02 दिसंबर 2009

षोडशी


हमारे देश में पौराणिक देवियों को षोडशी माना जाता है। कहा जाता है कि इनकी आयु सदा सोलह साल की ही रहती है। इस प्रकार की चर्चा देवताओं के बारे में कहीं सुनने को नहीं मिलती। वास्तविकता यह है कि षोडशी शब्द के साथ ब्राह् के विस्तार में 'पुरूष' शब्द का अनिवार्य प्रयोग होता है। सोलह कलाओं से युक्त पुरूष भाव को षोडशी पुरूष कहा जाता है। उसके अन्तर्गत सम्पूर्ण स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि समाहित रहती है। इसमें ब्राह् और माया, दोनों की कलाएं साथ-साथ रहती हैं। ब्राह् अकेला तो कहीं होता ही नहीं है। माया स्वयं बल रूप में ब्राह् की शक्ति होती है। ब्राह् के साथ एकाकार रहती है। जब ब्राह् षोडशी है, तब माया भी निश्चित ही षोडशी है। सृष्टि के आरंभ में केवल आकाश है। जो कुछ पदार्थ आकाश (व्योम) में व्याप्त है, वही ब्राह् है। चारों ओर अंधकार है। कोई गतिविघि नहीं दिखाई पडती। ब्राह् की शक्ति सुप्त अवस्था में है। ब्राह् की स्वतंत्रता ही उसका आनन्द भाव है। ऋषि प्राण वहां ज्ञान अगिA रूप हैं। ब्राह् को सृष्टि का बीज कहते हैं। उसमें सृष्टि का पूरा नक्शा रहता है। जैसे किसी बीज में पेड, पत्ते, फल-फूल आदि रहते हैं। यह ज्ञान ही इच्छा पैदा करता है। बिना ज्ञान के कर्म नहीं होता। ज्ञान के विकास को हम कर्म कहते हैं। सम्पूर्ण सृष्टि ब्राह् के ज्ञान का कर्म रूप विकास है, विवर्त है। पुन: अपने मूल स्वरूप में लौटने की क्षमता रखता है। यह इच्छा ब्राह् की शक्ति के जागरण से पैदा होती है। यह शक्ति 'स्पन्दन शक्ति' के नाम से शैव साहित्य में कही गई है। वेद में इसे 'बल' कहा गया है। इच्छा में क्रिया नहीं होती। इच्छापूर्ति की दिशा में बल या स्पन्दन शक्ति की क्रिया शुरू होती है। जिस बल से क्रिया शुरू होती है, उसे माया कहते हैं। इच्छा को ही मन रूप या मन का बीज कहा जाता है। मन पर क्रिया रूप में प्राणों की क्रिया होती है, तब कर्म होता है। इसी को वाक् कहते हैं। इस वाक् में प्राण, मन, ज्ञान (विज्ञान रूप) और आनन्द समाहित रहते हैं। यह मन अव्यय मन होता है। चूंकि स्पन्दन शक्ति पूर्ण स्वतंत्र चेतना शक्ति है, वह अपने सामथ्र्य से अपने को ही स्थूल क्रिया में विकसित कर लेती है। प्रत्येक क्रिया का मूल इच्छा रूप स्पन्दन ही है। जब तब इच्छा मन में रहती है, कोई क्रिया नहीं होती। जैसे ही स्थूल क्रिया से जुडती है, इस पर देश-काल का प्रभाव चढ जाता है। सृष्टि में प्रथम वाक् रूप अव्यय पुरूष बनता है। विष्णु की नाभि से सर्व प्रथम ब्राह् पैदा हुए। ये प्राण रूप थे। अति सूक्ष्म तत्व के रूप में पैदा हुए थे। इन्हीं के मन में इच्छा पैदा हुई-एकोहं बहुस्याम्। जिस प्रकार ब्राह् की सर्वज्ञता, पूर्णता आदि विशेषताएं अव्यय में सीमित हुईं, वैसे ही माया की शक्तियां भी यहां आकर सीमित हो जाती हैं। माया यहां पर कला, विद्या, राग, नियति और काल तत्व रूप में परिणत हो जाती है। यही ब्राह् के मूल स्वरूप का प्रथम आवरण कहलाता है। कला से सीमित आदान-प्रदान, विद्या से कर्म की विवेचना, राग से आसक्ति, काल से समय गणना और नियति से कार्य कारण भाव की सुदृढता तय होती है। षोडशी पुरूष की व्याख्या परा विद्या में विस्तार से मिलती है। यहां अव्यय, अक्षर और क्षर पुरूष की पांच-पांच कलाएं-आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक्- ब्राह्ा, विष्णु, इन्द्र, अगिA, सोम तथा प्राण, आप, वाक्, अन्न, अन्नाद के साथ परात्पर मिलकर षोडशी पुरूष रूप आत्मा बनता है। अपरा विद्या अथवा शब्द ब्राह् में अव्यय, अक्षर और क्षर पुरूष को ही स्फोट, अक्षर और वर्ण कहा है। अक्षर और वर्ण ही स्वर और व्यंजन हैं। शैव शास्त्रों में जहां स्पन्दन रूप माया का विस्तार मिलता है, वहां माया, महामाया और प्रकृति रूप स्पन्दन ही अव्यय, अक्षर और क्षर पुरूष का शक्ति रूप विवेचन है। चूंकि सृष्टि का विकास मूलत: दो धाराओं में होता है-एक अर्थ सृष्टि, दूसरी शब्द सृष्टि अत: किसी एक धारा के ज्ञान से दूसरी का ज्ञान सहजता से हो जाता है। अर्थ सृष्टि तो लक्ष्मी का क्षेत्र है। अर्थ का निर्माण सोम की आहुति से ही होता है। विष्णु ही सोम अथवा परमेष्ठि लोक के अघिपति हैं। शब्द वाक् की अघिष्ठात्री सरस्वती है। परमेष्ठी लोक का ही दूसरा नाम सरस्वान समुद्र है। दोनों ही प्रकार की सृष्टियां वहीं से शुरू होती हैं। वहां वाक् का स्वरूप परावाक् होता है। लोक व्यवहार में देखा जाता है कि शब्द वाक् ही अर्थवाक् में परिवर्तित होता है। हमारा सारा जीवन व्यवहार शब्दों के अर्थ पर ही टिका होता है। जो विश्व हमें दिखाई देता है, वह भी अर्थ सृष्टि ही है। अर्थ के धन का पर्यायवाची नहीं है। प्राण रूप, स्थूल-सूक्ष्म-सृष्टि का वाचक है। हमारी उपासना-अनुष्ठान सभी शब्द वाक् पर आधारित हंै। मंत्रों के उच्चारण पर टिके हैं। सारे यज्ञ मंत्रों के माध्यम से पूर्ण होते हैं। फलरूप हम किसी न किसी अर्थ की कामना करते हैं। कोई धन मांगता है, कोई संतान, कोई साçन्नध्य चाहता है। सरस्वती ही लक्ष्मी रूप में बदलती है और सम्पूर्ण वाक् षोडशी रूप है। अत: देवियां सदा षोडशी रूप कहलाती हैं। सच तो यह है कि सम्पूर्ण सृष्टि, जिसमें ऋषि, पितर और देव कारक बनते हैं, षोडशी स्वरूपा ही रहती है। हर देवी स्वयं में स्वतंत्र न होकर किसी न किसी देव की शक्ति ही तो है। बिना विष्णु के लक्ष्मी कहां रह सकती है। अर्थ रूपता के कारण विष्णु ही इस सृष्टि के निर्माता और पोषक हैं। ब्राह् है तो माया है। ब्राह्ा है तो सरस्वती है। हम केवल देवियों को पूजते हैं। उनके पति कभी साथ नहीं होते। इस तरह की पूजा में सामान्य लोक व्यवहार भी दिखाई नहीं पडता। षोडशी पुरूष में अव्यय की पांच कलाओं से हमारे पांच कोश बनते हैं। इसी से हमारा कारण शरीर + मन बनता है। अक्षर पुरूष हमारा सूक्ष्म शरीर और प्राण रूप आवरण बनता है। यह अव्यय पुरूष या कारण शरीर के साथ चिपका होता है। क्षर सृष्टि हमारा स्थूल शरीर है। स्थूल अन्त:करण और पंच महाभूत हैं। स्थूल पुर्यष्टक कहलाता है। यही मन-प्राण-वाक् का स्वरूप है। यही अव्यय-अक्षर-क्षर है। इसी में स्फोट, अक्षर-वर्ण का रूप समाहित रहता है। हमें षोडशी पुरूष का स्वरूप समझकर कारण शरीर के आवरणों से मुक्त होना है। अत: इसका ज्ञान हमारी प्रथम आवश्यकता है। क्योंकि हम सभी षोडशी हैं।

उलूक


उलूक यानी उल्लू, लक्ष्मी का वाहन। जो लक्ष्मी के साथ रहकर भी अंधेरे को प्रकाश मानकर विचरण करे, वही उल्लू। हम लक्ष्मी प्राप्ति के लिए पूजा-पाठ और अनुष्ठान करते हैं। कृष्ण कहते हैं कि ईश्वर जिससे रूष्ट होता है, उसे अथाह धन-सम्पदा, समृद्धि देता है। ताकि वह ईश्वर को याद ही नहीं करे। हम भी लक्ष्मी को पाकर ईश्वर को भूल जाना चाहते हैं। लक्ष्मी जिस पर सवारी करे, वही उल्लू। जीवन का यह कैसा विरोधाभास है। लक्ष्मी का त्यौहार भी अमावास की काली रात में। और हम इसी में ढूंढते हैं जीवन का प्रकाश।उलूक शब्द का अर्थ करें- उ = उधर, लू = ले जाना, क = शक्तिपूर्वक। उधर का भावार्थ हुआ स्वयं से दूर। जो जबरदस्ती खींचकर स्वयं से, आत्म प्रकाश या ईश्वर से दूर ले जाता हो। आत्मा चेतना का नाम है, लक्ष्मी अर्थ (पदार्थ) या जड का नाम है। व्यक्ति एक ही दिशा में तो चल सकता है। या तो गति चेतन की ओर रह सकती है, या फिर जड की ओर। लक्ष्मी की ओर जाना ही जड की ओर, चेतना से दूर जाना है। और इसी के वाहक को उल्लू कहते हैं। इस मति का नाम ही उल्लू है। यह कोई पक्षी का नाम नहीं है। लक्ष्मी के प्रभाव में हमारी बुद्धि उल्लू जैसे कार्य करने लग जाती है। अज्ञान के अंधकार को जीवन का प्रकाश मानने लगती है। भौतिक सुखो की चकाचौंध में रमण करने लग जाती है। अहंकार उसमें आसुरी वृत्तियों का प्रवेश करता जाता है। जीवन को अंधकार में ले जाने का यह क्रम आगे से आगे बढता ही जाता है। तब निश्चित ही है कि लक्ष्मी का वाहन उल्लू होना वाजिब ही है।लक्ष्मी का अंधेरे के साथ भी गहरा जुडाव है। लक्ष्मी विष्णु की पत्नी है। विष्णु क्षीर सागर में रहते हैं। यह परमेष्ठी लोक है, सोम लोक है। इसी में गौ लोक है। कृष्ण सोम वंशी हैं। काले हैं। सृष्टि का नियम है कि अग्नि में सोम की आहुति से यज्ञ चलता है। अत: सोम को अन्न का पर्यायवाची कहा गया है। सारी अर्थ सृष्टि सोम रूपा लक्ष्मी से उत्पन्न होती है। अग्नि सोम का भक्षण कर लेती है। सोम दिखाई नहीं पडता। जो कुछ दिखाई पडने वाला स्वरूप है, सम्पूर्ण सृष्टि में, वह अग्नि का ही प्रकट स्वरूप है। हमारा शरीर भी अग्नि रूप है। इसमें निरन्तर अन्न की आवश्यकता रहती है। तभी हमारी सृष्टि का भी संचालन होता है। दिन में सूर्य की तपन से सोम की कमी सम्पूर्ण जगत में व्याप्त होती रहती है। रात्रिकाल में आकाश द्वारा उसी सोम की वर्षा होती है। कमी को पूरा किया जाता है। सोम से निर्माण और पोषण भी। यही विष्णु का कार्य है। उसी को वेदों में यज्ञ पुरूष कहा गया है। सोम के बिना यज्ञ संभव ही नहीं है।हमारा शरीर भी प्रकृति दत्त है। इसका निर्माण और पोषण भी सोम से होता है। दिन में खर्च हुआ सोम रात्रि को हमारी थकान भी दूर करता है। नई शक्ति देता है। इसी शक्ति को लक्ष्मी कहते हैं। जिसे हम अन्न कहते हैं, वह केवल हमारा भोजन ही नहीं है। हमारी सारी भोग्य सामग्री हमारा अन्न कहलाती है। हम सब एक-दूसरे का अन्न हैं। आप मेरे लिखे हुए को पढ रहे हो, मुझे भोग रहे हो। ये विचारों का अन्न है। इसी प्रकार मन का अन्न होता है। सारे अन्नों का निर्माण लक्ष्मी करती है। धन भी एक प्रकार का अन्न ही है।परमेष्ठी लोक जिस प्रकार सोम लोक कहा गया है, वैसे ही पितर प्राणों का लोक भी यही है। सोम और पितर प्राण दोनों ही हमको चन्द्रमा से प्राप्त होते हैं। परमेष्ठी लोक हमारी सृष्टि का चन्द्रमा है। हमारी पृथ्वी का चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर लगाता रहता है। सोम और पितर प्राणों की आपूर्ति करता है। रात्रिकाल में बरसने वाले सोम से ही औषध और अन्न पैदा होते हैं। पृथ्वी पर भी और अन्तरिक्ष में भी। फल पकने के बाद जिसका पेड/पौधा नष्ट हो जाए, उसे औषघि कहते हैं। जिसका पेड बच जाए, वह वनस्पति कहलाता है। इसी अन्न के जरिए पितर प्राणों की और सोम की आपूर्ति हमारे शरीर में भी होती है। अन्न से ही शुक्र का निर्माण होता है। अन्न से मन का निर्माण होता है। मन भी अन्न की ही श्रेणी में आता है। ये सारा ही लक्ष्मी का क्षेत्र है। सोम के सारे कार्य-कलाप रात्रि में ही होते हैं। दिन में सूर्य की उष्णता सोम को निर्बल बना देती है। जीवन में समृद्धि के साथ जो जडता का प्रवेश होता है, वह भी रात्रि में ही उसे प्रवृत्त करता है। मद्यपान-जुआ-मादक द्रव्य-यौनाचार आदि की सारी क्रियाएं अंधकार से ही जुडी होती हैं। रात्रि के अंधकार यही एक विश्ेाषता है। अंधकार से जुडे विषय जीवन में लाभकारी नहीं होते। जीवन के कृष्ण और शुक्ल पक्ष में से उल्लू को कृष्ण ही प्रिय होता है। उसमें कहीं कोई भेद दिखाई नहीं पडते। अच्छे-बुरे, छोटे-बडे सारे भेद अंधकार में समा जाते हैं। बिना विचारे, बिना भेद-ज्ञान के कार्य करने वाले को उल्लू ही कहेंगे।उल्लू स्वभाव से भी क्रूर और अत्याचारी होता है। निर्दोष पक्षियों को यातना भी देता रहता है। धन मद में भी बहुत कुछ ऎसा ही करता है आदमी। उसे सब कुछ जायज भी लगता है और धन की ताकत से उसे एक गलतफहमी यह भी हो जाती है कि धन से वह सब कुछ खरीद सकता है। आदमी को धन से खरीद लेना आज आम बात हो गई। धीरे-धीरे ऎसे लोगों का समाज में उठना-बैठना भी कम हो जाता है। यह अलग बात है कि धन के जोर पर कुछ लोग सामाजिक पद हथिया लेते हैं। पर इनका सम्मान आम आदमी नहीं करता। उल्लू भले ही हमारी पूज्या लक्ष्मी का वाहन हो, इसका भी सम्मान कोई नहीं करता। हमारे यहां तो कहा जाता है कि जिस मकान पर उल्लू आकर नित्य बैठता है, वह मौत की सूचना देता है। उसे कोई अपने मकान पर बैठने तक नहीं देता। यदि मैं लक्ष्मी का वाहक बन गया तो मुझे भी बैठने देंगे या नहीं।जीवन का लक्ष्मी के साथ यह व्यवहार कितना विरोधाभासी है। लक्ष्मी की पूजा करें, उसे आने के लिए प्रसन्न करें और उल्लू को आने से भी रोक दें। लक्ष्मी तो उस पर बैठकर ही आएगी। लक्ष्मी के आते ही घर जड पदार्थो से भरने लगेगा। न जाने हम कितनी वस्तुएं खरीदकर लाएंगे। घर को जड पदार्थो का श्मशान बना देंगे। दूसरों को दिखाकर फूले न समाएंगे। यही परिग्रह की शुरूआत है। जीवन में हिंसा का प्रवेश (भाव हिंसा का) यहीं से होता है। जीवन की चेतना के द्वार बन्द होने लगते हैं। एक मूच्र्छा-सी बुद्धि और मन पर छाने लगती है। भीतर का मार्ग पूरी तरह अवरूद्ध हो जाता है। व्यक्ति बाहर की ओर ही भागने लगता है। फिर वह कभी स्वयं के बारे में चिन्तन-मनन नहीं करेगा। अज्ञान के अंधकार में उल्लू की तरह, लक्ष्मी को बिठाए भटकता रहेगा। ईश्वर की ओर से उसके कर्मो की यही सजा है- जा, उल्लू हो जा!

आनन्द


जिसकी जीवन भर सबको तलाश रहती है उसी को आनंद कहते हैं। सम्पूर्ण सुख-समृद्धि का सूचक शब्द है। और सृष्टि विस्तार का मूल कारक भी है। आनन्द के बिना सृष्टि नहीं हो सकती। आनन्द प्राप्त हो जाने के बाद कुछ और पाने की कामना भी नहीं रह जाती। आनन्द और सुख एक नहीं हैं। आनन्द आत्मा का तत्व है, जबकि सुख-दु:ख मन के विषय हैं। किसी भी दो व्यक्तियों के सुख-दु:ख की परिभाषा एक नहीं हो सकती। हर व्यक्ति का मन, कामना, प्रकृति के आवरण भिन्न होते हैं। अत: हर व्यक्ति का सुख-दु:ख भी अलग-अलग होता है। आनन्द स्थायी भाव है।
लोग अनेक प्रकार के स्वभाव वाले होते हैं। एक शरीर जीवी इनका सुख शरीर के आगे नहीं जाता। व्यायाम-अखाडे से लेकर सुख भोगने तक ही सीमित रहता है। इसके आगे इनका सुख-दु:ख भी नहीं है। मनोजीवी अपने मनस्तंभ में आसक्त रहता है। कहीं किसी कला में रमा रहता है या नृत्य, गायन, वादन में। ये तो देश-काल के अनुरूप बदलते रहते हैं। हर सभ्यता की अपनी कलाएं और मन रंजन होते हैं। इनके जीवन में सांस्कृतिक गंभीरता का अभाव रहता है। इन्हीं विद्या का योग आत्मा से नहीं बन पाता। चंचल मना रह जाते हैं। प्रवाह में जीने को ही श्रेष्ठ मानते हैं। बुद्धिवादी आदतन नास्तिक बने रहना चाहते हैं। किसी न किसी दर्शन को लेकर अथवा किसी अन्य के विचारों पर उलझते ही नजर आते हैं। मनोरंजन, हंसी-मजाक से सर्वथा दूर, न शरीर को स्वस्थ रखने की चिन्ता होती है। स्वभाव से सदा रूक्ष बुद्धिमानों की कमी नहीं है। शरीर जीवियों को मन की कोमलता अनुभूतियों का कोई अनुभव ही नहीं होता। एक वर्ग स्वयं आत्मवादी मानकर जीता है। सहज जीवन से पूर्णतया अलग होता है।
मूलत: ये चार श्रेणियां हैं, जिनमें साधारण व्यक्ति जीता है और आनन्द को खोजता रहता है। खण्ड दृष्टि से अखण्ड आनन्द किसको अनुभव हो सकेगा आनन्द तो मूल मन (अव्यय मन) के साथ जुडा रहता है। भक्ति में आह्लादित होने जैसा है। आनन्द प्राप्ति की पहली शर्त यही है कि व्यक्ति समग्रता में जीना सीखे। उसके शरीर, मन, बुद्धि आत्मा के साथ जुडे रहें। आत्मा से जुडा आनन्द तभी तो शरीर-मन-बुद्धि की अनुभूति में आएगा। योग का एकमात्र लक्ष्य भी यही है।
इसके विपरीत सुख-दु:ख मानव मन की कल्पना पर आधारित रहते हैं। इनका सम्बन्ध इन्द्रियों एवं एन्द्रिय सुख-दु:ख से ही रहता है। तात्कालिक भी होता है। किसी विषय अथवा परिस्थिति के कारण पैदा होता है और उसके साथ विदा भी हो जाता है। जब भी व्यक्ति के जीवन में समग्रता टूटती है, वह तात्कालिक सुख में ही अटक जाता है। उसके लिए सुख-दु:ख भी एक द्वन्द्व बनकर रह जाता है। गहनता तो होती ही नहीं है। क्योंकि वह पूर्ण मानव की तरह जीता ही नहीं है। अनेक पशु-पक्षी भी इन क्षेत्रों में मानव से आगे निकल जाते हैं। चाहे शारीरिक बल में हों अथवा बुद्धि के स्तर पर। मानव की श्रेष्ठता तो इनकी समग्रता में ही है।जब किसी भी कार्य में शरीर-मन-बुद्धि और आत्मा एक साथ जुडेंगे, तभी व्यक्ति सुख-दु:ख के मिथक को तोड सकता है। शरीर और बुद्धि को तो सुख-दु:ख का अनुभव ही नहीं होता। मन को होता है, जो स्वयं आवरित होता है। बुद्धि स्वयं आवरित है। अत: जो सामने दिखाई पडता है, उसी के आधार पर सुख-दु:ख का ग्रहण कर लेता है। इन्द्रियों की पकड सूक्ष्म पर होती ही नहीं। अत: मन को बार-बार स्थूल और दृश्य पर टिकाती रहती हैं। मन पर इंद्रियों द्वारा विषय आ-आकर पडते हैं। चंचलता के कारण मन खुद को रोक नहीं पाता और प्रवाह में बह पडता है। उसी को सुख मान बैठता है।
ज्ञान के योग से जैसे ही बुद्धि में विद्या का प्रवेश होने लगता है, मन का स्वरूप बदलने लगता है। मन की भूमिका, दिशा और ग्राह्यता बदलने लगती है। अब वह भीतर की और भी मुडने लगता है। प्रवाह की गति धीमी होने लगती है। अब मन इच्छाओं का आकलन करके ही स्वीकृत करने लगता है। हर इच्छा को पूरी करने नहीं भागता। मन की संवेदना जाग्रत होने लगती है। यहीं से आनन्द का मार्ग प्रशस्त होता है।
जिस प्रकार किसी पात्र में भरा जल हिलता है, वैसे ही संवेदना के कारण मन में भी रस का प्रवाह बनने लगता है। यह प्रेम प्रवाह आनन्द तक पहुंचने का मार्ग है। रसानन्द और आनन्द एक ही है। रसा को ही ब्रह्म कहते हैं। संवेदना के जागरण से व्यक्ति के धर्म में परिवर्तन आता है। पाषाण-मन अब पिघलने लगता है। दया-करूणा दिखाई पडने लगते हैं। किसी को दु:खी देकर आंसू बहने लगते हैं। यह आंसू भी उसी आनन्द का दूसरा छोर है। अधिक प्रसन्नता भी आंसू लाती है। अत्यन्त दु:ख की घडी में रोते-रोते भी हंसी छूट जाती है।
व्यक्ति जैसे-जैसे स्वयं को जानने लगता है, उसी क्रम में उसका बाहरी व्यवहार भी बदलता जाता है। उसके अहंकार और ममकार भी द्रवित होने लगते हैं। कल्पित सुख-दु:ख अब उसे स्पष्ट समझ में आने लगते हैं। उनके अर्थ बदल जाते हैं। मन के साथ-साथ प्राणों का व्यापार बदलता है। प्राण सदा मन के साथ रहते हैं और मन का अनुसरण करते हैं। मन की इच्छाओं का स्वरूप बदल जाता है। इनको खाना-पीना-पहनना जैसे क्षेत्रों में आसानी से देखा जा सकता है। व्यक्ति स्वचिन्तन में व्यस्त रहने लग जाता है। अब मिठास किसी अन्य स्तर पर दिखता है।
जैसे-जैसे प्राण उध्र्वगामी होते हैं, चिन्तन के विष्ाय बदलते हैं। व्यक्ति का आभा मण्डल बदलता है। आकाश से कौन से प्राण आकर्षित होंगे, किन प्राणों का आकाश में विसर्जन होगा, यह अनायास ही सारा क्रम परिवर्तित हो जाता है। नए भावों के अनुरूप नए प्राण आते हैं। पुराने विचारों की श्रृंखला टूटने लगती है। व्यक्ति का मन अन्नमय और मनोमय कोश के आगे विज्ञानमय कोश में प्रवेश करने लगता है। प्रज्ञा जाग्रत होने लगती है। प्रज्ञा के सहारे व्यक्ति अपने सूक्ष्म स्तर को समझने लगता है। स्थूल की तरह सूक्ष्म का भी परिष्कार करने लगता है। प्रकृति के आवरणों का हटाता है। सत्व में स्वयं को प्रतिष्ठित करने का प्रयास करता है। अब तक व्यक्ति का मन इतना निर्मल हो चुका होता है कि वह प्राणी मात्र के प्रति संवेदनशील होने लगता है। मुख मण्डल पर शान्ति और प्रसन्नता का भाव सहज रूप से स्थायी होने लगता है। वैखरी, मध्यम को पार करके पश्यन्ति में, मानसी धरातल पर जीने लगता है। बाहर जुडे रहते हुए भी बेलाग हो जाता है। उसकी कामनाओं की श्रंखला भी टूट जाती है। मन मर जाता है। ह्वदय रूपी अक्षर प्राण-ब्रह्मा-विष्णु इन्द्र का स्वरूप दिखाई देते ही एक आह्लाद प्रकट होता है। इसी के सहारे से व्यक्ति स्थायी आनन्द में प्रतिष्ठित हो जाता है।

शिवाजी को धर्य से मिली अपने लक्ष्य में सफलता


बीजापुर के शासक आदिल शाह ने शिवाजी के बढ़ते पराक्रम को ध्वस्त करने की गरज से कई सूरमाओं को उन्हें परास्त करने भेजा। अंत में युद्ध करने आए अफजल खां को भी वीर शिवाजी ने मार गिराया।
अनेक लोग काम करते समय बहुत उतावले हो जाते हैं। वे चाहते हैं कि जो भी होना हो, तुरंत हो जाए। लेकिन व्यक्ति के ध्यान में सदा अपना लक्ष्य और सफलता ही रहनी चाहिए। इस संबंध में शिवाजी का एक प्रसंग है- बीजापुर के शासक आदिल शाह ने जब देखा कि शिवाजी अपना साम्राज्य बढ़ाते जा रहे हैं तो उसने कई सूरमाओं को उन्हें परास्त करने हेतु भेजा।
पर जो भी गया, वह या तो मारा गया या फिर हारकर लौटा। परेशान होकर आदिल शाह ने अपने सबसे वीर योद्धा अफजल खां से शिवाजी को जिंदा या मुर्दा लेकर आने को कहा। अफजल खां विशाल सेना लेकर चल दिया।
मार्ग में उसने सैकड़ों मंदिरों को ध्वस्त कर दिया। महिलाओं को अपमानित किया। खेतों में खड़ी फसलों में आग लगा दी। लोग शिवाजी से जाकर शिकायत करते, पर वे शांत भाव से सुनते रहते। इससे अफजल का साहस और बढ़ गया। उसने पंढरपुर का प्रसिद्ध मंदिर और शिवाजी की कुलदेवी का मंदिर भी तोड़ डाला। लोग त्राहि-त्राहि करने लगे।
कुछ लोग तो शिवाजी को भला-बुरा भी कहने लगे। पर शिवाजी ने धर्य नहीं खोया। वे अपनी योजना से चल रहे थे। उन्होंने ऐसा वातावरण बनाया कि अफजल खां स्वयं ही पहाड़ी पर स्थित प्रतापगढ़ के किले तक आ पहुंचा। वहां शिवाजी ने उस पर आक्रमण करके उसे यमलोक पहुंचा दिया। केवल इतना ही नहीं, किले के आसपास छिपे सैनिकों ने उसकी सेना के एक आदमी को भी जीवित नहीं छोड़ा।
वस्तुत: यदि शिवाजी अपना धर्य खो देते तो वे सफल नहीं होते। इसलिए ध्यान हमेशा अंतिम लक्ष्य और सफलता की ओर ही होना चाहिए।

एक उजाड़ इमारत की पुराण गाथा


बहुत पुरानी बात है। एक राज्य हुआ करता था। कहने को वह लोकतांत्रिक था। शासक वर्ग (जिन्हें हम आज नेता के नाम से जानते हैं) के लोग बहुत खुशहाल थे। चूंकि लोकतंत्र था, इसलिए उनकी खुशहाली में किसी को दिक्कत नहीं थी। प्रजा भी अपने हिसाब से खुश थी। बहुत से लोग इस बात से खुश थे कि उन्हें लाइन में लगकर गैस सिलेंडर मिल जाता था तो कुछ लोग इसलिए खुश थे कि वे लाइन में नहीं लगकर ब्लैक में सिलेंडर ले आते थे।
कई लोग इसलिए खुश थे कि उन्हें दो जून की रोटी और शरीर ढंकने को एकाध लत्ता मिल जाता था। इसे वे ईश्वर की कृपा मानते थे। जिन्हें यह भी नसीब नहीं होता था, वे भी यह मानकर खुश थे कि भगवान की यही मर्जी होगी। कहने का मतलब यही है कि उस धर्मप्रधान राज्य की धर्मप्रेमी जनता हर हाल में खुश थी।
लेकिन उधर कुछ दिनों से शासक वर्ग को लगने लगा था कि राज्य में धर्म का प्रभाव कम हो रहा है। वे यह सोचकर चिंतित हुए कि इससे तो बेचारी प्रजा की खुशियां कम होती जाएंगी। ऐसा कुछ किया जाए कि धर्म की प्रतिष्ठा फिर से बहाल हो सके, ताकि जनता की खुशियां कम न होने पाएं।
गहन चिंतन-मनन के बाद अंतत: शासक वर्ग के परामर्शदाताओं का ध्यान अपने राज्य के एक बहुत प्राचीन नगर में स्थित एक बेहद प्राचीन इमारत की ओर गया। वह इतनी उजाड़ हो चुकी थी कि उसकी ओर कोई झांकता भी नहीं था। ऐसा सुनने में आया था कि वह कभी कोई धर्मस्थल हुआ करता था।
एक दिन बाहर से एक बर्बर आक्रमणकारी आया और उसे नष्ट करके अपने नाम पर नया धर्मस्थल बनवा दिया। लेकिन प्रजा को उससे कोई मतलब नहीं था। प्रजा के लिए राज्य में पहले ही ढेर सारे धर्मस्थल बने हुए थे, जो उसकी खुशियों के लिए काफी थे, किंतु शासक वर्ग के एक समूह ने खुद ही मान लिया कि उस उजड़ी हुई इमारत के स्थान पर नया धर्मस्थल बनाने से प्रजा बहुत खुश होगी और धर्म का राज कायम होगा। अंतत: वह इमारत गिरा दी गई। प्रजा खुश हुई या नहीं, यह तो मालूम नहीं हुआ, लेकिन शासक वर्ग का एक समूह बहुत खुश हुआ क्योंकि उसे स्वयं को खुश करने का एक मंत्र मिल गया था।
तो जो इमारत पहले काफी सुनसान और उजाड़ थी और जिसकी किसी को कोई फिक्र नहीं थी, प्रजा के दिमाग में घुसा दी गई। प्रजा का एक वर्ग इमारत के ढहने से बहुत खुश हुआ तो दूसरा वर्ग बहुत नाराज हुआ। दोनों ने अपनी खुशियों व नाराजगी का इजहार एक-दूसरे का खून पीकर किया। उधर, इमारत के विध्वंस को लेकर राज्य के मुखिया ने एक आयोग बिठा दिया, क्योंकि अब वह इमारत ढहने के बाद उजाड़ नहीं रह गई थी। वहां राजनीति की खेती होने लगी थी।
धीरे-धीरे समय गुजरता गया। प्रजा के दिमाग से इमारत की यादें धुंधली पड़ने लगीं। प्रजा अपने-अपने ढंग से खुश होने लगी थी। लेकिन शासक वर्ग को फिर प्रजा की खुशियों की चिंता होने लगी तो उसे आयोग की रिपोर्ट की याद आई, जिसे सदियों पहले गठित किया गया था।
रिपोर्ट राज्य के सबसे बड़े सदन में पेश की गई। रिपोर्ट पर शासक वर्ग के विभिन्न प्रजातियों के लोग आपस में गुत्थम-गुत्था होने लगे, यह दिखाने के लिए कि उन्हें अपनी प्रजा की कितनी ंिचंता है और उससे प्रजा खुश होगी। लेकिन अब तक प्रजा समझदार हो चुकी थी। उसने अपनी खुशियां कहीं और तलाश ली थीं। प्रजा अब भी धर्मप्रेमी है और रोज प्रार्थना करती है कि भगवान उसके शासकों को सद्बुद्धि दे।

शिव हैं कालभैरव


वेदोक्ति है कि भैरव शिव: शिव: भैरव अर्थात भैरव ही शिव हैं और शिव ही भैरव हैं। इस तत्व में कोई भेद नहीं है। भगवान भैरव के बारे में कहा गया है कि भैरव: पूर्ण रूपो हि शंकरस्य परात्मन। शिवपुराण में भी भैरव को परमात्मा शिव का रूप ही बताया गया है।
पौराणिक कथा के अनुसार जब सुमेरू पर्वत पर सभी देवताओं ने बrाजी से पूछा- हे परमपिता इस चराचर जगत में अविनाशी तत्व कौन है और जिनका आदि-अंत किसी को भी पता न हो, ऐसे देव के बारे में हम देवताओं को बताने का कष्ट करें? इस पर ब्रrाजी ने कहा- चराचर जगत में अविनाशी तत्व तो केवल मैं ही हूं। इस पर विष्णुदेव ने कहा कि इस संसार का भरण-पोषण मैं करता हूं, इसलिए परमशक्तिमान मैं हूं।
इसकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए चारों वेदों को बुलाया गया। वे कहने लगे कि जिनके भीतर समस्त भूत, भविष्य और वर्तमान निहित है और जिनका कोई आदि-अंत नहीं है, जो अजन्मा है, वे तो परम शक्तिमान भगवान रुद्र ही हैं। इस पर ब्रrाजी के पांचवे सिर ने भगवान शिव और माता पार्वती के बारे में कुछ अपमानजनक बातें कहीं, जिससे चारों वेद अत्यंत दु:खी हुए। इसी समय एक दिव्य ज्योति के रूप में नीललोहित भगवान रुद्र प्रकट हुए, जिसे देखकर ब्रrाजी ने कहा- ‘हे चंद्र शंक, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रुद्र रखा है, अत: तुम मेरी सेवा में आ जाओ।’
ब्रrाजी की इस वाणी से भगवान शिव ने क्रोधित होकर भैरव नामक पुरुष उत्पन्न किया और कहा कि तुम ब्रrा पर शासन करो। पापभक्षण करने के कारण भक्त तुम्हें पापभक्षक के नाम से भी जानेंगे। भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी पांचवी अंगुली के नख से ब्रrाजी का सिर काट लिया, जिसके कारण इन्हें ब्रrाहत्या के पाप से गुजरना पड़ा। शिवलोक काशी में इन्हें ब्रrाहत्या से मुक्ति मिली थी, जहां पर आज भी ‘कपाल मोचन’ तीर्थ है। यहां दर्शन मात्र से ब्रrाहत्या से मुक्ति मिलती है।
भगवान शिव ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। इसके साथ ही भूत-प्रेत, पिशाच, ब्रrा राक्षस, बेताल, मारण मोहन, उच्चटन विद्वेषण से इनको अपने भक्तों की रक्षा के लिए इन सभी का अधिकारी नियुक्त किया गया। आज भी इनके भक्त इस तरह की परेशानियों से बचने के लिए इनकी पूजा-आराधना करते हैं। तांत्रिक जगत में इन्हीं की आराधना विशेष तौर पर की जाती है।
इनकी प्रार्थना का मंत्र है अतिक्रूर महाकाय, कल्पान्त दहनोपम् भैरव नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दातु मर्हसि। इसी मंत्र से मानव मात्र का कल्याण हो जाता है। भगवान भैरव शिव के पांचवे अवतार माने जाते हैं। इनका अवतरण मार्ग शीर्ष कृष्ण पक्ष अष्टमी को हुआ। इस दिन इनकी पूजा-आराधना ब्रrाहत्या से मुक्ति दिलाती है। यथा कामं तथा ध्यानं कारयेत साधकोत्म: अर्थात जैसा कार्य हो, साधक को वैसा ही ध्यान करना चाहिए।
इनका सात्विक ध्यान अपमृत्यु का निवारक, आयु आरोग्य का कारक तथा मोक्ष देने वाला है। राजसिक ध्यान साधना चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि देने वाला है। जबकि भूत-प्रेत ग्रहादि द्वारा शत्रुओं के शमन को तामसिक कहा गया है। इनकी श्रद्धा और विश्वास से की गई उपासना भक्तों को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति दिलाती है।

भैरवजी की प्रार्थना का मंत्र


अतिक्रूर महाकाय,
कल्पान्त दहनोपम्
भैरव नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दातु मर्हसि।
इस मंत्र से मानव मात्र का कल्याण होता है।

स्वर को पहचानें सिद्ध करें मनोरथ


सूर्य, चंद्रमा एवं अन्य ग्रह नियमित रूप से चराचर जगत को प्रभावित करते हैं। इन्हीं से निर्देशित होकर नाड़ियां हमारे शरीर, मन एवं भविष्य में होने वाली तात्कालिक घटनाओं को प्रभावित करती हैं। इसी तरह वाम एवं दक्षिण स्वर क्रमश: मन एवं आत्मा के प्रतीक हैं।
कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है। ऐसे समय में स्वर की प्रतीक्षा करने पर उत्तम अवसर हाथों से निकल सकता है, अत: स्वर परिवर्तन के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारंभ करना चाहिए। स्वर विज्ञान का सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है।

संकेत नाड़ियों के
मानव शरीर में स्थित लगभग सात हजार दो सौ नाड़ियां समस्त ब्रrांड के ग्रह-नक्षत्रों की प्रभाव क्षमता को स्पष्ट कर देती हैं। नाभि में एक नाड़ी कुंडली के आकार में है, जिसमें से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलंगुषा, कुहू और शंखिनी नामक दस नाड़ियां निकलती हैं।
इनमें से प्रारंभिक तीन इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना प्रधान होती हैं। इड़ा को ही चंद्र कहते हैं और मन पर नियंत्रण एवं प्रिय-अप्रिय का बोध इसके कारण होता है। इसका परीक्षण बाएं नथुने से किया जाता है। पिंगला को सूर्य कहते हैं। यह दाएं नथुने में होती है।
सुषुम्ना को वायु कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य में होती है। हमारी श्वास निर्बाध गति से जिस नथुने से आ रही हो तो चंद्र स्वर तथा दाहिना नथुना सही काम कर रहा हो तो सूर्य स्वर चलता हुआ होता है। जिस समय स्वर परिवर्तन होता है, उस समय वायु तत्व प्रभावी होता है तथा सुषुम्ना नाड़ी चलती है।

कब करें कौन सा काम
ग्रहों को देखे बिना स्वर विज्ञान के ज्ञान से अनेक समस्याओं, बाधाओं एवं शुभ परिणामों का बोध इन नाड़ियों से होने लगता है, जिससे अशुभ का निराकरण भी आसानी से किया जा सकता है।चंद्रमा एवं सूर्य की रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। चंद्रमा का गुण शीतल एवं सूर्य का उष्ण है।
शीतलता से स्थिरता, गंभीरता, विवेक आदि गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चंचलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुण पैदा होते हैं। किसी भी काम का अंतिम परिणाम उसके आरंभ पर निर्भर करता है। शरीर व मन की स्थिति, चंद्र व सूर्य या अन्य ग्रहों एवं नाड़ियों को भलीभांति पहचान कर यदि काम शुरु करें तो परिणाम अनुकूल निकलते हैं।
स्वर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चंद्र स्वर में किए जाने चाहिए, जैसे विवाह, दान, मंदिर, जलाशय निर्माण, नया वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण खरीदना, शांति अनुष्ठान कर्म, व्यापार, बीज बोना, दूर प्रदेशों की यात्रा, विद्यारंभ, धर्म, यज्ञ, दीक्षा, मंत्र, योग क्रिया आदि ऐसे कार्य हैं कि जिनमें अधिक गंभीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता होती है।
इसीलिए चंद्र स्वर के चलते इन कार्यो का आरंभ शुभ परिणामदायक होता है। उत्तेजना, आवेश और जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनमें सूर्य स्वर उत्तम कहा जाता है। दाहिने नथुने से श्वास ठीक आ रही हो अर्थात सूर्य स्वर चल रहा हो तो परिणाम अनुकूल मिलने वाला होता है।

दबाए मानसिक विकार
कुछ समय के लिए दोनों नाड़ियां चलती हैं अत: प्राय: शरीर संधि अवस्था में होता है। इस समय पारलौकिक भावनाएं जागृत होती हैं। संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता और अरुचि होने लगती है। इस समय में परमार्थ चिंतन, ईश्वर आराधना आदि की जाए, तो सफलता प्राप्त हो सकती है। यह काल सुषुम्ना नाड़ी का होता है, इसमें मानसिक विकार दब जाते हैं और आत्मिक भाव का उदय होता है।

अन्य उपाय
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी।
गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए। कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय स्वर बदलने के प्रयास करने चाहिए।
स्वर को परिवर्तित कर अपने अनुकूल करने के लिए कुछ उपाय कर लेने चाहिए। जिस नथुने से श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा। घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है।

ताकि सुखमय हो दांपत्य


हिंदू संस्कृति में सोलह संस्कार हैं जिसमें विवाह संस्कार मुख्य है। विवाह का सौभाग्य सभी को प्राप्त नहीं होता है। दांपत्य सुख के अभाव के कई कारण हो सकते हैं। इनमें से हम मुख्य ज्योतिष कारणों का ही वर्णन कर रहे हैं।
< स्त्री या पुरुष की जन्म कुंडली में सप्तम भाव और सप्तमेष का पापी ग्रहों जैसे- राहु, मंगल, शनि और केतु से युक्त।

< सप्तमेष का ६वें, ८वें या १२वें भाव में
< पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में गुरु ग्रह का दूषित होना।
< मंगल दोष का निवारण न होना।
< गुण मिलान के अंतर्गत १८ गुण से कम होना।
< नाड़ी दोष, गण दोष, नुपूर दोष।
< हस्त रेखा के अंतर्गत बुध पर्वत के निकट सबसे लंबी रेखा को विवाह रेखा कहते हैं। इसका दूषित होना जैसे: विवाह रेखा आगे चलकर हृदय रेखा से मिल जाए तो संबंध विच्छेद हो सकता है।विवाह रेखा आगे चल द्विशाखीत हो जाए तो तलाक हो जाता है।विवाह रेखा बुध पर्वत के मूल में मुड़ जाए तो जातक का कभी विवाह नहीं होता।विवाह रेखा पर काला तिल, क्रॉस होना अशुभ लक्षण है।पूर्व जन्म में पत्नी पर किए गए अत्याचार भी दांपत्य दुख का कारण बनते हैं।सप्तम भाव में अकेला गुरु ग्रह हानिकारक होता है।
उपाय
< स्त्री जातक पुखराज और पुरुष जातक हीरा या ओपल रत्न धारण करें।
< सप्तमेष और सप्तम भाव में स्थित पापी ग्रहों की शांति करवाएं।
< पुरुष जातक निम्न मंत्र का जाप करें:-

पत्नीं मनोरमां देहि मनो वृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसार सागस्य कुलोद् भवाम

स्त्रियां भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्त तस्वीर रखकर मंत्र का जाप करें।

हे गौरि! शंक्डरार्धाड्रि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा मां कुरू कल्याणि! कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।

या

ऊँ कात्यायनी देवीय नम:।


वैभव ऐश्वर्य की प्रतीक है लक्ष्मी


अमावस्या का गहन अंधकार लक्ष्मी के स्वरूप और प्रकृति से मेल नहीं खाता। लक्ष्मी सौंदर्य, वैभव, ऐश्वर्य, पुष्टि और प्रकाश का प्रतीक है। इसलिए उनकी उपासना के लिए माघ शुक्ल पंचमी अर्थात श्री पंचमी या आश्विन पूर्णिमा ही उपयुक्त तिथि हैं। जब प्रकृति शिशिर के o£थ व आलस्य से निवृत होकर वनस्पति और किसलयों का प्ररोहण करती है या जब आश्विन का पूर्ण इन्दु पृथ्वी और अमृत वर्षा करता तो कृतज्ञ पृथ्वीवासी जीवन की आधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी की उपासना कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। कार्तिक अमावस्या की प्रकृति ऐसी नहीं है।
अमावश्य का घोर अंधकार जब दृष्य जगत को अपने आगोश में समेट लेता है तो जीवन प्रकाश और सौंदर्य के लिए अवकाश नहीं बचता। यह रहस्यमयी रजनी महाकाली की उपासना के लिए अधिक उपयुक्त लगती है। जब दृष्यमान विश्व किसी रहस्यपूर्ण अज्ञात के अनन्त अवकाश में विलीन हुआ जाता हैं, अस्तित्व अनिस्तत्व हो जाते है तो मृन्यृरूपिणी, मुक्त कुंतला मां काली की आराधना ही उपयुक्त हो सकती है।
लेकिन जब समूचा उतर भारत इस रात महालक्ष्मी की पूजा करता है तो इसका कुछ न कुछ कारण होना ही चाहिए। दश महाविद्याओं की उपसना पद्धति के दो क्रम हैं। और षोडशी क्रम। काली क्रम में काली, तारा, भैरवी और छिन्न मस्ता की उपासना की जाती है और षोडशी क्रम में त्रिपुर संदुरी, बगलामुखी, धुमावती, मातंगी, त्रिपुर, भैरवी और लक्ष्मी की। लक्ष्मी इनमें सबसे छोटी है।
इसलिए इन्हें कनिष्ठा भी कहते हैं। ये दोनों साधना क्रम प्रकृति के विलास के दो विपरीत पद्धतियों के प्रतीक है। दृष्यमान जगत के निरंतर अज्ञात में विलीन हो जाने की प्रक्रिया की अधिष्ठात्री देवी महाकाली है। वे श्यामवर्णा है और अधंकार उनका रूप हैं। अज्ञात से निकलकर अस्तित्व के मूर्तिमान होने की प्रक्रिया की अधिष्ठात्री है महात्रिपुर सुंदरी। वे रक्त वर्णा है और उनका स्वरूप है प्रकाश।
चन्द्रमा की बढ़ती और क्षय होती कलाओं में तांत्रिकों ने इन्हीं परस्पर विरोधी प्रक्रियाओं की अभिव्यक्ति देखी है। चांदनी रातों में हर तिथि को चंद्रमा विकसित होता जाता है। इस क्रम में अंधकार का अंश कम होता जाता है। पूर्णिमा की रात में चंद्रमा पूर्ण विकसित होता है। उस रात अंधकार बिल्कुल नष्ट हुआ सा लगता है। शुक्ल पक्ष की 15 रातों में हर तिथि को अंधकार की एक कला क्षय होती जाती है। फिर भी पूर्णिमा की रात में सोलहवीं कला के रूप में अंधकार विद्यमान रहता है।
इसे कहते हैं अनुमति। यह महाकाली है। यह अज्ञात, अनन्त, अननुमेय, महाकाली की शक्ति है। वह इस प्रत्यक्ष शक्ति का लगातार विधवंश कर रही है। वह जीवन के व्यापार से श्रांत जीवों को मृत्यु के निस पंद लोक में विश्राम का अवसर देती है और रूप, गंध, महात्रिपुरसुंदरी की लीला इससे भिन्न है। वे सृजन की देवी है। अनसितत्व को शुन्य से निकाल कर ले आती है और उन्हें अस्तित्व को शुन्य से निकाल कर ले आती है और उन्हें अस्तित्व प्रदान कर अपना लीलसखा बना लेती है। जीवन उनकी लीला है। प्रकाश उनका स्वरूप है। वे रोचना है, रोचिष्मति है, शुभा है।
अपने साधक को भोग और मोक्ष देती है। उनका यह रूप कृष्ण पक्ष की रातों में अभिव्यक्त होता है। कृष्ण पक्ष में हर तिथि को प्रकाश की एक कला कम होती जाती है। अमावस्या की रात तक प्रकाश की 15 कलाएं समाप्त हो चुकी होती है। उस रात अशेष प्रकाश की सोलहवीं कला शेष रहती है। इसे सिनीवाली कहते हैं। यह षोडशी कला है। यही महालक्ष्मी है। जिनकी महात्रिपुर सुंदरी के क्रम में अराधना होती है। यह जीवन, प्रकाश उत्कर्ष और पुष्टि का प्रतीक है।


कार्तिक अमावस्या के घोर अंधकार में जब सारी सृष्टि विलीन हो रही होती है, तो हिंदू प्रकाश की इसी षोडशी कला सिनीवाली की उपासना कहते हैं। यही महालक्ष्मी का रूप है। यह मृत्यु को भीषण दाढ़ों से जीवन को छीन लाने सरीखा है। जीवन का चरम उल्लास जैसे घोरतम निराशा में ही प्रकट हो सकता है। यही दीपावली की रात में महालक्ष्मी की उपासना का रहस्य। जो हिन्दुओं के परम उल्लास, महान शैर्य और अटल इच्छा शक्ति का प्रतीक है। यही हिन्दुत्व की अजेय जीवन शक्ति है।

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