20 जुलाई 2011

वृद्धावस्था में सुखी कैसे रहें?

संसार में प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहना चाहता है और ऐसा होना स्वाभाविक ही है। 
शरीर को यथासंभव निरोग रखने के उपाय करते रहना चाहिए और दूसरी बात आर्थिक रूप से कुछ बचत सुरक्षित रखना आवश्यक है, जिससे अपनी प्रतिदिन की आवश्यकताओं के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े।  कहा गया है - पहला सुख निरोगी काया।  दूजा सुख जब घर में हो माया। 

वृद्धावस्था को सुखी बनाने के लिए निम्न शिक्षा को ग्रहण करना अच्छा होगा -
1.  जरूरत से ज्यादा मत बोलिए।  बिना मांगे बहू-बेटे को सलाह मत दीजिये। 
2.  साठ साल की उम्र हो जाए तो अधिकार का सुख छोड़ दीजिए। तिजोरी की चाबी भी बेटे को दे दीजिए। 
3.  मगर हाँ अपने लिए इतना जरूर बचा लेना चाहिए की कल को किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। 


 वृद्धावस्था में शारीरिक रूप से स्वस्थ्य रहने के लिए कुछ उपयोगी सूत्र इस प्रकार हैं -

रहे निरोगी जो कम खाय।  बात न बिगरे जो गम खाय। 
कम खाने वाला शारीरिक रूप से हमेशा निरोग और गम खाने वाला लड़ाई-झगड़ों से बचा रहेगा। 
*  आस्ट्रेलिया के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डा. हार्न ने कहा है की लोग जितना खाते हैं, उसका एक तिहाई भी पचा नहीं पाते।  सर विलियम टेम्पिल ने अपनी किताब 'लांग लाइफ' में भी मिताहार पर बहुत जोर दिया है और कहा है - यदि अधिक जीना हो तो अपनी खुराक को घटाकर उतनी ही रखें, जितने से पेट को बराबर हल्कापन महसूस होता रहे। मिताहार को हर युग में श्रेष्ट कहा गया है। 

*  प्रतिदिन की दिनचर्या इस प्रकार रखिये की व्यवस्था बनी रहे। शरीर को उपयोगी कार्यों में वयस्त रखिये।
अपनी रुचि के अनुसार कार्य करें।  यथा - बागवानी, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, लेखन, कलात्मक कार्य, पेंटिंग, चित्रकारी, सत्संग, समाज सेवा के कार्यों में भाग लेना आदि। व्यस्त रहने से और शारीरिक श्रम से आपको अच्छी भूख लगेगी, निद्रा भी ठीक रहेगी और अनावश्यक चिंताओं से मुक्ति भी मिलेगी। 

*  वृद्धजनों को समय और परिस्थिति के अनुसार अपनी सोच को बदलना चाहिए।  पूर्वाग्रह को छोड़ना ही श्रेष्ट है। जिन परिवारों में बुजुर्ग समय के अनुसार अपनी विचारधारा में परिवर्तन कर लेंते हैं, वहां वृद्धजनों को पर्याप्त सम्मान मिलता है। 

*  मित्र बनें और मित्रता करें।  जीवन में सच्चे मित्र का होना अत्यंत आवश्यक है।  सुख-दुःख की चर्चा मित्र से ही की जा सकती है।  मित्र से खुलकर बातें करने से तनाव दूर होता है, मन को शांति मिलती है। 

*   सदैव प्रसन्न रहें।  खूब हंसें और दूसरों को भी हंसाएं - इसमें आपका कुछ भी खर्च नहीं होता।  आपको मानसिक शांति मिलेगी।  तनाव दूर होगा।  शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में भी आश्चर्यजनक सुधार होगा। 

*  यदि आप परिवार के साथ रहते हैं तो केवल एक बात का ध्यान रखें - बेटों-बहुओं की आलोचना-निंदा बिलकुल न करें।  बच्चों के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने का सुख कम नहीं होता।  पारिवारिक कार्यों में सहायक बनें। 

*  क्रोध कभी न करें और सहनशील बनें।  कमाऊ व्यक्ति का क्रोध परिवार के सदस्य सहन भी कर लेते हैं, परन्तु अब आप कमाऊ नहीं हैं।  क्रोध करना तो किसी प्रकार भी उचित नहीं माना जाता। 

*  अतीत की अप्रिय घटनाओं अथवा दुखद क्षणों को भूलना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अच्छा होता है।  बीती हुई दुखद बातों को मन में गाँठ बांधकर रखना स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। 

*  यदि सभी आपको अप्रिय, कटु एवं व्यंग्यात्मक वाणी भी सुनने को मिले तो उस पर भी ध्यान न दीजिये, बल्कि उस स्थान को छोड़कर एकांत में जाकर प्रभु का जप करें।  उक्त अवसरों पर अपनी सहनशीलता की शक्ति का परिचय दीजिये। 

*  वृद्धावस्था में अकेले रहने की गलती न कीजिएगा।  अकेला रहने वाला व्यक्ति तनावपूर्ण जीवन जीता है, वह अनेक बीमारियों का शिकार बन जाता है।  सुरक्षा की दृष्टि से भी अकेला रहना ठीक नहीं है।

श्रम और तप का महत्व समझें

सारी सृष्टि का आधार श्रम है। श्रम से समाज आगे बढ़ता है, श्रम से परिवार संगठित रहता है। श्रम से सेहत बनती है, नींद अच्छी आती है, जो जितना कठोर श्रम करेगा, उसमें उतना ही धैर्य आएगा। यहां तक कि परमात्मा भी श्रम करता है। जो श्रम नहीं करते, आलस्य करते हैं वे शरीर बिगाड़ लेते हैं। भले ही धनी हो जाएं, पर बीमारियां पाल लेते हैं, श्रम से बुद्धि तेज होती है और पुरुषार्थ करके आदमी आगे बढ़ता है।

श्रम, तप से महत्वपूर्ण बनता है। तप का सहयोग श्रम को मिलना चाहिए। किसी बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित होकर कष्ट उठाना तप है। जो जितना सहता है, उतना ही लहलहाता है। कष्ट सहना ही तप है। तप से श्रम सार्थक होता है। तप से मन में पवित्रता आती है। तप से ही ऐश्र्वर्य प्राप्त होता है।

आज राष्ट्र का, राष्ट्रवासियों का, विशेषतया माताओं का तप व्यर्थ जा रहा है। सभ्यता और संस्कृति नष्ट हो रही है। धर्म और संस्कृति के लिए मर-मिटने की तमन्ना बच्चों में नहीं जग रही है, न पवित्र भावना है न पवित्र आचार और न ही पवित्र व्यवहार। अपनी भाषा भी जीवन में प्रतिष्ठित नहीं हुई है। माताएं ही बच्चों में संस्कार जगा सकती हैं।

भीरुता बढ़ रही है। डरपोक तपस्वी नहीं हो सकता। माता निर्माण करती है, माता नियंत्रण करती है। ब्रह्म में ज्ञान द्वारा जीवन के विकास का मार्ग खोजना है, अज्ञान बहुत है। ज्ञान-साधिका माताएं बच्चों में सुसंस्कार जगाकर अज्ञान पर प्रहार करें। घर में धन आए, वह ईमानदारी की कमाई हो, श्रम से अर्जित हो, पाप की कमाई जीवन को बिगाड़ती है, धन का अपव्यय करना रोकें, सही उपयोग करना सीखें।

गृहस्थ की मर्यादा सत्य से प्रेरित हो। जीवन में सत्य को प्रतिष्ठित करें। बच्चों को सत्य से अनुराग करना सिखाएं। उन्हें संयम का पाठ पढ़ाएं। सदाचारी बनाएं। यशस्वी बनने की प्रेरणा दें। श्री का आह्वान करो, श्री आत्मधन है, उसे बटोर लो। जीवन को सुधारो, सुंदर विचारों से सुधार आएगा।

तीन चीजों का खयाल

तीन चीजें ऐसी हैं, जिनका आदमी को जरूर खयाल रखना चाहिए। जो कोई उनमें से किसी एक को भी छोड़ता है, या उसके ताल्लुक लापरवाही बरतता है, या तोड़ता है, वह सबको छोड़ता है, सबको तोड़ता है। इसीलिए पूरे ऐहतियात से उसे समझने और उस पर सोचने की कोशिश करनी चाहिए।

सबसे पहले अपनी जुबान, अपने मन और अपने कामों से यह ऐलान करो कि ईश्वर एक है। एक ईश्वर का ऐलान करने के बाद पूरी तरह से यह मान लो कि उसके सिवाय कोई भी तुम्हें नुकसान या फायदा नहीं पहुंचा सकता या नहीं पहुंचाता। फिर तुम खुद को, अपने कामों को ईश्वर के हवाले कर दो। अगर तुम अपने कामों का एक छोटा हिस्सा भी किसी दूसरे के लिए करते हो, तो तुम्हारी सोच और जुबान गलत है।

किसी दूसरे के लिए काम करने का मतलब ही है किसी से कोई उम्मीद या किसी तरह का कोई डर। और जब तुम सब चीजों के मालिक और रहनुमा उस ईश्वर के अलावा किसी और की तरफ उम्मीद या डर से देखते हो, तो एक और खुदा की इबादत या इज्जत का भार अपने ऊपर ले लेते हो।

दूसरे यह कि जब तुम इस सच्चे भरोसे के साथ बोलते या काम करते हो कि सिवाय उसके दूसरा कोई ईश्वर नहीं है। फिर तुम्हें उस पर, पूरी दुनिया, दौलत, चचा, पिता या मां या इस धरती पर किसी भी शख्स से ज्यादा भरोसा करना चाहिए।

तीसरे, एक ईश्वर को मानने और उस पर सच्चा भरोसा करने के बाद तुम्हारे लिए बेहतर है कि हमेशा तसल्ली रखो। किसी भड़कने वाली बात पर भी कभी गुस्सा न करो। गुस्से से सावधान रहो। अपने दिल को हमेशा ईश्वर के नजदीक रखो। और एक लम्हे के लिए भी उसे ईश्वर से अलग मत होने दो।

अनुराग के नए उपमान दिए मेहंदी ने

मध्यकाल में सुंदरियों की कोमल हथिलियों पर मेहंदी की लाली ऐसी चढ़ी कि उसके पूर्व के साहित्य में वर्णित अनुराग के सभी उपमान पीछे रह गए। लोगों का विरोध जितना होता है अनुराग का लाल रंग उतना ही गाढ़ा होता है। मुश्किलें जितनी आती हैं, इंसान उतना सुर्खरू होता है। ऐसा ही मेहंदी के साथ भी तो होता है। वह जितनी पीसी जाती है, हथेलियों पर उसकी लाली उतनी ही चढ़ती है।
सुर्खरू होता है इंसा, मुश्किलें सहने के बाद।
रंग लाती है हिना, पत्थर पे घिस जाने के बाद॥
मेहंदी का नई नवेलियों के साथ, दूसरी नई चीजों से भी अच्छा मेल बैठता है। शेरों, दोहों से होती हुई लोकगीतों में जब मेहंदी आती है तो नई आभा से वह दमक उठती है। उसका यह नवीन प्रेम कजरी के इस बोल में अच्छी तरह मुखरित हो उठा है।

काशी में साइकिल नई-नई आई है तो नवेली अपने पति से अनुरोध करती है -
पिया मेहंदी लिआइद मोतीझील से,
जाइके साइकील से ना।
मोतीझील से मंगाई द, छोटका देवरा से पिसाइ द,
अपने हथवा से लगाई द कांटी-कील से,
जाइके साइकील से ना।
मेहंदी की फरमाइश करने वाली नवेली, 
लाने का माध्यम बनने वाली साइकिल नई और मेहंदी पीसने वाला छोटका देवर तो और नया।

नवेलियों के हाथों में मेहंदी ऐसी चढ़ी कि पुराने सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा वर्णित सोलह श्रृंगारों में से कंगन को इसने विस्थापित सा कर दिया। परंतु ऐसा है नहीं। मेहंदी भला क्यों किसी को विस्थापित करने जाए। हकीकत यह है कि सौंदर्यशास्त्रियों के 16 श्रृंगार धनिकों के घरों की नवयौवनाओं के लिए थे। सामान्य परिवारों की नवेलियों के पास कंगन कहां? मेहंदी ने इतना भर किया कि वह ऐसी नवेलियों के हाथों में भी चढ़ी जिनको कंगन मयस्सर नहीं था।
जिसके पास हो वह पहने, मेहंदी तो हाथों के सौंदर्य-वृद्धि का काम कर ही चुकी है।

अरब से आई मेहंदी ने सबसे पहले अपना रंग राजस्थान, पंजाब और गुजरात में जमाया और वहां के मांगलिक कृत्यों में इस कदर घुसी कि बिना मेहंदी उन कृत्यों के पूरा होने में ही संकोच होने लगे। मेहंदी की रस्म बिना भला शादी कैसे? नवेलियों की हथेलियों पर लता-पल्लवों का रूप धर लहलहाती मेहंदी और कलात्मक रूप लेती देश के मध्य भागों में भी फैल गई। शब्दकोशों में मेहंदी के अनेक नाम वर्णित हैं, जिनमें रक्तरंगा, रागगर्भा, रंजिका, नखरंजिका प्रमुख हैं।

वैसे तो मेहंदी अब किसी ऋतु विशेष की मोहताज नहीं परंतु इसका मेल वर्षा ऋतु से सबसे ज्यादा है। जब सभी नाले-नदियां इठला उठती हैं, अपने सभी बंध तोड़ प्रियमिलन के लिए चल पड़ती हैं और चारों ओर हरियाली छाई होती है तो मेहंदी भी नवेलियों की हथेलियों पर और गाढ़ी हो किसी झूले पर पेंगें भरती हुई गलबहियों के लिए मचलने लगती है।

हथेलियों पर मेहंदी के कलात्मक रूप में वृद्धि के साथ विशेषज्ञता भी जुटती गई और संग-सहेलियों से मेहंदी मढ़वाने के बजाय नवेलियों ने घोषित-अघोषित मेहंदी पार्लरों की ओर मुंह मोड़ लिया। इस समय शादी में मेहंदी की रस्म में बुलाई जाने वाली मेहंदी मढ़ने की विशेषज्ञाओं की फीस एक-एक हजार रुपये तक है। वैसे सामान्य तौर पर कोई गुनी सहेली ही मेहंदी लगा देती है और नहीं तो २५-५० रुपये में कोई विशेषज्ञ ही लगा देती है।

मेहंदी का रंग चढ़ने में आठ-नौ घंटे का समय लगता है परंतु आज के भागमभाग भरे जीवन में इतना समय निकाल पाना मुश्किल लगता है, इसलिए अब इसकी जगह ब्लाक पेंटिंग भी आ गई है। सीधी-सादी मेहंदी के साथ अन्य चीजें भी जुड़ गई हैं, जिससे मेहंदी का रंग जल्दी और ज्यादा चढ़े। मेहंदी लगाने के पहले हथेली को पहले नीलगिरि के तेल से खूब साफ कर लिया जाता है। फिर खूब बारीक मेहंदी के सूखे पाउडर का, चाय की पत्ती के खूब उबले पानी में पेस्ट बनाना चाहिए। पेस्ट बनाते समय इसमें थोड़ा सा इमली का पानी और नीलगिरि के तेल की कुछ बूंदें भी मिलानी चाहिए। इससे मेहंदी का रंग गाढ़ा और पक्का हो जाता है। अब इसे कोन में भरकर धैर्यपूर्वक कलात्मक ढंग से बेल-बूटे उकेरते हुए लगाना चाहिए। मेहंदी लगाते समय सूखने न पाए, इसलिए बीच-बीच में नीबू और चीनी का पानी छिड़कते रहना चाहिए। मेहंदी लग जाने पर कम से कम पांच-छह घंटे तो वैसे ही लगे रहने देने के बाद उसे साफ कर लें, फिर मेहंदी रची हथेली पर नीलगिरि का तेल या सरसों का तेल लगा दें।

मेहंदी केवल श्रृंगार की ही वस्तु नहीं, इसमें अद्‌भुत औषधीय गुण भी होता है। बालों में लगाने से बाल मुलायम और काले होते हैं। इसकी तासीर ठंडी होती है। यह अच्छा एंटीसेप्टिक है तथा इसके लेप से हथेलियों और तलवों की जलन कम होती है। चेचक का जलन कम करने और श्वेत कुष्ट में भी मेहंदी का प्रयोग गुणकारी है।

ब्रेकअप से पहले

पुरानी कहानियों का अंत हमेशा इन सुखद पंक्तियों से हुआ करता था ..और अंत में वे खुशी-खुशी साथ रहने लगे..। इस अंत के बाद क्या होता होगा? यह सवाल सभी के मन में कभी न कभी आता है। दरअसल कहानी दि एंड के बाद शुरू होती है। रिश्ते हमेशा ही सुखद नहीं रहते, उनमें टकराव, अलगाव होता है। ब्रेक-अप जिंदगी का दुखद अध्याय है, लेकिन कई स्थितियों में यह जरूरी भी होता है।

कुछ समय पूर्व आई फिल्म लव आजकल के नायक-नायिका अलग-अलग रुचियों एवं करियर के कारण अलग होने का निर्णय लेते हैं। लेकिन वे परंपरागत ढंग से रोते-बिसूरते यह निर्णय नहीं लेना चाहते। वे इसे भी सेलिब्रेट करना चाहते हैं, ताकि दोबारा मिलें तो दो अजनबियों की तरह न गुजर जाएं।

कॉमेडी और रोमांटिक फिल्म प्यार के साइड इफेक्ट्स में ब्रेक-अप के कुछ साइड इफेक्ट्स बताए गए हैं। जैसे-बहुत रोना पडेगा, जितना रोएंगे उतना ही ब्रेक-अप से बाहर आएंगे और अगर रोना न आए तो दर्द भरे नगमे सुनें, एक्स को भूलने के लिए दिन-दिन भर शॉपिंग करेंगे। इससे बजट बिगडेगा और आपका तनाव दूसरी जगह शिफ्ट हो जाएगा, दोस्तों के साथ मौज-मस्ती, घूमना-फिरना फिर से शुरू हो जाएगा और हां- आजादी महसूस करने लगेंगे। यानी किसी अन्य को पसंद करने की आजादी।

ये तो फिल्मों की बातें हैं, लेकिन व्यावहारिक दुनिया में अलग होने का निर्णय लेना इतना सहज और आसान नहीं होता। बावजूद इसके कई बार ऐसा करना पडता है, क्योंकि जिंदगी रिश्तों से ऊपर है। पति-पत्‍‌नी के रिश्ते हों या प्रेम संबंध, कई बार वे इतने परिपक्व नहीं होते कि ताउम्र निभाए जा सकें। इनका कुप्रभाव जिंदगी के अन्य पहलुओं पर पडने लगे तो ब्रेक-अप जरूरी हो जाता है। लेकिन अलग होने से पहले सोच-विचार करना चाहिए और सम्मानजनक ढंग से रिश्तों को खत्म किया जाना चाहिए।

अलग होने से पहले
संबंध जितना गहरा होता है, उसके टूटने का दर्द भी उतना ही गहरा होता है। इसलिए ब्रेक-अप से पूर्व अपने रिश्तों का आकलन करें। कुछ बातों पर ध्यान दें-
1. संबंधों की समीक्षा करें। हर रिश्ते में कभी न कभी उतार-चढाव आते हैं। आपसी समझदारी और बातचीत से विवाद सुलझाने की कोशिश की जानी चाहिए।
2. रिश्ता अछा और लंबा रहा है तो अलग होने का निर्णय लेने से पूर्व काउंसलर की मदद भी लें।
3. किसी ऐसे मध्यस्थ की राय लें, जो निष्पक्ष और तटस्थ हो। दोस्तों की सलाह भी ली जा सकती है, अगर वे दोनों पक्षों से समान व्यवहार रखते हों। साथ रहने की तमाम संभावनाओं पर ठंडे मन से विचार करें।
4. रिश्ते बनाना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल उन्हें निभाना है। रिश्ते को परिपक्व होने का पूरा मौका दें, साथ ही अपने साथी के साथ पारदर्शिता बनाए रखें।
5.  काउंसलिंग, बातचीत और सोचने-समझने के बावजूद यदि रिश्ते को आगे निभा पाना नामुमकिन लग रहा हो, तो अलग होने का निर्णय लें। लेकिन एक बार निर्णय ले लेने के बाद फिर अपनी भावनाओं को उस पर हावी न होने दें, निर्णय पर अडिग रहें।

ब्रेक-अप के प्रभाव
वॉल्तेयर ने कहा था, प्रेम दार्शनिकों को मूर्ख और मूर्र्खो को दार्शनिक बनाता है। उन्होंने यह तो नहीं बताया कि जब यह प्रेम नहीं बचता तब क्या होता है। लेकिन इतना तय है कि ऐसे में सारे तर्क व्यर्थ हो जाते हैं। बुद्धिजीवी और तार्किक व्यक्ति भी दर्द और पीडा में डूब जाते हैं। लोग अवसाद में चले जाते हैं, खाना-पीना और सोना भूल जाते हैं।

कई बार आत्मग्लानि या अपराध-बोध से भी भर जाते हैं लोग। मेरे इस फैसले से वह जरूर आहत होगा या होगी या मुझमें कोई कमी थी जो उसने मुझे अपने जीवन से बाहर किया.. जैसे कई विचार पनपने लगते हैं।
कुछ लोगों के लिए प्रेम से बाहर निकलना रचनात्मकता का पर्याय भी बन जाता है। वे एकांतप्रिय होकर संगीत, लेखन, अभिनय या कला जैसे क्षेत्रों में अपनी अभिव्यक्ति करने लगते हैं, तो कुछ लोग विध्वंसात्मक प्रतिक्रिया जताते हैं। ऐसे लोग या तो आत्मघाती हो जाते हैं या दूसरे को पीडा पहुंचाने लगते हैं। ऐसे कई उदाहरण समाज में हैं, जब लडकी के प्रेम प्रस्ताव ठुकराने या शादी से मना करने पर कथित प्रेमी द्वारा उसके मुंह पर तेजाब फेंक दिया गया, पत्‍‌नी से अलगाव के बाद पति ने बदले की भावना से भरकर पत्‍‌नी के न्यूड फोटोग्राफ्स पोर्नो साइट्स पर डाल दिए। यदि बॉलीवुड कलाकारों की बात करें तो सलमान, ऐश्वर्य और विवेक ओबेराय का त्रिकोणीय प्रेम संबंध और उससे जुडी कटु घटनाएं सभी को याद हैं। हालांकि बाद में एक टीवी कार्यक्रम में विवेक ने स्वीकार किया कि उन्हें सार्वजनिक तौर पर ऐश्वर्य के बारे में अपने कमेंट नहीं देने चाहिए थे।

गलती कहां हुई
19 वर्षीय एक लडका अपने ब्लॉग पर लिखता है, कुछ समय पूर्व ही मैं अपनी गर्लफ्रेंड से अलग हुआ हूं। हम एक वर्ष तक साथ थे। मैंने बहुत कोशिश की कि हम इस दोस्ती को कायम रख सकें, लेकिन वह बहुत भावुक थी, शायद मुझसे ज्यादा अपेक्षा रखती थी। जब मैं उसे समझा न सका तो स्पष्ट कहना बेहतर समझा। वह गुस्से में आ गई, उसने मुझे थप्पड मारा और चली गई। मैं ईमानदार था, लेकिन शायद मुझे ठीक ढंग से अपनी बात कहनी नहीं आई। हालांकि अब तक मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि एक प्यारा संबंध कैसे टूट गया।

सच तो यह है कि व्यक्ति निरंतर खुद का विकास करता है। यह जरूरी नहीं कि पांच वर्ष पूर्व की पसंद-नापसंद भविष्य में भी बरकरार रहे। रुचियों, करियर, विचारों, सोच में बदलाव के साथ ही उम्र के साथ-साथ परिपक्वता भी आती है। लोग यदि प्रेम करते हैं तो प्रेम संबंध से बाहर भी आते हैं। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।

ब्रेक-अप की पहल कोई भी करे, दर्द दोनों को होता है। कभी सुकून, खालीपन, कभी दर्द, खुशी, आशा तो कभी अपराध-बोध जैसे कई मिले-जुले भाव मन में आने लगते हैं। यह सब इसलिए होता है कि अचानक एक निकट संबंध के खत्म होते ही अकेलापन घेर लेता है। बेचैनी के इस माहौल में किसी से भावनाएं बांटना भी मुश्किल होता है। लेकिन ज्यादा भावुकता से स्थितियां बोझिल ही होती हैं। व्यक्ति खुद ही धीरे-धीरे स्थितियों से सामंजस्य बिठाना सीख जाता है।

शालीन ढंग अलग होने का
1. ब्रेक -अप का निर्णय लेने के बाद यह तय करना जरूरी है कि कहां और कैसे यह बात दूसरे से कही जाए। ऐसी बातें कभी ई.मेल या फोन के जरिये न कहें। आमने-सामने बैठकर ठंडे दिल-दिमाग के साथ बात करें। दूसरे को भी अपना पक्ष रखने का मौका दें।
2. दूसरे को नजरअंदाज करके या अन्य किसी बहाने से बार-बार न जताएं कि आप अलग होना चाहते हैं। यह भी न कहें कि सोचने के लिए अभी थोडा समय चाहिए। जब भी निर्णय लेना हो, खुलकर, स्पष्ट ढंग से सामने वाले के सामने इसे शांत भाव से जाहिर करें।
3. अगर ब्रेक-अप की पहल आप कर रहे हैं तो दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया के लिए भी तैयार रहें। जो भी आहत होगा, वह तुरंत प्रतिक्रिया कर सकता है। रोने, चीखने-चिल्लाने, चीजें फेंकने के अलावा भी विध्वंसक प्रतिक्रिया हो सकती है। इसके लिए पहले ही मानसिक तौर पर तैयार रहें और खुद को शांत रखें।
4. सार्वजनिक स्थान के बजाय कोशिश करें कि कहीं एकांत में मिलें। अंतिम तौर पर फिर सोच लें कि साथी को कैसे और किन शब्दों में यह बात कहनी है। आपकी बातों से उसे यह न प्रतीत हो कि आप उसे आहत कर रहे हैं। उसे यह एहसास दिलाएं कि संबंधों के प्रति आपके मन में सम्मान है और आप भी इसके टूटने पर बहुत आहत होंगे।
5. अपनी बात कहने से पहले यह भी सोच लें कि आपका साथी ब्रेक-अप की वजह जरूर जानना चाहेगा। इसलिए जरूरी है कि सही, स्पष्ट व ईमानदार कारण उसे बता सकें।
6. सच बोलने का प्रयास करें। साथी को पूरा अधिकार है कि वह आपके मुंह से सच सुने। सच को कोमलता के साथ कह पाना वाकई बहुत मुश्किल होता है, लेकिन अलग होते समय यह बहुत अनिवार्य है।
7. अलग होने के निर्णय के बाद इस अध्याय को जितनी जल्दी हो, समाप्त करें। बहुत लंबे स्पष्टीकरण, अप्रत्यक्ष उत्तर देने, व्यर्थ में अपनी सपाई देने में ज्यादा समय न लगाएं। अपनी बात खत्म करें और वहां से निकल जाएं।
8. एक-दूसरे को दिए हुए गिफ्ट्स न वापस करने लगें। यह रिश्ते के प्रति असम्मानजनक होगा। आखिर कभी आप साथ थे और इनकी अछी यादें संजोना चाहेंगे। दोस्ती या प्रेम के क्षणों को ठेस पहुंचाने वाला कोई काम न करें।
9. साथी से यह अपेक्षा न रखें कि भविष्य में भी वह सहज संबंध बनाए रखे। हो सकता है आपके लिए जो बात सहज हो, उसके लिए वह उतनी ही आसान न हो। कुछ लोग ब्रेक-अप के बाद भी स्वस्थ दोस्ताना संबंध बरकरार रख लेते हैं। यदि आप भी ऐसे चंद लोगों में से हैं तो सचमुच भाग्यशाली हैं, क्योंकि व्यावहारिकता के साथ जीना आपको आता है।

17 जुलाई 2011

सुख-दुःख से निवृत्ति

आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सत्रीकर्षात् प्रवर्तत। सुख दुःख मनाराम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे।।
निवर्तते तदु भयं वाशित्वं चोप जायते।           सशरीरस्य योग ज्ञास्तं योगमृषयो विदुः।।

सुख-दुःख ये दोनों आत्मा, इन्द्रिय, मन और इन्द्रियों के अर्थों तथा मन के अर्थों के संयोग से उत्पन्न होते है। जब मन आत्मा में स्थिर हो जाता है तब किसी प्रकार का कर्म न होने से सुख और दुःख दोनों निवृत्ति हो जाते हैं और शरीर के साथ आत्मा वशी हो जाता है अर्थात मनुष्य मन और इन्द्रियों को वश में कर लेने और अलौकिक कार्य करने में समर्थ हो जाता है। योग शास्त्र को जानने वाले ऋषियों ने मन के इस वशीकरण को 'योग' के रूप में जाना है।
 
टिप्पणी - महर्षि पतंजलि ने समाधिपाद के दूसरे सूत्र में चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग बतलाया है -
योगश्चित्त वृत्ति निरोध:' अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध (रूक जाना) 'योग' अर्थात 'समाधि' है। जब तक चित्त वृत्तियों का निरोध नहीं हो पाता तब तक आत्मा अपने चित्त की वृत्तियों के अनुरूप ही अपना स्वरुप समझता है। महर्षि पतञ्जलि आगे कहते हैं - वृत्तयः पातय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः। प्रमाण विपर्याय विकल्प निद्रा स्मृतयः ।।' अर्थात वृत्तियाँ पांच प्रकार की होती है। ये दुखों (क्लेशों) को उत्पन्न करने वाली भी हो सकती हैं और दुखों को नष्ट (अक्लेश्कारी) करने वाली भी हो सकती हैं। ज्ञान की दृष्टि से वृत्तियाँ पांच प्रकार की हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप में दो-दो भेद करने पर दस भेद होते हैं। प्रमाण यानी सम्यकज्ञान या सत्य ज्ञान होना, विपर्यय यानी मिथ्या या असम्यक ज्ञान होना, विकल्प यानी कल्पना शक्ति, निद्रा और स्मृति यानी अनुभवों का पुनः स्मरण। ये वृत्तियाँ क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों प्रकार की होती हैं। उदहारण के लिए एक व्यक्ति रस्सी ढूंढ रहा हो और अँधेरे में सांप को रस्सी मान कर सुख का अनुभव करे तो वे 'अक्लिष्ट विपर्यय वृत्ति' हुई और एक व्यक्ति हलके प्रकाश में रस्सी को सांप समझ कर भयभीत  और दुखी हो जाए तो यह 'क्लिष्ट विपर्यय वृत्ति' हुई। इसी तरह पूर्व में प्राप्त हुए सन्मान को याद कर सुख अनुभव होना 'अक्लिष्ट स्म्रत्ति वृत्ति' और अपमान को याद कर दुःख अनुभव करने को 'क्लिष्ट स्मृति वृत्ति' कहा जाता है। पहले अक्लिष्ट वृत्तियों से क्लिष्ट वृत्तियों को हटाएं, फिर अक्लिष्ट वृत्तियों का निरोध (रोकना) कर योग सिद्ध करें। योग की सिद्धि हो जाने पर आत्मा वशी यानी स्वाधीन हो जाता है और शरीर में रहते हुए भी वे मायाजाल के चंगुल में नहीं फंसता। इसी अभिप्राय सेम इस सूत्र में कहा गया है की मन के आत्मस्थ हो जाने पर सुख-दुःख निवृत्त हो जाते हैं।

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