10 अप्रैल 2010

रामायण – अरण्यकाण्ड - अकम्पन रावण के पास

खर के एक सैनिक अकम्पन ने रावण के दरबार में जाकर खर की सेना के नष्ट हो जाने की सूचना दी। वह हाथ जोड़ कर बोला, "हे लंकापति! दण्डकारण्य में रहने वाले आपके भाई खर और दूषण अपने चौदह सहस्त्र सैनिकों सहित युद्ध में मारे गये। मैं बड़ी कठिनता से बच कर आपको सूचना देने के लिये आया हूँ।" यह सुन कर रावण को बड़ा दुःख हुआ साथ ही भारी क्रोध भी आया। उन्होंने कहा, "मेरे भाइयों को सेना सहित मार डालने वाला कौन है? मैं अभी उसे नष्ट कर दूँगा। तुम मुझे पूरा वतान्त सुनाओ।"

रावण की आज्ञा पाकर अकम्पन ने कहा, "प्रभो! यह सब अयोध्या के राजकुमार राम ने किया है। उसने अकेले ही सब राक्षस वीरों को मृत्यु के घाट उतार दिया।" रावण ने आश्चर्य से पूछा, " क्या राम ने देवताओं से सहायता प्राप्त कर के खर को मारा है?" अकम्पन ने उत्तर दिया, "नहीं प्रभो! ऐसा उसने अकेले ही किया है। वास्तव में राम तेजस्वी, बलवान और युद्ध विशारद योद्धा है। मैंने राम को अपनी आँखों से राक्षस सेना का विनाश करते देखा है। जिस खर की एक गर्जना से सारे देवता काँप जाते थे, उस रणबाँकुरे को उनकी शक्तिशाली सेना सहित उसने आनन-फानन में समाप्त कर दिया। उसका रणकौशल देख कर मुझे ऐसा आभास होता है कि आप अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ युद्ध करके भी उसे परास्त नहीं कर सकेंगे। उस पर विजय पाने का मेरी दृष्टि में एक ही उपाय है। उसके साथ उसकी पत्नी है जो अत्यन्त रूपवती, लावण्यमयी और सुकुमारी है। राम उससे बहुत प्रेम करता है। इसलिये वह उसे अपने साथ वन में लिये फिरता है। तात्पर्य यह है कि वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। मेरा विश्वास है, यदि आप किसी प्रकार उसका अपहरण कर के ले आयें तो राम उसके वियोग में घुल-घुल कर मर जायेगा। और यह समस्या अपने आप ही सुलझ जायेगी। आपको समरभूमि में व्यर्थ का रक्तपात भी नहीं करना पड़ेगा।"

लंकापति रावण को अकम्पन का यह प्रस्ताव सर्वथा उचित प्रतीत हुआ। उसने इस विषय में अधिक सोच विचार करना या अपने मन्त्रियों से परामर्श करना भी उचित नहीं समझा। वह तत्काल अपने दिव्य रथ पर सवार हो आकाश मार्ग से उड़ता हुआ सागर पार कर के मारीच के पास पहुँचा। मारीच रावण का परम मित्र था। सहसा अपने घनिष्ठ मित्र को अपने सम्मुख पाकर मारीच बोले, "हे लंकेश! आज अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के आपके यहाँ आने का क्या कारण है? आप जो इतनी हड़बड़ी में आये हैं, उससे मेरे मन में नाना प्रकार की शंकाएँ उठ रही हैं। लंका में सब कुशल तो है? परिवार के सब सदस्य आनन्द से तो हैं? अपने आने का कारण शीघ्र बता कर मेरी शंका को दूर कीजिये। मेरे मन में अनेक अशुभ आशंकाएँ उठ रही हैं।"

मारीच के वचनों को सुन कर रावण ने कहा, "यहाँ आने का कारण तो विशेष ही है। अयोध्या के राजकुमार राम ने मेरे भाई खर और दूषण को उनकी सेना सहित मार कर अरण्य वन के मेरे जनस्थान को उजाड़ दिया है। इसी से दुःखी हो कर मैं तुम्हारी सहायता लेने के लिये आया हूँ। मैं चाहता हूँ कि राम की पत्नी का अपहरण कर के मैं लंका ले जाऊँ। इसमें मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। सीता के वियोग में राम बिना युद्ध किये ही तड़प-तड़प कर मर जायेगा और इस प्रकार मेरा प्रतिशोध पूरा हो जायेगा।"

रावण के वचन सुन कर मारीच बोला, "हे रावण! तुम्हारा यह विचार सर्वथा अनुचित है। जिसने तुम्हें सीताहरण का सुझाव दिया है वह वास्तव में तुम्हारा मित्र नहीं शत्रु है। तुम राम से किसी प्रकार भी जीत नहीं सकोगे। राम के होते हुये तुम उससे सीता को नहीं छीन सकोगे। उसके अदभुत पराक्रम के सम्मुख तुम एक क्षण भी नहीं ठहर सकोगे। तुम्हारा हित इसी में है कि तुम इस विचार का परित्याग कर चुपचाप लंका में जा कर बैठ जाओ।" मारीच के उत्तर से निराश हो रावण लंका लौट आया।

रामायण – अरण्यकाण्ड - रावण को शूर्पणखा का धिक्कार

रावण के मारीच के पास से लंका लौटने के कुछ काल पश्चात् शूर्पणखा वहाँ आ पहिँची। उसने देखा, रावण चारों ओर से मन्त्रियों से घिरा हुआ स्वर्ण के सिंहासन पर बैठा ऐसी शोभा पार रहा था जैसे स्वर्ण की वेदी में घी प्रज्वलित अग्नि। जिसने समुद्रों तथा पर्वतों पर विजय प्राप्त की है, नागराज वासुकि को परास्त कर तक्षक की प्रिय पत्नी का हरण किया है, कुबेर को जीत कर उससे पुष्पक विमान छीना है, इन्द्रादि देवता जिससे भयभीत रहते हैं, वायु देवता जिस पर पंखा डुलाते हैं, वरुण जिसके यहाँ पानी भरता है और जो मृत्यु को भी परास्त करने की सामर्थ्य रखता है, ऐसे परमप्रतापी भाई की बहन होकर मैं नाक-कान कटवा कर अपमान का विष पियूँ, धिक्कार है ऐसी वीरता और पराक्रम पर। यह सोचते हुये उसका सम्पूर्ण शरीर क्रोध और अपमान की ज्वाला ले जलने लगा। वह रावण के पास आ कर क्रोध से फुँफकारती हुई बोली, "धिक्कार है तुम पर, तुम्हारे शौर्य पर और तुम्हारे इन मन्त्रियों पर। तुम संसार से इतने अनजान होकर अपनी विलासिता में डूबे हुये हो कि तुम्हें यह भी पता नहीं कि तुम्हारी ओर तुम्हारा काल बढ़ा चला आ रहा है। हे नीतिवान रावण! क्या मुझे तुमको यह बताने की आवश्यकता है कि समय पर उचित कार्य न करने वाले और अपने देश की रक्षा के प्रति असावधा रहने वाले राजा का राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जिस राजा के गुप्तचर सक्रिय और सतर्क नहीं होते, वह वास्तव में राज्य करने योग्य नहीं होता। क्योंकि गुप्तचर ही उसके नेत्र होते हैं। उनके बिना वह अंधा होता हे। मैं देख रही हूँ कि तुम्हारे गुप्तचर मूर्ख, अयोग्य और आलसी हैं। मन्त्री भी सर्वथा अयोग्य हैं जो उन्हें अभी तक यह पता नहीं कि उनके राज्य दण्डकारण्य में कितनी भयंकर घटना घट चुकी है। चौदह सहस्त्र राक्षसों का मेरे वीर भ्राताओं खर-दूषण सहित संहार हो चुका है। तुम्हारी बहन के नाक-कान एक विदेशी ने काट लिये हैं। परन्तु सुरा और सुन्दरियों में व्यस्त रहने वाले तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियों को इस सबकी क्या चिन्ता है? जो ऋषि-मुनि कल तुम्हारे नाम से थर-थर काँपते थे वे आज सिर उठा कर निर्भय हो घूम रहे हैं। तुम्हें अब भी सोचना चाहिये कि वृक्ष से गिरे हुये पत्ते और राज्य से च्युत राजा का कोई मूल्य नहीं होता। जो राजा आँखों से सोता और नीति से जागता है, जिसका क्रोध प्रलयंकर और प्रसन्नता सुखदायिनी है, प्रजा उसी की पूजा करती है। किन्तु तुम में तो एक भी गुण नहीं है जो तुम राम द्वारा किये गये भीषण हत्याकाण्ड से अभी तक अपरिचित हो।"



शूर्पणखा के कटु वाक्य सुन कर रावण लज्जित होते हुये बोला, "मैं सब जानता हूँ शूर्पणखे! केवल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम राम और लक्ष्मण को मरा हुआ ही समझो। तेरे नाक-कान काटने वाले को अब कोई बचा नहीं सकता। मैंने भली-भाँति विचार कर लिया है कि मुझे क्या करना है। राम मेरे हाथों मारा जायेगा। सीता मेरे महलों की शोभा बढ़ायेगी और तेरी दासी बन कर रहेगी।"

इतना कह कर रावण ने मन्त्रियों को विदा किया और फिर आकाश मार्ग से मारीच के पास पहुँचा। उससे स्नेह दिखाता हुआ बोला, "मित्र मारीच! मित्र ही संकट के समय मित्र की सहायता करता है। मैं जानता हूँ कि मेरे मित्रों और शुभचिन्तकों में तुमसे बढ़ कर बलवान, नीतिवान और मुझसे सच्चा स्नेह करने वाला और कोई नहीं है। मुझे बहन शूर्पणखा की दशा देख कर बहुत दुःख हुआ है। उन दुष्टों ने यह भी नहीं सोचा कि एक स्त्री पर हाथ नहीं उठाना चाहिये। उन कायरों को अवश्य दण्ड देना होगा। यह नाक शूर्पणखा की नहीं, सम्पूर्ण राक्षस जाति की कटी। हमारे नामे से काँपने वाले ऋषि-मुनि आज हमारी कायरता पर हँसते हैं। इस अपमान से तो मर जाना ही अच्छा है। भाई मारीच! उठो और सम्पूर्ण राक्षस जाति की इस अपमान से रक्षा करो। मैं सीता का हरण अवश्य करूँगा। तुम नाना प्रकार के वेश धारण करने में अद्वितीय हो। मैं चाहता हूँ कि तुम चाँदी के बिन्दुओं वाला स्वर्णमृग बन कर राम के आश्रम के सानमे जाओ। तुम्हें देख कर सीता अवश्य राम-लक्ष्मण को तुम्हें पकड़ने के लिये भेजेगी। उन दोनों के चले जाने पर मैं अकेली सीता का अपहरण कर के ले जाउँगा। राम को सीता का वियोग असह्य होगा और विरही राम को मार डालना मेरे लिये कठिन नहीं होगा।"

रावण के प्रस्ताव से अपनी असहमति प्रकट करते हुये मारीच बोला, "हे लंकापति! मैं पहले भी तुमसे कह चुका हूँ कि ऐसा करना तुम्हारे लिये उचित नहीं होगा। यह कार्य तुम्हारे जीवन के लिये काल बन जायेगा। सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि वेद-शास्त्रों के ज्ञाता होते हुये भी तुम परस्त्री हरण जैसा भयंकर पाप करने जा रहे हो। स्मरण रखो, राम के क्रोध से तुम बच नहीं सकोगे।"

मारीच के उत्तर से कुपित हो हाथ में खड्ग ले कर रावण बोला, "मारीच! मैं तुझे अपना मित्र समझ कर तेरे पास आया था। तेरा अनर्गल प्रलाप सुनने के लिये नहीं। तेरी कायरतापूर्ण युक्तियों को सुन कर मैं अपना विचार नहीं बदल सकता। सीता का हरण मुझे अवश्य करना है और तुझे मेरे आज्ञा का पालन करना है। यदि तू मेरी आज्ञा मान कर मेरे इस कार्य में सहायता नहीं करेगा तो राम-लक्ष्मण से पहले मैं तेरा वध करूँगा।"

रावण के इन क्रुद्ध शब्दों से भयभीत हो मारीच ने अपनी सहमति दे दी। इससे प्रसन्न हो कर रावण बोला, "अब तू सच्चा राक्षस है और मेरे परम मित्र है।" इसके पश्चात् रावण उसे ले कर दण्डक वन में पहुँच राम के आश्रम की खोज करने लगा। जब आश्रम मिल गया तो मारीच ने रावण के निर्देशानुसा मृग का रूप धारण किया और आश्रम के निकट विचरण करने लगा। इस अद्भुत स्वर्णिम मृग की शोभा देख कर सीता आश्चर्यचकित रह गई और विस्मित हो कर उसके पास पहुँची। मायावी मारीच ने अपनी मृग-सुलभ क्रीड़ाओं से सीता का मन मुग्ध कर लिया।

रामायण - अरण्यकाण्ड - महर्षि शरभंग का आश्रम

विराध राक्षस को मारकर सीता और लक्ष्मण के साथ राम महामुनि शरभंग के आश्रम में पहुँचे। उन्होंने देखा महर्षि शरभंग अत्यन्त वृद्ध और शरीर से जर्जर हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि उनका जीवन-दीप शीघ्र ही बुझने वाला है। उन्होंने महर्षि के चरणस्पर्श करके उन्हें अपना परिचय दिया। महर्षि शरभंग ने आगतों का सत्कार करते हुये कहा, "हे राम! इस वन-प्रान्त में तुम्हारे जैसे अतिथियों के दर्शन कभी-कभी ही होते हैं। मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम आ गये हो, इसलिये मैं इस नश्वर जर्जर शरीर का परित्याग कर ब्रह्मलोक में जाउँगा। मैं चाहता हूँ कि मेरी और्ध्व दैहिक क्रिया तुम्हारे ही हाथों से हो।" इतना कहकर महर्षि ने स्वयं अपने शरीर को प्रज्जवलित अग्नि को समर्पित कर दिया।

शरभंग के देहान्त के पश्चात् आश्रम की निकटवर्ती कुटियाओं में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों ने रामचन्द्र के पास आकर प्रार्थना की, "हे राघव! आप क्षत्रिय नरेश हैं। हम लोगों की रक्षा करना आपका कर्तव्य है। हम यहाँ तपस्या करते हैं और हमारी तपस्या के चौथाई भाग का फल राजा को प्राप्त होता है। परन्तु शोक की बात यह है कि आप जैसे धर्मात्मा राजाओं के होते हुये भी राक्षस लोग अनाथों की तरह हमें सताते हैं और हमारी हत्या करते हैं। इन राक्षसों ने पम्पा नदी, मन्दाकिनी और चित्रकूट में तो इतना उपद्रव मचा रखा है कि यहाँ तपस्वियों के लिये तपस्या करना ही नहीं जीना भी दूभर हो गया है। ये समाधिस्थ तपस्वियों को असावधान पाकर मृत्यु के घाट उतार देते हैं। इसलिये हम आपकी शरण आये हैं। इस असह्य कष्ट और अपमान से हमारी रक्षा करके आप हमें निर्भय होकर तप करने का अवसर दें।

तपस्वयों की कष्टगाथा सुनकर राम बोले, "हे मुनियों! मुझे आपके कष्टों की कहानी सुनकर बहुत दुःख हुआ है। आप मुझे बताइये, मुझे क्या करना चाहिये। पिता की आज्ञा से मैं चौदह वर्ष तक इन वनों में निवास करूँगा। इस अवधि में राक्षसों को चुन-चुन कर मैं उनका नाश करना चाहता हूँ। मैं आप सबके सम्मुख प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अपने भुजबल से पृथ्वी के समस्त मुनि-द्रोही राक्षसों को समाप्त कर दूँगा। मैं चाहता हूँ कि आप लोग मुझे आशीर्वाद दें जिससे मैं इस उद्देश्य में सफल हो सकूँ।

इस प्रकार उन्हें धैर्य बँधाकर और राक्षसों के विनाश की प्रतिज्ञाकर रामचन्द्र ने सीता और लक्ष्मण के साथ मुनि सुतीक्ष्ण के आश्रम में आये। वहाँ अतिवृद्ध महात्मा सुतीक्ष्ण के दर्शनकर उन्होंने उनके चरण स्पर्श किये और उन्हें अपना परिचय दिया। राम का परिचय पाकर महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुये और तीनों को समुचित आसन दे कुशलक्षेम पूछने लगे तथा फल आदि से उनका सत्कार किया। वार्तालाप करते करते जब सूर्यास्त की बेला आ पहुँची तो उन सबने एक साथ बैठकर सन्ध्या उपासना की। तीनों ने रात्रि विश्राम भी उनके आश्रम में ही किया। प्रातःकाल ऋषि की परिक्रमा करके राम बोले, "हे महर्षि! हमारा विचार दण्डक वन में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों के दर्शन करने का है। हमने सुना है कि यहाँ ऐसे अनेक ऋषि-मुनि हैं जो सहस्त्रों वर्षों से केवल फलाहार करके दीर्घकालीन तपस्या करते हुये सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे महात्माओं के दर्शनों से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये आप हमें वहाँ जाने की आज्ञा दीजिये।"

राम की विनीत वाणी सुनकर महात्मा ने आशीर्वाद देकर प्रेमपूर्वक उन्हें विदा किया और कहा, "हे राम! तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो। वास्तव में यहाँ के तपस्वी अथाह ज्ञान और भक्ति के भण्डार हैं। उनके अवश्य दर्शन करो। इस वन का वातावरण भी तुम्हारे सर्वथा अनुकूल है। इसमें तुम लोग भ्रमण करके अपने वनवास के समय को सार्थक करो। इससे सीता और लक्ष्मण का भी मनोरंजन होगा।"

रामायण - अरण्यकाण्ड - सीता की शंका

मार्ग में सीता रामचन्द्र से बोलीं, "नाथ! मेरे मन में एक शंका उठ रही है। आप शास्त्रों के ज्ञाता तथा धर्म पर सुदृढ़ रहने वाले होते हुये भी ऐसे कार्य में प्रवृत होने जा रहे हैं जो आपके करने योग्य नहीं है। हे स्वामी! मनुष्य के तीन दोष ऐसे हैं जिनका उन्हें परित्याग करना चाहिये। क्योंकि ये इच्छा से उत्पन्न होते हैं। वे दोष हैं मिथ्या भाषण जो आपने न कभी किया है और न करेंगे। दूसरा दोष हौ पर-स्त्रीगमन जो धर्म का नाश करके लोक परलोक दोनों को ही बिगाड़ता है। यह कार्य भी आपके लिये असम्भव है क्योंकि आप एकपत्नीव्रतधारी और महान सदाचारी हैं। तीसरा दोष है रौद्रता। यह दोष आपको लगता प्रतीत होता है क्योंकि आपने इन तपस्वियों के सामने राक्षसों को समूल नष्ट कर डालने की जो प्रतिज्ञा की है, उसी में मुझे दोष दिखाई दे रहा है। इस तपोभूमि में आपने लक्ष्मण के साथ जो धनुष चढ़ाकर प्रवेश किया है, उसे मैं कल्याणकारी नहीं समझती। जिन राक्षसों ने आपको कोई क्षति नहीं पहुँचाई है, उनकी हत्या करके आप व्यर्थ ही अपने हाथों को रक्त-रंजित करें, यह मुझे अच्छा नहीं लगता। इसे मैं अनुचित और दोषपूर्ण कृत्य समझती हूँ।

मैंने बचपन में एक वृतान्त सुना था, वह मुझे स्मरण आ रहा है। किसी वन में एक ऋषि तपस्या करते थे। वे केवल फलाहार करके ईश्वर की आराधना में तल्लीन रहते थे। उनकी इस कठिन तपस्या से भयभीत होकर इन्द्र ने उनकी तपस्या को भंग करना चाहा। वे एक दिन उनकी तपस्या भंग करने के लिये ऋषि के आश्रम में पहुँचे और विनीत स्वर में बोले, "हे मुनिराज! मेरा यह खड्ग आप अपने पास धरोहर के रूप में रख लीजिये, आवश्यकता पड़ने पर मैं इसे आपके पास से वापस ले जाउँगा। ऋषि ने वह खड्ग लेकर अपनी कमर में बाँध लिया जिससे वह खो न जाय। खड्ग कमर में बाँधने के प्रभाव से उनमें तामस भाव उत्पन्न हुआ और प्रवृति में रौद्रता आने लगी। परिणाम यह हुआ कि अब वे तपस्या तो कम करते किन्तु निरीह पशुओं का शिकार अधिक करते। इस पापकर्म के फलस्वरूप अन्त में उन्हें नर्क की यातना सहनी पड़ी। इसीलिये हे नाथ। इस प्राचीन कथा को ध्यान में रखते हुये मैं आपसे कहना चाहती हूँ कि शस्त्र और अग्नि की संगति एक सा प्रभाव दिखाने वाली होती है। आपने जो यह भीषण प्रतिज्ञा की है और आप जो दोनों भाई निरन्तर धनुष उठाये फिरते हैं, आप लोगों के लिये कल्याणकारी नहीं है। आपको निर्दोष राक्षसों की हत्या नहीं करनी चाहिये। आपके प्रति उनका कोई बैर-भाव नहीं है। फिर बिना शत्रुता के किसी की हत्या करना लोक में निन्दा का कारण बनती है। हे नाथ! आप ही सोचिये, कहाँ वन का शान्त तपस्वी अहिंसामय जीवन और कहाँ शस्त्र-संचालन। कहाँ तपस्या और कहाँ निरीह प्राणियों की हत्या। ये परस्पर विरोधी बातें हैं। जब आपने वन में आकर तपस्वी का जीवन अपनाया है तो उसी का पालन कीजिये। वैसे भी सनातन नियम यह है कि बुद्धमान लोग कष्ट सहकर भी अपने धर्म की साधना करते हैं। यह तो आप जानते हैं कि संसार में कभी सुख से सुख नहीं मिलता, दुःख उठाने पर ही सुख की प्राप्ति होती है।"

सीता के वचन सुनकर राम बोले, "प्रिये! जो कुछ तुमने कहा, उसमें कोई अनुचित बात नहीं है। फिर तुमने यह बात मेरे कल्याण की दृष्टि से कही है। तुम्हारा यह कथन भी सर्वथा उचित है कि धनुष बाण धारण करने का एकमात्र प्रयोजन आर्यों की रक्षा करना है। तुम यह देख चुकी हो कि यहाँ निवास करने वाले ऋषि-मुनि और तपस्वी राक्षसों के हाथों अत्यन्त दुःखी हैं और वे उनसे अपनी रक्षा चाहते हैं तथा इसके लिये उन्होंने मुझसे प्रार्थना भी की है। उनकी रक्षा के लिये ही मैंने प्रतिज्ञा भी की है। असहाय और दुखियों की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म है। क्या तुम यह उचित समझती हो कि मैं उस प्रतिज्ञा को भंग कर दूँ? यह तो तुम नहीं चाहोगी कि मैं प्रतिज्ञा भंग करके झूठा कहलाऊँ जबकि सत्य मुझे प्राणों से भी प्रिय है। ऋषि-मुनि और ब्राह्मणों की सेवा तो मुझे बिना कहे ही करनी चाहिये। फिर मैं तो उन्हें वचन भी दे चुका हूँ। फिर भी जो कुछ तुमने कहा उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।"

इसके पश्चात् राम ने सीता और लक्ष्मण को साथ लेकर अगस्त्य मुनि के दर्शन के लिये प्रस्थान किया। इस प्रकार अनेक ऋषि-मुनियों के दर्शन करते और वनों में भ्रमण करते हुये उन्हें दस वर्ष बीत गये। इस अवधि में उन्होंने अनेक स्थानों पर एक-एक दो-दो वर्ष तक कुटिया बनाकर निवास किया। बीच बीच में अगस्त्य मुनि का आश्रम भी खोजते रहे परन्तु अनेक प्रयत्न करने पर भी उनका आश्रम न पा सके। अन्त में वे लौटकर फिर सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में आये और बोले, "मुनिराज! मैं पिछले दस वर्ष से वन में भटककर महर्षि अगस्त्य के आश्रम की खोज कर रहा हूँ किन्तु अभी तक उनके दर्शन का लाभ प्राप्त नहीं कर सका हूँ। उनके दर्शनों की मुझे तीव्र लालसा है। इसलिये कृपा करके आप उनका ऐसा पता बताइये जिससे मैं सरलता से उनके आश्रम में पहुँच सकूँ।

राम के वचन सुनकर महर्षि सुतीक्ष्ण ने कहा, "हे राम! तुम मेरे आश्रम से दक्षिण दिशा की ओर सोलह कोस जाओ। वहाँ तुम्हें एक विशाल पिप्पली वन दिखाई देगा। उस वन में प्रत्येक ऋतु में खिलने वाले सुगन्धियुक्त रंग-बिरंगे फूलों से लदे वृक्ष मिलेंगे। उन पर नाना प्रकार की बोलियों में कलरव करते हुये असंख्य पक्षी होंगे। अनेक प्रकार के हंसों, बकों, कारण्डवों आदि से युक्त सरोवर भी दिखाई देंगे। इसी वातावरण में महात्मा अगस्त्य के भाई का आश्रम है जो वहाँ ईश्वर साधना में निमग्न रहते हैं। कुछ दिन उनके आश्रम में रहकर विश्राम करें। जब तुम्हारी मार्ग की क्लान्ति मिट जाय तो वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर वन के किनारे चलना। वहाँ से चार कोस की दूरी पर महर्षि अगस्तय का शान्त मनोरम आश्रम है जिसके दर्शन मात्र से अद्वितीय शान्ति मिलती है।

रामायण – अरण्यकाण्ड - अगस्त्य मुनि के आश्रम में

सुतीक्ष्ण मुनि से विदा ले कर राम, सीता और लक्ष्मण ने वहाँ से प्रस्थान किया। मार्ग के नदी, पर्वतों एवं उपत्यकाओं की शोभा को निरखते हुये, दो दिन महर्षि अगस्त्य के भाई के आश्रम में विश्राम करने के पश्चात् अन्त में वे अगस्त्य मुनि के आश्रम के निकट जा पहुँचे। आश्रम के निकट का वातावरण बड़ा हृदयहारी था। सुन्दर विशाल वृक्ष पुष्पवती लताओं से सजे हुये थे। अनेक वृक्ष हाथियों द्वारा तोड़े जाकर पृथ्वी पर पड़े थे। वृक्षों की ऊँची-ऊँची शाखाओं पर वानरवृन्द अठखेलियाँ कर रहे थे। पक्षियों का कलरव उनकी क्रीड़ाओं को तालबद्ध कर रहा था। हिंसक पशु भी हिरण आदि के साथ कल्लोल कर रहे थे। यह देखकर राम लक्ष्मण से बोले, "देखो सौमित्र! इस आश्रम का प्रभाव कितना अद्भुत और स्नेहपूर्ण है कि जन्मजात शत्रु भी परस्पर स्नेह का बर्ताव करते हैं और एक दूसरे की हत्या नहीं करते। यह महर्षि के तपोबल का ही प्रभाव है। राक्षस भी यहाँ किसी प्रकार का उपद्रव नहीं करते। मैंने तो यह भी सुना है कि उनके प्रभाव से अनेक राक्षस अपनी तामसी वृति का त्याग करके उनके अनन्य भक्त बन गये हैं। यही कारण है कि इस युग के ऋषि-मुनियों में महामुनि अगस्त्य का स्थान सर्वोपरि है। उनकी कृपा से इस वन में निवास करने वाले देवता, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर सब मानवीय धर्मों का पालन करते हुये बड़े प्रेम से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इस परम शान्तिप्रद वन में चोर, डाकू, लम्पट, दुराचारी व्यक्ति दिखाई भी नहीं देते। ऐसे महात्मा महर्षि के आज हम दर्शन करेंगे। तुम आगे जाकर मेरे आने की सूचना दो।"

राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने आश्रम में प्रवेश किया और अपने सम्मुख महर्षि के शिष्य को पाकर उससे बोले, "हे सौम्य! तुम महर्षि अगस्त्य को सादर सूचित करो कि अयोध्या के परम तेजस्वी सूर्यवंशी सम्राट दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र जी अपनी पत्नी जनकनन्दिनी सीता के साथ उनके दर्शन के लिये पधारे हैं। वे बाहर अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।" शिष्य से लक्ष्मण का संदेश सुनकर अगस्त्य मुनि बोले, "यह तो बड़ा आनन्ददायक समाचार तू ने सुनाया है। राम की प्रतीक्षा करते हुये मेरे नेत्र थक गये थे। तू जल्दी से जाकर राम को जानकी और लक्ष्मण के साथ मेरे पास ले आ।" मुनि का आदेश पाते ही शिष्य राम, सीता और लक्ष्मण को लेकर मुनि के पास पहुँचा जो पहले से ही उनके स्वागत के लिये कुटिया के बाहर आ चुके थे। तेजस्वी मुनि को स्वयं स्वागत के लिये बाहर आया देख राम ने श्रद्धा से सिर नवा कर उन्हें प्रणाम किया। सीता और लक्ष्मण ने भी उनका अनुसरण किया। अगस्त्य मुनि ने बड़े प्रेम से उन सबको बैठने के लिये आसन दिये। कुशलक्षेम पूछ कर तथा फल-फूलों से उनका सत्कार कर वे बोले, "हे राम! मैंने दस वर्ष पूर्व तुम्हारे दण्डक वन में आने का समाचार सुना था। तभी से मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। आज मेरे सौभाग्य है कि मेरी इस कुटिया में तुम्हारे जैसा धर्मात्मा, सत्यपरायण, प्रतिज्ञापालक, पितृभक्त अतिथि आया है। वास्तव में मेरी कुटिया तुम्हारे आगमन से धन्य हो गई है।" इसके पश्चात् महर्षि ने राम को कुछ दैवी अस्त्र-शस्त्र देते हुये कहा, "हे राघव! जब देवासुर संग्राम हुआ था, उस समय से ये कुछ दिव्य अस्त्र मेरे पास रखे थे। आज इन्हें मैं तुम्हें देता हूँ। इनका उपयोग जितना उचित तुम कर सकते हो अन्य कोई धर्मपरायण योद्धा नहीं कर सकता। इस धनुष का निर्माण विश्वकर्मा ने स्वर्ण और वज्र के सम्मिश्रण से किया है। ये बाण स्वयं ब्रह्मा जी ने दिये थे। स्वर्ण किरणों की भाँति चमकने वाले ये बाण कभी व्यर्थ नहीं जाते। यह तरकस जो मैं तुम्हें दे रहा हूँ, मुझे देवाधिपति इन्द्र ने दिये थे। इनमें अग्नि की भाँति दाहक बाण भरे हुये हैं। यह खड्ग कभी न टूटने वाला है चाहे इस पर कैसा ही वार किया जाय। मुझे विश्वास है कि इन अस्त्र-शस्त्रों को धारण कर के तुम इन्द्र की भाँति अजेय हो जाओगे। इनकी सहायता से इस दण्डक वन में जो देव-तपस्वी द्रोही राक्षस हैं, उनका नाश करो।"

राम ने महर्षि के इस कृपापूर्ण उपहार के लिये उन्हें अनेक धन्यवाद दिये और बोले, "मुनिराज! यह आपकी अत्यन्त अनुकम्पा है जो आपने मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों के योग्य समझा। मैं यथाशक्ति इनका उचित उपयोग करने का प्रयास करूँगा।" राम के विनीत शब्द सुन कर मुनि ने कहा, "नहीं राम! इसमें अनुकम्पा की कोई बात नहीं है। तुम वास्तव में मेरे आश्रम में आने वाले असाधारण अतिथि हो। तुम्हें देख कर मैं कृत-कृत्य हो गया हूँ। लक्ष्मण भी कम महत्वपूर्ण अतिथि नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी विशाल बलिष्ठ भुजाएँ विश्व पर विजय पताका फहराने के लिये ही बनाई गई है। और जानकी का तो पति-प्रेम तथा पति-निष्ठा संसार की स्त्रियों के लिये अनुकरणीय आदर्श बन गये हैं। इन्होंने कभी कष्टों की छाया भी नहीं देखी, तो भी केवल पति भक्ति के कारण तुम्हारे साथ इस कठोर वन में चली आई हैं। वास्तव में इनका अनुकरण करके सन्नारियाँ स्वर्ग की अधिकारिणी हो जायेंगीं। तुम तीनों को अपने बीच में पाकर मेरा हृदय फूला नहीं समा रहा है। तुम लोग इतनी लम्बी यात्रा करके आये हो, थक गये होगे। अतएव अब विश्राम करो। मेरी तो इच्छा यह है कि तुम लोग वनवास की शेष अवधि यहीं व्यतीत करो। यहाँ तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न होगा।"

ऋषि के स्नेह भरे वचन सुन कर राम ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया, "हे मुनिराज! जिनके दर्शन बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं तथा दीर्घकाल तक तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों को भी दुर्लभ हैं, उनके दर्शन मैं आज इन नेत्रों से कर रहा हूँ। भला इस संसार में मुझसे बढ़ कर भाग्यशाली कौन होगा? आपकी इस महान कृपा और अतिथि सत्कार के लिये मैं सीता और लक्ष्मण सहित आपका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करते हुये हम लोग आज की रात्रि अवश्य यहीं विश्राम करेंगे किन्तु वनवास की शेष अवधि आपके मनोरम आश्रम में हृदय से चाहते हुये भी बिताना सम्भव नहीं होगा। मैं आपकी तपस्या में किसी भी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं करना चाहता, परन्तु आपकी सत्संगति के लाभ से भी वंचित नहीं होना चाहता। इसलिये कृपा करके कोई ऐसा स्थान बताइये जो फलयुक्त वृक्षों, निर्मल जल तथा शान्त वातावरण से युक्त सघन वन हो। वहाँ मैं आश्रम बना कर निवास करूँगा। यहाँ से अधिक दूर भी न हो।"

राम की बात सुनकर अगस्त्य मुनि ने कुछ क्षण विचार करके उत्तर दिया, "हे राम! तुम्हारे यहाँ रहने से मुझे कोई असुविधा नहीं होगी। यदि फिर भी तुम किसी एकान्त स्थान में अपना आश्रम बनाना चाहते हो तो यहाँ से आठ कोस दूर पंचवटी नामक महावन है। वह स्थान वैसा ही है जैसा तुम चाहते हो। वहाँ पर गोदावरी नदी बहती है। वह स्थान अत्यन्त रमणीक, शान्त, स्वच्छ एवं पवित्र है। सामने जो मधुक वन दिखाई देता है, उत्तर दिशा से पार करने के पश्चात् तुम्हें एक पर्वत दृष्टिगोचर होगा। उसके निकट ही पंचवटी है। वह स्थान इतना आकर्षक है कि उसे खोजने में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी।"

मुनि का आदेश पाकर सन्ध्यावन्दन आदि करके राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ रात्रि अगस्त्य मुनि के आश्रम में ही विश्राम किया। प्रातःकालीन कृत्यों से निबटकर महामुनि से विदा हो राम ने अपनी पत्नी तथा अनुज के साथ पंचवटी की ओर प्रस्थान किया।

रामायण – अरण्यकाण्ड - पंचवटी में आश्रम

पंचवटी की ओर जाते हुये राम, सीता और लक्ष्मण की दृष्टि एक पर्वताकार बलिष्ठ व्यक्ति पर पड़ी। लक्ष्मण ने इस असाधारण आकार वाले मनुष्य को देखकर समझ लिया कि यह कोई राक्षस है। इसलिये धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते हुये उससे बोले, "तुम कौन हो?" लक्ष्मण के इस प्रश्न का उसने कोई उत्तर नहीं दिया, किन्तु राम की ओर दोनों हाथ जोड़ कर बोला, "हे रघुकुलतिलक! जब से मुझे ज्ञात हुआ कि आप दण्डकारण्य में पधारे हुये हैं, तभी से आपकी प्रतीक्षा में मैं यहाँ पड़ा हुआ हूँ। आपकी प्रतीक्षा करते हुये मुझे अनेक वर्ष व्यतीत हो गये हैं। मेरा नाम जटायु है और मैं गृद्ध जाति के यशस्वी व्यक्ति अरुण का पुत्र हूँ। मेरा निवेदन है कि आप मुझे अपने साथ रहने की अनुमति दें ताकि मैं सेवक की भाँति आपके साथ रहकर आपकी सेवा कर सकूँ।" यह कह कर वह राम और लक्ष्मण के साथ चलने लगा।

पंचवटी में पहुँच कर राम ने लक्ष्मण से कहा, "भैया लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि अगस्त्य ने जिस पंचवटी का वर्णन किया था, वह यही है और हम सही स्थान पर आ पहुँचे हैं। सामने गोदावरी नदी भी कल-कल करती हुई बह रही है। इसलिये कोई अच्छा सा स्थान खोज कर उस पर आश्रम बनाने की तैयारी करो।" राम के प्रस्ताव का समर्थन करते हुये सीता ने भी कहा, "हाँ नाथ! यह स्थान वास्तव में उपयुक्त है। गोदावरी के तट पर पुष्पों से लदे वृक्ष कितने अच्छे लग रहे हैं। वृक्षों पर लगे अनेक प्रकार के फल-फूल स्वर्ण, रजत एवं ताम्र के सदृश चमक रहे हैं। इन रंग-बिरंगे पुष्पों वाले वृक्षों से युक्त पर्वत ऐसे प्रतीत होते हैं, मानों गजों के समूह ने ऋंगार किया हो। मुझे तो ताल, तमाल, नागकेशर, कटहल, आम, अशोक, देवदारु, चन्दन, कदम्ब आदि के वृक्षों से तथा केवड़ा, मोतिया, चम्पक, गेंदा, मौलसिरी आदि रंग-बिरंगे पुष्पों से सुसज्जित वन अत्यन्त मनोरम प्रतीत होता है। आप अपना आश्रम यहीं बनाइये। मेरा मन भी यहाँ भली भाँति रम जायेगा।"

राम का प्रस्ताव और सीता का अनुमोदन पाकर लक्ष्मण ने लकड़ियों तथा घास-फूसों की सहायता से एक कुटिया का निर्माण कर लिया। जब यह कुटिया बनकर पूरी हो गई तो उसी के निकट उन्होंने एक और कुटिया का निर्माण सुन्दर लता-पल्लवों से किया और उस में सुन्दर स्म्भों से युक्त यज्ञ वेदी बनाई। तत्पश्चात् उन्होंने पूरे आश्रम के चारों ओर काँटों की बाड़ लगा दी। फिर राम और सीता को बुला कर आश्रम का निरीक्षण कराया। वे इस सुन्दर आश्रम को देख कर बहुत प्रसन्न हुये और लक्ष्मण की सराहना करते हुये बोले, "लक्ष्मण! तुमने तो इस बीहड़ वन में भी राजप्रासाद जैसा सुविधाजनक निवास स्थान बना दिया। तुम्हारे कारण तो मुझे वन घर से भी अधिक सुखदायक हो गया है।" इसके पश्चात् उन दोनों के साथ बैठ कर राम ने यज्ञ-कुटीर में हवन किया। वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे और लक्ष्मण दत्तचित्त होकर उन दोनों की सेवा करने लगे। इस प्रकार उन्होंने शरद ऋतु के दो मास सुख से बिता दिये।

एक दिन हेमन्त ऋतु की प्रातः बेला में राम सीता के साथ गोदावरी में स्नान करने के लिये जा रहे थे। लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे घड़ा उठाये चल रहे थे। शीतल वायु बह रही थी जिससे शरीर सुन्न हुआ जा रहा था। सरिता के तट पर पहुँच कर लक्ष्मण को ध्यान आया कि हेमन्त ऋतु रामचन्द्र जी की कितनी प्रिय ऋतु रही है इसलिये वे तट पर घड़े को रख कर बोले, "भैया! यही वह हेमन्त ऋतु है जो आपको सदा सर्वाधिक प्रिय रही है। इस ऋतु को आप वर्ष का आभूषण कहा करते थे। अब कठोर शीत पड़ने लगी है। पृथ्वी अन्नपूर्णा बन गई है। ग्रीष्म ऋतु में जितना जल सुहावना लगता था, आज उतनी ही अग्नि सुहावनी लगती है। नागरिक लोग धूमधाम से यज्ञों में अन्न की हवि देकर उसका पूजन करने लगे हैं। सम्पूर्ण भारत भूमि में दूध-दही की नदियाँ बहने लगी हैं। राजा-महाराजा अपनी-अपनी चतुरंगिणी सेनाएँ लेकर शत्रुओं को पराजित करने के लिये निकल पड़े हैं। सूर्य के दक्षिणायन होने से उत्तर दिशा की शोभा समाप्त हो गई है। आजकल सूर्य का ताप और अग्नि की उष्मा दोनों ही प्रिय लगते हैं। रात्रियाँ हिम जैसी ठण्डी हो गई हैं। उधर देखिये प्रभो! जौ और गेहूँ से भरे खेतों में ओस के बिन्दु मोतियों की भाँति झिलमिला रहे हैं। इधर ओस के जल से भीगी हई रेत पैरों को घायल कर रही है। उधर भैया भरत अयोध्या में रहते हुये भी वनवासी का जीवन व्यतीत करते हुये ठण्डी भूमि पर शयन करते होंगे। वे भी सब प्रकार के ऐश्वर्यों को लात मार कर आपकी भाँति त्याग एवं कष्ट का जीवन व्यतीत कर रहे होंगे। हे तात! विप्रजन कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव उसकी माता के अनुकूल होता है, पिता के नहीं, परन्तु भरत ने इस कहावत को मिथ्या सिद्ध कर दिया है। उनका स्वभाव अपनी माता के क्रूर स्वभाव से कदापि मेल नहीं खाता। उनकी माता का क्रूर स्वभाव वास्तव में हमारे और सम्पूर्ण देश के दुःख का कारण बन गया है।"

लक्ष्मण के मुख से कैकेयी के लिये निन्दा भरे वचन सुन कर राम बोले, "लक्ष्मण! इस प्रकार माता कैकेयी की निन्दा मत करो। वनवास में मैंने तापस धर्म ग्रहण किया है और तपस्वी के लिये किसी की निन्दा करना या सुनना दोनों ही पाप है। फिर कैकेयी जैसी भरत की माता हैं, वैसी ही मेरी भी माता हैं। हमें भरत के उन विनम्र, मधुर एवं स्नेहयुक्त वचनों को स्मरण रखना चाहिये जो उन्होंने चित्रकूट में आकर कहे थे। मैं तो व्यग्रता से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब हम चारों भाई फिर एकत्रित होकर एक दूसरे के गले मिलेंगे।" इस प्रकार भरत के वियोग में व्याकुल होते हुये राम सीता और लक्ष्मण के साथ गोदावरी के शीतल जल में स्नान कर के अपने आश्रम लौटे।

रामायण – अरण्यकाण्ड - शूर्पणखा के नाक-कान काटना

जब रामचन्द्र सीता और लक्ष्मण के साथ अपने आश्रम में पहुँचे तो उन्होंने आश्रम के निकट एक राक्षस कन्या को देखा जो राम के तेजस्वी मुखमण्डल, कमल-नयन तथा नीलम्बुज सदृश शरीर की कान्ति को देख कर ठगी सी खड़ी थी। अकस्मात् उसके भावों में परिवर्तन हुआ और वह राम को वासनापूर्ण दृष्टि से देखने लगी। वह उनके पास आकर बोली, "तुम कौन हो और इस वन में क्यों आये हो? यहाँ तो राक्षसों का राज्य है। वेश तो तुम्हारा तपस्वियों जैसा है, परन्तु हाथों में धनुष बाण लिये हो। साथ में स्त्री को लिये घूमते हो। ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। इसलिये तुम अपना परिचय देकर मेरे आश्चर्य का निवाराण करो और अपना पूरा वृतान्त सुनाओ।"

राम ने सरल भाव से उत्तर दिया, "हे राक्षसकन्ये! मैं अयोध्या के चक्रवर्ती नरेश महाराजा दशरथ का ज्येष्ठ पुत्र राम हूँ। यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है और यह जनकपुरी के महाराज जनक की राजकुमारी तथा मेरी पत्नी सीता है। पिताजी की आज्ञा से हम चौदह वर्ष के लिये वनों में निवास करने के लिये आये हैं। यही हमारा परिचय है। अब तुम जुझे अपना परिचय देकर मेरी इस जिज्ञासा को शान्त करो कि तुम इस भयंकर वन में अकेली इस प्रकार क्यों घूम रही हो?" राम का प्रश्न सुन कर राक्षसी बोली, "मेरा नाम शूर्पणखा है और मैं लंका के नरेश परम प्रतापी महाराज रावण की बहन हूँ। सारे संसार में विख्यात विशालकाय कुम्भकरण और परम नीतिवान विभीषण भी मेरे भाई हैं। वे सब लंका में निवास करते हैं। पंचवटी के स्वामी खर और दूषण भी मेरे भाई हैं। वे अत्यन्त पराक्रमी हैं। संसार में बिरला ही कोई वीर ऐसा होगा जो इन दोनों भाइयों के सामने समरभूमि में ठहर कर उनसे लोहा ले सके। यह तो हुआ मेरा परिचय, अब मैं तुम्हें कुछ अपने विषय में बताती हूँ। यह तो तुम देख ही रहे हो कि मैं रति से भी सुन्दर, पूर्ण यौवना और लावण्यमयी हूँ। तुम्हारे सुन्दर रूप और कान्तिमय बलिष्ठ युवा शरीर को देख कर मैं तुम्हें अपना हृदय अर्पित कर बैठी हूँ। मैं चाहती हूँ कि तुम पत्नी के रूप में मुझे स्वीकार कर के अपना शेष जीवन आनन्दपुर्वक बिताओ। यह तुम्हारे लिये अत्यन्त सौभाग्य की बात होगी कि मुझसे विवाह कर के तुम सहज ही त्रैलोक्य में विख्यात अद्भुत पराक्रमी लंकापति महाराज रावण के सम्बंधी बन जाओगे और फिर तुम्हारी ओर कोई आँख उठा कर भी नहीं देख सकेगा। मुझे पाने के लिये सैकड़ों राजकुमार अपने प्राण न्यौछावर करने को तैयार हैं, जबकि मैं स्वयं तुम्हारे सम्मुख अपना हाथ बढ़ा रही हूँ।"

शूर्पणखा के प्रस्ताव को सुन कर राम ने उत्तर दिया, "भद्रे! तुम देख रही हो कि मैं विवाहित हूँ और मेरी पत्नी मेरे साथ है। ऐसी दशा में मेरा तुसे विवाह करना कदापि उचित नहीं हो सकता। यह धर्मानुकूल भी नहीं है। हाँ मेरा भाई लक्ष्मण यहाँ अकेला है। यदि तुम चाहो और वह सहमत हो तो तुम उससे विवाह कर सकती हो। इस विषय में उससे बात कर के तुम देख लो।"

राम का उत्तर सुन कर शूर्पणखा ने लक्ष्मण को वासनामयी दृष्टि से देखा और फिर लक्ष्मण के पास जाकर बोली, "हे राजकुमार! तुम सुन्दर हो और मैं युवा हूँ। ऐसी दशा में तुम्हारी और मेरी जोड़ी खूब फबेगी। मुझसे विवाह कर के तुम्हारा रावण के साथ जो सम्बंध स्थापित होगा, उससे तुम्हारी स्थिति राम से भी श्रेष्ठ हो जायेगी। इसलिये तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लो। फिर तुम्हारा वनवास का कटु जीवन सुख और ऐश्वर्य में बदल जायेगा।" शूर्पणखा की कामातुर भंगिमा देख और विवाह का प्रस्ताव सुन कर वाक् चतुर लक्ष्मण ने कहा, "सुन्दरी! तुम राजकुमारी हो, मैं राम का एक साधारण सा दास हूँ। तुम मेरी पत्नी बन कर केवल दासी कहलाओगी। क्या किसी महान देश की राजकुमारी होकर दासी बनना तुम्हें शोभा देगा? इससे तो अच्छा है कि तुम राम से ही विवाह कर के उनकी छोटी भार्या बन जाओ। तुम जैसी रूपवती उन्हीं के योग्य है।" शूर्पणखा को लक्ष्मण के प्रशंसा भरे युक्तिपूर्ण वचन अच्छे लगे और वह पुनः राम के पास जा कर क्रोध से बोली, "हे राम! इस कुरूपा सीता के लिये तुम मेरा विवाह प्रस्ताव अस्वीकार कर के मेरा अपमान कर रहे हो। लो, पहले मैं इसे ही मार कर समाप्त किये देती हूँ। उसके पश्चात् तुम्हारे साथ विवाह कर के मैं अपना जीवन आनन्द से बिताउँगी।" इतना कह कर भयंकर क्रोध करती हुई शूर्पणखा बिजली जैसे वेग से सीता पर झपटी। इस आकस्मिक आक्रमण को राम ने बड़ी कठिनता किन्तु तत्परता से रोका। शूर्पणखा को सीता से अलग करते हुये वे लक्ष्मण से बोले, "हे वीर! इस दुष्टा राक्षसी से अधिक बात करना या इसके साथ हास्य विनोद करना उचित नहीं है। इसने तो जनकनन्दिनी की हत्या ही कर डाली होती। तुम इसके नाक कान काट कर इस दुश्चरित्र को ऐसी शिक्षा दो कि भविष्य में फिर कभी ऐसा आचरण न कर सके।"

राम की आज्ञा पाते ही लक्ष्मण ने तत्काल खड्ग निकाल कर दुष्टा शूर्पणखा के नाक-कान काट डाले। नाक-कान कटने की पीड़ा और घोर अपमान के कारण रोती हुई शूर्पणखा अपने भाइयों, खर-दूषण, के पास पहुँची और घोर चीत्कार कर के उनके सामने गिर पड़ी।

रामायण – अरण्यकाण्ड - खर-दूषण से युद्ध

अपनी बहन शूर्णखा को उठा कर जब खर ने उसका रक्त-रंजित मुखमण्डल देखा तो वह क्रोध से काँपते हुये बोला, "बहन! यह क्या हुआ? किस दुष्ट ने तेरे नाक-कान काटने का दुःसाहस किया? किसने आज इस सोते हुये नागराज को छेड़ने की मूर्खता की है? किसके सिर पर काल नाच रहा है? तू शीघ्र उसका नाम बता और सारा वृतान्त विस्तारपूर्वक कह, मैं अभी उस दुष्ट को इस पृथ्वी से समाप्त कर दूँगा।"

खर के इन वचनों सुन कर शूर्पणखा का कुछ धैर्य बँधा और वह रोते-रोते खर को बताने लगी, "अयोध्या के राजा दशरथ के दो पुत्र राम और लक्ष्मण इस वन में आये हुये हैं। साथ में राम की भार्या सीता भी है। वे दोनों भाई बड़े सुन्दर, पराक्रमी और तपस्वी मालूम होते हैं। जब मैंने उनसे उस स्त्री के विषय में पूछा तो वे चिढ़ गये। उनमें से एक ने मेरे नाक-कान काट लिये। भैया! तुम शीघ्र उन्हें मार कर उनसे मेरे अपमान का बदला लो। जब तक मैं उन तीनों का गरम-गरम रुधिर न पी लूँगी, मुझे शान्ति नहीं मिल सकती। इतना सुनते ही खर ने अपनी सेना के चौदह सबसे भयंकर योद्धा एवं पराक्रमी राक्षसों को आदेश दिया कि शूर्पणखा के साथ जा कर उन तीनों का वध करो। मेरी बहन को वहीं उनके शरीर का गरम-गरम रक्त पिला कर इसके अपमान की ज्वाला को शान्त करो। खर की आज्ञा पाकर वे राक्षस भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर राम, लक्ष्मण तथा सीता को मारने के लिये शूर्पणखा के साथ चल पड़े।

जब राम ने शूर्पणखा को इस राक्षस दल के साथ आते देखा तो वे लक्ष्मण से बोले, "लक्ष्मण! ये राक्षस शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिये आ रहे हैं। तुम सीता की रक्षा करो। मैं अभी एक-एक को मार कर यमलोक भेजता हूँ।" इसके पश्चात् जब तक राक्षस उनके पास पहुँचें, राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर बाण सँभाले युद्ध के लिये तैयार हो चुके थे। फिर उनसे बोले, "दुष्टों! हम लोग इस वन में निवास करते हुये तपस्वी धर्म का पालन कर रहे हैं और किसी निर्दोष को कभी नहीं छेड़ते। इसलिये तुम भी यदि अपनी भलाई चाहते हो तो यहाँ से लौट जाओ।" राम के वचन सुन कर बिना कोई उत्तर दिये ही उन राक्षसों ने एक साथ राम पर अपने शस्त्रों से आक्रमण कर दिया। इस पर राम ने एक साथ चौदह बाण छोड़े जिन्होंने उनकी छातियों में घुस कर उनके प्राणों का हरण कर लिया। वे भूमि पर गिर कर तड़पने लगे। फिर वे सब मृत्यु को प्राप्त हुये। सब राक्षसों को इस प्रकार मरा देख शूर्पणखा रोती-बिलखती खर के पास जाकर बोली, "उन सब राक्षसों को अकेले राम ने ही मार डाला। वे सब मिल कर भी उसका कुछ न बिगाड़ सके। मुझे तो ऐसा लगता है कि वे तुम्हारे सब योद्धाओं को पल भर में समाप्त कर देंगे। तुम अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा कर उससे युद्ध करो। यदि तुमने मेरे अपमान का प्रतिशोध नहीं लिया तो मैं आत्महत्या करके अपने प्राण त्याग दूँगी।"

शूर्पणखा के इन वचनों को सुन कर खर ने क्रोधित होकर कहा, "शूर्पणखे! तू अकारण ही भयभीत हो कर आत्महत्या करने का प्रलाप कर रही है। मैं तत्काल जाकर उन दोनों भाइयों का वध कर डालूँगा। उनका तेज मेरे सामने वैसा ही है जैसे कि सूर्य के सामने जुगनू। तू व्यर्थ की चिंता त्याग दे।" इस भाँति शूर्पणखा को सान्त्वना देकर खर चौदह सहस्त्र विकट योद्धाओं वाली अपनी विशाल सेना को साथ लेकर राम से संग्राम करने के लिये तीव्रता पूर्वक चला। खर को अपनी विशाल सेना के साथ आते देख कर राम ने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि राक्षसराज अपने पूरे दल-बल के साथ चला आ रहा है। आज आर्य का अनार्य के साथ संघर्ष होगा और निःसन्देह आर्य की विजय होगी। तुम सीता की रक्षा के लिये उसे साथ ले कर शीघ्र ही किसी गुफा में चले जाओ ताकि मैं निश्चिंत होकर युद्ध कर सकूँ।"

लक्ष्मण ने तत्काल अपने अग्रज की आज्ञा पालन किया। वे सीता को ले कर पर्वत की एक अँधेरी कन्दरा में चले गये। अभेद्य कवच धारण कर के राम युद्ध के लिये तैयार हो गये। देवता, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व आदि सभी राम के विजय के लिये परमात्मा से इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, "हे त्रिलोकीनाथ! वीर पराक्रमी रामचन्द्र को इतनी शक्ति दे कि उनके हाथों गौ, ब्राह्मणों तथा ऋषि-मुनियों को अनेक प्रकार से कष्ट देने वाले राक्षसों का नाश हो सके।" राक्षसों की सेना ने राम को चारों ओर से घेर लिया तथा आक्रमण की तैयारी करने लगे। राम ने भीषण विनाश करने वाली अग्नि बाण छोड़ दिया जिससे राक्षस हाहाकार करने लगे। राक्षसों के द्वारा छोड़े गये बाणों को वे अपने बाणों से आकाश में ही काटने लगे। राक्षसों ने अत्यन्त क्रोधित होकर एक साथ बाणों की वर्षा करना आरम्भ कर दिया और राम चारों ओर से उनके बाणों से आच्छादित हो गये। राम ने अपने धनुष को मण्डलाकार करके अद्भुत हस्त-लाघव का प्रदर्शन करते हुये बाणों को छोड़ना आरम्भ कर दिया जिससे राक्षसों के बाण कट-कट कर भूमि पर गिरने लगे। यह ज्ञात ही नहीं हो पाता था कि कब उन्होंने तरकस से बाण निकाला, कब प्रत्यंचा चढ़ाई और कब बाण छूटा। राम के बाणों के लगने से राक्षसगण निष्प्राण होकर भूमि में लेटने लगे। अल्पकाल में ही राक्षसों की सेना उसी भाँति छिन्न-भिन्न हो गई जैसे आँधी आने पर बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। पूरा युद्धस्थल राक्षसों के कटे हुये अंगों से पट गया।

रामायण – अरण्यकाण्ड - खर-दूषण वध

खर की सेना की दुर्दशा के विषय में ज्ञात होने पर दूषण भी अपनी अपार सेना को साथ ले कर समर भूमि में कूद पड़ा किन्तु राम ने अपने बाणों से उसकी सेना की भी वैसी ही दशा कर दिया जैसा कि खर की सेना का किया था। क्रोधित होकर दूषण ने मेघ के समान घोर गर्जना कर के तीक्ष्ण बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। इस आक्रमण से कुपित हो कर राम ने चमकते खुर से दूषण के धनुष को काट डाला तथा चार बाण छोड़ कर उसके रथ के चारों घोड़ों को भूमि पर सुला दिया। फिर एक अर्द्ध चन्द्राकार बाण से दूषण के सारथी का सिर काट दिया। क्रुद्ध दूषण एक परिध उठा कर राम को मारने झपटा। उसे अपनी ओर आता देख राम ने पलक झपकते ही अपना खड्ग निकाल लिया और दूषण के दोनों हाथ काट डाले। पीड़ा से छटपटाता हुआ वह मूर्छित होकर धराशायी हो गया। दूषण की ऐसी दशा देख कर सैकड़ों राक्षसों ने एक साथ राम पर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया। रामचन्द्र ने स्वर्ण तथा वज्र से निर्मित तीक्ष्ण बाणों को छोड़ कर उन सभी राक्षसों का नाश कर दिया। उनके पराक्रम से खर और दूषण की अपार सेना यमलोक पहुँच गई।

अब केवल खर और उसका सेनापति त्रिशिरा शेष बचे थे। खर अत्यन्त निराश हो चुका था। उसे धैर्य बँधाते हुये त्रिशिरा ने कहा, "हे राक्षसराज! आप निराश न हों। मैं अभी राम का वध करके अपने सैनिकों के मारे जाने का प्रतिशोध लेता हूँ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि मैंने उस तपस्वी को न मारा तो मैं युद्धभूमि में अपने प्राण त्याग दूँगा।" इतना कह कर वह राम की ओर तीव्र गति से झपटा। उसे अपनी ओर आते देख राम ने फुर्ती के साथ बाण चलना आरम्भ कर दिया। राम के बाणों ने त्रिशिरा के सारथी, घोड़ों तथा ध्वजा को काट डाला। इस पर क्रुद्ध सेनापति हाथ में गदा ले कर राम की ओर दौड़ा, किन्तु वीर राम ने उसे अपने निकट पहुँचने के पहले ही एक ऐसा तीक्ष्ण बाण छोड़ा जो उसके कवच को चीर कर हृदय तक पहुँच गया। हृदय में बाण लगते ही त्रिशिरा धराशायी हो गया और तत्काल उसके प्रण पखेरू उड़ गये। जहाँ पर वह गिरा वहाँ की सारी भूमि रक्त-रंजित हो गई।

जब खर अकेला रह गया तो वह क्रोधित हो कर राम पर अंधाधुंध बाणों की वर्षा करने लगा। चहुँ ओर उसके बाण वायुमण्डल में फैलने लगे। बाणों की घटाओं से घिरने पर राम ने अग्निबाणों की बौछार करना आरम्भ कर दिया। इससे और भी क्रुद्ध होकर खर ने एक बाण से रामचन्द्र के धनुष को काट दिया। खर के इस अद्भुत पराक्रम को देख कर यक्ष, गन्धर्व आदि भी आश्चर्यचकित रह गये, किन्तु अदम्य साहसी राम तनिक भी विचलित नहीं हुये। उन्होंने अगस्त्य ऋषि के द्वारा दिया हुआ धनुष उठा कर क्षणमात्र में खर के घोड़ों को मार गिराया। रथहीन हो जाने पर अत्यन्त क्रुद्ध हो पराक्रमी खर हाथ में गदा ले राम को मारने के लिये दौड़ा। उसे अपनी ओर आता देख राघव बोले, "हे राक्षसराज! निर्दोषों तथा सज्जनों को दुःख देने वाला व्यक्ति चाहे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी ही क्यों न हो, उसे अन्त में अपने पापों का फल भोगना ही पड़ता है। तुझे भी निर्दोष ऋषि-मुनियों को भयंकर यातनाएँ देने का फल भुगतना पड़ेगा। आज तेरे पापों का घड़ा भर गया है। तुझ जैसे अधर्मी, दुष्ट दानवों का विनाश करने के लिये ही मैं वन में आया हूँ। अब तू समझ ले कि तेरा भी अन्तिम समय आ पहुँचा है। अब तुझे कोई नहीं बचा सकता।"

राम के वचनों को सुन कर खर ने कहा, "हे अयोध्या के राजकुमार! वीर पुरुष अपने ही मुख से अपनी प्रशंसा नहीं किया करते। अपने इन वचनों से तुमने अपनी तुच्छता का ही परिचय दिया है। तुममें इतनी शक्ति नहीं है कि तुम मेरा वध कर सको। मेरी इस गदा ने अब तक सहस्त्रों आर्यों को रणभूमि में धराशायी किया है। आज यह तुम्हें भी चिरनिद्रा में सुला कर मेरी बहन के अपमान का प्रतिशोध दिलायेगी।" यह कहते हुये खर ने अपनी शक्तिशाली गदा को राम की ओर उनके हृदय का लक्ष्य करके फेंका। राम ने एक ही बाण से उस गदा को काट दिया। फिर एक साथ अनेक बाण मार कर खर के शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया। क्षत-विक्षत होने परे भी खर क्रुद्ध सर्प की भाँति राम की ओर लपका। इस पर राम ने अगस्त्य मुनि द्वारा दिया गये एक ही बाण से खर का हृदय चीर डाला। खर भयंकर चीत्कार करता हुआ विशाल पर्वत की भाँति धराशायी हो गया और उसके प्राण पखेरू सदा के लिये उड़ गये।

खर के मरने पर ऋषि-मुनि, तपस्वी आदि राम की जय-जयकार करते हुये उन पर पुष्प वर्षा करने लगे। उन्होंने राम की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुये कहा, "हे राघव! आज आपने दण्डक वन के निवासी तपस्वियों पर महान उपकार किया है। इन राक्षसों ने अपने उपद्रवों से हमारा जीवन, हमारी तपस्या, हमारी शान्ति सब कुछ नष्टप्राय कर दिये थे। आज से हम लोग आपकी कृपा से निर्भय और निश्चिन्त होकर सोयेंगे। परमपिता परमात्मा आपका कल्याण करें। इस प्रकार उन्हें आशीर्वाद देते हुये वे अपने-अपने निवास स्थानों को लौट गये। इसी समय लक्ष्मण भी सीता को गिरिकन्दरा से ले कर लौट आये। अपने वीर पति की शौर्य गाथा सुन कर सीता का हृदय गद्-गद् हो गया।

रामायण – अरण्यकाण्ड - राम का स्वर्णमृग के पीछे जाना

इस सुन्दर हिरण को पकड़ कर आश्रम में रखने की दृष्टि से सीता ने राम को पुकार कर अपने पास बुलाया और बोली, "हे नाथ! आप लक्ष्मण के साथ यहाँ शीघ्र आइये। देखिये, यह स्वर्णमृग कितना सुन्दर और प्यारा है।" उस माया मृग को देख कर लक्ष्मण ने राम से कहा, "तात! स्वर्ण का मृग आज तक न तो कभी हमने देखा और न सुना। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हमें छलने के लिये किसी राक्षसी माया की रचना की गई है।" लक्ष्मण के कथन को अनसुना कर के सीता बोली, "हे प्रभो! यह मृग शावक विधाता की अद्भुत रचनाओं में से एक है। आप इसे पकड़ कर अवश्य लाइये। मैं इससे अपना मन बहलाया करूँगी। जब हम वनवास समाप्त कर के अयोध्या लौटेंगे तो यह हमारे प्रासाद की शोभा बढ़ायेगा। अवधवासी इसे देख कर कितने प्रसन्न होंगे। यदि यह जीवित न पकड़ा जा सके तो इसे मार कर मृगछाला ही ले आइये। मैं उस पर बैठ कर ईश्वर आराधना करूँगी। जाइये, शीघ्रता कीजिये न।"

सीता के आग्रह को देख कर राम लक्ष्मण से बोले, "हे लक्ष्मण! इसमें सन्देह नहीं कि इस मृग का रूप वास्तव में आकर्षक है। यदि यह पकड़ा भी नहीं गया तो मारा तो अवश्य ही जायेगा। इसकी मृगछाला निःसन्देह मनोमुग्धकारी होगी। इसलिये इस अवश्य पकड़ना चाहिये। और यदि यह राक्षसी माया है तो भी इस राक्षस को मारना उचित ही होगा क्योंकि मैं राक्षसों को मारने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। तुम सावधान हो कर सीता की रक्षा करो। मैं इसे जीवित पकड़ने या मारने के लिये जाता हूँ। इतना कह कर राम धनुष बाण और तीक्ष्ण कृपाण ले कर मायावी मृग के पीछे चल पड़े। राम को अपनी ओर आता देख मृग भी उछलता कूदता गहन वन में घुस गया। वह प्राणों के भय से विविध वृक्षों, झाड़ियों के बीच छिपता प्रकट होता द्रुत गति से भागने लगा। उसका पीछा करते-करते रामचन्द्र बहुत आगे निकल गये। तब क्रुद्ध हो कर मृग के दृष्टिगत होते ही राम ने एक तीक्ष्ण बाण छोड़ा जो उसके मायावी छद्म वेश को चीर कर मारीच के हृदय तक पहुँच गया। बाण के लगते ही मारीच उछल कर अपने असली वेश में धराशायी हो गया और उच्च स्वर में 'हा लक्ष्मण! हा जानकी!' कहता हुआ मर गया। उसका विशाल मृत शरीर पृथ्वी पर ताड़ के वृक्ष की भाँति निश्चल पड़ा था।

मारीच का मृत शरीर देख कर राम को लक्ष्मण का कथन स्मरण हो आया। वास्तव में यह राक्षसी माया निकली। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि इस राक्षसी माया के पीछे कोई षड़न्त्र है। अनिष्ट की आशंका से वे तीव्र गति से आश्रम की ओर लौट पड़े। उन्हें यह भी ध्यान आया कि यह दुष्ट उच्च स्वर में 'हा लक्ष्मण! हा जानकी!' कह कर मरा है। कहीं ऐसा न हो कि लक्ष्मण सीता को अकेला छोड़ कर मेरी सहायता के लिये चल पड़े और सीता का कोई हरण कर ले जाये।

राम की आशंका सही निकली। जब सीता ने अपने पति के स्वर में 'हा लक्ष्मण! हा जानकी!' सुना तो उन्होंने घबरा कर लक्ष्मण से कहा, "हे लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे भैया संकट में पड़ गये हैं। तुम शीघ्र जा कर उनकी सहायता करो। मेरा हृदय चिन्ता से व्याकुल हो रहा है। ये उन्हीं के दुःख भरे शब्द थे।" सीता के आतुर वचन सुन कर लक्ष्मण बोले, "हे आर्ये! मैं आप को अकेला छोड़ कर नहीं जा सकता। भैया की ऐसी ही आज्ञा है। आप धीरज रखें वे अभी आते ही होंगे।"

लक्ष्मण के उत्तर से दुःखी हो कर सीता बोलीं, "लक्ष्मण! मुझे लगता है, तुम भाई के रूप में उनके शत्रु हो। जो उनके ऐसे आर्त स्वर सुन कर भी उनकी सहायता के लिये नहीं जाना चाहते। जब उनको ही कुछ हो गया तो मेरी रक्षा से क्या लाभ?" इस प्रकार कहते हुये उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। सीता की यह दशा देख कर लक्ष्मण हाथ जोड़ कर बोले, "माता! आप व्यर्थ दुःखी हो रही हैं। संसार में ऐसा कौन सा देव, दानव है जो भैया को परास्त कर सके या उनका बाल भी बाँका कर सके। आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, वे आते ही होंगे। आप नहीं जानतीं कि मायावी राक्षस नाना प्रकार के रूप धारण करते हैं और नाना प्रकार की बोलियाँ बोलते हैं। मैं जाने को तैयार हूँ, परन्तु ऐसा न हो कि अकेली रह कर आप किसी विपत्ति में पड़ जायें। इसीलिये मैं आप को अकेली नहीं छोड़ना चाहता।"

लक्ष्मण के तर्क ने सीता के क्रोध को और बढ़ा दिया। वे बोलीं, "लक्ष्मण! मैं तुम्हारी मनोवृति को भली-भाँति समझ रही हूँ। तुम राम के मर जाने पर मुझ पर अपना अधिकार जमाने की बात सोच रहे हो तो मैं तुम्हारी दुष्ट इच्छा को कभी पूरा नहीं होने दूँगी। राम के बिना मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।" सीता के ये वचन सुन कर लक्ष्मण का हृदय पीड़ा से भर उठा। उन्हें मूर्छा सी आने लगी। बड़ी कठिनाई से स्वयं को सँभाल कर बोले, "जानकी! मैं आपकी बातों का कोई उत्तर नहीं दे सकता, क्योंकि आप मेरी माता के स्थान पर हैं। मैं केवल यही कह सकता हूँ कि आज आप की बुद्धि नष्ट हो गई है जो अपने अग्रज की आज्ञा पालन करने वाले अनुज पर ऐसा दुष्टतापूर्ण लांछन लगा रही हैं। आज आप पर अवश्य कोई संकट आने वाला है। यह सब उसी की भूमिका है। मैं आपके द्वारा बलात् भेजा जा रहा हूँ। वन के देवता इसके साक्षी हैं।" यह कह कर कन्धे पर धनुष रख लक्ष्मण उधर चल दिये जिधर राम मारीच के पीछे गये थे।

रामायण – अरण्यकाण्ड - सीता हरण

लक्ष्मण के जाने के पश्चात् सन्यासी का वेष धारण कर रावण सीता के पास आया और बोला, "हे रूपसी! तुम कोई वन देवी हो या लक्ष्मी अथवा कामदेव की प्रिया स्वयं रति हो? तुम्हारे जैसी रूपवती, लावण्यमयी युवती मैंने आज तक इस संसार में नहीं देखा है। मझे यह देख कर आश्चर्य हो रहा है कि जो सौन्दर्य महलों में होना चाहिये था आज इस वन में कैसे दिखाई दे रहा है। तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? और इस वन में किस लिये निवास कर रही हो?"

रावण के प्रश्न को सुन कर सीता ने कहा, "हे सन्यासी! मैं तुम्हें और तुम्हारे वेश को नमस्कार करती हूँ। आप इस आसन पर बैठ कर यह जल और फल ग्रहण कीजिये। मेरा नाम सीता है। मैं मिथिलानरेश जनक की पुत्री और अयोध्यापति दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र की पत्नी हूँ। पिता की आज्ञा से मेरे पति अपने भाई भरत को अयोध्या का राज्य दे कर चौदह वर्ष के लिये वनवास कर रहे हैं। उन पराक्रमी सत्यपरायण वीर के साथ मेरे तेजस्वी देवर लक्ष्मण भी हैं। आप थोड़ी देर बैठिये, वे अभी आते ही होंगे। अब आप बताइये महात्मन्! आप कौन हैं और इधर किस उद्देश्य से पधारे हैं?" सीता का प्रश्न सुन कर रावण गरज कर बोला, "हे सीते! मैं तीनों लोकों, चौदह भुवनों का विजेता महाप्रतापी लंकापति रावण हूँ जिसके नाम से देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, मुनि सब थर-थर काँपते हैं। इन्द्र, वरुण, कुबेर जैसे देवता जिसकी चाकरी कर के अपने आप को धन्य समझते हैं। मैं तुम्हारे लावण्यमय सौन्दर्य को देख कर अपनी सुन्दर रानियों को भी भूल गया हूँ और मैं तुम्हें ले जा कर अपने रनिवास की शोभा बढ़ाना चाहता हूँ। हे मृगलोचने! तुम मेरे साथ चल कर नाना देशों से आई हुई मेरी अतीव सुन्दर रानियों पर पटरानी बन कर शासन करो। मेरे देश लंका की सुन्दरता को देख कर तुम इस वन के कष्टों को भूल जाओगी। इसलिये मेरे साथ चलने को तैयार हो जाओ।"

रावण का नीचतापूर्ण प्रस्ताव सुन कर सीता क्रुद्ध स्वर में बोली, "हे अधम राक्षस! तुम परम तेजस्वी, अद्भुत पराक्रमी और महान योद्धा रामचन्द्र के प्रताप को नहीं जानते इसीलिये तुम मेरे सम्मुख यह कुत्सित प्रस्ताव रखने का दुःसाहस कर रहे हो। अरे मूर्ख! क्या तू वनराज सिंह के मुख में से उसके दाँत उखाड़ना चाहता है? क्या तेरे सिर पर काल नाच रहा है जो तू यह घृणित प्रस्ताव ले कर यहाँ आया है? इस विचार को ले कर यहाँ आने से पूर्व तूने यह भी नहीं सोचा कि तू अपने नन्हें से हाथों से सूर्य और चन्द्र को पकड़ कर अपनी मुट्ठी में बन्द करना चाहता है। वास्तव में तेरी मृत्यु तुझे यहाँ ले आई है।" सीता के ये अपमानजनक वाक्य सुन कर रावण के तन बदन में आग लग गई। वह आँखें लाल करते हुये बोला, "सीते! तू मेरे बल और प्रताप को नहीं जानती। मैं आकाश में खड़ा हो कर पृथ्वी को गेंद की भाँति उठा सकता हूँ। अथाह समुद्र को एक चुल्लू में भर कर पी सकता हूँ। मैं तुझे लेने के लिये आया हूँ और ले कर ही जाउँगा।" यह कह कर रावण ने गेरुये वस्त्र उतार कर फेंक दिया और दोनों हाथों से सीता को उठा कर अपने कंधे पर बिठा निकटवर्ती खड़े विमान पर जा सवार हुआ। इस प्रकार अप्रत्यशित रूप से पकड़े जाने पर सीता ने 'हा राम! हा राम!!' कहते हुये स्वयं को रावण के हाथों से छुड़ाने का प्रयास किया। परन्तु बलवान रावण के सामने उनकी एक न चली। उसने उन्हें बाँध कर विमान में एक ओर डाल दिया और तीव्र गति से लंका की ओर चल पड़ा। सीता निरन्तर विलाप किये जा रही थी, "हा राम! पापी रावण मुझे लिये जा रहा है। हे लक्ष्मण! तुम कहाँ हो? तुम्हारी बलवान भुजाएँ इस समय इस दुष्ट से मेरी रक्षा क्यों नहीं करतीं? हाय! आज कैकेयी की मनोकामना पूरी हुई।" इस प्रकार विलाप करती हुई सीता ने मार्ग में खड़े जटायु को देखा। जटायु को देखते ही सीता चिल्लाई, "हे आर्य जटायु! देखो, लंका का यह दुष्ट राजा रावण मेरा अपहरण कर के लिये जा रहा है। आप तो मेरे श्वसुर के मित्र हैं। इस नराधम से मेरी रक्षा करें। यदि आप मुझे इस नीच के फंदे से नहीं छुड़ा सकते तो यह वृतान्त मेरे पति से तो अवश्य ही कह देना।"

रामायण – अरण्यकाण्ड - जटायु वध

सीता का आर्तनाद सुन कर जटायु ने उस ओर देखा तथा रावण को सीता सहित विमान में जाते देख बोले, "अरे ब्राह्मण! तू चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान होते हुये एक पर-स्त्री का अपहरण कर के ले जा रहा है। अरे लंकेश! महाप्रतापी श्री रामचन्द्र जी की यह भार्या है। तुम ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे कर रहे हो? राजा का धर्म तो पर-स्त्री की रक्षा करना है। तुम काम के वशीभूत हो कर अपना विवेक खो बैठे हो। छोड़ दो राम की पत्नी को। हे रावण! यह जानते हुये कि तुम बलवान, युवा तथा शस्त्रधारी हो और मैं दुर्बल, वृद्ध एवं शस्त्रहीन हूँ; फिर भी प्राण रहते मैं सीता की रक्षा करूँगा। तुमने जो यह भीषण अपराध किया है, उससे मैं तुम्हें रोकूँगा। यदि रोक न सका तो या तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा या स्वयं अपने प्राण दे दूँगा। मेरे जीवित रहते तुम सीता को नहीं ले जा सकोगे।"

जटायु के इन कठोर अपमानजनक शब्दों को सुन कर रावण उसकी ओर झपटा जो सीता को मुक्त कराने के लिये विमान की ओर तेजी से बढ़ रहा था। वायु से प्रवाहित दो मेघों की भाँति वे एक दूसरे से टकराये। क्रुद्ध जटायु ने मार-मार कर रावण को घायल कर दिया। घायल रावण भी वृद्ध दुर्बल जटायु से अधिक शक्तिशाली था। उसने अवसर पा कर जटायु की दोनों भुजायें काट दीं। पीड़ा से व्याकुल हो कर मूर्छित हो वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। जटायु को भूमि पर गिरते देख जानकी भी उसके पीछे भूमि पर गिरी, किन्तु रावण ने फुर्ती से केश पकड़ कर उन्हें भूमि पर गिरने से रोक लिया और "हा राम! हा लक्ष्मण!!" कह कर विलाप करती हुई सीता को विमान में एक ओर पटक दिया। फिर विमान को आकाश में ले जा कर तीव्र गति से लंका की ओर चल पड़ा।

जब उसने देखा कि सीता जोर-जोर से विलाप कर के वनवासियों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो उसने सीता को बलात् खींच कर अपनी गोद में डाल लिया और एक हाथ उनके मुख पर रख कर उनकी वाणी अवरुद्ध करने का प्रयास करने लगा। उस समय उन्नत भालयुक्त, सुन्दर कृष्ण केशों वाली, गौरवर्णा, मृगनयनी जानकी का सुन्दर मुख रावण की गोद में पड़ा ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा नीले बादलों को चीर कर चमक रहा हो। फिर भी सीता का क्रन्दन वन के प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। वन के सिंह, बाघ, मृग आदि रावण से कुपित हो कर उसके विमान के नीचे दौड़ने लगे। पर्वतों से गिरते हुये जल-प्रपात ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानों वे भी सीता के दुःख से दुःखी हो कर आर्तनाद करते हुये आँसू बहा रहे हों। श्वेत बादल से आच्छादित सूर्य भी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अपनी कुलवधू की दुर्दशा देख कर उसका मुख श्रीहीन हो गया हो। सब सीता के दुःख से दुःखी हो रहे थे।

जब सीता को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब दुष्ट रावण से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है तो वह बड़ी दीनता से परमात्मा से प्रार्थना करने लगी, "हे परमपिता परमात्मा! हे सर्वशक्तिमान! इस समय मेरी रक्षा करने वाला तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नहीं है। हे प्रभो! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो! हे दयामय! मेरे सतीत्व की रक्षा करने वाले केवल तुम ही हो।" जब सीता इस प्रकार भगवान से प्रार्थना कर रही थी तो उन्होंने नीचे एक पर्वत पर पाँच वानरों को बैठे देखा। उनको देख कर जानकी ने अनुसूया द्वारा दिये गये परिधान में उन्हीं के द्वारा दिये गये आभूषणों को बाँध कर ऊपर से गिरा दिया। अकस्मात् इस पोटली को गिरते देख वानरों ने ऊपर देखा कि एक विमान तेजी से उड़ता चला जा रहा है और उसमें बैठी कोई स्त्री विलाप कर रही है। वे इस विषय में कुछ और अधिक देख पाते उससे पूर्व विमान नेत्रों से ओझल हो गया। वनों, पर्वतों और सागर को पार करता हुआ रावण सीता सहित लंका में पहुँचा। उसने सीता को मय दानव द्वारा निर्मित सुन्दर महल में रखा। फिर क्रूर राक्षसनियों को बुला कर आज्ञा दी, "कोई भी मेरी आज्ञा के बिना इस स्त्री से मिलने न पावे। यह जो भी वस्त्र, आभूषण, खाद्यपदार्थ माँगे, वह तत्काल इसे दिया जाय। इसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये और न कोई इसका तिरस्कार करे। अवज्ञा करने वालों को दण्ड मिलेगा।"

इस प्रकार राक्षसनियों को आदेश दे कर अपने निजी महल में पहुँचा। वहाँ उसने अपने आठ शूरवीर सेनापतियों को बुला कर आज्ञा दी, "तुम लोग जा कर दण्डक वन में रहो। हमारे जनस्थान को राम लक्ष्मण नामक दो तपस्वियों ने उजाड़ दिया है। तुम वहाँ रह कर उनकी गतिविधियों पर दृष्टि रखो और उनकी सूचना मुझे यथाशीघ्र देते रहो। मैं तुम्हें यह अधिकार देता हूँ कि अवसर पा कर उन दोनों की हत्या कर डालो। मैं तुम्हारे पराक्रम से भली-भाँति परिचित हूँ। इसीलिये उन्हें मारने का दायित्व तुम्हें सौंप रहा हूँ।"

उन्हें इस प्रकार आदेश दे कर वह कामी राक्षस वासना से पीड़ित हो कर सीता से मिलने के लिये चल पड़ा।

रामायण – अरण्यकाण्ड - रावण-सीता संवाद

राम के वियोग में आँसू बहाती हुई जानकी के पास जा कर रावण बोला, "हे सुमुखी! अब उस तपस्वी के लिये आँसू बहाने से क्या लाभ? अब तू उसे भूल जा। तू प्रेम भरी दृष्टि से मेरी ओर देख। यह सम्पूर्ण राज्य मैं तुझे अर्पित कर दूँगा। यह राज्य ही नहीं, मैं भी, जो तीनों लोकों का स्वामी हूँ, तेरे चरणों का दास बन कर रहूँगा। मैं तुझे प्राणों से भी बढ़ कर चाहने लगा हूँ। मेरी समस्त सुन्दर रानियाँ तेरी दासी बन कर रहेंगीं। तू केवल मुझे पति रूप में स्वीकार कर ले। मैं आज ही देश भर में तेरे लंका की पटरानी होने की घोषणा करा दूँगा। सारे देव, दानव, नर, किन्नर जो मेरे दास हैं, वे सब तेरे संकेत पर अपने प्राण भी न्यौछावर करने को तैयार हो जायेंगे। तूने जो यह वनवास का कठोर जीवन व्यतीत किया है यह तेरे पूर्वजन्मों का फल था। अब उसकी अवधि समाप्त समझ। मुझसे विवाह करके तीनों लोकों की स्वामिनी बनने के तेरे दिन आ गये हैं। तेरे हाँ कहते ही संसार के सर्वोत्तम दिव्य वस्त्र, आभूषण, भोज्य पदार्थ तेरे सम्मुख उपस्थित कर दिये जायेंगे। तेरे जैसी अनुपम सुन्दरी रोने-बिलखने और कष्ट उठाने के लिये उत्पन्न नहीं हुई है, तू मेरी पटरानी बन कर मेरे साथ पुष्पक विमान में बैठ कर आकाश में विहार कर। यदि तू धर्म और लोकलाज से भयभीत होती है, तो यह तेरा विचार मिथ्या और निर्मूल है। किसी सुन्दरी का युद्ध में हरण कर के उसके साथ विवाह करना भी तो वैदिक रीति का ही एक अंग है। इसलिये तू निःशंक हो कर मेरी बन जा।"

रावण के इन वासनामय शब्दों को सुन कर उसके और अपने मध्य में तृण रख शोक संतप्त सीता बोली, "हे नराधम! परम पराक्रमी, धर्मपरायण एवं सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्री रामचन्द्र जी ही मेरे पति हैं। मैं उनके अतिरिक्त किसी अन्य की ओर दृष्टि तक भी नहीं कर सकती। तेरे अनर्गल प्रलाप से ऐसा प्रतीत होता है कि अब लंका सहित तेरे विनाश का समय आ गया है। तू कायरों की तरह मुझे चुरा कर अब डींगें हाँक रहा है। यदि उनके सम्मुख मेरा अपहरण करने का प्रयास करता तो तेरी भी वही दशा होती जो तेरे भाई खर और दूषण की हुई है। यदि तू उनके सामने पड़ जाता तो उनके बाण तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देते। तू ऐसे भ्रम में मत रह कि जब देवता और राक्षस तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो राम भी तुझे नहीं मार सकेंगे। उनके हाथों से तेरी मृत्यु निश्चित है। अब तेरा जीवनदीप बुझने वाला है। तेरे तेज, बल और बुद्धि तो पहले ही नष्ट हो चुके हैं। और जिसकी बुद्धि नष्ट हो चुकी होती है, उसका विनाश-काल दूर नहीं होता। जो तू मुझसे बार-बार विवाह करने की बात कहता है, तूने एक बार भी सोचा है कि कमलों में विहार करने वाली हंसिनी क्या कभी कुक्कुट के साथ रह सकती है? मैं तुझे सावधान करती हूँ कि तू बार-बार मेरे पति की निन्दा न कर, चाहे मेरे इस क्षणभंगुर शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डाल। मैं तो तेरे जैसे नीच से वार्तालाप करना भी पाप समझती हूँ।"

सीता के कठोर एवं अपमानजनक वाक्य सुन कर रावण कुपित हो कर बोला, "हे सीते! यदि मैं चाहूँ तो अभी तेरा सिर काट कर तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँ। परन्तु मुझे तुझ पर दया आती है। यदि एक वर्ष के अन्दर तूने मुझे पति के रूप में स्वीकार न किया तो मैं तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।" फिर वह राक्षसनियों से बोला, "तुम इसे यहाँ से अशोक वाटिका में ले जा कर रखो और जितना कष्ट दे सकती हो, दो। तुम्हें इसकी पूरी स्वतन्त्रता है।"

लंकापति रावण की आज्ञा पाकर राक्षसनियाँ सीता को अशोक वाटिका में ले गईं। अशोक वाटिका एक रमणीय स्थल होते हुये भी सीता के लिये पति वियोग और निशाचरी दुर्व्यवहार के कारण दुःखदायी स्थान बन गया था।

रामायण – अरण्यकाण्ड - राम की वापसी और विलाप

जब राम मारीच का वध कर के आश्रम की ओर लौटे तो उन्होंने मार्ग में लक्ष्मण को आते देखा। जनकदुलारी सीता के बिना अकेले लक्ष्मण को देख आशंका से उनका माथा ठनका। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि किसी राक्षसी षड़यंत्र के फलस्वरूप सीता किसी कठिनाई में फँस गई है। उन्होंने चिन्तित हो कर पूछा, "लक्ष्मण! सीता कहाँ है? जब मैं तुम्हें यह आदेश दे आया था कि तुम सीता की रक्षा करना, फिर तुम उसे अकेली कैसे छोड़ आये? वह किसी विपत्ति में तो नहीं फँस गई? जीवित तो है? शीघ्र बताओ उसे क्या हुआ है? यदि वह जीवित नहीं होगी तो मैं आश्रम नहीं जाउँगा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उस मायावी राक्षस ने हा 'लक्ष्मण!' कह कर तुम्हें भी भ्रम में डाल दिया है और इस दुरभिसन्धि के फलस्वरूप तुम सीता को अकेली छोड़ कर यहा दौड़ आये हो? अथवा सीता ने ही भ्रमित हो कर तुम्हें यहाँ आने को विवश किया हो। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि राक्षसों ने अपने प्रतिशोध लेने के लिये यह चाल चली है और तुम इसमें फँस गये हो। खर और दूषण की मृत्यु का बदला लेने के लिये उन्होंने सीता को मार डाला होगा।"

इस प्रकार चिन्ता में डूबते उतराते हुये राम के साथ लक्ष्मण जब अपने आश्रम पहुँचे तो उनकी आशंका सही निकली। उन्हें सीता कहीं दिखाई नहीं दी। उन्होंने आश्रम का कोना-कोना छान मारा, परन्तु उस समय पर्णकुटी की दशा शीत से मारी हुई कमलिनी जैसी हो रही थी। आश्रम के वृक्ष और पत्ते भी वायु में सन-सना कर दुःख भरी ठण्डी आहें लेते प्रतीत होते थे। रामचन्द्र ने देखा, मृगछाला और कुश इधर-उधर बिखरे पड़े हैं, आसन औंधे पड़े हैं, वृक्षों के फूल-पत्ते तथा कहीं-कहीं टहनियाँ टूटी या अधटूटी पड़ी हैं। आश्रम का अस्त-व्यस्त दृष्य देख कर राम विचार करने लगे। सीता का किसी ने हरण कर लिया, अथवा किसी दुष्ट राक्षस ने उसे अपना आहार बना लिया। कहीं वह फूल चुनने या नदी पर जल भरने तो नहीं चली गई। जब सब ओर खोजने पर भी उन्हें सीता कहीं दिखाई न दी तो उनकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। मस्तिष्क घूमने लगा। वे इधर-उधर नदी-नालों पर्वत-कन्दराओं पर जा-जा कर उन्मत्त की भाँति आवाज दे-दे कर सीता की खोज करने लगे। अन्त में उनकी उन्मत्तता इतनी बढ़ गई कि वे कभी कदम्ब के वृक्ष के पास जाकर कहते, "हे कदम्ब! मेरी सीता को तेरे पुष्पों से बहुत स्नेह था। तू ही बता वह कहाँ है?" कभी विल्व के पास जा कर उससे पूछते, "हे विल्व विटप! क्या तुमने पीतवस्त्रधारिणी सीता को कहीं देखा है?" इस प्रकार वे कभी किसी वृक्ष से, कभी किसी लता से और कभी पुष्प समूहों से सीता का पता पूछते। कभी अशोक वृक्ष के पास जा कर कहते, "अरे अशोक विटप! तेरा तो नाम ही अशोक है, फिर तू सीता से मेरी भेंट करा कर मेरे शोक का हरण क्यों नहीं करता?" फिर ताड़ के वृक्ष से कहते, "तू तो सब वृक्षों से ऊँचा है। तू दूर-दूर की वस्तुएँ देख सकता है। देख कर बता क्या तुझे सीता कहीं दिखाई दे रही है। चुपचाप खड़ा न रह। यदि तू देखना चाहेगा तो तुझे वह अवश्य दिखाई देगी।"

इस प्रकार नाना प्रकार के वृक्षों से पूछ-पूछ कर रामचन्द्र विलाप करने लगे, "हे प्राणवल्लभे जानकी! तू कहाँ छिप गई? यदि तू वृक्षों की ओट में छिप कर हँसी कर रही है तो मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ, तू प्रकट हो जा। देख, मैं तेरे बिना कितना व्याकुल हो रहा हूँ। अब बहुत हँसी हो चुकी। मैं हार मानता हूँ। मैं तुझे नहीं ढूँढ पा रहा हूँ। या तू सचमुच मुझसे रूठ गई है। बोल प्यारी सीते, बोल, जल्दी बोल, तू कहाँ है? इधर देख, तेरे साथ खेलने वाले मृग शावक भी तेरे वियोग में अश्रु बहा रहे हैं। सीते! तेरे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। मैं चाहता हूँ, अभी तेरे वियोग में अपने प्राण त्याग दूँ किन्तु पिता की आज्ञा से विवश हूँ। मुझे स्वर्ग में पा कर वे धिक्करेंगे और कहेंगे 'तू मेरी आज्ञा की अवहेलना कर के - चौदह वर्ष की वनवास की अवधि पूरी किये बिना ही - स्वर्ग में कैसे चला आया।' हा! मैं कितना अभागा हूँ, जो तुम्हारे विरह में मर भी नहीं सकता। हाय जानकी! तुम ही बताओ, तुम्हारे बिना मैं क्या करू?"

बड़े भाई को इस प्रकार विलाप करते देख लक्ष्मण ने उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा, "हे नरोत्तम! रोने और धैर्य खोने से कोई लाभ नहीं होगा। आइये, आश्रम से बाहर चल कर वनों और गिरि-कन्दराओं में भाभी की खोज करें। उन्हें वनों तथा पर्वतों में भ्रमण करने का चाव था। सम्भव है, वहीं कहीं भ्रमण कर रही हों। यह भी सम्भव है कि गोदावरी के तट पर बैठी मछलियों की जलक्रीड़ा देख रहीं हों या किसी भय की आशंका से भयभीत हो कर किसी लता कुँज में बैठी हों। इसलिये हमारे लिये यही उचित है कि हम विषाद और चिन्ता को छोड़ कर उनकी खोज करें।"

लक्ष्मण के युक्तियुक्त वचन सुन कर राम उसके साथ वनों, लताओं, गिरि-कन्दराओं आदि में खोज करने के लिये चले। उन दोनों ने वन, पर्वत-कन्दरा आदि का एक-एक कोना खोज डाला, परन्तु उन्हें सीता कहीं नहीं मिली। अन्त में राम हताश हो कर बोले, "भैया सौमित्र! यहाँ तो कोई ऐसा स्थान शेष नहीं बचा जहाँ हमने जानकी की खोज न की हो, परन्तु हमें सर्वत्र निराशा ही हाथ लगी। अब ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी सीता मुझे कभी नहीं मिलेगी। मैं वनवास की अवधि बिता कर जब अयोध्या लौटूँगा और माता कौशल्या पूछेंगी कि सीता कहाँ है तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? मिथिलापति जनक को क्या मुँह दिखाउँगा।" यह कहते हुये वे जोर-जोर से विलाप करने लगे, "हे सीते! मैं तुम्हें कहाँ ढूँढू? हे वनों के मृगों! क्या तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है? हे वनों की कोकिलों! क्या तुमने कहीं कोकिलाकण्ठी जानकी को देखा है? कोई तो कुछ बताओ। क्या सभी मेरे लिये निर्मोही हो गये हो? कोई नहीं बोलता, कोई नहीं बताता। कोई भी मुझसे बात करना नहीं चाहता। मैं नपुंसक हूँ, कायर हूँ जो अपनी भार्या की रक्षा न कर सका।"

थोड़ी देर मौन रहने के पश्चात् वे फिर लक्ष्मण से बोले, "हे सौमित्र! अब सीता के बिना मैं किसी को मुख दिखाने के लायक नहीं रहा। मैं अवधि पूर्ण होने पर अयोध्या भी नहीं जाउँगा। तुम अब अयोध्या लौट जाओ। मेरी ओर से भरत से कह देना अब तुम ही अयोध्या का राज्य सँभालो। मैं कभी नहीं लौटूँगा। माता कौशल्या से कहना कि किस प्रकार सीता का अपहरण हो गया और उसकी विरह-व्यथा को न सह सकने के कारण राम ने आत्महत्या कर ली। अब तुम्हारे जाते ही मैं गोदावरी नदी में कूद कर अपने प्राण त्याग दूँगा। वास्तव में मैं इस संसार में सबसे बड़ा पापी हूँ। इसीलिये तो मुझे एक के पश्चात् एक अनेक दुःख मिलते चले जा रहे हैं। पहले पिताजी का स्वर्गवास हुआ और अब सीता भी मुझे छोड़ कर जाने कहाँ चली गई। घर बार और सम्बंधी तो पहले ही छूट गये थे। मुझे रह-रह कर यह ध्यान आता है कि सीता राक्षसों के चंगुल में फँस गई है। वह भी रो-रो कर अपने प्राण विसर्जित कर रही होगी। तुम कहते हो कि वन में या गोदावरी के तट पर गई होगी। ये सब मन बहलाने की बातें हैं। जो वनवास की इतनी लम्बी अवधि में एक बार भी आश्रम से अकेली बाहर नहीं निकली, वह आज ही कैसे जा सकती है? अवश्य ही राक्षसों ने उसका अपहरण कर लिया है अथवा उसे अपना आहार बना लिया है। इन वृक्षों, पशुओं आदि से इतना सामीप्य होते हुये भी कोई मुझे सीता का पता नहीं बताता। हा सीते। हा प्राणवल्लभे! तू ही बता मैं तुझे कहाँ ढूँढू? कहाँ जा कर खोजूँ?"

रामायण – अरण्यकाण्ड - जटायु से भेंट

राम को इस प्रकार असहाय अनाथ की भाँति रुदन करते देख लक्ष्मण ने उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा, "भैया! तनिक सोचो, कितनी तपस्या से माता कौशल्या और पिताजी ने आपको प्राप्त किया है। आपके वियोग में ही पिताजी ने बिलखते हये अपने प्राण त्याग दिये। यदि इसी प्रकार रुदन करते हुये आप अपने प्राण त्याग देंगे तो सोचिये, तीनों माताओं, भरत और मेरी क्या दशा होगी? आपके वियोग में हम कितने दिन जीवित रह सकेंगे? फिर आपके प्यारे अयोध्यावासियों का क्या होगा? आपने ऋषि-मुनियों को साक्षी देकर राक्षसों के विनाश की जो प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा? क्या लोग यह कह कर निन्दा न करेंगे कि सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलसूर्य राघव अपने निजी दुःखों को वरीयता दे कर अपनी प्रतिज्ञा से विचलित हो गये? हे पुरुषोत्तम! सुख-दुःख का तो नित्य घूमने वाला चक्र है। ऐसा कौन है जिस पर विपत्तियाँ नहीं आतीं और ऐसी कौन सी विपत्ति है जिसका अन्त नहीं होता? किसी के सदैव एक से दिन नहीं रहते। आप तो स्वयं महान विद्वान हैं। क्या आपको शिक्षा देता मैं अच्छा लगता हूँ? आप परिस्थितियों पर विचार कर के धैर्य धारण करें। कहीं न कहीं हमें जानकी जी की खोज अवश्य मिलेगी।"

लक्ष्मण के मर्म भरे वचनों को सुन कर राम ने अपने आप को सँभाला और लक्ष्मण के साथ सीता की खोज करने के लिये खर-दूषण के जनस्थान की ओर चले। मार्ग में उन्होंने अपने पिता के सखा जटायु को देखा। उसे देख कर उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "भैया! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इसी जटायु ने सीता को खा डाला है। मैं अभी इसे यमलोक भेजता हूँ।" ऐसा कह कर क्रोध से तिलमिलाते हुये उन्होंने अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और जटायु को मारने के लिये आगे बढ़े। राम को अपनी ओर आते देख जटायु बोला, "राम! तुम आ गये। अच्छा हुआ। तुम्हारी ही प्रतीक्षा में मेरे प्राण अटके हुये थे। लंका का राजा सीता का हरण कर के ले गया है और उसी ने मेरी भुजाएँ काट कर मुझे बुरी तरह से घायल कर दिया है। हे वीर! जिस जनकनन्दिनी को तुम यहाँ वन पर्वत में ढूँढ रहे हो, उसे रावण अपने विमान में बिठा कर लंका ले गया है। सीता की पुकार सुन कर मैं उसकी सहायता के लिये गया भी था, परन्तु उस महाबली राक्षस ने मुझे मार-मार कर मेरी यह दशा कर दी। वृद्धावस्था के कारण मैं उस पर पार नहीं पा सका। यह उसका धनुष और उसके बाण हैं। इधर कुछ उसके विमान का टूटा हुआ भाग पड़ा है। अब मेरा अन्तिम समय आ गया है। इसलिये मैं अधिक नहीं बोल पा रहा हूँ। मैं तुम्हारे पिता का मित्र हूँ, अतएव मेरे मरने पर तुम मेरा अन्तिम संस्कार कर देना।" इतना कह कर जटायु का गला रुँध गया, आँखें पथरा गईं और उसके प्राण पखेरू उड़ गये।

जटायु के प्राणहीन रक्तरंजित शरीर को देख कर राम दुःखी होकर लक्ष्मण से बोले, "भैया! सचमुच मैं कितना अभागा हूँ। राज्य छिन गया, घर से निर्वासित हुआ, पिता का देहान्त हो गया, सीता का अपहरण हुआ और आज पिता के मित्र जटायु का भी मेरे कारण निधन हुआ। मेरे ही कारण इन्होंने अपने शरीर की बलि चढ़ा दी। इनके इस बलिदान से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। इनके मरने का मुझे बड़ा दुःख है। तुम जा कर लकड़ियाँ एकत्रित करो। मैं अपने हाथों से इनका दाह-संस्कार करूँगा। ये मेरे पिता के समान थे।"

राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने लकड़ियाँ एकत्रित कीं। दोनों ने मिल कर चिता का निर्माण किया। राम ने पत्थरों को रगड़ कर अग्नि निकाली। फिर द्विज जटायु के शरीर को चिता पर रख कर बोले, "हे पूज्य गृद्धराज! जिस लोक को यज्ञ एवं अग्निहोत्र करने वाले, समरांगण में लड़ कर प्राण देने वाले और धर्मात्मा व्यक्ति जाते हैं, उसी लोक को आप प्रस्थान करें। आपकी कीर्ति इस संसार में सदैव अटल रहेगी।" यह कह कर उन्होंने चिता में अग्नि प्रज्वलित कर दी। थोड़ी ही देर में जटायु का नश्वर शरीर पंचभूतों में मिल गया। इसके पश्चात् दोनों भाइयों ने गोदावरी के तट पर जा कर दिवंगत जटायु को जलांजलि दी।

रामायण – अरण्यकाण्ड - कबंध का वध

पक्षिराज जटायु को जलांजलि दे कर राम और लक्ष्मण सीता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर चले क्योंकि अब उनको यह तो ज्ञात हो ही चुका था कि लंका का राजा रावण सीता को इसी दिशा में ले कर गया है। कुछ दूर आगे चल कर वे पगडंडी विहीन वन में पहुँचे। वृक्षों, झाड़ियों एवं लताओं ने आगे का मार्ग अवरुद्ध कर दिया था। कठिनता से उसे पार कर वे क्रौंच नाम वन में पहुँचे। वह वन और भी सघन तथा अन्धकारमय जथा। उसकी सघनता तथा दुर्गमता को देख कर उन्होंने सोचा, सम्भव है रावण ने सीता को वहीं छिपा कर रखा हो, परन्तु बहुत खोजने पर भी जब कोई परिणाम नहीं निकला तो वे और आगे चले। इस वन को पार कर के मतंगाश्रम नामक वन में पहुँचे जो पिछले वन से भी अधिक भयानक और हिंसक पशुओं से पूर्ण था। घूमते-घूमते वे ऐसी पर्वत कन्दरा पर पहुँचे तो पाताल की भाँति गहरी और इतनी अन्धकारपूर्ण थी कि हाथ को हाथ नहीं सूझता था।

उस विशाल कन्दरा के मुख पर एक अत्यन्त मलिन, लम्बे पेट वाली, बड़े-बड़े दाँतों और बिखरे केश वाली, मलिनमुखी राक्षसिनी बैठी हुई हड्डी चबा रही थी। राम लक्ष्मण को देख कर वह अट्टहास करती हुई दौड़ी और लक्ष्मण से लिपट कर बोली, मेरा नाम अयोमुखी है। मैं बहुत दिनों से किसी सुन्दर युवक की प्रतीक्षा कर रही थी। अब तुम आ गये। चलो, मेरे साथ विहार करो।"

उसकी इस कुचेष्टा से क्रुद्ध हो कर लक्ष्मण ने अपनी म्यान से तलवार निकाली और उसके नाक, कान तथा उरोज काट डाले। उसके सारे शरीर पर रक्त की धाराएँ बहने लगीं और वह चीत्कार करती हुई वहाँ से भाग गई। अयोमुखी के भाग जाने के पश्चात् दोनों भाई थोड़ी दूर गये थे कि उन्हें एक भयंकर स्वर सुनाई दिया जिसकी गर्जना से सम्पूर्ण पृथ्वी और आकाश काँपते हुये प्रतीत हो रहे थे। इससे सावधान हो कर दोनों भाइयों ने तलवार निकाल कर उस दिशा में पग बढ़ाये जिधर से वह भयंकर गर्जना आ रही थी। उन्होंने गज के आकार वाले बिना गर्दन के कबंध राक्षस को देखा। उसका मुख और आँखें उसके वक्ष पर चमक रही थीं। वह दोनों मुट्ठियों में वन के जन्तुओं को पकड़े इनका मार्ग रोके खड़ा था। राम-लक्ष्मण को देखते ही उसने लपक कर दोनों को अपनी भुजाओं में दबा लिया और बोला, "बड़े भाग्य से आज ऐसा सुन्दर भोजन मिला है। तुम दोनों को खा कर मैं अपनी क्षुधा शान्त करूँगा।" इस आकस्मिक आक्रमण से लक्ष्मण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये, परन्तु रामचन्द्र ने बड़ी फुर्ती से उस राक्षस की दोनों भुजाएँ काट डालीं। वह चीत्कार करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। पृथ्वी पर पड़े हुये वह बोला, "हे पुरुष श्रेष्ठ! आपने राक्षस योनि से मुझे मुक्ति दिला कर मेरा बड़ा उपकार किया है। इन्द्र ने मुझे पहले ही बता दिया था कि आपके हाथों से मुझे सद्गति प्राप्त होगी। अब आप मुझ पर इतनी कृपा और करना कि अपने हाथों से मेरा दाह-संस्कार कर देना।"


कबंध की प्रार्थना सुन कर राम बोले, "हे राक्षसराज! मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा। मैं तुमसे कुछ सूचना प्राप्त करना चाहता हूँ। आशा है अवश्य दोगे। दण्डक वन से मेरी अनुपस्थिति में लंकापति रावण मेरी पत्नी का अपहरण कर के ले गया है। मैं उसके बल, पराक्रम, स्थान आदि के विषय में तुमसे पूरी जानकारी चाहता हूँ। यदि जानते हो तो बताओ।" राम का प्रश्न सुन कर कबंध बोला, "हे नरश्रेष्ठ! रावण बड़ा बलवान और शक्तिशाली नरेश है। उससे देव-दानव सभी भयभीत रहते हैं। उस पर विजय प्राप्त करने के लिये आपको नीति का सहारा लेना होगा। आप ऐसा कीजिये कि यहाँ से पम्पा सरोवर चले जाइये। वहाँ ऋष्यमूक पर्वत पर वानरों का राजा सुग्रीव अपने चार वीर वानरों के साथ निवास करता है। वह अत्यन्त वीर, पराक्रमी, तेजस्वी, बुद्धिमान, धीर और नीतिनिपुण है। उसके पास एक विशाल पराक्रमी सेना भी है जिसकी सहायता से आप रावण पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। उसके ज्येष्ठ भ्राता बालि ने उसके राज्य और उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया है। यदि आप उसे मित्र बना सकें तो आपका कार्य सिद्ध हो जायेगा। वह राक्षसों के सब स्थानों को जानता और उनकी मायावी चालों को भी समझता है। उसे भी इस समय एक सच्चे पराक्रमी मित्र की आवश्यकता है। आपका मित्र बन जाने पर वह अपने वानरों को भेज कर सीता की खोज करा देगा। साथ ही सीता को वापस दिलाने में भी आपकी सहायता करेगा।" इतना कह कर कबंध ने अपने प्राण त्याग दिये। रामचन्द्र उसका अन्तिम संस्कार कर के लक्ष्मण सहित पम्पासर की ओर चले। पम्पासर के निकट उन्होंने एक सुन्दर सरोवर देखा जिसमें दोनों भाइयों ने स्नान किया।

रामायण – अरण्यकाण्ड - शबरी का आश्रम

स्नान करने के पश्चात् अपनी क्लान्ति मिटा कर दोनों भाई सुग्रीव से मिलने के उद्देश्य से पम्पासर के पश्चिम तट के निकट पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक सुन्दर, स्वच्छ एवं रमणीक आश्रम देखा। वह शबरी नामक भीलनी का आश्रम था। उसने राम-लक्ष्मण को उधर से निकलते देख उनका स्वागत किया और आदरपूर्वक उन्हें अपने आश्रम में ले आई। उनके चरण स्पर्श कर उनका यथोचित सत्कार और पूजन किया। इससे प्रसन्न हो आसन पर बैठ रामचन्द्र जी बोले, "हे तपस्विनी! तुम्हारी तपस्या में किसी प्रकार की कोई विघ्न-बाधा तो नहीं पड़ती? कोई राक्षस आदि तुम्हें कष्ट तो नहीं देते?"

राम के स्नेह भरे शब्द सुन कर वृद्धा शबरी हाथ जोड़ कर बोली, "हे प्रभो! आपके दर्शन पा कर मेरी सम्पूर्ण तपस्या सफल हो गई। मेरे गुरुदेव तो उसी दिन बैकुण्ठवासी हो गये थे जिस दिन आप चित्रकूट में पधारे थे। उन्होंने अपने अन्तिम समय में आपके विषय में मुझे बताया था। तभी से मैं आपके स्वागत के लिये इस वन के मीठे और स्वादिष्ट फल छाँट-छाँट कर एकत्रित करती रही हूँ। कृपया इन्हें ग्रहण कर के मुझे कृतार्थ करें।"

शबरी ने जो फल प्रेम और श्रद्धा से एकत्रित किये थे, उन्हें राम ने बड़े प्रेम से स्वीकार किया। वे एक-एक बेर खते जाते थे और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते जाते थे। जब वे स्वाद ले-ले कर सब बेर खा चुके तो शबरी ने उन्हें बताया, "हे राम! यह सामने जो सघन वन दिखाई देता है, मातंग वन है। मेरे गुरुओं ने एक बार यहाँ बड़ा भारी यज्ञ किया था। यद्यपि इस यज्ञ को हुये अनेक वर्ष हो गये हैं, फिर भी अभी तक सुगन्धित धुएँ से सम्पूर्ण वातावरण सुगन्धित हो रहा है। यज्ञ के पात्र भी अभी यथास्थान रखे हुये हैं। हे प्रभो! मैंने अपने जीवन की सभी धार्मिक मनोकामनाएँ पूरी कर ली हैं। केवल आपके दर्शनों की अभिलाषा शेष थी, वह आज पूरी हो गई। अब आप मुझे अनुमति दें कि मैं इस नश्वर शरीर का परित्याग कर के वहीं चली जाऊँ जहाँ मेरे गुरुदेव गये हैं।"

शबरी की अदम्य शक्ति और श्रद्धा देख कर राम ने कहा, "हे परम तपस्विनी! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी। मैं भी प्रार्थना करता हूँ कि परमात्मा तुम्हारी मनोकामना पूरी करें।"

रामचन्द्र जी का आशीर्वाद पा कर शबरी ने समाधि लगाई और इस प्रकार अपने प्राण विसर्जित कर दिये। इसके पश्चात् शबरी का अन्तिम संस्कार कर के दोनों भाई पम्पा सरोवर पहुँचे। निकट ही पम्पा नदी बह रही थी जिसके तट पर नाना प्रकार के वृक्ष पुष्पों एवं पल्लवों से शोभायमान हो रहे थे। स्थान की शोभा को देख कर राम अपना सारा शोक भूल गये। वे सुग्रीव से मिलने की इच्छा को मन में लिये पम्पा के किनारे-किनारे पुरी की ओर चलने लगे।

॥अरण्यकाण्ड समाप्त॥

रामायण – किष्किन्धाकाण्ड - पम्पासर में राम हनुमान भेंट

कमल, उत्पल तथा मत्स्यों से परिपूर्ण पम्पा सरोवर के पास पहुँचने पर वहाँ के रमणीय दृश्यों को देख कर राम को फिर सीता का स्मरण हो आया और वे पुनः विलाप करने लगे।

उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "हे सौमित्र! इस पम्पा सरोवर का जल वैदूर्यमणि के समान स्वच्छ एव श्याम है। इसमें खिले हुये कमल पुष्प और क्रीड़ा करते हुये जल पक्षी कैसे सुशोभित हो रहे हैं! चैत्र माह ने वृक्षों को पल्लवित कर फूलों और फलों से समृद्ध कर दिया है। चारों ओर मनोहर सुगन्ध बिखर रही है। यदि आज सीता भी अपने साथ होती तो इस दृश्य को देख कर उसका हृदय कितना प्रफुल्लित होता। ऐसा प्रतीत होता है कि वसन्तरूपी अग्नि मुझे जलाकर भस्म कर देगी। हा सीते! तुम न जाने किस दशा में रो-रो कर अपना समय बिता रही होगी। मैं कितना अभागा हूँ कि तुम्हें अपने साथ वन में ले आया, परन्तु तुम्हारी रक्षा न कर सका। हा! पर्वत-शिखरों पर नृत्य करते हुये मोरों के साथ कामातुर हुई मोरनियाँ कैसा नृत्य कर रहीं हैं। हे लक्ष्मण! जिस स्थान पर सीता होगी, यदि वहाँ भी इसी प्रकार वसन्त खिला होगा तो वह उसके विरह-विदग्ध हृदय को कितनी पीड़ा पहुँचा रहा होगा। वह अवश्य ही मेरे वियोग में रो-रो कर अपने प्राण दे रही होगी। मैं जानता हूँ, वह मेरे बिना पानी से बाहर निकली हुई मछली की भाँति तड़प रही होगी। उसकी वही दशा हो रही होगी जो आज मेरी हो रही है, अपितु मुझसे अधिक ही होगी क्योंकि स्त्रियाँ पुरुषों से अधिक भावुक और कोमल होती हैं। यह सम्पूर्ण दृश्य इतना मनोरम है कि यदि सीता मेरे साथ होती तो इस स्थान को छोड़ कर मैं कभी अयोध्या न जाता। सदैव उसके साथ यहीं रमण करता। किन्तु यह तो मेरा स्वप्नमात्र है। आज तो यह अभागा प्यारी सीता के वियोग में वनों में मारा-मारा फिर रहा है। जिस सीता ने मेरे लिये महलों के सुखों का परित्याग किया, मैं उसीकी वन में रक्षा नहीं कर सका। मैं कैसे यह जीवन धारण करूँ? मैं अयोध्या जा कर किसी को क्या बताउँगा? माता कौसल्या को क्या उत्तर दूँगा? मुझे कुछ सुझाई नहीं देता। मैं इस विपत्ति के पहाड़ के नीचे दबा जा रहा हूँ। मुझे इस विपत्ति से छुटकारे का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। मैं यहीं पम्पासर में डूब कर अपने प्राण दे दूँगा। भाई लक्ष्मण! तुम अभी अयोध्या लौट जाओ। मैं अब जनकनन्दिनी सीता के बिना जीवित नहीं रह सकता।"

बड़े भाई की यह दशा देख कर लक्ष्मण बोले, "हे पुरुषोत्तम राम! आप शोक न करें। हे तात रघुनन्दन! आप यदि रावण पाताल में या उससे भी अधिक दूर चला जाये तो भी वह अब किसी भी तरह से जीवित नहीं रह सकता। आप पहले उस पापी राक्षस का पता लगाइये। फिर वह सीता को वापस करेगा या अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा। आप तो अत्यन्त धैर्यवान पुरुष हैं। आपको ऐसी विपत्ति में सदैव धैर्य रखना चाहिये। हम लोग अपने धैर्य, उत्साह और पुरुषार्थ के बल पर ही रावण को परास्त कर के सीता को मुक्त करा सकेंगे। आप धैर्य धारण करें।"

लक्ष्मण के इस प्रकार से समझाने पर अत्यन्त सन्तप्त राम ने शोक और मोह का परित्याग कर के धैर्य धारण किया। वे पम्पा सरोवर को लाँघ कर आगे बढ़े।

चलते-चलते जब वे ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुँचे तो अपने साथियों के साथ उस पर्वत पर विचरण करने वाले बलवान वानरराज सुग्रीव ने इन दोनों तेजस्वी युवकों को देखा।

इन्हें देख कर सुग्रीव के मन में शंका हुई और उन्होंने अपने मन्त्रियों से कहा, "निश्चय ही वालि ने इन दोनों धनुर्धारी वीरों को छद्मवेश में भेजा है।"

भयभीत होकर सुग्रीव अपने मन्त्रियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत के शिखर चले गये।

सुग्रीव को इस प्रकार चिन्तित देख कर वाक्‌पटु हनुमान बोले, "हे वानराधिपते! वालि तो शापवश यहाँ आ ही नहीं सकता, आप सहसा ऐसे चिन्तित क्यों हो रहे हैं?"

हनुमान के प्रश्न को सुन कर सुग्रीव बोले, "मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ये दोनों पुरुष वालि के भेजे हये गुप्तचर हैं और तपस्वियों का भेष धारण कर के हमारी खोज में आये हैं। हमें इनकी ओर से निश्चिन्त नहीं होना चाहिये। हनुमान! तुम वेष बदल कर इनके पास जाओ और इनका सम्पूर्ण भेद ज्ञात करो। यदि मेरा सन्देह ठीक हो तो शीघ्र इस विषय में कुछ करना।"

सुग्रीव का निर्देश पा कर हनुमान भिक्षु का भेष धारण कर राम-लक्ष्मण के पास पहुँचे। उन दोनों को प्रणाम करके वे अत्यन्त विनीत एवं मृदु वाणी में बोले, "हे वीरों! आप दोनों सत्यपराक्रमी एवं देवताओं के समान प्रभावशाली जान पड़ते हैं। आप लोग इस वन्य प्रदेश में किसलिये आये हैं? आपके अंगों की कान्ति सुवर्ण के समान प्रकाशित हो रही है। आपकी विशाल भुजाओं और वीर वेश को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि आप इन्द्र को भी परास्त करने की क्षमता रखते हैं, परन्तु फिर भी आपका मुखमण्डल कुम्हलाया हुआ है और आप ठण्डी साँसे भर रहे हैं। इसका क्या कारण है? कृपया आप अपना परिचय दीजिये। आप इस प्रकार मौन क्यों हैं? यहाँ पर्वत पर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव रहते हैं। उनके भाई वालि ने उन्हें घर से निकाल दिया है। वानरशिरोमणि सुग्रीव आप दोनों से मित्रता करना चाहते हैं। उन्हीं की आज्ञा से मैं आपका परिचय प्राप्त करने के लिये यहाँ आया हूँ। मैं वायुदेवता का पुत्र हूँ और मेरा नाम हनुमान है। मैं भी वानर जाति का हूँ। अब आप कृपया अपना परिचय दीजिये। मैं सुग्रीव का मन्त्री हूँ और इच्छानुकूल वेष बदलने की क्षमता रखता हूँ। मैंने आपको सब कुछ बता दिया है। आशा है आप भी अपना परिचय दे कर मुझे कृतार्थ करेंगे और वन में पधारने का कारण बतायेंगे।"

हनुमान की चतुराई भरी स्पष्ट बातों को सुन कर राम ने लक्ष्मण से कहा, "हे सौमित्र! इनकी बातों से मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि ये महामनस्वी वानरराज सुग्रीव के सचिव हैं और उन्हीं के हित के लिये यहाँ आये हैं। इसलिये तुम निर्भय हो कर इन्हें सब कुछ बता दो।"

राम की आज्ञा पा कर लक्ष्मण हनुमान से बोले, "हे वानरश्रेष्ठ! सुग्रीव के गुणों से हम परिचित हो चुके हैं। हम उन्हें ही खोजते हुये यहाँ तक आये हैं। आप सुग्रीव के कथनानुसार जब मैत्री की बात चला रहे हैं वह हमें स्वीकार है। हम अयोध्यापति महाराज दशरथ के पुत्र हैं। ये श्री रामचन्द्र जी उनके ज्येष्ठ पुत्र और मैं इनका छोटा भाई लक्ष्मण हूँ। चौदह वर्ष का वनवास पाकर ये वन में रहने के लिये अपनी धर्मपत्नी सीता और मेरे साथ आये थे। रावण ने सीता जी का हरण कर लिया है। इसी विचार से कि सम्भवतः वे हमारी सहायता कर सकें, हम लोग महाराज सुग्रीव के पास आये हैं। हे वानरराज! जिस चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के चरणों में सम्पूर्ण भूमण्डल के राजा-महाराजा सिर झुकाते थे और उनके शरणागत होते थे, उन्हीं महाराज के ज्येष्ठ पुत्र आज समय के फेर से सुग्रीव की शरण में आये हैं। ताकि महाराज सुग्रीव अपने दलबल सहित इनकी सहायता करें।"

इतना कहते हुये लक्ष्मण का कण्ठ अवरुद्ध हो गया।

लक्ष्मण के वचन सुन कर हनुमान बोले, "हे लक्ष्मण! आप लोगो के आगमन से आज हमारा देश पवित्र हुआ। हम लोग आपके दर्शनों से कृतार्थ हुये। जिस प्रकार आप लोग विपत्ति में हैं, उसी प्रकार सुग्रीव पर भी विपत्ति की घटाएँ छाई हुईं हैं। वालि ने उनकी पत्नी का हरण कर लिया है तथा उन्हें राज्य से निकाल दिया है। इसीलिये वे इस पर्वत पर निर्जन स्थान में निवास करते हैं। फिर भी मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि वे सब प्रकार से आपकी सहायता करेंगे।" इतना कह कर हनुमान बड़े आदर से रामचन्द्र और लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले गये।

रामायण – किष्किन्धाकाण्ड - राम-सुग्रीव मैत्री

हनुमान अपने साथ राम और लक्ष्मण को लेकर किष्किन्धा पर्वत के मलय शिखर पर, जहाँ पर कि सुग्रीव अपने अन्य मन्त्रियों के साथ बैठे थे, ले गये। सुग्रीव से दोनों भाइयों का परिचय कराते हुये हनुमान ने कहा, "हे महाप्राज्ञ! अयोध्या के महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र महापराक्रमी श्री रामचन्द्र जी अपने अनुज लक्ष्मण जी के साथ यहाँ पधारे हैं। इनके पंचवटी में निवासकाल में इनकी पत्नी सीता जी को लंका का राजा रावण चुरा ले गया। उन्हीं की खोज के लिये ये आपकी सहायता चाहते हैं। ये आपसे मित्रता करने की इच्छा रखते हैं। आपको इनकी मित्रता स्वीकार कर इनका यथोचित सत्कार करना चाहिये क्योंकि ये बड़े गुणवान, पराक्रमी और धर्मात्मा हैं। ये दोनों हमारे लिये परम पूजनीय हैं।"

राम और लक्ष्मण का परिचय पाकर प्रसन्नचित्त सुग्रीव बोले, "हे प्रभो! आप धर्मज्ञ, परम तपस्वी और सब पर दया करने वाले हैं। आप नर होकर भी मुझ वानर से मित्रता कर रहे हैं यह मेरा परम सौभाग्य है। आपकी मित्रता से मुझे ही उत्तम लाभ होगा। मेरा हाथ आपकी मैत्री के लिये फैला हुआ है, आप इसे अपने हाथ में लेकर परस्पर मैत्री का अटूट सम्बन्ध बना दें।"

सुग्रीव के वचन सुन कर राम ने अत्यन्त प्रसन्न होकर सुग्रीव के हाथ को अपने हाथ में लिया फिर प्रेमपूर्वक सुग्रीव को छाती से लगा लिया।

हनुमान ने भिक्षुरूप त्याग कर अग्नि प्रज्वलित की। राम और सुग्रीव ने अग्नि की प्रदक्षिणा कर मैत्री की शपथ ली और दोनों एक दूसरे के मित्र बन गये।

इसके पश्चात् राम और सुग्रीव अपने-अपने आसनों पर बैठ कर परस्पर वार्तालाप करने लगे। सुग्रीव ने कहा, "हे राम! मेरे ज्येष्ठ भ्राता वालि ने मुझे घर से निकाल कर मेरी पत्नी का अपहरण कर लिया है और मेरा राज्य भी मुझसे छीन लिया है। वह अत्यधिक शक्तिशाली है। मैं उससे भयभीत हो कर ऋष्यमूक पर्वत के इस मलयगिरि प्रखण्ड में निवास कर रहा हूँ। आप अत्यन्त पराक्रमी और तेजस्वी हैं। आप मुझे अभय दान देकर वालि के भय से मुक्त करें।"

सुग्रीव के दीन वचन सुन कर राम बोले, "हे सुग्रीव! मित्र तो उपकाररूप फल देने वाला होता है, मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से तुम्हारी पत्नी के हरण करने वाले वालि का वध कर दूँगा। अब तुम उसे मरा हुआ ही समझो।"

सुग्रीव ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, "हे राम! मेरे मन्त्रियों में श्रेष्ठ सचिव हनुमान मुझे आपकी विपत्ति की सम्पूर्ण कथा बता चुके हैं। आपकी पत्नी सीता आकाश या पाताल में कहीं भी हो, मैं अवश्य उनका पता लगवाउँगा। रावण तो क्या, इन्द्र आदि देवता भी सीता को मेरे वानरों की दृष्टि से छिपा कर नहीं रख सकते। राघव! कुछ ही दिनों पूर्व एक राक्षस एक स्त्री को लिये जा रहा था। उस समय हम इसी पर्वत पर बैठे थे। तब हमने उस स्त्री के मुख से 'हा राम! हा लक्ष्मण!' शब्द सुने थे। मेरा अनुमान है कि वह सीता ही थी। उसे मैं भली-भाँति देख नहीं पाया। हमें बैठे देख कर उसने कुछ वस्त्राभूषण नीचे फेंके थे। वे हमारे पास सुरक्षित रखे हैं। आप उन्हें पहचान कर देखिये, क्या वे सीता जी के ही है।"

यह कह कर सुग्रीव ने एक वानर को वस्त्राभूषणों को लाने की आज्ञा दी। उन वस्त्राभूषणों को देखते ही राम का धीरज जाता रहा। वे नेत्रों से अश्रु बहाते हुये शोकविह्वल हो गये और धैर्य छोड़ कर पृथ्वी पर गिर पड़े।

चेतना लौटने पर वे लक्ष्मण से बोले, "हे लक्ष्मण! सीता के इन आभूषणों को पहचानो। राक्षस के द्वारा हरे जाने पर सीता ने इन आभूषणों पृथ्वी पर गिरा दिया होगा।"

लक्ष्मण ने कहा, "भैया! इन आभूषणों में से न तो मैं हाथों के कंकणों को पहचानता हूँ, न गले के हार को और न ही मस्तक के किसी अन्य आभूषणों को पहचानता हूँ। क्योंकि मैंने आज तक सीता जी के हाथों और मुख की ओर कभी दृष्टि नहीं डाली। हाँ, उनके चरणों की नित्य वन्दना करता रहा हूँ इसलिये इन नूपुरों को अवश्य पहचानता हूँ, ये वास्तव में उन्हीं के हैं।"

रामायण – किष्किन्धाकाण्ड - राम-सुग्रीव वार्तालाप

राम ने सुग्रीव से कहा, "हे सुग्रीव! मुझे बताओ कि वह भयंकर रूपधारी राक्षस मेरी प्राणेश्वरी सीता को लेकर किस दिशा में गया है? तुम शीघ्र पता लगाओं कि वह राक्षस कहाँ रहता है? वानरराज! धोखे में डालकर और मेरा अपमान करके मेरी प्रियतमा को अपहरण करने वाला वह निशाचर मेरा घोर शत्रु है। मैं आज ही उसका वध कर के सीता को मुक्त कराउँगा।"

राम के शोक से पीड़ित वचन को सुन कर सुग्रीव ने उन्हें आश्वासन दिया, "हे राम! मैं नीचकुल में उत्पन्न उस पापात्मा राक्षस की शक्ति और गुप्त स्थान से परिचित नहीं हूँ किन्तु मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं शीघ्र ही ऐसा यत्न करूँगा कि मिथिलेशकुमारी सीता आपको मिल जायें। अतः आप धैर्य धारण करें। इस प्रकार से व्याकुल होना व्यर्थ है। व्याकुल होने पर मनुष्य की बुद्धि गम्भीर नहीं रह पाती। आपको इस प्रकार से अधीर होना शोभा नहीं देता। मुझे भी पत्नी के विरह का महान कष्ट प्राप्त हुआ है तथापि मैं पत्नी के लिये निरन्तर शोक नहीं करता। जब मैं वानर होकर धैर्य धारण कर सकता हूँ तो आप तो नर हैं, महात्मा हैं, सुशिक्षित हैं, आप मुझसे भी अधिक धैर्य धारण कर सकते हैं। मैं आपको उपदेश नहीं दे रहा हूँ, सिर्फ मित्रता के नाते आपके हित में सलाह दे रहा हूँ।"

सुग्रीव की बात सुन कर राम नेत्रों से अश्रु पोंछ कर बोले, "हे वानरेश! तुमने वही किया है जो एक स्नेही और हितैषी मित्र को करना चाहिये। तुम्हारा कार्य सर्वथा उचित है। सखे! तुम्हारे इस आश्वासन ने मेरी चिन्ता को दूर करके मुझे स्वस्थ बना दिया है। तुम जैसे स्नेही मित्र बहुत कम मिलते हैं। तुम सीता का पता लगाने में मेरी सहायता करो और मैं तुम्हारे सामने ही दुष्ट वालि का वध करूँगा। उसके विषय में तुम मुझे सारी बातें बताओ। विश्वास करो, वालि मेरे हाथों से नहीं बच सकता।"

राम की प्रतिज्ञा से सन्तुष्ट हो कर सुग्रीव बोले, "हे रघुकुलमणि! वालि ने मेरा राज्य और मेरी प्यारी पत्नी मुझसे छीन ली है। अब वह दिन रात मुझे मारने का उपाय सोचा करता है। उसके भय के कारण ही मैं इस पर्वत पर निवास करता हूँ। उससे ही भयभीत होकर मेरे सब साथी एक एक-करके मेरा साथ छोड़ गये हैं। अब ये केवल चार मित्र मेरे साथ रह गये हैं। वालि अत्यन्त बलवान है। उसके भय से मेरे प्राण सूख रहे हैं। बह इतना बलवान है कि उसने दुंदुभि नामक बलिष्ठ राक्षस को देखते देखते मार डाला। जब वह साल के वृक्ष को अपनी भुजाओं में भर कर झकझोरता है तो उसके सारे पत्ते झड़ जाते हैं। उसके असाधारण बल को देख कर मुझे संशय होता है कि आप उसे मार पायेंगे।"

सुग्रीव की आशंका को सुन कर लक्ष्मण ने मुस्कुराते हुये कहा, "हे सुग्रीव! तुम्हें इस बात का विश्वास कैसे होगा कि श्री रामचन्द्र जी वालि को मार सकेंगे?"

यह सुन कर सुग्रीव बोला, " सामने जो साल के सात वृक्ष खड़े हैं उन सातों को एक-एक करके वालि ने बींधा है, यदि राम इनमें से एक को भी बींध दें तो मुझे आशा बँध जायेगी। ऐसी बात नहीं है कि मुझे राम की शक्ति पर पूर्ण विश्वास नहीं है किन्तु मैं केवल वालि से भयभीत होने के कारण ही ऐसा कह रहा हूँ।"

सुग्रीव के ऐसा कहने पर राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और बाण छोड़ दिया, जिसने भीषण टंकार करते हुये एक साथ सातों साल वृक्षों को और पर्वत शिखर को भी बींध डाला।

राम के इस पराक्रम को देख कर सुग्रीव विस्मित रह गया और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए बोला, "प्रभो! वालि को मार कर आप मुझे अवश्य ही निश्चिन्त कर दे।"

रामायण – किष्किन्धाकाण्ड - बालि-वध

राम ने सुग्रीव को बालि-वध का आश्वासन दिया और सब किष्किन्धा की ओर चल दिये। राम हाथ में धनुष लिये आगे-आगे चल रहे थे। किष्किन्धा में पहुँच कर राम एक सघन कुँज में ठहर गये और सुग्रीव को बालि से युद्ध करने के लिये भेजा और कहा, "तुम निर्भय हो कर युद्ध करो।" राम के वचनों से उत्साहित हो कर सुग्रीव ने बालि को युद्ध करने के लिये ललकारा। सुग्रीव की इस ललकार को सुन कर बालि के क्रोध की सीमा न रही। वह क्रोध में भर कर बाहर आया और सुग्रीव पर टूट पड़ा। उन्मत्त हुये दोनों भाई एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। श्री रामचनद्र जी ने बालि को मारने कि लिये अपना धनुष सँभाला परन्तु दोनों का आकार एवं आकृति एक समान होने के कारण वे सुग्रीव और बालि में भेद न कर सके। इसलिये बाण छोड़ने में संकोच करने लगे। उधर बालि की मार न सह सकने के कारण सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत की ओर भागा। राम लक्ष्मण तथा अन्य वानरों के साथ सुग्रीव के पास पहुँचे। राम को सम्मुख पा कर उसने उलाहना देते हुये कहा, "मल्लयुद्ध के लिये भेज कर आप खड़े-खड़े पिटने का तमाशा देखते रहे। क्या यही आपकी प्रतिज्ञा थी? यदि आपको मेरी सहायता नहीं करनी थी तो मुझसे पहले ही स्पष्ट कह देना चाहिये था। आपके भरोसे आज मैं मृत्यु के मुँह में फँस गया था। यदि मैं वहाँ से भाग न आता तो वह मुझे मार ही डालता।"

सुग्रीव के क्रुद्ध शब्द सुन कर रामचन्द्र ने बड़ी नम्रता से कहा, "सुग्रीव! क्रोध छोड़ कर पहले तुम मेरी बात सुनो। तुम दोनों भाइयों का रंग-रूप, आकार, गति और आकृतियाँ इस प्रकार की थीं कि मैं तुम दोनों में अन्तर नहीं कर सका। इसीलिये मैंने बाण नहीं छोड़ा। सम्भव था कि वह बाण उसके स्थान पर तुम्हें लग जाता और फिर मैं जीवन भर किसी को मुख दिखाने लायक नहीं रहता। इस बार मैं तुम्हारे ऊपर कोई चिह्न लगा दूँगा।" वे फिर लक्ष्मण से बोले, "हे वीर! उस पुष्पयुक्त लता को तोड़ कर सुग्रीव के गले में बाँध दो जिससे इन्हें पहचानने में मुझसे कोई भूल न हो।" लक्ष्मण ने ऐसा ही किया और सुग्रीव फिर युद्ध करने चला।

इस बार सुग्रीव ने दूने उत्साह से गर्जना करते हुये बालि को ललकारा जिसे सुन कर वह आँधी के वेग से बाहर की ओर दौड़ा। तभी उसकि पत्नी तारा ने बालि को रोकते हुये कहा, "हे वीरश्रेष्ठ! अभी आप बाहर मत जाइये। सुग्रीव एक बार मार खा कर भाग जाने के पश्चात् फिर युद्ध करने के लिये लौटा है। इससे मेरे मन में संशय हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी के बल पर आपको ललकार रहा है। आज ही मुझे अंगद कुमार ने बताया था कि अयोध्या के अजेय राजकुमारों राम और लक्ष्मण के साथ उसकी मैत्री हो गई है। सम्भव है वे ही उसकी सहायता कर रहे हों। राम के पराक्रम के विषय में तो मैंने भी सुना है। वे शत्रुओं को देखते-देखते धराशायी कर देते हैं। यदि वे स्वयं सुग्रीव की सहायता कर रहे हैं तो उनसे लड़ कर आपका जीवित रहना कठिन है। इसलिये उचित है कि इस अवसर पर आप बैर छोड़ कर सुग्रीव से मित्रता कर लीजिये। उसे युवराज पद दे दीजिये। वह आपका छोटा भई है और इस संसार में भाई के समान हितू कोई दूसरा नहीं होता। उससे इस समय मैत्री करने में ही आपका कल्याण है।"

तारा के इस प्रकार समझाने से चिढ़ कर बालि ने उसे झिड़क कर कहा, "यह अनर्गल प्रलाप बन्द कर। स्त्री जाति स्वभाव से ही कायर होती है। मैं सुग्रीव की ललकार को सुन कर कायरों की भाँति घर में छिप कर नहीं बैठ सकता और न ललकारने वाले से भयभीत हो कर उसके सम्मुख मैत्री का हाथ ही बढ़ा सकता हूँ। रामचन्द्र जी को मैं जानता हूँ। वे धर्मात्मा हैं। मेरा उनसे कोई बैर भी नहीं है फिर वे मुझ पर आक्रमण ही क्यों करेंगे? आज मैं अवश्य सुग्रीव का वध करूँगा।" यह कह कर बालि सुग्रीव के पास पहुँच कर उससे युद्ध करने लगा। दोनों एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। जब राम ने देखा कि सुग्रीव दुर्बल पड़ता जा रहा है तभी उन्होंने एक विषैले बाण को धनुष पर चढ़ा कर बालि को लक्ष्य करके छोड़ दिया। बाण कड़कता हुआ बालि के वक्ष में जाकर लगा जिससे वह बेसुध हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। बालि को पृथ्वी पर गिरते देख राम और लक्ष्मण उसके पास जा कर खड़े हो गये।

जब बालि की चेतना लौटी और उसने दोनों भाइयों को अपने सम्मुख खड़े देखा तो वह नम्रता के साथ कठोर शब्दों में बोला, "हे राघव! आपने छिप कर जो मुझ पर आक्रमण किया, उसमें कौन सी वीरता थी? यद्यपि तारा ने सुग्रीव की और आपकी मैत्री के विषय में मुझे बताया था, परन्तु मैंने आपकी वीरता, शौर्य, पराक्रम, धर्मपरायणता, न्यायशीलता आदि गुणों को ध्यान में रखते हुये उसकी बात नहीं मानी थी और कहा था कि न्यायशील राम कभी अन्याय नहीं करेंगे। मेरा तो आपके साथ कोई बैर भी नहीं है। फिर आपने यह क्षत्रियों को लजाने वाला कार्य क्यों किया? आप नरेश हैं। राजा के गुण साम, दाम, दण्ड, भेद, दान, क्षमा, सत्य, धैर्य और विक्रम होते हैं। कोई राजा किसी निरपराध को दण्ड नहीं देता। फिर आपने मेरा वध क्यों किया है? जिसने आपकी स्त्री का हरण किया उससे आपने कुछ नहीं कहा किन्तु मुझ असावधान पर छिप कर वार किया। यदि मुझसे युद्ध करना था तो सामने आकर मुझसे युद्ध करते। आपके इस व्यवहार से मैं अत्यन्त दुःखी हूँ।"

बालि के इन कठोर वचनों को सुन कर रामचन्द्र ने कहा, "हे बालि! मैंने तुम्हारा वध अकारण या व्यक्तिगत बैरभाव के कारण से नहीं किया है। सम्भवतःतुम यह नहीं जानते कि यह सम्पूर्ण भूमि इक्ष्वाकुओं की है। वे ही इसके एकमात्र स्वामी हैं और इसीलिये उन्हें समस्त पापियों को दण्ड देने का अधिकार है। इक्ष्वाकु कुल के धर्मात्मा नरेश भरत इस समय सारे देश पर शासन कर रहे हैं। उनकी आज्ञा से हम सारे देश का भ्रमण करते हुये साधुओं की रक्षा तथा दुष्टों का दमन कर रहे हैं। तुम कामवश कुमार्गगामी हो गये थे। धर्म-शास्त्र के अनुसार छोटा भाई, पुत्र और शिष्य तीनों पुत्र के समान होते हैं। तुमने इस धर्ममार्ग को छोड़ कर अपने छोटे भाई की स्त्री का हरण किया जो धर्मानुसार तुम्हारी पुत्रवधू हुई। यह एक महापाप है। तुम्हें इसी महापाप का दण्ड दिया गया है। ऐसा करना मेरा कर्तव्य था। अपनी बहन और अनुज वधू को भोगने वाला व्यक्ति मार डालने योग्य होता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें तुम्हारे पिछले पापों का दण्ड दे कर आगे के लिये तुम्हें निष्पाप कर दिया है। अब तुम निष्पाप हो कर स्वर्ग जाओगे। मैं तुम्हें इस विषय में एक घटना सुनाता हूँ।

"मेरे पूर्व पुरुषों में मान्धाता नामक एक राजा थे। एक श्रमण ने इसी प्रकार का दुष्कर्म किया था जैसा तुमने किया है। राजा ने उसे भी कठोर दण्ड दिया था। अतएव तुम्हारा पश्चाताप करना ही व्यर्थ है। मैंने देश के राजा की आज्ञा का पालन किया है। मैं भी स्वतन्त्र नहीं हूँ। इसीलिये मैं तुम्हें दण्ड देने के लिये बाध्य था।"

राम का तर्क सुन बालि ने हाथ जोड़कर कहा, "हे राघव! आपका कथन सत्य है। मुझे अपनी मृत्यु पर दुःख नहीं है। मुझे केवल अपने पुत्र अंगद की किशोरावस्था पर चिन्ता है। वह मेरी एकमात्र सन्तान है। उसे मैं आपकी शरण में सौंपता हूँ। आप इसे सुग्रीव की भाँति ही अभय दें, यही आपसे मेरी प्रार्थना है।" इतना कह कर बालि चुप हो गया और उसके प्राण पखेरू उड़ गये।

रामायण - किष्किन्धाकाण्ड - वालि-राम संवाद

वालि को पृथ्वी पर गिरते देख राम और लक्ष्मण उसके पास जा कर खड़े हो गये। जब वालि की चेतना लौटी और उसने दोनों भाइयों को अपने सम्मुख खड़े देखा तो वह कठोर शब्दों में बोला, "हे रघुनन्दन! आपने छिप कर जो मुझ पर आक्रमण किया, उससे आपने कौन सा गुण प्राप्त कर लिया? किस महान यश का उपार्रजन कर लिया? यद्यपि तारा ने सुग्रीव की और आपकी मैत्री के विषय में मुझे बताया था, परन्तु मैंने आपकी वीरता, शौर्य, पराक्रम, धर्मपरायणता, न्यायशीलता आदि गुणों को ध्यान में रखते हुये उसकी बात नहीं मानी थी और कहा था कि न्यायशील राम कभी अन्याय नहीं करेंगे। आज मुझे ज्ञात हुआ कि आपकी मति मारी गई है। आप दिखावे के लिये धर्म का चोला पहने हुए हैं, वास्तव में आप अधर्मी हैं। आप साधु पुरुष के वेष में एक पापी हैं। मेरा तो आपके साथ कोई बैर भी नहीं है। फिर आपने यह क्षत्रियों को लजाने वाला कार्य क्यों किया? आप नरेश हैं। राजा के गुण साम, दाम, दण्ड, भेद, दान, क्षमा, सत्य, धैर्य और विक्रम होते हैं। कोई राजा किसी निरपराध को दण्ड नहीं देता। फिर आपने मेरा वध क्यों किया है? हे राजकुमार! यदि आपने मेरे समक्ष आकर मुझसे युद्ध किया होता तो आप अवश्य ही मेरे हाथों मारे गये होते। जिस उद्देश्य के लिये आप सुग्रीव की सहायता कर रहे हैं उसी उद्देश्य को यदि आपने मुझसे कहा होता तो मैं एक ही दिन में मिथिलेश कुमारी को ढूँढ कर आपके पास ला देता। आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले दुरात्मा राक्षस रावण के गले में रस्सी बाँध कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर देता। आपने अधर्मपूर्वक मेरा वध क्यों किया?"

वालि के कठोर वचनों को सुन कर रामचन्द्र ने कहा, "वानर! धर्म, अर्थ, काम और लौकिक सदाचार के विषय तुम्हें ज्ञान ही नहीं है। तुम अपने वानरोचित चपलतावश तुम व्यर्थ ही मुझ पर क्रोधित हो रहे हो। मैंने तुम्हारा वध अकारण या व्यक्तिगत बैरभाव के कारण से नहीं किया है। सौम्य! पर्वतों, वनों और काननों से युक्त सम्पूर्ण भू-मण्डल इक्ष्वाकु वंश के राजाओं की है। इस समय धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वी का पालन कर रहे हैं। उनकी आज्ञा से हम समपूर्ण पृथ्वी में विचरण करते हुए धर्म के प्रचार के लिये साधुओं की रक्षा तथा दुष्टों का दमन कर रहे हैं। तुमने अपने जीवन में काम को ही प्रधानता दिया और राजोचित मार्ग पर स्थिर नहीं रहे। छोटा भाई, पुत्र और शिष्य तीनों पुत्र-तु्ल्य होते हैं। तुमने इस धर्माचरण को त्याग कर अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी रुमा का हरण किया जो धर्मानुसार तुम्हारी पुत्रवधू हुई। उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय और राजा का प्रतिनिधि होने के कारण तुम्हारे इस महापाप का दण्ड देना मेरा कर्तव्य था। जो पुरुष अपनी कन्या, बहन अथवा अनुजवधू के पास कामबुद्धि से जाता है, उसका वध करना ही उसके लिये उपयुक्त दण्ड माना गया है। इसीलिये मैंने तुम्हारा वध किया। वानरश्रेष्ठ! अपने इस कार्य के लिये मेरे मन में किसी प्रकार संताप नहीं है। मैंने तुम्हें तुम्हारे पिछले पापों का दण्ड दे कर आगे के लिये तुम्हें निष्पाप कर दिया है। अब तुम निष्पाप हो कर स्वर्ग जाओगे।"

राम का तर्क सुन वालि ने हाथ जोड़कर कहा, "हे राघव! आपका कथन सत्य है। मुझे अपनी मृत्यु पर दुःख नहीं है। मेरा पुत्र अंगद मुझे अत्यन्त प्रिय है और मुझे केवल उसी की चिन्ता है। वह अभी बालक है। उसकी बुद्धि अभी परिपक्व नहीं हुई है। उसे मैं आपकी शरण में सौंपता हूँ। आप इसे सुग्रीव की भाँति ही अभय दें, यही आपसे मेरी प्रार्थना है।"

इतना कह कर वालि चुप हो गया और उसके प्राण पखेरू उड़ गये।

रामायण – किष्किन्धाकाण्ड - तारा का विलाप

जब तारा को बालि की मृत्यु का समाचार मिला तो वह अत्यन्त दुःखी हुई और रोती हुई उस स्थान पर आई जहाँ बालि का शव पड़ा था। तारा और अंगद दोनों को बिलख-बिलख कर रोते देख सुग्रीव को बहुत दुःख हुआ। उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। उधर तारा बालि से लिपट कर विलाप कर रही थी, "हे नाथ! आपके जैसे पराक्रमी वीर की राम ने छिप कर हत्या कर के क्षत्रिय धर्म को कलंकित किया है। हे नाथ! आप मौन हो कर क्यों पड़े हैं? इधर देखिये, आपका लाडला पुत्र अंगद किस प्रकार से बिलख-बिलख रो रहा है। आप तो कभी उसे उदास भी नहीं देख सकते थे, आज ऐसे निर्मोही कैसे हो गये? हे स्वामी! आप मुझे और अंगद को किसके भरोसे छोड़े जा रहे हैं? यह कैसी विडम्बना है कि जिस स्थान पर आपने अब तक सैकड़ों वीरों को सुलाया है वही आज आपकी स्वयं की वीरशैया बन गई। मुझे अनाथ बना कर आप कहाँ जा रहे हैं। मैं दुःख के सागर में डूबी जा रही हूँ। हे नाथ! मेरी रक्षा करो। आज मेरे पास पुत्र, ऐश्वर्य सब कुछ होते हुये भी मैं विधवा के नाम से पुकारी जाकर संसार में तिरस्कृत जीवन व्यतीत करूँगी।" फिर अंगद से बोली, "हे पुत्र! यमलोक को जाते हुये अपने पिता का हाथ जोड़ कर अभिवादन करो। देखो स्वामी! आपका पुत्र हाथ जोड़ कर आपके सामने खड़ा है। उसे आशीर्वाद क्यों नहीं देते? आज आपने इस युद्धरूपी यज्ञ में मेरे बिना कैसे भाग लिया। बिना अर्द्धांगिनी के तो कोई यज्ञ पूरा नहीं होता।" इस प्रकार तारा नाना रूपों से विलाप करने लगी। बालि के वानर सरदारों ने बड़ी कठिनाई से उसे शव से अलग किया।

धनुष धारण किये राम को देख कर तारा उनके पास आकर बोली, "हे राघव! तुम वीर, तेजस्वी, धर्मात्मा और महान दानवीर हो। मैं तुमसे एक दान माँगती हूँ। जिस बाण से तुमने मेरे पति के प्राण लिये हैं उसी बाण से मेरे प्राण भी हर लो ताकि मैं मर कर अपने पति के पास पहुँच जाऊँ। मेरे पतिदेव स्वर्ग में मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। यदि तुम यह सोच रहे हो कि मैं स्त्री हूँ और स्त्री का वध करना पाप है, तो तुम इससे मत डरो। मैं बालि का ही अर्द्धांग हूँ। इसलिये शीघ्रता करो।"

तारा के मर्मस्पर्शी शब्दों को सुन कर रामचन्द्र बोले, "तारा! तेरा इस प्रकार शोक और विलाप करना व्यर्थ है। सारा संसार परमात्मा के द्वारा बनाये गये विधान के अनुसार चलता है। विधाता की ऐसी ही इच्छा थी, यह सोच कर तुम धैर्य धारण करो। अंगद की कोई चिन्ता मत करो। वह आज से इस राज्य का युवराज होगा। तुम्हारा पति वीर था, वह युद्ध करते हुये वीरगति को प्राप्त हुआ है; यह तुम्हारे लिये गौरव की बात है। रोना बन्द करो। रोने से दिवंगत आत्मा को कष्ट पहुँचता है।" इस प्रकार राम ने तारा को अनेक प्रकार से धैर्य बँधाया। फिर वे सुग्रीव से बोले, "हे वीर! तारा और अंगद को साथ ले जा कर अब तुम बालि के अन्तिम संस्कार की तैयारी करो। हे अंगद! तुम इस संस्कार के लिये घृत, चन्दन आदि ले आओ। और हे तारा! तुम भी शोक को त्याग कर बालि के लिये अर्थी की तैयारी कराओ।" इस प्रकार रामचन्द्र जी ने सब से कह सुन कर बालि के अन्तिम संस्कार की तैयारी कराई।

बालि की शवयात्रा में बड़े-बड़े योद्धा और किष्किन्धा निवासी अश्रुमोचन करते हुये बिलखते श्मशान घाट पहुँचे। स्त्रियों के करुणाजनक विलाप से सम्पूर्ण वातावरण तथा प्रकृति शोकाकुल प्रतीत हो रही थी। नदी के तट पर जब चिता बना कर बालि का शव उस पर रखा गया तो सम्पूर्ण वातावरण एक बार फिर करुण चीत्कार से गूँज उठा। बड़ी कठिनाई से शव को तारा से पृथक किया गया। वह चिता पर ही उससे लिपट कर विलाप किये जा रही थी। अन्त में अंगद ने चिता को अग्नि दी। जब बालि का शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया तो श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण, सुग्रीव, अंगद एवं अन्य प्रमुख वानरों के साथ मिल कर उसके लिये जलांजलि दी।

रामायण – किष्किन्धाकाण्ड - सुग्रीव का अभिषेक

जब सब लोग बालि के अन्तिम संस्कार से निवृत हो गये तो हनुमान ने रामचन्द्र जी से निवेदन किया, "हे प्रभो! आपकी कृपा से सुग्रीव अब निष्कंटक और निश्चिन्त हुये। आप कृपया उनका राजतिलक कर अंगद को युवराज पर प्रदान करें। हनुमान की प्रार्थना सुन कर राम बोले, "हे पवनसुत! तुमने ठीक कहा, परन्तु मैं किष्किन्धा नगर में जा कर सुग्रीव का राज्याभिषेक नहीं कर सकता क्योंकि पिता की आज्ञा से मैं वनवास का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ और वनवासी रहते हुये मैं किसी नगर में प्रवेश नहीं कर सकता। अतएव तुम लोग सुग्रीव के साथ नगर में जा कर राज्याभिषेक की प्रक्रिया पूर्ण करो। और हे सुग्रीव! तुम नीतिवान और लोकव्यवहार कुशल हो, इसलिये अपने भतीजे अंगद को युवराज का पद प्रदान करो। वह तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता का पुत्र ही नहीं है, पराक्रमी और वीर भी है। कुछ दिन तुम लोग राज्य में रह कर शासन व्यवस्था को सुव्यवस्थित करो और प्रजा की भलाई में मन लगाओ। यह श्रावण का महीना और वर्षा की ऋतु है। इसमें सीता की खोज नहीं हो सकती। वर्षा की समाप्ति पर जानकी की खोज कराना। मैं इस अवधि में लक्ष्मण सहित इसी पर्वत पर निवास करूँगा।"

राम से विदा हो कर सुग्रीव दल-बल सहित किष्किन्धा जा कर राजसिंहासन पर बैठ राजकाज चलाने लगा। प्रजाजनों को उसने सब प्रकार से सन्तुष्ट करने की चेष्टा की। उधर राम लक्ष्मण के साथ प्रस्रवण पर्वत पर निवास करने लगे। एक सुरक्षित कन्दरा को कुटिया का रूप दे कर वे लक्ष्मण से बोले, "हे भाई! हम वर्षा ऋतु यहीं व्यतीत करेंगे। यह पर्वत वृक्षादि से सुशोभित हो कर अत्यन्त रमणीक प्रतीत होता है। इस गुफा के निकट ही सरिता के बहने के कारण यह स्थान हमारे लिये और भी सुविधाजनक रहेगा। यहाँ से किष्किन्धा भी अधिक दूर नहीं है, किन्तु इस शान्तिप्रद वातावरण में भी जानकी का वियोग मुझे दुःखी कर रहा है। उसके बिना मेरे हृदय में भयंकर पीड़ा होती है।" इतना कह कर वे शोक में डूब गये।

अपने अग्रज को शोकातुर देख कर लक्ष्मण बोले, "हे भैया! इस प्रकार शोक करने से क्या लाभ है? शोक से तो उत्साह नष्ट होता है। और उत्साहहीन हो जाने पर रावण से हम कैसे प्रतिशोध ले सकेंगे? इसलिये आप धैर्य धारण कीजिये। हम रावण को मार कर भाभी को अवश्य मुक्त करायेंगे। केवल कुछ दिनों की बात और है।"

लक्ष्मण के वचनों से राम ने अपने हृदय को स्थिर किया और वे प्रकृति की शोभा निहारने लगे। थोड़ी देर तक वे वर्षाकालीन प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन करते रहे। फिर लक्ष्मण से बोले, "हे लक्ष्मण! देखो इस ऋतु में प्रकृति कितनी सुन्दर प्रतीत होती है। ये दीर्घ आकार वाले बड़े-बड़े मेघ पर्वतों का रूप धारण किये आकाश में दौड़ रहे हैं। सागर का जल पान कर आकाश जो अमृत की वर्षा करेगा, उससे नाना प्रकार की औषधियाँ, वनस्पति, अन्न आदि उत्पन्न हो कर भूतलवासियों का कल्याण करेंगे। इधर इन बादलों को देखो, एक के ऊपर एक खड़े हुये ये ऐसे प्रतीत होते हैं मानो प्रकृति ने सूर्य तक पहुँचने के लिये इन कृष्ण-श्वेत सीढ़ियों का निर्माण किया है। शीतल, मंद, सुगन्धित समीर हृदय को किस प्रकार प्रफुल्लित करने का प्रयत्न कर रही हैं, परन्तु विरहीजनों के लिये यह भी कम दुःखदायी नहीं है। उधर पर्वत पर से जो जलधारा बह रही है, उसे देख कर मुझे ऐसा आभास होता है कि सीता भी मेरे वियोग में इसी प्रकार अश्रुधारा बहा रही होगी। अरे, ये पर्वत तो देखो जैसे कोई ब्रह्मचारी बैठे हों और ये काले-काले बादल इनकी मृगछालाएँ हों। पहाड़ी नाले इनके यज्ञोपवीत हों और बादलों की गम्भीर गर्जना ही वेदमंत्रों का पाठ हो। कभी ऐसा प्रतीत होता है कि ये बादल गरज नहीं रहे हैं अपितु बिजली के कोड़ों से प्रताड़ित हो कर पीड़ा से कराहते हुये आर्तनाद कर रहे हैं। काले बादलों में चमकती हुई बिजली ऐसी प्रतीत हो रही है मानो राक्षसराज रावण की गोद में मूर्छित पड़ी जानकी हो। हे लक्ष्मण! जब भी मैं वर्षा के दृश्यों को देख कर अपने मन को बहलाने की चेष्टा करता हूँ तभी मुझे सीता का स्मरण हो आता है। यह देखो, काले मेघों ने दसों दिशाओं को अपनी काली चादर से इस प्रकार आवृत कर लिया है जैसे मेरे हृदय की समस्त भावनाओं को जानकी के वियोग ने आच्छादित कर लिया है।

"यह वह ऋतु है जब राजा लोग अपने शत्रु पर आक्रमण नहीं करते, गृहस्थ लोग घर से परदेस नहीं जाते। घर उनके लिये अत्यन्त प्रिय हो जाता है। राजहंस भी अपने मानसरोवर की ओर चल पड़ते हैं। चकवे अपनी प्रिय चकवियों के साथ मिलने को आतुर हो जाते हैं और उनसे मिल कर अपूर्व प्राप्त करते हैं। परन्तु मैं ही एक ऐसा अभागा हूँ जिसकी चकवी रूपी सीता अपने चकवे से दूर है। मोर अपनी प्रियाओं के साथ नृत्य कर रहे हैं। बगुलों की पंक्तियों से शोभायमान काले-काले, जल से भरे, मेघ मोनो किसी लम्बी यात्रा पर जा रहे हैं, इसलिये वे पर्वतों के शिखरों पर विश्राम करते हुये चल रहे हैं। पृथ्वी पर नई-नई घास उग आई है और उस पर बिखरी हुई लाल-लाल बीरबहूटियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो कोई नवयौवना कामिनी हरे परिधान पर लाल बूटे वाली बेल लगाये लेटी हो। सारी पृथ्वी इस वर्षा के कारण हरी-भरी हो रही हैं। सरिताएँ कलकल नाद करती हुईं बह रही हैं। वानर वृक्षों पर अठखेलियाँ कर रहे हैं। इस सुखद वातावरण में केवल विरहीजन अपनी प्रियाओं के वियोग में तड़प रहे हैं। उन्हें इस वर्षा की सुखद फुहार में भी शान्ति नहीं मिलती। देखो, ये पक्षी कैसे प्रसन्न होकर वर्षा की मंद-मंद फुहारों में स्नान कर रहे हैं। उधर वह पक्षी पत्तों में अटकी हुई वर्षा की बूँद को चाट रहा है। सूखी मिट्टी में सोये हुये मेंढक मेघों की गर्जना से जाग कर ऊपर आ गये हैं और टर्र-टर्र की गर्जना करते हुये बादलों की गर्जना से स्पर्द्धा करने लगे हैं। जल की वेगवती धाराओं से निर्मल हुई पहाड़ों की चोटियों से पृथ्वी की ओर दौड़ती हुई सरिताओं की पंक्तियाँ इस प्रकार बिखर कर बह रही हैं जैसे किसी के धवल कण्ठ से मोतियों की माला टूट कर बिखर रही हो। लो, अब पक्षी घोंसलों में छिपने लगे हैं, कमल सकुचाने लगे हैं और मालती खिलने लगी है, इससे प्रतीत होता है कि अब शीघ्र ही पृथ्वी पर सन्ध्या की लालिमा बिखर जायेगी।"

फिर राम ने एक गहरा निःश्वास छोड़ कर कहा, "बालि के मरने से सुग्रीव ने अपना राज्य पा लिया। अब वह अपनी बिछुड़ी हई पत्नी को पुनः पाकर इस वर्षा का आनन्द उठा रहा होगा। पता नहीं, मैं अपनी बिछुड़ी हुई सीता के कब दर्शन करूँगा। अब तो श्रावण मास का अन्त हो चला है। शीघ्र ही शरद ऋतु का प्रारम्भ होता। दुर्गम मार्ग फिर आवागमन के लिये खुल जायेंगे। मुझे विश्वास है, शरद ऋतु आते ही सुग्रीव अपने गुप्तचरों से अवश्य सीता की खोज करायेगा।" यह सोचते हुये राम गम्भीर कल्पना सागर में गोते लगाने लगे।

रामायण – किष्किन्धाकाण्ड - हनुमान-सुग्रीव संवाद

चमकती है; वे सुग्रीव के विषय में विचार करने लगे। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि सुग्रीव मनोरथ सिद्ध हो जाने के पश्चात् अपने कर्तव्य की अवहेलना कर के विलासिता में मग्न रहने लगा है। अब तारा भी उसके विलास लीला का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई है। राजकाज का भार केवल मन्त्रियों के भरोसे छोड़ कर वह स्वयं स्वेच्छाचारी होता जा रहा है। श्री रामचन्द्र जी को जो उसने वचन दिया था, उसका उसे स्मरण भी नहीं रह गया है। यह सोच कर हनुमान सुग्रीव के पास जा कर बोले, "हे राजन्! आपने राज्य और यश दोनों ही प्राप्त कर लिये हैं। कुल परम्परा से प्राप्त लक्ष्मी का भी आपने विस्तार कर लिया है, किन्तु मित्रों को अपनाने का जो कार्य शेष रह गया है, उसे भी अब पूरा कर डालना चाहिये। आपने मित्र के कार्य को सफल बनाने के लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसे पूरा करना चाहिये। श्री राम हमारे परम मित्र और हितैषी हैं। उनके कार्य का समय बीता जा रहा है। इसलिये हमें जनकनन्दिनी सीता की खोज आरम्भ कर देनी चाहिये।"

हनुमान के द्वारा स्मरण दिलाये जाने पर उन्हें अपने आलस्य का भान हुआ। उन्होंने तत्काल नील नामक कुशल वानर को बुला कर आज्ञा दी, "हे नील! तुम ऐसी व्यवस्था करो जिससे मेरी सम्पूर्ण सेना बड़ी शीघ्रता से यहाँ एकत्रित हो जाय। सभी यूथपतियों को अपनी सेना एवं सेनापतियों के साथ यहाँ अविलम्ब एकत्रित होने का आदेश दो। राज्य सीमा की रक्षा करने वाले सब उद्यमी एवं शीघ्रगामी वानरों को यहाँ तत्काल उपस्थित होने के लिये आज्ञा प्रसारित करो। यह भी सूचना भेज दो कि जो वानर पन्द्रह दिन के अन्दर यहाँ बिना किसी अपरिहार्य कारण के उपस्थित नहीं होगा, उसे प्राण-दण्ड दिया जायेगा।" इस प्रकार नील को समझा कर सुग्रीव अपने महलों में चले गये।

इधर शरद ऋतु का आरम्भ हो जाने पर भी जब राम को सुग्रीव द्वारा सीता के लिये खोज करने की कोई सूचना नहीं मिली तो वे सोचने लगे कि सुग्रीव अपना उद्देश्य सिद्ध हो जाने पर मुझे बिल्कुल भूल गया है। वह सीता की खोज खबर लेने के लिये कुछ नहीं कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि अब सीता को पाने की कोई आशा शेष नहीं रह गई है। बेचारी सीता पर न जाने कैसी बीत रही होगी। जो राजहंसों के शब्दों को सुन कर जागती थी, न जाने अब कैसे रह रही होगी। यह शरद ऋतु उसे और भी अधिक व्याकुल कर रही होगी। यह सोचते हुये राम सीता को स्मरण कर के विलाप करने लगे।

जब लक्ष्मण फल ले कर समीपवर्ती वाटिका से लौटे तो उन्होंने अपने बड़े भाई को विलाप करते देखा। लक्ष्मण को देखते ही उन्होंने एक गहरी ठण्डी साँस ले कर कहा, "हे लक्ष्मण! पृथ्वी को जलप्लावित करने के लिये उत्सुक गरजते बादल अब शान्त हो कर पलायन कर गये हैं। आकाश निर्मल हो गया है। चन्द्रमा, नक्षत्र और सूर्य की प्रभा पर शरद ऋतु का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा है। हंस मानसरोवर का परित्याग कर फिर लौट आये हैं और चक्रवातों के समान सरिता के रेतीले तटों पर क्रीड़ा कर रहे हैं। वर्षाकाल में मदोन्मत्त हो कर नृत्य करने वाले मोर अब उदास हो गये हैं। सरिता की कल-कल करती वेगमयी गति अब मन्द पड़ गई है मानो वे कह रही हैं कि चार दिन के यौवन पर मदोन्मत्त हो कर गर्व करना उचित नहीं है। सूर्य की किरणों ने मार्ग की कीचड़ और दलदल को सुखा दिया है, इससे वे आवागमन और यातायात के लिये खुल गये हैं। राजाओं की यात्रा के दिन आ गये हैं, परन्तु सुग्रीव ने न तो अब तक मेरी सुधि ली है और न जानकी की खोज कराने की कोई व्यवस्था ही की है। वर्षाकाल के ये चार मास सीता के वियोग में मेरे लिये सौ वर्ष से भी अधिक लम्बे हो गये हैं। परन्तु सुग्रीव को मुझ पर अभी तक दया नहीं आई। मालूम नहीं मेरे भाग्य में क्या लिखा है। राज्य छिन गया, देश निकाला हो गया, पिता की मृत्य हो गई, पत्नी का अपहरण हो गया और अन्त में इस वानर के द्वारा भी ठगा गया। हे वीर! तुम्हें याद होगा कि सुग्रीव ने प्रतिज्ञा की थी कि वर्षा ऋतु समाप्त होते ही सीता की खोज कराउँगा, परन्तु अपना स्वर्थ सिद्ध हो जाने के बाद वह इस प्रतिज्ञा को इस प्रकार भूल गया है जैसे कि कोई बात ही न हुई हो। इसलिये तुम किष्किन्धा जा कर उस स्वार्थी वानर से कहो कि जो प्रतिज्ञा कर के उसका पालन नहीं करता, वह नीच और पतित होता है। क्या वह भी बालि के पीछे-पीछे यमलोक को जाना चाहता है? तुम उसे मेरी ओर से सचेत कर दो ताकि मुझे कोई कठोर पग उठाने के लिये विवश न होना पड़े।"

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