16 सितंबर 2011

सक्सेस की यूएसपी ( USP of Success )

ज्ञापन की दुनिया के एक मशहूर एक्सपर्ट रोजर रीव से जब यह पूछा गया कि किसी भी प्रोडक्ट, ब्रांड, संस्थान या व्यक्ति की सफलता का सूत्र क्या है, तो उन्होंने कहा कि 'There is nothing (in this world) which is successful without USP (unique selling prosposition)'

अर्थात संसार में ऐसा कोई नहीं जिसने बिना "Unique Selling Proposition" के सफलता पाईआखिर यह "Unique Selling Proposition" क्या है?

इसका मतलब है कि किसी चीज या व्यक्ति में सफल होने के लिये एक ऐसी विशेषता होनी चाहिएजो केवल उसको दूसरों से अलग करे और साथ ही दूसरे व्यक्तियों को उस विशेषता से अच्छा लाभ होता हुआ भी लगे

उदहारण के लिये एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने भारत के ग्रामीण इलाकों के लिये एक ऐसा रेडियो चालूइसी तरह से एक शेविंग क्रीम निर्माता ने क्वालिटी को बिना गिराए ऐसी क्रीम मार्केट में उतारी, जो बेहद सस्ती थीइसका सबसे बड़ा फायदा बार्बर शाँप [नई की दुकानों] हो हुआ। यही कारण है कि देश के अधिकाँश छोटे एवं माध्यम साइज की नई की दुकानें इसी शेविंग क्रीम का इस्तेमाल ग्राहक की शेव बनाने के लिये करते हैंऐसा करने से उनकी बचत अधिक होती है। वे अधिक पैसा कमाते हैंइसी तरह यदि आप किसी संसथान के लिये कार्य कर रहे हैं तो आपको इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि आप में ऐसी क्या विशेषता है जो आपको दूसरे कर्मचारियों से अलग करती हैआप में हजारों अवगुण हो सकते हैं, जिसके बारे में सारी संस्था Gossip करती है, परन्तु एक ऐसा गुण या विशेषता भी होनी जरूरी है, जिससे संस्था को लाभ होक्या आप में सोचने की शक्ति अच्छी है, क्या आप अच्छी रिपोर्ट लिख सकते हैं या आप में भाग-दौड़ करने की क्षमता है या आपका दिमाग बहुत Analytical है या आप में Networking करने की काबलियत है अर्थात आप दूसरों से अच्छे Relation [संबंध] आसानी से बना सकते हैं इत्यादिआकर यह देखा जाता है कि कर्मचारी या एग्जीक्यूटिव अपने अवगुणों पर होने वाली Gossip को राजनीति की संज्ञा देकर उससे परेशान होते रहते हैं और अपनी Energy व्यर्थ ही Waste करते हैंउनको अपना सारा ध्यान अपने उन गुणों का विकास करने में लगा देना चाहिएजिससे संस्थान को लाभ हो और वह दूसों से अलग नजर आएं


दो प्रेरक प्रसंग

होटल की एक मेज पर एक वृद्ध व एक वृद्धा दोनों बैठे थे। दोनों ने चाय पी और एक-दूसरे से परिचय प्राप्त किया। वृद्ध ने मेज छोड़ने से पहले वृद्धा से पूछा की क्या वह उसके साथ रह सकता है?
वृद्धा ने पूछा-क्यों?
वृद्ध ने उत्तर किया-क्योंकि हम दोनों अकेले हैं। मैं विधुर हूँ और आप विधवा।
बात को बढाते-बढाते दोनों साथ रहने को राजी हो गए. लेकिन वृद्धा ने अपनी संतुष्टि को संतोष देने के लिए वृधा से पूछा, तुम मेरे साथ क्यों रहना चाहते हो?
वृद्ध बोला-तुम्हारे बाल बहुत सुन्दर हैं।
वृद्ध से उत्तर पाकर वृद्धा बोली, तुम्हारी उम्र इतनी ज्यादा हो गयी है, फिर भी, तुम्हारी दांत बहुत सुन्दर हैं। तुमने इन्हें इतना सुन्दर बनाकर कैसे रखा है?
वृद्ध अपने प्रशंसा सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपने दाँतों का जबड़ा निकालकर मेज पर रख दिया।
वृद्धा ने अपने बालों का जुदा निकालकर मेज पर रख दिया।
~ यही माया है। माया सत्य का दर्शन नहीं करने देती। असार को सार बताना माया है।
~ चिंतन: स्वयं का खाना खाना - प्रकृति।
               दूसरे का खाना छीनकर खाना - विकृति।
               दूसरे को खिलाकर खाना - संस्कृति। 

(2)
एक रात राजा जनक ने स्वप्न देखा की वे एक भिक्षुक बन गए हैं। उनके हाथ में मिट्टी का एक पात्र है। वह अपनों से, अपने राज्य के लोगों से भीख मांग रहे हैं और उन्हें कोइ भीख नहीं दे रहा है। उनकी भूख बढ़ती जा रहे है। 

उन्होंने देखा की एक भिखारी बासी रोटी व दाल को फेंकने जा रहा है। राजा जनक उसकी और दौड़े और बासी रोटी व दाल माँगी। वे खाने ही वाले थे की एक कुत्ता आया और बासी रोटी व दाल छीनकर ले गया। उन्होंने हताश में अपने मस्तक पर हाथ मारा और वह हाथ सोने के पलंग पर लगा। राजा जनक की नींद खुल गई।

राजा जनक एक विक्षिप्त की भाँती अपने शयन-कक्ष से बाहर आए और दौड़-दौड़ कर कहने अलगे, क्या मैं राजा हूँ? क्या मैं ही राजा हूँ?

सब दरबारी हंसाने लगे की आज राजा को क्या हो गया? वह क्यों विनोद कर रहा है?
राजा जनक ने अपने गुरू अष्टावक्र से पूछा, सत्य क्या है, वह सत्य था या यह सत्य है?
गुरू अष्टावक्र बोले, 'दोनों ही असत्य हैं। स्वप्न झूठ है और तू राजा है यह भी झूठ है। देह राजा है तू राजा नहीं। तू देही है। तेरा आवरण देह राजा है। इस स्वप्न में जो सत्य है उसे जानना ही अध्यात्म है।
~ चिंतन: शरीर जब शरीर मांगता है - वासना।
               मन जब मन से बंधता है - प्रेम।
               आत्मा जब परमात्मा की और बढ़ता है - भक्ति।

साउथ अफ्रीका के 'गांधी' डेसमंड टुटु

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नोबेल प्राइज विजेता डेसमंड टुटु को इस बार गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। डेसमंड टुटु का जन्म 1931 में सोने की खदानों के लिए प्रसिद्ध ट्रांसवाल में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनका परिवार जोहान्सबर्ग शिफ्ट हो गया था। उनके पिता एक शिक्षक थे। डेसमंड एक फिजिशियन (चिकित्सक) बनना चाहते थे, लेकिन उनका परिवार इसकी शिक्षा का व्यय उठाने में असमर्थ था। टुटु ने प्रिटोरिया बंटु नॉर्मल कॉलेज में 1951 से 1953 तक पढ़ाई की, फिर जोहान्सबर्ग बंटु हाईस्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। 1957 में उन्होंने बंटु एजुकेशन ऐक्ट का विरोध करते हुए नौकरी से इस्तीफा दे दिया। यह ऐक्ट काले (ब्लैक) साउथ अफ्रीकियों की उत्तम शिक्षा के खिलाफ था। टुटु ने पादरियों से प्रभावित होकर चर्च जॉइन करने की सोची। उन्होंने थियोलॉजी में शिक्षा ली और 1960 में वह पादरी बन गए। 1962 से 66 तक वह लंदन में ही रहे और वहीं से थियोलॉजी में बैचलर और मास्टर डिग्री हासिल की। 1967 में वह साउथ अफ्रीका लौट आए और 1972 तक उन्होंने अश्वेत लोगों की स्थितियों को हाईलाइट किया। 1972 में ही वह फिर ब्रिटेन आए, जहां उन्हें थियोलॉजिकल एजुकेशन फंड ऑफ द वर्ल्ड काउंसिल ऍाफ चर्चेस का वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया। कुछ समय तक वह लंदन के थियोलॉजिकल इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में भी कार्यरत रहे। 1975 में वह पहले ऐसे अश्वेत व्यक्ति बने, जिसे जोहान्सबर्ग का डीन बनाया गया। 1976 से पहले टुटु विद्रोही अश्वेतों के मध्य काफी लोकप्रिय थे, लेकिन सोवेटो हिंसा से कुछ दिन पहले वह श्वेत (गोरे) साउथ अफ्रीकियों के सुधार के प्रचारक बन गए। साउथ अफ्रीका में न्याय और नस्लवाद जैसे मुद्दों पर कार्य करते हुए टुटु को अपरिहार्य कारणों से राजनीति में आना पड़ा। वह स्वयं कहते हैं कि उनकी रुचि धर्म में है, न कि राजनीति में। वह अपनी सरकारों को सदैव नस्लवाद के खिलाफ सचेत करते रहे। 1986 में टुटु केपटाउन के आर्कबिशप

निर्वाचित हुए। उन्हें अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए जेल भी जाना पड़ा। वर्ष 2000 में उन्हें बेट्‌स कॉलेज से एलएचडी की उपाधि मिली, 2005 में यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ फ्लोरिडा ने उन्हें सम्मानित किया। टुटु ने 1989 में प्रेसीडेंट एफडब्लू डी क्लार्क की उदारवादी नीति का समर्थन किया, इसी नीति के तहत नेल्सन मंडेला की रिहाई और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस पर से प्रतिबंध हटाया गया। टुटु लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाते भी हैं। डेसमंड टुटु की काबिलियत और ईमानदारी से प्रभावित होकर साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने उन्हें साउथ अफ्रीका ट्रुथ ऐंड रिकंसिलिएशन कमीशन का कार्यप्रभार प्रदान किया। इस कमीशन का काम रंगभेद की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करना होता है। वास्तव में, साउथ अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ उनके संघर्ष ने उन्हें दुनिया का हीरो बना दिया है। जब उनके नेता नेल्सन मंडेला को जेल में डाला गया, तो रंगभेद के खिलाफ उनकी अलख को टुटु ने जलाए रखा। 1984 में नोबेल प्राइज से सम्मानित होने वाले टुटु ने हमेशा हुकूमत के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद रखा। 2006 में उन्हें वर्जीनिया के कॉलेज ऑफ विलियम ऐंड मैरी ने डॉक्टर ऑफ पब्लिक सर्विस की उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें दलाई लामा द्वारा लाइट ऑफ ट्रुथ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। राजनीतिक जीवन से अब संन्यास ले चुके आर्कबिशप टुटु अपने अदम्य साहस और प्रभाव के कारण विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखते हैं।

चर्चित बयान

-  राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे के अधीन जिम्बाब्वे तानाशाही की ओर जा रहा है।
-  इराक पर अमेरिकी और ब्रिटिश हमला अनैतिक था।
-  2002 में इस्त्राइल पर फलस्तीन के खिलाफ नस्लवादी होने का आरोप लगाया।
-  मैं भारत का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे इस प्रतिष्ठा के काबिल समझा। लेकिन मैं भारत सरकार से पुरजोर सिफारिश करता हूं कि आप तिब्बत की आजादी में अपनी मदद दें।


13 सितंबर 2011

टोने टोटके - कुछ उपाय - 13 (Tonae Totke - Some Tips - 13)

1.  आपका व्यवसाय यदि कम हो गया हो या किसी ने उसे बाँध दिया हो, तो दीपावली से पूर्व धनतेरस के दिन पूजा स्थल पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर 'धनदा यन्त्र' को स्थापित करें और धूप, दीप दिखाएं, नैवेघ अर्पित करें. यह क्रिया करते समय मन ही मन श्रीं श्रीं मंत्र का जप करते रहें. प्रतिदिन नहा धोकर यन्त्र का निष्ठापूर्वक दर्शन करें. 

2.  दीपावली पूजन के समय 501 ग्राम चुहारों का पूजन करें. उनका तिलक करें, धुप दीप से आरती उतारें, प्रसाद का भोग लगाएं और रात्री भर पूजा स्थान पर रखा रहने दें. अगले दिन उन्हें लाल चमकीले या मखमली कपडे में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें. 51  दिन तक प्रतिदिन एक रूपया किसी भी मंदिर में माता लक्ष्मी को अर्पित करें. इससे वर्ष भर लक्ष्मी स्थिर रहती है. 

3.  कोर्ट कचहरी में मुकदमा चल रहा हो तो पांच गोमती चक्रों को दीपावली के दिन पूजन पर रखें. जब तारीख पर कोर्ट जाना हो तो उन्हें जेब में रख कर जाएं, जाते समय मन ही मन इश्वर से विजय की प्रार्थना करते रहें, सफलता प्राप्त होगी. 

4.  यदि आपका उधार लिया हुआ पैसा कोई लम्बे अरसे से नहीं लौटा रहा हो तो, उस व्यक्ति का नाम लेकर ग्यारह गोमती चक्र पर तिलक लगा कर, इष्ट देव का स्मरण कर, उससे निवेदन करें, कि मेरा पैसा जल्द से जल्द लौटा दो. इसके बाद पूजित गोमती चक्रों को पीपल के वृक्ष के पास जमीन में दबा दें. 

5.  व्यापार में हानि, धन नाश, बढ़ते कर्ज, व्यापार में बाधा आदि से मुक्ति पाने के लिए. दीपावली के दिन श्वेतार्क गणपति को गंगाजल से स्नान कराकर लाल वस्त्र पर रखें. फिर उनके समीप लाल चन्दन का एक टुकड़ा, ग्यारह धनदायी कौडियाँ, ग्यारह गोमती चक्र एवं ताम्बे की पादुकाएं या ताम्बे का एक टुकड़ा रखें. शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सफ़ेद कागज़ पर लाल चन्दन से अपनी दुकान का नाम लिखकर इसी सामग्री के पास रखें. लाल चन्दन की माला से "ॐ गं गणपतये नमः" का एक माला जप करें. लाल चन्दन की माला न हो तो रूद्राक्ष की माला से भी जप कर सकते हैं. फिर सारी सामग्री को उसी लाल वस्त्र में लपेट कर पोटली बना लें और उसे लाल मौली या रिबन से बांधें, धूप दीप दिखाएं व व्यापार स्थल में उत्तर पूर्व दिशा में बाँध दें. नित्य प्रातः व्यापार शुरू करने से पहले, उसे धूप दीप दिखाएं. ऐसा करते समय मन ही मन गणपति के पूर्वोक्त मंत्र का जप करते रहे. ऋण मुक्ति का यह बहुत प्रभावी उपाय है. 

6.  गाय को प्रतिदिन दो रोटी तेल लगाकर गुड रखकर खिलाएं, पक्षियों को दाना व जल दें और अपनी आय में से दो गरीबों को भरपेट भोजन कराते रहें, लाभ होगा. 

7.  कार्यसिद्धि के लिए कार्यसिद्धि यन्त्र अत्यंत फलदायी है. अपनी मनोकामना को लाल चन्दन से भोजपत्र पर लिख लें. लाल या पीले वस्त्र पर कार्यसिद्धि यन्त्र स्थापित करें. अगरबत्तियां व घी का दीपक जलाएं और आरती उतारें. कार्य सिद्ध हो जाने पर प्रभु के नाम पर कोई सत्कार्य जैसे कार्य करने को कहें. उदहारणतया पांच गरीबों को भोजन कराने, या घर में भजन कीर्तन कराने या फिर कोई भी सेवा करने का प्राण करें, कार्य सिद्ध हो जाने पर उसे भूलें नहीं. अब भोजपत्र को तह करके कार्यसिद्धि यन्त्र के नीचे रख दें. नित्य प्रति पांच अगरबत्तियां जलाएं और प्रतिदिन इक्कीस बार यन्त्र के सामने अपनी भोजपत्र पर लिखी मनोकामना को दोहराएं, अगरबत्तियों को मुख्यद्वार पर लगाएं. कुछ ही दिनों में आपका कार्य सिद्ध हो जाएगा. 

9.  यदि कमाई का कोई जरिया न हो, तो एक गिलास कच्चे दूध में, चीनी डाल कर जामुन वृक्ष की जड़ में चढ़ाएं. यह क्रिया धनतेरस से शुरू करें और चालीस दिन लगातार करें. कभी-कभी सफाई कर्मचारी को चाय की 250  ग्राम पत्ती या सिगरेट दान करें. सफ़ेद धागे में दीपावली पूजन के पश्चात धागे में दीपावली पूजन के पश्चात ताम्बे का सिक्का गले में पहनें. उस दिन रसोईघर में बैठकर भोजन करें. लाभ स्वयं दिखने लगेगा.    

12 सितंबर 2011

जिनका पाला उस भूत से पड़ा (सत्य कथा)

बात उन दिनों की है जब हर गाँव, बाग-बगीचों में भूत-प्रेतों का साम्राज्य था। गाँवों के अगल-बगल में पेड़-पौधों, झाड़-झंखाड़ों, बागों (महुआनी, आमवारी, बँसवारी आदि) की बहुलता हुआ करती थी । एक गाँव से दूसरे गाँव में जाने के लिए पगडंडियों से होकर जाना पड़ता था। कमजोर लोग खरखर दुपहरिया या दिन डूबने के बाद भूत-प्रेत के डर से गाँव के बाहर जाने में घबराते थे या जाते भी थे तो दल बनाकर। हिम्मती आदमी दल का नेतृत्व करता था और बार-बार अपने सहगमन-साथियों को चेताया करता था कि मुड़कर पीछे मत देखो। जय हनुमान की दुहाई देते हुए आगे बढ़ो।

उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में सोखाओं की तूँती बोलती थी और किसी के बीमार पड़ने पर या तो लोग खरबिरउआ दवाई से काम चला लेते थे नहीं तो सोखाओं की शरण में चले जाते थे। तो आइए अब आप को उसी समय की

एक भूतही घटना सुनाता हूँ- हमारे गाँव के एक बाबूसाहब पेटगड़ी (पेट का दर्द) से परेशान थे । उनकी पेटगड़ी इतनी बड़ गई कि उनके जान की बन गई। बहुत सारी खरविरउआ दवाई कराई गई; मन्नतें माँगी गई, ओझाओं-सोखाओं को अद्धा, पौवा के साथ ही साथ भाँग-गाँजा और मुर्गे, खोंसू (बकरा) भी भेंट किए गए पर पेटगड़ी टस से मस नहीं हुई। उसी समय हमारे गाँव में कोई महात्मा पधारे थे और उन्होनें सलाह दी कि अगर बाबूसाहब को सौ साल पुराना सिरका पिला दिया जाए तो पेटगड़ी छू-मंतर हो जाएगी। अब क्या था, बाबूसाहब के घरवाले, गाँव-गड़ा, हितनात सब लोग सौ साल पुराने सिरके की तलाश में जुट गए। तभी कहीं से पता चला कि पास के गाँव सिधावें में किसी के वहाँ सौ साल पुराना सिरका है।

अब सिरका लाने का बीड़ा बाबूसाहब के ही एक लँगोटिया यार श्री खेलावन अहिर ने उठा लिया । साम के समय खेलावन यादव सिरका लाने के लिए सिधावें गाँव में गए। (सिधावें हमारे गाँव से लगभग एक कोस पर है) खेलावन यादव सिरका लेकर जिस रास्ते से चले उसी रास्ते में एक बहुत पुराना पीपल का पेड़ था और उसपर एक नामी भूत रहता था। उसका खौफ इतना था कि वहाँ बराबर लोग जेवनार चढ़ाया करते थे ताकि वह उनका अहित न कर दे। अरे यहाँ तक कि वहाँ से गुजरनेवाला कोई भी व्यक्ति यदि अंजाने में सुर्ती बनाकर थोंक दिया तो वह भूत ताली की आवाज को ललकार समझ बैठता था और आकर उस व्यक्ति को पटक देता था। लोग वहाँ सुर्ती, गाँजा, भाँग आदि चढ़ाया करते थे।

अभी खेलावन अहिर उस पीपल के पेड़ से थोड़ी दूर ही थे तब तक सिरके की गंध से वह भूत बेचैन हो गया और सिरके को पाने के लिए खेलावन अहिर के पीछे पड़ गया। खेलावन अहिर भी बहुत ही निडर और बहादुर आदमी थे, उन्होंने भूत को सिरका देने की अपेक्षा पंगा लेना ही उचित समझा। दोनों में धरा-धरउअल, पटका-पटकी शुरु हो गई। भूत कहता था कि थोड़ा-सा ही दो लेकिन दो। पर खेलावन अहिर कहते थे कि एक ठोप (बूँद) नहीं दूँगा; तूझे जो करना है कर ले। अब भूत अपने असली रूप में आ गया और लगा उठा उठाकर खेलावन यादव को पटकने पर खेलावन यादव ने भी ठान ली थी कि सिरका नहीं देना है तो नहीं देना है। पटका-पटकी करते हुए खेलावन अहिर गाँव के पास आ गए पर भूत ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और वहीं एक छोटे से गढ़हे में ले जाकर लगा उनको गाड़ने। अब उस भूत का साथ देने के लिए एक बुढ़ुआ (जो आदमी पानी में डूबकर मरा हो) जो वहीं पास की पोखरी में रहता था आ गया था। अब तो खेलावन यादव कमजोर पड़ने लगे। तभी क्या हुआ कि गाँव के कुछ लोग खेलावन यादव की तलाश में उधर ही आ गए तब जाकर खेलावन यादव की जान बची।

दो-तीन बार सिरका पीने से बाबूसाहब की पेटगड़ी तो एक-दो दिन में छू-मंतर हो गई पर खेलावन अहिर को वह पीपलवाला भूत बकसा नहीं अपितु उन्हें खेलाने लगा। बाबूसाहब ताजा सिरका बनवाकर और सूर्ती, भाँग आदि ले जाकर उस पीपल के पेड़ के नीचे चढ़ाए और उस भूत को यह भी वचन दिया कि साल में दो बार वे जेवनार भी चढ़ाएँगे पर तुम मेरे लँगोटिया यार (खेलावन यादव) को बकस दो। पीपलवाले भूत ने खेलावन यादव को तो बकस दिया पर जबतक बाबूसाहब थे तबतक वे साल में दो बार उस पीपल के पेड़ के नीचे जेवनार जरूर चढ़ाया करते थे।

उस पीपल के पेड़ को गिरे लगभग 20-25 साल हो गए हैं और वहीं से होकर एक पक्की सड़क भी जाती है पर अब वह भूत और वह पीपल केवल उन पुरनिया लोगों के जेहन में है जिनका पाला उस भूत से पड़ा।
सिरका चाहें आम का हो या कटहल का या किसी अन्य फल का पर यह वास्तव में पेट के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है और जितना पुराना होगा उतना ही बढ़िया ।

प्रस्तुतकर्ता :- प्रभाकर पाण्डेय
( के सौजन्य से )

11 सितंबर 2011

हास्टलवाला भूत

हमारे गाँव के पास ही एक स्नातकोत्तर महाविद्यालय है। इसकी गणना एक बहुत ही अच्छे शिक्षण संस्थान के रूप में होती है। दूर-दूर से बच्चे यहाँ शिक्षा-ग्रहण के लिए आते हैं।

7-8 साल पहले की बात है। बिहार का एक लड़का यहाँ हास्टल में रहकर पढ़ाई करता था। वह बहुत ही मेधावी और मिलनसार था। हास्टल में उसके साथ रहनेवाले अन्य बच्चे उसे दूबेभाई-दूबेभाई किया करते थे। एकबार की बात है कि वह अपने बड़े भाई की शादी में सम्मिलित होने के लिए 15 दिन के लिए गाँव गया। हास्टल के अन्य बच्चों ने उससे कहा कि दूबेभाई जल्दी ही वापस आ जाइएगा।

15 दिन के बाद वह लड़का फिर से आकर हास्टल में रहने लगा। लेकिन अब वह अपने दोस्तों से कम बात करता था। यहाँ तक कि वह उनके साथ खाना भी नहीं खाता था और कहता था कि बाद में खा लूँगा। अब वह पढ़ने में भी कम रुचि लेता था। जब उसके साथवाले बच्चे उससे कुछ बात करना चाहते थे तो वह टाल जाता था। वह दिनभर पता नहीं कहाँ रहता था और रात को केवल सोने के लिए हास्टल में आता था।

घर से हास्टल में आए उसे अभी एक हप्ते ही हुए थे कि एकदिन उसके कुछ घरवाले हास्टल में आए। सबके चेहरे उदासीन थे। एक लड़का उन लोगों से बोल पड़ा कि दूबेभाई तो अभी हैं नहीं, वे तो केवल रात को सोने आते हैं। उस लड़के की बात सुनकर दूबे के घरवाले फफककर रो पड़े और बोले वह रात को भी कैसे आ सकता है।
हमलोग तो उसका सामान लेने आए हैं। अब वह नहीं रहा। हास्टल से जाने के दो दिन बाद ही वह मोटरसाइकिल से एक रिस्तेदार के वहाँ जा रहा था। उसकी मोटरसाइकिल एक तेज आती ट्रक से टकरा गई थी और वह आन स्पाट ही काल के गाल में समा गया था। इतना कहकर वे लोग और तेज रोने लगे। हास्टल के जो बच्चे ये बात सुन रहे थे उन्हे ठकुआ मार गया था और उनके रोएँ खड़े हो गए थे। वे बार-बार यही सोच रहे थे कि रात को जो लड़का उनके पास सोता था या जिसे वे देखते थे क्या वह दूबेभाई का भूत था।

खैर उस दिन के बाद दूबेभाई का भूत फिर कभी सोने के लिए हास्टल में नहीं आया पर कई महीनों तक हास्टल के सारे बच्चे खौफ में जीते रहे और दूबेभाई के रहनेवाले कमरे में ताला लटकता रहा।

लोग कहते रहे कि दूबेभाई को अपने हास्टल से बहुत ही लगाव था इसलिए स्वर्गीय होने के बाद भी वे हास्टल का मोह छोड़ न सके।

कहते हैं आज भी जो बच्चे दूबेभाई के भूत के साथ सोते थे डरे-सहमे ही रहते हैं।

यह घटना सही है या गलत; यह मैं नहीं कह सकता। क्योंकि मैंने यह घटना अपने क्षेत्र के कुछ लोगों से सुनी है।
खैर भगवान दूबेभाई की आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करें।

प्रस्तुतकर्ता :- प्रभाकर पाण्डेय
 (के सौजन्य से)  

भूत भी कई प्रकार के होते हैं........

आज मैं भूतों की जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ वो बुड़ुआओं (एक प्रकार के भूत) के बारे में है। जब कोई व्यक्ति किसी कारण बस पानी में डूबकर मर जाता है तो वह बुड़ुआ बन जाता है। बुड़ुआ बहुत ही खतरनाक होते हैं पर इनका बस केवल पानी में ही चलता है वह भी डूबाहभर (जिसमें कोई डूब सकता हो) पानी में।

हमारे तरफ गाँवों में जब खाटों (खटिया) में बहुत ही खटमल पड़ जाते हैं और खटमलमार दवा डालने के बाद भी वे नहीं मरते तो लोगों के पास इन रक्तचूषक प्राणियों से बचने का बस एक ही रास्ता बचता है और वह यह कि उस खटमली खाट को किसी तालाब, खंता (गड्ढा) आदि में पानी में डूबो दिया जाए। जब वह खटमली खाट 2-3 दिनतक पानी में ही छोड़ दी जाती है तो ये रक्तचूषक प्राणी या तो पानी में डूबकर मर जाते हैं या अपना रास्ता नाप लेते हैं और वह खाट पूरी तरह से खटमल-फ्री हो जाती है।

एकबार की बात है कि हमारे गाँव के ही एक पंडीजी एक गड्ढे (इस गड्ढे का निर्माण चिमनी के लिए ईंट पाथने के कारण हुआ है नहीं तो पहले यह समतल खेत हुआ करता था) में अपनी बँसखट (बाँस की खाट) को खटमल से निजात पाने के लिए डाल आए थे। बरसात के मौसम की अभी शुरुवात होने की वजह से इस गड्ढे में जाँघभर ही पानी था। यह गड्ढा गाँव के बाहर एक ऐसे बड़े बगीचे के पास है जिसमें बहुत सारी झाड़ियाँ उग आई हैं और इसको भयावह बना दी हैं साथ ही साथ यह गड्ढा भी बरसात में चारों ओर से मूँज आदि बड़े खर-पतवारों से ढक जाता है।

दो-तीन दिन के बाद वे पंडीजी अपनी बँसखट (बाँस की खाट) को लाने के लिए उस गड्ढे की ओर बढ़े। लगभग साम के 5 बज रहे थे और कुछ चरवाहे अपने पशुओं को लेकर गाँव की ओर प्रस्थान कर दिए थे पर अभी भी कुछ छोटे बच्चे और एक-दो महिलाएँ उस गड्ढे के पास के बगीचे में बकरियाँ आदि चरा रही थीं।

ऐसी बात नहीं है कि वे पंडीजी बड़े डेराभूत (डरनेवाले) हैं। वे तो बड़े ही निडर और मेहनती व्यक्ति हैं। रात-रात को वे अकेले ही गाँव से दूर अपने खेतों में सोया करते थे, सिंचाई किया करते थे। पर पता नहीं क्यों उस दिन उस पंडीजी के मन में थोड़ा भय व्याप्त था। अभी पहले यह कहानी पूरी कर लेते हैं फिर उस पंडीजी से ही जानने की कोशिश करेंगे कि उस दिन उनके मन में भय क्यों व्याप्त था?

उस गड्ढे के पास पहुँचकर जब पंडीजी अपनी बँसखट (बाँस की खाट) निकालने के लिए पानी में घुसे तो अचानक उनको लगा की कोई उनको पानी के अंदर खींचने की कोशिश कर रहा है पर वे तबतक हाथ में अपनी खाट को उठा चुके थे। अरे यह क्या इसके बाद वे कुछ कर न सके और न चाहते हुए भी थोड़ा और पानी के अंदर खींच लिए गए।

अभी वे कुछ सोंचते तभी एक बुड़ुआ चिल्लाया, "अरे! तुम लोग देखते क्या हो टूट पड़ो नहीं तो यह बचकर निकल जाएगा और अब यह अकेले मेरे बस में नहीं आ रहा है।" तबतक एक और बुड़ुआ जो सूअर के रूप में था चिल्लाया, "हम इसको कैसे पकड़े, इसके कंधे से तो जनेऊ झूल रहा है।" इतना सुनते ही जो बुड़ुआ पंडीजी से हाथा-पाई करते हुए उन्हें पानी में खींचकर डूबाने की कोशिश कर रहा था वह फौरन ही हाथ बढ़ाकर उस पंडीजी के जनेऊ (यज्ञोपवीत) को खींचकर तोड़ दिया।

जनेऊ टूटते ही लगभग आधा दरजन बुड़ुआ जो पहले से ही वहाँ मौजूद थे उस पंडीजी पर टूट पड़े। अब पंडीजी की हिम्मत और बल दोनों जवाब देने लगे और बुड़ुआ बीस पड़ गए। बुड़ुआओं ने पंडीजी को और अंदर खींच लिया और उनको लगे वहीं पानी में धाँसने। पंडीजी और बुड़ुआओं के बीच ये जो सीन चल रहा था वह किसी बकरी के चरवाहे बच्चे ने देख लिया और चिल्लाया की बीरेंदर बाबा पानी में डूब रहे हैं। अब सभी बच्चे चिल्लाने लगे तबतक बुड़ुआओं ने पंडीजी (बीरेंदर बाबा) को उल्टाकर के कींचड़ में उनका सर धाँस दिया था और धाँसते ही चले जा रहे थे। पानी के ऊपर अब रह-रहकर पंडीजी (बीरेंदर बाबा) का पैर ही कभी-कभी दिखाई पड़ जाता था।

बच्चों की चिल्लाहट सुनकर तभी हमारे गाँव के श्री नेपाल सिंह वहाँ आ गए और एक-आध बड़े बच्चों के साथ गड्ढे में घुस गए। गड्ढे में घुसकर उन्होंने अचेत पंडीजी (बीरेंदर बाबा) को बाहर निकाला। पंडीजी के मुँह, कान, आँख और सर आदि में पूरी तरह से कीचड़ लगी हुई थी। अबतक आलम यह था कि हमारा लगभग आधा गाँव उस गड्ढे के पास जमा हो गया था। आनन-फानन में उस पंडीजी को नहलाया गया और खाट पर सुलाकर ही घर लाया गया। कुछ लोगों को लग रहा था कि पंडीजी अब बचेंगे नहीं पर अभी भी उनकी सँसरी (साँस) चल रही थी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के डाक्टर आ चुके थे और पंडीजी का इलाज शुरु हो गया था। दो-तीन दिन तक पंडीजी (बीरेंदर बाबा) घर में खाट पर ही पड़े रहे और अक-बक बोलते रहे। 15-20 दिन के बाद धीरे-धीरे उनकी हालत में सुधार हुआ पर उनकी निडरता की वजह से उन पर इन दिनों में भूतों का छाया तो रहा पर कोई भूत (बुड़ुआ) उनपर हाबी नहीं हो पाया।

आज अगर कोई उस पंडीजी (बीरेंदर बाबा) से पूछता है कि उस दिन क्या हुआ था तो वे बताते हैं कि दरअसल इस घटना के लगभग एक हप्ते पहले से ही कुछ भूत उनके पीछे पड़ गए थे क्योंकि वे कई बार गाँव से दूर खेत-बगीचे आदि में सुर्ती या कलेवा आदि करते थे तो इन भूतों को नहीं चढ़ाते थे। इस कारण से कुछ भूत उनके पीछे ही लग गए थे जिसकी वजह से वे उन दिनों में थोड़ा डरे-सहमे हुए रहते थे।

पंडीजी आगे बताते हैं कि जो बुड़ुआ पहले उनको पकड़ा वह गुलाब (हमारे गाँव का ही एक ब्राह्मण कुमार जो एक बड़े पोखर में डूबकर मर गया था) था क्योंकि दूसरे किसी भी बुड़ुवे में मेरा जनेऊ तोड़ने की हिम्मत तो दूर पास आने की भी हिम्मत नहीं थी पर जब गुलाब (ब्राह्मण बुड़ुए का नाम) ने जनेऊ तोड़ दिया तो सभी बुड़ुओं ने हमला बोलकर मुझे धाँस दिया।

अगली कहानी में मैं गुलाब के डूबने और उसके बुड़ुआ बनने की बात बताऊँगा।

भूत-पिचास निकट नहीं आवें, महाबीर जब नाम सुनावें।
जय बजरंगबली, जय हनुमान।

पिछली कहानी में हमने देखा कि किस प्रकार आधा दर्जन बुड़ुआओं (भूतों) ने मिलकर एक पंडीजी को गड्ढे में धाँस दिया था और उनको धाँसने में जिस बुड़ुआ ने सबसे अधिक अपने बल और बुद्धि का प्रयोग किया था उसका नाम गुलाब था। मैंने पिछली कहानी में यह भी बता दिया था की जो प्राणी पानी में डूबकर मरता है वह बुड़ुआ (एक प्रकार का भूत) बन जाता है।

अब आइए 40-50 साल पुरानी इस कहानी के माध्यम से यह जानने की कोशिश करते हैं कि गुलाब कौन था और किस प्रकार वह बुड़ुआ (भूत) बन गया था।

स्वर्गीय (स्वर्गीय कहना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है क्योंकि अगर गुलाब स्वर्गीय हो गए तो फिर बुड़ुआ बनकर लोगों को सता क्यों रहे हैं- खैर भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।) गुलाब हमारे गाँव के ही रहने वाले थे और जब उन्होंने अपने इस क्षणभंगुर शरीर का त्याग किया उस समय उनकी उम्र लगभग 9-10 वर्ष रही होगी। वे बहुत ही कर्मठी लड़के थे। पढ़ने में तो बहुत कम रूचि रखते थे पर घर के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। चउओं (मवेशियों) को चारा देने से लेकर उनको चराने, नहलाने, गोबर-गोहथारि आदि करने का काम वे बखूबी किया करते थे। वे खेती-किसानी में भी अपने घरवालों का हाथ बँटाते थे। उनका घर एक बड़े पोखरे के किनारे था। यह पोखरा गरमी में भी सूखता नहीं था और जब भी गुलाब को मौका मिलता इस पोखरे में डुबकी भी लगा आते। दरवाजे पर पोखरा होने का फायदा गुलाब ने छोटी ही उम्र में उठा लिया था और एक कुशल तैराक बन गए थे। आज गाँववालों ने इस पोखरे को भरकर घर-खलिहान आदि बना लिया है।

एकबार की बात है की असह्य गरमी पड़ रही थी और सूर्यदेव अपने असली रूप में तप रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वे पूरी धरती को तपाकर लाल कर देंगे। ऐसे दिन में खर-खर दुपहरिया (ठीक दोपहर) का समय था और गुलाब नाँद में सानी-पानी करने के बाद भैंस को खूँटे से खोलकर नाँद पर बाँधने के लिए आगे बढ़े। भैंस भी अत्यधिक गरमी से परेशान थी। भैंस का पगहा खोलते समय गुलाब ने बचपने (बच्चा तो थे ही) में भैंस का पगहा अपने हाथ में लपेट लिए। (इसको बचपना इसलिए कह रहा हूँ कि लोग किसी भी मवेशी का पगहा हाथ में लपेटकर नहीं रखते हैं क्योंकि अगर वह मवेशी किसी कारणबस भागना शुरुकर दिया तो उस व्यक्ति के जान पर बन आती है और वह भी उसके साथ घसीटते हुए खींचा चला जाता है क्योंकि पगहा हाथ में कस जाता है और हड़बड़ी में उसमें से हाथ निकालना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। ) जब गुलाब भैंस को लेकर नाँद की तरफ बढ़े तभी गरमी से बेहाल भैंस पोखरे की ओर भागी। गुलाब भैंस के अचानक पोखरे की ओर भागने से संभल नहीं सके और वे भी उसके साथ तेजी में खींचे चले गए। भैंस पोखरे के बीचोंबीच में पहुँचकर लगी खूब बोह (डूबने) लेने। चूँकि पोखरे के बीचोंबीच में गुलाब के तीन पोरसा (उनकी तंबाई के तिगुना) पानी था और बार-बार भैंस के बोह लेने से उन्हें साँस लेने में परेशानी होने लगी और वे उसी में डूब गए। हाथ बँधा और घबराए हुए होने की वजह से उनका तैरना भी काम नहीं आया।

2-3 घंटे तक भैंस पानी में बोह लेती रही और यह अभाग्य ही कहा जाएगा कि उस समय किसी और का ध्यान उस पोखरे की ओर नहीं गया। उनके घरवाले भी निश्चिंत थे क्योंकि ऐसी घटना का किसी को अंदेशा नहीं था। 2-3 घंटे के बाद जब भैंस को गरमी से पूरी तरह से राहत मिल गई तो वह गुलाब की लाश को खिंचते हुए पोखरे से बाहर आने लगी। जब भैंस लगभग पोखरे के किनारे पहुँच गई तो किसा व्यक्ति का ध्यान भैंस की ओर गया और वह चिल्लाना शुरु किया। उस व्यक्ति की चिल्लाहट सुनकर आस-पास के बहुत सारे लोग जमा हो गए। पर यह जानकर वहाँ शोक पसर गया कि कर्मठी गुलाब अब नहीं रहा। भैंस ने अपनी गरमी शांत करने के लिए एक निर्बोध बालक को मौत के मुँह में भेज दिया था।

इस घटना को घटे जब लगभग 5-6 साल बीत गए तो लोगों को उस पोखरे में बुड़ुवे (भूत) का एहसास होने लगा। गाँव में यह बात तेजी से फैल गई कि अब गुलाब जवान हो गया है और लोगों पर हमला भी करने लगा है। आज वह पोखरा समतल हो गया है, उसपर घर-खलिहान आदि बन गए हैं पर जबतक उसमें पानी था तबतक गुलाब उस पोखरे में अकेले नहानेवाले कई लोगों पर हमला कर चुका था। एक बार तो वह एक आदमी को खींचते हुए पानी के अंदर भी लेकर चला गया था पर संयोग से किसी महिला की नजर उसपर पड़ गई और उसकी चिल्लाहट सुनकर कुछ लोगों ने उस व्यक्ति की जान बचाई।

प्रस्तुतकर्ता :- प्रभाकर पाण्डेय
  ( के सौजन्य से )

पुनर्जन्म, भूत-प्रेत और.... कहानी

क्या आप पुनर्जन्म या भूत-प्रेत में विश्वास करतें है?...अगर नहीं...तो यह कहानी जरुर पढ़ें अब हम आवाज की बात भी लगे हाथ कर ही लेते है....आवाज तो कभी हम किसीको देते है...बुलाते है, कहते है, सुनते है!... और कोई हमें भी आवाज दे कर बुलाता है... बतियाता है, अच्छी या बुरी खबर सुनाता है, अपने कहे के अनुसार चलने को मजबूर भी कर देता है!... लेकिन इस आवाज देने वाले का अपना रंग--रुप होता है...नाम होता है!...एक रिश्ता होता है!... कोई अजनबी भी होता है तो वह रिश्ते से हम जैसा ही एक होता है...इस धरती पर अवतरीत एक जीव होता है!... !...अगर वह मनुष्य भी नही है तो क्या हुआ?... एक जीव तो होता ही है जो जीवंत होने के सभी लक्षणों से युक्त होता है!

...और फिर तो क्या निर्जीव चिज-वस्तुओं की आवाज नहीं होती?... क्यों नहीं होती?...अवश्य होती है!... चीजें गिरने की आवाज होती है....चीजों के ट्कराने की आवाज होती है!... हवाके झोंके से सरसराहट करने वाले पत्तों की आवाज होती है...बिजली कड्कने की आवाज होती है... बरसने वाली वर्षा की आवाज होती है!...नदियां, समंदर, झरने....सभी आवाजे ही तो देते है..गिनवाने जाएं तो बहुत लंबी सूची बनेगी!

…...लेकिन...लेकिन हम जान ही जाते है कि आवाज किस चीज की है और कहांसे आ रही है!... आवाज उत्पन्न करनेवाली चिज-वस्तुएं नजर भी आ जाती है!

..आवाज को ले कर ही,ललिता के साथ जो कुछ घटा वह मै इस कहानी में बयां करने जा रही हूं!..सबसे पहले तो मै लोलिता का परिचय दूंगी!... इसकी 32 साल की उम्र है!...शादीशुदा है!..सरकारी स्कूल में अध्यापिका है!...पति इंजीनियर है और मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत है!...लोलिता की दो बेटियां है..बडी 6 साल की और छोटी 4 साल की है...अब लोलिता फिर पेट से है, तीन महिने की गर्भवती है!...लोलिता का परिवार, सुखी परिवार है!

... एक दिन सुबह जब लोलिता स्कूल जाने की तैयारी में थी; तब लोलिता के छोटे  भाई जय का फोन आया...खबर दुःख भरी थी..लोलिता के पिताजी को  हार्ट-अटैक आया था और उन्हें अस्पताल ले जाया गया था! ..सुनकर जाहिर है कि लोलिता का दिल बैठ गया... माता-पिता की जगह दुनिया में कौन ले सकता है?..लोलिता ऐसे में कैसे रुक सकती थी?......उसी शहर में उसका मायका था!...उसने स्कूल में संदेशा भिजवाया कि उसकी तीन दिन की छुट्टी ग्रांट की जाए...वह नहीं आ सकेगी!...लोलिता की दोनो बेटियां स्कूल जा चुकी थी... तय हुआ कि लोलिता अकेली ही ऑटॉ ले कर अपने पिता के घर पहुंच जाएगी और उसके पति मनोज, अपनी कार लेकर, दोनों बेटियों को स्कूल से साथ ले कर बादमें लोलिता के मायके पहुंच जाएंगे!..वह भी उस दिन एक दिन की छुट्टी ले रहे थे!...

…  ...लोलिता के पास अस्पताल का पता था... उसकी मां और छोटा भाई दिनेश अस्पताल में ही उसके पिताजी के पास थे..सो लोलिता अस्पताल पहुंच गई!...वहां पता चला कि पिताजी को समय रहते ही अस्पताल लाया गया था...इस वजह से सही समय पर डॉक्टरी सहायता मिल गई और अब वे खतरे से बाहर है!.. अस्पताल में उन्हे दो दिन ऑब्झर्वेशन के लिए रखने की आवश्यकता डॉक्टर को महसूस हुई थी!... फिल हाल उन्हे आई.सी.यू. में रखा गया था!... बाहर से ही पारदर्शी शीशे की खिडकी से लोलिता ने पिताजी को नजर भर कर देख लिया... उस समय वह आंखें बंद किए बेड पर लेटे हुए थे!

..लोलिता को थोडी तसल्ली मिल गई!...इतने में उसके पति मनोज भी अपनी दोनों बेटियों के साथ ले अस्पताल पहुंच गए!.. उन्हों ने भी डॉक्टर से मिल कर अपने ससुरजी के बारे में सारी जानकारी ले ली और राहत महसूस की..अब खतरा टल चूका था!..बस दो दिन की बात थी; पिताजी को अस्पताल से घर ले जाने की इजाजत मिल जानी थी!

आज दूसरा दिन था!... पिताजी स्वस्थ लग रहे थे!..वे घर जाने की जिद कर र्हे थे, लेकिन उनका इलाज करने वाले डॉ. तिवारी उन्हें एक दिन और अस्पताल में रखना चाहते थे!.. एक ही दिन की तो बात थी!... सभी ने उन्हें समझाया कि ' बस!.. कल सुबह 10 बजे जैसे कि डॉ. तिवारी अस्पताल पहुंचेंगे... आपका एक बार परिक्षण करेंगे और आपको घर जाने की इजाजत मिल जाएगी!'

...उस रात लोलिता को रात देर तक नींद नहीं आई!...कल सुबह पिताजी घर आने वाले थे...उसके बाद शनिवार और रविवार...दो दिन के लिए वैसे भी स्कूल की छुट्टी ही थी!... पति मनोज और दोनों बेटियां ..पूरा परिवार यही पर था!... पिताजी का स्वास्थ्य ठीक-ठाक था...चिंता करने जैसा कुछ भी नहीं था!.... लेकिन लोलिता की आंखों से मानों नींद कोसो दूर थी!...लोलिता ने अपने मोबाइल फोन में झांका... रात के करीब 2 बजने वाले थे!... उसी समय उसने अपने कान के पास हवाका हलकासा झोंका महसूस किया...लेकिन उसने खास ध्यान नहीं दिया!.. वह अपनी ही सोच में डूबी हुई थी!

... अब कान के पास हवामें कुछ ठंड भी महसूस हुई.. लोलिता चौक गई!.. उसके पास ड्बल बेड पर इस समय उसकी बडी बिटीया 'विदुषी' सोई हुई थी!...साथ वाले कमरे में मनोज और छोटी बिटिया ' वैशाली' थे!.. गरमियों के दिन थे; सिलिंग फैन जरुर चल रहा था... लेकिन कान के पास ठंडी हवा क्यों कर महसूस हुई!... लोलिता समझ नहीं पाई और उसने पासा पलटा!

...कि उसके कान के बिलकुल पास कोई फुस्फुसाया...' लोलिता!..तेरे पिताजी बस!.. कल शाम तक के मेहमान है!...अगर वे कल घर नहीं आएंगे तो ही अच्छा है...कुछ साल की जिंदगी और जी सकतें है!'

" क्या?......." लोलिता लगभग चिल्लाई!..और अब एकदम से उठकर बैठ गई!...वह घबराई हुई थी!...अब उसने बेड के पास का स्वीच ओन किया...बल्ब जल उठा!...कमरे में रोशनी थी! लोलिता ने आस-पास नजर दौडाई...वहां तो कोई भी नहीं था!...तो फिर कौन बोल रहा था?...लोलिता मारे घबराहट के पसीने से तर-बतर थी!...उसके बाद उसने लाईट जलती ही छोड दी...सुबह सुबह कोई पांच बजे के करीब उसकी आंख लगी!

...आज सुबह से घर में सभी खुश थे...लेकिन लोलिता कुछ तनाव और कुछ डर की मिलीजुली शकल में नजर आ रही थी!... लोलिता का यह रुप उसके पति मनोज से छिपा न रह सका!... मनोज ने पूछ ही लिया...

"... लोलो, आज तो पिताजी घर आ रहे है... फिर भी लगता है कि तुम्हे परेशानी है?... क्या बात है?"

" बस!...ऐसे ही...कुछ ठीक नहीं लग रहा!...चिंता पिताजी की ही हो रही है!"..लोलिता ने परेशानी बता दी!

" लगता है कुछ छुपा रही हो...क्या तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है?...या रात को विदुषी ने परेशान किया?" मनोज को लोलिता के पहले वाले जवाब से संतुष्टी हुई नहीं थी!

... अब लोलिता को भी लगा कि रात को उसके साथ जो कुछ घटीत हुआ...उसे छिपाना ठीक नही!... उसने मनोज को सबकुछ बता दिया!... सुनकर मनोज को ज्यादा हैरानी नहीं हुई! उसने लोलिता को एक अच्छे पति की तरह समझाया कि यह उसका वहम है... 'कई बार मनुष्य अपने ही विचारों में  इतना उलझ जाता है कि उसे आंखों के सामने विचित्र चिज-वस्तुएं भी दिखाई देती है और आवाजें भी सुनाई देती है!...' मनोज के समझाने पर लोलिता को कुछ तसल्ली मिली!...उसे भी लगा कि यह उसका वहम ही है कि उसके कान में कोई कुछ कह गया था!

... अब पिताजी को घर लाने के लिए लोलिता, भाई जय और मनोज अस्पताल गए!... लोलिता की भाभी सुजाता और मां घर पर ही थे!...पिताजी अव स्वस्थ थे!.. घर जाने के लिए तैयार बैठे थे!...अब 11 बजने वाले थे!... समय के पाबंद, ठीक 10 बजे अस्पताल पहुंचने वाले डॉ. तिवारी अब तक पहुंचे नहीं थे!...अस्पताल में बैठे लोलिता वगैरा सभी डॉ. तिवारी का इंतजार कर रहे थे!...उनके आते ही एक बार के परिक्षण के बाद पिताजी घर जा सकतें थे!

... लेकिन डॉ.तिवारी नहीं आए... खबर आई कि नजदीक के पूल पर उनकी कार का एक्सिडैंट हुआ है...  ड्राईवर दम तोड चुका है और डॉ.तिवारी को पुलिस द्वारा वही नजदीक के अस्पताल में ले जाया गया है!... सुन कर सभी सक्तेमें आ गए... सबसे ज्यादा तो लोलिता सक्ते में आ गई.. अस्पताल मे उस समय ड्यूटी पर मौजूद अन्य डॉक्टर, राठी ने लोलिता के पिताजी का परिक्षण किया और उन्हे घर ले जाने की इजाजत दी! ...लेकिन लोलिता एकदम से कह उठी.." नहीं डॉक्टर...पिताजी को कुछ दिन यही रहने दीजिए!...उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है!...डॉक्टर मुझे लगता है कि उनका घर जाना ठीक नहीं रहेगा... आई रिक्वेस्ट यू डॉक्टर!"

...सुन कर सभी अचंभे में पड गए कि लोलिता ऐसा क्यों कह रही है!...लोलिता के पिताजी भी हैरानी से उसकी तरफ देखने लगे!...मनोज को जरुर लगा कि लोलिता ने जो सुबह कानों में किसी की आवाज सुनने की बात कही थी... उस बात को ले कर वह अब तक परेशान है और इसी वजह से कह रही है कि 'पिताजी को आज घर नहीं ले जाना चाहिए!' ...पति मनोज लोलिता को एक तरफ ले गए और थोडा गुस्सा दिखाते हुए बोले...

" लोलिता!... तुम अब भी आवाज वाली बात पर विश्वास कर रही हो? कौनसी सदी में जी रही हो?...माना कि औरतें अंध-विश्वासी होती है...लेकिन तुम तो हद पार कर रही हो!"

" ..प्लीज मानिए मेरी बात!...आज के दिन अगर पिताजी यही रहते है तो किसीका क्या जाएगा?... मेरा वहम ही सही... पिताजी को आज का दिन यही रहने के लिए समझाइए!"...लोलिता अब आंखों में आंसू लिए कह रही थी!...अब उसका भाई जय भी आ कर खडा हो गया था और सुन रहा था...वह बोला...

" ...ठीक है दीदी...अगर आपके मन में कोई वहम है तो मै पिताजी को समझाने की कोशिश करता हूं..लेकिन वह शायद ही मानेंगे!.. कल से घर जाने की रट लगाए हुए है!"

...और वैसा ही हुआ..पिताजी नहीं माने!...डॉ. राठी को भी लगा कि वे स्वस्थ है और चाहे तो घर जा सकतें है!... और पिताजी घर आ गए!

... घर में लोलिता की मां और भाभी दोनों ही बहुत खुश थी...उन्हों ने मंदिर जा कर प्रसाद भी चढाया!...अब चिंता करने जैसा कुछ भी नहीं था!...कुछ नजदीकी रिश्तेदार घर पर पिताजी का हाल-चाल पूछ्ने भी आ गए थे!...हां!..किसीने अब तक डॉ. तिवारी के एक्सिडैंट की खबर पिताजी को दी नहीं थी!..पिताजी ने दो-एक बार कहा भी कि .... 'मेरा इलाज करने वाले डॉ.तिवारी अस्पताल से निकलते समय मिल जाते तो अच्छा रहता!...बहुत अच्छे हार्ट-स्पेशियालिस्ट है!...स्वभाव से कितने खुश-मिजाज है!.....उनसे मिलने को बहुत दिल कर रहा है...मेरी फोन पर ही उनसे बात करवा दो!' ... लेकिन जय ने ' बाद में बात करवाता हूं!' कह कर बात टाल दी थी!

.... उस रात पिताजी रात को अच्छी नींद सोए!...सुबह उठ कर मॉर्निंग-वाक पर भी गए!...वापस आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ कर चाए पी रहे थे... हाथ में अखबार था!...अखबार का दुसरा पन्ना देख रहे थे कि बोल उठे..." अरे भगवान!...यह क्या हो गया...डॉ. तिवारी चल बसे?" साथ वाली कुर्सी पर बेटा जय बैठा हुआ था!... सामने वाली कुर्सी पर दामाद मनोज बैठे हुए थे!... घर की महिलाएं रसोई में थी!

...जय और मनोज ने फुर्ति दिखाई और पिताजी को संभाला...लेकिन उनकी गर्दन कुर्सी के पीछे लुढक चुकी थी!... उन्हों ने अखबार में छ्पी डॉक्टर तिवारी के एक्सिडैंट की खबर पढ ली थी...एक्सिडैंट के बाद डॉक्टर तिवारी को नजदीक के अस्पताल में ले जाया गया था..लेकिन सिर पर गहरी चोट लगी हुई थी और ज्यादा खून बह गया था; इस वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका!...पिताजी के दिल को इस खबर ने हिला कर रख दिया!

...तुरन्त अस्पताल में फोन किया गया...डॉ. राठी तुरन्त पहुंच गए...उनका परिक्षण हुआ...लेकिन लोलिता के पिताजी दुनिया छोड कर जा चुके थे!... अब घर में मातम छाया हुआ था!...लोलिता रोते रोते बार बार कह रही थी कि..." आप लोगों ने मेरी बात मानी होती..पिताजी को और एक दिन अस्पताल में रहने देते.. तो...पिताजी आज जीवित होते...हमारे बिच होते!"...मनोज लोलिता को समझाने में लगे हुए थे कि...मनुष्य का जन्म और म्रूत्यु का चक्र ईश्वर ही की मरजी से चलता है...इसमें कोई फरक नहीं कर सकता!...लेकिन लोलिता अपनी बात पर अडी हुई थी कि उसको संकेत पहले ही मिल चुका था!..उसके कान में किसीने बताया था कि ‘पिताजी को बचाया जा सकता है!

...कुछ दिन ऐसे ही गुजर गए!...और परिक्षण में पता चला कि लोलिता के गर्भ में जुडवा बच्चे है!... यह खबर अचरज करने वाली तो थी नहीः जुडवा बच्चे तो पैदा होते ही रहते है!

....लेकिन एक दिन लोलिता को ऐसे ही रात को फिर आवाज सुनाई दी...जैसे कि किसी ने कान में कहा.." लोलिता, तेरे गर्भ में दो लड्के है...एक तो तेरे पिता स्वयं पुनर्जन्म ले कर अवतरित हो रहे है!"

..." मै कैसे विश्वास कर लूं कि वे मेरे पिता ही है?" लोलिता आधी-कच्ची नींद में थीः वह भी बोल पडी!

..." तेरे पिता की बाह पर लाल रंग के लाखे का निशान थाः...बेटे की बाह पर भी होगा!" ..स्वर धीमा हो गया और उसके बाद कुछ नहीं.

..." लोली!..लोली!.. क्या सपना आया था?...नींद में क्या बोल रही थी?" ..साथ ही बेड पर लेटे हुए पति मनोज ने पूछा.
..." पता नहीं क्या बोली मै!..मुझे कुछ याद नहीं है!" लोलिता ने बात छिपाई!
.... समय के चलते लोलिता ने दो जुडवा लड्कों को जन्म दिया!...सही में एक बच्चे की बाह पर लाल रंग के लाखे का निशान था; ठीक उसी जगह जहां लोलिता के पिताजी की बाह पर था!...लोलिता अब आवाज में बसी हुई सच्चाई जान चुकी थी!

... लेकिन दो महिने बाद उसके दोनों बेटे जॉन्डिस की चपेट में आ गए!... उन्हे अस्पताल पहुंचाया गया!...उन दोनों की हालत देखते हुए डोक्टर्स ने जवाब दे दिया!
...." हम अपनी पूरी कोशिश करेंगे... बाकी उपरवाले की मर्जी!" ...डॉक्टर ने कहा!
... और उसी रात फिर अस्पताल के अहाते में बेंच पर बैठी लोलिता को आवाज सुनाई दी.....
..." तेरे पिता को बचा ले.... उन्हे उनके असली नाम से पुकार कर रुक जाने के लिए कहेगी तो वे रुक जाएंगे...अभी इसी समय चली जा!"
...लोलिता भागती हुई I.C.U. की तरफ गई... मनोज साथ ही थे..वे भी उसके पीछे भागे... लेकिन लोलिता को I.C.U.में जाने से रोका गया! ....मनोज कुछ बोलते उससे पहले ही लोलिता बाहर खडी जोर से चिल्लाने जैसी आवाज में बोली....

..." पुरुषोत्तम!... रुक जाओ!....मेरी खातिर रुक जाओ पुरुशोत्तम!...तुम्हारी मै बेटी भी हूं; मां भी हूँ!!... मुझे छोड कर मत जाओ!" ...बोलते बोलते लोलिता रो पडी.
...उसी समय आइ.सी.यू का दरवाजा थोडासा खुल गया और नर्स ने बताया कि एक बच्चा अभी सांसे ले रहा है और एक भगवान को प्यारा हो गया है!
..."जो है वे मेरे पिता पुरुशोत्तम है नर्स!...वे अब कहीं नहीं जाएंगे!" लोलिता ने नर्स से कह दिया...अब दरवाजा फिर बंद हो गया!...
.... सही में एक बच्चे की जान बच गई थी!...बच्चा अब ठीक हो कर घर आ गया था!... लोलिता ने अब अपने पति मनोज को सब कुछ बताया. मनोज को भी अब विश्वास हो गया है कि कुदरत के पिटारे में कई शक्तियां भरी हुई है!
...एक दिन मनोज ने लोलिता से यूं ही पूछा...
“ लोली..हमारा दूसरा बच्चा क्यों हमें छोड कर गया?”
“ बस!..वो चला गया...अपने घर ही तो गया है!” लोलिता का ठंडा जवाब!
“ कौन था वह?...उसका कौन सा घर था?”...मनोज के मन में जिज्ञासा पैदा हुई!
“ वे डॉ.तिवारी थे मनोज!...अपने घर वापस चले गए है!...तुम पता कर लो, वे वहीं मिलेंगे!...” कहते हुए लोलिता ने अपने सोए हुए बच्चे के गाल पर होठ रख लिए!...मनोज ने दूसरे दिन ही डॉ.तिवारी के घर का रुख किया..उसे पता चला की जिस रात उसके दूसरे बच्चे की मृत्यु हुई थी... उसी रात, उसी समय डॉ.तिवारी की बहू ने बेटे को जन्म दिया था!
...वाकई कुदरत एक ऐसा अंधकार है, जिसमें बहुत कुछ छिपा हुआ है!....उस अंधकार को भेदने की शक्ति हमारे पास नहीं है!

भूत-प्रेतों की लीला

भूत-प्रेतों की लीला भी अपरम्पार होती है। कभी-कभी ये बहुत ही सज्जनता से पेश आते हैं तो कभी-कभी इनका उग्र रूप अच्छे-अच्छों की धोती गीली कर देता है। भूत-प्रेतों में बहुत कम ऐसे होते हैं जो आसानी से काबू में आ जाएँ नहीं तो अधिकतर सोखाओं-पंडितों को पानी पिलाकर रख देते हैं, उनकी नानी की याद दिला देते हैं।

आज की कहानी एक ऐसे प्रेत की है जिसको कोई भी सोखा-पंडित अपने काबू में नहीं कर पाए और ना ही वह प्रेत किसी देवी-देवता से ही डरता था। क्या वह प्रेत ही था या कोई और??? आइए जानने की कोशिश करते हैं। हमारी भी इस प्रेत को जानने की उत्कंठा अतितीव्र हो गई थी जब हमने पहली बार ही इसके बारे में सुना। दरअसल लोगों से पता चला कि इस प्रेत ने बहुत सारे सोखाओं-पंडितों को घिसरा-घिसराकर मारा और इतना ही नहीं जब इसे किसी देवी या देवता के स्थान पर लेकर जाया गया तो इसने उस देवी या देवता की भी खुलकर खिल्ली उड़ाई और उन्हें चुनौती दे डाली कि पहले पहचान, मैं कौन??? और शायद इस कौन का उत्तर किसी के पास नहीं था चाहें वह सोखा हो या किसी देवी या देवता का बहुत बड़ा भक्त या पुजारी।

अभी से आप मत सोंचिए की यह कौन था जिसका पता बड़े-बड़े सोखा और पंडित तक नहीं लगा पाए? क्या इस कहानी को पढ़ने के बाद भी इस रहस्य से परदा नहीं उठेगा? इस रहस्यमयी प्रेत के 'पहचान मैं कौन' पर से परदा उठेगा और यह परदा शायद वह प्रेत ही उठाएगा क्योंकि उससे अच्छा उसको कौन समझ सकता है। बस थोड़ा इंतजार कीजिए और कहानी को आगे तो बढ़ने दीजिए।

यह कहानी हमारे गाँव-जवार की नहीं है। ये कहानी है हमारे जिले से सटे कुशीनगर जिले के एक गाँव की। यह गाँव पडरौना के पास है। अब आप सोंच रहे होंगे कि यह कहानी जब मेरे जिले की नहीं है तो फिर मैं इसे कैसे सुना रहा हूँ। मान्यवर इस गाँव में मेरी रिस्तेदारी पड़ती है अस्तु इस कहानी को मैं भी अच्छी तरह से बयाँ कर सकता हूँ।

भूत-प्रेतों की तरह से इस कहानी को रहस्यमयी न बनाते हुए मैं सीधे अपनी बात पर आ जाता हूँ। इस गाँव में एक पंडीजी हैं जो बहुत ही सुशील, सभ्य और नेक इंसान हैं। यह कहानी घटिट होने से पहले तक ये पंडीजी एक बड़े माने-जाने ठीकेदार हुआ करते थे और ठीके के काम से अधिकतर घर से दूर ही रहा करते थे। हप्ते या पंद्रह दिन में इनका घर पर आना-जाना होता था। ये ठीका लेकर सड़क आदि बनवाने का काम करते थे। इनके घर के सभी लोग भी बड़े ही सुशिक्षित एवं सज्जन प्रकृति के आदमी हैं। इनकी पत्नी तो साधु स्वभाव की हैं और एक कुशल गृहिणी होने के साथ ही साथ बहुत ही धर्मनिष्ठ हैं।

एकबार की बात है कि पंडीजी ठीके के काम से बाहर गए हुए थे पर दो दिन के बाद ही उनको दो लोग उनके घर पर पहुँचाने आए। पंडीजी के घरवालों को उन दो व्यक्तियों ने बताया कि पता नहीं क्यों कल से ही पंडीजी कुछ अजीब हरकत कर रहे हैं। जैसे कल रात को सात मजदूरों ने अपने लिए खाना बनाया था और ये जिद करके उनलोगों के साथ ही खाना खाने बैठे पर मजदूरों ने कहा कि पंडीजी पहले आप खा लें फिर हम खाएँगे। और इसके बाद जब ये खाना खाने बैठे तो सातों मजदूरो का खाना अकेले खा गए और तो और ये खाना भी आदमी जैसा नहीं निशाचरों जैसा खा रहे थे। उसके बाद दो मजदूर तो डरकर वहाँ से भाग ही गए। फिर हम लोगों को पता चला। उसके बाद हम लोग भी वहाँ पहुँचे और इनको किसी तरह सुलाए और सुबह होते ही इनको पहुँचाने के लिए निकल पड़े।

इसके बाद वे दोनों व्यक्ति चले गए और पंडीजी भी आराम से अपनी कोठरी में चले गए। कुछ देर के बाद पंडीजी लुँगी लपेटे घर से बाहर आए और घरवालों के मना करने के बावजूद भी खेतों की ओर निकल गए। घर का एक व्यक्ति भी (इनके छोटे भाई) चुपके से इनके पीछे-पीछे हो लिया। जब पंडीजी गाँव से बाहर निकले तो अपने ही आम के बगीचे में चले गए। आम के बगीचे में पहुँचकर कुछ समय तो पंडीजी टहलते रहे पर पता नहीं अचानक उनको क्या हुआ कि आम की नीचे झुलती हुई मोटी-मोटी डालियों को ऐसे टोड़ने लगे जैसे हनुमान का बल उनमें आ गया हो। डालियों के टूटने की आवाज सुनकर इनके छोटे भाई दौड़कर बगीचे में पहुँचे और इनको ऐसा करने से रोकने लगे। जब इनके छोटे भाई ने बहुत ही मान-मनौवल की तब पंडीजी थोड़ा शांत हुए और घर पर वापस आ गए।

इस घटना के बाद तो पंडीजी के पूरे परिवार के साथ ही साथ इनका पूरा गाँव भी संशय में जीने लगा। एक दिन फिर क्या हुआ की पंडीजी अपनी ही कोठरी में बैठकर अपने बच्चे को पढ़ा रहे थे और इनकी पत्नी वहीं बैठकर रामायण पढ़ रही थीं तभी इनकी पत्नी क्या देखती हैं कि पंडीजी की शरीर फूलती जा रही है और चेहरा भी क्रोध से लाल होता जा रहा है। अभी पंडीजी की पत्नी कुछ समझती तबतक पंडीजी अपने ही बेटे का सिर अपने मुँह में लेकर ऐसा लग रहा था कि जैसे चबा जाएँगे पर इनकी पत्नी डरी नहीं और सभ्य भाषा में बच्चे को छोड़ने की विनती कीं। अचानक पंडीजी बच्चे का सिर मुँह से निकालकर शांत होने लगे और रोते बच्चे का सिर सहलाने लगे।

इस घटना के बाद तो पंडीजी के घरवालों की चैन और नींद ही हराम हो गई। वे लोग पूजा-पाठ करवाने के साथ ही साथ कइ सारे डाक्टरों से संपर्क भी किए। यहाँ तक कि उन्हे कई बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया गया पर डाक्टरों की कोई भी दवा काम नहीं की और इधर एक-दो दिन पर पंडीजी कोई न कोई भयानक कार्य करके सबको सकते में डालते ही रहे। डाक्टरों से दिखाने का सिलसिला लगभग 2 महीने तक चलता रहा पर पंडीजी के हालत में सुधार नाममात्र भी नहीं हुआ।

हाँ पर अब सबके समझ में एक बात आ गई थी और वह यह कि जब भी पंडीजी की शरीर फूलने लगती थी और उनका चेहरा तमतमाने लगता था तो घर वाले उनकी पत्नी को बुला लाते थे और पंडीजी अपनी पत्नी को देखते ही शांत हो जाते थे।

एकदिन पंडीजी की पत्नी पूजा कर रही थीं तभी पंडीजी वहाँ आ गए और अपनी पत्नी से हँसकर पूछे कि तुम पूजा क्यों कर रही हो? पंडीजी की पत्नी ने कहा कि आप अच्छा हो जाएँ , इसलिए। अपनी पत्नी की बात सुनकर पंडीजी ठहाका मार कर हँसने लगे और हँसते-हँसते अचानक बोल पड़े की कितना भी पूजा-पाठ कर लो पर मैं इसे छोड़नेवाला नहीं हूँ अगर मैं इसे छोड़ुँगा तो इसे इस लोक से भेजने के बाद ही। पंडीजी की यह बात सुनकर पंडीजी की पत्नी सहमीं तो जरूर पर उन्होंने हिम्मत करके पूछा आप कौन हैं और मेरे पति ने आपका क्या बिगाड़ा हैं? इसपर पंडीजी ने कहा कि मैं कौन हूँ यह मैं नहीं जानता और इसने मेरा क्या बिगाड़ा है मैं यह भी नहीं बताऊँगा।

पंडीजी की पत्नी ने जब यह बात अपने घरवालों को बताई तो पंडीजी के घरवालों ने उस जवार में जितने सोखा-पंडित हैं उन सबसे संपर्क करना शुरु किया। पहले तो कुछ सोखा-पंडितों ने झाड़-फूँक किया पर कुछ फायदा नहीं हुआ। एकदिन पंडीजी के घरवालों ने पंडीजी को लेकर उसी जवार (क्षेत्र) के एक नामी सोखा के पास पहुँचे। सोखाबाबा कुछ मंत्र बुदबुदाए और पंडीजी की ओर देखते हुए बोले कि तुम चाहें कोई भी हो पर तुम्हें इसे छोड़कर जाना ही होगा नहीं तो मैं तुम्हें जलाकर भस्म कर दूँगा। जब सोखाबाबा ने भस्म करने की बात कही तो पंडीजी का चेहरा तमतमा उठा और वे वहीं उस सोखा को कपड़े की तरह पटक-पटककर लगे मारने। सोखा की सारी शेखी रफूचक्कर हो गई थी और वह गिड़गिड़ाने लगा था। फिर पंडीजी की पत्नी ने बीच-बचाव किया और सोखा की जान बची।

पंडीजी द्वारा सोखा के पिटाई की खबर आग की तरह पूरे जवार क्या कई जिलों में फैल गई। अब तो कोई सोखा या पंडित उस पंडीजी से मिलना तो दूर उनका नाम सुनकर ही काँपने लगता था। इसी दौरान पंडीजी को लेकर एक देवी माँ के स्थान पर पहुँचा गया पर देवी माँ (देवी माँ जिस महिला के ऊपर वास करती थीं उस महिला ने देवी-वास के समय) ने साफ मना कर दिया कि वे ऐसे दुष्ट और असभ्य व्यक्ति के मुँह भी लगना नहीं चाहतीं। पंडीजी उस स्थान पर पहुँचकर मुस्कुरा रहे थे और अपनी पत्नी से बोले की जो देवी मेरे सामने आने से घबरा रही है वह मुझे क्या भगाएगी? देवी माँ ने पंडीजी के घरवालों से कहा कि यह कौन है यह भी पहचानना मुश्किल है। आप लोग इसे लेकर बड़े-बड़े तीर्थ-स्थानों पर जाइए हो सकता है कि यह इस पंडीजी को छोड़ दे।

इसके बाद पंडीजी के घरवाले पंडीजी को लेकर बहुत सारे तीर्थ स्थानों (जैसे मैहर, विंध्याचल, काशी, थावें, कुछ नामी मजार आदि) पर गए पर कुछ भी फायदा नहीं हुआ। यहाँ तक की अब पंडीजी अपने घरवालों के साथ इन तीर्थों पर आसानी से जाते रहे और घूमते रहे। अधिकतर तीर्थ-स्थान घूमाने के बाद भी जब वह प्रेत पंडीजी को नहीं छोड़ा तो पंडीजी के घरवाले घर पर ही प्रतिदिन विधिवत पूजा-पाठ कराने लगे। पंडीजी की पत्नी प्रतिदिन उपवास रखकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने लगीं।

एक दिन पंडीजी अपने घरवालों को अपने पास बुलाए और बोले की आप सभी लोग खेतों में जाकर कम से कम एक-एक पीपल का पेड़ लगा दीजिए। पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी कि अगर आपकी यही इच्छा है तो एक-एक क्या हम लोग ग्यारह-ग्यारह पीपल का पेड़ लगाएँगे। इसके बाद पंडीजी के घरवाले पंडीजी को साथ लेकर उसी दिन खेतों में गए और इधर-उधर से खोजखाज कर एक-एक पीपल का पेड़ लगाए और पंडीजी से बोले कि हमलोग बराबर पीपल का पेड़ लगाते रहेंगे।

इस घटना के बाद पंडीजी थोड़ा शांत रहने लगे थे। अब वे अपने घर का छोटा-मोटा काम भी करने लगे थे। एक दिन पंडीजी के बड़े भाई घर के दरवाजे पर लकड़ी फाड़ रहे थे। पंडीजी वहाँ पहुँचकर टाँगी अपने हाथ में ले लिए और देखते ही देखते लकड़ी की तीन मोटी सिल्लियों को फाड़ दिए। शायद इन तीनों सिल्लियों को फाड़ने में उनके भाई महीनों लगाते।

एक दिन लगभग सुबह के चार बजे होंगे कि पंडीजी ने अपनी पत्नी को जगाया और बोल पड़े, "मैं जा रहा हूँ।" पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी, "अभी तो रात है और इस रात में आप कहाँ जा रहें हैं?" अपनी पत्नी की यह बात सुनकर पंडीजी हँसे और बोले, "मैं जा रहा हूँ और वह भी अकेले। तेरे सुहाग को तेरे पास छोड़कर। अब मैं तेरे पति को और तुम लोगों को कभी तंग नहीं करूँगा। तूँ जल्दी से अपने पूरे घरवालों को जगवाओ ताकि जाने से पहले मैं उन सबसे भी मिल लूँ।" पंडीजी के इतना कहते ही पंडीजी की पत्नी के आँखों से झर-झर-झर आँसू झरने लगे और वे पंडीजी का पैर पकड़कर खूब तेज रोने लगीं। अब तो पंडीजी के पत्नी के रोने की आवाज सुनकर घर के लोग ऐसे ही भयभीत हो गए और दौड़-भागकर पंडीजी के कमरे में पहुँचे। अरे यह क्या पंडीजी के कमरे का माहौल तो एकदम अच्छा था क्योंकि पंडीजी तो मुस्कुराए जा रहे थे। घरवालों ने पंडीजी की पत्नी को चुप कराया और रोने का कारण पूछा। पंडीजी की पत्नी के बोलने से पहले ही पंडीजी स्वयं बोल पड़े की अब मैं सदा सदा के लिए आपके घर के इस सदस्य (पंडीजी) को छोड़कर जा रहा हूँ। अब आपलोगों को कष्ट देने कभी नहीं आऊँगा।

पंडीजी के इतना कहते ही पंडीजी की पत्नी बोल पड़ी, "आप जो भी हों, मेरी गल्तियों को क्षमा करेंगे, क्या मैं जान सकती हूँ की आप कौन हैं और मेरे पति को क्यों पकड़ रखे थे?" इतना सुनते ही पंडीजी बहुत जोर से हँसे और बोले मैं ब्रह्म-प्रेत (बरम-पिचाश) हूँ। मेरा कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता और तेरे पति ने उसी पीपल के पेड़ को कटवा दिया था जिसपर मैं हजारों वर्षों से रहा करता था। इसने मेरा घर ही उजाड़ दिया था इसलिए मैंने भी इसको बर्बाद करने की ठान ली थी पर तुम लोगों की अच्छाई ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया।

इस घटना के बाद से वे ब्रह्म-प्रेत महराजजी उस पंडीजी को छोड़कर सदा-सदा के लिए जा चुके हैं। आज पंडीजी एवं उनका परिवार एकदम खुशहाल और सुख-समृद्ध है। पर ब्रह्म-प्रेत महराज के जाने के बाद भी अगर कुछ बचा है तो उनकी यादें और विशेषकर उन सोखाओं के जेहन में जिनका पाला इस ब्रह्म-प्रेतजी से पड़ा था और जिसके चलते इन सोखाओं ने अपनी सोखागिरा छोड़ दी थी।

एक निवेदन करता हूँ प्रेत बनकर नहीं आदमी बनकर। एक तो पेड़ काटें ही नहीं और अगर मजबूरी में काटना भी पड़ जाए तो एक के बदले दो लगा दीजिए। ताकि मेरा घर बचा रहे और आप लोगों का भी। क्योंकि अगर ऐसे ही पेड़ कटते रहे तो एक दिन प्रकृति असंतुलित हो जाएगी और शायद न आप बचेंगे न आपका घर भी। (एक पेड़ सौ पुत्र समाना, एक तो काटना नहीं और अगर काटना ही हो तो उसके पहले दस-बीस लगाना।)

बोलिए बजरंग बली की जय।================

मरकर बने भूत

भूत! यह शब्द ही बड़ा अजीब और रोंगटे खड़े कर देनेवाला है। पर सभी भूत, भूत (अनिष्ट करनेवाले) नहीं होते; कुछ साधु स्वभाव के भी होते हैं। मतलब अच्छा आदमी अगर मरने के बाद भूत बनता है तो उसके काम अच्छे ही होते हैं पर कभी-कभी भूत का अच्छा या बुरा बनना इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह किन परिस्थितियों में मरा। मतलब अगर बहुत ही अच्छा आदमी है पर किसी शत्रुतावस कोई उसे जानबूझकर मार देता है तो उस व्यक्ति के भूत बनने के बाद आप उससे अच्छाई की उम्मीद नहीं कर सकते पर हो सकता है कि वह अच्छा भी हो।

आज मैं जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ वह एक साधु स्वभाव के भूत की है। आज भी गाँवों में एक प्रकार के भिखमंगा आते हैं जिन्हें जोगी = (योगी) कहा जाता है। ये लोग विशेषकर भगवा वस्त्र धारण करते हैं या लाल। इनके हाथों में सारंगी नामक बाजा रहता है जिसे ये लोग भीख माँगते समय बजाते रहते हैं।

कुछ जोगी गाने में भी बहुत निपुण होते हैं और सारंगी बजाने के साथ ही साथ गाते भी हैं। ये जोगी अपने गीतों में राजा भरथरी से संबंधित गीत गाते हैं। राजा भरथरी के बारे में यह कहा जाता है कि वे एक बहुत ही अच्छे राजा थे और बाद में जोगी हो गए थे। जोगी के रूप में 'अलख निरंजन' का उदघोष करते हुए सर्वप्रथम वे भिक्षाटन के लिए अपने ही घर आए थे और अपनी माँ के हाथ से भिक्षा लिए थे। दरअसल इन जोगियों के बारे में कहा जाता है कि जोगी बनने के बाद इन्हें सर्वप्रथम अपनी माँ या पत्नी हो तो उससे भिक्षा लेनी पड़ती है और भिक्षा लेते समय इनकी पहचान छिपी होनी चाहिए तभी ये सच्चे जोगी साबित होंगे।

इन जोगियों के भिक्षाटन का तरीका भी अलग-अलग होता है। कुछ जोगी सारंगी बजाते हुए गाँव में प्रवेश करते हैं और घर-घर जाकर जो कुछ भी अन्न-पैसा मिलता है ले लेते हैं पर कुछ जोगी एक महीने तक किसी गाँव का फेरी लगाते हैं। इस फेरी के दौरान वह जोगी सारंगी बजाते और गाते हुए पूरे गाँव में दिन में एक बार घूम जाता है। इस फेरी के दौरान वह किसी के घर से कुछ भी नहीं लेता है पर एक महीना फेरी लगाने के बाद वह घर-घर जाकर कपड़े (पुराने भी) या थोड़ा अच्छी मात्रा में अनाज आदि वसूलता है और लोग राजी-खुशी देते भी हैं। इन कपड़ों से यो लोग गुदड़ी बनाते हैं या बेंच देते हैं।

सुनाना था क्या और मैं सुना रहा हूँ क्या??? अरे मुझे तो भूत जोगी की कहानी सुनानी थी और मैं लगा भिक्षुक जोगी की कथा अलापने। आइए, अब बिना लाग-लपेट के भूत जोगी की कहानी शुरु करते हैं :-

ये कहानी आज से 35-40 वर्ष पहले की है। हमारे गाँव के पुरनिया लोग बताते हैं कि आज से बहुत पहले ये जोगी लोग (भिखमंगे जोगी) एक बड़ी संख्या में दल बनाकर आते थे और गाँव के बाहर किसी बगीचे आदि में अपना डेरा डाल देते थे। आपस में क्षेत्र का बँटवाराकर ये लोग भिक्षाटन के लिए अलग-अलग गाँवों में जाते थे।

एकबार की बात है कि ऐसा ही एक जोगियों का दल हमारे गाँव के बाहर एक बगीचे में ठहरा हुआ था। इस बगीचे में उस समय जामुन, आम आदि के पेड़ों की अधिकता थी। (आज भी इस बगीचे में एक-आध जामुन के पेड़ हैं।) ये जोगी कहाँ के रहने वाले थे, इसकी जानकारी हमारे गाँव के किसी को भी नहीं थी और ना ही कोई इन लोगों के बारे में जानना चाहा था।

अभी इन जोगियों का उस बाग में डेरा जमाए दो-चार दिन ही हुए थे की एक अजीब घटना घट गई। एकदिन हमारे गाँव का एक व्यक्ति किसी कारणवस सुबह-सुबह उस बगीचे में गया। वह बगीचे में क्या देखता है कि जोगियों का दल नदारद है और एक जामुन के पेड़ पर से एक जोगी फँसरी लगाए लटक रहा है। जोगी की उस लटकती हुई उस लाश को देखकर वह आदमी चिल्लाते हुए गाँव की ओर भागा। उसकी चिल्लाहट सुनकर गाँव के काफी लोग इकट्ठा हो गए और एक साथ उस बगीचे में जामुन के पेड़ के पास आए। गाँव के पहरेदार ने थाने पर खबर की।

पुलिस आई और उस जोगी की लाश को ले गई। गाँव के कुछ प्रबुद्ध लोगों के अनुसार जोगियों में किसी बात को लेकर बड़ा झगड़ा हो गया था और उन लोगों ने इस जोगी को मारकर यहाँ लटका दिया था और खुद फरार हो गए थे।

खैर ये तो रही उस जोगी के मरने की बात। समय धीरे-धीरे बीतने लगा और अचानक एक-आध महीने के बाद ही वह जोगी उसी जामुन के पेड़ पर बैठकर सारंगी बजाता हुआ कुछ लोगों को अकेले में दिख गया। जोगी के भूत होनेवाली बात पूरे गाँव में तेजी से फैल गई और उसके बाद कोई भी अकेले उस जामुन के पेड़ के पास नहीं गया। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि कभी-कभी वह जोगी भिनसहरे सारंगी बजाते हुए उन्हें गाँव के बाहर एकांत में भी दिखा।

एकबार की बात है कि जामुन खाने के लिए बच्चों का एक दल दोपहर में उस बगीचे में गया। बच्चों ने आव देखा ना ताव और तीन चार बच्चे फटाक-फटाक उस जामुन पर चढ़कर जामुन तोड़ने लगे। कुछ बच्चे नीचे खड़े होकर ही झटहा (लकड़ी का छोटा डंडा) और ढेले (ईंट, मिट्टी का टुकड़े) से मार-मारकर जामुन तोड़ने लगे।

बच्चों का जामुन तोड़ने का यह सिलसिला अभी शुरु ही था कि नीचे खड़े एक बच्चे को जामुन के उस पेड़ की एक ऊपरी डाल पर एक जोगी बैठा हुआ दिखाई दिया। उस जोगी को देखते ही उस बच्चे की चीख निकल गई। अब नीचे खड़े और बच्चे भी उस जोगी को देख लिए थे। पेड़पर चढ़े बच्चों की नजर जब उस जोगी पर पड़ी तो उनको साँप सूँघ गया और वे हड़बड़ाहट में नीचे उतरने लगे। पेड़ पर चढ़ा एक बच्चा अपने आप को सँभाल नहीं पाया और पेड़ पर से ही गिर पड़ा पर एकदम नीचे की एक डाल पर आकर अँटक गया। कुछ बच्चों ने देखा कि उसको उस जोगी ने थाम लिया है। उसके बाद उस जोगी ने उस बच्चे को नीचे उतारकर जमीन पर सुला दिया और खुद गायब हो गया।

ये पूरी घटना मात्र 5-7 मिनट के अंदर ही घटी थी। सभी बच्चों ने अब जोर-जोर से रोना भी शुरुकर दिया था और कुछ गाँव की ओर भी भाग गए थे। अब गाँव के कुछ बड़े लोग भी लाठी-भाला आदि लेकर उस जामुन के पेड़ के पास आ गए थे। उस बच्चे को बेहोशी हालत में उठाकर घर लाया गया। 2-3 घंटे के बाद वह पूरी तरह से ठीक हो गया था। जिन बच्चों ने गिरते हुए बच्चे को जोगी के द्वारा थामकर नीचे उतारकर सुलाते हुए देखा था; उन लोगों ने यह बात जब सभी को बताई तो उस जोगी के प्रति पूरे गाँव में श्रद्धा और आदर का भाव पैदा हो गया था।

इस घटना के बाद वह जोगी कभी फिर से दिखाई नहीं दिया पर उस बगीचे की ओर जानेवाले कुछ लोग बताते हैं कि आज भी कभी-कभी उस बगीचे में सारंगी की मधुर ध्वनि सुनाई देती है। आज भी उस भूत-जोगी के बारे में बात करते हुए लोग थकते नहीं हैं और कहते हैं कि वे दिखाई इसलिए नहीं देते ताकि कोई डरे नहीं।

बोलिए जोगिया बाबा की जय.............

 प्रस्तुतकर्ता :- प्रभाकर पाण्डेय
 ( के सौजन्य से )

नियम के फायदे अनेक

अनियमित जीवनशैली से अनियमित भविष्य निकलता है, जिसमें दु:ख और रोग के सिवाय कुछ भी नहीं होता। नियम के माध्यम से शरीर और मन को सेहतमंद बनाया जा सकता है। आष्टांग योग के दूसरे अंग नियम भी पाँच प्रकार के होते हैं : (1) शौच, (2) संतोष, (3) तप, (4) स्वाध्याय और (5) ईश्वर प्राणिधान।

(1) शौच- शरीर और मन की पवित्रता ही शौच है। शरीर और मन की पवित्रता से रोग और शोक का निदान होता है। शरीर की पवित्रता के लिए मिट्टी, उबटन, त्रिफला, नीम आदि लगाकर निर्मल जल से स्नान कर शुद्ध होते हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को त्यागने से मन की शुद्धि होती है।

(2) संतोष- मेहनत और लगन द्वारा प्राप्त धन-स‍म्पत्ति से अधिक की लालसा न करना, न्यूनाधिक की प्राप्ति पर शोक या हर्ष न करना ही संतोष है। संतोषी सदा सुखी। अत्यधिक असंतोष से मन में बेचैनी और विकार उत्पन्न होता है, जिससे शरीर रोगग्रस्त हो जाता है।

(3) तप- सुख-दुख, भूख-प्यास, मान-अपमान, हानि-लाभ आदि को दृड़ता से सहन करते हुए मन और शरीर को विचलित न होने देना ही तप है। भोग-संभोग की प्रबल इच्छा पर विजय पाना भी तप है। तप है-इंद्रिय संयम। तप से शरीर और मन मजबूत होते हैं।

(4) स्वाध्याय- स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का अध्ययन करते हुए विचार शुद्धि और ज्ञान-प्राप्ति के लिए सामाजिक, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक विषयों का नित्य-नियम से पठन-मनन करना। कहते हैं कि ज्ञान ही दुखों से छुटकारा पाने का रास्ता है।

(5) ईश्वर प्राणिधान- इसे शरणागति योग या भक्तियोग भी कहा जाता है। मन की स्थिरता और शरीर की शांति के लिए केवल एक ईश्वर को ही अपना ईष्ट बनाएँ, जिससे मन भ्रम और भटकाव से छुटकर उर्जा को संवरक्षित करने लगेगा।

मन, वचन और कर्म से ईश्वर की आराधना करना और उनकी प्रशंसा करने से चित्त में एकाग्रता आती है। इस एकाग्रता से ही शक्ति केंद्रित होती है जो दुख और रोग से लड़ने की ताकत देती है। 'ईश्वर पर कायम' रहने से शक्ति का बिखराव बंद होता है।

यौगा पैकेज : प्राणायाम से निगेटिव ऊर्जा का निकास होता है। कपालभाति और भस्त्रिका किसी योग शिक्षक की सलाह अनुसार करें। प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करें। ज्ञान, पृथिवि, वरुण, वायु, शून्य, सूर्य, प्राण, लिंग, अपान और अपान वायु मुद्रा करने से सभी तरह के रोगों में लाभ प्राप्त किया जा सकता है। दस मिनट का ध्यान आपको रिफ्रेश कर देगा।

स्वस्थ रहने के नौ टिप्स

1.  अगर सुख की नींद सोना हो तो सोते समय 'चिंता' न करें, प्रभुनाम का 'चिंतन' करें।

2.  पाचन शक्ति ठीक रखनी हो तो ठीक वक्त पर भोजन करें और प्रत्येक कौर को 32 बार चबाएँ।

3.  यदि यौनशक्ति ठीक रखनी हो तो कामुक चिंतन न किया करें और सप्ताह में एक से अधिक बार सहवास न किया करें।

4.  यह गलतफहमी है कि अण्डा, माँस खाने से बल बढ़ता है और शराब पीने से आनंद आता है। अण्डा, माँस खाने से शरीर मोटा-तगड़ा जरूर हो सकता है पर कुछ बीमारियाँ भी इसी से पैदा होती हैं। शराब पीने से आनंद नहीं आता, बेहोशी आती है और बीमारियाँ होती हैं।

5.  अपनी आर्थिक शक्ति से अधिक धन खर्च करने वाला कर्जदार हो जाता है। अपनी शारीरिक शक्ति से अधिक श्रम करने वाला कमजोर हो जाता है। अपनी क्षमता से अधिक विषय भोग करने वाला जल्दी बूढ़ा और नपुंसक हो जाता है और अपने से अधिक बलवान से शत्रुता करने वाला नष्ट हो जाता है।

6.  भोजन करते समय और सोते समय किसी भी प्रकार की चिंता, क्रोध या शोक नहीं करना चाहिए। भोजन से पहले हाथ और सोने से पहले पैर धोना तथा दोनों वक्त मुँह साफ करना हितकारी होता है।

7.  यदि आप मुफ्त में स्वस्थ और चुस्त बने रहना चाहते हैं तो आपको तीन काम करना चाहिए। पहला तो प्रातः जल्दी उठकर वायु सेवन के लिए लम्बी सैर के लिए जाना और दूसरा ठीक वक्त पर खूब अच्छी तरह चबा-चबाकर खाना तथा तीसरा दोनों वक्त शौच अवश्य जाना।

8.  बीमारी की अवस्था में, बीमारी से मुक्त होने के बाद, भोजन करने के बाद, परिश्रम या यात्रा से थके होने पर प्रातःकाल तथा सूर्यास्त के समय और उपवास करते समय विषय भोग करना बहुत हानिकारक होता है।

9.  यदि आप सुख चाहते हैं तो दुःख देने वाला काम न करें, यदि आप आनंद चाहते हैं तो स्वास्थ्य की रक्षा करें। यदि आप स्वास्थ्य चाहते हैं तो व्यायाम और पथ्य का सेवन करें। संसार के सब सुख स्वस्थ व्यक्ति ही भोग सकता है। कहा भी गया है- पहला सुख निरोगी काया।

क्या एक शरीर को एक से अधिक आत्माएँ भोग सकती हैं...?


* मनुष्य व अन्य सभी जीवों का स्थूल शरीर मात्र पैकिंग हैं और उसमें विद्यमान यानि कि पैक्ड सूक्षम शरीर यानि कि आत्मा उस पैकिंग में वेष्ठित बहुमूल्य निधि।

* किसी भी अति प्रिय मनुष्य, वस्तु, पशु-पक्षी आदि का विछोह अथाह वेदना देता है। और मनुष्य/जीव की सबसे प्रिय निधि तो उसका अपना शरीर ही है।

* तभी तो संसारिक जीव अपनी मृत्यु से अथाह भयभीत होता है।

* शरीर छोड़ते हुए करूण रुदन करता है। मार्मिक दृष्टि से देखता है, कि कोई उसे मृत्यु से बचा ले, किंतु जो स्वयं को ही नहीं बचा पायेगा, उसे कैसे बचा लेगा?

* यदि किसी को पूर्व जन्म याद रह जाए तो प्रारम्भ में कष्ट होता है किंतु बाद में वह शरीर यानि कि पैकिंग के अनुसार ढल जाता है और उसके अनुसार ही जीवन जीने लगता है।
* गमन करते हुए कोई भी जीव या वस्तु साथ नहीं जाती है, मृत्यु से नहीं बचा सकती है, तब संचय में अनीति किस लिये? कुछ पल निकालकर सोचे, ज़रूर सोचे.......?

* अकर्मण्य नहीं बने, नैतिक बने, और पढ़े निम्न घटनाएँ, मनन् करे...?

इंग्लैंड की घटना:
लिवरपूल, इंग्लैंड में एक ऐसा केस सामने आया की एक बच्चा पैदा हुआ और उसके हाथ पर उसके स्वर्गीय पिता का गोदने का निशान था। प्रिसीला और टेडी फ्रेंटम पति और पत्नी थे। टेडी वक्कुम क्लीनर के पार्ट्स बनाने वाली कंपनी में काम करता था। टेडी की उम्र जब 16 साल की थी तब उसने अपने हाथ पर गोदना गुडवाया था। जब टेडी 35 वर्ष का था तब उसकी पत्नी गर्भवती हुई। टेडी अपने बच्चे का मुँह देख पाता कि इससे एक महीने पहिले ही उसकी मृत्यु हो गयी।

डॉक्टर और मनोवैज्ञानिकों दोनों ने टेडी के नवजात बच्चे के हाथ के गोदने का परीक्षण किया। प्रिसीला का मानना था की उसका पति अपने बच्चे के रूप में पुन: आ गया है। यानि कि बच्चे के शरीर में पहिले कोई आत्मा थी और टेडी की मृत्यु के बाद टेडी की आत्मा ने उस अजन्मे बच्चे के शरीर में प्रवेश कर लिया।

भारत की घटना:
कैरल सन 1937 में एक उच्च सैनिक अधिकारी के रूप में ब्रिटन से भारत आए थे। उन्होनें अपनी पुस्तक में ज़िक्र किया है कि लगभग सन 1939 कि बात है वें असम-बर्मा सीमा पर कैंप में थे। उनका कैंप एक नदी के किनारे लगा था। एक दिन मैने टेलिस्कोप से देखा कि एक युवक कि लाश बही जा रही है और एक दुर्बल और बूढ़ा दाढ़ी वाला उस लाश को नदी से बाहर खींचने का प्रयास कर रहा है। मैने इस घटना की ओर और साथी अधिकारीओं का ध्यान भी आकृष्ट किया। हम सबने अपनी-अपनी टेलिस्कोप से देखा कि वह बूढ़ा उस लाश को निकालकर एक पेड़ के पीछे ले गया। हम सब उत्सुकता से यह द्रश्य देख रहे थे। कुछ क्षणों बाद हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब हमने पेड़ के पास जवान आदमी को चलते देखा।
हमने सिपाहियों को बुलाया और उस आदमी को पकड़ कर लाने को कहा। सिपाही उस युवक को पकड़ कर ले आए। मैने उस युवक से कहा, `सच-सच बताओ, तुम कौन हो? मैने अच्छी तरह देखा था कि तुम बहे जा रहे थे और दाढ़ी वाला बूढ़ा तुम्हारी लाश निकालने कि कौशिश कर रहा था। अब तुम जिंदा हो।' इस पर उस युवक ने कहा कि वह वही बूढ़ा व्यक्ति है किंतु शरीर उस मृत्य युवक का है। उसने बताया कि वह योग साधना से शरीर परिवर्तन में निपुण है। जब भी उसका शरीर बूढ़ा हो जाता है तो वह ऐसा कर लेता है। कैरल ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया। तो उसने कैरल से पेड़ के पास पड़े बूढ़े आदमी का शरीर मॅंगाकर देखने के लिए कहा. कैरल के कहने पर सैनिक पेड़ के पास से बूढ़े का मृत्य शरीर उठा लाए, जिसे देखकर सबके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

उस युवक की मृत्यु से पहिले युवक के उस शरीर को कोई दूसरी आत्मा भोग रही थी अब उसे इस बूढ़े की आत्मा इस्तेमाल करेगी।

* 32 वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तक पूर्व जन्म की स्मृति में कैकई नन्दन सहाय की एक दिलचस्प घटना छपी थी और बताया कि उनके चचेरे भाई श्री नंदन सहाय को हैजा हो गया था। उस समय उनकी आयु 19 वर्ष की थी। उनकी मृत्यु हो गयी थी। मृत्यु के समय श्री नन्दन सहाय की पत्नी को दो मास का गर्भ था। पति की मृत्यु के बाद से ही पत्नी को ख़राब-ख़राब सपने आने शुरू हो गये। एक दिन सपने में पत्नी ने अपने मृत्य पति को देखा। वह कह रहे थे, `मैं तुम्हारे पास ही रहूँगा। तुम्हारे पेट से जन्म लूँगा. लेकिन तुम्हारा दूध नहीं पिऊंगा। मेरे लिये दूध का अलग से प्रबंध रखना। मेरी बात की सत्यता यह होगी कि जन्म से ही मेरे सिर पर चोट का निशान होगा।'

समय पर पुत्र ने जन्म लिया। बच्चे के सिर पर चोट का निशान था। बच्चा अपनी माँ का दूध नहीं पीता था। उसके लिये अलग से धाय रखी गई। धाय ही उसे दूध पिलाती थी।

बच्चा किसी और स्त्री का दूध तो पी लेता था किंतु अपनी पूर्व जन्म की पत्नी और इस जन्म की माँ का दूध न पिता था। माँ का दूध निकालकर चम्मच से पिलाने पर बच्चा वह दूध उलट देता था।
यानि कि दो माह तक गर्भस्थ शिशु में कोई अन्य आत्मा रही श्री नंदन सहाय ने अपनी पत्नी के गर्भ से अपने ही बालक के रूप में जन्म लिया।

* वेदांत के महान ज्ञाता अदिगुरु शंकराचार्य से महान मीमांसक मंडन मिश्र की धर्म पत्नी भारती ने शास्त्रार्थ किया और हारने लगी। भारती विदुषी थी। भारती ने सोचा की सन्यासी को कामकला का कुछ भी ज्ञान नहीं होता है। फिर अदिगुरु शंकराचार्य तो बालकपन में ही सन्यासी हो गये थे। अत: अदिगुरु शंकराचार्य को कामकला का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं होना चाहिए। झट से भारती ने कामकला पर शास्त्रार्थ प्रारंभ कर दिया। तब अदिगुरु शंकराचार्य ने इसके लिए समय मांगा। भारती ने समय दे दिया। अदिगुरु शंकराचार्य ने एक मृत्य राजा की देह में प्रवेश करके कामकला का ज्ञान प्राप्त किया था और भारती को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।
यानि की राजा के शरीर का उपभोग पहिले राजा ने किया और उनके मरने के बाद कुछ समय तक अदिगुरु शंकराचार्य ने किया।
सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तों उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि।
मनुष्य की जिस वस्तु, जीव के प्रति आशक्ति होती है, उसके विछोह पर करूण रुदन करता है। सामान्य मनुष्य की सबसे अधिक प्रीति अपने शरीर के प्रति होती है। इसीलिए मृत्यु जैसी वेदना और किसी घटना में नहीं है। किंतु यह भी सत्य है कि स्थूल शरीर पॅकिंग है और उसमें विद्यमान सूक्षम शरीर उस पॅकिंग में वेष्ठित बहुमूल्य निधि।
इन घटनाओं से यह पता चलता है की एक शरीर का उपभोग एक से अधिक आत्माएँ कर सकती हैं। स्थूल शरीर को आत्माएँ किसी वस्त्र बदलने की तरह बदल देती हैं। इस स्थूल शरीर बदलने की क्रिया को ही जन्म-मरण या परकाया में प्रवेश कहा जाता है। संसारिक भाषा में हम आत्मा को सूक्ष्म शरीर कह सकते हैं।

*  लोग समझते हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य ने सम्राट महापद्म यानि कि घनान्द को जीता था। जी नहीं ऐसा नहीं हुआ था। सम्राट घनान्द तो एक नैतिक और बहुत बलशाली सम्राट था। सम्राट घनान्द के भय से तो सिकन्दर सिंधु नदी को पार करने का भी साहस न जुटा सका था और वापिस लौट गया था। महापद्म नन्द की मृत्यु के बाद उस शरीर में दूसरी आत्मा ने प्रवेश कर लिया था। कौन थी वह आत्मा?
सार:
इन घटनाओं से पता चलता है कि स्थूल और सूक्षम शरीर अलग-अलग हैं। स्थूल शरीर की भूमिका पॅकिंग भर की है। और सूक्षम शरीर की भूमिका शक्ति की है। एक स्थूल शरीर को दो भिन्न-भिन्न प्राण या कि आत्मा इस्तेमाल कर सकती हैं। किंतु उसे रहना वहीं होगा जहाँ का पॅकिंग है। जैसे शोभाराम त्यागी की आत्मा और शरीर जसवीर का, तो उसे जसवीर की जिंदगी जीनी पड़ी। अदिगुरु शंकराचार्य ने राजा के शरीर में प्रवेश करके राजा की जिंदगी जी। प्रत्येक घटना में शेष जीवन शरीर के अनुसार ही स्थान पर जीना पड़ा। किंतु यदि कोई आत्मा लावारिस लाश में प्रवेश करती है तो उसे कौनसी जिंदगी ज़िनी होगी यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। तब कैसे जानोगे कि कौन अपना और कौन पराया, आज कौन धर्म के मानने वाले हो कल पता नहीं कौन धर्म मानना पड़ जाए, तब काहे का विरोध, काहे की कटुता.......? नैतिक बनो।

इससे यह सिद्ध होता है कि एक स्थूल शरीर का उपभोग दो प्राण यानि कि आत्माएँ कर सकती हैं। परकाया प्रवेश एक विद्या भी है और सिद्ध योगी अपना शरीर अपनी इच्छा के अनुसार बदल सकते हैं। कई बार परकाया प्रवेश अनायास ही हो जाता है। इसके कौन कारण हैं, यह अभी तक अज्ञात है.......?

हॉलैंड की घटना
एम्सटरडम के एक स्कूल में वहां के प्रिंसिपल की लड़की मितगोल के साथ हाला नम की एक ग्रामीण लड़की की बड़ी मित्रता थी। हाला देखने में बड़ी सुंदर और मितगोल विद्वान् थी। वें प्राय: पिकनिक और पार्टियाँ साथ मनाया करती थी। एक बार दोनों सहेली एक साथ कार से जा रही थी। गंभीर दुर्घटना घाट गयी। उनकी कार एक विशालकाय वृक्ष से जा टकराई। मितगोल को गंभीर चोटें आयी, उसका सम्पूर्ण शरीर क्षत-विक्षत हो गया और उसका प्राणांत हो गया। हाला को बाहर से तो कोई घाव नहीं थे किंतु अन्दर कहीं ऐसी चोट लगी की उसका भी प्राणांत हो गया. दोनों के शव कार से बाहर निकल कर रखे गए।
तभी एकाएक ऐसी घटना हुई कि जिअसे किसी शक्ति ने मितगोल के प्राण हाला के शरीर में प्रविष्ट करा दिए हों। वह एकाएक उठ बैठी और प्रिंसिपल को पिता जी कहकर लिपटकर रोने लगी। सब आश्चर्यचकित थे कि हाला प्रिंसिपल साहब को अपना पिता कैसे कह् रही है? उनकी पुत्री मितगोल का शरीर तो क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा हुआ है।
प्रिंसिपल साहब ने उसे जब हाला कहकर संबोधित किया तो उसने बताया कि पिता जी मैं हाला नहीं आपकी बेटी मितगोल हूँ। मैं अभी तक इस क्षत-विक्षत हो गए शरीर में थी। अभी-अभी किसी अज्ञात शक्ति ने मुझे हाला के शरीर में डाल दिया है।
हर तरह से परीक्षण किए गए और पाया गया कि सच में ही मितगोल के प्राण हाला के शरीर में आ गए हैं। इस प्रकार शरीर परिवर्तन की यह अनोखी घटना घटी।

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