15 सितंबर 2010

गायत्री उपासना हम सभी के लिये अनिवार्य ( Gayatri Worship is greatful for us )

यत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक का समस्त दिवय ज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है । माँ गायत्री का आँचल पकड़ने वाला साधक कभी निराश नहीं हुआ । इस मंत्र के चौबीस अक्षर शक्तियों, सिद्घियों के प्रतीक है । गायत्री उपासना करने वाले साधक की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती है, ऐसा ऋषिगणों का अभिमत है ।

गायत्री वेदमाता है एवं मानव मात्र का पाप का नाश करने की शक्ति उनमें है । इससे अधिक पवित्र करने वाला और कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है । भौतिक लालसाओं से पीड़ित व्यक्ति के लिये भी और आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु के लिये भी एक मात्र आश्रय गायत्री ही है । गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु कीर्ति, धन एवं ब्रहमवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गये है, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते है ।

भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को नित्य नियमित गायत्री उपासना करनी चाहिये । विधिपूर्वक की गई उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विभिन्न विपत्तियों, आसन्न विभीषिकाओं से उसकी रक्षा करती है । प्रस्तुत समय इक्कीसवीं सदी का ब्रहम मुहूर्त है । आगतामी वर्षों में पूरे विश्व में तेजी से परिवर्तन होगा । इस विशिष्ट समय में की गयी गायत्री उपासना के प्रतिफल भी विशिष्ट होंगें । युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री के तत्वदर्शन को जन-जन तक पहुँचाया व उसे जन-सुलभ बनाया । प्रत्यक्ष कामधेनु की तरह इसका हर कोई पय पान कर सकता है । जाति, मत, लिंग भेद से परे गायत्री सार्वजनीन है, सबके लिये उसकी उपासना-साधना करने व लाभ उठाने का मार्ग खुला हुआ है ।

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है । हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकांडों के साथ की गई उपासना अति फलदायी मानी गई है । तीन माला नायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है । शौच-स्नान से निवृत होकर नियत स्थान, नियत समय पर सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहियें ।

उपासना का विधि विधान इस प्रकार है

ब्रह्म संध्या – जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिये की जाती है । इसके अन्तर्गत पाँच कृत्य करने पड़ते है ।

पवित्रीकरण – बाँए हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढक लिया जाए । पवित्रीकरण का मंत्रोच्चारण किया जाए । तदुपरांत उस ज को सिर तथा शरीर पर छिड़क लिया जाये ।

ऊँ अपवित्रः पवित्रोवा, सर्वावस्थां गतोडपि वा ।
यः स्मरेत्पुणडरीकाक्षं, स बाहृाभ्यन्तरः शुचिः ।।
ऊँ पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु पुण्डरीकाक्षः, पुनातु ।

आचमन – वाणी, मन व अन्तःकरण की शुद्घि के लिये चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाये ।

ऊँ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ।। 1 ।।
ऊँ अमृतापिधानमसि स्वाहा ।। 2 ।।
ऊँ सत्यं यशः श्रीर्मयि, श्रीः श्रयतां स्वाहा ।। 3 ।।

शिखा स्पर्श एवं विंदन – शिखा के स्थान को भीगी पाँचों अंगुलियों से स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सदविचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें ।

ऊँ चिदरुपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्घि कुरुष्व मे ।।

प्रणायाम – श्वास को धीमी गति से बाहर से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के कृत्य में आता है । श्वांस खींचने के साथ भावना करें कि प्राणशक्ति की श्रेष्ठता श्वांस के द्घारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वांस के साथ बाहर निकल रहे है । प्राणायाम, मंत्र के उच्चारण के बाद किया जाये ।

ऊँ भूः ऊँ भुवः ऊँ स्वः ऊँ महः ऊँ जनः ऊँ तपः ऊँ सत्यम् । ऊँ भूर्भवः स्वः त्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ऊँ आपोज्योतीरसोडमृतं, ब्रहम भूर्भऊवः स्वः ऊँ ।

न्यास – इसका प्रयोजन है – शरीर के सभी महत्तवपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देवपूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाँयें हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों को उसमें भिगोकर बताए गये स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।

ऊँ वाड.मे आस्येडस्तु (मुख को)
ऊँ नसोर्मेप्राणोडस्तु (नासिका के दोनो छिद्रों को)
ऊँ अक्ष्णोर्मेचक्षुरस्तु (दोनों नेत्रों को)
ऊँ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ऊँ बाहृोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ऊँ ऊर्वोर्मे ओजोडस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ऊँ अरिष्टानि मेड़्रानि, तनूस्तन्वा में सह सन्तु (समस्त शरीर को)

आत्मशोधन की ब्रहम संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्घि होतथा मलिनाता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र प्रखर व्यक्ति ही भगतवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते है ।

देवपूजन – गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतंभरा गायत्री है । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की भावना के अनुरुप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापिर हो रही है ।

ऊँ आयातु वरदे देवि । त्र्यक्षरे ब्रहमवादिनि ।
गायत्रिच्छन्दसां मातः, ब्रहृयोने नमोडस्तु ते ।। 3 ।।
श्री गायत्र्यै नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।
ततो नमस्कारं करोमि ।

गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सदगुरु के रुप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिनन्दन करते हुए उपासना की सफलता हेतु प्रार्थना के साथ गुरु आवाहन् निम्न मंत्रोच्चर के साथ करें ।

ऊँ गुरुब्रर्हमा गुरुविष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः ।
गुरुरेव परब्रहृ, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। 1 ।।
अखन्डमणडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। 2 ।।
मातृवत् लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका ।
नमोडस्तु गुरु सत्तायै, श्रद्घा-प्रज्ञायुता च या ।। 3 ।।
ऊँ श्री गुपवे नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, धयायामि ।

माँ गायत्री व गुरुसत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापना हेतु पंचोपचार पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेघ प्रतीक के रुप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते है । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पांचों को समर्पित करते चलें । जल का अर्थ है – नम्रता, सहृदयता । अंक्षत का अर्थ है – समयदान, अंशदान । पुष्प का अर्थ है – प्रसन्नता, आंतरिक उल्लास । धूप-दीप का अर्थ है – सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य परमार्थ तथा नैवेघ का अर्थ है – स्वभाव व व्यवहार में मधुरता, शालीनता का समावेश ।

ये पांचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिये किये जाते है । कर्मकांड के पीछे भावना महत्वपूर्ण है ।

3. जप – गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पन्द्रह मिनट नियमित रुप से किया जाये, अधिक बन पड़े तो अधिक उत्तम । होंठ हिलते रहे, किंतु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । जप प्रकि्या कषाय-कल्मषों-कसंस्कारों को धोने के लिये की जाती है ।
ऊँ भूर्भवः स्वः त्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए भावना की जाए कि हम निरंतर पवित्र हो रहे है । दुर्वुद्घि की जगह सदबुद्घि की स्थापना हो रही है

4. ध्यान - जप तो अंग अवयव करते है, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में गायत्री माता के आँचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रुप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों के शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्घा-प्रज्ञा निष्ठा रुपी अनुदान उतरने की मान्यता परपक्व की जाती है । जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस कृत्य का महत्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है ।

5. सूर्याध्र्यदान – जप समाप्ति कके पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्घ्य रुप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है ।

ऊँ सूर्यदेव । सहस्त्रांशो, तेजोराशे जगत्पते ।
अनुकम्पय मां भक्तया, गृहाणार्घ्य दिवाकर ।।
ऊँ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः ।।

भावना यह करें कि जल आत्मसत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट ब्रहृ का तथा हमारी सत्ता-संपदा समष्टि के लिये समर्पित विर्सजित हो रही है ।

नमस्कार एवं विसर्जन – इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर विदाई के लिये करबद्घ नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख लिया जाये । जप के लिये माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिये । सूर्योदय के दो घंटे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है । मौन मानसिक जप चौबीस घंटे कभी किया जा सकता है । माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें ।

ऊँ घौः शान्तिरन्तरिक्ष ऊँ शान्तिः, पृथिवि शान्तिरापः, शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्र्वेदेवाः, शान्तिब्रर्हशान्तिः, सर्व ऊँ शान्तिः, शान्तिरेवः, सा मा शान्तिरेधि ।। ऊँ शान्तिः, शान्तिः, शान्ति । सर्वारिष्ट-सुशान्तिभर्वतु ।।

प्रेम और भक्ति में हिसाब! ( According to the love and devotion! )

क पहुंचे हुए सन्यासी का एक शिष्य था, जब भी किसी मंत्र का जाप करने बैठता तो संख्या को खडिया से दीवार पर लिखता जाता। किसी दिन वह लाख तक की संख्या छू लेता किसी दिन हजारों में सीमित हो जाता। उसके गुरु उसका यह कर्म नित्य देखते और मुस्कुरा देते।

एक दिन वे उसे पास के शहर में भिक्षा मांगने ले गये। जब वे थक गये तो लौटते में एक बरगद की छांह बैठे, उसके सामने एक युवा दूधवाली दूध बेच रही थी, जो आता उसे बर्तन में नाप कर देती और गिनकर पैसे रखवाती। वे दोनों ध्यान से उसे देख रहे थे। तभी एक आकर्षक युवक आया और दूधवाली के सामने अपना बर्तन फैला दिया, दूधवाली मुस्कुराई और बिना मापे बहुत सारा दूध उस युवक के बर्तन में डाल दिया, पैसे भी नहीं लिये। गुरु मुस्कुरा दिये, शिष्य हतप्रभ!

उन दोनों के जाने के बाद, वे दोनों भी उठे और अपनी राह चल पडे। चलते चलते शिष्य ने दूधवाली के व्यवहार पर अपनी जिज्ञासा प्रकट की तो गुरु ने उत्तर दिया,

'' प्रेम वत्स, प्रेम! यह प्रेम है, और प्रेम में हिसाब कैसा? उसी प्रकार भक्ति भी प्रेम है, जिससे आप अनन्य प्रेम करते हो, उसके स्मरण में या उसकी पूजा में हिसाब किताब कैसा?'' और गुरु वैसे ही मुस्कुराये व्यंग्य से।

'' समझ गया गुरुवर। मैं समझ गया प्रेम और भक्ति के इस दर्शन को।

न्यायपूर्वक अर्जित धन का दान ही सुखदायी है ( Justly earned the money donated is comfortable )

तनाव को दूर भगाने के लिए सबसे बढिया तरीका है दान देना

 यायपूर्वक अर्जित धन का दान करना सुखदायी होता है। सबसे पहले मनुष्य को न्यायपूर्वक धन की प्राप्ति का उपाय जानना ही सूक्ष्म विषय है। उस धन को सत्पात्र की सेवा में अर्पण करना उससे भी श्रेष्ठ है। साधारण समय में दान देने की अपेक्षा उत्तम समय पर दान देना और भी अच्छा है, किंतु श्रद्धा का महत्व काल से भी ब़ढ़कर है।

आप भी सोचेंगे यह क्या बेहूदी बात हुई। दान देने से तनाव का क्या लेना देना? लेकिन लेना-देना है और बहुत गहरा लेना देना है। जिनके पास कुछ नहीं है क्या आपने कभी उतना तनावग्रस्त देखा है जितना उन्हें जिनके पास बहुत कुछ है। आप अध्ययन कर लीजिए जिसकी पाने की मानसिकता होती है वह हमेशा तनाव में रहता है। लेकिन जो कुछ पाना ही नहीं चाहता उसे कभी तनाव नहीं होता। कबीरदास कहते हैं-

चाह गयी चिंता मिटी मनुवा बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिए, सोई शंहशाह

बात बहुत साधारण है। पाने की मानसिकता हमारे दुख का कारण है। जो जितना पाना चाहता है वह उतना ही दुखी रहता है। फिर आप सोचेंगे कि पाना न हुआ तो जीवन कैसे चले? फिर हमारे होने का मतलब क्या है? यह बात सही है इच्छा का विस्तार होता है तो संसार बनता है। और जब संसार बनता है तो दुख औऱ तनाव तो आयेंगे ही।

फिर इससे बचने का रास्ता क्या है? तनाव से बचने का एक ही रास्ता है आप चुपचाप दान करना शुरू कर दें। जिंदगी पाने और देने के समन्वय से चलती है। केवल पाते गये तो बहुत संकट हो जाएगा। भरते भरते आदमी खुद एक भार हो जाता है। इसलिए भरने के साथ साथ खाली होने की प्रकृया भी चलनी चाहिए। जितना मिल रहा है उसका एक निश्चित हिस्सा हमारे हाथ से लोगों तक पहुंचना भी चाहिए। आज हो यह रहा है कि हमारी पाने की प्रवृत्ति तो बनी हुई है लेकिन देने की मंशा खत्म हो गयी है।
आप एक प्रयोग करिए। रोज कुछ दान करना शुरू करिए। अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा। बस देना शुरू करिए। ज्यादा तर्क-वितर्क मत करिए। कुछ दिनों का प्रयोग मानकर इसे शुरू कर दीजिए। मान लीजिए कि यह आपकी साधना है। यही आपकी आराधना है। यही रामजी की पूजा है। एक सप्ताह ऐसा करके देखिए। आपको अपने व्यक्तित्व में क्रांतिकारी परिवर्तन नजर आयेगा। आप देखेंगे कि आपके दुख अपने आप कम होने लगे। आपको अब उतना तनाव भी नहीं रहता। अब आप अपनी समस्याओं को लेकर इतने परेशान भी नहीं रहते। मन में अंदर से एक आनंद प्रस्फुटित होना शुरू हो जाएगा।

ऐसा हो तो एक सप्ताह के प्रयोग के बाद इसे अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना लीजिए। यह मत सोचिए कि आप कितना कमाते हैं। 100 रूपया रोज कमानेवाला भी महादानी हो सकता है और 100 हजार रूपये रोज कमानेवाला भी महा कंजूस। सवाल पैसे का नहीं है। सवाल है आपकी मानसिकता का। आपको अपनी मानसिकता का इलाज करना है। बुद्धि को वह अभ्यास करवाना है जिसे वह भूल चुका है। और इसी कारण उस बुद्धि ने आपके लिए तनाव के हजार रास्ते बना रखे हैं। इसलिए आप कितना पैसा दान करते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। आप दान करते हैं यह महत्वपूर्ण है और आपके अपने लिए जरूरी भी।

वैसे तो नियम है कि आप अपनी कमाई का 10 प्रतिशत दान दें लेकिन आपकी अपनी जरूरते शायद ज्यादा होंगी। इसलिए अपनी कमाई का एक प्रतिशत दान करना शुरू करिए। ध्यान रखिए यह नित्यप्रति होना चाहिए क्योंकि आप नित्यप्रति के हिसाब से ही कमाते हैं। अपनी कमाई का एक प्रतिशत समाज के कमजोर और निसहाय लोगों की मदद में खर्च करना शुरू करिए। कोई हल्ला नहीं। कोई प्रचार नहीं। क्योंकि यह काम आप अपने इलाज के लिए कर रहे हैं। क्या आप अपने इलाज का प्रोपोगंडा करते हैं क्या? आप खुद अनुभव करेंगे कि आप अंदर से कितने बड़े हो गये हैं। तनाव तो खोजे नहीं मिलेगा।

कहते हैं राजा रन्तिदेव के पास जब कुछ नहीं रह गया था तो उन्होंने शुद्ध हृदय से केवल जल का दान किया था। अन्यायपूर्वक प्राप्त हुए द्रव्य के द्वारा महान फल देने वाले ब़ड़े-ब़ड़े दान करने से धर्म को प्रसन्नता नहीं होती। धर्म देवता तो न्यायोपार्जित थो़ड़े से अन्न का श्रद्धापूर्वक दान करने से ही संतुष्ट होते हैं। राजा नृग ने विद्वानों (ब्राह्मणों) को हजारों गाएँ दान की थीं, किंतु एक ही गौ उन्होंने दूसरे को दान कर दी जिसे अन्यायतः प्राप्त द्रव्य दान करने के कारण उन्हें नरक में जाना प़ड़ा।

उशीनगर के राजा शिबि ने श्रद्धापूर्वक अपने शरीर का मांस देकर पुण्यात्माओं की गति प्राप्त की। न्यायपूर्वक एकत्रित किए हुए धन का दान करने से जो लाभ होता है वह बहुत-सी दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ का अनुष्ठान करने से भी नहीं होता। यही कारण है कि संसार में अनेक लोग न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई वस्तु प्राप्त होने के बाद भी प्रसन्नता से दान कर अमर हो गए हैं।

हर सच्चा कर्म पूजा है ( Every true act is prayer )

म अपने पूजाघर में बैठकर भगवान का भजन करते हैं और सोचते हैं कि हम भक्त हैं। हम मंदिर में बैठकर भजन-कीर्तन करते हैं और हमें लगता है कि हम भक्त हैं। लोगों के साथ मिलकर हम धार्मिक आयोजन करते हैं और हम समझते हैं कि हम भक्त हैं।

ये सब धारणाएँ सही हैं, पर भक्ति की एक और भी अवस्था है, जिसे सही मायने में सच्ची भक्ति कहा जा सकता है। और वह है-ईश्वर को पूजाघर, मंदिर और धार्मिक आयोजनों के बाहर भी देखना। यदि यह सही है कि यह जगत ईश्वर से ही निकला है और उसी में स्थित है, तब इस संसार में ऐसा कुछ नहीं है,जो ईश्वर से रहित हो।

संसार में सर्वत्र वही रमा है और उसकी भक्ति जैसे पूजाघर, मंदिर और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से की जा सकती है, वैसे ही अपने हर कर्म के माध्यम से भी की जा सकती है। इस प्रकार सच्ची भक्ति की अवस्था वह है, जहाँ हमारा प्रत्येक कार्य भगवान की पूजा बन जाता है।

और जब व्यक्ति का हर कर्म पूजा बन जाता है तब उसके लिए मंदिर और प्रयोगशाला में भेद नहीं रह जाता। भगिनी निवेदिता 'विवेकानंद साहित्य' की भूमिका में लिखती हैं- 'यदि एक और अनेक सचमुच एक ही सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं, तो केवल उपासना के ही विविध प्रकार नहीं वरन सामान्य रूप से कर्म के भी सभी प्रकार, संघर्ष के भी सभी प्रकार, सृजन के भी सभी प्रकार, सत्य साक्षात्कार के मार्ग हैं।

अतः लौकिक और धार्मिक में आगे कोई भेद नहीं रह जाता। कर्म करना ही उपासना है। विजय प्राप्त करना ही त्याग है। स्वयं जीवन ही धर्म है। विदेशों की यात्रा से लौटने के बाद रामेश्वरम्‌ के मंदिर में भाषण देते हुए स्वामी विवेकानंद ने भक्ति की व्याख्या करते हुए कहा था -'वह मनुष्य जो शिव को निर्धन, दुर्बल तथा रुग्ण व्यक्ति में देखता है, वही सचमुच शिव की उपासना करता है, परंतु यदि वह उन्हें केवल मूर्ति में देखता है, तो कहा जा सकता है कि उसकी उपासना अभी नितांत प्रारंभिक ही है।

यदि किसी मनुष्य ने किसी एक निर्धन मनुष्य की सेवा-सुश्रूषा बिना जाति-पाँति अथवा ऊँच-नीच के भेदभाव के, यह विचार कर की है कि उसमें साक्षात्‌ शिव विराजमान हैं तो शिव उस मनुष्य से दूसरे एक मनुष्य की अपेक्षा, जो कि उन्हें केवल मंदिर में देखता है, अधिक प्रसन्ना होंगे।'

आगे उन्होंने कहा था- 'जो व्यक्ति अपने पिता की सेवा करना चाहता है, उसे अपने भाइयों की सेवा सबसे पहले करनी चाहिए। इसी प्रकार जो शिव की सेवा करना चाहता है, उसे उसकी संतान की, विश्व के प्राणीमात्र की पहले सेवा करनी चाहिए। शास्त्रों में भी कहा गया है किजो भगवान के दासों की सेवा करता है, वही भगवान का सर्वश्रेष्ठ दास है।' यही सच्ची भक्ति का स्वरूप है।

धर्मों में ॐ उच्चारण का महत्व

हिंदू या सनातन धर्म की धार्मिक विधियों के प्रारंभ में 'ॐ' शब्द का उच्चारण होता है, जिसकी ध्वनि गहन होती है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। प्राचीन भारतीय धर्म विश्वास के अनुसार ब्रह्मांड के सृजन के पहले प्रणव मंत्र का उच्चारण हुआ था। ॐ का हिंदू धर्म के अलावा अन्य धर्मों में भी महत्व है।

योगियों में यह विश्वास है कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति है। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता है। ॐ से शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और वह स्वस्थ हो जाता है। ॐ के उच्चारण से फेफड़ों में, हृदय में स्वस्थता आती है। शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ और तनावरहित हो जाता है। ॐ के उच्चारण से वातावरण शुद्ध हो जाता है।

ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है। जिनका उच्चारण एक के बाद एक होता है। ओ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है, जिसके अनुसार साधक या योगी इसका उच्चारण ध्यान करने के पहले व बाद में करता है। ॐ 'ओ' से प्रारंभ होता है जो चेतना के पहलेस्तर को दिखाता है। चेतना के इस स्तर में इंद्रियाँ बहिर्मुख होती हैं। इससे ध्यान बाहरी विश्व की ओर जाता है। चेतना के इस अभ्यास व सही उच्चारण से मनुष्य को शारीरिक व मानसिक लाभ मिलता है।

आगे 'उ' की ध्वनि आती है, जहाँ पर साधक चेतना के दूसरे स्तर में जाता है। इसे तेजस भी कहते हैं। इस स्तर में साधक अंतर्मुखी हो जाता है और वह पूर्व कर्मों व वर्तमान आशा के बारे में सोचता है। इस स्तर पर अभ्यास करने पर जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं व उसे आत्मज्ञान होने लगता है। वह जीवन को माया से अलग समझने लगता है। हृदय, मन, मस्तिष्क शांत हो जाता है।

'म' ध्वनि के उच्चार से चेतना के तृतीय स्तर का ज्ञान होता है, जिसे 'प्रज्ञा' भी कहते हैं। इस स्तर में साधक सपनों से आगे निकल जाता है व चेतना शक्ति को देखता है। साधक स्वयं को संसार का एक भाग समझता है और इस अनंत शक्ति स्रोत से शक्ति लेता है। इसके द्वारा साक्षात्कार के मार्ग में भी जा सकते हैं। इससे साधक के शरीर, मन, मस्तिष्क के अंदर आश्चर्यजनक परिवर्तन आता है। शरीर, मन, मस्तिष्क, शांत होकर तनावरहित हो जाता है।

ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। साधक बैठने में असमर्थ हो तो लेटकर भी इसका उच्चारण कर सकता है। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।

नियम वो जिससे भगवान प्रसन्न हों

बात उन दिनों की है जब महाराज युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ पर राज्य करते थे। राजा होने के नाते वे काफी दान आदि भी करते थे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दानवीर के रूप में फैलने लगी और पांडवों को इसका अभिमान होने लगा।

कहते हैं कि भगवान दर्पहारी हैं। अपने भक्तों का अभिमान तो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। एक बार कृष्ण इंद्रप्रस्थ पहुंचे। भीम व अर्जुन ने युधिष्ठिर की प्रशंसा शुरू की कि वे कितने बड़े दानी हैं। तब कृष्ण ने उन्हें बीच में ही टोक दिया और कहा, लेकिन हमने कर्ण जैसा दानवीर और नहीं सुना। पांडवों को यह बात पसंद नहीं आई। भीम ने पूछ ही लिया, कैसे? कृष्ण ने कहा कि समय आने पर बतलाऊंगा।

बात आई गई हो गई। कुछ ही दिनों में सावन प्रारंभ हो गया व वर्षा की झड़ी लग गई। उस समय एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए कुछ भी नहीं खाता-पीता। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा।

युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया। संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ।

ब्राह्मण की आखों में चमक आ गई। भगवान ने अर्जुन व भीम को भी इशारा किया, वेष बदलकर वे भी ब्राह्मण के संग हो लिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी वही उत्तर प्राप्त हुआ।

ब्राह्मण निराश हो गया। अर्जुन-भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान को ताकने लगे। लेकिन वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए बैठे रहे। तभी कर्ण ने कहा, हे देवता! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास। उसने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी, फिर ब्राह्मण से कहा, आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी पहुंचाने के लिए ब्राह्मण के साथ अपना सेवक भी भेज दिया।

ब्राह्मण लकड़ी लेकर कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। पांडव व श्रीकृष्ण भी लौट आए। वापस आकर भगवान ने कहा, साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। अन्यथा चंदन की लकड़ी के खिड़की-द्वार तो आपके महल में भी थे।

इस कहानी का तात्पर्य यह है कि हमें ऐसे कार्य करने चाहिए कि हम उस स्थिति तक पहुंच जाएं जहां पर स्वाभाविक रूप से जीव भगवान की सेवा करता है। हमें भगवान को देखने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने को ऐसे कार्यों में संलग्न करना चाहिए कि भगवान स्वयं हमें देखें। केवल एक गुण या एक कार्य में अगर हम पूरी निष्ठा से अपने को लगा दें, तो कोई कारण नहीं कि भगवान हम पर प्रसन्न न हों। कर्ण ने कोई विशेष कार्य नहीं किया, किंतु उसने अपना यह नियम भंग नहीं होने दिया कि उसके द्वार से कोई निराश नहीं लौटेगा।

श्रीकृष्ण का कर्म संदेश

भादों की अष्टमी थी। मूसलाधार पानी बरस रहा था। यमुना में बाढ़ आ गई थी, पूरे उफान पर थी यमुना। ऐसी भयंकर बारिश में कौन कहाँ जाएगा? इसीलिए सो गए थे सभी पहरेदार और जेल में जन्म दिया था, देवकी ने अपनी आठवीं संतान पुत्र को।

विलक्षण बात तो यह थी कि पुत्र के जन्म लेते ही खुल गए थे सभी बंधन माँ-बाप के। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब आँधी, तूफान ने जेल के बंद किवाड़ों को भी खोल दिया था। वासुदेव की आँखें चमक उठी थीं।

आनन-फानन वासुदेव ने अपने लाडले को कपड़े में लिपटाया और छिपा दिया था टोकरी में। टोकरी को वासुदेव ने धरा सिर पर और ले चले गोकुल-यमुना पार। पर यमुना तो विकराल बनी थी, पूरे उफान पर थी। वासुदेन न डरे और न रुके, चल पड़े यमुना में।

पहले उनके घुटनों तक पानी आया, फिर कमर तक, फिर छाती तक और फिर सिर तक आ गया। पर वासुदेव के पैर नहीं थमे, बढ़ते गए मंजिल की ओर। तभी एक चमत्कार हुआ। जैसे ही जल ने नन्हे के पाँव को छुआ, यमुना-मैया उतरने लगी।

वासुदेव की आँखें अपलक निहार रही थीं अपने दुलारे को। आँसू रुक नहीं रहे थे, भिगो रहे थे दोनों के तन-मन को। मन में भय था वासुदेव के, न जाने कब देख पाएँगे अपने दुलारे को। देख भी पाएँगे कभी या नहीं। पर मन में कहीं अटूट भरोसा था अपने सखा नंद पर, इसीलिए अपने पुत्र रत्न को जल्दी से यशोदा की गोद में डाल वे उल्टे पाँव ही लौट आए थे जेल में।

यशोदा की गोद भर गई थी। ढोलक की थाप और सोहर के गीतों से गूँज उठा था घर-द्वार और ग्वालिनों के लिए राग-रंग उत्सव, उल्लास का दिन था वह। भूल गई थीं वे दूध बिलौना और छछिया बेचना। सभी के कदम बढ़ गए थे यशोदा के द्वार पर, जहाँ कान्हा, झूल रहे थे।

ग्वालिनों में यशोदा निहाल हो गई थी पुत्र पाकर। वह आज गर्वीली सी थी। होती भी क्यों नहीं? घर आँगन भर गया था उसका, मनचाही खुशियों से। बाबा नन्द की खुशियों का पारावार ही न था वे तो मात्र हँस-हँस कर सबसे मिल रहे थे। उनकी वीणा तो मानो मूक हो गई थी।

इसी कान्हा ने दूध पीते-पीते पूतना के प्राण पी लिए थे। माखन चुराते-चुराते अपने सखाओं का मन जीत लिया था। डरा दिया था इसने यशोदा मैया को अपने मुख में ब्रह्मांड दिखाकर। पेड़ों पर उछल-कूद मचाते, कर दिया था इसने कालीनाग का मर्दन और उसके फन पर नृत्य करते मुस्कुराते हुए, यमुना नदी से बाहर आ गए थे विजयी मुद्रा में।

इसकी बंसी की धुन सुनकर गौएँ और गोपियाँ अपनी सुध-बुध भूल जाती थीं। हो जाती थीं गोपियाँ इसके महारास के रस में सराबोर। ऐसा था यशोदा मैया का छोरा कन्हैया। यही नटखट, माखनचोर, बंसी बजैया, कान्हा मथुरा में आकर बन गया कृष्ण।

महाभारत युद्ध में यही कृष्ण बना धनुर्धर अर्जुन का सारथी। कुरुक्षेत्र में युद्ध का शंखनाद हो चुका था। रणभेरी गूँज उठी थी, परंतु यह क्या? महारथी अर्जुन के हाथ-पाँव शिथिल होने लगे। मुँह सूखने लगा। शरीर में कँपकपी होने लगी। आँखें आँसुओं से भर आईं, मन विषाद से। हाथ से गांडीव सरककर जमीन पर गिर पड़ा, क्योंकि पृथा-पुत्र के मस्तिष्क पर छा गया था मोह।

देखा था परंतप अर्जुन ने विपक्ष में खड़े अपने दादा, परदादा, आचार्यों, मामाओं, पुत्र-पौत्रों, मित्रों, स्वजनों, परिजनों और बंधुजनों को। सोचने लगे कि जिनके हाथों ने मुझे झुलाया, जिनकी गोद में खेलकर मैं बड़ा हुआ, जिनके आश्रम में रहकर मैंने विद्या पाई, जिन्होंने मुझे धनुष-बाण चलाना सिखाया क्या उन्हीं से युद्ध करूँ?

इन्हें मारने से तो बेहतर होगा कि मैं भीख माँगकर खाऊँ। इन सभी के खून से लथपथ, सना हुआ राज्य लेकर मैं क्या करूँगा। चले गए थे विषादग्रस्त पार्थ, कृष्ण की शरण में शिष्य भाव से। ऐसे में श्रीकृष्ण ने समझाया था यूँ उस किंकर्तव्यविमूढ़ पार्थ को।

हे पार्थ! जो जन्मता है वह मरता है। जो मरता है वह जन्मता है। यह है प्रकृति का अटूट नियम। मनुष्य जैसे पुराने वस्त्रों को छोड़कर कर लेता है नए वस्त्र धारण वैसे ही देही पुराने शरीर को छोड़कर धारण कर लेता है नए शरीर को। न तो यह आत्मा जन्म लेती है और न मरती है।

आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गिरा सकता है, न वायु सुखा सकती है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य शाश्वत और सनातन है। जो आत्मा को मरने वाला समझता है, जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते कि न तो आत्मा मरती है और न ही मारी जाती है, इसीलिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को एक मानकर तुम युद्ध करो।

हे धनंजय! कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, उसके फलों में नहीं। तुम कर्मफल का कारण भी मत बनो। कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। तुम योगस्थ होकर कर्म करो, क्योंकि सिद्धि-असिद्धि, हर्ष-विषाद में समभाव से रहना ही योग है। 'समत्वं योग उच्यते।' कर्मों की कुशलता ही योग है। 'योगः कर्मसु कौशलम्‌।'

इन्द्रियों को अंतर्मुखी कर, मन को संयमित और नियंत्रित कर, बुद्धि को स्थिर कर तुम 'स्थितप्रज्ञ' बनो। कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। तुम कर्मफल में आसक्त हुए बिना ही कर्म करो। कर्मों की गति गहन है।

कर्म संन्यास और कर्मयोग दोनों ही मुक्ति देने वाले हैं, परंतु कर्म संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है। कर्मफल में आसक्ति को त्यागकर कर्मों को ब्रह्म में समर्पित करके कार्य करना श्रेयस्कर है, कर्म करते हुए कर्मफलों को त्यागने से ही मनुष्य त्यागी बनता है।

हे नरश्रेष्ठ अर्जुन! प्रत्येक वर्ण के अपने-अपने कर्म हैं। पराक्रम, तेज, धर्म, चतुराई, युद्ध से मुँह न मोड़ना, दान और ईश्वरभाव ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यदि अहंकार का आश्रय लेकर तुम यह समझते हो कि युद्ध नहीं करोगे तो तुम्हारा निश्चय व्यर्थ है, क्योंकि तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव तुम्हें युद्ध में प्रवृत्त करके ही रहेगा।

हे कौन्तेय! तुम मोह के कारण युद्ध नहीं करना चाहते, परंतु तुम अपने स्वभावज कर्म के कारण युद्ध करोगे। यूँ भी स्वधर्म में मरना श्रेयस्कर है। 'स्वधर्में निधनं श्रेयः' इसलिए सब धर्मों को त्यागकर तुम केवल मेरी शरण में आ जाओ। 'मामेकं शरणं व्रज।'

हे धनुर्धर अर्जुन! जो शोक करने के योग्य नहीं है उन बान्धवों के लिए तुम शोक कर रहे हो। मोह से उत्पन्न हुए शोक को तुम त्याग दो। तुम युद्ध करो। 'ततस्पाद् युध्यस्व भारत।' कर्म के इस संदेश को पार्थ ने सुना था।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुखारविन्द और वे प्रवृत्त हो गए थे अपने धर्म, अपने कर्म-युद्ध में। श्रीकृष्ण का यह कर्म संदेश सदियों से मानव पथ को आलोकित करता रहा है और इस नव सहस्राब्दी में भी करता रहेगा।

शकटासुर का वध

सूतजी बोले, हे मुनिवरों अब मैं आपको कृष्ण की बाल लीलाएं बतलाता हूँ । वृष्णि वंश में जन्म लेकर भगवान विष्णु ने बाल रुप कृष्ण बनकर क्या किया, वह सब आप सुनें । सूतजी के इस कथन पर सम्पूर्ण उपस्थित मुनिगण प्रसन्न हो गये । अत्यन्त उत्सुक्तापूर्वक वह सूतजी का कथन श्रवण करने लगे ।

सूतजी आगे बोले, एक दिन कृष्ण को निंद्रामग्न देखकर माता यशोदा उनको एक छकड़े के नी लिटा गयीं ताकि बाहर आंगन मेंहवा लगती रहे और छकड़े की छाया के कारण बालक का धूप से बचाव भी होता रहे । वह यमुना स्नान के लिये चली गयी । वहां उनका मन न लगा । वह तत्काल स्नान करके वापस आ गयी । जैसे ही वह वापिस आयी, देखा कि छकड़ा उलटा पड़ा हुआ है । उसका प्रत्येक भाग टूटा पड़ा है । पहिया अलग, जुआ अलग.............. वह घबराकर दौड़ी । हाय मेरा लाल । उनको भय लगा । शायद किसी कारणवश छकड़ा उलट गया है उनका लाल उसमें दब गया होगा । मुनिवरों माता यसोदा के प्राण कंठ मं आ गये । दौड़कर भंग हो गये छकड़े के पास आयी । हठात् अपने लाल को उसी प्रकार निंद्रामग्न देखकर लपककर उठा लिया और छाती से लगा लिया । उनकी आंखों से प्रसन्नता के कारण अश्रुधार फूट पड़े । वह अपना भागय सराहने लगी । अगर बालक को कुछ हो जाता, तो उनको गोपराज नंद का कोपभाजन बनना पड़ता । लापरवाही का फल भोगना पड़ता । वह बालक को इस प्रकार छकड़े के नीचे अकेला सुलाकर यमुना स्नान के लिये क्यों गयी । वह पश्चाताप करने लगी । कितनी बड़ी भूल कर दी है, उन्होंने ऐसा उनको न करना था । बालक को कुछ हो गया होता तो.......... अभी वह अपने को संभाल भी नहीं पायी थी कि काषाय वस्त्रधारी नेंद आ गये । छकड़े की दशा देखकर चौंक गये । पूछा अरे छकड़ा इस प्रकार टुकड़े-टुकडे होकर कैसे पडा है ।
यशोदा के पास इस जिज्ञासा का कोई उत्तर न था । गोपराज नंद यशोदा की गोद में बालक को स्तनपान करते देखकर आश्वस्त हो गये कि बालक सुरक्षित है । नंद ने अपना प्रश्न फिर दोहरा दिया तब यशोदा ने सच सच उनको सब बतला दिया । मैं लौटकर आयी तो छकड़ा इसी प्रकार पड़ा था । बालक मैंने उठा लिया । मैं नहीं जानती, कैसे टूटा ।

यह वार्तालाप हो ही रहा था कि कुछ गोप बालक खेलते हुए वहां आ गये । दोनों का वार्तालाप सुनकर वह बोले, अरे इसने खुद लात मारी थी छकड़े में । हम सब तो देख रहे थे । छकडड़ा हवा में उड़ गया । नीचे गिरा तो चूर-चूर हो गया । इसी ने किया है । वह सब बालक को ही दोषी ठहराने लगे । गोप बालकों की बात सुनकर नंद और यशोदा चकित रह गये । उनको गोप बालकों की बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था । अंततः गोपराज नंद ने वह छकड़ा ठीक ठीक करके रख दिया ।

मुनिवरो गोपराज नंद और माता यशोदा ने गोप बालकों की बात का विश्वास न किया । भला विश्वास भी कैसे हो सकता था । एक नन्हा-सा शिशु भला विशालकाय छकड़ा लात मारकर कैसे उलट सकता है । अतएव दोनों भगवान की लीला को न जान सके वास्तव में उनका वध करने के लिये कंस द्घारा भेजा गया असुर शकटासुर आया था । वह सदा छकड़ों में प्रवेशकर अपने शत्रु की हत्या करने में निपुण था । निद्रामग्न कृष्ण को एकदम उपयुक्त स्थान पर पाकर उसने अपने कौशल का प्रदर्शन किया । वह तत्काल छकड़े में प्रवेश कर गया । वह टूटकर कृष्ण के ऊपर गिरकर उसके प्राण हरण करने वाला था कि कृष्ण ने अपना पैर मारकर उसको उछाल दिया । जब वह धरती पर गिरा तो चूर-चूर हो गया । शकटासुर की हड़डी-पसली बराबर हो गयी । हे मुनिवरों । भगवान कृष्ण के हाथों उसके जीवन का अंत होने के कारण यमराज ससम्मान उसको स्वर्ग ले गया । उसे मोक्ष पद प्राप्त हो गया । भगवान पापियों का नाश करते है, पर मुनिवरों, भगवान के हाथों मारे जाने पर तमाम पापी स्वर्ग को प्राप्त होते है । हे मुनिवरों भगवान की यह कैसी कृपा है । सूजी से इस प्रकार का विवरण सुनकर सभी मुनिगण भगवान की इस लीला पर गदगद हो उठे नमिषारण्य एकबारगी भगवान के जय-जयकार से गूंज उठा ।

भगवान कृष्ण जन्म

सूतजी बोले, मुनिवरों । जैसा मैंने बताया, वही सब आगे चलकर घटित हुआ । जैसे-जैसे देवकी गर्भ धारण करती जाती थी, जैसे- जैसे शिशु पैदा होते थे, वैसे-वैसे ही कंस उनको एक शिला पर पटककर उनका वध कर देता था । इस प्रकार देवकी के छह गर्भ नष्ट हो गए । कालनेमि के छहों पुत्र हिरण्यकशिपु का शाप पूर कर मुति प्राप्त कर गये । जब देवकी का सातवां गर्भ आया, तो योगमाया ने देवकी के गर्भ को रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया फिर अर्धरात्रि में ही रजस्वला देवकी का गर्भपात हो गया । वह मूर्छित हो गयी । उसको योगमाया के इस कार्य का कुछ पता न चला । उसी रात रोहिणी ने पुत्र को जन्मा । रोहिणी पुत्र पाकर हर्षित हो गयी । रोहिणी वासुदेव की दूसरी पत्नी थी । उसकी संतानों से कंस को किसी प्रकार का भय न था ।

कंस ने सप्तम गर्भ की खोज की, पर कुछ पता न चला । इसी बीच देवकी आठवीं बा र गर्भवती हो गयी । आठवां गर्भ होने के कारण कंस द्घारा अत्यन्त सावधानी के साथ देवकी की देखभाल हो रही थी । कंस ने सारी सुरक्षा कर ली थी । देवकी के आठवें गर्भ में स्वयं भगवान विष्णु आ गये । दूसरी ओर भगवान विष्णु के आदेशानुसार निद्रा ने यशोदा के गर्भ मे प्रवेश किया । इस प्रकार हे मुनिवरों । आठवें माह में यहां देवकी ने और वहां यशोदा ने क्रमशः एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया । भगवान का जन्म होते ही समस्त भूमंडल प्रसन्न हो गया । देवी देवता उनकी आरती उतारने लगे । तब वासुदेव ने भयभीत होकर कहा, हे प्रभो आपने अलौकिक रुप में मेरे यहां जन्म लिया है, पर यह सब कै संभाले । कंस मेरी सब संतानें नष्ट कर चुका है । आप अपने रुप को संवरित करे । इस पर भगवान विष्णु ने अपनो को संवरित कर लिया । वसुदेव से वह बोले, हे पिताजी आप कृपा कर मुझे यहां से गोपराज नंद के यहां ले चलिये । भगवान की इस आज्ञा को पाकर वसुदेव रात में ही यशोदा के घर गये । उन पर किसी प्रकार की रोक-टोक न हुई । सर्वत्र निद्रा का गहरा राज व्याप्त था । यशोदा के निवास पर भी यह दशा थी । वह एक बालिका को जन्म देकर सो रही थी । सब सो रहे थे ।

मुनिवरों यह सब भगवान विष्णु की माया थी । योगमाया का मायाजाल फैला था । इस कारण वसुदेव अपना पुत्र यशोदा के पास रखकर उसकी पुत्री उठाकर सकुशल वापस आ गये ।

किसी को कानों कान पता न चला । यहां तक कि देवकी भी बेखबर रह गयी । यह रहस्य केवल वसुदेव तक ही रह गया । वापस आते ही सब की निंद्रा टूट गयी । देवकी का शिशु रुदन करने लगा । आठवीं संतान का जन्म देखते ही तत्काल कंस को सूचना दी गई । कंस तुरन्त दौड़कर आ गया । उसने देवकी की गोद से जन्मी उस कन्या को छीन लिया । देवकी रोने लगी, बोली, हे भाई, तुमने मेरे छह पुत्रों का वध कर डाला । अब यह एक कन्या उत्पन्न हुई है । इस पर दया करो । वैसे ही यह परी सी लगती है । मुनिवरों । इस पर कंस हंसकर बोला, हां सचमुच परी लगती है । और उसने कन्या को शिला पर दे मारा । जैसे ही कन्या शिला से टकरायी, वह अपना कलेवर दल आकाश में उड़ गयी । कंस अवाक चकित रह गया । निगाहें उठाकर उसने आकाश की ओर देखा । आकाश में उसके केश फैले थे । उसकी देह दिव्य चंदन सी सुशोभित थी । उसने नील-पीत वर्ण के परिधान धारण कर रखे थे । हाथी के मस्तक के समान उठे, उभरे उसके स्तन थे । उसका मुख चन्द्रमा के समान रुपवान था । वह मदिरा पान करती आश में उन्मुक्त विचरण कर रही थी । उसने भयानक अट्टाहास के साथ क्रोधित होकर कहा, रे कंस तूने अकारण ही मुझे पृथ्वी पर पटका । पर तेरा काल तो आयेगा और तेरे शत्रु तेरा नाश कर डालेंगे, उस समय तेरी छाती चीरकर मैं तेरा रुधिरपान करुंगी । और इस प्रकार कह कर वह आकाश में विलीन हो गयी ।
कंस भौचक्का रह गया, पर वह अट्टाहास करते हुए बोला, मेरा नाश करने वाला उत्पन्न ही नहीं हुआ है । इस प्रकार कहकर कंस वापस अपने भवन में आ गया । नारद की बात पर उसे आश्र्चर्य हुआ देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा । आठवीं संतान तो कन्या हुई । नारद का कथन सच नहीं निकला । वह असमंजस में पड़ गया । क्या उसका वध अन्य व्यक्ति के द्घारा होगा । वह मन ही मन भयभीत हो गया ।

फिर वह देवकी के पास गया । देवकी के पास जाकर पश्चाताप करने लगा, बोला, मैं बड़ा निष्ठुर हूँ मैंने अपने प्रियजनों का ही दमन किया है । फिर भी विधाता ने जो भाग्य में लिख दिय है वह होकर रहेगा । हे बहन उसमें मैं किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकता । हे सती तुमको दुख त्याग देना चाहिए और मेरे प्रति भी कटुता नहीं रखनी चाहिए क्योंकि जो कुछ भी मैं कर रहा हूँ, वह विधाता के हाथों का खिलौना बनकर कर रहा हूँ । जो होना होता है, वह अवश्य होता है लेकिन दुखद दशा तो यह है कि देव के विधान का मनुष्य स्वयं कर्ता बन जाता है । समय ही मनुष्या का सबसे बड़ा दुश्मन है । वही उसका विनाशक भी है इस कारण तुमो मुझ पर क्रोध नहीं करना चाहिये । हे बहन मैं पुत्रवत् होकर तुम्हारे चरणों में प्रणाम करता हूँ । मैंने तुम्हार बड़ा अपकार किया है । इस प्रकार कहकर कंस देवकी के चरणें में लोट गया । हे मुनिवरों । कंस को इस प्रकार पने चरणें में लोटता देखककर देवकी की आँखों में आंसू उमड़ आये । वह अपने पति को विलोक कर एक मां के द्रवित हृदय से बोली, मं तुम पर नाराज नहीं हूँ । यह सब काल की माया है । मैं तुमको क्षमा करती हूँ । इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है । देवकी से इस प्रकार का संतोष पा कंस अन्तःपुर में चला गया । देवकी से क्षमा-याचना करने के उपरान्त भी वह चिंतित उद्घिग्न था ।

मुनिवरो वसुदेव ने भगवान विष्णु का कृष्ण रुप में जन्म होने से पहले ही अपनी पत्नी रोहिणी को गोपराज नंद के यहां भेज दिया था । बाद में उनको पता चला कि रोहिणी ने एक बालक को जन्म दिया है । वह अत्यन्त प्रसन्न हुए और जब गोपराज नन्द अपना वार्षिक कर देने मथुरा आये तो वसुदेव ने उनसे भेंट की । उनसे निवेदन किया कि रोहिणी पुत्र को वह अपना पुत्रवत् माने और उसका नामसकरण संस्कार अपने पुत्र (जो वास्तव में वसुदेव का था) के साथ सम्पन्न करा दे । कंस के कारण वह रोहिणी से उत्पन्न पुत्र का मुख नहीं देख पा रहे है । इस प्रकार वसुदेव का दुख देखकर गोपराज नन्द ने उनको धैर्य बंधाया और सब प्रकार से आश्वासन देकर संतुष्ट कर दिया । नंदराज का आश्वासन पाकर वसुदेव को बड़ा संतोष मिला ।

वह तब जलमार्ग से मथुरा जाते हुए गौ-ब्रज नामक स्थान पर रुक गये । ब्रज बड़ी सुन्दर और मनोरम भूमि थी । वहां के गोप-गोपियों की शोभा देखते ही बनती थी । अतएव गोपराज नेंद का मन रम गया । इसके साथ-साथ वहां के तमाम गोप-गोपियों ने उनसे रुकने का भी निवेदन किया था । उत्तम स्थान देखककर गोपराज नंद वहीं वास करने लगे । यहीं पर दोनों पुत्रों का नामकरण-संस्कार भी किया गया । बड़े पुत्र का नाम संकर्षण और छोटे का नाम कृष्ण रखा गया । इस प्रकार नंद सुखपूर्वक वहां पर वास करने लगे ।

नारद कंस मिलन

सूतजी आगे बोले, मुनिवरों । जब सम्पूर्ण देवगण और भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतरित हो गये, तो नारद पृथ्वी पर आये । वह कंस से मिले । देवलोक से चलकर नारद मथुरा के एक उपवन में आये । वहाँ से उन्होंने अपना एक दूत उग्रसेन के पुत्र राजा कंस के पास भेजा । उसने कंस को नारद के आगमन की सूचना दी । समाचार पाकर कंस तुरन्त चल पड़ा । निद्रिष्ट स्थान पर उसने अत्यन्त तेजधारी और दिव्य नारद जी को देखा । उनको नमस्कार कर उनकी अभ्यर्थना की । तत्पश्चात कंस के दिए अग्नि सदृश रक्त वर्ण आसन पर नारद जी बैठ गये ।

नारद जी बोले, मैं स्वर्ग से प्रस्थान कर समेरु पर्वत पर गया था । वहां सम्पूर्ण देवलोक उपस्थित था । वहां पर कुछ निर्णय किया जा रहा था । बातचीत से मुझको पता चला कि तुम्हारे अनुयायियों सहित तुम्हारे वध की योजना बनाई गयी है । तुम्हारी बहन देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवी संतान तुम्हारा काल बनेगी । वह वास्तव में विष्णु का अवतार होगा । वह पूर्व जनमों में भी तुम्हारे विनाश का कारण बन चुके है यही बात मैं तुमसे कहने आया हूं । तुम सावधान हो जाओ और देवकी के समस्त गर्भ नष्ट करने का प्रयत्न करो । मेरा तुम पर विशेष स्नेह है । इस कारण यह गोपनीय रहस्य मैंने तुमको बतला दिया है । अब मैं वापस जाता हूँ तुम्हारा कल्याण हो ।

इतना कहकर देवर्षि नारद चले गये । उनके जाने के बाद कंस अट्टहास करने लगा । अपने साथ आये सेवकों से बोला, नारद मुझको डराने आया था । अभी उसको मेरी शक्ति का ज्ञान नहीं है । मुझे को ई भी परास्त नहीं कर सकता । इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी शक्तिशाली नहीं है । जो मेरा मुकाबला कर सके । मैं सम्पूर्ण भूलोक, देवलोक, यमलोक अपने बाहुबल पर नष्ट कर सकता हूँ । फिर भी हयग्रीव, केशी, प्रलम्ब, धेनुक, अरिष्ट, वृषयऋ पूतना, कालिया नाग को खबर दे दो कि वह स्वेच्छापूर्वक परिवर्तन कर भूमंजल में विचरण करें । जहां भी मेरा विपक्षी दिखलाई पड़े, उसका वध कर डालें । हयग्रीव और केशी गर्भस्थ बालकों पर निगरानी रखेंगे । नारद की यह बात सुनकर हमको भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है । नारद का तो काम ही है, इधर की उधर लगाना । भय उत्पन्न कर मन-मुटाव पैदा करना, अतएव सब निर्भय होकर रहे ।

इसप्रकार कंस हंसता हुआ अपने राजभवन की ओर चल पड़ा, पर उसका मन शंकाओं से भर गया था ।
उसने राजभवन आकर मंत्रीगणों को आदेश दिया कि वह सावधान रहे । तत्परतापूर्वक प्रारम्भ से ही देवकी के गर्भ नष्ट करते रहे । देवकी और वासुदेव की विशेष रुप से सावधानीपूर्वक देखभाल करें । देवकी के गर्भ की सावधानीपूर्वक गणना करें । उसके सभी गर्भ सावधानीपूर्वक नष्ट कर दिये जाएं । मुनिवरों कंस ने इस प्रकारी की व्यवस्था तो कर दी, पर मन ही मन नारद की बातों के कारण भयभीत हो गया था । उसने देवकी के सभी गर्भ नष्ट करने की उचित व्यव्स्था कर दी ।

यह बात योगबल से भगवान विष्णु को भी ज्ञात हो गयी उनको यह सोचना पड़ा कि कंस द्घारा सात गर्भ नष्ट करने पर आठवें गर्भ में वह किस प्रकार अवतार (जन्म) लेंगे । तभी भगवान विष्णु को कालनेमि के छह पुत्रों का ध्यान आ गया । हिरण्यकशिपु ने उनको शाप दिया था कि तुम सब देवकी के गर्भ में जाओगे और जन्म से ही पूर्व गर्भ के समय ही तुम सबकी मृत्यु होगी । हिरण्यकशिपु ने उनको यह शाप इसलिये दिया था कि उन्होंने बिना अनुमति के ब्रहृ की तपस्या कर वरदान पा लिया था । अतएव इस शाप को पूरा करना आवश्यक था । अतएव भगवान विष्णु तुरन्त भूतल लोक को गये । वहां पर छहों कालनेमिके पुत्र जल-शय्या पर निद्रामग्न थे । विष्णु भगवान अपनी योगमाया के बल पर उनके शरीर में प्रवेश कर गये और उनके प्राण हरण कर निद्रा को दे दिए । उसे आदेश दिया की वह एक-एक प्राण देवकी के गर्भ में स्थापित करे । सातवें गर्भ के समय गर्भ परिवर्तन कर दे । देवकी के गर्भ को रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दे । इस प्रकार के संकर्षण से उत्पन्न बालक मेरा बड़ा भाई होगा । आठवें गर्भ के समय मैं जन्म लूंगा और तब तुम भी जन्म लोगी । मैं यशोद के पास पहुंच जाऊंगा । तुम देवकी के पास रहोगी । इस प्रकार तुमको देवकी की आठवीं संतान मानकर कंस तुम्हारा वध करेगा, पर तुम त्यन्त दिव्यरुप में आकाश में तिरोहित हो जाना । इन्द्र तुम्हारा अभिषेक करेगा । वह तुमको अपनी बहन मानेगा । बाद में तुम देवी के रुप में पूजति होंगी । शुंभ-निशुंभ नामक दो दैत्यों का वध कर तुम मेरे अंश से उत्पन्न देवी के रुप में पूजी जाओगी । तुम्हारा जप करने वाला धन-सम्पत्ति, पुत्रादि का सुख पायेगा । उनके संकट तुम सदा दूर करने में समर्र्थ रहोगी ।

इस प्रकार भगवान विष्णु ने निद्रा को अपने कार्य में भागी बना लिया । वह वापस आ गये । सारी योजना बन गयी ।

पृथ्वी का दुख वर्णन

सूत जी बोले, द्घापर युग के अन्त समय में पृथ्वी का भार बहुत बढ़ा गया । नाना प्रकार के अत्याचारोसे पीड़ित पृथ्वी तब दुखी होकर ब्रहृ की शरण में गयी । ब्रहृ से उसने अपने सम्पूर्ण दुखो का रो-रोकर निवेदन किया । तब ब्रहृजी उसे अपने साथ लेकर भगवान विष्णु शयन- काल में थे । उनको शयन करते हुए सतयुग और त्रेतायुग बीत गये थे । भगवान विष्णु के पास जाते समय ब्रह के पास देवादि एवं समस्त मुनिगण भी संग हो गये । सबने वहां जाकर सामूहिक प्रार्थना की । भगवान विष्णु की निंद्रा टूटी । उन्होंने सबके आने का कारण पूछा । तब ब्रहृ ने उनको पृथ्वी का सारा दुख बतलाया । इस पर विष्णु भगवान सबके साथ सुमेरु प्रवत पर आये । तब वहाँ पर दिव्य-सभा हुई । इस सभा में पृत्वी ने अपने सारे दुखों का वर्णन किया ।

परमपिता ब्रहृ ने तब भगान विष्णु से पृथ्वी के दुख हरण करने की प्रार्थना की । उनसे निवेदन किया कि पृथ्वी पर आकर अवतार ग्रहण करें ।

ब्रहृ की इस प्रार्थना पर विष्णु बोले, आज से काफी समय पहले मैंने पृथ्वी को भयमुक्त करने का निश्चय कर लिया है । मैंने समुद्र को राजा शान्तनु के रुप में पृथ्वी पर भेज दिया है । मैं पहले ही जानता था कि पृथ्वी का भार बढ़ेगा । इस कारण पूर्व में ही मैंने शान्तुन के वंश की उत्पत्ति कर दी है । गंगा के पुत्र भीष्म भी वसु ही है । वह मेरी आज्ञा से ही गये है । महाराज शान्तुन की द्घितीय पत्नी से विचित्रवीर्य नामक पुत्र उत्पन्न हुआ है । इस समय उनके दोनो पुत्र धृतराष्टर् और पांडु भूमि पर है । पांडु की दो पत्नियां है । कुन्ती और माद्री । धृतराष्ट्र की पत्नी है गांधारी । एतएव देवतागण शान्तुवंश में जन्म लें । तत्पश्चात् मैं भी जन्म लूंगा । भगवान विष्णु के इस कथन पर समस्त देवतागणों, वसुगणों, आदित्यों, अश्विनीकुमारों ने पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किये । सबने भरतवंश में जन्म लिया । सूतजी बोवे, मुनिवरों । इस प्रकार धर्म ने युधिष्ठिर, इन्द्र ने अर्जुन, वायु ने भीम, दोनों अश्विनी कुमारों ने नकुल, सहदेव, सूर्य ने कर्ण, वृहस्पति ने द्रोणाचार्य, वसुओं ने भीष्म, यमराज ने विदुर, कलि ने दुर्योधन, चन्द्रमा ने अभिमन्यु, भूरिश्रवा ने शुक्राचार्य, वरुण ने श्रृतायुध, शंकर ने अश्वत्थामा, कणिक ने मित्र, कुबेर ने धृतराष्ट्र और यक्षों ने गंधर्वों, सर्पों ने देवक, अश्वसेन, दुःशासन आदि के रुप में पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किये । इस प्रकार समस्त देवगण अवतार लेकर पृथ्वी पर आ गये । नारद जी को जब यह पता चला तो वह विष्णु जी के पास आये और कुपति होकर बोले, जब तक नर-नारायण जन्म न लेंगे, तब तक पृत्वी का भार कैसे हल्का होगा । नर तो अवतार लेकर पृथ्वी पर चले गये । नारायण रुपी भगवान विष्णु आप यहीं विराजमान है । आखिर आप क्या कर रहे है ।

नारद की इस बात पर भगवान विष्णु बोले, हे नारद, इस समय में मैं विचार कर रहा हूँ कि कहां और किस वंश में जन्म लूँ । अभी तक मैं इसका निर्णय नहीं कर सका हूँ । मुनिवरों । भगवान विष्णु के इस कथन पर नारदजी ने उनको कश्यप का वर्णन करते हुए कहा कि वह महात्मा वरुम से गायें मांगकर ले गये, बाद में वापस नहीं की । इस पर वरुण मेरे पास आया । तब मैनें कश्यप को ग्वाला हो जाने का शाप दे दिया । इस समय कश्यप वासुदेव के रुप मे मेराश्राप भोग रहे है । उनकी दोनों पत्नियां देवकी और रोहिणी के रुप में उनके साथ है । वह पापी कंस के अधीन रह कर बड़ा दुख पा रहे है । वरुण के साथ विश्वासघात करने और मेरे श्राप का फल पा रहे है । मेरा तो यह सुझाव है कि आप उनके यहां ही अवतार लें । नारद का यह प्रस्ताव भगवान विष्णु ने स्वीकार कर लिया । व श्रीर सागर में स्थित उत्तर दिशा में अपने निवास में चले गए । फिर मेरु पर्वत की पार्वती गुफा में प्रवेश कर अपनी दिव्य देह त्यागकर वासुदेव के यहां जन्म ग्रहण करने के लिये चले गये ।

नैमिषारण्य का सत्संग ( Naimisharanya's Satsang )

र्म भूमि नैमिषारण्य में सभी संतों का समागम हुआ । आर्यावत के मुनि, विद्वान, शास्त्रों के ज्ञाता उपस्थित थे । महामुनि और सभी शास्त्रों में पारंगत शौनक जी ने वहां उपस्थित सूतजी से कहा, हे सूतजी, आपने हमें अत्यन्त श्रेष्ठ तथा आख्यान सुनाये है । हम आपके आभारी है, कि आपके द्वारा हमें अनेक भरतवंशी राजाओं, देवताओं, दानवों, गंधर्वों, सर्पों, राक्षसों, दैत्यों, सिद्वों, यक्षों के अदभुत कर्मों तथा धर्म का पालन करने वाले अत्यन्त श्रेष्ठ जीवन और चरित्रों का वर्णन प्राप्त हुआ । आपकी मधुर वाणी से हमने अनेक पुराण भी सुनें । आपकी सुधामय वाणी बड़ा सुख देने वाली है । शौनक जी की इस बात का समर्थन वहां उपस्थित सभी लोगों ने हर्ष ध्वनि के साथ किया । शौनक जी बोले, हे मुनिवर आपने कुरुवंशियों की सारी कथा कही, पर वृष्णि और अंधक वंशों के बारे में कुछ नहीं बतलाया । आप कृपापूर्वक इन सबका विवरण सुनायें ।

इस पर सूतजी अत्यन्त प्रसन्नता के साथ बोले, मुनिवरो, व्यास जी के शिष्य धर्मात्मा जनमेजय ने जो प्रश्न वृष्णि वंश के बारे में किये थे, उन्हीं के अनुसार वृष्णि वंश की कथा मैं आप सबको सुनाता हूँ । अत्यन्त मेधावी तेजस्वी भरतंवशी राजा जनमेजय ने भरतवंश के इतिहास को पूर्णरुप से श्रवण कर वैशम्पायन से ज्ञान प्राप्त किया था, वही वृतान्त आप लोगों को सुनाता हूँ ।

पुराणों को श्रवण करने से प्रतीत होता है, पांडव और वृष्णि वंशियों का कुल एक ही था । वंशावलि वर्णन में निपुण तथा प्रत्यक्षदर्शी वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को बतलाया, जो अव्यक्त कारण, नित्य सदस दामक एवं प्रधान पुरुष है, उसी से इस ईश्वरमय जगत की उत्पत्ति हुई है । उसी अव्यक्त पुरुष को अभि्न तेज सम्पन्न, सब जीवों का सृष्टा और नारायण-परायण समझो । उसी महान ब्रहृ से अहंकार उत्पन्न हुआ । सूक्ष्म जीवों से पंचतत्व और जरायुज आदि चार प्रकार के जीवों की उत्पत्ति हुई । इसी को सनातन सृष्टि कहते है ।

भगवान ने सूक्ष्म भूतों को प्रकट कर अनेक प्रकार की भौतिक प्रजा उत्पन्न करने के विचार से, सबसे पहले जल का निर्माण किया । फिर उसमें अपना वीर्य डाला । जल को नीर कहा गया है, यह जल नीर की उत्पत्ति का कारण है, इसी कारण नर के जनक भगवान को नारायण कहा गया है । भगवान द्वारा जल में डाला गया वीर्य हिरण्य वर्ण का अंड हो गया । इस अंड से स्वंयभू ब्रह- की उत्पत्ति हुई । अण्ड में एक वर्ष रहकर ब्रहृ ने उसके दो खंड कर दिये । एक खंड पृख्वी और दूसरा खंड देवलोक ।

दोनों खंड़ो के अंतराल में आकाश की रचना कर पृथ्वी को जल पर स्थापित किया । तब सूर्य और दस दिशाएं बनायी गयी । उसी अंड से उन्होंने काल, मन, वचन, काम, क्रोध एवं अनुराग की सृष्टि की । सप्तऋषियों को प्रकट किया । परम क्रोधी रुद्र को उत्पन्न कर मारीचि आदि के पूर्वज सनत कुमार को जन्म दिया । विघुत, वज्रमेघ रोहित, इन्द्रधनुष तथा गगनचर खगों का निर्माण किया । वेदों की रचना की ।

अन्यान्य अंगों से अनेक प्रकार के प्राणी उत्पन्न किए । वशिष्ठ नामक प्रजापति भी बनाया, पर यह सब मन से उत्पन्न होने के कारण उनकी प्रजा में वृद्वि नहीं हो रही थी । अतएव तब ब्रहृ ने अपनी देव के दो भाग किए । एक को पुरुष बनाया, दूसरे को स्त्री । इस प्रकार भगवान ने विराट रचना की । विराट ने पुरुष को रचा । यह पुरुष मनु था । मनु ने मनवंतर का क्रम चलाया । योनिज सृष्टि में स्त्री संज्ञक द्वारा दूसरा अंतर उपस्थित हो गया । इसी कारण मनवंतर शब्द चल पड़ा । इस प्रकार योनिज अनोयिज दोनों प्रकार की सृष्टि हुई । शतरुपा अयोनिजा कन्या विराट की पत्नी बनी । शतरुपा ने विराट पुरुष के द्वारा वीर नामक पुत्र उत्पन्न किया ।

उससे विप्रवत् और उत्तानपाद नामक दो पुत्र, काम्या नामक एक पुत्री उत्पन्न हुई । काम्या के चार पुत्र सम्राट, रुक्षि, विराट और प्रभु हुए । उत्तानपाद ने चार पुत्र उत्पपन्न किए । ध्रुव, कीर्तिमान, शिव और अस्वपति । ध्रुव ने घोर तपस्या की । ब्रहृ ने उन्हें उच्च लोक प्रदान किया । धुव्र के तीन पुत्र हुए । कालान्तर में इसी वंश में वेन हुआ । वह देवताओं का द्रोही निकला । तब मुनियों ने उसकी दक्षिण भुजा कर मंथन का पृथृ नामक पुत्र को जन्म दिया । पृथू राजसूय यज्ञ का अनुष्टान करने वाला पहला राजा हुआ । पृथू राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला पहला राजा हुआ । पृथू ने प्राणियों को, जीवन दान देने के उद्देश्य से देवता, दानव, गंंधर्व, अप्सरा, सर्प, यज्ञ, लता, पर्वतादि से मिलकर सबको बछड़ा बनाकर पृथ्वी का दोहन किया । तब पृथ्वी ने अन्नादि दुग्ध प्रदान किया, तो सबकी जीविका का साधन बनी । आगे चलकर इसी पृथू वंश के प्रचेता की उदासीनता के कारण पृथ्वी वृक्ष-विहीन हो गई । तब वृक्षों के अधिपति सोम ने प्रजापति का सहारा लिया । तब चन्द्रमा के अंश से दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए । दक्ष प्रजापति ने चन्द्रवंश का विस्तार किया ।

मुनिवरों दक्ष प्रजापति के समय से मैथुनी सृष्टि प्रारम्भ हो गयी । इसमें नारद ने बाधा डाली । दक्ष प्रजापति ने उनको शाप देकर भस्म कर दिया । तब देवताओं के अनुरोध पर ब्रहृ ने दक्ष प्रजापति से एक कन्या लेकर नारद को पुनर्जन्म दिया । दक्ष प्रजापति का वंश बढ़ता गया । बहुत काल बाद दिति के गर्भ से कश्यप ने अत्यन्त बलवान पुत्र उत्पन्न किए । उनके नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष थे । प्रहलाद हिरण्यकशिपु का ही पुत्र था ।

सूतजी बोले, आगे चलकर ब्रहृ ने चन्द्रमा को ब्राहणो, नक्षत्रो, ग्रहो, यज्ञों और तपस्याओं का अधिपति बनाया । वरुण को जल का, कुबेर को धन का, वृहस्पति को सम्पूर्ण विश्वका अधिपति नियुक्त किया । भृगुवंशियों के अधिपति शुक्राचार्य बने । आदित्यों के विष्णु, वसुओं के अधिपति अग्नि बनाये गये । प्रजापतियों के दक्ष, दैत्यों के प्रहलाद, मरुतों के इन्द्र, पितरों के सूर्यपुत्र यम, रुद्रों के भगवान शिव और षोडष मात्रिकाओं, व्रती, मंत्री, गौत्रों, यक्षो, राक्षसों, राजाओ, साध्यों के अधिपति भगवान विष्णु बनाये गये ।

मुनिवरों, इसी प3कार विप्रचित दानवों के, शिव भूत-प्रेत, पिशाचों के, हिमवान पर्वतों के, समुद्र नदियों के, अशरीरी प्राणियों के और शब्दों के वायु, गंधर्वों के चित्ररथ, नागों के वासुकि, सर्पों के तक्षक, हाथियों के ऐरावत, घोड़ों के उच्चैक्षवा, पक्षियों के गरुड़, मृगों के सिंह, गौवों के वृषभ, वृत्रों के पीपल, गंधर्वों, अप्सराओं के कामदेव और ऋतु, मास, पक्ष, दिन, रात, मुहूर्त, कला, काष्ण, ऋतु, अयन, योग, गणित का अधिपति संवत्सर को बनाया । इस प्रकार का कार्य विभाजन कर तब ब्रहजी ने दिगपालों की नियुक्ति की । सूतजी बोले, मुनिवरों तब ब्रहृ ने सुधन्वा को पूर्व का, शंखपदम् को दक्षिण का, अच्युत केतुमान को पश्चिम का, हिरण्यरोमा को उत्तर का दिग्पाल बनाकर सबको पृथु के अधीन कर दिया । तब शौनक जी बोले, सूतजी, वेन तो महादुरात्मा था, तब उसका पुत्र पृथृ क्योंकर इतना प्रतापी हुआ ।
शौनक जी की इस जिज्ञासा पर सूतजी बोले, हां मुनिवरों । मृत्यु सुता सुनीता के गर्भ से उत्पन्न वेन दुराचारी था । उसने यज्ञ-हवन बन्द कराकर देवताओं के सारे कार्य रोक दिये । उसने अपने को ही एकमात्र देवता बतलाया । उसे मरीचि आदि मुनियों ने भी समझाया । वेन न माना, वह अपनी जिद पर था । तब मुनियों ने उसे पकड़कर उसकी जांघ का मंथन किया । वेन बहुत छटपटाया । उसकी जांघ से एक बौना और काले रंग का पुरुष उत्पन्न हुआ । वह खड़ा ही रहा । तब मुनि ने उसे निषीद कहा (बैठ जाओ) इसी निषीद शब्द के कारण यह निषादवंश का आदिपुरुष बना । तब मुनियों ने वेन की दक्षिण भुजा को मथा । उससे पृथृ का जन्म हुआ । तब वेन नरक में चला गया । पृथू अत्यन्त धर्मात्मा और प्रतापी राजा बना । उसके यज्ञ कुंड से सूत, मागध उत्पन्न हुए । तब पृथू ने सूत को अनूप प्रदेश और मागधा को मगध प्रदेश का शासक बनाया । इतना सब करने के उपरान्त पृथु ने पृथ्वी को रहने योग्य बनाया । राजा पुथु के इसी कार्य के कारण यह भूमंडल उनके नाम पर ही पृथ्वी कहलाता था । हे मुनिवरों राजा पृथ ने भूमि समतल की । पर्वतों को जन्म दिया । उन्होंने पृथ्वी का दोहन कर उसे रहने योग्य बनाया । इसके बाद असुरों, नागों, यक्षो, राक्षसों, गंधर्वो, अप्सराओं, पर्वतों, वृक्षों ने पृथ्वी का दोहन किया । पृथ्वी का विस्तार समुद्र तक हो गया । एक समय वह मधुकैटभ के मद में व्याप्त हो गयी थी । अतएव पृथ्वी का नाम मेदिनी भी हो गया । इस प्रकार दोहन के हो जाने के उपरान्त पृथ्वी योग्य हो गयी ।

सूतजी इतना कहकर मौन हो गए । तब शौनक जी ने उससे मन्वन्तर के विषय में प्रश्न किया । सूतजी ने सम्पूर्ण मनुओं और मन्वन्तर की कथा सुनायी । फिर सूर्य, संन्ध्या की छाया, यज्ञ के जन्म का विवरण दिया । सूत जी बोले, मुनिवरो । वैवस्वत मनु के वंशजों ने महाविशालकाय दानव धुन्ध का वध कर पृथ्वी का उद्वार कियग । राजा कुशलाश्व के जन्म में महर्ष गालब का जन्म हुआ । विश्वामित्र की भार्या ने इनको जन्म दिया था । सत्यव्रत ने गालब को विश्वामित्र की भार्या से खरीद लिया था । बाद में सत्यव्रत महर्ष वशिष्ठ के शाप के कारण त्रिशंकु कहलाये । विश्वामित्र को जब यह ज्ञात हुआ, तब उन्होंने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया । कंकय नरेश की कन्या सत्यरथा त्रिशंकु की पत्नी थी । उसने हरिश्चन्द्र को जन्म दिया और हरिशचन्द्र से रोहित उत्पन्न हुए । तत्पश्चात राजा सगर का आगमन हुआ । पर्याप्त अन्तराल के बाद सूर्यवंश ने विकास पाया । यशस्वी भागीरथ पवित्र गंगा को पृथ्वी पर ले आये । इस प्रकार हे मुनिवरों, परम-पिता व्रहृ के द्वारा निर्मित सृष्टि बराबर बढ़ती गयी । धर्म, अधर्म का संघर्ष होता रहा । समय-समय पर ब्रहृ के आदेश से भगवान विष्णु अवतार लेकर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करते रहे । मुनिवरों । इन अवतारों की कथा बड़ी रोचकहै । परम पिता परमात्मा ब्रहृ ने सदा पृथ्वी पर कृपादृष्टि रखी है । इस कारण मुनिवरों, हम उन्हीं के अंश है । उनकी ही कृपा से हम इस नैमिषारण्य में समागम कर रहे है ।
सूत जी का यह कथन सुनकर उपस्थित मुनिगण गदगद हो गये । सूतजी का कथन सर्वथा सत्य था । तब शौनक जी बोले, हे मुनि श्रेष्ठ, हमारे ज्ञान वर्धन के लिये कृपापूर्वक आपने ब्रहृ द्वारा हरि (विष्णु) के अवतारों की बात कही है । अतएव विष्णु के यह सब अवतार हरिवंश कहलाये । आप हमें हरिवंश-पुराण सुनाने की कृपा करें ।

शौनक जी के इस प्रश्न पर सूतजी अत्यन्त प्रसन्नता के साथ बोले, मुनिवरों आपकी यह जिज्ञासा मेरा उत्साहवर्द्वन करती है । हरिवंश (विष्णु अवतारों) में सबसे प्रिय श्रीकृष्ण है । मैं इनका ही दिव्य चरित्र आप सबको सुनाना चाहता हूँ । हे मुनिवरों इस कथा का नाम ही हरिवंश पुराण है । हरिवंश पुराण के श्रवण से उसी प्रकार के पुत्र की प्राप्ति होती है, जिस प्रकार का पुत्र देवकी और वासुदेव को प्राप्त हुआ था । विधिपूर्वक इस कथा के श्रवण और बाद में संतान के लिये प्रार्थना करने पर याचक को पुत्ररत्न की प्राप्ति अवश्य होती है । हरिवंश पुराण के श्रवण की यह महिमा है । अतएव प्रथम मैं हरिवंश पुराण की कथा कहता हूँ । तत्पश्चात उसके श्रवण की विधि और सन्तान हेतु की गयी प्रार्थना का विवरण दूंगा, आप सब ध्यानपूर्वक सुनें । सूतजी के इस कथन पर सब मुनिगण गदगद हो गये और आगे का विवरण सुनने के लिये अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक सावधान होकर बैठ गये ।

14 सितंबर 2010

सक्सेस की यूएसपी ( USP of Success )

ज्ञापन की दुनिया के एक मशहूर एक्सपर्ट रोजर रीव से जब यह पूछा गया कि किसी भी प्रोडक्ट, ब्रांड, संस्थान या व्यक्ति की सफलता का सूत्र क्या है, तो उन्होंने कहा कि 'There is nothing (in this world) which is successful without USP (unique selling prosposition)'

अर्थात संसार में ऐसा कोई नहीं जिसने बिना unique selling proposition के सफलता पाई। आखिर यह unique selling proposition क्या है?

इसका मतलब है कि किसी चीज या व्यक्ति में सफल होने के लिये एक ऐसी विशेषता होनी चाहिए। जो न केवल उसको दूसरों से अलग करे और साथ ही दूसरे व्यक्तियों को उस विशेषता से अच्छा लाभ होता हुआ भी लगे।

उदहारण के लिये एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने भारत के ग्रामीण इलाकों के लिये एक ऐसा रेडियो चालू। इसी तरह से एक शेविंग क्रीम निर्माता ने क्वालिटी को बिना गिराए ऐसी क्रीम मार्केट में उतारी, जो बेहद सस्ती थी। इसका सबसे बड़ा फायदा बार्बर शाँप [नई की दुकानों] हो हुआ। यही कारण है कि देश के अधिकाँश छोटे एवं माध्यम साइज की नई की दुकानें इसी शेविंग क्रीम का इस्तेमाल ग्राहक की शेव बनाने के लिये करते हैं। ऐसा करने से उनकी बचत अधिक होती है। वे अधिक पैसा कमाते हैं। इसी तरह यदि आप किसी संसथान के लिये कार्य कर रहे हैं तो आपको इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि आप में ऐसी क्या विशेषता है जो आपको दूसरे कर्मचारियों से अलग करती है। आप में हजारों अवगुण हो सकते हैं, जिसके बारे में सारी संस्था gossip करती है, परन्तु एक ऐसा गुण या विशेषता भी होनी जरूरी है, जिससे संस्था को लाभ हो। क्या आप में सोचने की शक्तिक अच्छे है, क्या आप अच्छे रिपोर्ट लिख सकते हैं या आप में भाग-दौड़ करने की क्षमता है या आपका दिमाग बहुत analytical है या आप में networking करने की काबलियत है अर्थात आप दोसरों से अच्छे Relation [संबंध] आसानी से बना सकते हैं इत्यादि। आकार यह देखा जाता है कि कर्मचारी या एग्जीक्यूटिव अपने अवगुणों पर होने वाली Gossip को राजनीति की संज्ञा देकर उससे परशान होते रहते हैं और अपनी energy व्यर्थ ही waste करते हैं। उनको अपना सारा ध्यान अपने उन गुणों का विकास करने में लगा देना चाहिए। जिससे संस्थान को लाभ हो और वह दूसरों से अलग नजर आएं।

12 सितंबर 2010

रणनीति का क्रियान्वयन जरूरी ( Implementation of strategy needed )

क एक्जीक्यूटिव को काँरपोरेट वर्ल्ड में सफल होने के लिये यह जरूरी है कि उसमें दो योग्यताओं का समावेश हो। पहली अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये भविष्य की रणनीति के बारे में ज्ञान दूसरी अपने सोच के अनुसार क्रियान्वयन करने की क्षमता। इनको समझाने के लिये एक पुराना उदहारण लेते हैं। दो दोस्त जंगल में भ्रमण करने के लिये जाते हैं और साथ ही यह भी निर्णय लेते हैं कि वे जंगल में ही टैंट लगाकर रहेंगे।

जब वे टैंट में आराम कर रहे होते हैं, तो अचानक से उनके सामने के टाइगर आ जाता है। दोनों घबरा जाते हैं। एक दोस्त टाइगर को देखकर अपने स्पोर्ट्स शूज बिजली की गति से पहनने लगता हो। जिसको देखकर दूसरा दोस्त remark करता है कि तुम टाइगर से तेज नहीं भाग सकते। क्यों अपनी एनर्जी व्यर्थ गँवा रहे हो।' इसको सुनकर पहला दोस्त कहता है कि 'दोस्त! मुझे टाइगर से तेज नहीं दौड़ना है, मुझे तुझसे तेज दौड़ना है।'

उपरोक्त उदहारण में पहले वाले दोस्त को उद्देश्य उसके दिमाग में बिलकुल स्पष्ट है, उसको प्राप्त करने की रणनीति भी उसने पलक झपकते ही बना ली, और उस रणनीति को implement करने के लिये उसने जूते भी पहल लिये। अब तो वह टाइगर के आक्रमण का इंतज़ार कर रहा है। जैसे ही तिगर उन पर झाप्तेगा, दोनों इधर-उधर भागने के अलावा कुछ नहीं कर पायेंगे। इस भाग-दौड़ में जो पीछे रह जाएगा, वह टाइगर के हत्थे चढ़ जायेगा। दूसरे दोस्त ने खतरे के समय अपने दिमाग को भय के आवेश में जाम कर लिया और बिलकुल अकर्मण्य होकर बैठ गया।

उपरोक्त दोनों योग्यताओं के अनुसार काँरपोरेट वर्ल्ड में चार प्रकार के एक्जीक्यूटिव मिलते हैं। पहले, वे जो ना तो सोचना अच्छा जानते हैं और ना ही वे अपनी सोच को क्रियान्वित कर सकते हैं। अवे अपने भाग्य से काँरपोरेट वर्ल्ड में एंट्री ले लेते हैं, परन्तु अधिक चल नहीं पाते। दूसरे, वे एक्जीयूतिव जिनकी सोचने की शक्ति बहुत अच्छे होती है, परन्तु आलसी प्रवृत्ति के कारण उसको क्रियावान्ति करने में असफल होते हैं। ऐसे लोग बात करने में बहुत अच्छे होते हिं, बहुत जल्दी इंप्रेस करते हैं, परन्तु कार्य नहीं कर पाते हैं। ये बहुत जल्दी frustrate होते हैं और कंपनी छोड़ने में जल्दबाजी करते हैं। तीसरे प्रकार के वे एक्जीक्यूटिव हैं जो सोच नहीं सकते, परन्तु एक्टिव होने के कारण कार्य अच्छा करते हैं। ये फील्ड फ़ोर्स के लिये उत्तम हैं।

चौथे प्रकार के वे एक्जीक्यूटिव हैं, जो सोचते भी अच्छा हैं और एक्टिव भी बहुत हैं। ये लोग काँरपोरेट वर्ल्ड में top positions पर होते हैं।

इस लेख में दिए गए diagram के अनुसार प्रथम प्रकार के एक्जीक्यूटिव को Losers की संज्ञा दी है, दूसरे प्रकार को frustrator की संज्ञा दी है, तीसरे प्रकार को Gambler और चौथे को Expander कहा गया है। कुल मिलाकर मंत्र यही है कि हमें एक्स्पंदर बनाना है।

पारंपरिक बाजारों में मार्केटिंग की जरूरत ( Marketing have to be in traditional markets )


सी ने ठीक ही कहा है 'इस संसार में कोई भी चीज permanent नहीं है। सफलता या असफलता सभी एक timeperiod से बंधी हुई हैं। कुछ समय के पश्चात उसमें बदलाव जरूर होता है।

जो चीज आज सफल दिख रही है, कुछ समय के पश्चात उसको कोई पूछने वाला भी नहीं होगा, इसी तरह जो आज असफल दिख रही है, वह भविष्य में सफलता की गगनचुम्बी ऊंचाइयों पर होगी।

उदहारण के लिये जयपुर-इंदौर आदि शहरों में यदि हम नजर दौडाएं तो पायेंगे कि यहाँ पर अन्य बड़े शहरों की तरह शाँपिंग माल और कांरपोरेट वर्ल्ड के big रिटेल आउटलैट खुल रहे हैं। ये अपनी आकर्षक मार्केटिंग योजनाओं के माध्यम से ग्राहकों को [खासतौर पर युवा वर्ग को ] अपनी तरफ झुका रहे हैं। अच्छे वातावरण, एयरकंडीशंड सुविधाएं, स्मार्ट सेल्समैन एवं सेल्सवुमैन, good product collection, बेहद बढ़िया विज्ञापनों एवं अच्छे इवेंट मार्केटिंग की बदौलत इन्होने वो कर दिखाया, जो जयपुर जैसे शहरों के परम्परागत बाजार पिछले पचास वर्षों में नहीं कर सके। अभी तो परिस्थितियाँ ऐसी हो चुकी हैं कि परम्परागत बाजारों के लोग अपनी दुकान सुपरमाल आदि में खोलने लगे हैं। सवाल यह उठाता है कि इन पारंपरिक बाजारों का भविष्य में क्या होगा? अभी हाल ही में पता चला है कि सन 2001-2002 में जो दुकानदार बड़े थे, जो अखवारों में फुल पेज के साइज के अनेकों बार विज्ञापन देते थे, आज 2010 में उनकी हैसियत यह हो गई है कि वे बहुत ही छोटे विज्ञापन देने में हांफ जाते हैं।

मैनेजमेंट विशेषज्ञों के अनुसार 'यदि किसी शहर का बहुत तेजी से विकास हो रहा है, तो शाँपिंग माल इत्यादि traditional बाजारों को पीछे जरूर छोड़ेगी। उनके अनुसार भविष्य के 10-15 वर्षों में पारंपरिक बाजारों में ग्राहकों की अत्यधिक कमी आयेगी। वे सिंगापुर का उदहारण देते हैं, जहाँ पर भीड़-भरे छोटी-छोटी दुकानों वाले बाजारों को आधुनिक सुपर माल आदि के कारण बहुत दिक्कतों का सामना करना पडा। अतः मैनेजमेंट विशेषज्ञ ये सल्लाह देने से नहीं चूकते कि पारंपरिक बाजारों को अपने आपको संगठित कर लेना चाहिए। अपना एक USP विकसित कर लेना चाहिए। सिंगापुर की तर्ज पर सरकार से सहयोग लेना चाहिए और अपने एक-एक ग्राहक के लिये fight करनी चाहिए। अन्यथा शहर तो बड़ा हो जायेगा पर ये दुकानदार छोटे होकर भीड़ में गम जायेंगे।

गलत आदतों का फायदा उठाना जानो ( Know the wrong habits to take advantage )

क्सर यह कहा जाता है कि एक आम आदमी गलत आदतों का पुलिंदा है। उसको ठीक करना नामुमकिन है। भगवन ने भी आठ-नौ बार इस पृथ्वी पर अवतार लिया, या अपने पैगम्बरों को पृथ्वी पर भेजा, परन्तु यह मनुष्य सुधार नहीं सका।

मैनेजमेंट विशेषज्ञ यह मानते हैं कि गलत आदतों में मनुष्य को एक अजीब सा आनंद मिलता है, एक adventure की feeling महसूस होती है या उसको करने से guilt से अधिक किसी चीज के achievement की feeling होती है। इसलिए मनुष्य उसमें सराबोर होकर अपनी जिन्दगी जीता चला जाता है। यदि मनुष्य की गलत आदतों को सुधरा नहीं जा सकता, तो क्या उनसे फायदा नहीं उठाया जा सकता?

मैनेजमेंट की दुनिया में ऐसे अनेक उदहारण मिलेंगे। ऐसे ही एक उदहारण दो दुकानों के competition का है। ये दोनों दुकाने एक ही बाजार में एक दूसरे के आमने-सामने की ओर दोनों एक ही प्रकार के प्रोडक्ट ग्राहकों को बेचती थी। इसलिए दोनों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी जबरदस्त थी। जो भी दुकान ग्राहकों के लिये कोई भी स्कीम लेकर आती, उसको दूसरा दुकान वाला अगले ही दिन लागू करके ग्राहकों को अपनी ओर खींचने की कोशिश करने लगता था। मैनों तक चली इस तरह की परिस्थितियों से परेशान होकर एक दुकान वाले ने एक नायाब तरीका ग्राहकों को रिझाने का सोचा। उसने पहले हिसाब लगाकर यह पता किया कि वह प्रतिदिन ग्राहकों से bargain के समय वास्तु का price कम करके कितने पैसे क नुक्सान उठाता है। माना कि यह नुक्सान प्रतिदिन का 2000 रूपये आता है।

इतने हे रूपये उसने छोटे-मोटे आइटम उदहारण के लिये पेंसिल, पेन, जियोमैत्रिक बाँक्स, स्माल डेकोरेटिव आइटम्स को खरीद कर एक बड़ी टोकरी में डालकर अपनी दुकान के निकासी द्वार (Exitdoor) पर रखवा लिया। उसने अपने कर्मचारियों को हिदायत डि कि यदि की ग्राहक इसमें चीजें निकालकर अपने साथ ले जाए, तो वे उसको Ignore करें। दूसरे शब्दों में वे ग्राहकों की चोरियों को नजरंदाज करें। ऐसा करने से धीरे-धीरे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी और साथ ही वह टोकरी भी शाम तक खाली होने लगी।

अब ग्राहक को shopping करने का मजा आने लगा और वे अपने साथ नए-नए दोस्त भी लाने लगे, ताकि वे भी इस adventure में भागीदार बन सके।

इसका सुखद परिणाम यह रहा कि दुकान की बिक्री भी बहुत बढी और दूसरी दुकान वाले को यह समझ में नहीं आया कि ग्राहक उसकी दुकान पर क्यों नहीं आते। सारांश यही है कि हर चीज का फायदा उठाना जानों।

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