30 जून 2011

बुरी आदतों को संकल्प के द्वारा संयम में बाँध लो

वासनाओं से मुक्त कैसे हो? यह प्रश्न उन सबके लिए है, जो आदतों से छुटकारा पाना चाहते हैं।

तुम आदतों को छोड़ना चाहते हो, क्योंकि उनसे तुम्हें कष्ट होता है, वे तुम्हें सीमित करती हैं। वासनाओं का स्वभाव है, तुम्हें विचलित करना, तुम्हें बाँध देना और जीवन का स्वभाव है मुक्त होने की चाह। जीवन मुक्त रहना चाहता है। पर जब यह नहीं मालूम कि कैसे मुक्त हों, तब आत्मा-जन्मान्तरों तक मुक्ति की खोज में भटकती रहती है।

समय और स्थान को ध्यान में रखकर संकल्प करो। संकल्प समयबद्ध होना चाहिए। फिर तुम्हारा व्यवहार भी अच्छा होगा और तुम पथ से विचलित होने से भी बच जाओगे। इसलिए समय और स्थान का ध्यान रखकर संकल्प करो।

उदहारण के लिये किसी को सिगरेट पीने की आदत है और वह कहता है, 'मैं सिगरेट पीना छोड़ दूंगा।' पर वह सफल नहीं होता। ऐसे लोग निर्धारति समय, जैसे तीन महीने या 90 दिनों के लिये संकल्प ले सकते हैं। अगर किसी को गाली देने की आदत है, तो वह 10 दिनों तक बुरे शब्दों का प्रयोग नहीं करने का संकल्प करें। जीवन भर के लिये संकल्प मत करो, क्योंकि तुम उसे निभा नहीं पाओगे। यदि कोई संकल्प बीच में टूट भी जाए, तो चिंता मत करो। फिर से शुरू करो। धीरे-धीरे समय की सीमा बढ़ाते जाओ, जब तक वही तुम्हारा स्वभाव ना बन जाए। यही 'संयम' है। हर एक में कुछ संयम होता ही है। जब मन व्यर्थ की चिंताओं में उलझा रहता है, तब दो बातें होती हैं। पहली, तुम्हारी पुरानी आदतें वापस आ जाती है और तुम निरुत्साहित हो जाते हो। तुम अपने को दोषी ठहराते हो और सोचते हो कि तुम्हारा कोई विकास नहीं हुआ।

दूसरी ओर तुम इसे संयम अपनाने का एक नया अवसर मानकर प्रसन्न हो सकते हो। संयम के बिना जीवन कभी सुखी और रोग-मुक्त नहीं हो सकता। उदहारण के लिए, तुम्हें पता है कि एक साथ तीन आइसक्रीम या प्रतिदिन आइसक्रीम खाना उचित नहीं है। ऐसा किया तो बीमार पड़ जाओगे।

जब जीवन में उत्साह और रस का अभाव है, तब आदतें तुम्हें अवरूद्ध कर देती हैं। जब जीवन को एक दिशा मिल जाती है, तब 'संयम' के द्वारा तुम आदतों से ऊपर उठ जाते हो। जो भी आदतें तुम्हें परेशान करती हैं, उन्हें संकल्प के द्वारा संयम में बाँध लो।

समूल विनाश की जड़ है क्रोध

इस संसार की नदी में बहुत कम लोगों के पाँव टिके हैं। अधिकाँश तो यूं ही बह गए, लेकिन इस नदी में सुबह-सुबह पार निकलना आसान होता है, क्योंकि उस समय बर्फ बहकर नहीं आती। उसी तरह इस संसार रूपी नदी से होने के लिये भी सुबह का समय या ब्रह्ममुहूर्त का समय श्रेष्ट होता है। यदि इस समय आप पाँव टिकाएंगे, तो बहुत जल्दी पार चले जाएंगे, लेकिन इस समय भी कुछ पत्थर तो इस नदी में अवश्य होते हैं। कुछ नुकीले हैं, कुछ चपटे हैं और कुछ आपके पाँव को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जीवन की नदी में यह पांच पत्थर हैं: काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। यदि नदी को सुरक्षित पार करना है, तो ध्यान रखना कि इन पर आपका पांव नहीं पड़े। ये देखने में बहुत छोटे लगते हैं, लेकिन एक बार जब अंदर पाँव पड़ता है, तो संतुलन गड़बड़ा सकता है और आप बह भी सकते हैं।

कौन चाहता है कि मैं क्रोध करूं, लेकिन फिर भी क्रोधित होता है। कौन चाहता कि मैं लालची कहलाऊँ, लेकिन फिर भी लालच करता है। इन सभी में सबसे हानिकारक है क्रोध। जब यह आता है, तो बुद्धि पर पर्दा पड़ जाता है। इंसान को होश नहीं रहता और वह पागल के समान हो जाता है। उसका परिणाम यह होता है कि जोश में आकर वह क्या बोल जाता है, उसे पता नहीं होता, पर जो उसे सुनता है, उसे सब कुछ याद रहता है और उसे वह कभी नहीं भूलता। सामने वाला, फिर भले ही उससे शत्रुता मौल ले, लेकिन क्रोध में वहां कुछ याद रहता है। बात अगर क्रोध तक ही हो, तो फिर भी चल जाए, लेकिन क्रोध की पत्नी 'हिंसा' भी तो उसका पूरा साथ निभाती है। इस क्रोध का परिवार बहुत बड़ा है। उसकी दो बेटियाँ है, 'निंदा' और 'चुगली', एक बहिन है 'जिद', इसका एक बड़ा भाई भी है, वह है 'अभिमान'। एक बेटा है 'द्वेष' और बहू है 'ईर्ष्या'। क्रोध जब आता है, तो कभी अकेले नहीं आता। अपने इस पूरे परिवार को लेकर साथ आता है और जब यह पूरा परिवार एक साथ आता है, तब फिर व्यक्ति का सारा व्यक्तित्व ही बदल जाता है। फिर उसे नाश की ओर जाने से कोई रोक नहीं सकता। इसलिए यदि इस संसार रूपी नदी से पार होना है, तो इस पूरे परिवार से बचकर रहना होगा और इस परिवार से बचने का आसान उपाय है, कि इस परिवार के मुखिया क्रोध से ही नाता हटा लिया जाए।

दैनिक जीवन में मुहूर्त का महत्त्व

भारतीय जीवनशैली में काल की शुभता-अशुभता का बहुत महत्व है। किसी भी कार्य का आरम्भ शुभ समय में ही होना चाहिए, ऐसी हमारे देश के ज्योतिषीयों/विद्वानों तथा बुजुर्गों की मान्यता है। शुभ समय में किया गया कार्य शीघ्र एवं अनुकूल होता है। शुभ समय में शुरू किया गया कार्य आधा हो गया मानते हैं। शुभ समय की जानकारी के लिये ऋषियों ने मुहूर्त नामक पद्वति का आविष्कार किया, जो कि तत्कालीन गोचर (वर्तमान) ग्रहों पर आधारित होती है। मुहूर्त पद्वति ज्योतिष के संहिता भाग के अंतर्गत आती है, जो पूर्णतः गणित पर आधारति होती है। शुभ मुहूर्त का आविष्कार गणितीय शुद्धता है। ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि ज्योतिष का विकास मुहूर्तों की उपयोगिता के कारण ही हो पाया है। वर्तमान समय में हर छोटे-छोटे कार्यों के लिये मुहूर्त तय किये जाते हैं।

जैसे-जैसे ज्योतिष का विकास हुआ वैसे ही इसकी उपयोगिता भी बढी है। वर्तमान में गर्भाधानादि 16 संस्कार, ग्राहारम्भ, गृहनिर्माण, यात्रा, व्यापाराम्भ, शपथग्रहण, पदग्रहण, वाहनक्रय, आवेदन पत्र भरने, पर्चादाखिल आदि सभी क्षेत्रों में मुहूर्त देखे जाने की परम्परा है।

वर्तमान समय में व्यक्ति की आवश्यकताएं और क्षेत्र अतिविस्तृत हो गए हैं। जिन कार्यों को कभी छोटा समझा जाता था, वे आज आजीविका के मुख्य साधन बन गए हैं। ऐसे कुछ महत्वपूर्ण कार्यों को प्रारम्भ करने के पूर्व शुभ मुहूर्त के सामान्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

मुहूर्त संबंधी जानकारी

1. अमावस्या तिथि में मांगलिक कार्यों को प्रारम्भ नहीं करना चाहिए।
2. रिक्ता तिथियों (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दर्शी) में आजीविका संबंधी किसी भी कार्य को प्रारम्भ नहीं करना चाहिए।
3. नंदा तिथियों (प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी) में किसी भी योजना को पारित अथवा क्रियान्वित नहीं करें।
4. रविवार, मंगलवार एवं शनिवार को मेल-मिलाप एवं संधि के कार्य नहीं करें।
5. कोई भी गृह जिस दिन अपनी राशि परिवर्तित करे, उस तिथि और नक्षत्र में किसी भी कार्य की रूपरेखा नहीं बनाएं और ना ही कोई कार्य प्रारम्भ करें।
6. जिस दिन नक्षत्र एवं तिथि योग 13 आए, उस दिन पारिवारिक अथवा सामाजिक उत्सव अथवा कार्य का आयोजन नहीं करें.
7. जब भी कोई ग्रह उदय अथवा अस्त हो, तो उससे तीन दिन पूर्व और बाद तक भी अपने किसी विशेष कार्य की शुरूआत नहीं करें।
8. अपनी जन्म राशि का और जन्म नक्षत्र का स्वामी जब अस्त हो, वक्री हो अथवा शत्रु ग्रहों के मध्य हो, उस समय में भी निजी जीवन से जुड़े और आय संबंधी क्षेत्रों का विस्तार अथवा योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं करें। बुध ग्रह को अस्त का दोष कम लगता है।
9. तिथि, नक्षत्र एवं लग्न की समाप्ति हो रही हो, उस समय जीवन, मृत्यु और आय से जुड़े किसी कार्य को अंजाम नहीं देना चाहिए।
10. क्षय तिथि को भी त्यागना चाहिए।
11. समीपवर्ती ग्रहण जिस नक्षत्र में हुआ हो, उस नक्षत्र को अगले ग्रहणपर्यंत शुभ कार्यों से दूर रखा जाता है।
12. जन्म राशि से चौथी, आठवीं और बारहवीं राशि पर जब चन्द्रमा हो, उस समय प्रारम्भ किए गए कार्य नष्ट हो जाते हैं।
13. शुभ कार्यों के प्रारम्भ में भद्राकाल से बचना चाहिए।
14. चन्द्रमा जब कुम्भ अथवा मीन राशि में हो, उस समय घर में अग्नि संबंधी वस्तुएँ जैसे ईधन, गैस सिलेंडर, प्रेट्रोल, अस्त्र-शस्त्र, नए बर्तन, बिजली का सामान अथवा मशीनरी नहीं लानी चाहिए।
15. विवाह के लिए मंगलवार को कन्या का और सोमवार को वर का वरण नहीं करना चाहिए।
16. जन्मवार एवं जन्म नक्षत्र में नए कपडे पहनना अच्छा होता है।
17. पुष्य नक्षत्र केवल विवाह को छोड़कर अन्य सभी कार्यों में शुभ होता है।
18. देवशयन अवधि में बालक को स्कूल में दाखिला नहीं दिलाना चाहिए।
19. चार (गतिशील यात्रा संबंधी) कार्यों हेतु चार लग्न (मेष, कर्क, तुला, मकर), स्थिर कार्यों (विवाह एवं भवन निर्माण) के लिये स्थिर लग्न (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) तथा द्विस्वभाव राशियों का पूर्वार्ध स्थिर कार्यों के लिये प्रयोग किया जा सकता है।
20. घर के किसी बुजुर्ग का श्राद्ध दिवस हो अथवा मृत्यु तिथि हो, उस दिन भी किसी नए कार्य की शुरूआत नहीं करनी चाहिए।
21. साक्षात्कार लेने और देते अथवा परीक्षा फ़ार्म भरने में नन्दा और ज़या तिथियाँ शुभ मानी जाती हैं।
22. सूर्य जब बुध और गुरू की राशियों में हो, तो उस समय नए भवन में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
23. मंगलवार को धन उधार नहीं लेना चाहिए और बुधवार को नहीं देना चाहिए।
24. मंगलवार को ऋण चुकाना और बुधवार को धन संग्रह करना शुभ होता है।
25. सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा में, गुरूवार को दक्षिण दिशा में, रविवार और शुक्रवार को पश्चिम दिशा में, मंगलवार और बुधवार को उत्तर दिशा में व्यावसायिक अथवा पारिवारिक कार्य हेतु यात्रा नहीं करनी चाहिए।

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