22 जून 2011

शेखचिल्ली - शाही हुक्का

हाफिज नूरानी, शेखचिल्ली के पुराने दोस्त थे। नारनौल में उनका कारोबार था। बीवी थी नहीं। बड़ी हवेली में बेटे और बहू के साथ रहते थे।

बेटे को दूल्हा बने सात बरस बीत चुके और बहू की गोद न भरी, तो हाफिज साहब को फिक्र हुई कि या खुदा, खानदान का नाम आगे कैसे चलेगा?

उन्होंने एक ख़त शेखचिल्ली को लिखकर राय माँगी। शेखचिल्ली कुरूक्षेत्र के किसी पीर के मुरीद थे। कोसों दूर होने के बावजूद थोड़े-थोड़े अरसे बाद वहां जाते-आते रहते थे। बस, एक दिन हाफिज नूरानी को बेटे-बहू के साथ ले गए पीर साहेब के पास।

पीर भी काफी पहुंचे हुए थे। उन्होंने बहू को कुछ पढ़कर पानी पिलाया और एक तावीज उसके बाजू पर बांधकर बोले--"परवरदिगार ने चाहा, तो इस बरस आरजू पूरी हो जाएगी।"

पीर साहब की दुआ का असर हुआ। एक बरस बीतते-न-बीतते बहू के पाँव भारी हो गए। वक्त आने पर चाँद-से बेटे ने जन्म लिया। हाफिज साहब का आँगन खुशियों से भर उठा।

हाफिज नूरानी की खुशियों का पारावार न था। तुरंत जश्न का इंतजाम होने लगा। उसमें शेखचिल्ली को खातौर से बुलाया गया।

शेखचिल्ली को दावतनामा मिला, तो बड़े खुश हुए। बेगम से बोले--"तुरंत चलने की तैयारियां करो।"

"तैयारियां क्या ख़ाक करूं!" बेगम तुनककर बोलीं--"न ढंग के कपडे हैं, न टन पर एक गहना। तुम्हारे पास तो फटी-पुरानी जूतियाँ भी हैं, मेरे पास तो वह भी नहीं। अगर ऐसे हाल में वहां गए, तो खासी हंसाई होगी।"

शेखचिल्ली खामोश हो गए। बेगम की एक-एक बात सच थी। हाफिज नूरानी नारनौल के बड़े रईस थे। उनका जश्न भी छोटा-मोटा न होगा। बड़े-बड़े अमीर-उमरा भी आएँगे। चूंकि यह दिन शेखचिल्ली की वजह से देखना नसीब हुआ है, इसलिए हाफिज साहब उनको सभी से मिलाएंगे भी। ऐसी सूरत में वहां फटेहाल पहुंचना क्योंकर मुनासिब होगा?

शेखचिल्ली को खुदा पर गुस्सा आने लगा कि आखिर क्या सोचकर उसने उन्हें इस हालत में छोड़ रखा है?--मगर वक्त गुस्से का नहीं, कुछ तरकीब भिडाने का था।

नवाब साहब का धोबी शेखचिल्ली को बहुत मानता था। कुछ ही दिन पहले उसने उन्हें इस हालत में छोड़ रखा है?--मगर वक्त गुस्से का नहीं, कुछ तरकीब भिडाने का था।

नवाब साहब का धोबी शेखचिल्ली को बहुत मानता था। कुछ ही दिन पहले शेखचिल्ली ने उसे नवाब के गुस्से से निजात दिलाई थी। बस, जा धमके उसके पास। बोले--"एक काम के लिए आया हूँ। मना मत करना!"

धोबी ने शेखचिल्ली के मांगने पर जान तक देने की बात कही, तो शेखचिल्ली ने सारी उलझन उसे बताकर अपने और बेगम के लिये कुछ कपडे मांगे। बोले--"नारनौल से लौटते ही वापस कर दूंगा।"

धोबी इस अनोखी मांग से कुछ घबराया तो, मगर वायदा कर चुका था। जी कडा करके शेखचिल्ली के मनपसंद कपडे उसे दे दिए। बोला--"ये कपडे नवाब और उनकी भांजी के हैं। सही-सलामत वापस कर देना!"

शेखचिल्ली उन्हें ले घर लौटे। बेगम ने देखे, तो बड़ी खुश हुईं। फिर बोलीं--"कपडे तो मिल गए, मगर जूतियों का क्या करोगे? नारनौल पैदल तो जाएंगे नहीं। सवारी का क्या होगा?"

शेखचिल्ली पहुंचे मोची के यहाँ। बोले--"दो जोड़ी जूतियाँ चाहिएं। एक मेरे लिये, एक बेगम के लिये।"

मोची ने तरह-तरह की जूतियाँ दिखाईं। शेखचिल्ली ने सबसे कीमती जूतियाँ पसंद कर लीन। बोले--"इन्हें बेगम को और दिखा लाऊँ। तब खरीदूंगा।"

मोची मान गया। शेखचिल्ली जूतियाँ ले घर सटक गए। अब सवाल रहा सवारी का।

सबसे अच्छी घोड़ा-गाडी झज्जर के बनी घनश्याम के पास थी। वह उसे किराए पर भी चलाता था। शेखचिल्ली उसके पास पहुंचे। बोले--"मुझे नवाब साहब के काम से नारनौल जाना है। नवाब साहब की बग्घी का एक घोड़ा बीमार है। सो अपनी घोड़ा-गाडी दे दो। किराया नवाब साहब से दिला दूंगा।"

अच्छा किराया मिलने के लालच में घनश्याम ने बिना हील-हुज्जत के अपनी घोड़ा-गाडी उनके हवाले कर दी। और शेखचिल्ली बेगम को ले नारनौल रवाना हो गए।

नारनौल उस वक्त रियासत झज्जर ही का एक कस्बा था। शाही ठाठ-बाट से शेखचिल्ली माय बेगम वहां पहुंचे, तो हलचल मच गई। वे जश्न से एक दिन पहले पहुंचे थे, इसलिए पहले मेहमान थे। बड़ी आवभगत हुई। पूरे कसबे में शेखचिल्ली की अमीरी के चर्चे गूंजने लगे। उन्हें हर मौके पर जाफरानी तम्बाकू वाला हुक्का पेश किया जाने लगा। शेखचिल्ली यूं हुक्का बहुत पहले छोड़ चुके थे, मगर यहाँ मुफ्त का जो हुक्का मिला तो कश पर कश लगाने लगे, जैसे ठेठ नवाबी खानदान के हों।

मगर इन जश्न के मौके पर सारा गुड गोबर हो गया। हाफिज नूरानी के कुछ दोस्त नवाब के घराने से भी जुड़े थे। शेखचिल्ली को सबसे मिलवाया गया, तो नवाब साहब के जो कपडे वह पहने हुए थे, पहचान लिए गए। उस समय तो किसी ने कुछ न कुछ कहा, मगर बाद में जो फुसफुसाहटें फैलीं, तो शेखचिल्ली को भनक लग गई। बस, हुक्का पकडे-पकडे भागे जनानखाने की ओर। बेगम से बोले--"जल्दी करो! यहाँ से तुरंत चल देने में ही भलाई है। कपड़ों की बाट फूट गई है। ऐसा णा हो कि नवाब को पता चल जाए और धोबी के साथ-साथ हम भी रगड़े जाएं।"

बस, दोनों जश्न के बीच से जो खिसके, तो नारनौल के बाहर आकर ही दम लिया।

"सत्यानाश जाए उन लोगों का! कीड़े पड़ें निगोड़ों की आँखों में!"-- बेगम तुनतुनाकर बोलीं--"कितना मजा आ रहा था! सारी औरतें मुझे सिर-आँखों पर बिठाए थीं।"

तभी उनका ध्यान गया हुक्के पर, जो अभी भी शेखचिल्ली के हाथ में था। बोलीं--"यह हुक्का क्यों उठा लाए? नूरानी भाई ढूंढते फिरेंगे कि हुक्का कहाँ गया?"

मगर शेखचिल्ली भी ऐसे बने बैठे थे, जैसे वह उन लोगों को अभी फाड़ खाएंगे, जिन्होंने नवाब के कपडे पहचाने थे। बेगम की बात उनके कानों में पहुँची ही नहीं--

'काश! मेरे बस में होता कि जिसको चाहूँ फांसी पर चढ़ा दूं। कमबख्तों से कोई पूछे कि नवाब के कपड़ों पर क्या उसका नाम लिखा है कि गुनगुनाने लगे--कपडे तो नवाब के-से लगते हैं!

'मैं अल्लाहताला का इतना नेक बन्दा। दिलो-जान से उसकी इबादत करने वाला। पाँचों वक्त नमाज अदा करने वाला। पीरों और फकीरों की कदमबोसी से पेट भरने वाला। फिर भी पता नहीं, मेरी इतनी बेइज्जती उसे कैसे गवारा होती है? अता क्यों नहीं फरमा देता मुझे कोई ऐसी गैबी ताकत कि जिसकी ओर टेढ़ी नजर से देखूं, वह ख़ाक हो जाए!

'अल्लाह, अगर ऐसी गैबी ताकत मुझे मिल जाए, तो''' तो फिर मैं इन सबकों देख लूंगा। सबसे पहले हाफिज नूरानी के जशन में वापस जाऊंगा। उन सारे बेहूदा लोगों को ऐसी टेढ़ी नजर से देखूंगा कि सर से पाँव तक शोला बन जाएंगे कमबख्त। इधर-उधर भागेंगे। शोर मच जाएगा--पानी डालो! रेत डालो!

'लपटों में घिरे वे वहशी पंडाल में इधर-उधर भागेंगे। दूसरे लोग उनसे बचने की लिये भागेंगे। पंडाल में आग लग जाएगी। '''न '''न ''''पंडाल तो बेचारे हाफिज नूरानी का है। उसमें आग क्यों लगेगी?

'मगर वे भागते-दौड़ते हुए आकर मुझसे लिपट गए तो'''''? अरे कैसे लिपट जाएंगे? मैं उन्हें टेढ़ी नजरों से देखूंगा ही छत पर चढ़कर।

'अगर वे जनानखाने में जा घुसे तो? वहां भी बुरी तरह भगदड़ मच जाएगी। सारी औरतें भाग-भागकर कमरों में जा छिपेंगी। अंदर से सांकल चढ़ा लेंगी।

'मगर बेगम?--बेगम कैसे भागेंगी? वह तो बिना किसी की मदद के उठ भी नहीं सकेंगी।

'या परवरदिगार! खैर करना, वरना बेगम को कबाब बनने में देर नहीं लगेगी। दो-चार बाल्टी पानी तो उनके कोहकाफ जैसे बदन पर दस-पांच बूँद जैसा साबित होगा।

'मगर तीस-चालीस बाल्टियां पानी लाएगा कौन? लोग तो जश्न में मशगूल होंगे। '''उन्हें हादसे की खबर देने के लिए मुझे ही चिल्लाना होगा--आग लग गई! हाय, बेगम आग में घिर गई! दौड़ो!

और तभी बेगम की धौल उनके सिर पर पडी। जैसे धरती पर गिरने से जागे शेखचिल्ली। देखा--हुक्का उन दोनों के बीच गिर पडा है। घोड़ा-गाडी में धुंआ भरा है और धोबी से उधार मांगे कपड़ों में चिंगारियां उठ रही हैं।

शेखचिल्ली - तेंदुए का शिकार

एक बार कार्यक्रम बना, नवाब साहब कालेसर के जंगलों में शिकार खेलने जाएंगे।

कालेसर के जंगल खूंखार जानवरों के लिये सारे भारत में मशहूर थे। ऐसे जंगलों में अकेले शिकारी कुत्तों के दम पर शिकार खेलना निरी बेवकूफी थी। अतः वजीर ने बड़े पैमाने पर इंतजाम किए। पानीपत से इस काम के लिये विशेष रूप से सधाए किए। पानीपत से इस काम के लिये विशेष रूप से सधाए गए हाथी मंगाए गए। पूरी मार करने वाली बन्दूदें मुहैया की गईं। नवाब साहब की रवानगी से एक हफ्ता पहले ही शिकार में माहिर चुनिंगा लोगों की एक टोली कालेसर रवाना कर डी गई कि वे सही जगह का चुनाव करके मचान बांधें, ठहरने का बंदोबस्त करें और अगर जरूरत समझें, तो हांका लगाने वालों को भी तैयार रखें। इस तरह हर कोशिश की गई कि नवाब साहब कम-से-कम वक्त में ज्यादा-से-ज्यादा शिकार मार सकें।

अब सवाल उठा कि नवाब साहब के शिकार पर कौन-कौन जाएगा? जाहिर था कि शेखचिल्ली में किसी की दिलचस्पी न थी। हो भी कैसे सकती थी? एक तो माशाअल्ला खुदा ने उनको दिमाग ही सरकसी अता फरमाया था कि पता नहीं, किस पल कौन-सी कलाबाजी खा जाए! ऊपर से बनाया भी उन्हें शायद बहुत जल्दबाजी में था। हड्डियों पर गोष्ट चढ़ाना तो अल्लाह मियाँ जैसे भूल ही गए थे।

मगर शेखचिल्ली इसी बात पर अड़े थे कि मैं शिकार पर जरूर जाऊंगा। राजी से ले जाना हो, तो ठीक; वरना गैर-राजी पीछा करता-करता मौके पर पहुँच जाऊंगा।

नवाब ने सुना, तो शेख्चिल्ल्ली की ओर ज़रा गुस्से से देखा। बोले-"तुम जरूरत से ज्यादा बदतमीज होते जा रहे हो। एक चूहे को तो मार नहीं सकते, शिकार क्या ख़ाक करोगे?"

"मौक़ा मिलेगा, तभी तो कर पाऊंगा हुजूर!"--शेखचिल्ली ने तपाक उत्तर दिया--"चूहे जैसे दो अंगुल की शै पर क्या हथियार उठाना? मर्द का हथियार तो अपने से दो अंगुल बड़ी शै पर उतना चाहिए।"

नवाब साहब ने उनका जवाब सुनकर उन्हें अपने शिकारी लश्कर में शामिल कर दिया। काफिला पूरी तैयारी के साथ कालेसर के बियाबान जंगलों में जा पहुंचा। वहां पहले से ही सारा इंतजाम था। तय हुआ कि रात को तेंदुए का शिकार किया जाए।

दिन छिपने से पहले ही सारे लोग पानी, खाना और बंदूकें ले मचानों पर जा बैठे। पेड़ 'सहारा' बाँध दिया गया।

चांदनी रात थी। मचानों पर बैठे सब लोगों की निगाहें सामने बंधे चारे के आसपास लगी थीं। शेखचिल्ली और शेख फारूख एक मचान पर थे। हालांकि वजीर चाहता था कि शेखचिल्ली को अकेला ही एक मचान पर बैठा दिया जाए, ताकि रोज-रोज की झक-झक ख़त्म हो। मगर नवाब नहीं चाहते थे कि शेखचिल्ली को कुछ हो, या वह अपनी हवाई झोंक में कुछ ऐसा-वैसा कर बैठे कि शिकार हाथ से निकल जाए। इसलिए उनकी तजवीज पर शेख फारूख को पलीते की तरह उनकी दम से बाँध दिया गया था। न पलीते में आग लगेगी, न बन्दूक चलेगा।

तेंदुए का इंतज़ार करते-करते तीन घंटे बीत गए। शेखचिल्ली का धीरज छूटने लगा। वह शेख फारूख से फुसफुसाकर बोले--"अजीब अहमक है यह तेंदुआ भी! इतना बढ़िया शिकार पेड़ से बंधा है और कमबख्त गायब है!"

"शिकार में ऐसा ही होता है"--"शेख फारूख ने शेखचिल्ली को चुप रहने का इशारा करते हुए बेहद धीमी आवाज में कहा।

"ख़ाक ऐसा होता है."--शेखचिल्ली फुसफुसाकर बोले--"मेरा तो जी चाहता है, बन्दूक लेकर नीचे कूद पडून, और वह नामुराद जहाँ भी है, वहीं हलाल कर दूं।"

शेख फारूख ने उन्हने फिर चुप रहने को कहा। शेखचिल्ली मन मसोसकर एक तरफ बैठ गए। सोचने लगे--'कमबख्त सब डरपोक हैं। एक अदद तेंदुए के पीछे बारह आदमी पड़े हैं। ऊपर के सारे-के-सारे पेड़ों पर छिपे बैठे हैं। यह कौन-सी बहादुरी है, जिसकी देंगे वजीर हांक रहा था? बहादुर हैं तो नीचे उतारकर करें तेंदुए से दो-दो हाथ! वह जानवर ही तो है! हैजा तो नहीं कि हकीम साहेब भी कन्नी काट जाएं!

'कमबख्त मेरी बहादुरी पर शक करने चले थे। अरे, तेंदुआ कल का आता, अभी आ जाए। नीचे उतारकर वह थपेड दूंगा कि कमबख्त की आँखें बाहर निकल आएंगी।

'मगर सुना है, वह छलांग बड़े गजब की लगाता है। मेरे नीचे उतारते ही उसने मुझ पर छलांग लगा दी तो? '''तो क्या हुआ! बन्दूक को छतरी की तरह सिर पर सीधा तान दूंगा। ससुरा गिरेगा तो सीधा बन्दूक की नाल पर गिरेगा। पेट में धंस जाएगी नाल! हो जाएगा ठंडा!

'और छलांग का भरोसा भी क्या? कुछ अधिक ऊंचा उचल गया, तो जाकर गिरेगा सीधा मचान पर। उठाकर भाग जाएगा शेख फारूख को। सारे लोग अपने-अपने मचान पर से चिल्लाएंगे-- शेखचिल्ली, पीछा करो उस शैतान तेंदुए का! शेख फारूख को ले भागा!

'मैं बन्दूक तानकर तेंदुए के पीछे भागूंगा। तेंदुआ आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे। शेख फारूख चिल्ला रहे होंगे-- शेखचिल्ली, बचाओ! शेखचिल्ली, मुझे बचाओ!

'आखिर तेंदुआ जानवर है, कोए जिन्न तो नहीं? कमबख्त भागता-भागता कभी तो थकेगा! थककर सांस लेने के लिये कहीं तो रूकेगा!

'बस, मैं अपनी बन्दूक को उसकी ओर तानकर यूं लबलबी दबा दूंगा और ''''

"ठांय!"--- तभी तेज आवाज गूंजी। सब चौंक उठे। शेखचिल्ली ने जोर से चिल्लाकर पूछा--"क्या हुआ?"

"तेंदुआ मारा गया।" --शेख फारूख बोले--"कमाल है शेखचिल्ली! चारे पर मुंह मारने से पहले ही तुमने उसके परखच्चे उड़ा दिए।"

'सच?'--शेखचिल्ली ने चारे की ओर देखा तो यकी न आया। पर यह सच था। दूसरे लोग निशाना साध भी न पाए थे कि शेखचिल्ली की बन्दूक गरज उठी थी।

मचान से नीचे उतारकर नवाब साहेब ने सबसे पहले शेखचिल्ली की पीठ ठोंकी। फिर वजीर की ओर देखकर कहा--"शेखचिल्ली जो भी हो, है बहादुर!"

मगर शेखचिल्ली जानते थे कि असलियत क्या थी! वह चुप रहे। चुप रहने में ही भलाई जो थी।

21 जून 2011

शेखचिल्ली - बेगम के पैर

बात उन दिनों की है, जब महेंद्रगढ़ झज्जर के नवाब के अधीन था। उत्तर-पश्चिम भारत पर विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण हो रहे थे और रोहतक, पानीपत और रेवाड़ी, दिल्ली के रास्ते में पड़ने के कारण इन काक्रान्ताओं की निर्दयता के शिकार होते थे।

नवाब उन दिनों झज्जर के बुआवाल तालाब को ठीक कराने में लगे थे, ताकि संकट के समय रिवाय को पानी का कष्ट न हो, अचानक दुर्राने के तेज हमले की खबर आई। पता चला कि दुर्रानी के सेना रेवाड़ी के पास पहुँचने वाली है।

तुरंत नवाब ने रियासत के जांबाज सिपहसालारों और वजीरों मनसबदारों की एक बैठक बुलाई। अहम मसला था कि अगर दुर्रानी झज्जर का रूख करे, तो उसासे कैसे निबटा जाए? और अगर हमले की सूरत में रोहतक या रेवाड़ी से मदद की गुहार आए, तो क्या किया जाए?

सभी का कहना था कि रियाया को तुरंत आगाह कर दिया जाए कि हमले की सूरत में उसे अपना बचाव कैसे करना है और दुश्मन से जूझने के लिये पूरी तैयारी की जाएं। दूसरी रियासतों की भी भरपूर मदद की जाए।

उसी दिन पूरी रियासत में नवाब की ओर से डुग्गी पिटवा डी गई कि हमले की सूरत में रियासत के कमजोर और बीमार लोग, औरतें और बच्चें भागकर पास के जंगल में चिप जाएं। नौजवान, दुश्मन का मुकाबला करने में फ़ौज का साथ दें।

डुग्गी शेखचिल्ली ने भी सुनी। उनकी बेगार निहायत मोटे किस्म की थीं। उन्हें देखकर अक्सर लोग यह मान ही नहीं पाते थे कि शेखचिल्ली के घर फाके भी होते होंगे। वह एकदम हक्के-बक्के और परेशान हो उठे- 'अब कोई समझाए नवाब को कि हमला हुआ, तो इतनी मोटी बेगम भागकर इतने दूर जंगलों में कैसे जाएँगी? बीच ही में न धर ली जाएंगे!..... फिर खुदा न खास्ता, दुर्रानी की फ़ौज आदमखोर हुई, तो बेगार उनका एक दिन का नाश्ता साबित होंगी.'''''धत तेरे की! मैं भी क्या उलटा-सीधा सोचने लगा! कमबख्तों की धजियाँ न उड़ा दूंगा, अगर उन्होंने बेगार की ओर देखा''' मगर रास्ते ही में पकडे जाने पर वे उन्हें देखेंगे नहीं, तो क्या आँखें बंद कर लेंगे? अंधे भी तो नहीं होंगे वे।

'हाँ, शेख फारूख एक दिन कह तो रहे थे दुर्रानी एकदम अंधा है। मैदान में उतरता है तो अपने-पराए में फर्क नहीं कर पाता। '''''मगर दुर्रानी अंधा है, तो क्या उसके सिपाही भी अंधे होंगे?

'बड़ी मुसीबत में जान फंस गई। मेरा क्या है, मैं तो उसकी फ़ौज के गुबार से ही उड़कर कहीं का कहीं जा पहुंचूंगा। मगर सवाल तो बेगार का है। वह तो जन्नत में भी मेरे बिना सबको फटकार लगाएंगी। अल्लाह मियाँ को भी नहीं बख्शेंगी। '''उफ़, अगर कहीं से उड़ने वाला कालीन मिल जाए तो'''

'मैं भी कितना अहमक हूँ! नवाब साहब ने घोड़ा दे रखा है, फिर भी नाहक परेशान हो रहा हूँ। बेगार को घोड़े पर बैठाकर दौड़ा दूंगा। दुर्रानी की कमबख्त सारी फ़ौज हाथ मालती रह जाएगी।

'मगर घोड़ा भी तो जानवर है। पता नहीं, बेगार का बोझ सह पाएगा या नहीं? ऐसा न हो कि बीच में पिचक जाए! या खुदा, ऐसा हुआ, तो क्या होगा? घोड़ा कहीं गिरेगा, बेगम कहीं बिरंगी! उनसे तो गिरकर उठा भी नहीं जाएगा।

'फिर घोड़ा नवाब का है। क्या पता, सीधा जंगल में जाएगा या लड़ने क जोश में कमबख्त दुर्रानी की फ़ौज में ही जा घुसेगा! बेगम बेचारी तो जोर-जोर से फटकार लगाने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकतीं। माना कि उनके अब्बा हजूर एक जांबाज सिपाही थे, तलवार ऐसी चलाते थे कि दुश्मन को छठी का दूध याद आ जाता था, मगर धुल पड़े उनके दकियानूसी ख्यालात पर! बेगार को जबान चलाना तो सिखा दिया, तलवार चलानी नहीं सिखाई। सिखा देते, तो उस समय काम न आती जब घोड़ा उन्हें लिये दुर्रानी की फ़ौज में जा घुसता!

'मगर '''यह माना कि घोड़ा दुर्रानी के फ़ौज में घुस जाएगा, मगर बेगार क पास तलवार कहाँ से आएगी? अल्लाह मियाँ आसमान से तो टपका नहीं देंगे कि लो मेरे बन्दे शेखचिल्ली की बेगा, तलवार लो और काट डालो दुर्रानी की गर्दन!

'अल्लाह मियाँ इतने मेहरबान होंगे, तो बेगम दुर्रानी की गर्दन जरूर काट डालेगी। कितना मजा आएगा उस दिन! दुर्रानी की फ़ौज में दहशत छा जाएगी। उसके सारे सिपाही मैदान छोड़कर भाग जाएंगे। नवाब उन्हें हैरानी से भागता देखेंगे।

पूछेंगे--यह अनहोनी कैसे हुई? किस आसमानी ताकत ने यह सब किया?

तभी भेदिया आकर नवाब को बताएगा-- हुजूर, एक मोटी औरत ने तलवार से दुर्रानी की गर्दन उड़ा दी।

'नवाब और हैरान होंगे। तपाक से कहेंगे-- वह औरत है या फरिश्तों की मलिका? उसे पूरी इज्जत के साथ दरबार में पेश करो!

'पेश करो''' नहीं-नहीं, नवाब कहेगा कि हम खुद उसकी कदमबोसी करेंगे।

'फिर वह घोड़े से उतारकर नागे पैर बेगम की तलाश में निकलेगा, वैसे ही जैसे शहंशाह अकबर नंगे पैर वैष्णो देवी की जियारत पर निकले थे।

'बेगम, दुर्रानी का खून से लथपथ सिर तलवार की नोक पर टाँगे मैदाने-जंग में खडी होंगी। नवाब उसकी कदमबोसी करेगा। बार-बार सजदे में झुकेगा।

'अपने सभी अमीर-उमराव को बेगम
के पैरों की धुल माथे से लगाने को कहेगा। पैर चूमने को कहेगा।

'सभी बेगम
के पैर चूमेंगे। नवाब मुझसे भी उनके पैर चूमने को कहेगा। '''भला अपनी बेगम क पैर मैं कैसे चूम सकता हूँ? मैं कहूंगा नहीं।

'नवाब जोर से चिल्लाएगा--चूमो!
'मैं फिर कहूंगा-- नहीं।
'नवाब बौखला उठेगा। सिपाहियों से कहेगा-- पकड़ लो इस मरदूद को और डाल दो इस आसमानी ताकत
के पैरों पर!
'नवाब
के सिपाही मुझे पकड़ लेंगे और फिर'''
और जोर से धाम की आवाज हुई तो शेखचिल्ली ने देखा-- वह चारपाई से लुढ़ककर नीचे सब्जी छीलती बेगम
के पैरों में गिर पड़े हैं।
''आग लगे इस बौडमपने में!" बेगम जोर से चीखीं--"अच्छा हुआ, दरांती पर नहीं गिरे। हो जाती ख़त से गर्दन अलग!"
और शेखचिल्ली बेचारे क्या कहते! खिसियाना हो, चुपचाप छत पर चले गए। हाँ, अलबत्ता दुर्रानी
के हमले का डर उन्हें और ज्यादा सताने लगा था कि कहीं सचमुच में बेगम के पैर ही चूमने न पड़ जाएं।

शेख्चिली की दूसरी नौकरी

पहले मालिक ने शेख्चिली को ठीक काम न करने के कारण निकाल ही दिया तो शेखचिल्ली एक सेठ के यहाँ पहुंचा और हाथ जोड़कर सेठजी से बोला-हुजूर मैं बहुत गरीब आदमी हूँ आप मुझे खिदमत के लिये नौकरी पर रख लीजिये।

सेठजी ने कहा-ठेक है, मगर तुमको मुझे एक इकरार नामा लिखकर देना होगा। अगर तुम उसके अनुसार काम न करोगे या नौकरी चोदोगे तो तुम्हारे नाक-कान का लिये जाएंगे। यदि हम तुमहें नौकरी से अलग करने को कहेंगे तो तुम हमारे नाक-कान काट देना।

सब काम इत्यादि लिखकर एक इकरार नामा तैयार किया गया तो दोनों उस पर अपने-अपने हस्ताक्षर करके सो रहे।

सुबह उठते ही शेखचिल्ली ने सोचा कि रोज सर और दाढी का काम बड़ा बे मौक़ा है इसलिए उनकी सफाई ही करवा देनी चाहिए। ऐसा सोचकर उसने पानी में छूना पीसकर डाल दिया।

उस पानी में जब सेठ जी ने दाढी को और उनकी स्त्री ने बालों को धोया तो सब गिर गए। सेठ जी ने खफा होकर कहा-यह क्या?

शेख्चिल्ले बोला-इकरार नामें के खिलाफ तो मैंने कुछ नहीं किया।

सेठजी की किताबों का बैग भी शेखचिल्ली रोज दफ्तर ले जाया करता था। एक दिन शेखचिल्ली ने वैसा ही दूसरा बैग बनाकर उसमें ईटें भर दीन और दूसरे दिन ले जाकर दफ्तर में रख दिया। जब सेठ जी ने बैग खोला तो हक्के-बक्के रह गए और सबको हंसता देखकर बड़े शर्मिन्दा हुए अब सेठ जी समझ गए कि नौकर कुछ उस्ताद मिला है।

शेखचिल्ली की अगली शर्त थी प्रतिदिन घोड़े को चराकर लाने की शर्त के अनुसार शेखचिल्ली घोड़े को लेकर चराने गए तो घोड़े को छोड़कर और चादर तानकर सो रहे। रात होने पर घोड़े लेकर वापिस आए तो रास्ते में सौदागर बोला-क्यों भाई घोड़ा बेचोगे?

शेखचिल्ली ने उत्तर दिया- हाँ साहब बेचेंगे। मगर 50 रू लेंगे। सौदागर ने खा-नहीं।
तब शेखचिल्ली बोले 40 ही दे देना पर घोड़े की थोड़ी पूँछ काट लेने दो।

शेखचिल्ली सौदागर से रूपया और थोड़ा सा पूँछ का टुकडा लेकर चल दिया और जाते ही चिल्लाने लगा- सेठ जी! सेठजी!! घोड़े को चूहे अपने बिल में घटित कर ले गए। सेठ जी आए तो उन्हें पूँछ दिखाकर कहने लगा- देखिये घोड़े को खींचने पर उसकी पूँछ टूट कर रह गई।

सेठ जी उसे नौकरी से अलग होने को कहते तो नाक-कान कटवाने पड़ते थे अतः चुप होकर रह गए।

शर्त में यह भी लिखा था कि शेखचिल्ली घर में जलाने को लकड़ी भी लाया करेगा। जब शेखचिल्ली लकड़ी लेकर आया तो उसने आते ही घर में रख कर आग लगा डी।

सेठजी उस समय मन्दिर गे हुए थे। आने पर उन्होंने शेखचिल्ली से कहा- तुमने हमारे घर में आग क्यों लगाई? अब हम तुमको नौकर नहीं रखेंगे।

शेखचिल्ली ने इकरार नामे की बात कह दी।

सेठजी ने तंग आकर अपनी पत्नी से कहा- अब तो इससे नाक-कान बचाना ही कठिन है। क्या किया जाए।

पत्नी ने कहा मैं आपके साथ पीहर चली जाती हूँ यह आप ही पीछे से भाग जाएगा।

शेखचिल्ली ने यह सब बात सुन ली और रात को ही सेठजी के ले जाने वाले बक्से में जा बैठा।

सुबह होने से पहले ही सेठजी और उसकी पत्नी बक्सा लेकर चल दिए। जब कुछ दूर चले गए तो सेठजी बोले कमबख्त से पीछा तो छूता अब वह नहीं आ सकेगा। ऐसे कहते हुए सेठजी व उनकी पत्नी चले जाते थे तो बक्से में बैठे शेखचिल्ली को पेशाब आ गया तो उसने संदूक में ही कर दिया। जब पेशाब बहकर सेठजी के मुंह पर आया तो सेठजी ने समझा की हलुवा बनाकर हमने संदूक में रखा था उसका घी बह रहा है।

जब सेठजी ने संदूक उतार कर जमीन पर रखा तो झट संदूक में से शेखचिल्ली निकल आया और बोला-हुजूर के क़दमों को तब तक नहीं छोड़ सकता जब तक नाक-कान न काट लूण।

सेठजी ने कहा- क्यों? यह लो संदूक इसे सिर पर रख के ले चलो। परन्तु शेखचिल्ली ने इनकार कर दिया।

लाचार सेठजी अपने ही सिर पर संदूक रखकर चले। जब ससुराल एक मील रह गई तो उन्होंने शेखचिल्ली से कहा-जाओ ससुराल कह दो सेठ जी आए है वह फलां जगह पर बैठे हैं उन्हें ले आओ।

शेखचिल्ली ने ससुराल जाकर कहा-सेठ जी बीमारी की हालत में हैं कठिनता से आए हैं। उन्हें लिवा लाएं।

रात को जब खाने का वक्त आया तो सेठ जी के आगे डाल रखी और शेखचिल्ली को आचे-२ पकवान खाने को मिले।

रात को सेठजी को पाखाना लगा तो शेख जी बोले बाहर कहाँ जाएंगे यहीं इसी हंडिया में कर दीजिये। सेठ जी ने वैसा ही किया। सुबह होने पर बोले-जाओ हंडिया फेंक आओ। परन्तु शेखचिल्ली ने मना कर दिया।

लाचार सेठ जी स्वयं हंडिया कपडे में लपेट कर फेंकने चले। चौखट पर ठोकर लगी तो हंडिया छूट कर नीचे गिर गई। सबके बदन पर पाखाने के छींटे पर और थू-थू करते भागे।

20 जून 2011

शेखचिल्ली की चल गई

शेखचिल्ली बाजार में यह कहता हुआ भागने लगा, “चल गई, चल गई!” बात क्या थी?

एक दिन शेखचिल्ली बाजार में यह कहता हुआ भागने लगा, “चल गई, चल गई!” उन दिनों शहर में शिया-सुन्नियों में तनाव था और झगड़े की आशंका थी।

उसे ‘चल गई, चल गई’ चिल्लाते हुए भागते देखकर लोगों ने समझा कि लड़ाई हो गई है। लोग अपनी-अपनी दूकानें बंद कर भागने लगे। थोड़ी ही देर में बाजार बंद हो गया।

कुछ समझदार लोगों ने शेखचिल्ली के साथ भागते हुए पूछा, “अरे यह तो बताओ, कहां पर चली है? कुछ जानें भी गई हैं क्या?”

शेखचिल्ली थोड़ा ठहरा और हैरान होकर पूछा, “क्या मतलब?”

“भाई, तुम्हीं सबसे पहले इस खबर को लेकर आए हो। यह बताओ लड़ाई किस मुहल्ले में चल रही है।”

“कैसी लड़ाई?” शेखचिल्ली ने पूछा।

“अरे तुम्हीं तो चिल्ला रहे थे कि चल गई चल गई।”

“हां-हां”, शेखचिल्ली ने कहा “वो तो मैं इसलिए चिल्ला रहा था कि बहुत समय से जेब में पड़ी एक खोटी दुअन्नी, आज एक लाला की दुकान पर चल गई है।” 

शेखचिल्ली - सड़क यहीं रहती है

एक दिन शेखचिल्ली कुछ लड़कों के साथ, अपने कस्बे के बाहर एक पुलिया पर बैठा था। तभी एक सज्जन शहर से आए और लड़कों से पूछने लगे, ‘क्यों भाई, शेख साहब के घर को कौन-सी सड़क गई है?’ शेखचिल्ली के पिता को सब ‘शेख साहब’ कहते थे। उस गाँव में वैसे तो बहुत से शेख थे, परंतु ‘शेख साहब’ चिल्ली के अब्बाजान ही कहलाते थे। वह व्यक्ति उन्हीं के बारे में पूछ रहा था। वह शेख साहब के घर जाना चाहता था।

परन्तु उसने पूछा था कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है। शेखचिल्ली को मजाक सूझा। उसने कहा, ‘क्या आप यह पूछ रहे हैं कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘हाँ-हाँ, बिल्कुल!’ उस व्यक्ति ने जवाब दिया।

इससे पहले कि कोई लड़का बोले, शेखचिल्ली बोल पड़ा, ‘इन तीनों में से कोई भी रास्ता नहीं जाता।’ ‘तो कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘कोई नहीं।’‘क्या कहते हो बेटे?’ शेख साहब का यही गाँव है न? वह इसी गाँव में रहते हैं न?’ ‘हाँ, रहते तो इसी गाँव में हैं।’ ‘मैं  यही तो पूछ रहा हूँ कि कौन-सा रास्ता उनके घर तक जाएगा।’

‘साहब, घर तक तो आप जाएँगे।’ शेखचिल्ली ने उत्तर दिया, ‘यह सड़क और रास्ते यहीं रहते हैं और यहीं पड़े रहेंगे। ये कहीं नहीं जाते। ये बेचारे तो चल ही नहीं सकते। इसीलिए मैंने कहा था कि ये रास्ते, ये सड़कें कहीं नहीं जाती। यहीं पर रहती हैं। मैं शेख साहब का बेटा चिल्ली हूँ। मैं वह रास्ता बताता हूँ, जिस पर चलकर आप घर तक पहुँच जाएँगे।’

‘अरे बेटा चिल्ली!’, वह आदमी प्रसन्न होकर बोला, ‘तू तो वाकई बड़ा समझदार और बुद्धिमान हो गया है। तू छोटा-सा था जब मैं गाँव आया था। मैंने गोद में खिलाया है तुझे। चल बेटा, घर चल मेरे साथ। तेरे अब्बा शेख साहब मेरे लंगोटिया यार हैं। और मैं तेरे रिश्ते की बात करने आया हूँ। मेरी बेटी तेरे लायक़ है। तुम दोनों की जोड़ी अच्छी रहेगी। अब तो मैं तुम दोनों की सगाई करके ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली उस सज्जन के साथ हो लिया और अपने घर ले गया। आगे चलकर वह सज्जन शेखचिल्ली के ससुर बन गए।

शेखचिल्ली का नुकसान

एक दिन शेखचिल्ली की अम्मी ने उससे कहा, ‘बेटे, अब तुम जवान हो गए हो। अब तुम्हें कुछ काम-काज करना चाहिए।’ ‘क्या काम करूँ?’ शेखचिल्ली ने पूछा। ‘कोई भी काम करो।’

‘मेरी तो समझ में नहीं आता, अम्मी कि मैं क्या काम करूँ? मैं तो किसी तरह की दस्तकारी भी नहीं जानता।’ ‘बेटे, तुम्हारे अब्बाजान अब बूढ़े हो गए हैं। तुम्हें कोई-न-कोई काम-धंधा जरूर करना चाहिए।’ ‘तुम ऐसा कहती हो तो ठीक है। मैं काम की तलाश में जाता हूँ।’ ‘जाओ।’ अम्मी ने कहा।

‘जा रहा हूँ। पर मुझे बढ़िया- सा खाना खिलाओ। मैं खा-पीकर ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली बोला।

‘अभी बनाए देती हूँ।’ अम्मी ने उत्तर दिया। शेखचिल्ली की माँ ने उसके लिए बढ़िया-बढ़िया पकवान बनाए और उन्हें खिला-पिलाकर उसे नौकरी की तलाश में भेज दिया। शेखचिल्ली मस्ती में झूमता हुआ घर से निकल पड़ा। उसके दिमाग में नौकरी या मजदूरी के सिवा कोई बात नहीं थी।

वह घर से बहुत दूर निकल गया। एक जगह रास्ते में उसे एक सेठ मिला। वह घी का हंडा सिर पर लिए जा रहा था। बोझ के कारण सेठ के कदम लड़खड़ा रहे थे। सेठ ने उसे देखते ही कहा, ‘ए भाई! मजदूरी करोगे?’ ‘बिलकुल करूँगा। बंदा तो मजदूरी की तलाश में है ही।’ ‘तो मेरा यह हंडा ले चलो। इसमें घी है। घी बिखर न जाए! तुम इसे मेरे घर तक पहुँचा दोगे तो मैं तुम्हें एक अधन्ना दूँगा।’

‘सिर्फ एक अधन्ना!’ चिल्ली ने पूछा। ‘हाँ,’ सेठ ने उत्तर दिया। ‘लाओ सेठजी, मैं ही लिए चलता हूँ। पहली बार मजदूरी कर रहा हूँ, दो पैसे कम ही सही।’ शेखचिल्ली ने कहा। और उसने सेठ का घी से भरा हुआ वह बड़ा बर्तन अपने सिर पर रख लिया। सिर पर घी का बर्तन रखकर शेखचिल्ली उस सेठ के साथ चल दिया।

चलते-चलते शेखचिल्ली सोचने लगा, यह सेठ मुझे दो पैसे देगा। दो पैसे यानी आधा आना। आधा आना यानी कि दो पैसे।

उनमें एक मुर्गी और एक मुर्गे का चूज़ा खरीदा जा सकता है। वे चूज़े बड़े होंगे। एक बड़ी मुर्गी और मुर्गा। मुर्गी अंडे देगी। वह रोज अंडे देगी। खूब चूज़े बनेंगे। कुछ दिनों में बहुत-सी मुर्गियाँ हो जाएँगी। ढेरों मुर्गियाँ हो जाएँगी तो वे और अंडे दिया करेंगी। अंडे बेचने से मुझे बहुत आमदनी होगी।

फिर तो पैसों की कमी ही नहीं रहेगी। अपने लिए एक शानदार घर बनाऊँगा। बहुत-सी जमीन खरीदूँगा। भैंसे खरीदकर डेरी बनाऊँगा। दूध बेचूँगा। दूध और अंडों का थोक व्यापारी बन जाऊँगा तो पूरे इलाके में मेरी धाक जम जाएगी। सब लोग मेरा माल पसंद करेंगे और खरीदेंगे। व्यापार चल निकलेगा।

शेखचिल्ली की ख्याली जलेबी

एक बार एक बुढ़िया किसी गाड़ी से टकरा गई। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। लोगों की भीड़ ने उसे घेर लिया। कोई बेहोश बुढ़िया की हवा करने लगा तो कोई सिर सहलाने लगा।

गाड़ीवाला टक्कर मारते ही भाग गया था। वहीं शेखचिल्ली जनाब भी खड़े थे। एक आदमी बोला, ‘जल्दी से बुढ़िया को अस्पताल ले चलो’ दूसरे ने कहा, ‘हाँ, ताँगा लाओ और इसे अस्पताल पहुँचाओ।’ ‘हमें इसे यहीं पर होश में लाना चाहिए। भई, कोई तो पानी ले लाओ।’ तीसरा बोला। ‘पानी के छींटे देने पर यह होश में आ जाएगी।’

‘हाँ, हमें इसकी जिंदगी बचानी चाहिए।’ ‘लेकिन यह तो होश में नहीं आ रही। इसे अस्पताल ही ले चलो। वहीं होश में आएगी।’ वहीं खड़ा शेखचिल्ली बोला, ‘इसे होश में लाने का तरीका तो मैं बता सकता हूँ।’ ‘बताओ भाई?’, लोग बोले।

‘इसके लिए गर्म-गर्म जलेबियाँ लाओ। जलेबियों की खुशबू इसे सुँघाओ और फिर इसके मुँह में डाल दो। जलेबियाँ इसे बड़ा फायदा करेंगी।’ शेखचिल्ली ने बताया। शेखचिल्ली की बात बुढ़िया के कानों में पड़ गई।

वह बेहोशी का बहाना किए पड़ी थी। शेखचिल्ली की बात सुनते ही वह बोल उठी, ‘अरे भाइयों, इसकी भी तो सुनो! देखो यह लड़का क्या कह रहा है।’ लोग चौंक पड़े। उन्होंने बुढ़िया को बुरा-भला कहा और चल दिए। बहानेबाज बुढ़िया भी चुपचाप उठकर जाने को मजबूर हो गई।

शेखचिल्ली और खुरपा


एक बार घरवालों ने शेखचिल्ली को घास खोदने के लिए जंगल भेज दिया। दोपहर तक उसने एक गट्ठर घास खोद ली और गट्ठर उठाकर घर चला आया। घरवाले बड़े खुश हुए। पहली बार शेखचिल्ली ने कोई काम किया था।

परंतु जब कई घंटे बीच गए तब शेखचिल्ली को याद आया कि घास खोदने के लिए जिस खुरपे को वह ले गया था, वह तो वहीं रह गया है, जहाँ उसने घास खोदी थी।

तेज धूप में पड़ा-पड़ा खुरपा गर्म हो गया था। चिल्ली ने चिलचिलाती धूप में पड़ा हुआ अपना गर्म तवे-सा तपता खुरपा मूठ से पकड़ा लेकिन मूठ भी गर्म हो चुकी थी। शेखचिल्ली घबरा गया।
‘अरे! खुरपे को तो बुखार चढ़ गया है।’ मन-ही-मन चिल्ली मुस्कुराता हुआ हकीम साहब के पास पहुंचा और बोला, ‘हकीम साहब, हमारे खुरपे को बुखार हो गया है। जरा दवाई दे दीजिए।’ हकीम साहब समझ गए कि शेखचिल्ली शरारत कर रहा है।

उन्होंने वैसा ही उत्तर दिया, ‘अरे हाँ, वाकई इसे तो बुखार है। जाओ जल्दी से इसे रस्सी से बाँधकर कुएँ में लटकाकर डुबकी लगवा दो। तब भी बुखार न उतरे तो इसे मेरे पास ले आना।’ शेखचिल्ली चला गया।

शेखचिल्ली ने रस्सी ने खुरपा बाँधा और उसे कुएँ में लटकाकर खूब गोते लगवाया। थोड़ी देर बाद उसने उसे ऊपर खींचा। खुरपा ठंडा हो चुका था। चिल्ली ने हकीम साहब को धन्यवाद दिया।

संयोगवश एक दिन हकीम साहब के दूर की एक रिश्तेदार को तेज बुखार हो गया था। वह बूढ़ी उन्हीं से अक्सर दवाई लेने आती थी। वह शेखचिल्ली के पड़ोस में रहती थी।

चिल्ली ने देखा कि तेज बुखार से तपती हुई उस सत्तर वर्ष की बुढ़िया को लोग हकीम साहब के पास ले जाना चाहते हैं।

शेखचिल्ली को शरारत सूझी। उसने हकीम साहब को बताया हुआ नुस्खा उन्हें बताते हुए कहा कि, ‘हकीम साहब जो वहाँ बताएँगे, मैं यहीं बताए देता हूँ। दादीजान को तेज बुखार है। यह गरम खुरपे-सी तप रही है। इसका सबसे अच्छा इलाज यह है कि इन्हें किसी कुएँ या तालाब में खूब अच्छी तरह डुबकी लगवाओ। बुखार नाम की चीज सदा के लिए दूर हो जाएगी। यह तरकीब मुझे हकीम साहब ने खुद बताई थी।’

लोगों ने शेखचिल्ली की बात मान ली और बुढ़िया को एक पीढ़े पर बैठाकर रस्सियों से बाँधकर कुएँ में लटका दिया। कुएँ के पानी में बुढ़िया को खूब डुबकियाँ लगवाई गईं। कई डुबकियाँ लगवाने के बाद जब बुढ़िया को बाहर निकाला गया तो वह ठंडी पड़ चुकी थी।

उसके प्राण-पखेरू उड़ गए थे। लोग शेखचिल्ली पर बिगड़ उठे। बुढ़िया के घरवालों ने गुस्से में कहा, ‘तुमने तो दादीजान को मार ही दिया।’ शेखचिल्ली बोला, ‘मियाँ, मैंने केवल बुखार की गारंटी ली थी। अच्छी तरह देख लो, बुखार उतर गया है या नहीं।’

हकीम साहब का नुस्खा गलत नहीं है। यह उन्हीं की बताई हुई तरकीब है। खुद जाकर पूछ लो। तरकीब गलत होती तो इस बुढ़िया का बुखार न उतरता।’ लोग हकीम साहब के पास गए। हकीम साहब से पूछा गया तो उन्होंने चिल्ली के खुरपे के बुखार वाली बात बताते हुए कहा कि उन्होंने गर्म खुरपे को ठंडा करने के लिए चिल्ली को तरकीब बताई थी। बुढ़िया को बुखार था। उसे पानी में नहीं डुबाना चाहिए था। वह इंसान थी, खुरपा नहीं। शेखचिल्ली पर इस घटना के कारण घरवालों की बहुत डाँट पड़ी।

(शेखचिल्ली के बारे में:
भारत में शेखचिल्ली के किस्से मशहूर हैं। हमारे लिए यह एक जाना-पहचाना पात्र है। शेखचिल्ली के साथ घटी घटनाओं में रोचकता, गहराई और मानव स्वभाव की सहज अभिव्यक्ति मिलती है जो वर्षों से हम सबका मन मोहती चली आ रही है। शेखचिल्ली एक आम आदमी है जो हम सब में कहीं न कहीं मौजूद है।)

शेखचिल्ली और कुत्ते

जनाब शेखचिल्ली दुनिया में सिर्फ दो चीजों से डरते थे. घर में अपनी बीवी से और बाहर कुत्तों से. सो वह घर में बीवी और बाहर कुत्तों से ज़रा बचकर ही रहते. क्योंकि उन्होंने भी सुन रखा था कि भौंकने वाले कुत्ते काटते नहीं, लेकिन इस अफवाह पर उन्हें यकीन नहीं था. उन्हें यह भी लगता था कि क्या पता इस अफवाह से कुत्ते वाकिफ भी हैं या नहीं सो वह ऐसा ख़तरा उठाने की कभी सोचते भी नहीं थे. 

गाँव के कुत्तों को भी उनमें कोई रूचि नहीं रह गई थी. उनकी कद-काठी, पहनावा और शक्ल कुत्तों को ज़रा भी पसंद नहीं थी. शेख़ चिल्ली दुबले-पतले और नाटे तो थे ही उनका चश्मा अजीब ढंग से उनकी नाक पर टिका रहता था.  

एक दिन की बात शेख़ चिल्ली अपने चचा जान से मिलने के लिए बगल के गाँव में जा रहे थे. उस गाँव के अजनबी कुत्तों ने ऎसी अजीब शक्ल-सूरत वाला इंसान पहले कभी नहीं देखा था. आज जब पहले-पहल उन्हें ऐसा मौक़ा नसीब हुआ तो वे जोर-जोर से भौंकने लगे. वे इस अजीब इंसान का पीछा छोड़ने को तैयार न थे. जहां भी शेख़ चिल्ली जाते कुत्ते भी पीछे-पीछे भौंकते हुए लगे रहते.

शेख़ चिल्ली ने कुत्तों को पीछा करते देख अपनी चाल बढ़ा दी. लेकिन वह जितना तेज चलते कुत्ते उतनी ही जोर से भौंकते. 

आखिरकार शेख़ चिल्ली के सब्र का बाँध टूट गया. उन्हें लगा कि ये बदमाश कुत्ते ऐसे नहीं मानने वाले, कुछ करना ही पड़ेगा. उन्होंने किसी हथियार की तलाश में इधर-उधर नजर फिराई. बगल में ही एक ईंट पड़ी थी. वह झुक कर उसे उठाने लगे. लेकिन ईंट हिल भी नहीं रही थी, वह तो जमीन में गड़ी थी. पूरी ताकत लगा देने के बाद भी शेख़ चिल्ली उसे उठाने में कामयाब नहीं हुए. वे नाराज़ हो गए और गुस्से से भरकर गाँव वालों को गालियाँ देने लगे.

एक गाँव वाला उधर से गुजर रहा था. उसने शेख़ चिल्ली से उनकी नाराजगी का सबब पूछा.

" बड़ा अजीब गाँव है तुम्हारा." शेख़ चिल्ली गुस्से में ही चिल्लाए, " यह भी कोई तरीका है. तुम लोग कुत्तों को खुला रखते हो और ईंटों को बांध कर."

19 जून 2011

शेखचिल्ली की नौकरी

शेखचिल्ली अब एक अमीर के यहाँ नौकर हो गया। उसने उसे ऊँट चराने के काम पर लगा दिया। वह हर रोज ऊंटों को जंगल में ले जाता और शाम को चराकर वापिस ले आता। एक दिन वह एक पेड़ के नीचे पड़कर सो गया तो ऊंटों को रस्सी पकड़कर कोई ले गया। अब वह जब जागा तो बहुत घबडाया। शेखचिल्ली ने प्रतिज्ञ की कि अब अमीर के घर नहीं जाऊंगा। ऊंटों की तलाश करके ही जाऊंगा। अब जंगल में इधर-उधर घूमने लगा। उसको ऊंटों का नाम न आता था। इतने में उस अमीर के गाँव के कुछ आदमी सामने आते दिखाई दिए। उसने ऊंटों की लीद दिखाकर कहा कि जिनके हम है (नौकर) उनसे कह देना कि जिनकी यह (लीद) है जाते रहे।

शेखचिल्ली था तो मूर्ख ही और आप भी जानते हैं कि मूर्खों को गुस्सा बहुत जल्दी आता है। एक दिन शेखचिल्ली रास्ते में जा रहा था। लड़कों ने अपनी आदत के मुताबिक़ उसे तंग करना आरम्भ किया। एक कहता महामूर्ख दूसरा कहता जिंदाबाद! मगर लड़के बहुत चालाक थे। वह घरों में घुस जाते और शेखचिल्ली गली में ही टापता रहता। एक दिन संयोग से क्या हुआ कि छोरा सा लड़का शेखचिल्ली के हाथ आ गया। फिर क्या था वह मूर्ख तो था ही, उसने लड़के को उठाया और धडाम ससे कुँए में फेंक दिया। अपनी बीवी से जाकर बोला कि लड़के को कुँए में फेंक आया हूँ। उसकी औरत का माथा ठनका। वह बोली अच्छी बात है। शेखचिल्ली जब सो गया तो उस बेचारी ने लड़के को कुँए से निकाला। मगर मारे ठण्ड के लड़के का बुरा हाल हो रहा था। उसका भाई गली में ही रहता था। वह लड़के को वहां ले गई। सारा हाल कह सुनाया और बोली भैया लड़के को तुम अपने पास रखो। जब उसे आराम हो जाए फिर उसको घर पहुंचा देना। शेखचिल्ली के साले ने कहा बहन, जब उसके माँ-बाप उसकी खोज में आएँगे तो फिर क्या किया जाएगा? शेखचिल्ली की स्त्री बोली-अगर लड़के को इस परिस्थिति में उनके सुपुर्द किया गया तो वह बला आएगी कि हम व्यर्थ में मारे जाएंगे। इसलिए आराम होने तक अपने पास रखो। अगर इसके माँ-बाप ढूँढने कल इए आवेंगे तो उनको मैं समझा लूंगी इतना कहकर वह अपने घर आई और एक बकरी के बच्चे को उठा कर कुँए में फेंक आया। जिस कुँए में लड़के को फेंका था।

दूसरे दिन प्रातः काल खोए हुए लड़के के माता-पिता उसकी तलाश में निकट वाली गली में से उस गली में आए, जिसमें शेखचिल्ली रहता था। वह अचानक अपने घर के सामने टहल रहा था लड़के के पिता ने उससे पूछा कि तुमने हमारा लड़का तो नहीं देखा?

शेखचिल्ली ने उत्तर दिया-श्रीमान उस पाजी ने मुझे छेड़ा था मैं कल शाम उसे कुँए में फेंक दिया।

लड़के के पिता ने पूछा किस कुँए में ।
शेखचिल्ली ने कहा-उस सामने वाले कुँए में।
लड़के के माता-पिता ने कुँए में एक आदमी को उतारा उस आदमी ने कुँए से आवाज डी, सरकार लड़का वादका तो यहाँ कोई नहीं है। हाँ एक बकरी का बच्चा तो अवश्य है। यह कहकर उसने रस्सी के साथ बकरे का बच्चा देखकर बहुत हैरान हुए। लड़के के माता-पिता उदास होकर शहर के दूसरे भागों में लड़के को तलाश करने लगे। इतने में लड़का स्वस्थ हो गया और उसे शेखचिल्ली के साले ने उसके घर के सामने ले जाकर छोड़ दिया।

यह सब कुछ हो गया। मगर शेखचिल्ली बेचारा कई दिन तक सोचता रहा कि लड़के से बकरी का बच्चा किस tअरह बन गया।

एक दिन की बात है कि शेखचिल्ली एक अमीर आदमी के यहाँ सीस का काम करता था। एक दिन जब कि मालिक गाडी पर सवार होकर बाजार जा रहा था और शेखचिल्ली उसके पीछे बैठा हुआ था तो मालिक का रेशमी रूमाल हवा में गिर गाया। मालिक ने रूमाल को न देखा, परन्तु उसने देख लिया। लेकिन उसको उठाया नहीं इत्तफाक से मालिक रास्ते में एक दुकार के पास जाकर ठहरा। जब रूमाल की जरूरत महसूस हुई तो कहा मेरा रूमाल कहाँ है? शेखचिल्ली ने फ़ौरन कहा हुजूर! आपका रूमाल फलां बाजार में गिर गया था।

इस पर मालिक ने डपट कर कहा बेवकूफ तुमने उठाया क्यों नहीं? उसने हाथ जोड़ कर कहा-हुजूर का हुक्म न था। मालिक ने गुस्से से दोबारा देखते हुए कहा-जब कोई चीज हमारी या गाडी वगैरह की गिरे उए फ़ौरन उठा लिया करो। उसने हाथ जोड़कर अर्ज दिया, बेहतर हुजूर! आइन्दा ऐसा ही होगा। दूसरे दिन जब मालिक सैर करने अपने घर जा रहा था तो घोड़े ने लीद दी। उसने फ़ौरन उतर कर लीद को कपडे में बाँध लिया और अपने पास इत्मिनान से रखा। वापसी में मालिक के साथ एक और साहब भी घर आए और मतलब की बातें करने लगे। अब शेखचिल्ली ने अपनी ईमानदारी का सबूत देने के लिये वही लीद, कपडे में बंधी हुई, मालिक के सामने पेश कर दी और अदब से कहा हजूर की आज्ञा से घोड़े की गिरी हुई चीज को उठा लिया था। मालिक के दोस्त ने मेज पर पडी हुई गठरी को खोलता देखकर बोलना बंद कर दिया और बाद में चीज देखने पर खिलखिलाकर हंसा। मालिक को ऐसी बुरी स्थिति पर बड़ा क्रोध आया। शेखचिल्ली ने मालिक की लाल आँखे देखकर कदम पीछे हटा लिया और जल्दी से यह कहता हुआ बाहर चला गया श्रीमान की आज्ञा थी। अच्छा अब मैं घोड़े को पानी पिला आऊँ- इसके बाद वह घोड़े को नदी पर ले गया किनारे पर खडा होकर सोचने लगा- यहाँ पानी थोड़ा है, साथ ही कीचड वाला है। आगे चलकर पानी पिलाना चाहिए, यह सोचकर घोड़े को आगे ले गया। नदी के बीच में चूंकि पानी बहुत गहरा था, अतः घोड़े की रस्सी छोड़ दी और अपनी जान बचा कर बाहर भाग आया। उसका विचार था कि घोड़ा इसी तरफ आ जाएगा। मगर जब घोड़े को गोते खाते और दूसरी तरफ बहते देखा तो शोर मचाने लगा। घोड़ा भाग गया! घोड़ा भाग गया।

इसी तरह चिल्लाता हुआ मकान पर आ गया और मालिक को हांफता हुआ हाल सुनाने लगा। मालिक ने उसकी बात पर विश्वास करके अपनी तलवार उठा ली जो वह शाम को अपने पास रखता था। शेखचिल्ली को साथ में लेकर वह नदी पर गया। उसका ख़याल था कि घोड़ा असली है और उसी स्थान पर ठहर गया होगा मगर जब शेखचिल्ली अपने मालिक के साथ नदी पर पहुंचा तो मालिक से कहा- आपको अब तलवार संभालने की आवश्यकता नहीं है, मुझे दे दीजिये। व्यर्थ में आप को कष्ट होगा।

मालिक उसकी चिकनी-चपड़ी बातों में आ गया। शेखचिल्ली को तलवार पकड़ा दी। किनारे पर पहुँच कर शेखचिल्ली ने मालिक का उस तरफ रूख करके बताया, जिधर पाने गहरा था और घोड़ा गर्क हुआ था। कहा- श्रीमान यहाँ से घोड़ा भाग गया था। चिन्ह बताने के लिये कोई कंकर नहीं उठाया। बल्कि जोश में तलवार ही को उस निशाँ पर फेंक दिया। मालिक इस मूर्खता की हद को देखकर सहन न कर सका। मालिक ने शेखचिल्ली के गाल पर दो तमाचे रसीद दिए और कहा-हरामजादे घोड़ा गर्क करके कहता है भाग गया। फिर बतलाने के लिये तलवार को भी फेंक दिया।

शेखचिल्ली की खिचडी

एक दिन शेख्चिल्ले बीमार हो गया। हकीम साहिब रहते थे शहर में। शेखचिल्ली के गाँव से दो मील के फासले पर, जब शेखचिल्ली उनके पास पहुंचा तो उन्होंने बताया यह चार पुडिया सौंफ के अर्क के साथ खाओ।

शेखचिल्ली बोला श्रीमान खाऊँ क्या? हकीम साहिब बोले खिचडी। अब शेखचिल्ली जिसने अभी तक खिचडी न खाई थी उस विचार से कि खिचडी शब्द भूल न जाऊं, जबान से खिचडी-२ कहता हुआ घर को चला। लेकिन था गंवार ही खिचडी शब्द भूल गया और खाचिडी-२ अपने आप उसके मुंह से निकलने लगा। रास्ते में एक स्थान पर एक जात अपने खेत की रक्षा कर रहा हटा। उसने जिस समय शेखचिल्ली को खाचिडी-२ कहते हुए सुना तो मार-मार कर उसका भूसा बना दिया और कहने लगा अब खाचिडी न कहना, दूर रहो, समीप मत आओ। उसने दूर रहो समीप मत आओ कहना आरम्भ कर दिया। थोड़ी दूर गया होगा कि वहां चिदीमार जाल फैलाए बैठे थे। उन्होंने भी खूब मरम्मत की और बोले कि अब तुम आते जाते और फंसते जाओ कहना। शेखचिल्ली ने आते जाओ और फंसे जाओ कहना आरम्भ कर दिया। सामने से बहुत से चोर आ रहे थे। उन्होंने शेख्चिल्लीए के यह शब्द सुने तो मारे गुस्से के उनका बुरा हाल हो गया। उन्होंने शेखचिल्ली को इतना पीटा कि अधमरा कर छोड़ दिया. वहां से रिहाई हुई तो शेखचिल्ली थक कर चूर हो गया था। उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि हे खुदा! कोई सवारी भेज, इतने में पीछे से एक सवार आता दिखाई दिया और बोला- 'ए ओर जानवर!' मेरी घोडी की बछेडी कंधे पर उठा लो।

शेखचिल्ली ने बछेडी कंधे पर उठा ली और बोला-वाह मेरे ईश्वर! इतने वर्ष खुदाई करते हो गए हैं और अभी नीचे ऊपर के अंतर का पता नहीं। मैंने घोडी माँगी थी नीचे को, आपने दे दी ऊपर को।

व्यापारी शेखचिल्ली

एक दिन शेखचिल्ली की माँ ने कहा-बेटा! ऐसे कब तक काम चलेगा। तुम्हें कुछ कारोबार करना चाहिए। ऐसा कहकर उसने खद्दर का थान बाजार से लाकर शेखचिल्ली को देकर कहा-बेटा! इस थान को लेजाकर बाजार में बेच आओ।

शेखचिल्ली ने पूछा-माँ इस थान को किस भाव से बाजार में बेचूंगा? मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं है।

माँ ने कहा-बेटा! इसमें जानने की कोई ख़ास बात नहीं। दो पैसे ऊंचे रखकर बेच देना।

नादाँ शेखचिल्ली थान लेकर बाजार में एक तरफ बैठ गया।

एक ग्राहक शेखचिल्ली के पास आया और पूछने लगा क्यों भाई? इस थान का क्या दाम है?

शेखचिल्ली को माँ की बात का ख़याल आ गया?

उसने कह दिया- इसमने दाम दर की क्या बात है भाई! दो पैसे ऊपर-दो पैसे नीचे रखकर ले लो।

ग्राहक ने देखा कि महा मूर्ख से पाला पडा है, इसलिए उसने अपनी जेब से चार पैसे निकाल कर दो पैसे तो थान के ऊपर रख दिए और दो पैसे थान के नीचे रख दिए।

शेखचिल्ली ने थान को उस ग्राहक के हवाले किया और आप वही चार पैसे उठाकर घर को चल दिए।

वह रास्ते में चला जाता था। उसी वक्त उसे एक व्यक्ति मिला जो कि तरबूज बेच रहा था शेख्चिल्ले ने बड़े-बड़े फल देखे तो पूछने लगा-क्यों भाई यह क्या चीज है?

उस आदमी ने उसकी शक्ल देखकर ही समझ लिया कि यह कोई महामूर्ख है। उसने कहा-भाई! यह हाथी का अंडा है।

शेख्चिली यह सुनकर मन ही मन बड़ा खुश हुआ और कहने लगा भाई इसका दाम क्या है?

उस आदमी ने खा-यह बहुत सस्ता है। इसका दाम दो पैसे है।

उन दिनों तरबूज एक-एक पैसे के बिकते थे। शेखचिल्ली ने दो पैसे देकर वह तरबूज मोल ले लिया और मन में यह सोचता हुआ खुश होकर चला कि चलो दो पैसे में ही हाथी का अंडा हाथ आ गया। अब घर चलकर इस अंडे की सेवा करूंगा। इसमें से हाथी का बच्चा मिकलेगा तो उसकी सेवा करूंगा। वह बड़ा होगा तो उसे बेचकर बहुत रूपये कमाऊँगा।

शेखचिल्ली चलता जा रहा था। तब तक उसे टट्टी लगी। वह तरबूज को लिये एक खेत में घुस गया। एक जगह उसने तरबूज को रख दिया और आप टट्टी करने बैठ गया।

इतने में एक गिलहरी तरबूज के पास से निकल गई।

शेखचिल्ली ने उसे देखकर सोचा कि यह तो हाथी का ही बच्चा मालूम होता है। वह उठकर उसकी ओर दौड़ा, मगर गिलहरी भला कब हाथ आने वाली थी वह लपक-लपक एक ओर निकल गई।

शेखचिल्ली हाथ मलता हुआ घर की ओर लौट पडा।
घर की ओर लौटते हुए उसे रास्ते में ही बड़ी भोख लगी तो एक नानवाई की दुकान से उसने दो पैसे की रोटियाँ और सब्जी ली, तथा खाने लगा। ज्योंही उसने एक ग्रास मुंह में डाला था कि एक कुतिया दम हिलाती हुए सामने आ खडी हुई। उसने समझा कुतिया भूखी है इसलिए सारा खाना उसके सामने डाल दिया।

कुतिया ने देखते-देखते सब कुछ चाट कर लिया तो वह घर कि ओर चल पडा।

घर आपने पर उसने देखा उसकी माँ घर पर नहीं है। वह भीतर गया और अपनी औरत से सारा हाल सुनाने लगा।

उसकी औरत ने जब सब हाल सुन लिया तो गुस्सा होकर कहने लगी लानत है तुम पर जो तुमने हाथी का बच्चा खो दिया। अगर वह आज घर में होता तो मैं उस पर किस शान से सवारी करती।

इतना सुनना था कि शेखचिल्ली ने खाना छोड़कर अपनी औरत को मारना शुरू कर दिया। उसने कहा हरामजादी! हाथी का बच्चा इतना छोटा और तू भैंस जैसी औरत! अगर तू उस पर सवारी करती, तो वह बच्चा मर नहीं जाता?

अभी यह सब झमेले हो ही रहे थे कि शेखचिल्ली की माँ लौटकर घर आ गई। उसने जब अपनी पतोहू के रोने की आवाज सुनी तो ऊपर आकर पूछा-क्यों बेटा। यह सब क्या तमाशा है?

इस पर शेखचिल्ली ने थान को बेचने से लेकर हाथी का अंडा खरीदने तक की कुल बातें अपनी माँ को सुना डी।

शेखचिल्ली की माँ ने यह सब हवाला सुना तो मरे गुस्से से आग-बबूला हो गयी। उसने शेख्चिल्ल्ली को बहुत भला-बुरा कहा। फिर खाने लगी बेईमान! तुझे मैंने अपनी कुल जमा पूंजी बेचकर खद्दर का थान दिया था। तू जा और जब तक थान लेकर वापस नहीं आएगा मैं तुझे घर में घुसाने नहीं दूंगी। यह कहते हुए उसने शेखचिल्ली को खूब पीटा और उसे बाहर भगा दिया।

शेख्चिल्ले वहां से चल पड़ा। चलते-चलते उसी दुकान के पास उसने उस कुतिया को देखा, जिसे उसने रोटी खिलाई थी। बस फिर क्या था? शेखचिल्ली लगा उसे मारने। उसको खूम मार पडी थी, इसलिए उसने सारा गुस्सा उस कुतिया पर निकालना शुरू कर दिया कुतिया एक तरफ को भाग चली।

उसे पिटते हुए शेखचिल्ली भी उसके साथ ही साथ दौड़ने लगा। दौड़ते-भागते आखिर उसकी मार से बचने के लिये कुतिया एक मकान में घुस गई।

शेखचिल्ली भी उसके साथ ही उस मकान के अंदर घुस गया।

उस वक्त उस मकान की मालकिन अपना बाक्स खोल कर श्रृंगार करने बैठी थी बस उसी समय किसी काम से पडौस में चली गई थी। मगर बास्क को बंद करना भूल गई थी। कुतिया जब कमरे में घुसी तो शेखचिल्ली ने खुला हुआ संदूक देखा। उसके अंदर बहुत से जेवरात और रूपये रखे हुए थे। उन्हें देखकर उसने अपने कंधे पर से अंगोछा उतारा और बाक्स में रखे तमाम जेवरात तथा रूपये उसमें बाँध लिये और आसानी से बाहर निकल आया।

घर आकर उसने अपनी माँ को वह सारा सामान दे दिया। उसकी माँ इतनी ज्यादा दौलत देखकर बहुत खुश हुई। शेखचिल्ली ने उस दौलत के मिलने का सारा हाल बयान कर दिया।

उसकी माँ ने सब जेवरात मकान के अंगार में जमीन में गाड़ दिए।

मगर उसी वक्त उसे यह ख़याल आया कि शेखचिल्ली तो बेवकूफ है। कहीं अगर किसी की बातों में आकर कुछ किसी से कह दिया तो आफत होगी।

यह सोचकर उसने बाजार से एक आदमी भेजकर रूपये की धान की खोल और कुछ मिठाइयां मंगवाई और रात के वक्त जब शेखचिल्ली सो गया तो उन्हें आँगन में बिखेर दिया।

फिर बहुत सुबह उसने शेखचिल्ली को जगाकर कहा उठ बेटा! देख! आज हमारे आँगन में धान की खोल और मिठाइयों की बारिश हुई है।

शेखचिल्ली ने यह सुना तो दौड़कर चाट आँगन में आ गया और धान की खोल और मिठाई के टुकड़ों को बीन बीन कर खाने लगा।

जिस आदमी के मकान में चोरी हुई थी, उन्होंने शहर के कोतवाल को रिपोर्ट लिखा दी। तहकीकात होने लगी। जब वे ढूंढते हुए शेखचिल्ली के मकान पर आए तो शेखचिल्ली मकान के सामने खडा था।

शहर के कोतवाल ने उससे पूछा-तुम जानते हो यह चोरी किसने की है।

शेखचिल्ली ने छूटते ही कहा-यह चोरी तो मैंने ही की थी। तब शहर कोतवाल ने पूछा-दौलत कहाँ है?

शेखचिल्ली ने कहा- वह तो मेरी माँ ने आँगन में उसी दिन गाध दिया था, जिस रात की सुबह हमारे आँगन में धान की खील और मिठाइयों की बारिश हुई थी।

यह सुनकर शहर कोतवाल बहुत हंसा। उसने सोचा भला ऐसा भी कहीं हुआ है कि किसी के आँगन में धान की खील और मिठाइयों की बारिश हो।

वह समझा- यह कोई पागल आदमी है और वह सिपाहियों के साथ चला गया।

इस प्रकार शेखचिल्ली की माँ की जान बच गई। कुछ दिनों तक उसी धन से अपना घर चलाती रही।

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