31 मार्च 2010

श्री गोवर्धन महाराज जी क़ी आरती



आरती

आरती श्री गोवर्धन महाराज जी क़ी
श्री गोवार्धर महाराज महाराज
तेरे माथे मुकुट विराजे रहो।
टोपे पान चढे दूध क़ी धार, ओ धार। तेरे माथे...
तेरे कानन में कुंडल सोहे,
तेरे गले वैजयंती माल। तेरे माथे...
तेरी सात कोस क़ी परिकम्मा,
तेरी दे रहे नर और नार। तेरे माथे...
तेरे मानसी गंगा बहे सदा
तेरी माया अपरम्पार। तेरे माथे...
ब्रज मंडल जब डूबत देखा,
ग्वाल बाल जब व्याकुल देखे,
लिया नख पर गिर्वर्धार। तेरे माथे...
वृन्दावन क़ी कुञ्ज गलिन में,
वो तो खेल रहे नंदलाल तेरे माथे...
चन्द्रसखी भजवाल कृष्ण छवि,
तेरे चरणों पै बलिहारी। तेरे माथे...

नवदुर्गा जी क़ी आरती




आरती

आरती जगदम्बे जी क़ी
ओ आंबे, तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गावें भारती ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
तेरे भक्त जनों पर मैया भीड़ पड़ी है भारी,
दानव दल पर टूट पदों माँ, करके सिंह सवारी,
सौ सौ सिंहों से है बलशाली, ओ मैया.... ।
माँ-बेटे का है इस जब में बड़ा ही निर्मल नाता,
पूत-कपूत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता
सब पे करुना दर्शाने वाली, सबको हरषाने वाली,
नैया भंवर से उबारती, ओ मैया... ।
नहीं मांगते धन और दौलत, ना चांदी न सोना,
हम तो मांगे माँ तेरे चरणों में एक छोटा सा कोना,
सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली,
सतियों के सत को संवारती, ओ मैया... ।

शाकुम्भरी देवी जी क़ी आरती



आरती

शाकुम्भरी देवी जी क़ी आरती
हरि ॐ शाकुम्भरी अम्बा जी क़ी आरती कीजो
ऐसो अद्भुत रूप हृदय धर लीजो,
शताक्षी दयालु क़ी आरती कीजो॥
तुम परिपूर्ण आदि भवानी माँ,
सब घाट तुम आप भाखानी माँ॥ श्री शाकुम्भर...
तुम हो शाकुम्भर, तुम ही हो शताक्षी माँ,
शिव मूर्ती माया प्रकाशी माँ॥ श्री शाकुम्भर...
नित जो नर नारी तेरी आरती गावे माँ,
इच्छा पूरण कीजो, शाकुम्भरी दर्शन पावे माँ॥ श्री शाकुम्भर...
जो नर आरती पढ़े पढावे माँ
जो नर आरती सुने सुनावे माँ
बसे बैकुंठ शाकुम्भर दर्शन पावे॥ श्री शाकुम्भर...

भूत का पिंड छूट गया



वाणी और वर्मा के कोई संतान न थी। पर वे इतने भले थे कि सारे गाँव के लोग उनके भलेपन की सदा चर्चा किया करते थे।

एक दिन रात को मूसलधार वर्षा हो रही थी। वर्मा और वाणी खाने के लिए बैठने ही वाले थे कि बाहर से किसी ने जोर से दर्वाजे पर दस्तक दी। किवाड़ खोलकर देखा तो वर्षा में भीगा एक युवा दंपति उन्हें दिख़ाई दिया।

‘‘शहर में जाते हम वर्षा में फंस गये। क्या आज की रात आप के घर में आश्रय मिल सकता है?'' उस दंपति ने पूछा।

‘‘अन्दर आ जाइये।'' इन शब्दों के साथ वाणी ने उनका स्वागत किया, खाना खिलाकर उनके सोने का प्रबंध किया।

उनके भोजन करने के बाद थोड़ा ही खाना बचा था। वाणी ने उसे अपने पति को खाने को कहा। क्योंकि फिर से खाना बनाने के लिए लकड़ियाँ न थीं, भीग गई थीं।

वर्मा ने हठ किया, ‘‘हम दोनों आधा-आधा खा लेंगे।'' इसके बाद दोनों ने बात करते थोड़ा-थोड़ा खा लिया और सो गये।

सवेरे किसी के रोने की आवाज़ सुनकर वे चौंककर उठ बैठे। घर के किवाड़ खुले थे। ड्योढ़ी पर रात को आई हुई औरत फूट-फूटकर रो रही थी। इस पर वाणी और वर्मा अचरज में आ गये और उसके रोने का कारण पूछा।

‘‘मैं क्या बताऊँ? मेरी गृहस्थी डूब गई। रात को मैं इस घर में न आती तो अच्छा होता। मेरे पति आप दोनों का सरल प्रेम देख बोले, ‘‘क्या तुमने कभी इस गृहिणी जैसा मेरे साथ प्यार किया है? जो पत्नी अपने पति के साथ प्यार नहीं कर सकती, वह पत्नी ही क्यों?''

इसके बाद मेरे समझाने पर भी चले गये। वे बड़े ही हठी हैं, फिर लौटकर आनेवाले नहीं हैं।'' सिसकियाँ लेते बोली। उसका नाम चन्द्रमती था।

वर्मा ने बड़ी उद्विग्नता के साथ चन्द्रमती के पति की खोज़ की। पर कहीं उसका पता न चला।

‘‘मैं जानती हूँ, वे लौटकर नहीं आयेंगे। मेरा अपना तो कोई नहीं है। किसी कुएँ में कूदकर जान दे दूँगी।'' यों कहते चन्द्रमती फिर रो पड़ी।

उसकी हालतपर उस दंपति का दिल पिघल उठा। उन लोगों ने समझाया, ‘‘तुम बिलकुल चिंता न करो। अपने पति के लौटने तक तुम हमारे ही घर रहो।'' उस दिन से चन्द्रमती उस परिवार की एक सदस्या के रूप में रहने लगी। वह देखने में नरम स्वभाव की सी लगी। रात को वही रसोई बनाती थी।

एक महीना बीत गया। वर्मा का बचपन का दोस्त मुरारी चार-पाँच दिन वर्मा के घर बिताने के ख़्याल से आया। वह दो-चार महीनों में एक बार अवश्य आया करता था। पिछली बार जब आया था, चन्द्रमती न थी। उसने वर्मा के द्वारा चन्द्रमती की सारी कहानी जान ली। उस दिन रात को चन्द्रमती ने ही सब को खाना परोसा। भोजन के बाद मुरारी दालान में खाट लगाकर लेट गया।

मगर बड़ी देर तक मुरारी को नींद नहीं आई। आधी रात के व़क्त कोई आहट पाकर उसकी आँख खुल गई। चन्द्रमती हाथ में दिया लेकर धीरे से रसोई घर के किवाड़ खोल रही थी। रसोई घर के उस पार की खिड़की पर किसी के द्वारा दस्तक देने की आवाज़ सुनाई दी।

मुरारी को चन्द्रमती का व्यवहार और खिड़की पर से आहट सुनकर संदेह हुआ। चन्द्रमती के रसोई घर में पहुँचते ही मुरारी झट से उठ बैठा। छोटी खिड़की में से रसोई घर के अन्दर झांका। चन्द्रमती एक पात्र में चावल, दाल, सब्जी और दही रखकर खिड़की में से भीतर पहुँचे हाथों में थमा रही थी।

खिड़की के उस पार का व्यक्ति कह रहा था, ‘‘और कितने दिन यों आधी रात को भोजन करना होगा? किसी उपाय से तिजोरी का धन हड़पकर जल्दी आ जाओ।'' वह व्यक्ति अंधेरे में था, इसलिए मुरारी को दिखाई नहीं दिया।

‘‘इन लोगों का विश्वास अभी अभी मुझ पर जम रहा है। जल्दी ही चाभियों का गुच्छा मेरे हाथ में आ जाएगा। तुम थोड़ा सब्र करो।'' चन्द्रमती ने कहा।

‘‘अरी चोर की बच्ची! बाहर से भोली बनकर मेरे दोस्त की उदारता को आसरा बनाकर अपने मर्द के साथ मिल कर यह नाटक रच रही हो! हाँ, देखती रह जाओ, मैं तुम्हारा नाटक बंद करवा देता हूँ।'' यों मुरारी ने अपने मन में सोचा। तब जाकर वह लेट गया। फिर उसने निश्चय किया कि चन्द्रमती का यह समाचार वाणी-वर्मा को सुनाकर उनके मन को दुखाये बिना उनके घर से भूत का पिंड़ छुड़ा देना है।

दूसरे दिन सवेरे मुरारी ऊँची आवाज़ में वर्मा से कहने लगा, ‘‘बाप रे बाप! रात को मैं पल भर भी सो नहीं पाया। लगता है कि इस घर में कोई भूत घुस आया है। मैंने पूरब की ओर जो खाट लगाई थी, उसे पश्चिम की ओर खींच ले गया है। खिड़की में पीने के जल का जो बर्तन रखा था, वह ख़ाट के नीचे पहुँच गया है। मैं तो हिम्मतवर हूँ, दूसरा होता तो मर जाता।''

वाणी और वर्मा ये बातें सुन घबरा गये और बोले, ‘‘तब क्या ओझा को बुलवा लें?''

‘‘आप घबराइये नहीं। मैं सब प्रकार के भूतों को भगा सकता हूँ।'' मुरारी ने उन्हें हिम्मत बंधवाई। दूसरे दिन वह बाजार से पायल ख़रीद लाया और रात को जब-तब आवाज़ करने लगा। इसके बाद उसने तकिये को चारपाई पर सीध में लगाया, उस पर दुपट्टा डाल कर पिछवाड़े में गया, रसोई घर की खिड़की पर दस्तक दी।

बड़ी देर बाद हिम्मत कर चन्द्रमती आई, पात्र में सारी चीज़ें लगाकर उसने मुरारी के हाथों में वह पात्र थमा दिया। मुरारी झट से घर के अंदर आया। उस पात्र को चन्द्रमती की चारपाई पर रखकर मुरारी ने चारपाई को दूसरी ओर खींचा, तब चुपचाप आकर अपनी खाट पर लेट गया।

चन्द्रमती थोड़ी देर तक पात्र की प्रतीक्षा में खड़ी रही, खिड़की के समीप बाहर अपने पति का पता न पाकर रसोई घर के किवाड़ बंद किये, अपने कमरे में पहुँचकर चीख़ उठी।

उस चिल्लाहट से वर्मा और वाणी चौंककर जाग चन्द्रमती की खाट के पास दौड़े आये। वहाँ पर मुरारी भी इस तरह आ पहुँचा, मानो उसी व़क्त उठा हो।


चन्द्रमती सहमती आवाज़ में बोली, ‘‘भूत की बात सच है। मुझे भी पायलों की आवाज़ सुनाई दी है। उस ओर की खाट इस ओर आ लगी है। इसलिए घबड़ाकर उठ बैठी हूँ। देखिये, रसोई घर का पात्र मेरी खाट पर आ गया है।''

मुरारी ने ढाढ़स बंधाकर कहा, ‘‘आप लोग डरियेगा नहीं, मैं भूत की ख़बर लूँगा।'' इसके बाद वह दो दिन तक रात में पायलों की आवाज़ करता ही रहा। इसलिए अपने पति के द्वारा रसोई घर की खिड़की पर दस्तक देने पर भी चन्द्रमती अपने कमरे से बाहर आने में डर गई।

तीसरे दिन रात को मुरारी बाहर ताक में बैठा रहा। चन्द्रमती के पति को पिछवाड़े के रास्ते में जाते देख वह भी उसी रास्ते जानेवाले जैसा अभिनय करते गुनगुनाने लगा, ‘‘क्या वह मेरी बहन के प्रति ऐसा द्रोह करेगा? मैं भी देख लूँगा।''

चन्द्रमती का पति बाहर खड़ा रहा। उसने शंका भरी आवाज़ में पूछा, ‘‘अजी, बात क्या है? क्या हुआ है?''

‘‘और क्या होना है जी! इस घर के मालिक मेरे बहनोई साहब हैं, मेरी बहन के कोई संतान नहीं है। इस घर में कोई औरत आकर जम गई है जिसे उसके पति ने त्याग दिया है। अब मेरे बहनोई कहते हैं कि वे उस औरत के साथ शादी करेंगे। वह औरत भी इसके लिए तैयार है।'' यों कहते तेजी के साथ चला गया, फिर दूसरे रास्ते से आकर अपनी ख़ाट पर सो गया। मुरारी की बात पर चन्द्रमती के पति का विश्वास जम गया। क्योंकि वह उधर तीन दिन से खिड़की के पास खाना देने नहीं आई थी।

फिर क्या था, दूसरे दिन सवेरे चन्द्रमती के पति ने प्रवेश करके वर्मा से कहा, ‘‘मैं मूर्खता वश अपनी पत्नी को यहाँ पर छोड़ गया था। अब कृपया उसे मेरे साथ भिजवा दीजिए।''

भूत के भय से कांपनेवाली चन्द्रमती अपने पति के साथ खुशी-खुशी चली गई। उसके जाने पर वाणी और वर्मा यह सोचकर दुखी हो रहे थे कि चन्द्रमती के चले जाने पर उनका घर एक दम सूना-सा लगता है। तब मुरारी ने कहा, ‘‘तुम लोगों को यह सोचकर खुश होना चाहिए कि तुम्हें भूत से पिंड छूट गया है। उल्टे दुखी हो रहे हो?'' इसके बाद मुरारी ने उन्हें सारी सच्ची कहानी सुनाई और उनसे विदा लेकर चला गया।

गधा हमेशा गधा ही रहता है

जीवनसिंह एक धनी व्यापारी था। वह अक्सर निकट के शहर से अपनी दुकान के लिए सौदा लाने जाया करता था। वह अपने साथ अपने गधे को भी ले जाता था। एक दिन वह अपने गधे के साथ शहर से वापस लौट रहा था। वह शहर में बहुत देर तक घूमता रहा, इसलिए वह थक गया था। अतः एक छायेदार पेड़ के नीचे वह विश्राम करने लगा और शीघ्र ही उसे नींद आ गई।

अचानक कुछ छोटे बच्चों के ऊँचे स्वर में मन्त्रोच्चारण से उसकी नींद टूट गई। एक मुल्ला अपने घर पर कुछ बच्चों को पढ़ा रहा था। उसने मुल्ला को चिल्लाकर यह कहते सुना, ‘‘तुम पर चीखने-चिल्लाने का कोई लाभ नहीं । तुम सब गधे हो। मैं तुम्हें इनसान बनाने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन लगता है तुमने मेरी बात को न समझने के लिए कसम खा ली है।''

जीवनसिंह ने देखा कि बच्चे चुपचाप बाहर निकल रहे हैं। उसे अपने बचपन की याद आ गई जब उसने किसी स्कूल का मुँह नहीं देखा। उसका स्कूल उसके पिता की दुकान थी, वहीं उसने लिखना, पढ़ना, बोलना और हिसाब-किताब की जटिलता सीखी थी। इससे भी अधिक उपयोगी उसके पिता ने यह सिखाया था कि ग्रहकों के साथ कैसा बरताव करना चाहिये। उसने जीवन में पहली बार सोचा कि यहाँ एक ऐसा आदमी है जो गधों को इनसान बनाने की कोशिश कर रहा है। और उसके पास एक गधा है जो भार ढोने के अलावा और किसी लायक नहीं है। शायद उस काम के लिए गधे को बुद्धि की ज़रूरत नहीं होती।

मुल्ला को बड़ी हँसी आई जब जीवनसिंह ने पेड़ के नीचे सोते हुए जो कुछ सुना, उसे बताते हुए मुल्ला से अपने गधे को इनसान बनाने के लिए अनुरोध किया। मुल्ला ने देखा कि व्यापारी बड़ी सच्चाई से कह रहा है। ‘‘ठीक है'', उसने कहा, ‘‘गधे को यहाँ छोड़ जाओ और तीन महीनों तक उसे खिलाने के लिए काफी धन दे जाओ। उसके बाद उसे तुम ले जा सकते हो।''

जीवनसिंह ने बचा हुआ धन उसे दे दिया, गधे पर से सामान उतारा और अपनी पीठ पर लाद लिया और उसे धन्यवाद देकर वह घर की ओर चल पड़ा। चालाक मुल्ला गधे को तब तक अपने उपयोग के लिए रखना चाहता था जब तक व्यापारी उसे लेने के लिए न आ जाये। आखिर खिलाने के लिए उसे कौन-सा अपना धन खर्च करना था।

तीन महीनों के बाद जीवनसिंह ठीक समय पर यह आशा लिये आ गया कि एक मज़बूत नवयुवक उसे उसका इन्तज़ार करता हुआ मिलेगा। मुल्ला ने मुस्कुराते हुए उसका स्वागत किया, ‘‘तुम्हारा गधा मेरी अपेक्षाओं से कहीं आगे निकला। कुरान की सतरें याद करते समय धीरे-धीरे वह एक ख़ूबसूरत नौजवान में बदल गया। अगले गाँव का मुखिया मर गया था और गाँव वाले उसके स्थान पर रखने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश कर रहे थे। वे लोग मुझसे मेरी सलाह मांगने आये। मैंने गधे से आदमी बने युवक की सिफारिश की। गाँव के वयोवृद्ध मेरे एहसानमन्द हो गये। वे युवक को ले गये।''

जीवनसिंह बहुत प्रसन्न हो गया। फिर भी, वह अचानक अपने गधे की कमी महसूस करने लगा। उसने अनुभव किया कि ऐसे बुद्धिमान नवयुवक की सेवा उसे ही मिल पाती तो उसे कितनी खुशी होती! उसने फिर पड़ोसी गाँव में जाकर उससे मिलने का निश्चय किया। वह सीधे मुखिया के घर पर पहुँचा।

मुखिया उस समय वरिष्ठ लोगों से विचार-विमर्श कर रहा था। जीवनसिंह ने देखा कि मुखिया वैसा सुन्दर और युवा नहीं है जैसा कि मुल्ला ने कहा था। लेकिन जिस तरह उसने गाँव की समस्याओं को सुलझाया उससे वह निश्चित रूप से बुद्धिमान लगा। जब विचार-विमर्श ख़त्म हो गया, जीवनसिंह ने पास जाकर अभिवादन किया। ‘‘अरे यार, क्या तुमने मुझे पहचाना नहीं? मैं तुम्हारा मालिक हूँ। मैंने तुम्हें तालीम याफ्ता मुल्ला के पास छोड़ दिया था।''

मुखिया ने, सौभाग्यवश, इस अनजान आदमी के व्यवहार का बुरा न माना। बल्कि शिष्टतापूर्वक कहा, ‘‘महोदय, मैं इस गाँव का मुखिया हूँ। मैं नहीं समझता तुम क्या कह रहे हो और कैसे तुम मेरे मालिक थे।'' उसने देखा कि गाँव के सभी वयोवृद्ध जन एक दूसरे को और उत्सुकता से आगन्तुक को कैसे देख रहे हैं।

जीवनसिंह ने तब तीन महीने पहले मुल्ला के साथ हुई भेंट के बारे में उसे बताया। यह सुनकर मुखिया ठठाकर हँसा कि कभी वह व्यापारी का गधा था। उसने बुरा न माना, बल्कि उस सीधे सादे आदमी के लिए इस मज़ाक को और आगे बढ़ा दिया। ‘‘मेरे अच्छे दोस्त'', उसने जीवनसिंह के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘मुल्ला को समझने में गलती हो गई। वास्तव में तुम्हारा गधा फकीर हो गया है जो अनेक धर्मों का मुखिया है। तुम उसी से जाकर मिलो।''

व्यापारी अब फकीर की तलाश करने निकला। वह दिन भर गलियों, हाटों, मस्जिदों, दरगाहों पर भटकता रहा, लेकिन फकीर कहीं नहीं मिला। शाम हो रही थी। आखिर वह थकामांदा पानी पीने के लिए-नदी किनारे पहुँचा। वहाँ उसने एक फकीर को देखा। वह नदी किनारे प्रार्थना कर रहा था। प्रार्थना खत्म होने के बाद जीवनसिंह उससे मिला। ‘‘क्या तुम्हें याद है कि पड़ोसी गाँव के मुल्ला ने तुम्हें कुरान की आयतें सिखाई थीं और फकीर में बदल दिया था। इससे पूर्व तुम मेरे गधे थे और मैं तुम्हारा मालिक था।''

‘‘क्या मैं गधा था? मैं क्या सुन रहा हूँ! मैं किसी मुल्ला को नहीं जानता । मैंने कुरान की आयतें मदरसा में सीखीं। जो भी हो, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न?'' फकीर ने चिल्ला कर पूछा। ‘‘मैं समझता हूँ कि तुम्हें मतिभ्रम का रोग हो गया है। मेरे पास जादू की कुछ शक्तियॉं हैं जिनसे मैं तुम्हें ठीक कर सकता हूँ, लेकिन इससे पहले तुम्हें अपने गधे के बारे में सब कुछ बताना होगा!''

जीवनसिंह, जिसे डर था कि फकीर अब मार बैठेगा, यह देख कर शान्त खड़ा था कि फकीर नरम पड़ गया है। इसलिए उसने विस्तारपूर्वक सब कुछ बता दिया, जिससे जादू का प्रभाव ठीक ठीक पड़ सके। उसे आशा के विपरीत आशा होने लगी कि फकीर का जादू अन्त में उसी का गधे में बदल देगा और अपने पहले मालिक को पहचान लेगा।

फकीर आँखें बन्द कर तब तक बैठ चुका था। जीवनसिंह भी साँस रोक कर उसके सामने बैठ गया। फकीर ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और कहा, ‘‘मेरे अच्छे दोस्त, जब कोई बहादुरी का काम करता है, तब हम उसे शेर कहते हैं । जब कोई चालाकी करता है तब हम उसे दुष्ट कहते हैं। हम उसे लोमड़ी भी कह सकते हैं। हम जब अपनी भावनाओं को इस तरह प्रकट करते हैं तब लोग बेहतर समझते हैं। वैसे ही जब मुल्ला ने देखा कि बच्चे उसकी तालीम को देर से समझते हैं, तब उसने उन्हें गधा कहना ज्यादा पसन्द किया, यद्यपि वह अपने दिल में यही ख्वाहिश करता रहा कि कैसे वह इन छोटे ‘गधों' को बुद्धिमान मनुष्य बना दे। कहने के ढंग में मुल्ला की गलती नहीं है और न तुम्हारी गलती है कि क्यों तुमने मुल्ला से अपने गधे को इनसान में बदलने की उम्मीद की। लेकिन जब तुम मुल्ला के पास अपने गधे को लेकर गये, तब उसने तुम्हारी बेवकूफी से फायदा उठाया। याद रखो, गधा हमेशा गधा ही रहता है। गधे को इनसान नहीं बना सकते। लेकिन तुम जैसे इनसान को गधा ज़रूर बनाया जा सकता है जो मुल्ला ने कर दिखाया। मुल्ला के पास वापस जाओ और तुम्हें उसके घर के पिछवाड़े में तुम्हारा गधा बँधा हुआ मिल जायेगा! मेरी दुआ तेरे साथ है।''

‘‘धन्यवाद, हे परम आदरणीय महाराज!'' जीवनसिंह ने खड़ा होते हुए कहा। ‘‘आज मैंने जीवन में पहला पाठ सीखा है। मैं सीधा मुल्ला के पास जाकर अपना गधा माँगूंगा। मैं अपने गधे को कभी अलग नहीं कर सकता भले ही वह बेदिमाग हो।''

जैसा कि फकीर ने अनुमान लगाया था, गधा मुल्ला के घर के पिछवाड़े में मिल गया। मुल्ला वहाँ पर नहीं था, इसलिए जीवनसिंह अपने गधे को साथ ले कर वहाँ से अपने घर की ओर चल पड़ा। व्यापारी उस दिन गधे पर सवार नहीं हुआ, जैसा कि हमेशा किया करता था, यद्यपि उसके पास उस दिन कोई बोझ नहीं था।

लाभ-हानि


कामेश मनौती पूरी करने एक दिन रामेश को लेकर पैदल चल पड़ा। उसे ब्रह्मपुर का मंदिर जाना था। रास्ते में बारिश से दोनों भीग गये। कामेश लगातार छींकने लगा, तब रामेश ने उसे सलाह दी, ‘‘हर दिन स्नान के बाद तुलसी के पत्ते खाना। जुकाम से बचोगे। मैं खुद इसका उदाहरण हूँ।''

‘‘तुलसी के पत्ते खाने मात्र से क्या छींकें रुक जायेंगी?अपनी व्यर्थ राय मुझपर थोपना मत।'' कामेश ने चिढ़ते हुए कहा।

ब्रह्मपुर पहुँचकर दोनों वैद्य के पास गये। रामेश ने वैद्य से कहा, ‘‘मैंने इससे कहा कि हर रोज़ तुलसी के पत्ते खाने से जुकाम से बचोगे। पर, यह विश्वास ही नहीं करता। कृपया इसे समझाइये।'' उसने कामेश की शिकायत की।

वैद्य ने उसे क्रोध से देखते हुए कहा, ‘‘मेरे पास आनेवाले अधिकाधिक जुकाम से ही पीड़ित रोगी हैं। मैं इसे रोकने के लिए अचूक दवा देता हूँ'', कहते हुए उसने तीन दिनों की दवा दी।

कामेश, रामेश की हार पर खुश हुआ और दवा खा ली। दवा लेने के बाद भी वह छींकने लगा तो रामेश बोला, ‘‘बता चुका हूँ दवा लेने के बाद भी छींकें आती रहेंगी। मेरी मानो, हर रोज़ तुलसी के पत्ते खाना शुरू कर दो।''

‘‘बाप रे, तुम तो तुलसी के पत्तों पर, ज़ोर देते जा रहे हो।'' चिढ़ते हुए कामेश ने कहा। जब दोनों मंदिर की सीढ़ियों पर चलने लगे तब एक आदमी लगातार छींकता रहा। रामेश उसे तुलसी के पत्ते खाने की सलाह देने लगा। उस समय धनराज नामक एक व्यक्ति कामेश को प्रणाम करते हुए कहने लगा, ‘‘एक साधु ने कहा है कि इस मंदिर में आनेवाले किसी भक्त से बीस अशर्फ़ियाँ लेकर व्यापार करोगे तो काफी धन कमाओगे। क्या आप मेरी सहायता कर सकेंगे?''

रामेश को सताने का अच्छा मौका कामेश को मिला। उसने रामेश को दिखाते हुए उस व्यक्ति से कहा, ‘‘तुम एक-एक करके उस के पास आदमी भेजते जाओ और हर कोई उससे यह पूछे कि जुकाम का क्या उपाय है। फिर उससे दान माँगे। वह हरेक को एक अशर्फी देगा।''


धनराज ने कामेश के अनुसार एक-एक करके बीस आदमियों को उसके पास भेजा। रामेश ने धैर्य के साथ उन्हें तुलसी के पत्तों को खाने की सलाह दी। एक ने कहा, ‘‘हमारे गॉंव में तुलसी के पौधे नहीं हैं, क्या मैं उनके बदले आंवले के पत्ते खा सकता हूँ?'' एक और ने कहा, ‘‘मेरी स्मरण शक्ति कमज़ोर है। क्या हर दिन मेरे घर आकर याद दिला सकते हो?''

वे रामेश का मखौल उड़ाते रहे, पर वह नाराज़ नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद एक आदमी ने धनराज को रामेश के पास लाकर कहा, ‘‘ये महाशय ही आपका मज़ाक उड़ाने के लिए आप के पास आदमियों को भेज रहे हैं।''

रामेश ने धनराज को ग़ौर से देखा। धनराज की समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दे। पर अपने को संभालते हुए उसने कहा, ‘‘हम जो भी करते हैं, उससे होनेवाले लाभ और हानि एक समान होने चाहिये। अपनी ही बात पर डटे रहोगे तो तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा। इससे तुम हँसी के पात्र बन जाओगे। तुम यह जानो, इसी के लिए मैंने यह नाटक किया।''

‘‘तुलसी की चिकित्सा से एक को भी लाभ होगा तो पर्याप्त है। इस पर मेरा कोई मखौल उड़ाये भी तो मुझे कोई हानि नहीं पहुँचेगी।'' रामेश ने हँसते हुए कहा।

तब धनराज ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘उस आदमी का धन मुझे नहीं चाहिये, जो आपका मखौल उड़ाता है। उससे मेरा लाभ नहीं होगा। मुझे आप माफ कर दीजिए।''

रामेश ने उसे बीस अशर्फियाँ देते हुए कहा, ‘‘तुम व्यापार शुरू कर दो। जिस काम को अच्छा समझते हो, उसके बारे में अधिकाधिक लोगों से कहते रहना।''

फिर एक बार कामेश, रामेश के हाथों हार गया, उसका चेहरा फीका पड़ गया।

बचपन में सुनी कहानी

एक दिन शाम को जब बच्चे खेल रहे थे, तब उन्हें कांटों की झाड़ियों के बीच एक अंडा दिखायी पड़ा। बच्चों ने सहज ही कुतूहलवश उस अंडे को अपने हाथों में लिया और उसे बड़े ही ग़ौर से देखने लगे। वे इस निर्णय पर नहीं आ सके कि यह अंडा है या और कुछ। उस समय उस रास्ते से गुज़रते हुए एक आदमी ने उन बच्चों को एक आणा देकर उसे खरीद लिया। वह आदमी भी उस अंडे को ग़ौर से देखने लगा। उसने उसे उलट-पलटकर खूब देखा, पर उसकी समझ में नहीं आया कि यह किस पक्षी का अंडा है। उसने सोचा ‘इस अंडे को ले जाकर राजा को दूँ तो वे अवश्य ही पुरस्कार देंगे।' बड़ी आशा लेकर वह उस अंडे को राजा के पास ले गया। राजा ने उस आदमी को पुरस्कार दिया और स्वयं तल्लीन होकर देखने लगे कि यह किस पक्षी का अंडा हो सकता है। किन्तु उनकी भी समझ में नहीं आया। उन्होंने उसे राज दरबार के दरबारियों के हवाले किया और यह बताने के लिए कहा कि यह किस पक्षी का अंडा है। उन्होंने भी उसे अपने हाथों में लिया और उलट-पलटकर देखा। वे भी किसी निर्णय पर नहीं आ पाये।

वह अंडा जब एक खिड़की में रखा गया तब एक मुर्गे ने उसे अपनी चोंच से मारा। फिर भी वह नहीं फूटा। अब विश्वस्त रूप से मालूम हो गया कि वह अंडा नहीं है। अब इस समस्या का हल कैसे होगा, कौन करेगा? सभासदों की सलाह लेकर राजा ने सब पंडितों और विज्ञों को बुलवाया और पूछा, ‘‘यह कौन-सा अंडा है? असल में यह अंडा है या नहीं? फैसला कीजिये और बताइये।'' उन सबने उसे ध्यान से देखा, उसकी खूब परीक्षा की और कहा, ‘‘यह हमसे संबंधित विषय नहीं है। इसके बारे में वे ही लोग बता सकते हैं, जो भूमि पर खेती करके जीते हैं। आप देश के किसानों को बुलवाइये और उनकी राय लीजिये।''

राजा ने मुनादी पिटवायी कि ‘‘कृषि क्षेत्र में जो प्रवीण हैं, उनमें से कोई आगे आये और इस पहेली को सुलझाये।'' पर कोई नहीं आया।

इतने में सैनिक राज्य भर में ढूँढ़कर एक ऐसे किसान को ले आये, जो बढ़िया फसल उगाता था, जिसकी भूमि बहुत ही उपजाऊ थी। यह किसान चल नहीं सकताथा । दो लकड़ियों के आधार पर चलता हुआ वह बूढ़ा किसान राजा के पास आया। वह बूढ़ा किसान सुन नहीं सकता था, उसे दिखायी भी नहीं देताथा । यानी वह किसान लंगड़ा, बहरा और अंधा था।

राजा के पास जो अंडा था, उसे उसने टटोलकर देखा और कहा, ‘‘मैंने अपने पूर्वजों से सुना है कि वे इतने बड़े-बड़े मक्के उगाते थे, जिनके दाने अंडे जैसे बड़े-बड़े होते थे। पर मैंने तो इतना बड़ा मक्का कभी नहीं उगाया। पर मेरे पिताजी यह कहा करते थे कि अपने जमाने में वे इतने बड़े-बड़े धान्य के दाने उगाते थे।'' कांपते हुए बड़े ही नीरस स्वर में उस किसान ने कहा। उसकी बातें सुनकर राजा निराश नहीं हुए। उन्होंने अपनी हठ भी नहीं त्यजा।

राजा ने सैनिकों को आज्ञा दी कि वे इस बूढ़े के पिता को ढूँढ़कर ले आयें।

दूसरा जो किसान आया, लकड़ी के सहारे वह धीरे-धीरे लंगड़ाता हुआ आया। आँखों से वह देख तो सकता था, पर उसे सुनाई नहीं पड़ताथा । वह आदमी देखने में इतना कमज़ोर भी नहीं लगताथा । राजा ने उसे अंडा जैसे धान्य के दाने को दिखाते हुए पूछा, ‘‘क्या तुमने इसे कभी देखा? क्या अपने खेत में तुमने इसे उपजाया?'' तो उसने कहा, ‘‘नहीं, मैंने कभी नहीं देखा, उपजाया भी नहीं। ऐसे बड़े धान्य के दाने के बारे में मेरे पिताजी कहा करते थे। मेरे पिताजी से पूछियेगा।''

उस तीसरे दादा को यानी दो लकड़ियों के सहारे आये किसान के दादा को सिपाही ढूँढ़कर ले आये। यह बूढ़ा आराम से पैदल चल कर आया। उसके दोनों पैर बिलकुल ही सही सलामत थे। आदमी भी हट्टा-कट्टा था। उसे अच्छी तरह सुनायी पड़ता था। आँखें देख सकती थीं।

राजा ने अंडा जैसा बड़ा दाना उसके हाथ में रखा और पूछा, ‘‘दादा, क्या कभी ऐसे धान्य के दाने को इसके पहले कभी देखा?''

दाने को हथेली से पकड़कर उसने कहा, ‘‘कितने लंबे समय के बाद इतना सुंदर धान्य देखने को मिला। अपने बचपन में हमारे खेत में ऐसा ही धान्य उपजाते थे।'' आश्चर्य और आनंद से भरे स्वर में उसने कहा।

‘‘क्या इतना बड़ा दाना अपने खेत में उपजाते थे?'' राजा ने पूछा।

‘‘हाँ, हमारे खेत में अंडे जैसे बड़े-बड़े दाने उगाते थे। उस खेत से उगे हर दाने से हथेली भर का आटा निकलता था। इससे वहाँ के सब लोग पेट भर खाते थे और संतृप्त होते थे'', बूढ़े ने राजा से स्पष्ट कहा।


राजा ने आश्चर्य-भरे स्वर में पूछा, ‘‘दादा, तुम्हारा खेत कहाँ है?''

‘‘वह किसी एक का खेत नहीं था। सबका था। भगवान ने खेती करने के लिए यह भूमि सब मनुष्यों को दी।'' दादा ने कहा।

‘‘जो उपजाते थे, वह सबके लिए पर्याप्त होता था? बचा-खुचा क्या करते थे?'' राजा ने पूछा।

‘‘बेचना-खरीदना हम जानते ही नहींथे । सच कहा जाए तो उस ज़माने में हम धन के बारे में जानते ही नहीं थे। सब मिल-जुलकर मेहनत करते थे। जो उपजाते थे, सब आपस में बांट लेते थे और पेट भर खाते थे। हमारे बचपन में धान्य का दाना इतना बड़ा और इतना मजबूत होता था'', दादा ने कहा।

‘‘तो फिर अब ऐसा क्यों नहीं है?'' राजा ने पूछा।

‘‘मानव में धन की आशा बहुत बढ़ गयी। कोई एक मेहनत करे तो दूसरा उसे खरीद लेता है। यह धन क्या आया, फसलें और दाने क्रमशः छोटे-छोटे होते जा रहे हैं'', दादा ने कहा।

‘‘दादा, मेरा एक संदेह है। तुम बिलकुल सही-सलामत हो। पैर, कान, आँखें सब इंद्रियाँ अच्छी तरह काम कर रही हैं। तुम्हारे बेटे का एक पैर नहीं है। पोते के दोनों पैर नहीं हैं। तुमसे भी अधिक बूढ़े लग रहे हैं। इसका क्या कारण है?'' राजा ने पूछा।

‘‘अपने जमाने में हम खूब मेहनत करते थे और खेती करते थे। समान रूप से मेहनत करते थे और सब एक समान खाते-पीते थे। अब मेहनत करनेवाले कम हो गये, बैठकर खानेवालों की संख्या बढ़ गयी। मेरा बेटा और मेरा पोता दोनों इसी श्रेणी में आते हैं। भगवान ने हमें यह भूमि दी, परिश्रम करके हल चलाने और फसल उगानेके लिए । भूमाता की दी हुई फसल को बराबर बांटनेके लिए । पर, अब ऐसा नहीं कर रहे हैं। इसी वजह से धान्य बीज दुबले-पतले हो गये हैं।'' वृद्ध ने गंभीर स्वर में कहा।

कितने ही साल पहले यह कहानी मेरे बहनोईजी ने सुनायी थी। तब मुझे मालूम नहीं था कि यह टालस्टॉय की कहानी है। सूर्य चंद्र की भी दृष्टि जहाँ नहीं जाती, वहाँ रचयिता की दृष्टि जाती है। टालस्टॉय ऐसे महान दार्शनिक थे।

परिवर्तन


अवंती राज्य में विनोद नामक एक युवक राजदरबार के एक छोटे कर्मचारी के पद पर नियुक्त हुआ। उसका पिता राजदरबार में नौकरी करते मर गया था, इसलिए विनोद को वह नौकरी प्राप्त हुई। काफी समय तक विनोद ने शादी नहीं की क्योंकि वह बड़ी नौकरी पाकर अपनी पत्नी की दृष्टि में बड़ा आदमी कहलाना चाहता था।

मगर अपनी माँ के जोर देने पर विनोद ने आख़िर एक गरीब किसान की बेटी चन्द्रा से शादी कर ली। वह खूबसूरत और सुशील भी थी। वह किफ़ायत के साथ ख़ातिर करना अच्छी तरह जानती थी। वह अपने पति और सास के साथ विनयपूर्वक व्यवहार भी करती थी।

पर विनोद अपनी पत्नी की नज़र में ऊँचा व्यक्ति कहलाने के ख्याल से पैसे पानी की तरह बहाने के कारण कर्जदार बन गया।

चन्द्रा अपने पति की कमाई से भली भांति परिचित थी। लेकिन वह कभी अपने पति को नहीं कहती कि हम संपन्न नहीं हैं, लेकिन अनावश्यक ख़र्च कम करने की सलाह देती रही।

विनोद क़िफ़ायत करना अपमान की बात मानता था। इसलिए वह पत्नी से कहा करता था, ‘‘हमें कंजूसी दिखाने की क्या जरूरत है? अपने पद के अनुकूल खर्च करना ही होगा।''

जब कर्जदार उसे कर्ज चुकाने का तकाजा करने लगे, तब उसने एक अच्छी नौकरी पाने की कोशिश की। लेकिन वह बेकार गई।

एक बार विनोद का मामा अपनी बहन व भानजे को देखने आया। वह राज दरबार में बड़े पद पर थे। विनोद ने सोचा कि अगर वे चाहें तो उसे अच्छी नौकरी दिला सकते हैं, इस ख्याल से उसने उनके सामने अपनी समस्या रखी।

विनोद से ये बातें सुन उसके मामा को आश्चर्य हुआ, क्योंकि विनोद की नौकरी कोई ख़राब न थी। उसकी योग्यता से कहीं ऊँची थी। अलावा इसके, विनोद की आमदनी उसके परिवार के ख़र्च के लिए पर्याप्त थी। वह उसमें से थोड़ा-बहुत बचा भी सकता था। साथ ही, वह अपनी नौकरी में दक्षता दिखाये तो ऊँचे पद पर भी जा सकता था।

इन सब बातों की जानकारी रखनेवाले विनोद के मामा अपने भानजे की इस बेवकूफी पर रहम खाकर बोले, ‘‘देखो विनोद! तुम्हें सबसे पहले अपनी नौकरी के प्रति विश्वास और आदर होना चाहिए। तभी तुम उस नौकरी में चमक सकते हो! ऊँचे अधिकारी अगर तुम्हारी प्रतिभा को पहचान लें तो तुम्हारा भला होगा। इसलिए तुम अपनी आमदनी से संतुष्ट होना सीखो।''

विनोद को अपने मामा की बातें अच्छी न लगीं। उसे गलतफ़हमी हो गई कि उसके मामा बहाना बना रहे हैं। विनोद के मन की बात उसके मामा ने भांप ली। उन्होंने पूछा, ‘‘सुनो बेटा, बताओ, किस तरह की नौकरी तुम चाहते हो?''

विनोद को लगा कि उसके भीतर नई स्फूर्ति आ गई है। उसने कहा, ‘‘अगर मुझे कोशाध्यक्ष या मण्डलाधिकारी का पद मिल जाये तो ओहदे के साथ अच्छी आमदनी भी हो सकती है।''

अपने भानजे की यह महत्वाकांक्षा देख उन्हें हँसी के साथ क्रोध भी आया। वे बोले, ‘‘अच्छी बात है! कोशाध्यक्ष मेेरे परिचित हैं। कल तुम मेेरे साथ चलो, मैं उनके द्वारा तुम्हें अच्छी नौकरी दिलाने की कोशिश करूँगा।''

दूसरे दिन विनोद अपने मामा के साथ राजधानी जाकर कोशाध्यक्ष के घर पहुँचा। कोशाध्यक्ष से एकांत में बात करने के बाद मामा ने उनके साथ विनोद का परिचय कराया।

कोशाध्यक्ष ने विनोद को एड़ी से चोटी तक परख कर देखा, उसकी नौकरी का हाल जान लिया, तब वे बोले, ‘‘तुम्हारा विचार वाकई अच्छा है, लेकिन जैसा तुम समझते हो, कोशाध्यक्ष का पद सुखदायक नहीं है। यह तो तलवार की धार है। इसमें धन के साथ संबंध है, इसमें थोड़ा भी अंतर आ गया तो दण्ड भोगना पड़ेगा। इस पद को संभालने के लिए बुद्धिमत्ता के साथ साहस और अनुभव की भी ज़रूरत है।''

पर विनोद को ये बातें अच्छी न लगीं।


कोशाध्यक्ष ने आगे यों बताया, ‘‘कोशाध्यक्ष का यह पद मुझे अचानक नहीं मिला। इस पद पर आने के पहले मैंने दरबार में घंटी बजाई, बाद में द्वारपाल बना, फिर दुर्ग पर पहरेदार नियुक्त हुआ। इसके बाद कोशागार का रक्षक बना। राजा ने कई बार मेरी कठिन परीक्षाएँ लीं, उनमें सफल होने के बाद ही उन्होंने मुझे यह पद दिया है। कई सीढ़ियाँ पार किये बिना क्या हम ऊपरी मंजिल पर पहुँच सकते हैं?''

विनोद को ये सारी बातें अनावश्यक लगीं। उसके चेहरे के बदलते रंग को मामा देख रहे थे। फिर कोशाध्यक्ष से विदा लेकर दोनों वहाँ से चल पड़े।

मामा ने विनोद को समझाया, ‘‘बेटा, उनकी बातों पर ध्यान न दो। मण्डल के अधिकारी भी मेरे दोस्त हैं। क्या हम उनसे भी मिलें?'' इस बात को सुनने के बाद विनोद के मन में फिर से आशा जगी। थोड़ी दूर जाने पर रास्ते में उन्हें दस युवक मिले। विनोद के मामा ने उनसे पूछा, ‘‘बेटे, तुमलोग कहॉं जा रहे हो?''

उनमें से एक ने जवाब दिया, ‘‘हम लोग बेकार शिक्षित व्यक्ति हैं। हमारी अ़क्लमंदी और शिक्षा हमारे पेट भरने का साधन न बन सकी। राजधानी में भी हमारी शिक्षा को जब मान्यता न मिली तो हम वहाँ क्यों रहें? इसलिए देहातों में जाकर हमलोग खेती-बाड़ी करके अपने पेट भरना चाहते हैं!''

यों बताकर वे लोग आगे बढ़ गये। ये बातें सुनने पर विनोद के मन में अचानक कोई परिवर्तन हुआ। उसके सारे भ्रम दूर हो गये।

मामा बोले, ‘‘विनोद, मण्डल के अधिकारी का घर समीप आ गया है, चलो, हम उनसे जाकर मिल लेंगे।''

‘‘मामाजी, अब किसी से मिलने की ज़रूरत नहीं है ! अपनी नौकरी से मैं संतुष्ट हूँ! आप की सलाह के मुताबिक ईमानदारी के साथ मेहनत करके मैं ऊँचा पद पाने की कोशिश करूँगा। मैंने नाहक़ आप को कष्ट दिया, मुझे माफ़ कर दीजिएगा।'' विनोद ने कहा।

विनोद की बातें सुन मामा बहुत प्रसन्न हुए।

अपने ही शिकारी कुत्तों का शिकार

ऐक्टियोंएक घमण्डी युवक था- सचमुच एक घमण्डी धावक और शिकारी। वह जंगल में इतनी तेजी से दौड़ सकता थाकि लोगों को वह जादूगर की तरह लगता जो कहीं तो अदृश्य हो जाये और कहीं प्रकट हो जाये। शिकारीके रूप में राज्य भरमें वह अद्वितीय था लेकिन इस मामलें में उसे श्रेय कुछ शिकारी कुत्तों को इतनी अच्छी तरहप्रशिक्षित करने के कारण मिला था कि वे निरन्तर अपने मालिक के लिए शिकार का पीछा करते औरउसे मारते या पकड़ कर ले आते।

डायनाजंगल की अधिष्ठात्री देवी थी। एक बार जब वह जंगल में घूम रही थी , उसने ऐक्टियों को हवा की सरसराहट केसमान दौड़ते हुए देखा। वह प्रसन्न और प्रभावित हो गई। वह भी जंगल में दौड़ना चाहती थी। लेकिनउसकी सखियों में उसकासाथ देने वाली या उसके साथ आँख-मिचौनी खेलनेवाली कोई नहीं थी।

डायनाने अपने साथ दौड़ने के लिए ऐक्टियों को निमन्त्रित किया। युवक रोमांचित हो उठा। एक देवीके साथ मित्रता एक गौरवपूर्ण उपलब्धि थी। वह देवी के साथ हर रोज दौड़ लगाने लगा जोदोनों के लिए बहुत मजेदार था। ऐक्टियों के शिकारी कुत्ते भी दोनों के पीछे-पीछे दौड़ते थे।

पहलेतो ऐक्टियों डायना के साथ बर्ताव में बहुत सावधान रहता था और उसके प्रति आदर का भावरखता था। लेकिन वह धीरे-धीरे उद्दण्ड होता चला गया , जैसा कि कहावत है- अधिक जान-पहचान से घटती है दोस्तीकी शान।

खेद है !!
कहानी अस्थाई तौर पर उपलब्द नही है ।

लोभ


कुमुद्वती राज्य की सरहदों पर प्रवाहित होनेवाली कुमुदिनी नदी तट पर सुप्रसिद्ध सोमशेखर मुनि का आश्रम हुआ करता था। गुरुकुल को चलानेवाले सोमशेखर मुनि शिष्यों को ध्यान की पद्धतियों के साथ-साथ चित्र लेखन भी सिखाया करते थे। वे चित्रलेखन के सिद्धहस्त कलाकार थे। अतः कलाओं में अभिरुचि रखनेवाले संपन्न लोग सुदूर प्रांतों से वहाँ आया करते थे और उनका माँगा शुल्क चुकाकर अपना चित्र बनवाकर ले जाते थे।

मुनि जिन चित्रों को बनाते थे, उनके लिए रक़म वसूल करने के विषय में बहुत ही सावधानी बरतते थे। इसपर लोगों को आश्चर्य भी होता था। कुछ लोग तो यह कहने में भी संकोच नहीं करते थे कि एक मुनि को इतना धन वसूल करना शोभा नहीं देता।

लोगों की इन टिप्पणियों की वे परवाह नहीं करते थे और उन्होंने चित्रलेखन द्वारा धन वसूल करने में कोई शिथिलता नहीं दिखायी।

एक दिन सजायी गयी सुंदर बग्घी में राजनर्तकी शुभांगी मुनि से मिलने आयी और उनसे अपना चित्र बनवाने की इच्छा प्रकट की।

‘‘अच्छी बात है। क्षणों में तुम्हारा चित्र बनाता हूँ। परंतु इसके लिए तुम्हें ज्यादा रक़म चुकानी होगी।'' मुनि ने कहा।

‘‘कोई बात नहीं। आप जितना माँगेंगे, दूँगी। कहिये, आपको कितना चाहिये?'' राजनर्तकी ने पूछा।

‘‘अपने स्तर के योग्य कितना दे सकोगी, तुम्हीं बताना,'' मुनि ने पूछा।

‘‘क्या सौ अशर्फियाँ पर्याप्त होंगी?'' उसने पूछा।

नर्तकी ने समझा कि यह सुनकर मुनि बेहद खुश होंगे।

‘‘दो सौ अशर्फियाँ,'' मुनि ने बिना हिचकिचाये कहा ।

मुनि की माँग जानकर नर्तकी अवाक् रह गयी। पर अपने को संभालती हुई उसने कहा, ‘‘यह तो बड़ी रक़म है। मुनियों को इतना बड़ा लोभ शोभा नहीं देता।''

‘‘इसमें सौदे की कोई गुंजाइश नहीं। जो रकम मैंने माँगी, उसे पहले ही चुकाना होगा। इसके बाद ही चित्र बनाने का काम शुरू करूँगा। मेरी शर्त तुम्हें स्वीकार नहीं है तो तुम जा सकती हो।'' मुनि ने स्पष्ट कह डाला।

मुनि की इन बातों से नर्तकी के स्वाभिमान को धक्का लगा। जिस काम के लिए आयी, उसे पूरा किये बिना लौटना वह क़तई नहीं चाहती थी। उसने दो सौ अशर्फ़ियाँ उनके सामने रखीं और कहा, ‘‘लीजिये, नीचे खड़ी हो जाती हूँ, चित्र बनाना।'' कहकर वह सामने के पेड़ के नीचे नृत्य भंगिमा में खड़ी हो गयी।

मुनि ने ध्यान से उसे नख से शिख तक देखा और चित्र बनाने में मग्न हो गया। थोड़ी ही देर में उन्होंने वह चित्र उसे दे दिया ।

चित्र को देखकर राजनर्तकी ने कहा, ‘‘निस्संदेह ही चित्र बहुत अच्छा बना है। पर इसे बनाने के लिए आपने जो रक़म मुझसे वसूल की वह बहुत ज्यादा है। इतनी रक़म जमा करके मरते समय आप क्या अपने साथ ले जायेंगे?'' कहती हुई तेजी से बग्घी में बैठकर निकल पड़ी।

चित्र बनाने का मुनि का काम जारी रहा और वे धन भी कमाते रहे । पर एक दिन, उन्होंने अचानक चित्र बनाने का काम रोक दिया और शिष्यों को ध्यान पद्धतियों को सिखाने में लग गये। जब राजनर्तकी को इसका पता चला तो वह इस परिवर्तन का कारण जानने के लिए आश्रम आयी।


पिछली बार जब वह आश्रम आयी थी तब रास्ता ऊबड-खाबड था, कंकडों और पत्थरों से भरा हुआ था, अस्तव्यस्त था, पर अब रास्ता बिलकुल साफ-सुथरा था। वह वैशाख पौर्णमी का दिन था।

आश्रम के प्रांगण में एक विशाल मंडप को देखकर उसे आश्चर्य हुआ। मंडप के बीचों-बीच सोमशेखर का प्रधान शिष्य बैठा हुआ था और वह शिष्यों व भक्तों को संबोधित करते हुए भाषण दे रहा था।

‘‘भानु प्रकाशनंद स्वामी की प्रबल इच्छा थी कि एक ध्यान मंदिर का निर्माण करूँ। परंतु उनकी इच्छा की पूर्ति के पहले ही उनका निधन हो गया। परंतु हमारे गुरुवर सोमशेखर स्वामी ने ध्यान मंदिर के निर्माण को अपना लक्ष्य बनाया और इसके लिए उन्होंने अनवरत परिश्रम किया। लोगों ने उन्हें लोभी, स्वार्थी कहा, पर उन्होंने इस लोक निन्दा की परवाह नहीं की। अपने चित्रलेखन के द्वारा धनार्जन किया और अपने गुरु की इच्छा पूरी की। अगली पीढ़ियों के लिए उपकार करके तपस्या करने वे अरण्य चले गये। उनकी कितनी ही प्रशंसा क्यों न करें, वह कम है। उन्हीं के कारण यह साफ-सुथरा मार्ग बना, यह ध्यान मंदिर बना। हम उनके ऋणी हैं।''

इन बातों को सुनते ही राजनर्तकी की आँखों में आँसू उमड़ आये। उसका मन पश्चाताप से भर गया। उसने उस मुनि को लोभी समझ लिया था जो इतने महान आत्मा और परोपकारी थे। उसे अपनी ग़लती महसूस हुई। मन ही मन उसने मुनि से क्षमा माँगी। इसके बाद उसने अपना कंठहार, सोने की चूडियाँ निकालीं और ध्यान मंदिर को भेंट के रूप में समर्पित कर दिया । अब उसका मन प्रशांत था; उसके विचार पवित्र थे । वहाँ से वह चल पड़ी।

उत्तम वैद्य


वल्लभापुर का निवासी रमेश पांडे प्रख्यात वैद्य था। सब लोग कहते थे कि उनसे बढ़कर कोई वैद्य है ही नहीं। वह निस्संतान था। उसका विश्वास था कि यह शास्त्र किसी के सिखाने मात्र से कोई सीख नहीं सकता। इसके लिए सीखनेवाले में होनी चाहिये, लगन और इच्छा शक्ति।

एक दिन रमेश पांडे के दूर का रिश्तेदार कमल पांडे अपने दोनों बेटों के साथ चिकित्सा कराने उसके यहाँ आया। शहर में उसकी आभूषणों की दुकान थी। कुछ समय से वह नासूर-विशेष से पीडित था। उसके दोनों बेटे धनुंजय व राघव वैद्य वृत्ति के प्रति आकर्षित हुए।

रमेश पांडे की चिकित्सा से दो ही हफ्तों में कमल पांडे के रोग में सुधार आया। शहर लौटते हुए उसने रमेश पांडे से कहा, ‘‘भाई साहब, आप साक्षात् धन्वंतरी हैं। परंतु मैं यह नहीं चाहता कि वैद्य वृत्ति में आपकी यह प्रवीणता आप ही के साथ ख़त्म हो जाए।'' रमेश पांडे ने कहा, ‘‘मैं कर भी क्या सकता हूँ। मैं किसी और को यह शास्त्र तभी सिखा सकता हूँ, जब कि उसमें इसके प्रति लगन हो ।''

‘‘मेरे दोनों बेटों में इस शास्त्र के प्रति रुचि है। आप इन दोनों को अपने शिष्यों के रूप में स्वीकार कीजिये।'' कमल पांडे ने विनती की।

रमेश पांडे ने बता दिया कि उनकी परीक्षा के बाद ही यह निर्णय लूँगा कि उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार करना है या नहीं । उसके इस उत्तर से संतुष्ट कमल पांडे शहर चला गया।

इन दोनों में से धनुंजय अ़क्लमंद था। वह विषय जल्दी ही समझ जाता ता। राघव शांत स्वभाव का था। विषय को एक-दो बार सुन लेने के बाद ही वह किसी निर्णय पर आता था। रमेश पांडे दस दिनों तक तरह-तरह के पत्तों और जड़ी-बूटियों की विशिष्टता के बारे में उन्हें बताया। साथ ही उसने उनसे यह भी कहा कि वे उसकी चिकित्सा-पद्धति को ग़ौर से देखें।

एक दिन, रमेश पांडे को ख़बर मिली कि पास ही के गाँव का भूस्वामी बहुत बीमार है, जो खाता है, वह पचता नहीं और कोई अज्ञात रोग उसे कमज़ोर बनाये जा रहा है। जो आदमी यह ख़बर लेकर आया, उससे रमेश पांडे ने भूस्वामी के बारे में और भी जानकारी ली। रमेश पांडे समझ गया कि वह भूस्वामी अजीर्ण रोग से पीड़ित है। उसने धनुंजय को उस भूस्वामी के इलाज का भार सौंपा। जाते समय उसे यह भी समझाया कि इस अजीर्ण रोग के लिए किन-किन दवाओं को उपयोग में लाना चाहिये।

दो दिनों तक धनुंजय ने गुरु की बतायी दवाओं से भूस्वामी का इलाज किया। उनके कहे पत्तों व जड़ी-बूटियों को पीसा और उनकी गोलियाँ बनाकर भूस्वामी को खिलाने लगा। लगता था कि वह सुधर गया, पर देखते-देखते भूस्वामी फिर से उस रोग से पीडित होने लगा। धनुंजय की समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए। वह निराश होकर लौट आया।

राघव ने, गुरु से भूस्वामी की चिकित्सा की अनुमति माँगी। रमेश पांडे ने मान लिया। भूस्वामी के यहाँ पहुँचने के बाद उसने वह आहार मँगवाया, जिसे भूस्वामी हर दिन खाता है। उसने उस आहार की परीक्षा की। उसके भोजन में घी और तेल की भरमार है। अनेक प्रकार के बलवर्धक पदार्थ आवश्यकता से अधिक हैं। राघव की समझ में आ गया, त्रुटि कहाँ है।

राघव ने भूस्वामी से कहा, ‘‘महाशय, आपको परहेज़ से रहना होगा। दस दिनों तक इमली के रस व मथे मट्ठे से भोजन करना होगा। तभी जाकर गुरु की दी हुई दवा उपयोगी साबित होगी।''

भूस्वामी ने ‘‘हाँ'' कह दिया । एक सप्ताह के अंदर ही उसका रोग कम होने लगा। भूस्वामी ने राघव को उचित भेंट देकर बिदा किया।

राघव जब लौटा तब रमेश पांडे घर में नहीं था। धनुंजय ने राघव से विषय की पूरी जानकारी ली । शाम को जब रमेश पांडे लौटा तब धनुंजय ने कहा, ‘‘गुरुदेव, मैं जान गया कि राघव ने भूस्वामी की कैसे चिकित्सा की और उसमें सफल हुआ। उसने जीरा, काली मिर्च और थोडा सा गुड़ मिश्रित कषाय मात्र दिया। मैंने भी आप का बताया इलाज ही किया पर कोई फायदा नहीं हुआ। ऐसा क्यों हुआ?''


रमेश पांडे ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘धनुंजय, वैद्य को चाहिये कि वह रोगी की ही नहीं, बल्कि रोग की भी परीक्षा करे। रोग के मूल कारण को पहचानना चाहिये। भूस्वामी आवश्यकता से अधिक खाता है। इसकी चिकित्सा के लिए दवाओं से अधिक प्रभावशाली है, पथ्य। इसी कारण राघव का इलाज कामयाब हुआ।''

दूसरे दिन, जब दोनों जड़ी-बूटियों को इकठ्ठा करने वन में घूम रहे थे, तब उन्होंने एक आदमी को पेड़ के नीचे बेहोश पड़ा देखा। वह बहुत ही दुबला-पतला था और उसके कपड़े फटे हुए थे। धनुंजय ने कहा, ‘‘कोई भिखारी लगता है। भूख से बेहोश है। चलो, अपना काम करते हैं।''

‘‘हाँ, हाँ, जिस काम पर आये, वह तो करेंगे ही। परंतु, इस स्थिति में इसे छोड़कर जाना भी तो उचित नहीं है।'' कहते हुए राघव ने उस आदमी के चेहरे पर पानी छिड़का। जब वह आदमी उठ बैठा, तब राघव ने धनुंजय से कहा, ‘‘धनुंजय, इसे घर ले जाकर भर पेट खाना खिलायेंगे। यह भी जानेंगे कि क्या भूख के कारण ही इसकी यह दुस्थिति हुई है या किसी रोग से यह पीड़ित है। गुरुजी से इसकी परीक्षा करायेंगे।'' कहकर वे उसे गुरु के पास ले आये।

रमेश पांडे ने सब कुछ सुनने के बाद धनुंजय से कहा, ‘‘निस्सहाय के प्रति और रोगियों के प्रति वैद्य में सहानुभूति होनी चाहिये। उसकी आर्थिक परिस्थितियों को दृष्टि में रखकर उससे धन लेना चाहिये। हम रोगी का मित्र बनकर उससे व्यवहार करेंगे तो हम अपनी वृत्ति में निखरेंगे।''

गुरुदेव की बातें सुनकर धनुंजय का चेहरा फीका पड़ गया। उसने कहा, ‘‘क्षमा कीजिये गुरुदेव। वैद्य वृत्ति के द्वारा अधिकाधिक कमाने के उद्देश्य से यहाँ आया था। पर अब लग रहा है कि व्यापार की तुलना में यह कमाई नहीं के बराबर है। वैद्य वृत्ति मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं है। मुझे घर लौटने की अनुमति दीजिये।'' यों कहकर धनुंजय वहाँ से चला गया।

राघव ने गुरु रमेश पांडे के यहाँ रहकर वैद्य वृत्ति अपनायी और थोड़े ही समय में उत्तम वैद्य बना । वह गुरु से भी अधिक प्रसिद्ध हुआ।

विदुर की बहुएँ


चतुर्भुज नामक गाँव में विदुर और धर्मराज नामक दो दोस्त रहा करते थे। दोनों मध्यम वर्ग के किसान थे। गोपी और सोम विदुर के बेटे थे और धर्मराज के कोई संतान नहीं थी।

एक दिन धर्मराज ने विदुर से कहा, ‘‘विदुर, हम दोनों पचासवें साल में क़दम रख रहे हैं। तुम्हारे दोनों बेटे लायक़ हो गये हैं। उनकी शादी करा दोगे तो तुम दादा भी बन जाओगे। अपनी वृद्धावस्था में आराम से रह सकते हो। मैं तो निस्संतान हूँ। किसी शिशु को गोद लेना चाहता हूँ तो वे मेरी जायदाद के बारे में विवरण जानना चाहते हैं।'' दर्द-भरी आवाज़ में उसने कहा।

विदुर ने, धर्मराज के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘एक मानव ही है, जिसे बुढ़ापे में सहारा मिलता है। उसके वारिस उसकी देखभाल करते हैं। अन्य प्राणी इस सुविधा से वंचित हैं। अब तक मैं और मेरी पत्नी सुखी हैं। बहुओं के आने के बाद क्या होगा, कुछ बता नहीं सकते। जो भी हो, हम दोनों आगे भी भाई समान रहेंगे।''

‘‘भविष्य को लेकर तुम्हें चिंतित होने की कोई ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हारे दोनों बेटे योग्य हैं, अच्छे स्वभाव के हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि उनका विवाह भी अच्छे स्वभाव की कन्याओं से होगा।'' धर्मराज ने कहा।

गोपी और सोम ने दोनों की बातचीत सुनी। दोनों ने आपस में बातें कर लीं और उनसे मिलने उनके पास आये।

गोपी ने, धर्मराज से कहा, ‘‘चाचाजी, मैं और मेरा भाई आपका बड़ा आदर करते हैं। आपको अपना चाचा मानते हैं। हमें अपने ही बेटे समझिये।''

धर्मराज ने भाव-विह्वल होकर कहा, ‘‘मैं तुम दोनों के स्वभाव से अच्छी तरह से परिचित हूँ। तुम्हारे पिता को अच्छी बहुएँ मिल जाएँ तो मैं और मेरी पत्नी तुम दोनों की छाया में आराम से ज़िन्दगी बितायेंगे।''

सोम ने कहा, ‘‘चाचाजी, अच्छा हुआ, आपने बहुओं की अच्छाई की बात याद दिलायी। बड़े लोग कहते हैं कि ऊपर तथास्तु देवता रहते हैं। मेरे और मेरे भाई की पत्नियाँ सगी बहनें हों तो और अच्छा होगा, क्योंकि वे मिलजुलकर रहेंगी। दोनों में प्रेम बना रहेगा और उनकी तरफ़ से हमें किसी समस्या का सामना करना नहीं पड़ेगा।''

बेटे की बातों पर विदुर ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘हम अच्छा सोचते हों तो फल भी अच्छा ही होगा। हाल ही में नारदकुंड गाँव से एक आदमी रिश्ता लेकर आया। उस गाँव के मुखिया विश्वेश्वर की दो बेटियाँ हैं। वे हमसे रिश्ता जोड़ना चाहते हैं। अच्छा यही होगा कि तुम दोनों उन लड़कियों को देख आओ। तुम दोनों को वे लड़कियाँ अच्छी लगीं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। इसकी जिम्मेदारी तुम्हीं को सौंपता हूँ।''

सोम और गोपी ने कहा, ‘‘तब देरी किस बात की। हम सब मिलकर जायेंगे। और उन लड़कियों को देख आयेंगे।''

दूसरे ही दिन, विदुर ने गाँव के मुखिया विश्वेश्वर को ख़बर भिजवायी कि वे उनकी बेटियों को देखने कल ही आ रहे हैं।

दूसरे दिन वे सब किराये की गाड़ी में नारदकुंड जाने के लिए निकल पड़े। विश्वेश्र्वर के घर के पास आये कि नहीं, विदुर की छाती में ज़ोर का दर्द होने लगा। उन्हीं की प्रतीक्षा में खडा विश्वेश्वर, विदुर को तुरंत घर के अंदर ले गया और पलंग पर लिटाया। फिर तुरंत वैद्य को बुला लाने के लिए नौकर को भेजा।

वैद्य ने आकर विदुर की परीक्षा की और कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि यह गंभीर दिल का दौरा है। कहते हैं कि छोटे सांप को भी बड़ी लाठी से मार डालना चाहिये। इसलिए हमें सावधानी बरतनी चाहिये। जो दबाइयाँ दूँगा, उनका सही उपयोग कीजिये। परंतु हाँ, एक सप्ताह तक पलंग पर ही इनका लेटे रहना बहुत ज़रूरी है।''

तब धर्मराज ने विश्वेश्वर से कहा, ‘‘सोचा नहीं था कि ऐसा होगा। गाँव में ही एक अच्छा-सा घर हमें किराये पर दिलाइये। ज़रूरत पड़ी तो एक हफ्ते तक ही नहीं, एक महीने तक रहकर विदुर की चिकित्सा करायेंगे।'' विश्वेश्वर कुछ कहने ही जा रहा था कि उसकी दोनों बेटियों ने इशारा करके उसे बगल के कमरे में आने को कहा।

बड़ी बेटी रागिनी ने पिता से कहा, ‘‘पिताजी, वे हमारे घर शादी का रिश्ता तय करने आये हैं। हम उन्हें अपने ही घर में रखकर आवश्यक चिकित्सा करायेंगे। यह हमारा फर्ज़ भी बनता है।''

दूसरी बेटी मोहिनी ने भी कहा, ‘‘यही अच्छा होगा नहीं तो हमपर तोहमत लग जायेगी कि हमने ससुर की देखभाल नहीं की और बाहर भेजकर अपने हाथ धो लिये। यह रिश्ता पक्का हो या न हो, पर उन्हें यहाँ से संतुष्ट भेजना हमारा कर्तव्य है। सब प्रकार से अच्छा यही होगा कि विदुरजी को अपने ही घर में रखें और उनकी चिकित्सा करायें।''

बेटियों की बातें सुनने के बाद विश्वेश्वर ने मुड़कर अपनी पत्नी की ओर देखा। मन ही मन बेटियों की प्रशंसा करते हुए विश्वेश्वर की पत्नी ने कहा, ‘‘बेटियों ने जो कहा, ठीक कहा। वैसा ही कीजिये। घर आये रिश्तेदारों को किसी और घर में रखना उचित नहीं होगा। फिर आपकी मर्जी।''

बग़ल के कमरे में ही लेटा विदुर उनकी ये बातें सुन रहा था। मन ही मन उसे इस बात पर खुशी हुई कि अपनी इस आकस्मिक बीमारी से विश्वेश्वर के परिवार के सदस्यों के स्वभाव को वह जान पाया।

विश्वेश्वर ने, अपनी पत्नी और बेटियों की बातों पर खूब सोचा-विचारा और अंत में यही निर्णय लिया कि विदुर को गाँव के किसी अच्छे घर में रखना ही ठीक होगा। उसने सब सुविधाओं से भरा एक अच्छा-सा घर ढूँढ़ा और उनके रहने का प्रबंध किया।


विदुर, धर्मराज और उसके दोनों बेटे दस दिनों तक उस घर में बिना किसी असुविधा के रहे। विदुर बहुत ही जल्दी चंगा हो गया। इसपर वैद्य ने आश्चर्य भी प्रकट किया। गाँव लौटने के पहले धर्मराज ने विदुर से कहा, ‘‘विश्वेश्वर को कृतज्ञता जतापर निकलेंगे। मेरी समझ में नहीं आता कि पत्नी और बेटियों के ज़ोर देने के बाद भी उसने तुम्हें क्योंकर एक अलग घर में रखा?''

इसपर विदुर ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘धर्मराज, विश्वेश्वर की पत्नी और बेटियों के दिल दया व करुणा से भरे हैं। वे दूसरों का आदर करना जानती हैं। अब रही, विश्वेश्वर की बात। उनमें भी ये अच्छे गुण मौजूद हैं, पर साथ ही साथ उनमें पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान भी है। अगर वे मुझे अपने घर में रखते तो लोग यही कहते कि अपनी बेटियों की शादी कराने के लिए उसने यह षड्यंत्र रचाहै । इसीलिए उन्होंने मुझे अलग घर में रखा और मेरी चिकित्सा करवायी। यद्यपि हम लोगों का रिश्ता अभी नहीं बना है और यह आवश्यक भी नहीं है कि ऐसा होगा, फिर भी उन्होंने अलग घर में रख कर भी हमारी देखभाल अपने परिवार के समान की। मुझे इस घर के सभी लोगों के स्वभाव अच्छे लगे। मुझे यह रिश्ता बहुत पसंद है। अगर विश्वेश्वर मान जाएँ तो मैं उनकी बेटियों को अपनी बहुएँ बनाने के लिए तैयार हूँ। गोपी और सोम को भी वे कन्याएँ अच्छी लगीं।''

दूसरे दिन औपचारिक रूप से विश्वेश्वर के घर में विवाह की तिथि पक्की हुई और एक महीने के अंदर ही उनका विवाह भी संपन्न हुआ।

धर्मराज और विदुर की अपेक्षा के अनुसार ही बहुओं ने भी उनके साथ अच्छा व्यवहार किया। अब उनके आनंद की सीमा नहीं रही। दोनों मित्रों के परिवार एक दूसरे के सुख-दुख में हाथ बँटाते हुए शान्तिपूर्वक जीवन बिताने लगे।

अफवाह



गणपतिसिंह की यह आदत थी कि कोई खास बात हो तो सबसे पहले वह उसका पता लगा ले और सबको सूचना दे! इस जल्दबाजी में वह कई बार ऐसी गलत सलत ख़बरों का प्रचार कर बैठता था, जिससे कोई भी उसकी बातों पर यक़ीन नहीं करता थाऔर दुखी हो जाता था। अपनी बातों पर किसी को विश्वास न करते देख गणपति बड़ी पीड़ा का अनुभव करता था। मगर उसके प्रति लोगों का जो विचार था, उसे बदलने के लिए गणपति ने अनेक प्रयत्न किये, पर वह सफल न हुआ।

एक दिन गाँव में कोई गड़बड़ी हो गई। ऐसी गड़बड़ियों को सुलझाने में पड़ोसी गाँव का पटवारी बड़ा मशहूर था। गाँववालों ने जब पटवारी के पास इस समस्या को सुझाने की ख़बर भेजी तो उसने दूसरे दिन आने की सूचना दी।

जिन दो पक्षों के बीच झगड़ा हुआ था, वे दोनों दूसरे दिन सवेरे पटवारी के इंतज़ार में चौपाल में इकट्ठे हो गये। उन लोगों ने बड़ी देर तक पटवारी का इंतज़ार किया, लेकिन किसी कारण से पटवारी अपने वादे के मुताबिक़ पहुँच नहीं पाया। आखिर झगड़ा करनेवाले दोनों दल के लोग अपने अपने घर चले गये।

पड़ोसी गाँव का पटवारी कभी अपने वचन से मुकरता न था। उसके न आने का कोई बड़ा कारण हो सकता है। गणपति ने सोचा कि सब से पहले वही उस कारण का पता लगा लेगा और गाँववालों को सूचना देगा। यों विचार करके कड़ी धूप में खाने की चिंता तक किये बिना गणपति पटवारी के गाँव की ओर चल पड़ा।

गाँव के बाहर गणपति के सामने से एक लाश आ गुजरी। उसने एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘भाई, यह लाश किसकी है? साधारण आदमी की प्रतीत नहीं होती।''


‘‘यह तो इस गाँव के एक बड़े आदमी की लाश है।'' उस व्यक्ति ने कहा।

‘‘इस गाँव का सबसे बड़ा आदमी कौन है?'' गणपति ने फिर पूछा।

‘‘इस गाँव में हमारे पटवारी से बढ़कर कौन बड़ा आदमी है।'' पड़ोसी गाँव के व्यक्ति ने जवाब दिया। गणपति ने सोचा, बेचारे इस गाँव का पटवारी मर गया है। इसीलिए आज सुबह पंचायत करने उसके गाँव में नहीं आया।

यह अनोखी ख़बर अपने गाँववालों को सुनाने के लिए गणपति दौड़े-दौड़े अपने गाँव को लौट आया। सबको बताने लगा, ‘‘बेचारे आज सवेरे पड़ोसी गाँव के पटवारी का देहांत हो गया है। इसीलिए वे आज हमारे गाँव में नहीं आये। मैंने उनकी लाश को खुद देखा है।''

पर एक भी व्यक्ति ने उसकी इस अनोख़ी खबर पर यक़ीन नहीं किया। इस पर गणपति को बड़ा दुख हुआ। वह सोचने लगा, ‘सच्ची बात बताने पर भी लोग उसकी बात पर विश्वास क्यों नहीं करते? सब के मन में यह विश्वास कैसे पैदा करे कि वह सच्ची बात ही बताता है।'

यों विचार कर उसने लोगों को समझाया, ‘‘भाइयो, पटवारी की मृत्यु पर हमारे गाँव के कुछ बुजुर्ग लोगों को जाकर शोक-संताप प्रकट करना जरूरी है न? इसलिए आप लोग अभी चलिए, सच्ची बात का पता आप लोगों को लगेगा।''

तिस पर भी किसी ने उसकी बात पर ध्यान न दिया। कुछ लोगों ने गणपति से पूछा, ‘‘तुम बताते हो कि तुमने पटवारी की लाश देखी है। क्या तुमने कभी पटवारी को जिंदा देखा भी है?'' ‘‘ऐसे बड़े आदमी के मरने पर उसकी लाश को पहचानने की ज़रूरत है?'' गणपति ने पूछा।


फिर भी कोई फ़ायदा न रहा। तब उसने सोचा, उसके गाँववाले पड़ोसी गाँव के मृत पटवारी के प्रति अन्याय कर रहे हैं। इसलिए उसी गाँव के किसी आदमी को बुलवाकर उसके मुँह से यह खबर सुनवा दे तब उसके प्रति गाँववालों की गलत फहमी दूर हो जाएगी।

यों विचार कर गणपति फिर पड़ोसी गाँव के लिए चल पड़ा। रास्ते में एक बुजुर्ग से उसकी मुलाक़ात हो गई। गणपति ने पूछा, ‘‘ महाशय, आप तो यक़ीन करेंगे न कि आज सुबह आप के गाँव के पटवारी का देहांत हो गया है?''

‘‘मैं यक़ीन नहीं करूँगा।'' उसने कहा।

‘‘क्यों यक़ीन नहीं करते?'' गणपति ने आश्चर्य में आकर पूछा।

‘‘क्योंकि मैं ही उस गाँव का पटवारी हूँ।'' उस व्यक्ति ने कहा।

गणपति यह जवाब सुनकर अवाक् रह गया। फिर उस दिन सुबह उसके तथा उस गाँव के एक और व्यक्ति के बीच जो वार्तालाप हुआ था उसे सुनाया। इस पर पड़ोसी गाँव के पटवारी ने समझाया, ‘‘अचानक आज मेरे गाँव के एक बहुत धनी आदमी का देहांत हो गया है। इस कारण मैं तुम्हारे गाँव नहीं जा सका। मेरे गाँव भी में तुम जैसा एक आदमी है। वह झूठ बोले बिना विश्वास करने योग्य झूठ बोलता है। उसने कहा कि मृत व्यक्ति बड़ा आदमी है। और गाँव में बड़ा आदमी मुझे बताया। इन दोनों अर्थों को जोड़कर तुमने सोचा कि मैं ही मर गया हूँ। तुम उसके स्वभाव से परिचित नहीं हो, इसीलिए तुमने उसकी बातों पर यक़ीन किया। पर मेरे गाँव में उसकी बातों पर कोई यक़ीन नहीं करता।''

इस पर गणपति का ज्ञानोदय हो गया। झूठ ध्वनित करनेवाला सत्य बतानेवाले पर कोई यक़ीन नहीं करता, तो सत्य जाने बिना खबरें फैलानेवाले पर कोई विश्वास नहीं करे तो इसमें आश्चर्य क्या है?

सुधीर शहर गया


सुधीर और शंभु एक ही गाँव के निवासी थे। सुधीर बढ़ई तो शंभु लोहार। दोनों अपने -अपने पेशों में माहिर थे। एक बार एक व्यापारी उस गाँव में आया, जो कांसे व तांबे के बरतनों का व्यापार करता था। शंभु के बनाये कांसे व तांबे के बरतनों का काम उसे बहुत अच्छा लगा। उसने तगड़ा वेतन देने का आश्वासन देकर उसे शहर बुलाया।

शंभु जाने को उतावला था, पर उसकी पत्नी ने एतराज जताया। उस समय उसका साला भी वहाँ मौजूद था। उसने शंभु को प्रोत्साहन देते हुए कहा, ‘‘ज़रूर जाना। अच्छा वेतन मिलेगा। अगर चार-पांच महीनों के बाद भी तुम्हारी कमाई में कोई बरकत नहीं हुई तो लौट आना।''

उसकी यह सलाह शंभु और उसकी पत्नी को अच्छी लगी। दूसरे ही दिन वह व्यापारी के साथ शहर गया। यह जो सब कुछ हुआ, उसकी पूरी जानकारी बगल की गली में रहनेवाली बढ़ई सुधीर की पत्नी भानुमति को मिली। उसका पक्का विश्वास था कि आसपास के गाँवों में उसके पति की बराबरी का बढ़ई कोई है नहीं। उस दिन से वह अपने पति से कहती रही, ‘‘हम भी शहर जायेंगे। खूब कमायेंगे और वहीं एक घर बनाकर आराम से ज़िन्दगी बितायेंगे।''

सुधीर की पत्नी की जिद जोर पकड़ती गयी। वह उससे कहने लगी, ‘‘शंभु ने अपना परिवार छोड़ दिया और कमाने शहर चला गया। हम तो निस्संतान हैं। हमारा अपना कोई नहीं है। जब से हमारी शादी हुई है, तब से देखती आ रही हूँ कि तुम कायर हो। तुममें साहस है ही नहीं।''

लाचार होकर सुधीर को भी शहर जाना पड़ा। वहाँ शंभु से मिला और अपने लिए कोई काम ढूँढ़ने की विनती की। शंभु ने भी बहुत कोशिश की पर सुधीर को कोई काम दिला नहीं सका। सब यही कहते थे कि शहर में बढ़इयों की भरमार है । जो बढ़ई हैं, उन्हीं के पास जब काम नहीं है - तो नये बढ़ई को कहाँ से काम दिलायें।


सुधीर चार महीनों तक शहर में काम की खोज में लगा रहा। जो रक़म वह गाँव से ले आया, वह भी ख़त्म होने को थी। उसने आख़िर तंग आकर गाँव वापस जाने का निर्णय लिया। परंतु उसे इस बात का डर था कि एक कौड़ी के भी बिना लौटे उसे देखकर उसकी पत्नी ताने कसेगी। उसने खूब सोचा और नाक से लेकर सिर तक के भाग को कपड़े से ढक लिया और रात को घर पहुँचकर दरवाज़ा खटखटाया।

पत्नी भानुमति ने दरवाजा खोलते ही उसे देखकर घबराते हुए पूछा, ‘‘यह क्या? न ही नाक दिखायी दे रही है, न ही कान। अपने चेहरे को यों क्यों छिपा रहे हो?''

सुधीर ने आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, ‘‘शहर में मैंने जो रक़म कमायी, उसे एक थैली में बंद करके ले आ रहा था। गाँव की सरहदों पर चोरों ने मुझपर हमला कर दिया। पसीना बहाकर कमाया, इतनी आसानी से वह रक़म उन्हें थोड़े ही दूँगा ! मैं भी उनपर टूट पड़ा। इतने में चोरों में से एक ने तलवार निकाली और कहा, ‘‘तुम्हें धन चाहिये या प्राण, इसका फ़ैसला अभी कर लेना। चुपचाप वह थैली हमें दे दोगे तो तुम्हें छोड़ देंगे। अगर तुमने हमारी बात नहीं मानी तो हम तुम्हारी नाक और कान काट डालेंगे।''

‘‘इतनी बड़ी नाइन्साफी! वह रक़म उन्हें दे डालते तो कितना अच्छा होता। इससे बढ़कर अपमान की बात क्या हो सकती है?'' कहकर भानुमति अपने पति के चेहरे पर के कपड़े को खींचने ही वाली थी कि सुधीर ने खुद खींचते हुए कहा, ‘‘तुमने अब जो कहा, वही काम मैंने किया। शहर में जितना भी कमाया, उन बदमाशों ने छीन लिया। अच्छा हुआ, कम से कम इस नाक और कान को बचाकर लौट पाया,'' स्वर को कंपाते हुए उसने कहा।

‘‘उन्होंने आपसे धन ही तो छीन लिया है, न कि आपके बढ़ई का काम। चिंतित मत होइये।'' कहती हुई भानुमति ने पति को ढाढ़स बंधाया।

तीन सपने


गोकर्णिक के राजा मणिकर्ण बड़े ही धार्मिक और धर्मात्मा थे। योगपुंगव व साधु संन्यासियों के प्रति वे अमित आदर भाव रखते थे। वे अ़क्सर महनीय योगियों के दर्शन कर उनके आशीर्वाद पाया करते थे। राजधानी में जो भी साधु संन्यासी आते थे, उनका सादर स्वागत करते थे और श्रद्धापूर्वक उनका आतिथ्य करते थे।

एक बार एक जटाधारी नामक संन्यासी राजभवन पधारे। राजा ने यथावत् उनका स्वागत-सत्कार किया और साष्टांग प्रणाम किया। राजा के विनयपूर्ण व्यवहार से वे बहुत ही प्रस हुए और उन्हें कितने ही आध्यात्मिक विषयों का बोध किया। राजभवन से निकलने के पहले उन्होंने राजा से कहा, ‘‘राजन्, तुमसे एक मुख्य विषय बताना चाहता हूँ। तुम आज की रात से लेकर तीन रातों तक लगातार तीन बुरे सपने देखने जा रहे हो। सावधानी बरतना। नहीं तो आपत्ति में फंस जाओगे।'' फिर वे वहाँ से चले गये।

यह सुनते ही राजा बहुत घबरा गये। उन्होंने तुरंत मंत्रियों को बुलवाया और विषय बताया। तब विवेकवर्धन नामक मंत्री ने कहा, ‘‘जटाधारी ने आपसे यह बताया कि ये बुरे सपने आप रात ही के समय देखेंगे। इसलिए आप दिन में सो जाइये और रात को जागे रहिये। तब इन सपनों को देखने की कोई गुंजाइश नहींरहेगी । इस प्रकार बुरे सपनों के कारण आनेवाली आपत्तियों से आप बच सकते हैं।''

राजा को यह सलाह सही लगी। उनमें संगीत, शतरंज और आध्यात्मिकता के प्रति अधिकाधिक रुचि थी। शेष मंत्रियों ने भी राजा को सलाह दी कि रात को वे इनसे अपना समय बिताते रहें, जिससे नींद नहीं आयेगी।

राजा ने पहली रात शतरंज खेलते हुए बिताने का निर्णय किया। शतरंज में माहिर लोगों को बुलवाया। सवेरे तक वे शतरंज खेलते रहे। पर, सवेरा होते-होते महाराज को एक छोटी-सी झपकी आ गई ।

इस छोटी-सी झपकी के दौरान महाराज ने एक सपना देखा। वे एक जंगल में थे। एक सर्प महाराज को देखते ही फुफकारता हुआ उनकी ओर दौड़्रा । उनका पूरा शरीर पसीने से भीग गया। इतने में वे जाग उठे।

राजा ने अगले दिन निश्र्चय किया कि आज रात को संगीत सुनते हुए समय काटूँगा। मधुर संगीत सुनते-सुनते कुछ क्षणों के लिए उनकी आँखें बंद हो गयीं। उस दौरान सपने में उन्होंने देखा कि आकाश से धड़ाम् से एक बिजली उन्हीं पर गिरने के लिए बढ़ी आ रही है। उससे बचने के लिए वे इधर-उधर भाग रहे थे। फिर भी सपने में वह बिजली उन्हीं का पीछा कर रही थी। इतने में राजा जाग उठे।

तीसरी रात को जब वे धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा कर रहे थे, तब हल्की सी नींद आ गई। इस बार सपने में एक भयंकर सिंह उनपर टूट पड़ा। वे एक कुंड में कूद पड़े। कुंड का पानी रुधिर रंग का था। इतने में युवरानी मणिमेखला वहाँ दिखायी पड़ी और पिता को रुधिर कुंड से बाहर निकाला। इतने में राजा की आँखें खुल गयीं।

सवेरे ही, राजा ने मंत्रियों को बुलवाया और अपने सपनों के बारे में बताया। मंत्रियों ने तुरंत उन सपेरों को बुलवाया, जो साँप की काट को मंत्र शक्ति से दूर करते हैं। उन्होंने महाराज को सलाह दी कि वे शिकार करने जंगल में न जाएँ और राजभवन में ही रहें। अंतःपुर में जितने भी थे, सबको सावधान किया। फिर भी महाराज की घबराहट दूर नहीं हुई।

उस समय शिव नामक एक युवक ने महाराज के दर्शन किये और कहा, ‘‘राजन्, मैं बहुत ही अ़क्लमंद हूँ। किन्तु कोई भी मेरी अ़क्लमंदी को मानने के लिए तैयार नहीं है। कम से कम आप मेरी अ़क्लमंदी को जानिये, नहीं तो मैं हिमालय पर्वतों पर चला जाऊँगा।''

उसकी बातें सुनकर महाराज को लगा कि यह कोई पागल है, जो जी में आया, बक रहा है। फिर उन्हें लगा कि हो सकता है, यह सचमुच ही अक्लमंद हो, इसमें कोई अपूर्व शक्ति भरी पड़्री हो। यों सोचकर उन्होंने जटाधारी के बताये तीनों सपनों के बारे में उससे बताया।

पूरा विषय सुनने के बाद और थोड़ी देर सोचने के बाद शिव ने कहा, ‘‘महाराज, योगी, संन्यासी दैवज्ञ होते हैं। उनके मुँह से निकली बात कभी भी व्यर्थ नहीं होती। लेकिन उनकी बातों में रहस्य और गूढ़ार्थ भरा होता है। जो तीन सपने आपको परेशान कर रहे हैं, उनका मैं विश्लेषण करूँगा और उनका समाधान भी बता सकूँगा। पहले, दो सपनों का विश्लेषण करूँगा। उनमें आपकी दृष्टि के अनुसार वास्तविकता हो तो तीसरे सपने पर प्रकाश डालूँगा।''

‘‘हाँ, हाँ, ज़रूर बताना। देरी किस बात की?'' महाराज ने कहा।

‘‘महाराज, आपने प्रथम सपने में देखा, एक जंगल और जंगल में एक सर्प। सर्प प्रतिकार का प्रतीक है, संकेत है। इस सपने का अंतरार्थ यही है कि कोई आपसे प्रतिकार लेना चाहता है और वह मौक़े की ताक़ में है। अब रही बिजली की बात। बिजली हठात् गिरती है। मतलब यह हुआ कि कोई अप्रत्याशित घटना घटनेवाली है। बिजली आपका पीछा कर रही है तो इसका यह मतलब हुआ कि जो दुर्घटना घटनेवाली है, वह आपकी तरफ इंगित कर रही है, उसका निशाना आप हैं।''

शिव की अ़क्लमंदी पर राजा को विश्वास हो गया, क्योंकि उसके विश्लेषण बुद्धिजन्य और तर्कसंगत थे। राजा के आदेश पर शिव के रहने के लिए आवश्यक प्रबंध किया गया। शिव के विश्लेषण के अनुसार खूब सोचने के बाद राजा की दृष्टि एक विषय पर गयी। हाल ही में राज्य में लुटेरे ज्यादा हो गये थे, इसलिए राजा ने उनपर रोक लगाने के लिए आवश्यक प्रयत्न किये। उन्हें लगा कि लुटेरों का सरदार भैरव उन्हें मार डालना चाहता है।

अब राजा ने सब लुटेरों को पकड़वा लिया, जिनमें भैरव भी था। उससे पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि भैरव ने विषैले सर्प को राजा के शयनागार में भेजने का षडयंत्र रचा था और उनका अंत कर देना चाहा था। भैरव ने यह अपराध स्वीकार भी किया।


यों यह साबित हो गया कि राजा के प्रथम सपने का विश्लेषण शिव ने जो किया, वह सौ फी सदी सही है। राजा बेहद खुश हुए। द्वितीय सपने से संबंधित जानकारी पाने के लिए उन्होंने गुप्तचरों को चारों दिशाओं में भेजा।

दो दिनों के बाद एक गुप्तचर ने आकर कहा, ‘‘सिंहपुरी के राजा विक्रमसेन हमारे राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे हैं।''

शिव की बातों पर चकित राजा ने उसे बुलवाया और पूछा, ‘‘मुझसे भी अधिक बलवान विक्रमसेन का सामना कैसे किया जाए?''

‘‘इसका परिष्कार मार्ग आपके तृतीय सपने में सुझाया गया है महाराज'', शिव ने कहा।

‘‘कैसे?'' महाराज ने पूछा।

‘‘महाराज, आपने सपने में जिस सिंह को देखा, वह सिंहपुरी का राजा विक्रमसेन है। आपका रक्त से भरे कुंड में गिरना होनेवाले रक्तपात का संकेत है। युवरानी ने आपको उस कुंड से निकाला और आपकी रक्षा की। वही युवरानी आपको इस विपत्ति से बचा सकती है'', शिव ने कहा। ‘‘यह कैसे संभव है?'' महाराज ने संदेह व्यक्त किया।

‘‘सिंहपुरी के राजा का एक बालिग़ बेटा है। युवरानी का विवाह उससे करायेंगे तो युद्ध की बात ही नहीं उठेगी।'' शिव ने स्पष्ट किया।

राजा मणिकर्ण ने उसकी बातों में छिपी वास्तविकता को पहचाना। उन्होंने दूसरे ही दिन अपनी पुत्री का छायाचित्र विक्रमसेन को भेजा और पत्र में लिखा, ‘‘आप सहमत हों तो मेरी पुत्री को आप की बहू बनने का सौभाग्य प्रदान कीजिये। यह मेरी हार्दिक इच्छा है।''

मणिमेखला के अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध सिंहपुरी के युवराज ने यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार किया। अब विक्रमसेन ने गोकर्णिक पर आक्रमण करने का विचार त्यज दिया और अपने बेटे की शादी की तैयारियों में लग गया। फिर उनका विवाह बहुत बड़े पैमाने पर संप हुआ।

शिव ने राजा के तीनों सपनों का विश्लेषण बड़ी ही सक्षमता से की। उसी की वजह से राज्य घोर विपत्तियों से बच पाया। शिव की समझदारी की राजा ने भरपूर प्रशंसा की और उसे अपने आन्तरिक सलाहकार के पद पर नियुक्त किया।

बेतुकी सलाहें


रामदीन अपने बाप-दादों के ज़माने की एक झोंपड़ी का मालिक था। उससे सटकर एक विशाल पिछवाड़ा था। उसने अपने पिछवाड़े में केले के कल्ले रोप दिये। केले का बगीचा ख़ूब बढ़ा, हरा-भरा तथा देखने में मनमोहक था।

एक दिन सवेरे रामदीन केले के बगीचे में पानी सींच रहा था। तभी गाड़ी में से जमीन्दार की पत्नी उतर पड़ी। रामदीन अपने हाथों को साफ़ कर जमीन्दार की पत्नी के सामने आ खड़ा हुआ।

जमीन्दार की पत्नी ने रामदीन का नाम पूछकर कहा, ‘‘रामदीन, तुम अपने पिछवाड़े के साथ अपनी झोंपड़ी को बेच सकते हो?''

रामदीन विस्मय में आ गया। वह कोई उत्तर न दे पाया। समझ न पाया कि जमीन्दार की पत्नी उसकी पुरानी झोंपड़ी लेकर करेंगी ही क्या?

‘‘पैसे की तुम चिंता न करो। मैं तुम्हें पाँच सौ रुपये दूँगी।''

रामदीन अपने कानों पर यक़ीन नहीं कर पाया, क्योंकि उस झोंपड़ी के लिए कोई दो सौ रुपयों से ज़्यादा न देगा।

रामदीन को मौन देख जमीन्दार की पत्नी बोली, ‘‘अच्छी बात है! साढ़े सात सौ रुपये देती हूँ। अब मोल-भाव मत करो।''

रामदीन को लगा कि वह बेहोश होता जा रहा है। साढ़े सात सौ रुपये! वह इस विचार में खो गया कि इतनी पूँजी लगाकर कोई भी व्यापार कर सकता है।

इस बार भी रामदीन को मौन देख वह ख़ीझकर बोली, ‘‘मैं अंतिम बात कह रही हूँ- एक हज़ार रुपये दूँगी! झोंपड़ी बेचते हो या नहीं?''

रामदीन ने स्वीकृति सूचक सिर हिलाया और कहा, ‘‘शाम के अंदर हम झोंपड़ी ख़ाली कर देंगे। शाम को आप इस पर कब्ज़ा कर सकती हैं।''

‘‘शामको मैं अपने नौकर के द्वारा रुपये भेज दूँगी!'' यों कहकर जमीन्दार की पत्नी बड़ी खुशी के साथ चली गई।

उसके जाते ही रामदीन अपनी औरत से बोला, ‘‘अरी! सुनो! हमारी क़िस्मत खुल गई ।''

इधर जमीन्दार की गाड़ी रामदीन की झोंपड़ी के आगे आकर जब रुकी, तभी से अड़ोस-पड़ोस के लोग उनकी बातचीत बड़ी उत्सुकता के साथ सुन रहे थे। वे अब आकर आश्चर्य से बोले, ‘‘क्या तुम सचमुच इस झोंपड़ी को बेच दोगे?''

‘‘अरे साहब! एक हज़ार रुपये मिल रहे हैं तो क्यों न बेचूँगा?'' रामदीन ने उल्टा सवाल किया।

‘‘अरे, तुम्हारी अ़क्ल चरने गई है! तुमने यह भी सोचा है कि तुम्हारी इस टूटी-फूटी झोंपड़ी के लिए एक हज़ार रुपये क्यों दिये जा रहे हैं? इस झोंपड़ी से बहुत बड़ा लाभ न हो तो जमीन्दारिन इतने रुपये क्यों लुटा देंगी? उन्हें यह मालूम होगा कि तुम्हारी झोंपड़ी के अन्दर कोई खज़ाना है। तुम तो भोले और बुद्धू ठहरे ! इसीलिए झट बेचने को तैयार हो गये हो? हमारी बात सुनो, तुम किसी भी दाम पर झोंपड़ी को मत बेचो, तुम्हीं ख़ुद खोदकर उस खज़ाने को ले लो।'' यों सबने रामदीन को बेतुकी सलाहें दीं और वहाँ से चले गये।

ये बेतुकी सलाहें रामदीन को उचित प्रतीत हुईं। उसकी औरत ने भी पड़ोसियों की बातों में आकर कहा, ‘‘इन लोगों का कहना सच मालूम होता है। हाल ही में जमीन्दारिन अपनी कन्या का विवाह भी करने जा रही है, ऐसी हालत में एक हज़ार रुपये ख़र्च करके यह झोंपड़ी क्यों ख़रीद लेगी? इस झोंपड़ी में अपनी लड़की को थोड़े ही बिठाने वाली है?''

शामको जब जमीन्दार का नौकर एक हज़ार रुपये लेकर पहुँचा, तब पति-पत्नी दोनों ने झोंपड़ी बेचने से इनकार कर दिया।

उस दिन रात को लालटेन की रोशनी में रामदीन ने केले के पौधों को उखाड़कर फेंक दिया, सारे पिछवाड़े को गहराई तक खोदा। झोंपड़ी के भीतर उसे कोई चीज़ दिखाई न दी । इस पर उसने झोंपड़ी की छत को हटाकर ढूँढ़ा, कहीं कोई चीज़ हाथ न लगी।

इतने में सवेरा हो गया। रामदीन रुआँस स्वर में बोला, ‘‘हमने बहुत बढ़िया सौदा हाथ से निकल जाने दिया ।''


‘‘अब भी कुछ बिगड़ा नहीं, तुम तुरंत जाकर जमीन्दारिन से कह दो कि हम झोंपड़ी बेचने के लिए तैयार हैं। पाँच सौ भी दे, मान जाओ।'' रामदीन की पत्नी ने सुझाया।

रामदीन जमीन्दार के घर चला गया, जमीन्दार की औरत से बोला, ‘‘मैंने मूर्खतावश लोगों की बेतुकी सलाहें मानकर झोंपड़ी बेचने से इनकार कर दिया था। अब मैं बेचना चाहता हूँ। आप जो उचित समझें, सो दे दीजिए!''

जमीन्दारिन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, ‘‘अब तुम्हारी झोंपड़ी मेरे लिए किस काम की? मैं अपना दाँव तो हार चुकी हूँ!'' इन शब्दों के साथ उसने जमीन्दार तथा उसके बीच जो दाँव लगाया गया था, उसका वृत्तांत सुनाया।

असल में बात यह थी कि जमीन्दार की गाड़ी उसके दादा-परदादाओं के ज़माने की थी। जब से वह ससुराल आई है, तब से वह जमीन्दार द्वारा नई गाड़ी ख़रीदवाने की कोशिश कर रही है। मगर जमीन्दार को अपनी पुरानी गाड़ी ही प्यारी है। उसके दादा-परदादा उसी में घूमते थे।

‘‘पुरखों से चली आनेवाली चीज़ को कोई त्याग नहीं देता। आख़िर हमारे गाँव के छोर पर स्थित केले के पौधोंवाला भी अपने दादा-परदादाओं के ज़माने की झोंपड़ी को छोड़ना नहीं चाहेगा। तुम चाहे, उसके क़द के बराबर धन का ढेर लगा दो, तब भी वह उस झोंपड़ी को नहीं बेचेगा।'' जमीन्दार ने कहा था।

इस पर दोनों ने एक-एक हज़ार रुपयों का दाँव लगाया थाऔर जमीन्दारिन हार चुकी थी।

‘‘मैंने इस आशा से तुम्हें एक हज़ार रुपये देने को मान लिया था कि मैं दाँव में जीत जाऊँगी और जमीन्दार के द्वारा नई गाड़ी ख़रीदवा दूँगी। तुमने लोगों की बेतुकी सलाहें सुनकर मेरी आशा पर पानी फेर दिया। जानते हो? तुम्हें जिन लोगों ने झोंपड़ी न बेचने की सलाह दी, उन्हीं लोगों ने मेरे पास आकर अपनी झोंपड़ियाँ पाँच-पाँच सौ रुपयों में बेचने की इच्छा प्रकट की। दूसरों की बातों में आकर नुक़सान पा चुके हो। अब भी सही, अपनी अ़क्ल ठिकाने पर रखो।''

रामदीन लज्ज़ित हो अपना सिर झुकाये उल्टे पाँव लौट आया।

राजकुमार और पत्थर के खम्भे


बहुत समय पहले रत्नगिरि का राजा अच्छी तरह शासन कर रहा था और उसके राज्य में प्रजा शान्तिपूर्वक जीवन-यापन कर रही थी। उसके तीन पुत्र थे और वे तीनों सुन्दर युवक के रूप में बड़े हो रहे थे। यह सोचकर कि इन्हीं में से कोई उसके सिंहासन का उत्तराधिकारी होगा, उन्हें राजा ने अपने पास बुला कर कहा, ‘‘मैं चाहता हूँ कि अब तुम सब राज्य में घूम कर यह देखो कि प्रजा कैसे रहती है, वे सुखी हैं कि नहीं। तुम सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाओ और संध्या तक लौटकर यह बताओ कि तुमने क्या देखा।''

अतः दूसरे दिन प्रातःकाल तीनों राजकुमार दिन का भोजन अपने साथ लेकर पैदल निकल पड़े। सबसे बड़े राजकुमार राजकीर्ति ने बायीं ओर का मार्ग लिया; राजमूर्ति ने दायीं ओर का रास्ता लेने का निश्चय किया; सबसे कनिष्ठ राजकुमार राजस्नेही ने सीधे जानेवाले पथ का अनुगमन किया। सबने संध्याकाल तक महल में वापस लौट आने का वचन दिया।

राजकीर्ति बहुत देर तक चलने के बाद एक जंगल में पहुँचा जहाँ उसने एक सरोवर के निकट तीन खूबसूरत घोड़ों को घास चरते देखा। निकट ही एक वृक्ष के नीचे बैठा एक योगी घोड़ों की निगरानी कर रहा था। राजकुमार ने योगी के पास जाकर साष्टांग दण्डवत किया। योगी ने पूछा, ‘‘वत्स, तुम कौन हो और जंगल में तुम्हारा कैसे आना हुआ?''

राजकीर्ति ने अपना परिचय और आने का उद्देश्य बताते हुए कहा, ‘‘हे महात्मन ! क्या मैं आप के एक घोड़े पर सवारी कर सकता हूँ जिससे मैं अधिक से अधिक क्षेत्रों तक पहुँच कर वहाँ की प्रजा से मिल सकूँ?''

‘‘किसी घोड़े को ले लो लेकिन सूर्यास्त तक निश्चित रूप से लौट आना और अपनी यात्रा के बारे में बताना'', योगी ने कहा।

राजकीर्ति एक घोड़े पर सवार होकर तेज़ी से निकल पड़ा। कुछ दूरी पर वहाँ सब्जियों का एक विचित्र बाग देख कर रुक गया।

उस बाग का कोई माली नहीं था उसके बाड़े में कोई द्वार बना हुआ नहीं था। वह अपनी आँखों पर विश्वास न कर सका जब उसने देखा कि बाड़े के खूंटे हँसियों में बदल गये और सब्जियों को काटने लगे। राजकुमार चाहता तो अब बाग के अन्दर जा सकता था, लेकिन उसे साहस न हुआ।

वह जंगल में लौटकर घोड़े से नीचे उतर योगी के पास आया। ‘‘हाँ पुत्र, तुम उत्तेजित लग रहे हो। क्या बात है?'' राजकीर्ति ने रहस्यमय बाग के बारे में बताया। ‘‘राजकुमार'', योगी ने आँखें मिचकाते हुए पूछा, ‘‘तुमने उस विचित्र दृश्य से क्या सीखा?''

‘‘मैं कुछ नहीं समझ सका, महात्मन! यह सब रहस्यमय था और इस विचित्र घटना की व्याख्या करना मेरे बस की बात नहीं है।'' राजकुमार ने स्वीकार किया।

‘‘यदि तुम इतनी आसान चीजें नहीं समझ सकते तो शासन कैसे करोगे? मैं तुम्हारी मूर्खता के कारण तुम्हें पत्थर का खम्भा बना रहा हूँ।''

जब राजकीर्ति रात तक भी नहीं लौटा तब राजा और दोनों राजकुमार बहुत चिन्तित हो गये। राजा दोनों राजकुमारों से भी उनके अनुभव के बारे में पूछना भूल गया। उन्होंने देखा कि दोनों राजकुमार दिन भर राज्य में घूमते रहने के कारण थक गये हैं। उन्होंने कहा कि दूसरे दिन प्रातःकाल सोचेंगे कि क्या करना है। यह निश्चय किया गया कि राजमूर्ति भाई की खोज में बायीं ओर की सड़क से जायेगा। और राजस्नेही दायीं ओर की सड़क से, क्योंकि जिस मार्ग से पहले दिन वह गया था वह पहाड़ों की ओर जाता था जिधर आबादी बहुत कम थी।

राजमूर्ति, शीघ्र ही जंगल में आ गया, जहाँ तीन ख़ूबसूरत घोड़े घास चर रहे थे और एक योगी उनकी निगरानी कर रहा था। उसने योगी को प्रणाम किया और एक घोड़े पर सवारी करने की आज्ञा मांगी। ‘‘हे महात्मन, मैंने ऐसे सुन्दर घोड़े पहले कभी नहीं देखे।''

‘‘ले जाओ, ओ राजकुमार! लेकिन सूर्यास्त तक लौट आना और अपनी साहसिक यात्रा के अनुभव बताना।'' योगी ने मुस्कुराते हुए कहा।

राजमूर्ति घोड़े पर सवारी के उत्साह में पत्थर का वह खम्भा देख न सका जिसका ऊपरी हिस्सा उसके भाई के चेहरे से मिलता-जुलता था। कहीं उसका भाई खड़ा, बैठा हुआ या लेटा हुआ मिल जाये, इस ख्याल से घोड़े पर सवार हो जाते हुए उसने अपनी बायीं और दायीं ओर देखा। लेकिन उसे कोई ऐसा नहीं मिला ।

उसे एक बूढ़ा आदमी मिला जो लकड़ी के गट्ठर से दब कर झुका हुआ था। राजमूर्ति ने घोड़े की लगाम खींचते हुए पूछाः ‘‘दादा जी, क्या मैं सहायता करूँ?''

उस आदमी ने अपना सिर भी नहीं उठाया। और न एक शब्द ही कहा। पर फिर भी और लकड़ियाँ चुनता रहा। राजमूर्ति को यह घटना अनोखी-सी लगी, इसलिए उसने योगी को बताना चाहा।

वह वापस लौटकर घोड़े से नीचे उतरा और अभिवादन के लिए झुका। ‘‘बताओ, तुम्हारा अनुभव क्या था?'' योगी ने पूछा।

राजमूर्ति ने वृद्ध के विषय में बताया और यह भी कहा कि वह उसकी सहायता करना चाहता था, लेकिन वृद्ध ने इसकी सहायता नहीं ली।

‘‘उसने तुम्हारी सहायता क्यों नहीं स्वीकार की?'' योगी ने पूछा। ‘‘मैं नहीं कह सकता, महात्मन; उसने तो एक शब्द भी नहीं कहा।'' राजमूर्ति ने कहा।

‘‘राजकुमार! यदि तुम इतनी सरल बातें भी नहीं समझ सकते तो मौका मिलने पर राज्य पर शासन कैसे करोगे? तुम मूर्ख हो, इसलिए मैं तुम्हें पत्थर का खम्भा बना देता हूँ।''

जब राजमूर्ति भी नहीं लौटा, राजस्नेही के साथ राजा भी परेशान हो गया। राजस्नेही ने राजा को आश्वस्त करते हुए कहा कि कल सवेरे ही भाइयों की खोज में निकल पडूँगा। दूसरे दिन सुबह ही वह बायें मार्ग पर चल पड़ा और शीघ्र ही उस जंगल में पहुँच गया। उसे भी चरते हुए सुन्दर घोड़ों ने आकृष्ट किया जिन्हें एक शान्तिपूर्वक बैठा हुआ योगी देख रहा था। अचानक राजकुमार ने पत्थर के दो खम्भों को देखा। ये उसे बहुत विचित्र लगे। खम्भों के ऊपरी हिस्से उसके भाइयों के चेहरों से मेल खाते थे। उसके मन में जिज्ञासा हुई।

राजस्नेही ने योगी से पूछा, ‘‘हे पावन आत्मा! क्या आपने मेरे भाइयों को देखा है?''

‘‘हाँ, वे इधर आये थे।'' योगी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘वे घोड़ों पर सवार होना चाहते थे। जब वे वापस आये मेरे प्रश्नों के उत्तर न दे सके, इसलिए मैंने उन्हें पत्थर के खम्भों में बदल दिया।''

‘‘क्या उन्हें पुनः जीवित नहीं किया जा सकता, महात्मन?'' राजस्नेही ने विनती की।

‘‘एक घोड़ा ले जाओ और मार्ग में कुछ अनोखी चीज़ दिखाई दे तो मुझे उसका रहस्य समझाओ।''

योगी ने कहा। ‘‘यदि तुम्हारा उत्तर सन्तोषजनक हुआ तो तुम तीनों राजकुमार तीनों घोड़ों पर सवार होकर वापस जा सकते हो।''

राजकुमार राजस्नेही ने थोड़ी देर के लिए सोचा और अपने भाग्य की परीक्षा लेने का निश्चय किया, जिससे उसके भाइयों के प्राण भी बचाये जा सकते थे। वह योगी के आदेशानुसार एक घोड़े पर सवार होकर चल पड़ा। उसने कोई अनोखी घटना नहीं देखी और न किसी विचित्र व्यक्ति से उसकी मुलाकात हुई जिससे योगी के उत्तर देने के लिए उसे कोई संकेत मिल सके।

उसे प्यास लग रही थी और वह घोड़े को विश्राम भी देना चाहता था। उसने कुछ दूरी पर एक सरोवर देखा।

वह घोड़े को घास चरने के लिए छोड़ दिया और पानी पीने के लिए सरोवर की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने अपनी अंजलि में पानी लेने के लिए हाथ बढ़ाया कि आश्चर्य! सरोवर पीछे हट गया। वह आगे बढ़ा, लेकिन जल पीछे हटता गया। और, घोर आश्चर्य! राजकुमार थोड़ी ही देर में सूखे सरोवर के तल पर खड़ा था।

यह सचमुच एक आश्चर्यजनक घटना थी। वह तुरन्त योगी के पास वापस चला गया और अपने अनुभव के बारे में बोला। ‘‘हाँ, ठीक है, लेकिन इस घटना से तुमने क्या समझा?'' योगी ने प्रश्न किया।

राजकुमार ने बहुत माथापच्ची की लेकिन उसे कोई युक्तियुक्त उत्तर न सूझा जो साधु को सन्तुष्ट कर सके। ‘‘तुम भी अपने भाइयों के समान मूर्ख हो और तुम्हारी भी वही दुर्गति होगी।'' योगी ने कहा। दूसरे ही क्षण राजकुमार राजस्नेही पत्थर के खम्भे में बदल गया। कोई भी कल्पना कर सकता है कि सबसे छोटे राजकुमार के देर रात तक भी नहीं लौटने पर महल में कितनी खलबली मची होगी।

राजा के पश्चाताप का कोई अन्त नहीं था, क्योंकि उसी के आदेश पर राजकुमार बाहर गये थे।

मंत्री ने सुझाव दिया कि राजकुमारों की खोज करने के लिए सेना को चारों ओर भेज देना चाहिये। किन्तु राजा ने घोषणा की कि राजकुमारों की खोज करने वह स्वयं जायेगा। राजा ने उसी मार्ग का अनुगमन किया और शीघ्र ही उसी जंगल में आ गया जहाँ योगी शान्तिपूर्वक घोड़ों को चरते हुए निगरानी कर रहा था।

राजा ने सोचा कि योगी अपने तपोबल से राजकुमारों के बारे में कुछ कह सकेगा। ‘‘हे धर्मात्मा, मेरा विश्वास है कि मेरे तीनों बेटे राज्य का भ्रमण करने के लिए इस मार्ग से आये हैं...''

योगी बीच में ही हस्तक्षेप करते हुए बोला, ‘‘हाँ, वे आयेथे । मैंने उनसे आसान सवाल पूछे जिनका उत्तर वे नहीं दे सके। मेरी नज़र में वे मूर्ख थे और राजा होने लायक नहीं थे। इसलिए मैंने उन्हें पत्थर के खम्भों में बदल दिया। तुम उन्हें यहाँ देख सकते हो।''

राजा खम्भों के ऊपरी हिस्सों को अपने बेटों के चेहरों से मिलते देख चकित रह गया।

‘‘वे प्रश्न क्या थे, महात्मा? क्या मैं अपने बेटों के लिए उत्तर दे सकता हूँ।'' राजा ने कहा।

योगी ने तब सबसे बड़े राजकुमार के अनुभव के बारे में बताया। ‘‘राजकुमार ने सब्जियों का एक बाग देखा जिसका कोई रक्षक नहीं था। अचानक ब़ाडे के खूंटे हँसियों में बदल कर सब्जियों को काटने लगे। इसका अर्थ क्या है?''

‘‘बाड़ा पौधों और सब्जियों की रक्षा के लिए था। लेकिन एक दुष्ट रखवाले की तरह अपने मालिक की दौलत को उसने बर्बाद कर दिया।''

योगी ने मुस्कुराते हुए दूसरे राजकुमार के अनुभव का विवरण दिया। ‘‘भारी बोझ से दबा हुआ होते हुए भी उसकी परवाह किये बिना और लकड़ियाँ चुन कर वृद्ध अपना भार बढ़ाये जा रहा था। हे राजन, इसका अर्थ क्या है?''

राजा ने कहा, ‘‘वृद्ध को अपने पास की सम्पति से सन्तोष नहीं था। परिणाम पर विचार किये बिना वह और अधिक प्राप्त करने के लोभ से ग्रस्त था।''

योगी अब भी मुस्कुरा रहा था। ‘‘तुम्हारा सबसे छोटा राजकुमार प्यास बुझाने के लिए सरोवर से पानी पीना चाहता था, लेकिन सरोवर ने उसे धोखा दिया। हे राजा, इस रहस्य का क्या अर्थ है?''

‘‘एक फ़िज़ूलखर्च के पास जो बेकार की चीजों पर अपनी दौलत बर्बाद करता है, अन्त में कुछ नहीं बचता।'' राजा ने कहा। उसे एक अदृहास सुनाई पड़ा और उसने अपने तीनों बेटों को अपने पास देखा। खम्भे अदृश्य हो गये थे।

‘‘हे महात्मन!'' राजा ने साष्टांग दण्डवत केसाथ कहा। ‘‘मेरे तीनों बेटों को पुनर्जीवन देने के बदले मैं आजीवन आप की सेवा करूँगा। आज मैं इन्हें अपने महल में ले जाऊँगा और यदि आप मेरे बच्चों को यह शिक्षा देने के लिए कि वे अच्छे राजा कैसे बनें, आप इनके गुरु बनकर हमारे साथ चलें तो मैं आप का आभारी रहूँगा।''

योगी ने राजा का निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और राजकुमारों को कहा, ‘‘तुम सब एक-एक घोड़ा लेकर अपने पिता के साथ लौट जाओ।''

कुछ दिनों के पश्चात योगी को समारोहपूर्वक महल में ले जाकर राजकुमारों के राजगुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।