30 अप्रैल 2011

भारतीय संस्कृति का स्वरुप


संस्कृति का तात्पर्य जीने की कला से है। वह तौर-तरीका अथवा ढंग जो इंसान द्वारा अपनी जिन्दगी जीने के लिये अपनाया जाता है अथवा व्यवहृत है, "संस्कृति" कहलाता है। यह वस्तुतः वह प्रवृत्ति अथवा प्रणाली होती हो जो मनुष्य की वेशभूषा, पहनावा, खान-पहनावा, आमोद-प्रमोद एवं क्रियाकलाप जैसी रूची में सन्निहित रहता है, उसी प्रकार मनुष्य की इच्छा, आकांशा, कामना एवं वासना के प्रतिबिंब की झलक हम तत्कालीन मानवीय संस्कृति में देखते हैं।

संस्कृति रुचि से अनुप्रेरित एक संस्कार है जो मनुष्य में व्याप्त रहता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" ने अपनी पुस्क्तक "संस्कृत्ति के चार अध्याय" में इस तथ्य को उद्घाटित करते हुए लिखा है- जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जिस समाज के साथ हम मिलाकर जी रहे हैं, उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है। अपने जीवन में मनुष्य जिन संस्कारों को संचित करता है, वह उसके संस्कृति का अंग बन जाता है।" अतएव विज्ञान मनुष्य के जीवन में लिप्त रहने वाला एक संस्कार है, जिसकी रचना और विकास अनेक सदियों के कटु अनुभवों का परिणाम है। अन्य ,शब्दों में यह युगों-युगों तक संचित भावधारा के विकास का प्रतिफलन है।

जो राष्ट्र ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, कला एवं कौशल में जितना अधिक समृद्ध रहा है, उस राष्ट्र की संस्क्र्तिती उतनी ही सम्रद्ध्शाली रही है। अन्य शब्दों में जो राष्ट्रए जितना ही सभी और सुशिक्षित होता है, उस राष्ट्र की सांस्कृतिक गरिमा उतनी ही समुन्नत और प्रभावशाली होती है। रूसो, मांटेस्क्यू वाँल्टेयर एवं डिडरोट जैसे महान दार्शनिकों ने अगर अपने ज्ञान एवं दर्शन की रश्मि के समाज में नहीं फैलाई होती तो फ्रांस की राज्य क्रान्ति (1789) के समय लोगों की सुसुप्त चेतना नहीं हो पाती। अरस्तु, सुकरात एवं होमर जिअसे महान दार्शनिक एवं कलाकार का प्रादुर्भाव अगर न हुआ होता तो रोम, ग्रीस, यूनान एवं इटली जैसे यूरोपीय देशों का स्वरुप कुछ भिन्न होता।

यह स्वतः सिद्ध बात है कि जब भी एक राष्ट्र दूसरे वाणिज्य अथवा व्यापार, सहयोग अथवा असहयोग एवं मित्रता अथवा शत्रुता आधी कारणों से परस्पर एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं तो उन राष्ट्रों की संस्कृति एक-दूसरे को परस्पर प्रभावित करती है।

प्राचीन भारतीय इतिहास पर दृष्टि डालने से यह प्रतीत होता है कि भारत अतीतकाल से ज्ञान, विज्ञान, कला, कौशल एवं दर्शन का केंद्र रहा है। यहाँ शक, कुषाण, हूण, यूनानी एवं पर्शियन जैसी अनेक जातियों, धर्मों एवं सम्प्रदायों के लोग समय-समय पर आए और अनेक प्रभाव में आकर भारतीय संस्कृति का परिदृश्य भी समय-समय पर कुछ न कुछ परिवर्तित होता गया है जिसकी झलक हम भारतीय प्रातत्वविदों के अनुसंधान से नमूने के रूप में प्राप्त मूर्तियों, सिक्कों, बर्तनों, चित्रों, आभूषणों एवं पोशाकों में देखते हैं। अवशेष के रूप में प्राप्त इन प्राचीन अभिलेखों का अवलोकन करने से तत्कालीन भारतीय समाज की जीवंत सांस्कृतिक झलक प्राप्त होती है। समन्वय की भावना भारतीय संस्कृति का मूल विशिष्टय है और अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की मौलिक विशिष्टता है।

इस देश में जहाँ एक ओर वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत एवं गीता जैसी ज्ञान एवं दर्शन के सागर से सुसज्जित कालजयी कृतियों एवं महाकाव्यों की रचना हुई वहीं दूसरी ओर नालंदा, तक्षिला एवं विक्रमशिला जैसे शिक्षा केन्द्रों की स्थापना ज्ञान के अर्जन हेतु की गई, जहाँ देशी एवं विदेशी असंख्य छात्रों ने ज्ञान का अर्जन किया तथा अपने भावों एवं विचारों के परस्पर आदा-प्रदान से देशीय संस्कृति को नवीन आयाम दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग एवं फाह्यान के यात्रा वृतांत से प्राचीन भारतीय समाज का समुन्नत सांस्कृतिक परिदृश्य उजागर होता है। रामकृष्ण परमहंस, महात्मा बुद्ध, वर्धमान महावीर एवं सम्राट अशोक ने एक ओर जहाँ तप, अहिंसा, करूणा एवं प्रेम का सन्देश दिया वहीं दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद एवं महर्षि अरविन्द ने दर्शन के मूल से हमें अवगत कराया। नागार्जुन, आर्यभट्ट वराहमिहिर एवं धन्वन्तरी जैसे सुप्रशिद्ध गणितग्य, ज्योतिष एवं चिकित्सा वैज्ञानिकों ने जहाँ एक ओर ज्योतिश एवं चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नये-नये अविष्कार करके देश को समुन्नत बनाया वहीं दूसरी ओर गोस्वामी तुलसीदास, कबीरदास, चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर, गुरूनानक एवं दादूदयाल जैसे सदाचारी पुरूषों ने तत्कालीन समाज को नैतिकता एवं सदाचार के मार्ग को अपनाने की प्रेरणा डी। गोस्वामी तुलसीदास ने "रामचरित मानस" महाकाव्य में दानवत्व की विजय दिखाकर तथा उसमें विभिन्न चरित्रों को उद्घाटित कर आदर्श पति, आदर्श पत्नी, आदर्श पत्नी, आदर्श भाई एवं आदर्श सेवक का अनूठा उदहारण मध्यकालीन समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया और लोगों को जीवन के नैतिक आदर्शों एवं मूल्यों को पालन करने की प्रेरणा दी। भगवत गीता में कर्म की महत्ता प्रतिपादित की गई और "कर्म ही पूजा है" का सिद्धांत निरूपण किया गया है तथा कर्म के मार्ग से विचलित न होने की प्रेरणा दी गई है। संस्कृत साहित्य के महान कवी एवं भारत के शेक्सपीयर कहे जाने वाले कालिदास ने अपने विषद ज्ञान की रश्मि सम्पूर्ण राष्ट्र से चतुर्दिक फैलाई और उसी ज्ञान रूपी आलोक से हम समस्त देशवासी आलोकित हुए। विश्व कवि रविन्द्र नाथ टैगोर, बंकिमचंद्र एवं ईश्वर चन्द विघ्यासागर जैसे मनीषी एवं युगपुरूष इसी देश में पैदा हुए जिन्होंने सेवा एवं समर्पण के भाव से राष्ट्र को महान सन्देश दिया। ज्ञान एवं विज्ञान के क्षेत्र में प्रगतिशील प्राचीन भारत की ग्यानावार्धाद कृतियों एवं काव्यों की ख्याती सम्पूर्ण विश्व में इतनी फ़ैली कि विदेशी विद्वानों द्वारा इन ग्रंथों का अनुवाद अँग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन एवं पारसी भाषा में होने लगा तथा विदेशों में भारतीय साहित्य एवं दर्शन का परचा-प्रसार होने ला और लोग इसे पढने लगे और ग्रेग, रोम, मिश्र, चीन, जापान, कोरिया एवं तिब्बत जैसे राष्ट्र भारत के संपर्क में आने लगे। इन विदेशी राष्ट्रों से संपर्क में आने के कारण हमारी संस्कृति भी प्रभावित हुई। भारतीय इतिहास के विभिन्न काल खण्डों का अनुशीलन करने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि शिक्षा, ज्ञान, कला-कौशल एवं दर्शन की दृष्टि से हमारा देश विकासशील रहा है इस कारण प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय समाज की संस्कृति भी प्रगतिगामी रही है। समय-समय पर विदेशी आक्रमणकारियों ने देश पर आक्रमण करके देशीय संस्कृति को नष्ट करने की कुचेष्टा की परन्तु देशवासी अपनी अटूट आस्था एवं विश्वास की बदौलत अपनी संस्कृति को जीवंत एवं अक्षुण बनाए रखने में सफल हुए हैं। इस कारण प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत का सांस्कृतिक स्वरुप गरिमामय एवं वैभवशाली रहा है। भारतीय संस्कृति की वास्तविक झलक यहाँ की मूर्तिकला, चित्रकला, शिल्पकला, वास्तुकला एवं अभिनय कला उत्सवों एवं त्योहारों में झलकती है।

अनोखी बात यह है कि यहाँ के कलावन्तों ने कला को निखारने के लिये कोई सीमा नहीं बांधी। उन्होने धातु, पत्थर, लकड़ी एवं हड्डी आदि को अपनी कला प्रदर्शित करने का आधार बनाया। भारतीय कलावन्तों ने मूर्तियों, बर्तनों, दीवारों, पोशाकों, सिक्कों एवं आभूषणों पर चित्रकारी करके भारतीय कला का बेजोड़ नमूना प्रस्तुत किया है जिसका अनुशीलन करके तत्कालीन भारी समाज का वास्तविक प्रतिबिम्ब हमारे सम्मुख उजागर होता है।

इतिहास गवाह है कि भारत में मूर्तिकला का प्रारम्भ सदियों पुराना है तथा यहाँ मूर्ती को गढ़ने या ढालने का तांता कभी न टूटा। सिन्धु की घाटी के मोहनजोदडों और पंजाब के हड़प्पा की शहरी सभ्यता के जमाने से आज तक इस देश में मूर्तियाँ बनाई और पूजी जाती हैं। इस तथ्य का प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों से प्राप्त अभिलेख के रूप में मूर्तियों से सहज ही लगाया जा सकता है। सांड, कुत्ते एवं शाल ओढ़े विभिन्न मुद्राओं में प्राप्त मूर्तियों तथा बर्तनों एवं आभूषणों पर अंकित जानवरों एवं मनुष्यों की मूर्तियों से यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन भारतीय समाज कला के क्षेत्र में निपुण था तथा उनका सामाजित जीवन भी समुन्नतशील था।

अशोक के शासनकाल में साँची एवं भरहुत के स्तूपों के चतुर्दिक रेलिंग एवं तोरण द्वारा बनी है। मूर्तियों और उस पर की गई नक्काशी भारतीय कला एवं संस्कृति का अनमोल रतन है जिसमें इंसान की रुचि को दर्शाया गया है। कालान्तर में ग्रीक और यूनानी शैली में कलावन्तों ने मूर्तियों को गढ़ने अथवा बनाने का कार्य प्रारम्भ किया जो 'गांधार शैली' के नाम से चर्चित रही है। इस शैली में बुद्ध के जीवन के अनेक दृश्य पत्थर की पातियों पर उभार दिए गए जिसकी नक़ल से अनेक मूर्तियाँ देश के अन्य भागों में बनकर मथुरा से बामियान तक देशी एवं विदेशी आस्थावानों की पूजा पाने लगी। कुशान राजाओं के शासनकाल में यह शैली अत्याधिक पल्लवित और पुष्पित हुई जिसका मुख्य केंद्र मथुरा, सारनाथ, अमरावती और मथुरा था। इस काल में पत्थर और मिटटी की बनी मूर्तियों का रूप विलक्षण था। साँची के बोधिसत्व की मूर्ती तथा संसार के डरे जीवों को निर्भय करती अभी मुद्रा में खडी मथुरा की ध्यान मुद्रा में बैठी पत्थर की मूर्ती बेजोड़ है, जो भारतीय संस्कृति के मूल मन्त्र "अहिंसा परमों धर्म" का सन्देश सम्पूर्ण विश्व को आज भी दे रही है।

राष्ट्रकूट राजाओं के शासनकाल में देवगिरी और दौलताबाद के पास अजन्ता से करीब 75 मील के फासले पर औरंगाबाद जिले में अवस्थित एलोरा के गुफा मन्दिर में बनी मूर्तियाँ अनोखी कारीगरी और विलक्षण नक्काशी के लिये विश्वविख्यात हैं। जहाँ बौद्ध, जैन एवं हिन्दू धर्मों के लगभग 30 से अधिक विहार, चैत्य एवं मन्दिर हैं जिसमें प्रदर्शित की गई मूर्तियाँ असाधारण हैं। मानक कला एवं कारीगरी से सुसज्जित यह गुफा मन्दिर अनंत श्रम, अटूट आस्था एवं असीम विश्वास का प्रतीक बना हुआ है।

खजुराहो का प्राचीन मन्दिर भारतीय संस्कृति की अनमोल विरासत है। हर्ष के शासन काल में 7वीं शती में भारत पधारे चीनी यात्रे 'ह्वेनसांग' के यात्रा वृतांत से यह स्पष्ट होता है कि इस मन्दिर का निर्माण कार्य गुप्त काल में प्रारम्भ हुआ था जो प्रतिहारों के शासनकाल में जारी रहा। चंदेल राजाओं (9-12 शताब्दी) ने वास्तुकला की इस मिसाल को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। खाजुराओ के इस भय मन्दिर का महत्वा उसकी वास्तुकला की खूबसूरती या मादक मुद्राओं में निमित मूर्तियों से नहीं है, अपितु इस शिल्प में संचित उस ज्ञान से है जिसने मानव को सतही भेदों को बुलाकर आलोक में लाने की राह दिखाई है।

भुवनेश्वर और कोणार्क के सूर्य मन्दिर की बाहरी काया अनेक अभिराममय और सजीव मूर्तियों से सजी हैं। इन मूर्तियों में भारतीय संस्कृति की उत्कृष्टता की जहानी सहज भाव से देखी जा सकती है। काल्पनिक ख्यालों और भंगिमाओं में सुर-सुन्दरियों की मूर्तियों से सुसज्जित इन मंदिरों का कलोवर अन्पम है। भुवनेश्वर ख्यालों और भंगिमाओं में सुर-सुंदरियों की मूर्तियों से सुसज्जित इन मंदिरों का कलोवर अनुपम है। भुवनेश्वर के एक मन्दिर पर प्रेम पात्र लिखने में बनी नारी की मूर्ती उतनी ही आकर्षक है, जितनी कि उसके चेहरे की बनावट में जंगी नारी की मानवीय सुन्दरता। कोणार्क के सूर्य मन्दिर की मूर्तियों की कहानी निराली बन पडी है। विभिन्न भाव-भंगिमाओं से सुसज्जित इन मूर्तियों का अवलोकन करने से तत्कालीन भारतीय समाज के सामाजित एवं संस्कृतिक जीवन का स्वरुप सजीव हो उठता है। दक्षिण भारत के दिलवाडा के मन्दिर की बाहरी काय में लगी मूर्तियाँ हमारी संस्कृति की अनमोल विरासत हैं।

प्राचीन भारतीय इतिहास का अधयन्न करने से यह प्रतीत होता है कि इंसान ने अपने कला-कौशल की खूबियों को कहानी में परिणत कर सदियों बाद आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिये चट्टानों पर अपने सन्देश खोदे, चिकने पत्थरों के खड़े किए और उस पर अक्षरों के मोती बिखेरकर अपने जीवन-मरण की कहानी को उतारा जो हमारी अनमोल विरासत बन गई है।

अशोक ने अपने शासनकाल में सारनाथ, दिल्ली, नंदनगढ़, लुम्बनी एवं इलाहबाद आदि स्थानों पर अनेक स्तूपों, खम्बों का निर्माण करवाया और उस पर अहिंसा, करूणा एवं त्याग के सन्देश को खुदवाकर लोगों का ध्यान आकृष्ट करवाया ताकि समाज के लोग अहिंसा, शांति, करूणा एवं भाईचारे का पालन करके सुपथ की ओर अग्रसर होकर देशीय संस्कृति को समुन्नत करने में योगदान दे सकें। कुछ खम्बे 30 फीट ऊंचे हैं और एक ही पत्थर से बनाए गए हैं। सारनाथ के खम्बों में चार सिन्हावाली मूर्ति हमारा राष्ट्रीय प्रतीक है।

अजन्ता के गुफा मन्दिर विश्व के गुफा मंदिरों की श्रृंखला में अद्वितीय है। इसकी गुफाओं पर कुदरत का नूर इस प्रकार बरस पडा है। जिसे देखकर यह प्रतीत होता है कि प्रकृति यहाँ आकर थिरक उठी हिया। मुम्बई और हैदराबाद के बीच विन्ध्याचल के पूर्वी और पश्चिम चोर में विशाल पर्वतमालाओं की एक श्रृंखला उत्तर से दक्षिण तक अवस्थित है। अजन्ता का गुफा मन्दिर इसी पहाडी गुफा में अवस्थित है। इसका निर्माण ईसा से करीब दो सौ साल पहले ही प्रारम्भ हुआ और यह सातवीं सदी तक बनाकर तैयार हो चुका था। करीब 250 फीट सीधा पहाड़ काटकर अर्धचन्द्राकार रूप में बनाई गई यह गुफा मन्दिर देश की सबसे प्राचीन गुफा मन्दिर है। बुद्ध के जीवन के निर्माण काल तक की घटनाओं से सम्बंधित असंख्य भित्ती चित्र कलावन्तों ने इस गुफा मंदिरों में बनवाया है जिसे देखकर प्रेम, मैत्री, तप, करूणा एवं त्याग की अनोभूति होने लगती है और यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन समाज के लोगों की रुचि प्रेम, करूणा एवं त्याग में थी और लोग सदाचारी प्रवृति के थे। दया और माया उनके जीवन का मूल अनूठे कलाकारी के कारण इसके चित्र दुनिया के लिये नमूने बन गए और देश विदेश में सर्वत्र ही चित्रकला को प्रभावित किया। चीन के तुन-हांग और श्रीलंका के सिगिरिया की पहाडी दीवारों पर इसी के नमूने चित्रों को अंकित किया गया है। पूर्व के देशों की कला को इन चित्रों ने प्रभावित किया साथ की मध्य और पश्चिमी एशिया के देश भी इसके कल्याणकारी प्रभाव से अछूते नहीं रहे। देश के अन्य नगरों एवं देहातों में भी इन चित्रों का अनुकरण किया जाने लगा और तत्कालीन ग्रामीण एवं शहरी संस्कृति का स्वरुप में जीवन के विविध पक्षों एवं पहलुओं को मुखरित करने के कारण अजन्ता का गुफा मन्दिर चित्रकला के इतिहास में एक अप्रतिम स्थान रखता है।

कालान्तर में देश के विभिन्न भागों में कलावन्तों ने जीवन और जगत के विभिन्न पहलुओं के असंख्य चित्र मंदिरों, स्मारकों, प्राचीन धरोहरों एवं महलों पर अंकित किए जिसमें तत्कालीन जीवन का जीता जागता सजीव स्वरुप दिखता है। मार्कोपोलो, अलबरूनी एवं इब्नबतूता के एतिहासिक वृतांत से मध्यकालीन भारतीय समाज का सांस्कृतिक स्वरुप झलकता है। मध्यकालीन भारत में हिन्दू और इस्लामी संस्कृतियों का सम्मिलन हुआ और दोनों संस्कृतियों ने एक दूसरे को प्रभावित किया। मुगलकालीन चित्रकला का आधार फारसी शैली था जिस्मों ईरानी और भारतीय शैलियों का सुन्दर समन्वय था। अकबर के समय में राष्ट्रीय शैली का प्रादुर्भाव हुआ। इन चित्रों में लैला-मजनू के अंकित चित्र अटूट प्रेम और असीम साहस का प्रतीक बना हुआ है।

अभिनय मनोरंजन का साधन होता है एवं इसके माध्यम से हम सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की विविध अनुभूतियों को समाज के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं।

भारत में अभिनय की परस्परा सहस्त्राब्दियों प्राचीन है। अभिनय कला का प्रमुख अवयव (तत्व) नाटक है। कालिदास ने नाटक को "शांत क्रतु चाक्षुष" यानी शांत चाक्षुष यज्ञ कहा है। आचार्य भारत ने अपनी पुस्तक नाटयशास्त्र में नाटक को परिभाषित करते हुए लिखा है कि ब्रह्मा ने ऋग्वेद में पाठ्य, सामवेद से ज्ञान, यजुर्वेद से अभिनय एवं अथर्वेद से रस लेकर पांचवे नाट्य वेद की रचना की। अतः नाटक में संगीत, नर्तन, गायन एवं वादन का समाहार होता है। भारत में नाटक का प्रारम्भ पुलातलियों के नाच से माना जाता है। प्राचीन भारती नाट्य परम्परा के ख्यातिलब्ध नाट्यकार अश्वघोष, शूद्रक, कालिदास, विशाखादत्त, भवभूति, हर्ष एवं राजशेखर ने प्रेरणादायक दुखांत एवं सुखान्त नाटकों की रचना की एवं उसका समय-समय पर सफल मंचन हुआ और उसके माध्यम से हमारे तत्कालीन जीवन के सांस्कृतिक स्वरुप को दिखाया गया। कालांतर में प्रेम प्रधान, व्यंग प्रधान, हास्य प्रधान एवं वीर प्रधान असंख्य नाटकों एवं एकांकियों की रचना हुई एवं उसका समय-समय पर सफल मंचन होता गया है। जिसमें समाज का प्रतिबिम्ब झलकता है।

भारत में नृत्य अथवा नर्तन की परम्परा भी अति प्राचीन है। गोपियों की रासलीला एवं कठपुतली के नाच ने नृत्य कला का सूत्रपात हुआ। कालान्तर में नृत्यकला का परिमार्जित रूप हमारे सम्मुख आया जो हमारी रुचि, आस्था एवं संस्कार का प्रतीक बन गया। वर्तमान समय में भरतनाट्यम, ओडिसी नृत्य, कत्थक नृत्य, राजस्थानी नृत्य एवं मणिपुरी नृत्य आदि भंगिमाओं में भारतीय नृत्यांगना नृत्य प्रस्तुत कर भारतीय संस्कृति के इन्द्रधनुषी झरोखे को मुखरित करने में तल्लीन है।

ज्ञान दर्शन एवं कलाकृतियों में निहित प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय समाज के स्वरुप का निरूपण करने से यह प्रतीत होता है कि भारतीय समाज उन्नतशील था। परिवार का एक मुखिया होता था और संयुक्त परिवार का स्वरुप था। गुरूकुलों एवं शिक्षा केन्द्रों में शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। समाज का आर्थिक आधार कृषि पर आधारित था। लोग मिलजुल कर खेती करते थे और मिलकर रहते थे। लोग द्वार पर आए अतिथि की समुचित सेवा करते थे। प्रेम, अहिंसा एवं त्याग की भावना लोगों में अंतर्निहीत थी। नैतिकता एवं सदाचार जैसे नैतिक मूल्यों का लोग पालन करते थे। आमोद-प्रमोद के रूप में लोग नाच, गान करते अपना मनोरंजन करते थे। वाणिज्य एवं व्यापार का मार्ग भी प्रशस्त था। मैत्री का भाव लोगों में था। समाज के लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में हाथ बाँटते थे एवं दूसरों के दुखों को अपना दुःख समझते कार्य करते थे। कटुता एवं शत्रुता का भाव नगण्य था। सुख और समृद्धी का बोलबाला था। देशी पोशाक एवं देशीय भोजन लोग ग्रहण करते थे। समाज में पर्दा प्रथा का प्रचलन था स्त्रियों को घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता नहीं थी। उनका जीवन केवल घर की चारदीवारी तक सीमित हो गया था।

भारतीय संस्कृति की विकास यात्रा लंबी है और इस यात्रा में काफी उतार-चढ़ाव आया है। समय-समय पर परस्पर आदान-प्रदान की प्रवृत्ति को अंगीकृत किये जाने के फलस्वरूप भारतीय संस्कृति का स्वरुप निराला बन गया है। भारतीय संस्कृति अत्यधिक उदार, व्यापक एवं प्रगतिशील रही है। विभिन्न जन-धाराओं का यों इतना किसी भी देश की संकृति को नहीं मिला, जितना भारत को मिला। इसी कारण भारत सार्वदेशिक संस्कार से तृप्त है। भारतीय संस्कृति की सांस्कृतिक विरासत अथवा धरोहर देश के एक छोर से दूसरे छोर तक अर्थात कश्मीर से कन्याकुमारी तक छिटपुट बिखरी पडी है। इन धरोहरों को संरक्षित रखने की आवश्यकता है ताकि अतीत के दुर्लभ विरासत में लिप्त ज्ञान एवं संस्कार को हम आने वाली पीढी तक पहुंचाते रहें एवं उससे प्रेरणा ग्रहण करते रहें।

वर्तमान भारतीय समाज का सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरुप धीरे-धीरे परिवर्तित होता गया है। वर्तमान भारतीय समाज पर पश्चिम संस्कृति अथवा अप-संस्कृति का प्रभाव तेजी से पड़ रहा है। संयुक्त परिवार का सिद्धांत टूटता जा रहा है। हम पृथकता चाहते हैं और अकेला रहना पसंद करने लगे हैं। एक ओर जहाँ हमारे नए-नए रिश्ते जुड़ते जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर पुराने नाते टूटते जा रहे हैं। लोग खेतीबाड़ी करने की प्रथा छोड़कर गावों, कस्बों एवं दूर-दराज के देहातों से पलायन कर जीविकोपार्जन के लिये नगरों एवं महानगरों की ओर आने लगे हैं। राष्ट्र की राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं अपनी क्षेत्रीय भाषा/बोली का परित्याग कर लोग विदेशी अथवा अँग्रेजी भाषा को अपनाने एवं उस भाषा के माध्यम से अपने बच्चों को शिक्षा देने में गर्व अनुभव करने लगे हैं। विदेशी भाषा या अँग्रेजी में अपने विचारों को व्यक्त करने वाले लोगों का, व्यक्ति का समादर होने लगा है। हरिश्चंद्र का सूक्ति वचन "निज भाषा उन्नति आहे, सब उन्न्नती को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिताहीन न संचय सूल" की अवहेलना कर हम देशीय भाषा को तूच, हीन एवं नगण्य समझने लगे हैं। भारतीय साज-पोशाक अथवा पहनावे को छोड़कर लोग पश्चिमी देशों के नौकरान पर साज-पोशाक धारण करने लगे हैं और ऐसा करने में उन्हें गर्व की अनुभूति होने लगी है। सात्विक भोजन को देशीय रीति से खाना हम नहीं चाहते। शास्त्रीय, रवींद्र संगीत एवं बह्क्तिपरक गीतों का स्थान पाँप गीत एवं संगीत लेने लगा है। ओडिसी, कत्थक एवं भरतनाट्यम नृत्य में रुचि न लेकर कैबरे डांस देखना अधिक पसंद करने लगे हैं। प्रेरणाप्रद नाटक एवं अन्य मनोरंजन के उपादान का समाज से ह्वास होने लगा है। अपनी संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं और जीवन के हर क्षेत्र में हम पश्चिमी की नक़ल तेजी से करते जा रहे हैं।

26 अप्रैल 2011

भारतीय संस्कृत में स्वास्तिक शब्द

भारतीय संस्कृत विभिन्न मान्यताओं, परम्पराओं, विश्वासों और सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों से परिपूर्ण है। इसके सामान कोई अन्य मिसाल सम्पूर्ण विश्व में मिलना मुश्किल है। इसी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है स्वास्तिक चिह्न। भारतीय संस्कृति में स्वास्तिक शब्द और इसके मूर्त रूप स्वास्तिक चिह्न का व्यापक प्रयोग होता है। इस शब्द की अभिव्यक्ति को सुखदोई, कल्याणकारी और मंगलमय आदि शुभ भावों को लेकर आशीष देने के प्रयोग में लाया जाता है। यह शब्द अतीत काल से ही विश्व की मंगल कामना का सूचक बना हुआ है। ऋग्वेद सबसे प्राचीन साहित्य है। इसमें स्वास्तिक शब्द कई स्थानों पर मिलता है। वैसे तो वैदिक ऋचाएं विश्व कल्याण के भावों को ही व्यक्त करती हैं क्योंकि कोई भी स्तुतिकर्ता स्वयं के लिए कोई इच्छा प्रकट नहीं करता है। सभी जगह बहुवचन का प्रयोग कर सृष्टि की समस्त मानव जाती की भलाई के लिए स्तुतियाँ की गई हैं। ऋग्वेद का निम्नलिखित श्लोक समाज कल्याण के भाव को प्रदर्शित करने में पूर्ण रूप से समर्थ है :-
'स्वस्ति नः पथ्यामु धन्वसु स्वस्तयसु वृजेन स्ववर्ति। 
 स्वस्ति नः पुत्र कृशेष योनिशु स्वस्ति रामे मरुतो द्वातन।।'

इस श्लोक में मार्ग मरूभूमि युद्ध आदि में सभी मनुष्यों के कल्याण की शुभकामना की गई है। यहाँ तक कि धन उपलब्धि में सफलता और गर्भस्थ शिशुओं तक की मंगलमय स्थिति के लिए भी प्रार्थना की गयी है। इसी तरह यजुर्वेद में भी स्वस्तिक की व्यापक भावना मिलती है : -
'स्वस्ति नः इन्द्रों वृद्ध श्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्व वेदा।
स्वस्ति नः स्ताक्ष्यों अरिष्ट नेमी स्वस्तिने वृहस्पतिर्दधातु।।'

इस ऋचा को सभी शुभ अवसरों पर कार्य के आरम्भ में ही उच्चारित किया जाता है, ताकि विश्व की मंगलमय भावनाओं के साथ कार्य संपन्न हो जाए। हिन्दू धर्मानुयायिओं के लिए 'स्वस्तिक' या 'सतीए' का चिह्न अज्ञात अथवा नया नहीं है। श्री गणपति का चिह्न होने से यह मंगल सूचक माना जाता है। लग्नादिक शुभ कार्यों में गणपति का पूजन होता है। फिर कहीं कार्यारंभ होता है। कर्मकांडी ब्राह्मण या आचार्य एक पट्टे पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर उसको गणपति का चिह्न मान कर उसका पूजन करते हैं। यघपि यह चिह्न हिन्दू मात्र का जाना माना है फिर भी इसका गूढ रहस्य बहुत कम लोग जानते हैं। योग दर्शन में हठयोग की क्रिया का ज्ञान रखने वाले जानते हैं कि मानव देह में योगमार्ग में 6 स्थान हैं, जिन्हें पटचक्र भी कहते हैं। पहला स्थान मूलाधार चक्र या आधार चक्र का है। इस एक चक्र में एक-एक कमल और एक-एक अधिष्ठात देवता का स्थान है। आधार चक्र में चतुर्दल कमल है और ये चक्र स्वस्तिकाकार है, जिसके अधिष्ठात देवता श्री गणपति है। गणपति जिनके स्थान तक पहुंचे बिना योगी आगे गति नहीं कर सकते, एक मंगल कारक देवता है। अतः प्रत्येक कार्य में प्रथम श्री गणपति पूजे जाते हैं। इसलिए उनके चिन्ह स्वास्तिक को मंगल सूचक माना जाता है।

बंगाल तथा मद्रास में आज भी स्वस्तिक के चिह्न अनेक रूपों में सजावट के मौके पर व्यवहृत होते है। इन दोनों प्रांतों में कल्पना (स्वस्तिक का एक रूप) का चिह्न तो बहुत ही प्रचलित है। गुजरात के घरों में दीवारों की वन्दनवारों को इस चिह्न द्वारा मोतियों से अलंकृत किया जाता है। हिन्दू घरों में प्रत्येक उत्सव पर यह चिह्न द्वारा की चौखट पर या आँगन में बनाया जाता है। हिन्दुओं के विवाहोत्सव में ये चिह्न उस दीवार पर अंकित किये जाते हैं जिस पर कुल देव चित्रित रहते हैं। प्रत्येक शुभ अवसरों पर पुरोहित स्वास्तिक के चिह्न कुमकुम द्वारा अंकित करते हैं। विवाह के मौके पर वर-वधु के मुकुट पर स्वास्तिक चिह्न अंकित किया जाता है जो शुभ माना जाता है। हिन्दू दुकानदार अपने हिसाब-किताब के बहीखाते दीपावली के दिन बदलते हैं। बहीखाते की क्रिया उत्सव के साथ संपन्न होती है। बहीखाते के प्रथम पृष्ट पर स्वास्तिक का चिह्न कुमकुम से अंकित किया जाता है। इस चिह्न से यही अर्थ निकाला जाता है कि सिद्धिदाता भगवान श्री गणेश जी उन्हें आशीर्वाद दें और अपनी कृपा दृष्टि की नजर डालते हुए, ऐसे हालात उत्पन्न करें जिससे उनके व्यापार में उन्नति हो। इसके अलावा स्त्रियों के आभूषणों एवं गहनों में भी इस चिह्न की प्रधानता काफी पाई जाती है। गले की चेन के लाँकेट पर, अंगूठी में, चाबी के छल्ले  पर, कानों के बुन्दों में, चूड़ियों पर और यहाँ तक कि स्त्री, पुरूष के एवं बच्चों के वस्त्रों पर व अन्य कई रूपों में यह चिह्न अलंकारों की शोभा में वृद्धि करता है। मंदिर में पुजारी की धोती पर भी यह चिह्न देखा जा सकता है।

स्वास्तिक के चिह्न बौद्ध और जैन धर्मानुयायियों के यहाँ भी सहज रूप में देख जा सकते हैं। बौद्ध लामा पवित्रता तथा भगवान गौतम बुद्ध का आशीर्वाद पाने के अभिप्राय से स्वास्तिक चिह्न व्यवहार में लाते थे। दार्जिलिंग की वेधशाला पहाडी के ऊपर स्थानीय लामाओं के देवता महाकाल की बलिवेदी पर स्वास्तिक के दो विशाल चिह्न अंकित हैं। बौद्ध तथा जैन अनुयायी अपने त्योहारों पर इस चिह्न का प्रयोग करते हैं।

स्वस्तिक चिह्न का व्यवहार अनेक अभिप्रायों से किया जाता है। जन साधारण की धारणा है की यह एक चिह्न है और सूर्य की चाल को चित्रित करता है। ऐसा माना जाता है की यह चिह्न पहले-पहल सूर्य पूजा का चिह्न था। भारतीय लोगों का विचार है की यह चिह्न 'ॐ' तथा स्वास्ति(कल्याण) से सम्बन्ध रखता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह चिह्न प्राचीन वैदिक काल में बनाए जाने वाले अग्नि कुण्ड से निकला है जिसका ढांचा लगभग ऐसा ही होता था। जाति विज्ञान के जर्मन पंडित स्वस्तिक की उत्पत्ति पांच हजार वर्ष पूर्व आर्यों द्वारा बतलाते हैं। कहा जाता है की आर्य लोग अनार्यों से भिन्नता रखने के लिए इस चिन्ह का प्रयोग करते थे। एक विद्वान का मानना है की यह बलिदान सूचक चिन्ह है तथा बलिवेदी के प्रदक्षिणा की और संकेत करता है। आर्यों के प्राचीन गावों में चौराहों पर स्वस्तिक के चिह्न बने रहते थे। ऐसा कहा जाता है की स्वस्तिक के चिह्न आर्यों की सैनिक छावनी के प्रवेश द्वारों पर बने रहते थे। विशवास यह था की ये चिह्न छावनियों की विपत्तियों से रक्षा करते थे। ब्रहम ज्ञानी वेदांती जन स्वास्तिक को पर ब्रहम का ही चिह्न बतलाते हैं। वे कहते हैं कि 'ॐ' का ही विंकृत चिह्न स्वस्तिक हो गया है। चित्र 'क' 'ख' से उनकी इस उक्ति की पुष्टि होती है। इन चित्रों की लकीरों को गिनने से पता चलता है की दोनों ही 8  मात्राओं से बनाए गए हैं।

'स्वस्तिक' श्री महालक्ष्मी जी का भी चिह्न है। शाक्त धर्मानुयायी एवं तांत्रिक भी अपने कार्य सिद्धि अनुष्ठान में स्वस्तिक को प्रथम स्थान देते हैं। ईसाई धर्म का क्रास भी स्वास्तिक का ही सूक्ष्म रूप सिद्ध माना जाता है। अतः इसकी धार्मिक महत्ता है। इसके अलावा यह चिह्न हमारे कुशल एवं निपुण इंजीनियरों एवं मिस्त्रियों के लिए भी नगर-निर्माण का एक ढांचा है। जयपुर नगर स्वास्तिकाकार ढांचे पर ही बना हुआ है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने भी अपने नगर स्वास्तिकाकार ही बसाए थे। राजा-महाराजाओं के महलों पर पर्याप्य संस्कृत में स्वस्तिक ही कहा जाता है। सामुद्रिक शास्त्रानुसार जिस मनुष्य की देह पर स्वास्तिक का चिह्न हो, वह परम भाग्यशाली माना जाता है। माना जाता है कि ऐसा मनुष्य जहाँ भी जाता है, उसका अनुकूल प्रभाव दूसरों पर पड़ता है जिससे दूसरे लाभान्वित होते हैं। युद्ध शास्त्र के अनुसार स्वस्तिक व्यूह में फंसा हुआ शत्रु कठिनाई से ही निकल सकता है। जैन धर्मावलम्बियों के लिए स्वस्तिक एक परम मांगलिक चिह्न है। यहाँ तक कहा जाता है कि ये चिह्न यदि स्वप्न में दीखे तो मंगल होता है। इसी प्रकार स्वस्तिक शब्द का प्रयोग उत्तरोत्तर अनेक ग्रंथों में वैदिक काल के पश्चात बराबर मिलता है। इस चिह्न की चार भुजाएं केंद्र बिंदु के समकोणों पर आधारित हो कर विश्व की चार दिशाओं की घोतक हैं। भुजाओं का दायीं और को मुड़ना सूर्य पथ का प्रतीक बनाता है। इस प्रकार इस मंगलमय चिह्न में सूर्य, पृथ्वी, दिशाएं और समस्त विश्व मैत्री और कल्याण की भावनाएं केन्द्रित की गयी हैं। यही कारण है कि इस चिह्न को शुभ सूचक मान कर युग-युगांतर से हर मंगलमय वस्तु व मंगलमयी बेला पर कार्यारम्भ में ही प्रयोग लाया जाता है।

भारतीय मुद्रा प्रणाली द्वारा भी स्वस्तिक की भावना को विस्तृत रूप से व्यक्त किया गया है। वैदिक काल में गाय आदन-प्रदान का माध्यम थी। गाय को सर्वाधिक कल्याणमयी समझ कर युग से ले कर अब तक इस देश का सर्वोपरि जीव माना गया है। इसके बाद सिक्कों पर सर्व-सम्पन्नता की अभिव्यक्ति कई मंगलमय चिह्न द्वारा की गयी है। तक्षशिला, मथुरा, उज्जैन, अयोध्या, मालवा आदि गणराज्यों के सिक्कों पर हाथी, गाय और स्वास्तिक चिह्न मुद्रा संचालन में निहित मंगलमयी भावना के प्रत्यक्ष प्रतीत हैं। राजस्थान में पुत्र जन्मोत्सव पर बच्चे की बुआ गोबर व पिसे हुए चावल से द्वार के दोनों ओर स्वास्तिक या सातिर रखती है ताकि श्री गणपति समस्त प्रकार की विध्न-बाधाओं को बच्चे से दूर रखे। यह उत्सव काफी धूमधाम से मनाया जाता है।

भारत की इस कल्याणकारी भावना का प्रसार विश्व के अन्य देशों में भी पाया जाता है। चीन की साम्राज्ञी 'वू' ने स्वास्तिक चिह्न को सूर्य का प्रतीक मानने की राजाज्ञा घोषित कर दी थी। वहां के रेशम व अन्य वस्तुओं पर इस चिह्न  का प्रयोग मिलता है। जापान, मिश्र व यूनान आदि देशों में भी स्वास्तिक की व्यापकता के प्रमाण कम नहीं मिलते। अमरीका के पाषाण युग में भी स्वास्तिक के चिह्न मिलते है। ये चिह्न अमरीका के प्राचीन समाधि स्थलों पर तथा मैक्सिको और पेरूविया के प्राचीन कीर्ति-स्तंभों पर पाए जाते हैं। एशिया में पहले-पहल इस चिह्न का पर्दापण वेविलोनिया की प्राचीन राजधानी 'सूसा' में हुआ था। जापान, चीन तथा तिब्बत में यह प्राचीन काल से अब तक व्यवह्र्त होता आ रहा है। इंगलैंड में लोग इसे फ्लाई फुट कहते हैं जिसका अर्थ चौपाया होता है। स्केंडेनेविया में इसे लोग 'थौर  की हथौड़ी' कहते हैं। यूरोप की एक दंत  कथा के अनुसार 'थौर' सूर्य का पुत्र तथा वर्षा का देवता है। यह मानी हुई तथा प्रमाणिक बात है कि स्वस्तिक चिह्न बहुत प्राचीन है परन्तु विश्व में यह इतना प्रसिद्ध नहीं था। एक शक्तिशाली राष्ट्र का राष्ट्रीय चिह्न होने के कारण इसकी सर्वप्रियता तथा प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी है। यह चिह्न हिटलर के नाजी दल के बैज का चिह्न बनकर विख्यात (या कुख्यात?) हो गया है। आज भी जर्मनी में हिटलर की जेल (संग्रहालय) में स्वास्तिक चिह्न बना हुआ देखा जा सकता है। नाजियों के झंडे पर यह चिह्न तिरछा अंकित किया जाता था। ऐसा माना जाता है कि तिरछा अंकित करने से ये चिह्न एक ख़ास एवं विशेष ढंग से लाभ पहुंचाता है। भारत में इस चिह्न को अंकित करने की दूसरी ही रीति अथवा परम्परा है। कभी-कभी स्वस्तिक के चतुष्कोणों पर केवल चार बिन्दुओं का निशान भर ही दिया जाता है।

आज के इस अति आधुनिक समय में भी स्वस्तिक शब्द व चिह्न का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है। पुरानी पीढी के लोग तथा हमारे देहात में बसे परिवार आज भी पत्रों का आरम्भ 'स्वास्तिक' या 'ॐ' से करते हैं। संस्कृत या उससे सम्बन्ध रखने वाले लोग अब भी 'स्वास्ति भवः' से ही आशीष देते हैं। ये सब हमारे समाज में व्याप्त विश्व कल्याण की भावना को दर्शाता है।

24 अप्रैल 2011

टोने टोटके - कुछ उपाय - 9 (Tonae Totke - Some Tips - 9)

छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं इस लोकप्रिय स्तम्भ में एक उपयोगी साधना की विधिवत जानकारी दी जा रही है
 
श्री बजरंग बाण 
हनुमान चालीसा की तरह ही श्री बजरंग बाण भी एक सिद्ध स्त्रोत है इस सिद्ध शक्तिशाली बाण को विधि पूर्वक प्रयोग करने से साधक के समस्त कष्टों का निवारण हो जाता है इस बाण की सिद्धि करने से साधक के शरीर में हनुमान जी की शक्ति प्रवेश कर जाती है

 क्रिया एक ही है अपने सामने हनुमान जी का चित्र रखकर श्रद्धा और विशवास के साथ उनका ध्यान करना चाहिए मन की एकाग्रता का अभ्यास करते हुए मन स्वतः ही काबू में हो जाता है हनुमान जी के चित्र की भली भाँती पूजा अर्चना करके श्रद्धायुक्त प्रणाम कर यह स्तुति करनी चाहिए

अतुलित बलधामं हेमशैलाभ देहं दनुजवन कृशानुं ग्यानीनामग्रगण्यम, 
सकल गुन्निधाम वानराणामधीषम, रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि

यह स्तुति करके साधक को चाहिए की वह पास ही दाहिनी ओर एक आसन और बिछा दे जैसे कि शास्त्र में इसका वर्णन आता है कि जब भी बजरंग बाण का पाठ किया जाय तो स्वयं हनुमान जी आसन पर आकर विराजते हैं

बजरंग बाण का जब भी पाठ करें, ऊनी वस्त्र के ऊपर ही बैठकर करें जिसे हनुमान जी वरन कर लेते हैं तब साधक के अन्दर एक नई स्फूर्ति एवं शक्ति का संचार हो जाता है मन में एक नई चेतना एक नए जोश का स्फुरण होने पर वह अपने को बलवान समझने लगता है, निर्भीक व निर्भय हो जाता है तथा समस्त प्रेत बाधाएं तथा आसुरी शक्तियां ऐसे भजन को देखते ही भाग खडी होती है यह हजारों- हजारों का अनुभव है उन्होंने कहा है कि बजरंग बाण का नियमित पाठ बाधाओं और आने वाली कठिनाइयों से रक्षा करता है

बड़े-बड़े योगी, संत महात्मा, तांत्रिक, यांत्रिक भी सदा इस बाण को जपते रहते हैं इसे कंठस्त कर लेना चाहिए यह स्वयं ही मंत्रमय है इसका नित्य पाठ अपने आप में आश्चर्यजनक सफलता देने वाला है रोग-व्याधि तंत्र, मंत्र से जो हानि पहुंचाते हैं उसका प्रभाव स्वतः ही निष्क्रिय हो जाता है जिस घर में प्रतिदिन बजरंग बाण का पाठ होता है, वहां स्वयं हनुमान जी विराजमान रहते हैं और सभी प्रकार की बाधाओं से घर मुक्त रहता है जो भक्त रामलीलाओं में धन आदि देकर भगवान् राम के चरित्र का वर्णन आम जन तक पहुंचाने का कार्य करते हैं वे आर्थिक दृष्टि से संपन्न तो हो ही जाते हैं अपितु धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि भी उन्हें मिल जाती है रामायण का अखंड पाठ व सुन्दर काण्ड का पाठ जन-जन में एक नवीन चेतना का इस कलिकाल में संचार कर रहा है उन घरों में उन्नति व विकास की धारा सदा बहती है

बाधा से बचने के उपाय
सबसे पहले जो भी साधक हनुमान की की साधना करना चाहता है या किसी भी ऐसी देवी-देवताओं की साधना में बैठने जा रहा है उसे किसी शुभ मुहूर्त में आसन पर पूर्व या उत्तर्भिमुख होकर रात्री में 108 मन्त्रों का जप व अष्टांग सामग्री द्वारा हवन करना चाहिए साधक को रक्षा रेखा मंत्र को सिद्ध कर लेना चाहिए जिससे साधना काल में कोई भी बाधा उत्पन्न न हो


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