15 मई 2011

समाज सुधारक थे श्रीमद शंकरदेव

असम के महान संत श्रीमद्‌ शंकरदेव का जन्म नौगांव जिले के अली पुखरी में १४४९ में हुआ था। उनका जीवन अनेक अनूठी घटनाओं से पूर्ण था। अपने दूरदर्शी प्रयास से उन्होंने अनेक जाति-वर्गों में विभाजित पूर्वोत्तर में भक्ति रस की जो धारा प्रवाहित की और जनसाधारण को कल्याण की राह दिखाई, वह अतुलनीय है।

शंकरदेव के पूर्वज चंडीवर भूइयां पहले बंगाल आकर बसे थे और वहां से असम आ गए थे। उनके वशंजों ने मध्य असम के विभिन्न भागों में भूइयां-राज्यों की स्थापना की थी। शंकरदेव के पिता शिरोमणि भूइयां कुसुंबर अली पुखरी में आकर बस गए थे।

शंकरदेव की माता का नाम सत्यसंधा था। बचपन में ही शंकर को माता-पिता की स्नेह-छाया से वंचित होना पड़ा।

वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।
शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।
शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।

"शंकरदेव की प्रमुख कृतियां विशुद्ध असमिया भाषा में -काव्यः हरिशचंद्र उपाख्यान एवं रुक्मिणी हरण काव्य -भक्ति पद : कीर्तन घोष, भक्ति प्रदीप, गुणमाला ब्रजावली भाषा में - प्रगीत पद- बरगीत - टीकाः शंकरदेव ने भक्ति तत्व संबंधी संस्कृत ग्रंथ भक्ति रत्नावली की टीका भी लिखी थी। अनूदित कृतियां शंकरदेव ने उत्तर कांड रामायण तथा श्रीमद्‌ भागवत के कई स्कंधों का असमिया भाषा में अनुवाद भी किया।" उनका पालन-पोषण दादी खेरसुती ने किया। बारह वर्ष की आयु में शंकर महेंद्र कंदली की संस्कृत पाठशाला में अध्ययन करने लगे। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन के माध्यम से उनके मन में तत्व-ज्ञान की ज्योति जल उठी। अल्प समय में ही अतुल शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर वे घर लौटे, परंतु उनका मन भक्ति में रम गया था।

आम लोगों की दशा पर उन्होंने ध्यान दिया और अनुभव किया कि भक्ति की राह पर चलकर ही उनको उचित मार्गदर्शन मिल सकता है। परिवार के सदस्यों के आग्रह पर उन्होंने सूर्यावती से विवाह किया। सांसारिक कर्मों से उदासीन होकर वे चिंतन-लेखन में जुट गए। इन्हीं दिनों उन्होंने चिह्न यात्रा नाटक की रचना की और उसका मंचन किया। फिर वे अपने साथियों के साथ बारह वर्षों तक भ्रमण करते रहे। इस दौरान जहां उन्होंने तीर्थ स्थानों की यात्रा की, वहीं कई संतों के संपर्क में भी आए। उन्हें श्रीमद्‌भागवत पर आधारित कृष्ण भक्ति का प्रचार करने की प्रेरणा मिली।
 

वे ब्रजावली भाषा में भक्ति-पद की रचाना करने लगे। काशी, वृंदावन, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ आदि स्थानों की उन्होंने यात्रा की। तीर्थाटन से लौटने के बाद वे ग्रंथ लेखन और भक्ति धर्म का प्रचार करने में जुट गए। उन्हें अनेक शिष्यों के साथ माधवदेव जैसा प्रतिभाशाली शिष्य मिल गया। दोनों जनसाधारण के बीच धर्म का प्रचार करने लगे। ११९ वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर का परित्याग किया।

शंकरदेव मूलतः संत और धर्म प्रचारक-सुधारक थे। उन्होंने समाज-व्यवस्था की त्रुटियों की तरफ ध्यान दिया था। उन्होंने राज्याश्रय प्राप्त तत्कालीन ब्राह्मणों-पुरोहितों का अहंकार देखा, जो जनजातीय लोक-संस्कृति को हिकारत की नजरों से देखते थे। यही वजह है कि इन सब खामियों को दूर करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया।

शंकरदेव ने धर्म वंचित, शोषित, अशिक्षित, अंत्यज, शूद्र, जनजातीय जनों को धर्म-ज्ञान देने के लिए संस्कृत भाषा की दीवार तोड़ते हुए जनसाधारण की भाषा में मौलिक कृतियों की रचना की।

राधा कृष्ण के सच्चे उपासक थे नींबार्क

सनातन संस्कृति की आत्मा श्रीकृष्ण को उपास्य के रूप में स्थापित करने वाले निंबार्काचार्य वैष्णवाचार्यों में प्राचीनतम माने जाते हैं। राधा-कृष्ण की युगलोपासना को प्रतिष्ठापित करने वाले निंबार्काचार्य का प्रादुर्भाव कार्तिक पूर्णिमा (१ दिसंबर) को हुआ था। भक्तों की मान्यतानुसार आचार्य निंबार्क का आविर्भाव-काल द्वापरांत में कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ और परीक्षित पुत्र जनमेजय के समकालीन बताया जाता है।

इनके पिता अरुण ऋषि की, श्रीमद्‌भागवत में परीक्षित की भागवतकथा श्रवण के प्रसंग सहित अनेक स्थानों पर उपस्थिति को विशेष रूप से बतलाया गया है। हालांकि आधुनिक शोधकर्ता निंबार्क के काल को विक्रम की ५वीं सदी से १२वीं सदी के बीच सिद्ध करते हैं। संप्रदाय की मान्यतानुसार इन्हें भगवान के प्रमुख आयुध सुदर्शन का अवतार माना जाता है।

इनका जन्म वैदुर्यपत्तन (दक्षिण काशी) के अरुणाश्रण में हुआ था। इनके पिता अरुण मुनि और इनकी माता का नाम जयंती था। जन्म के समय इनका नाम नियमानंद रखा गया और बाल्यकाल में ही ये ब्रज में आकर बस गए। मान्यतानुसार अपने गुरु नारद की आज्ञा से नियमानंद ने गोवर्धन की तलहटी को अपनी साधना-स्थली बनाया।

बचपन से ही यह बालक बड़ा चमत्कारी था। एक बार गोवर्धन स्थित इनके आश्रम में एक दिवाभोजी यति (केवल दिन में भोजन करने वाला संन्यासी) आया। स्वाभाविक रूप से शास्त्र-चर्चा हुई पर इसमें काफी समय व्यतीत हो गया और सूर्यास्त हो गया। यति बिना भोजन किए जाने लगा। तब बालक नियमानंद ने नीम के वृक्ष की ओर संकेत करते हुए कहा कि अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है, आप भोजन करके ही जाएं। लेकिन यति जैसे ही भोजन करके उठा तो देखा कि रात्रि के दो पहर बीत चुके थे। तभी से इस बालक का नाम 'निंबार्क', यानी निंब (नीम का पेड़) पर अर्क (सूर्य) के दर्शन कराने वाला, हो गया।

निंबार्काचार्य ने ब्रह्‌मसूत्र, उपनिषद और गीता पर अपनी टीका लिखकर अपना समग्र दर्शन प्रस्तुत किया। इनकी यह टीका वेदांत पारिजात सौरभ (दसश्लोकी) के नाम से प्रसिद्ध है। इनका मत 'द्वैताद्वैत' या 'भेदाभेद' के नाम से जाना जाता है। आचार्य निंबार्क के अनुसार जीव, जगत और ब्रह्‌म में वास्तविक रूप से भेदाभेद संबंध है। निंबार्क इन तीनों के अस्तित्व को उनके स्वभाव, गुण और अभिव्यक्ति के कारण भिन्न (प्रथक) मानते हैं तो तात्विक रूप से एक होने के कारण तीनों को अभिन्न मानते हैं। निंबार्क के अनुसार उपास्य राधाकृष्ण ही पूर्ण ब्रह्‌म हैं।

डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी सुविख्यात पुस्तक 'भारतीय दर्शन' में निंबार्क और उनके वेदांत दर्शन की चर्चा करते हुए लिखा है कि निंबार्क की दृष्टि में भक्ति का तात्पर्य उपासना न होकर प्रेम अनुराग है। प्रभु सदा अपने अनुरक्त भक्त के हित साधन के लिए प्रस्तुत रहते हैं। भक्तियुक्त कर्म ही ब्रह्‌मज्ञान प्राप्ति का साधन है। सलेमाबाद (जिला अजमेर) के राधामाधव मंदिर, वृंदावन के निंबार्क-कोट, नीमगांव (गोवर्धन) सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में निंबार्क जयंती विशेष समारोह पूर्वक मनाई जाती है।

मानवता के लिए शहीद हुए थे पांचवे पातशाह

सखत्व अथवा सिक्खी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब, स्वर्ण मंदिर और हरमंदिर साहिब का आधार-महत्व जगजाहिर है। सिख पंथ का समूचा अक्स ही इनके बगैर अधूरा है। बल्कि ये तो सिक्खी की शिनाख्त हैं। और, यह महान व पवित्र देन बख्शी थी पंथ के पांचवें पातशाह साहिब गुरु श्री अर्जुन देव जी ने। उन्हीं की शहादत ने सिखों को बलिदानी कौम का रुतबा दिलाया था और शीश तली पर रखकर हक-सच के पक्ष में आवाज बुलंद करने की सूरमाई रिवायत भी पांचवें पातशाह की दी हुई सौगात है।

उनसे आरंभ हुआ कुर्बानियों का महान सिलसिला दूर तक गया...।

गुरु नानक देव, गुरु अगंद देव, गुरु अमरदास और गुरु रामदास के बाद पंथ की रहनुमाई करने वाले गुरु अर्जुन देव का जन्म १५ अप्रैल १५६३ को गोइंदवाल में हुआ था। गुरु की नगरी अमृतसर के जन्मदाता, चौथे पातशाह गुरु रामदास उनके पिता और मां भानी जी माता थीं। धार्मिक-ऐतिहासिक वृतांत-प्रसंगों के मुताबिक गुरु अर्जुन देव सब भाइयों से छोटे थे लेकिन सद्‌गुणों में सर्वोपरि थे। इसी वजह से गुरु रामदास जी उन्हें तरजीह देते थे। बेहद रूहानी माहौल में उनका लालन-पालन हुआ। हालांकि उस दौर में बहुतेरे सिख अनुयायी मानते थे कि पृथ्वी चंद चौथे पातशाह के अग्रज पुत्र हैं सो गुरु-गद्दी उन्हीं को मिलेगी। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि पृथ्वी चंद ने बाकायदा गुरु-गद्दी पर अपनी दावेदारी भी जताई थी, लेकिन गुरु रामदास जी ने योग्यता के पैमाने पर सबको बखूबी परख कर गुरु अर्जुन देव जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और सिख पंथ की अगुवाई सौंपी। इस जिम्मेदारी का निर्वाह उन्होंने जबरदस्त शिद्दत के साथ किया।

उस दौर में 'सिख' एक नवोदित कौम थी। एक ऐसी अकाल-पंथिक लहर, जिसका तब के प्रचलित तमाम धर्मों-मजहबों पर गहरा व मुफीद असर पड़ रहा था। उस पंथिक लहर को गुरु अर्जुन देव जी ने शिखर पर पहुंचाया और दुनिया के कोने-कोने में उनके प्रचार ने लोगों पर जादुई असर किया। वह प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी की एकत्व अथवा सबका मालिक एक अकाल पुरख' की अवधारणा को आधार बनाकर चले। उनके संतई करिश्मे ने एक अलहदा दुनिया का निर्माण किया। बड़ी तादाद में हिंदुओं-मुसलमानों ने सिक्खी को अपनाया। गद्दीनशीन होते ही गुरु अर्जुन देव जी ने पंथ के विकास और उसे नया रूप देने की कोशिशें शुरू कीं। उन्होंने श्रृंखलाबद्ध सत्संगों-कीर्तनों का अटूट सिलसिला शुरू किया। जोड़ मेलों की रिवायत को शिद्दत भी उन्हीं की हिदायतों के बाद हासिल हुई। बड़ी तादाद में और दूर-दूर से अनुयायी जोड़ मेलों में शिरकत के लिए आते और निहाल होकर लौटते। उन जोड़ मेलों का एक बड़ा मकसद 'सांझ' की अवधारणा को पुख्ता करना और इनसान को खुद की बेहतरी के लिए सादा-सच्चा जीवन बीताने का प्रशिक्षण देना भी रहता था। सांझे लंगरों की परंपरा ने सामाजिक सद्‌भाव की दिशा में क्रांतिकारी और बेहद सार्थक भूमिका निभाई।

सत्संग और गुरबाणी-कीर्तन को सिक्खी में अहम महत्व पहले दिन से ही हासिल है। गुरु अर्जुन देव जी ने इन्हें और ज्यादा कारगर बनाने में अपना शानदार योगदान दिया। वह गुरु नानक देव, गुरु अगंद देव, गुरु अमर दास और गुरु रामदास की बाणी को आधार बनाकर, अपना पवित्र संदेश संगतों को देते थे। अपने पूर्ववर्ती चारों गुरुओं की महान मौखिक-लिखित रचनाओं को तलाश कर, संकलित करना और उनका प्रारूप तैयार करना एक बेमिसाल और (तब) निहायत असंभव-सा लगने वाला कर्म था, लेकिन गुरु अर्जुन देव जी ने अपने तईं यह किया।


श्री गुरुग्रंथ साहिब सिक्खी की अनमोल विरासत है और इस विरासत की प्राप्ति का सेहरा पांचवें पातशाह के पावन सिर पर है। ज्यों-ज्यों पंथ की मान्यता दुनिया भर में बढ़ती गई, त्यों-त्यों इसके विकास के लिए नए से नए कदम भी उठाए गए। गुरु अर्जुन देव जी ने महसूस किया कि पंथ के अनुयायियों को अब एक सांझे केंद्रीय मंदिर और सांझे धार्मिक ग्रंथ की जबरदस्त दरकार है।

इसलिए उन्होंने पहले पहल सबसे उल्लेखनीय और जरूरी काम हरिमंदिर साहिब के निर्माण का किया। दुनिया में, तब से पहले और बाद, ऐसा कहीं कोई दूसरा उदाहरण उपलब्ध नहीं है कि किसी धार्मिक स्थल के चार दरवाजे इस मंतव्य के साथ बनाए (या खोले) जाएंह्नकि इनमें हर धर्म, पंथ, महजब, जात-पांत का व्यक्ति बगैर किसी हिचकिचाहट अथवा शंका के प्रवेश कर सके। पांचवें पातशाह ने यह किया। यह भी एक दुर्लभ मिसाल है कि चारों दरवाजों की नींव, चार अलग-अलग धर्मों-मजहबों से बावस्ता व्यक्तियों ने रखी। जबकि हरमंदिर साहिब का शिलान्यास गुरु अर्जुन देव जी ने अपने समकालीन महान सूफी संत हजरत मियां मीर के हाथों करवाया। तब भी समाज के एक बड़े हिस्से में संकीर्णता हावी थी, लेकिन गुरु जी की इस हिम्मती पहलकदमी के आगे लगभग हर किसी ने अपना सिर झुका दिया था। इसलिए भी कि तब, धार्मिक सहिष्णुता की बहाली के लिए उठाया यह सबसे बड़ा कदम था। उसका असर बाकायदा आज भी कायम है और यकीनन रहती दुनिया तक रहेगा। इस कथन में अतिशयोक्ति नहीं कि हरमंदिर साहिब आज भी उस गरिमा की बखूबी हिफाजत कर रहा है। गुरु घर के चारों दरवाजे हर धर्म, मजहब, जाति और वर्ग के लोगों के लिए सदैव खुले रहते हैं।


श्री गुरुग्रंथ साहिब की रचना भी गुरु अर्जुन देव जी की अनुयायियों को दी गई एक अनमोल और अति महान सौगात है। यह इन अर्थों में भी मौलिक-महानता लिए हुए है कि इसमें महज सिख गुरुओं की पवित्र बाणी ही समाहित नहीं है, उस दौर के कई सूफी-संतों और भक्तों की बाणी भी इसमें समाहित है। और, वे सूफी-संत व भक्त विभिन्न धर्मों-मजहबों में यकीन रखते थे। समग्र-चिंतन वाले विचारों को तरजीह दी गई।


पांचवें पातशाह ने शहादत को भी नए आयाम दिए। तत्कालीन मुगल शहनशाह जहांगीर गुरु जी की विचारधारा और सद्‌कर्मों से घोर असहमति रखता था। वह चाहता था कि गुरु अर्जुन देव अपना रूहानी अभियान त्याग कर, उसकी पनाह में आ जाएं और उसकी राह अख्तियार कर लें। ऐसा कैसे संभव था? गुरु जी ने उसकी असहमतियों की रत्ती भर भी परवाह नहीं की और अपने मार्ग पर पहले की मानिंद चलते रहे। अंततः शहनशाह जहांगीर की असहमति के तेवर हिंसक गुस्से में तब्दील हो गए।

मई, १६०५ के आखिरी हफ्ते के एक दिन गुरु अर्जुन देव जी को बाकायदा गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें लाहौर के यातना-शिविर में डाल कर मजबूर किया गया कि वह मुगल सम्राट की सत्ता कबूल करें और अपना रास्ता छोड़ दें। भयावह-अमानवीय यातनाएं खुशी-खुशी पांचवें पातशाह ने बर्दाश्त कीं लेकिन झुकने से साफ इनकार कर दिया। जालिमों ने उन्हें तपते तवे पर बिठाया और जिस्म पर सुलगती रेत तक डाली, लेकिन गुरु जी अपने आदर्शों से नहीं हिले। आखिरकार उन्होंने अपनी जान देकर शहादत का जाम पी लिया।

उनका शहादत दिवस आए साल निराले तरीके से मनाया जाता है। इसलिए भी कि उन्होंने समूची मानवता के लिए खुद को कुर्बान कर दिया और आह तक नहीं भरी। इस दिन दुनिया भर के सिख अनुयायी शहादत दिवस तो मनाते हैं, लेकिन शोक दिवस नहीं।

कर्म योगी संत थे मलूक दास जी महाराज

प्रख्यात संत, जगतगुरु मलूकदास महाराज का भक्तिकालीन निर्गुणवादी भक्त कवियों में प्रमुख स्थान है। वे रामानंदी संप्रदाय के ख्ख् वें आचार्य थे। उनमें जन्मसिद्‌ध चकत्कारिता व विलक्षण साधुता थी। उनके अंदर विश्व कल्याण की भावना कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं के द्‌वारा देशभर में सत्यम, शिवम, सुंदरम की अलग जगाई।

आजीवन संपूर्ण सृष्टि को भगवत स्वरूप मानकर संत प्रवर उसकी तन-मन से सेवा में वे जुटे रहे।

संत प्रवर मलूकदास जी महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले केग्राम कड़ा माणिकपुर में संवत क्म्फ्क् की वैशाख कृष्ण पंचमी (गुरुवार) को हुआ था। उन्होंने जो भी शिक्षा प्राप्त की, वह स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण के द्‌वारा प्राप्त की। उनमें बाल्यावस्था में ही कविता लिखने का गुण विकसित हो चुका था।

महाराजश्री को उनके पिता ने जीविकोपार्जन हेतु कंबल के व्यवसाय में लगाया, परंतु उसमें उनका मन नहीं रमा। वह संतों और निर्धनों को कंबल मुफ्त में ही दे दिया करते थे। उनके पास जो भी याचक आता था, उसे वे निराश वापस नहीं करते थे। वह अभ्यागतों की यथाशक्ति अन्न-वस्त्र से सेवा किया करते थे। वे जब संतों की सेवा करते थे, तो उनके प्रताप से पहले से ही मौजूद वस्तुएं शतगुणित हो जाती थीं। वह एक टिक्कर में से ही लाखों व्यक्तियों को प्रसाद दे दिया करते थे। उनके भंडार में कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होती थी। उन्होंने अनगिनत निर्धन कन्याओं के हाथ पीले करवाए। अनेक विधवाओं का पालन-पोषण किया। गांव में जब प्लेग फैला, तो प्लेग पीड़ितों की अहर्निश सेवा की। वह अपने आश्रम में कोढ़ी व्यक्तियों को भी प्रश्रय देकर उनके घावों की मरहम-पट्‌टी कर दिया करते थे। उन्होंने व्यापक जनहित में निजी खर्च से सड़कों का निर्माण कार्य तक कराया। वस्तुतः वह निष्काम भाव से परमार्थ में लगे रहे।

बाबा मलूकदास मूर्ति पूजा और आडंबरों के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि दूसरे व्यक्तियों की पीड़ा को जानना और उसे दूर करना ही सच्ची सेवा, सच्चा धर्म है। यही सच्चे संत व पीर की पहचान है। वह मोक्ष प्राप्ति का साधन भी दया भाव को ही मानते थे। वह कहा करते थे कि सेवा भाव के द्‌वारा नर और नारायण दोनों ही प्राप्त हो जाते हैं।

महाराजश्री कर्मयोगी संत थे। वह जाति-पांति के घोर विरोधी थे। उनकी वाणी अत्यंत सिद्‌ध थी। वे त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने समूचे देश में भ्रमण करते हुए वैष्णवता और रसोपासना का प्रचार-प्रसार किया। हिन्दू व मुसलिम दोनों ही उनके शिष्य थे। आचार्य मलूकदास के पास सत्संग हेतु लोगों का तांता लगा रहता था। संत तुलसीदास तक ने कई दिनों तक उनका आतिथ्य स्वीकार किया था। मुगल शासक औरंगजेब भी उनके सत्संग से अत्यंत प्रभावित था। उसने उनके आदेश पर गैर-मुसलिमों पर स्वयं लगा निर्धारित जाजिया कर वापस ले लिया था। किंवदंती है कि भगवान राम ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए थे।

संत शिरोमणि मलूकदास महाराज अपनी इच्छा से संवत क्स्त्रफ्ऽ में अपने जन्म के ही माह, तिथि, समय व वार को क्०त्त् वर्ष की आयु में भगवत धाम को गमन कर गए। बताया जाता है कि मलूकदास महाराज का पंच भौतिक शरीर उनके देहत्याग के उपरांत जगन्नाथपुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के समक्ष सच्चिदानंद स्वरूप में प्रकट हो गया था और उन्होंने उनसे उनकी सन्निधि में रहने की इच्छा प्रकट की थी। इस प्रार्थना को जगन्नाथ प्रभु ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था। तब से आजतक जगन्नाथ प्रभु के गर्भ गृह केपनाले के पास मलूकदास महाराज का स्थान विमान है और उनके नाम का रोट अभी भी वहां आनेवाले भक्तों को प्रसादस्वरूप दिया जाता है। वृंदावन में वंशीवट क्षेत्र स्थित मलूक पीठ में संत प्रवर मलूकदास जी महाराज की जाग्रत समाधि है।

गुरू तेग बहादुर : धर्म के लिए दी कुर्बानी

महज चार वर्ष की आयु में बालक तेग बहादुर ने अपने तन के बेशकीमती वस्त्र एक निर्वस्त्र गरीब बालक को पहनाकर उसकी गरीबी को ढांपा। उन्हीं तेग बहादुर जी ने करीब पचपन वर्ष की अवस्था में हिंदू धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली के चांदनी चौक में अपनी अमर, अद्वितीय बलिदान रूपी चादर से हिंदुस्तान की अस्मिता को ढांपा।

धर्म की लाज बचाई। गुरुदेव की इस बेमिसाल कुरबानी पर भावविभोर होकर लिखा कवि सेनापति ने-
'प्रगट भए गुरु तेग बहादुर।
सगल सृष्टि पै ढापी चादर॥
करम धरम की जिनि पत राखी।
अटल करी कलजुग में साखी॥'
छठे गुरु श्री गुरु हरिगोबिंद जी के सबसे छोटे पुत्र और पांचवें गुरु तथा सिख धर्म के प्रथम शहीद श्री गुरु अर्जन देव जी के पौत्र गुरु तेग बहादुर जी बचपन से ही ईश्वर-भक्ति में तल्लीन रहते थे। शुरू से ही गंभीर स्वभाव, विचारशील साधु प्रवृत्ति और प्रकृति वाले तथा त्याग की भावना के मालिक थे तेग बहादुर। महज पांच वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने समाधि लगाना सीख लिया। बिना हिले-डुले वह घंटों ईश्वर के ध्यान में जुड़कर बैठे रहते। कई बार माता को पुत्र की साधु-वृत्ति पर चिंता होने लगती। पर उनके पिता गुरु हरगोविंद उन्हें मुस्करा कर समझाते, 'बहुत बड़ा काम करना है हमारे इस पुत्र को। उस कार्य की अभी से तैयारी कर रहा है।

परहित के लिए त्याग के उच्चतम आदर्श और करुणा के सागर गुरु तेग बहादुर जी का जीवन एक सिपाही के रूप में प्रारंभ हुआ और समापन एक गंभीर, शांत, सहिष्णु और लोकोपकारी शहीद के रूप में। खुद पिता गुरु हरिगोबिंद शस्त्र के महाबली थे। सो, उन्होंने पुत्र तेगबहादुर को शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दिलाई। बाल्यावस्था में तलवार से इस शस्त्रविा के खूब जौहर दिखाए तेग बहादुर ने करतारपुर की जंग में। मोह लिया पिता का मन। तेग के धनी होते हुए भी वे गुरु अर्जन देव जी की तरह शांत, उदात्त, बलिदानी पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए। परधर्म की रक्षा के लिए गुरुदेव ने अपना शीश दे दिया, लेकिन स्वाभिमान नहीं छोड़ा।

करीब साढ़े ग्यारह वर्ष की अवस्था में तेग बहादुर जी का विवाह करतारपुर निवासी श्री लालचंद खत्री की सुपुत्री नानकी जी के साथ हुआ। गृहस्थी में भी वे वैरागी रहे। एकदम सादा जीवन। सांसारिक मोहमाया, लालसा, तृष्णा से कोसों दूर। सर्वदा एकांत में रहते। जुड़े रहते उस हरि के साथ और करते अपने मन को दृढ़। गुरु तेग बहादुर ने सभी संसारी वृत्तियों को वश में कर लिया था। पिता गुरु हरिगोबिंद जी ने देहावसान से पूर्व तेग बहादुर की बजाय श्री हरिराय जी को गुरु गद्‌दी सौंपी, तो रंचमात्र भी विरोध-विवाद न किया शांति और सहिष्णुता के मसीहा, पुत्र तेग बहादुर ने। धार्मिक आजादी के परम मुद्‌दई गुरु तेग बहादुर जी के व्यक्तित्व और वाणी का मूल वाक्य था-
'भै काहू कउ देत नहि,
नहि भै मानत आनि॥'

यानी न किसी से डरो और न किसी को डराओ। डरा हुआ मनुष्य कायर होता है और डराने वाला अत्याचारी। गुरुजी अच्छी तरह जानते थे कि डरपोक व्यक्ति कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं कर सकता, फिर उससे जुल्म के खिलाफ अड़ने और लड़ने की उम्मीद करना, तो बहुत दूर की बात है। अतः उक्त उपदेश के जरिए उन्होंने लोगों को न केवल सहृदय और सबल बनने का आह्‌वान किया, बल्कि खुद भी उस पर व्यावहारिक रूप से अमल करके दिखाया। उन्होंने अपने आदर्शों से भारत जन को नई राह दिखाई।

गुरू नानक की सीख

एक बार गुरु नानक साहिब और उनके साथी रबाबी भाई मरदाना भ्रमण करते हुए एक ऐसे नगर में चले गए जहां किसी ने उन्हें बैठने तक की जगह नहीं दी। गुरु साहिब के उदासीन साधुओं वाले वेश देखकर लोगों ने उनका अपमान किया और उन पर पत्थर फेंके। गालियां भी दीं।

भाई मरदाना ने गुरु साहिब की ओर देखा, 'साहिब जी ये कैसे लोग हैं?'
गुरु जी ने गंभीरता से कहा, 'सदा बसते रहें इस नगर के लोग, और यहीं बसते रहें।

' वहां गुरु जी ने एक शबद का गायन भी किया जिस का भाव कुछ इस तरह का है, 'अगर मैं बातें करूं तो लोग कहते हैं कि बक-बक करता है। चुप रहूं, तो कहते हैं कि इसे समझ नहीं है। झुक कर रहता हूं, तो कहते हैं कि भय के कारण भक्ति करता है। चला जाऊं तो कहते हैं कि भाग गया है। कहां समय व्यतीत करूं? इसलिए परमात्मा ही मेरे सम्मान की रक्षा करेगा।'

गुरु जी और भाई मरदाना चलते हुए आगे एक और नगर में पहुंचे। लोगों को गुरु जी के पहुंचने का पता चला तो उन्होंने उनका बहुत आदर-सम्मान किया। वहां कीर्तन होने लगा, प्रभु केनाम का गायन किया जाने लगा। लोगों ने गुरु जी को ईश्वर का रूप माना और उनसे आशीष मांगा।

गुुरु जी प्रसन्न हुए और मुस्करा दिए। वहां उन्होंने आराम से रात बिताई।
सुबह गुरु जी वहां से चलने लगे तो उन्होंने कहा, 'यह नगर उजाड़ हो जाए... कोई भी यहां न रहे...।'
लोगों ने शीश झुका दिए। गुरु जी की बात को सुनकर भाई मरदाना ने पूछा- 'साहिब जी आपका यह कैसा न्याय है? जहां बैठने के लिए भी जगह न मिली, उन लोगों को आपने बसते रहने के लिए कहा, जिन लोगों ने सेवा बंदगी की उनका नगर उजाड़ बना रहे हो?

गुरु जी ने मुस्करा कर कहा-'मरदाना! ऐसा ही होना चाहिए।'
'मगर क्यों गुरुजी?' भाई मरदाना ने आश्चर्य से पूछा। गुरु जी ने कहा, 'पहले नगर के लोग किसी और नगर में जाएंगे तो वहां के लोगों को भी बुरे व्यवहार में लगाएंगे। इस नगर के लोग जहां कहीं भी रहेंगे, लोगों को अपने सदाचरण से नेक बनाएंगे। इसलिए, ऐसे स्वभाव वाले भले लोग एक ही जगह पर नहीं रहने चाहिए।'
उस समय भाई मरदाना पहले नगर के लोगों की दीन-हीन दशा के बारे में सोच रहा था। गुरु जी की बातें सुनकर कहने लगा, 'तो क्या उनका कल्याण नहीं हो सकता?'
'हो सकता है।' गुरु साहिब ने विश्वास केसाथ कहा।
'इसके लिए उन्हें क्या करना होगा?'

गुरु जी ने कहा- 'अभी तो वे लोग जीवन को खाने-पीने और मौज-मस्ती का साधन मात्र समझते हैं। जीवन केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं है। जीवन जन कल्याण के लिए है। उन्हें चाहिए, दूसरे नगर के लोगों से प्रेरणा लें। जीवन को केवल उदर पूर्ति के लिए न समझें। भले कामों में लगें। तभी उनका भला हो सकता है।'

धर्म और राष्ट्र एक दूसरे के प्रेरक हैं: स्वामी सत्यमित्रानंदगिरी जी महाराज

धर्माचार्य, साधु-संत तथा मठ-मंदिर नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए प्रयास क्यों नहीं करते?
मैं स्वंय यह अनुग्रह करता हूं। आज धर्माचार्यों व साधु-संतो को जगदगुरू शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ आदि की तरह धर्म व संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। मगर धर्माचार्यों की कथनी-करनी के अंतर ने उन्हें प्रभावहीन व तेजहीन बना डाला है, इसी कारण उनका प्रभाव नहीं पड़ता।

इसके बावजूद अभी भी देश में बहुत से आचार्य हैं, मठ-मंदिर हैं जो धर्म-संस्कृति के प्रचार में लगे हैं और सेवा, परोपकार आदि पुनीत कार्यों में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। अनेक धर्माचार्य तथा कथा-व्यास अपने कार्यक्रमों से प्राप्त धन को अस्पतालों, वनवासी क्षेत्रों में चलाए जा रहे सेवा प्रकल्पों, संस्कृत के अध्ययन, गोसेवा आदि कार्यो पर व्यय करे हैं।
ह्नआपके धार्मिक पुनर्जागरण के इतने प्रयासों के बावजूद दुनिया नैतिक मूल्यों के संकट से ग्रस्त है, क्यों?

अतिभौतिकता के कारण धार्मिक व नैतिक मर्यादाओं का हनन होता है। पहले लोग अपनी महान संस्कृति व परंपराओं के अनुरूप सरल व सात्विक जीवन बिताते थे। धार्मिक संस्कारों के कारण पाप कर्म करने, अन्याय व बेइमानी करने से डरते थे। उन्हें विश्वास था कि परमात्मा उनके कर्मो को देखता है। अच्छे कर्म करने से लोक-परलोक में सुख मिलेगा, पाप कर्म करने से नरक की यातनाएं भोगनी पड़ेंगी। दूसरी बात यह है कि स्वाधीनता के बाद हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बच्चों और युवा पीढ़ी को धार्मिक संस्कार देने बंद कर दिए गए।

कुछ बुद्धिजीवी आरोप लगाते हैं कि एक ओर देश में करोड़ों लोगों को भूखे पेट सोना पड़ता है, दूसरी ओर भव्य धार्मिक कार्यक्रमों पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसे अपव्यय बताते हुए वे इसे रोकने की मांग करते हैं।
ऐसी सोच उन लोगों की होती है जिनकी दृष्टि में नैतिक मूल्य व धर्म-संस्कृति का कोई महत्व नहीं होता। यदि अपव्यय रोकने की बात है तो ये सेकुलर सोच के बुद्धिजीवी उन कार्यक्रमों का विरोध क्यों नहीं करते जिनके जरिए करोड़ों रुपये खर्च करके बच्चों, युवाओं व महिलाओं के सामने प्रदूषित विचार, प्रदूषित दृश्य परोसे जा रहे हैं। मीडिया द्वारा प्रसारित इन विकृतियों व अश्लील दृश्यों को रोकने के लिए क्या उन्होंने कोई आवाज उठाई है? यदि धर्म प्रचार व मठ-मंदिरों पर व्यय से चिंतित इन बुद्धिजीवियों को वास्तव में गरीबों की चिंता है तो सबसे पहले शराबखानों को बंद कराने की मांग करनी चाहिए। नवधनाढ्य वर्ग लाखों रुपये अपने दुर्व्यसनों पर व्यय कर देता है। क्या ये बुद्धिजीवी कभी उन्हें इनसे मुक्त होने की प्रेरणा देते हैं?

हरिद्वार में भारत माता मंदिर की स्थापना की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
मैं प्रारम्भ से ही धर्म और राष्ट्र को एक दूसरे का प्रेरक मानता रहा हूं। धर्म संस्कारों को बनाता है। राष्ट्रभाव राष्ट्र और स्वधर्म पर बलिदान की प्रेरणा देता है, ऐसा मेरा स्पष्ट मत है। मैंने अनुभव किया कि स्वाधीनता के बाद बच्चों को राष्ट्रभक्ति तथा धर्म-संस्कृति के संस्कारों से वंचित करने के कारण राष्ट्रभक्ति की भावना शिथिल पड़ी है। मेरा सपना था कि देश में पुनः राष्ट्रभक्ति की भावना पनपे तथा देश की महान विभूतियों की स्मृति में एक अनूठे भारत माता मंदिर की स्थापना की जाए। मंदिर में जहां भारत माता की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, वहीं देश भक्त राष्ट्र सेनानियों की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मातृ मंदिर में वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक की महान माताओं की मूर्तियां हैं। संत मंदिर में विभिन्न संप्रदायों के धर्माचार्यों, संत-महात्माओं, ऋषि-मुनियों की प्रतिमाएं हैं तो शक्ति मंदिर, विष्णु मंदिर तथा शिव मंदिर में अवतारों व देवी-देवताओं को श्रद्धा-भक्ति के साथ प्रतिष्ठापित किया गया है। मेरी इच्छा थी कि पूरे देश के श्रद्धालु जब तीर्थयात्रा करते हुए हरिद्वार पहुंचे तो उन्हें वहां भारत माता मंदिर में अनेकता मे एकता की अनुभूति हो।

युवा पीढ़ी को पुनः संस्कारित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
सबसे पहले पाठ्य पुस्तकों में महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग, इतिहास की प्रेरक घटनाओं का समावेश किया जाना चाहिए जिससे युवा पीढ़ी को धर्म-संस्कृति व राष्ट्रभक्ति के महत्व से परिचित कराया जा सके। दूरदर्शन तथा मीडिया के जरिए दर्शकों को अश्लील सामग्री पहुंचाई जा रही है। इसे प्रभावी ढंग से रोका जाना चाहिए। युवा पीढ़ी को वृद्धों, माता-पिता तथा राष्ट्र के प्रहरियों का सम्मान करने की प्रेरणा दी जानी चाहिए। ये सारे काम शिक्षा व्यवस्था में सुधार से ही हो सकते हैं।

भारतीय आत्मा का विदेशी संत

लम्बी दाढ़ी, आंखों में गहरी शांति और चेहरे पर अद्‌भुत तेज। लगभग ५० वर्ष की आयु के अमरीकी डेविड फ्रॉली को देखकर लगता है जैसे प्राचीन भारत के किसी ऋषि से मिल रहे हों। अमेरिका स्थित 'अमेरिकन इंस्टीट्‌यूट ऍाफ वैदिक स्टडीज' के डाइरेक्टर डेविड फ्रॉली का झुकाव भारतीय धर्म, दर्शन के प्रति झुकाव १९ साल की उम्र से ही हो गया था।

साठ के दशक में उन्होंने योग के ऊपर कुछ किताबें पढ़ीं। धीरे-धीरे डेविड का मन उनमें इतना रमने लगा कि उन्होंने भारतीय धर्म, दर्शन, अध्यात्म, वेद, पुराण और उपनिषद आदि का एक सिरे से अध्ययन कर डाला। वह भारतीयता में ऐसे डूबे कि अपना नाम तक वामादेव शास्त्री रख लिया।

उनकी भारतीय धर्म, दर्शन पर लगभग २० से अधिक किताबें आ चुकी हैं। जहां भारत में वेद, ज्योतिष तंत्र-योग आदि का नाम लेना 'सांप्रदायिकता' और 'पिछड़ेपन' की निशानी माना जाता है। वहीं अमेरिका स्थित इस संस्थान में वेद, आयुर्वेद, ज्योतिष, योग, तंत्र और वेदांत आदि पर निरंतर शोध प्रकाशित होते रहते हैं। डेविड फ्रॉली को 'वेदांत' में आत्मिक रुचि है।

वे कहते हैं, 'आत्मा ही परमात्मा है। यानि भगवान हमारे अंदर है। उन्हें कहीं बाहर ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है। ऐसी गहरी शिक्षा केवल मुझे वेदांत में पढ़ने को मिली। अन्य किसी धर्मग्रंथ में ऐसी उदारता नहीं हो सकती। राम मंदिर मसले पर वह अपनी निर्भीक राय देते हैं हिंदुओं के लिए उस जगह का खास महत्व है। इसलिए मुसलमानों को वह जगह छोड़ देनी चाहिए। क्योंकि उनके लिए इसकी कोई खास अहमियत नहीं है। एक मस्जिद के टूटने को इतना बड़ा मसला बनाना नहीं चाहिए। भारत में पहले हिंदुओं के बहुत से पूजा स्थल तोड़े जा चुके हैं। इतिहास इस बात का गवाह है। इस मसले के इतना बढ़ जाने के लिए वह कोर्ट को जिम्मेदार मानते है, जहां यह पिछले ५० सालों से अटका हुआ है। उनका कहना है अगर अमेरिका की कोर्ट में यह मसला होता, तो कब का सुलझ चुका होता है।

हाल ही में शिक्षा पर लगाए जा रहे भगवाकरण के आरोपों के बारे में वह कहते हैं, अगर इसे इतिहास बदलना कहा जा रहा है, तो यही सही है। विदेशियों ने अगर आपकी पाठ्‌य पुस्तकों में इतिहास के नाम पर कुछ भी लिख दिया वह कैसे अंतिम शब्द हो सकता है। भारतवासियों को बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए, उनका इतिहास जिसे वह पढ़ रहे हैं, उसे विदेशियों ने औपनिवेशिक काल में केवल अपने फायदे के लिए लिखा था। जिन मैक्समूलर को यहां के लोग महाविद्वान मानकर उन्हें पूजते हैं, उन्हें जर्मनी में कोई नहीं जानता। मैं भारतीयों से यही कहना चाहता हूं कि अपने ऊपर भरोसा करना सीखें। अपने अतीत को अपनी नजरों से देखें और परखें। इस पर गर्व करना सीखें। जितने भी देश औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत रहे, सबने अपने इतिहास को बदला है। जिनमें से चीन एक है। यहां तक कि ब्रिटेन ने खुद अपने इतिहास में बदलाव किया है। हमारी बात ले लीजिए जब मैं छोटा था, तो मैंने इतिहास की किताबों में पढ़ा था कि रेड इंडियन बहुत बुरे होते हैं। वे लोगों को मारते हैं। जबकि आज नयी पीढ़ी पढ़ती है कि सफेद रंग के यूरोपियन रेड इंडियन को परेशान करते थे। इसलिए मैं भारतीयों से यही कहना चाहता हूं कि अपने अतीत को अपनी नजरों से तौलें और उस पर गर्व करना सीखें।

भारत जन के नायक हैं श्रीकृष्ण

भगवान श्रीकृष्ण ज्ञानातीत होने के साथ-साथ कालातीत भी हैं। वह भारतीय इतिहास को प्रभावित करनेवाले युगनायक रहे हैं। वह भारतीय जन के नायक हैं। मथुरा के कारागार में वासुदेव व देवकी की आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म तथा वृंदावन में उनका लालन-पालन हुआ, ऐसा शास्त्रों-ग्रंथों में वर्णित है।

करोड़ों हिन्दुओं के आस्थापुरुष श्रीकृष्ण के बारे में ऋगवेद के आठवें मंडल में मंत्रद्रष्टा ऋषि के रूप में हमें उल्लेख मिलता है, लेकिन उससे यह नहीं लगता कि वह देवकीपुत्र श्रीकृष्ण ही हैं। वे कोई और ऋषि भी हो सकते हैं। देवकीपुत्र श्रीकृष्ण की चर्चा छांदोग्योपनिषद में मिलती है, जहां उन्हें घोर आंगिरस का शिष्य बताया गया है। यहां भी उनके पिता का उल्लेख नहीं है। हालांकि ऋगवेद में आए उल्लेख के अतिरिक्त कुछ अन्य स्थानों पर श्रीकृष्ण का नाम आया है, जहां उन्हें यमुना के किनारे इंद्र से युद्‌ध करते हुए बतलाया गया है। उल्लेखनीय है कि वासुदेव कृ ष्ण की इंद्र से युद्‌ध की स्थिति बन गयी थी और तब उन्होंने गोवद्‌र्धन की सहायता से ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इससे कुछ विद्‌वानों का मत है कि वासुदेव कृष्ण का वैदिक कृष्ण से संबंध हो सकता है।

देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में वासुदेव कृष्ण का स्पष्ट उल्लेख महर्षि पाणिनी कीअष्टाध्यायी में है। इसी ग्रंथ में कृष्ण, अर्जुन और बलराम का भी उल्लेख मिलता है। अष्टाध्यायी में भगवान श्रीकृष्ण के दैवी और मानवीय दोनों ही रूपों के उल्लेख मिलते हैं। सबसे विस्तृत चर्चा उनकी महाभारत ग्रंथ में है। भारत के जन-जन की आस्था में बसे श्रीकृष्ण का वर्णन विदेशों में भी मिलता है। यूनानी शासक अगाथोलिक्स द्‌वारा जारी किये गये सिक्के में एक ओर सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण और दूसरी ओर हलधर बलराम की आकृतियां खुदी हुई मिलती हैं। श्रीकृष्ण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अभिलेख चित्तौड़ के निकट नागरी के घोसुंडी से प्राप्त हुआ है, जिसके अनुसार सर्वताक नामक एक व्यक्ति अपने को वासुदेव (कृष्ण) और संकर्षण (बलराम) का भक्त बतलाता है। इस वर्णन से लगता है कि सर्वातक कोई ब्राह्मण राजा था, जो अपने को अश्वमेधयाजी भी कहता था।

विभिन्न विद्‌वानों के मत को आधार मानें तो कृ ष्ण का जन्म द्‌वापर के उत्तराद्‌र्ध में हुआ था। पिछले ५१०० वर्ष से भी अधिक समय से कलियुग चल रहा है। इससे लगता है कि उनका जन्म लगभग छह हजार वर्ष पूर्व हुआ होगा। वैदिक कृष्ण को ही अगर हम वासुदेव कृष्ण मान लें, तो वह भारतीय काल गणना के अनुरूप बन जाएगा।


श्रीकृष्ण के जन्म को लेकर भारतीय इतिहास और वेदों की व्याख्या करनेवाले विद्‌वानों का चाहे जो मत हो, पर यथार्थ यही है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस भारतीय धरा पर अपनी लीलाएं कीं, जीवन का दर्शन भारतवासियों को अमूल्य धरोहर के रूप में दिया और आज भी वह भारतीय जन के नायक हैं।

भक्ति ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी

भारत ऋषि-मुनियों, ज्ञानी-ध्यानियों तथा विरक्त संत महात्माओं के कारण ही संसार भर में जगद्‌गुरु के रूप में विख्यात रहा है। शंकराचार्यजी द्वारा स्थापित चार पीठों गोवर्धनमठ (पुरी), ज्योर्तिमठ (बद्रीकाश्रम), श्रंगेरी मठ तथा शारदा पीठ (द्वारिका) में त्यागी, तपस्वी तथा विद्वान आचार्यों की गौरवपूर्ण परंपरा रही है।

इन्हीं आचार्यों में ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का अग्रणी स्थान रहा है।
स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी उन शंकराचार्यों में हैं, जिनसे दीक्षा ग्रहण कर स्वामी करपात्री जी महाराज, स्वामी अखंडानंद सरस्वती, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती, स्वामी परमानंद सरस्वती जैसी विभूतियां अपने को गौरवान्वित अनुभव करती थीं। संसार में योग का परचम फैलाने वाले महर्षि महेश योगी भी स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज के ही शिष्य थे।

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का जन्म अयोध्या नगरी के ग्राम गाना में मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी, २१ दिसम्बर सन्‌ १८९० को एक विद्वान मिश्र ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आठ वर्ष की अवस्था में ही यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न होते ही बालक ब्रह्मानंद को काशी भेजकर संस्कृत विघालय में प्रवेश दिला दिया गया। संस्कृत और हिंदी का अध्ययन करते समय मन में सांसरिक मोहजाल में न फंसकर सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के पुनीत कार्य में समर्पित होने का संकल्प ले लिया। इसके लिये साधना और तपस्या को आवश्यक मानकर वे हिमालय जा पहुंचे।

ब्रह्मानंद के परिवार वालों को जब पता चला कि वह काशी में विालय छोड़कर हिमालय की ओर चले गए हैं तो उनकी खोज की गई। एक बार तो उन्हें पकड़कर गांव ले जाया गया। किंतु उन्होंने स्पष्ट कह दिया-'मैं सांसारिक प्रपंचों में न पड़कर तत्व ज्ञान पाने का संकल्प ले चुका हूं।' माता स्वयं धर्म शास्त्रों की ज्ञाता थी। उन्होंने ब्रह्मानंद को विदा करते हुए कहा-'जाओ, साधना करो तत्व ज्ञान अर्जित करो भगवान का भजन करो किंतु दर-दर भिक्षा मांग कर पेट भरने वाले साधु न बन जाना।'

वे पुनः हिमालय की ओर चल पड़े श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य जी के दीक्षित शिष्य दंडी स्वामी कृष्णानंद सरस्वती उन दिनों उत्तरकाशी में साधनारत थे। उन्होंने इन्हें अनेक शास्त्रों का अध्ययन कराया। योगाभ्यास के साथ-साथ भगवद्भक्ति और साधना का मार्ग दिखाया। २५ वर्ष की आयु में उत्तरकाशी से ऋषिकेश पहुंचे। स्वामी कृष्णानंदजी से उनका ब्रह्म चैतन्य ब्रह्मचारी नामकरण कर दीक्षा दी। प्रयाग में कुंभ पर्व पर स्वामी कृष्णानंद ने ३६ वर्ष की आयु में उन्हें संन्यास की दीक्षा देकर स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती नामकरण किया।

उनके विरक्त जीवन, तेजस्वी व्यक्तित्व तथा प्रभावशाली प्रवचनों ने कुछ ही समय में उन्हें देश व्यापी ख्याति दिला दी। काशी, हरिद्वार, प्रयाग, पुरी व रामेश्र्वरम्‌ आदि स्थानों की यात्रा कर जब वे उपस्थित जनसमूह को सनातन धर्म के सिद्धांतों से अवगत कराते तो श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो उठते।

शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ पर १६५ वर्षों से कोई शंकराचार्य पद पर आरूढ़ नहीं थे। पर तीनों पीठ के शंकराचार्यों के विचार-विमर्श के बाद १ अप्रैेल १९४१ को उनका अभिषेक कर वहां के शंकराचार्य पद पर अधिष्ठित किया गया।

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने जोशी मठ में ज्योतिर्मठ आश्रम की स्थापना कराई। सन्‌ १९५३ में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रयाग पहुंचकर शंकराचार्यजी से आर्शीवाद लिया तथा धर्म प्रचार की योजना के प्रति सहमति व्यक्त की। राष्ट्रपति ने कहा था-श्री शंकराचार्य भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी हैं।

शंकराचार्य जी ने कलकत्ता में आयोजित एक महायज्ञ समारोह में प्रवचन में संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था-संस्कार ही कर्म का बीज है और वही सृष्टि का कारण है। जीव संस्कारों से दीक्षित होकर ही मानव जीवन को सफल बना सकता है। यदि कोई देश अपने देश के आध्यात्म विचारों तथा संस्कारों को त्याग देता है तो वह निष्प्राण हो जाता है। शंकराचार्यजी वेदों की सभी शाखाओं के पठन-पाठन संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार तथा धर्म और संस्कृति के संवर्धन के लिए पूरी कर्मठता से सक्रिय रहे।

२० मई १९५३ को उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। उनके द्वारा लिखित अनेक ग्रंथ आज भी धर्म और संस्कृति की अजस्र प्रेरणा देने में सक्षम हैं।

भगवान् महावीर

भगवान महावीर का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन बिहार प्रदेश में हुआ था। हम सभी जानते हैं कि वह जैन धर्म के चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे। समस्त राजपाट छोड़कर आत्मा की अनुभूति और मोक्ष प्राप्त करने के लिए उन्होंने मार्ग कृष्ण दशमी को दिगंबर दीक्षा ग्रहण की और वैशाख शुक्ल दशमी को पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया।

उन्होंने आत्मकल्याण की दृष्टि से तीन सिद्धांतों अनेकांत, अहिंसा और अपरिग्रह का प्रतिपादन किया। इनमें उनका अनेकांत दर्शन एक ऐसा सिद्धांत है, जिससे विश्व की समस्त प्रमुख समस्याओं के समाधान संभव है।

अनेकांत सिद्धांत विश्व को भगवान महावीर की मौलिक देन है। किसी भी वस्तु के स्वरूप की विवेचना के संदर्भ में भारतीय दर्शन के समन्वयात्मक पक्ष का अनुशीलन करते समय सभी का ध्यान इस सिद्धांत की ओर जाता है। भगवान महावीर ने इसे अनेकांतवाद की संज्ञा से प्रतिष्ठापित किया है।

सत्य को समझने में अनेकांत बहुत सहायक है। विशिष्ट और सूक्ष्म तथ्यों को समझने के लिए इस सिद्धांत की आवश्यकता न सिर्फ अध्यात्मशास्त्र को होती है, बल्कि जीवन व्यवहार शास्त्र में भी अनेकांत की स्थान-स्थान पर आवश्यकता होती है। व्यावहारिक जीवन में इस प्रकार केअनेकांतमयी दृष्टिकोण का लाभ बहुत है। समय की कमी है, धन की कमी है, साधनों की कमी है आदि बंधन हम अपने जीवन में इतने अधिक मान लेते हैं कि हम इन कमियों से जकड़ा हुआ-सा अनुभव करते हैं।

कभी विपरीत रूप से भी विचार किया जाना चाहिए कि हमारे पास कितना समय है या कितना धन या साधन है। ज्यों-ज्यों हम इस दिशा में सोचना शुरू करेंगे, हमें लग सकता है कि आगे बढ़ने, प्रसन्न रहने और सत्कार्य करने केलिए हमारे पास बहुत कुछ है। आज के मनोवैज्ञानिक कई समस्याओं को इसी सिद्धांत के जरिए हल करते हैं।

जातिवाद की समस्या पूरे देश में जहर फैलाए हुए है। सारे चुनावी समीकरण इसी आधार पर तय होने लगे हैं। यहां देश और देश का भविष्य मुख्य नहीं है। हममें से ऐसा कोई नहीं सोचता कि जाति के मोह में हम यदि किसी गलत व्यक्ति को नेता चुनते हैं, तो सारा देश बर्बाद हो जाता है। अनेकांत सिद्धांत इस मुद्‌दे पर आग्रही चिंतन प्रस्तुत नहीं करता। इसका चिंतन समग्रता से है, किसी जाति विशेष से नहीं। इसका चिंतन है कि समग्र जातियों का विकास तभी संभव है, जब संपूर्ण देश का विकास हो। हमारी जातिगत अस्मिता अलग है, लेकिन देशगत अस्मिता एक है। यही बात भाषा को लेकर उत्पन्न होती है। अनेकांत सिद्धांत कहता है कि बेशक हम अपनी मातृभाषा ही बोलें, यह हमारा अधिकार है। पर अपनी भाषा दूसरों पर जबरदस्ती थोपना या दूसरी भाषाओं का अपमान करना हमारे अधिकार में नहीं है।

अनेकांत दर्शन वस्तुतः विचार के विकास की चरम रेखा है। इससे वस्तु के उसी स्वरूप का दर्शन होता है, जहां विचार समाप्त हो जाते हैं। जब तक वस्तु स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तभी तक विवाद रहता है। केवल एकपक्षीय दृष्टि से चलने वाले विवाद या विचार अनेकांतात्मक वस्तुदर्शन केबाद अपने आप समाप्त हो जाते हैं।

अप्पर

अप्पर यानी पिता। सचमुच तमिलनाडु के भक्तों के पिता की तरह ही हैं अप्पर। उसी समय के एक और महान संत तिरुज्ञान संबंधर ने बचपन में कभी उन्हें देख कर कहा था अप्पर। और मरुलनीक्कियार हो गये अप्पर। कितनी अजीब बात है कि अप्पर के कोई संतान नहीं थी। लेकिन उन्हें सभी अप्पर कह कर पुकारते हैं। वह भोले बाबा के उपासक थे।

बीच में वह जैन धर्म की परिक्रमा भी कर आये थे। लेकिन वे अपने प्रिय शिव शंकर को भुला नहीं पाए। इसीलिए उनकी शरण में वापस लौट आये। उनके आराध्य भगवान शिव को अर्र्पित दो पद:-

यही है वह जगह
जहां भगवान शिव का वास है
देखो, उधर देखो
जिसने मिलन कराया है
चंद्रमा और गंगा के निर्मल जल का-
देखो, उसकी घुंघराली अलकों को देखो
देखो उसे, जो अपनी शरण में
आने वालों के लिए
बन जाता है अमृत
देखो उसे जिसने मिटा दिये
असुरों के वे तीन स्थान
जो लटके हुए थे हवा में
देखो उस प्रभु को देखो
जो भक्तों के लिए वही रूप धर लेता है
जिसकी करते हैं वे पूजा
देखो उसकी ओर देखो जिसने
किया है चारों वेदों का गान
देखो उसे जो छिपा है
वैदिक ऋचाओं और मंत्रों में
वही जो बसा है
समुद्र से घिरे गोकरणम में
सदा और सर्वदा।

मैं आया-नाचता और गाता
प्रभु के गीत,
और कहता रहा-
हे पावन प्रभु! तुम धन्य हो।
मैं उस प्रभु के गीत गाता रहा-
जिसके मस्तक पर है चंद्रमा
करता रहा आराधना उस देवी की
जो है फूल से भी कोमल
जब मैं आइयारु जा रहा था
जहां चक्रधारी भगवान विष्णु
कर रहे थे उस प्रभु की पूजा
मैंने देखा पंछियों के जोड़ों को
आते हुए चुपचाप वहां
और देखा!
प्रभु के पावन चरणों को
ऐसा दृश्य देखा मैंने-
जैसा पहले न देखा था कभी।

आदर्श मानवता के प्रति समर्पित संत कबीर

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय॥

आज से ६०० साल पहले (सन्‌ १३९८) ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा के दिन ब्रह्‌म मुहूर्त में मानवता के मसीहा संत सम्राट सदगुरु कबीर साहिब का अवतरण काशी में लहरतारा नामक स्थान में हुआ था। उनके जन्म के विषय में अलग-अलग धारणाएं हैं, लेकिन इन विभिन्न धारणाओं के पीछे न पड़ते हुए उनके द्वारा स्थापित मानवीय आदर्शों की बात करना ही उचित हो।

भारत एक बहुलवादी देश है। सदियों से यहां अनेक धार्मिक संप्रदायों का सह-अस्तित्व रहा है। यहां विभिन्न धर्मावलंबी एक-दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णुता रखते हुए उन्हें सम्मान देते आए हैं। अपवाद हो सकते हैं, किंतु सामान्य रूप से 'अनेकता में एकता' की भावना भारत में सदैव कायम रही है।

भारत में धर्मों के सह-अस्तित्व का मुख्य कारण सामान्य जन में यह सहचेतना है कि विभिन्न धर्म एक ही परमपिता तक पहुंचने के भिन्न-भिन्न साधन हैं। धर्म-पंथ भले ही अनेक हों, किंतु सभी का लक्ष्य एक है। अनेकता में एकता की समन्वयकारी दृष्टि का सभी धर्मों के संत-महात्माओं ने उपदेश दिए हैं। मुहम्मद, ईसा, नानक, बुद्ध, महावीर, कबीर से लेकर आधुनिक युग में रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ और महात्मा गांधी तक सभी इस विषय में एकमत हैं कि धार्मिक संप्रदाय अनेक हो सकते हैं, किंतु धर्म एक ही है।

कबीर दास जी मूलतः संत थे। कविता तो उनकी वाणी ही थी। इसलिए उन्हें संत कवि भी कहते हैं। निर्गुण भक्ति शाखा के प्रखर व महान संत कबीरदास जी आज के जनमानस को सूफी मत के रहस्यवाद के बहुत निकट हैं, इसलिए विशेषकर भारतीय संत समाज, चाहे वह मुसलिम हो, सिख हो, हिंदू हो या अन्य, सब के सब समान रूप से प्रभावित होकर उनके आदर्श वचनामृत का रसपान करते हैं। कबीर का नाम कबीर दास, कबीर साहब एवं संत कबीर जैसे रूपों में प्रसिद्ध है। यह मध्यकालीन भारत के महापुरुष थे और इनका परिचय, प्रायः इनके जीवनकाल से ही, सफल साधक, भक्त कवि, मत-प्रवर्तक अथवा समाज सुधारक मानकर दिया जाता रहा है। संत कबीरदास के नाम पर कबीर पंथ नामक संप्रदाय भी प्रचलित है। कबीरपंथी लोग इन्हें एक अलौकिक अवतारी पुरुष मानते हैं और इनके संबंध में बहुत सी चमत्कारपूर्ण कथाएं भी सुनी जाती हैं। इनका कोई प्रामाणिक जीवन वृत्त आज तक नहीं मिल सका है, जिस कारण इस विषय में निर्णय करते समय, अधिकतर जनश्रुतियों, ग्रंथों और विविध उल्लेखों तथा इनकी अभी तक उपलब्ध कुछ फुटकल स्थानों के अंतः साक्ष्य का ही सहारा लिया जाता रहा है।

कबीर की सामाजिक चेतना : संतों की आध्यात्मिक परंपरा में सामाजिक चेतना का एक विशेष स्थान होता है। इसलिए कबीर की सामाजिक चेतना का पुट बड़े विस्तार से दिखाई पड़ता है। समाज से नितांत निरपेक्ष भाव की कल्पना संत साहित्य में नहीं है। रुढ़िवादिता जन्य सामाजिक विकारों का निदान कर समाज के नवीन स्वरूप के निर्माण का विधान संतों ने निरंतर किया है, उन संतों में से संत कबीर का स्थान प्रमुख है। उनकी साधना विकास की भूमिका अवश्य है, किंतु उसका सामाजिक मूल्य भी है। इस सामाजिक चेतना स्वर में संत कबीर की वाणी उनकी आत्म संस्करण की धारणा एक मूल्यवान स्वरूप ग्रहण करती है। इसलिए समाज के लिए कबीर की वाणी एक आदर्श शिक्षक के समान है।

दार्शनिक विखंडताओं, सामाजिक वर्गगत जटिलताओं, रूढ़ियों तथा धार्मिक बाह्‌याचारों से त्रस्त जन-साधारण के लिए कबीर ने एक ऐसे वर्गहीन समाज की व्यवस्था का प्रयास किया है जिसमें जीवन की सरलता और सौंदर्य की सहज परख होती है। संत कबीर के दर्शन में समाज का खंडन नहीं बल्कि मंडन है। उन्होंने जीवन में जो कुछ सीखा समाज से सीखा और जो सिखाया वह समाज को सिखाया। कबीर ने समाज का बृहद्‌ स्वरूप प्रस्तुत किया है। संत समाज ही उनकी दृष्टि में आदर्श समाज है क्योंकि संत का संतत्व उसके जीवन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक दोनों ही पक्षों पर निर्भर करता है। संत जीवन की पहली कसौटी उसका लौकिक व्यवहार और स्वयं सिद्धत्व का गुण है। संत अपनी सदाचारी वृत्तियों से असंत को भी संत बना देता है। इसलिए संतों की महिमा का गुणगान कबीर ने मुक्त कंठ से किया है। (कबीर ग्रंथावली पेज ३८, ३९ साखी २ व ४)

संत और वैष्णव की कबीर दास ने सदा ही प्रशंसा की है। वैष्णव और संत दोनों ही सदाचारी हैं। सदाचार ही भक्ति की भूमिका है और भक्ति सदाचार को रंजक बनाती है। संत कबीर एक ऐसे समाज में विश्वास रखते हैं, जहां धर्मगत, संस्कारगत, व्यवसायगत और अर्थगत किसी प्रकार का विषम भाव नहीं। वे भेदभावना से ऊपर उठकर सबको समत्व की दृष्टि से देखते हैं। वे तो व्यक्ति की अंतर्निहित एकता में विश्वास रखते हैं। कबीर के उस वर्गहीन समाज में ब्राह्‌मण और शूद्र, हिंदू और मुसलमान में कोई जातिगत व धर्मगत भेद नहीं। जाति, धर्म, वर्गगत भेदभावना अनुदार और मानवता विरोधी है, छुआछूत एक भ्रम है। सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए संत कबीर ने छद्‌मवेश और पाखंडों की निंदा की, मिथ्याचारों पर अदम्य प्रहार किया, कुप्रथाओं की भर्त्सना की, निर्धन के शोषण से उपार्जित धन के बल पर विलासमय जीवन व्यतीत करने वाले पूंजीपतियों के आगे कनक और कामिनी की असारता सिद्ध की। समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता को मिटाने के लिए उन्होंने संचय की मनोवृत्ति पर कुठाराघात करते हुए कहा है कि लक्षाधीश को भी अंत समय खाली हाथ जाते देखा है। संचय की यह प्रवृत्ति चिंता का कारण है और समाज में अशांति एवं विषमता फैलाती है।

संत कबीर ने सत्य, क्षमा, दया, त्याग, विश्वबंधुत्व, विनय, समता, समदृष्टि, करनी और कथनी में एकता, संतोष, दीनता आदि के द्वारा समाज को उन्नत बनाने का प्रयत्न किया। सत्य आचरण, मानव प्रेम को प्रोत्साहित करता है, क्षमा व्यक्ति को उदार और महान बनाती है, दया धर्म का मूल है, त्याग संतोष का जनक है, विश्वबंधुत्व से भेदभावना मिटती है। संत कबीर कहते हैं कि विनय से अहंकार मिटता है और समता से विषमता का नाश होता है, कथनी और करनी की एकता से जीवन संतुलित होता है, संतोष से शांति मिलती है और दीनता से मन विकारहीन होता है।

लोक धर्म : आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की लोक धार्मिता का अत्यंत सूक्ष्मतापूर्वक संधान करते हुए संतों को लोक धर्म का बड़ा समर्थक माना है। वास्तविकता यह है कि कबीर आजन्म अपने व्यवसाय से इतने अधिक जुड़े रहे कि उनको भिक्षावृत्ति और परमुखोपजीविता से घोर घृणा होने लगी। 'आवाध राम सबै करम करिहूं' कहने वाला कबीर सामाजिक आबद्धता अथवा लोक आबद्धता को स्वीकार न करता हो, यह बात कुछ समझ में नहीं आती।

कबीर की धर्म-विषयक धारणा संकीर्णता से अछूती, व्यापक और उदार है। उनका सहज लोकधर्म स्वानुभूति पर आधारित है। भ्रम में भटकते हुए समाज को अंधविश्वासों, पाखंडों, रूढ़ियों, कोरे दार्शनिकवाद-विवादों की व्यर्थता सिद्ध करके कबीर एक ऐसे सहज धर्म को अपनाने का उपदेश देते हैं, जिसका आधार आंतरिक शुचिता, विचारों की पवित्रता, आचरण की सात्विकता है जिसमें दया, प्रेम, सेवाभाव, अहिंसा, सत्य और औदार्य गुण विमान है।

कबीर का मूलमंत्र 'मानवतावाद' है। उन्होंने जीवन पर्यंत अपनी विचारधारा को मानवतावादी दृष्टि से समलंकृत करने का प्रयास किया। उनका यह मानवतावाद मनुष्य जाति तक सीमित न रहकर पशु-पक्षी, जीव-जंतु तथा वनस्पति जगत तक प्रसारित है। युग-प्रवर्तक रामानंद से प्रेरित एवं अनुप्राणित होकर संत कबीर ने जाति-पांति की भेद भावना से ऊपर उठ 'हरि को भजै सो हरि का होई' का उद्‌घोष कर समस्त मानव जाति को समता के धरातल पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। इसी मानवीय एकता के प्रतिष्ठापन के लिए उन्होंने आध्यात्मिक क्षेत्र में एक ऐसे निर्गुण ब्रह्‌म की स्थापना की जो सभी वर्ग और जाति को स्वीकार हो। उनका वह ब्रह्‌म सभी का सृजनहार है। वह सभी में और सब उसी में वास करते हैं। जब 'हरि में ही पिंड और पिंड में हरि' विमान है तो मानव मानव में ऊंच-नीच की भेद भावना को स्थान कहां?

आदर्श ब्रहमचारी, अतुल पराक्रमी थे श्री परशुराम

श्री परशुराम भगवान् विष्णु के अंशावतार थे। धर्मग्रंथों में लिखा है श्री परशुराम का आर्विभाव वेंशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि के प्रदोषकाल में जिला इंदौर की तहसील महू के गाँव जम्दाग्नेश्वर में हुआ था। इनके प्राकव्य के समय छः ग्रह अपनी राशी अथवा उच्चा स्थिति में थे। दार्शनिक दृष्टि से ये तेज (अग्नि) तत्व के घनीभूत स्वरुप हैं।

इनके क्रोध से बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी कांपते थे। इन्होने कठोर तपस्य से भगवान् शंकर को प्रसन्न करके उनके अमोघ परशु को प्राप्त किया और इसे धारण करने के कारण ही राम से परशुराम कहलाए।

श्री परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि तथा माता रेणुका थीं। जमदग्नि पुत्र होने से उन्होंने 'जामदग्न' भी कहा गया। कहते हैं कि पुत्रोत्पत्ति के लिये रेणुका तथा विश्वामित्र की माता को प्रसाद मिला था, किन्तु देववश प्रसाद दोनों माताओं के बीच बदल गया। इसके फलस्वरूप रेणुका के पुत्र परशुराम जी ब्रह्मण होते हुए भी क्षत्रीय गुण सम्पन्न हो गए। इससे वे स्वभाव से उग्र तथा महान योद्धा बन गए, जबकि विश्वामित्र क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी ब्रह्मर्षि हो गए। परशुराम में ब्राह्मण और क्षत्रिय तेज का अपूर्व समन्वय मिलता है।

परशुराम जी अपने पिता के बड़े आज्ञाकारी थे। एक बार इनके पिता ने अपनी पत्नी से रूष्ट होकर अपने पुत्र को रेणुका का वध करने का आदेश दिया। पिता की आज्ञा को मानकर परशुराम ने अपनी पत्नी का सिर काट लिया। पिता ने प्रसन्न होकर जब इनसे वर माँगने को कहा, तो परशुराम ने अपनी माता को पुनः जीवित करने का वरदान माँगा। महर्षि के प्रताप से रेणुका जीवित हो गई।

परशुराम आदर्श ब्रह्मचारी होने से अतुल पराक्रम और उत्साह के मूर्तिमान स्वरुप हैं। भीष्म पितामह एवं कर्ण को धनुर्विद्या इन्होने ही सिखाई थी। सीता स्वयंवर में अपने गुरू शिव के धनुष को भगवान् श्री रामचंद्र द्वारा तोड़े जने पर ये महाराजा जनक के दरबार में पहुंचे। पहले तो श्री राम पर क्रोधित हुए, लेकिन बाद में इनका क्रोध शांत हो गया। भगवान् परशुराम के प्रति लोगों की अनन्य आस्था है। उनका तेज अतुलित था। उन्होंने यज्ञ और आदर्श आचार परम्परा के निर्वाह का नया सिद्धांत दिया।

श्री परशुराम से सम्बंधित तीर्थ
परशुराम कुंड यह अरूणाचल प्रदेश में है। कहते हैं कि यहाँ पर जिस जगह भगवान् परशुराम ने परशु मारा था, वहां से जल निकल आया। यहाँ स्नान करने से व्यक्ति ब्रह्म ह्त्या से छूट जाता है।
परशुराम आश्रम बलिया में भृगुक्षेत्र के पंचकोशी मार्ग में परसिया ग्राम हैं, वहां सरयू नदी के किनारे मनियार ग्राम में भगवान् परशुराम का आश्रम हैं। यहाँ के एक वृक्ष के नीचे उन्होंने तपस्या की थी।
परशुराम मन्दिर रुनकता मथुरा से 10 किमी पर रुनकता है। यहाँ महर्षि जमदग्नि का आश्रम था। ऊंचे पहाड़ पर माता रेणुका तथा जमदग्नि का मन्दिर है। नीचे परशुराम जी का मन्दिर है, जहाँ परशुराम जयन्ती पर मेला लगता है।
खाटी कपूरथला के फगवाड़ा से पांच किमी दूर भगवान् परशुराम मन्दिर है। इसे जमदग्नि का तापोस्थान कहा जाता है। गाँव में ब्राह्मणों का एक भी घर नहीं होने से मन्दिर की सेवा सिख समुदाय के लोग करते हैं। उन्होंने ही सड़क पर परशुराम गेटका भी बनवाया है।
रकासन राहों से 10 किमी दूर रेनुका का मन्दिर है। इसके साथ भगवान् परशुराम का टोबा भी है।

रिश्तों को बचाएं उलझने से

ईषा पढी-लिखी समझदार कामकाजी स्त्री थी। मुकुल भी आदर्श पति था। लेकिन जब भी परिवार के सभी लोग एक-साथ होते, ईषा के लिए वातावरण सुखद नहीं रहता। आशा के विपरीत मुकुल अपने घरवालों के साथ मिलकर ईषा का उपहास करने का एक भी मौका हाथ से न जाने देता। कब तक वह इसे मजाक समझ कर अनदेखा व अनसुना करती। उसका तनाव दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा था। ईषा अपवाद नहीं उसके जैसी अनेक पत्नियां हैं जो इन्हीं छोटी-छोटी बातों से बेवजह आहत होती रहती हैं। कई बार ये छोटी-छोटी शिकायतें इतनी बडी हो जाती हैं कि रिश्ते खोखले लगने लगते हैं। छोटे-छोटे मतभेद बडी तकरार या अहं के टकराव का कारण बन जाते हैं। यह जरूरी है कि इन उलझनों के पीछे छिपे कारणों को जाना और समझा जाए। आमतौर पर मतभेदों की मुख्य वजहें निम्न होती हैं:
1. साथी की कार्यशैली पर बार-बार टीका-टिप्पणी करना
2. व्यवहार और व्यक्तित्व में कमियां निकालना
3. तनाव के क्षणों में व्यर्थ कुतर्क करके परेशान करना
4.जब सहयोग की उम्मीद हो, तब व्यस्तता का बहाना बनाकर टालना
5. विचारों, व्यवहार और एटीट्यूड पर जबरन नियंत्रण की कोशिश
6. निष्ठा, दृढता और आत्मीयता पर सवाल उठाना
7. परिवार में योगदान को नगण्य मानना

ऐसे बढाएं कदम
अगर आपको अपने साथ ऐसा महसूस हो रहा है तो सचेत हो जाएं। समस्याएं उग्र रूप लें इससे पहले आपको इनके समाधान की दिशा में प्रयास शुरू कर देने चाहिए। हालांकि इसमें कोशिशें दोतरफा होनी जरूरी हैं। परंतु सामने वाले की ओर से पहल का इंतजार इतना भी न करें कि देर हो जाए। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि संबंधों को जीत-हार की भावना से लडकर बेहतर नहीं बनाया जा सकता। इन्हें बेहतर सिर्फ एक-दूसरे को समझकर ही बनाया जा सकता है। इसलिए इस दिशा में कदम बढाने से पहले अपने और अपने साथी के स्वभाव, उसकी आदतों और जरूरतों को भी समझने की कोशिश करें। साथ ही यह भी मानकर चलें कि दुनिया में कोई भी इंसान पूर्ण नहीं होता। कमियां आपमें भी हो सकती है और अपनी कमियों को स्वीकारना कोई हार नहीं है। बातचीत के दौरान अगर कहीं आपको लगता है कि गलती आपकी है तो उसे स्वीकारने में संकोच न करें।
इससे बेहतर परिणाम तो मिलेंगे ही, दोनों अपने को जीता हुआ महसूस करेंगे।

मतभेद सुलझाने के तरीके
अपनी भावनाओं को प्रकट करें। नम्र बनें, लेकिन दृढता व आत्मसम्मान कायम रखें। बिना उत्तेजित हुए खुद को सही साबित करने की कोशिश करें। शांत, उदार व समझदार बनें। गुस्से से कभी जीता नहीं जा सकता। अगर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण और भाषा पर काबू रखें तो ऐसे विवाद सुलझाने में सफलता की संभावना बढ जाती है। दोषारोपण के खेल से बाहर निकलिए। दूसरे की गलतियां निकालने से केवल आग में घी डालने का काम होता है। इसलिए सामने वाले की पूरी बात सुनने व समझने की कोशिश करें। कई बार ऐसा करने पर आप समझ पाएंगी कि सामने वाला सही था और कहीं आपसे भी चूक हुई है।
एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करें। दूसरे के प्रति आदर भाव एक सकारात्मक रवैया है, जो दुश्मन को भी अपना बना देता है। जब भी कभी मतभेदों के बीच आदर का भाव दिखता है, संबंधों के बीच तनाव कम होने लगता है। अपनी शिकायतों और इछाओं के बारे में स्पष्ट रहिए। भावनात्मक सहारे के लिए निरर्थक आरोप मत लगाइए। अपने विचारों की दिशा सही रखिए। अव्यावहारिक निर्णयों में कूदने की भूल न करें। पुराने घावों को भरने की कोशिश करिए न कि नए घावों को और बढाने का प्रयास करें। अनादर से दूरियां और बढती हैं। समझौते की ओर कदम बढाइए। यदि आपको लग रहा है कि आपके आसपास के लोग केवल आपकी गलतियों को ही इंगित कर रहे हैं या निष्पक्ष फैसला नहीं कर रहे तो आप किसी अन्य व्यक्ति को माध्यम बना अपनी बात रख सकती हैं।
ये संबंध दीर्घ और सुखद हों, यह हमेशा याद रखें। माफ करना सीखें- यह भूलने से भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

भावनाओं पर नियंत्रण
मैरिज कांउसलर डॉ.अनु गोयल कहती हैं कि मतभेद ऐसे अवरोधक हैं जो हर किसी के रास्ते में कभी न कभी किसी न किसी रूप में जरूर सामने आते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि आप इनसे दूर रहने व इनका हल निकालने की कोशिश करें न कि इन्हें बढाने या आग में घी डालने का। ख्ाुशी का वातावरण बनाए रखने की कोशिश करें। ऐसे अपवाद कम ही देखने को मिलेंगे जब कोई मतभेदों के बीच शांति न चाहता हो। कई बार इनसे बचने के लिए माफ करना ही एकमात्र हल होता है। यही रास्ता है जो तमाम तकरारों और मतभेदों के बाद भी आपको खुशी प्रदान कर सकता है। पर यह सब तभी संभव है जब पहले आप अपने डर, असुरक्षा और कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर चुकी हों। अन्यथा यह तेरा वो मेरा, यह गलत वह सही, तुम ऐसे मैं वैसी जैसे विचार मतभेदों को ही जन्म देते हैं। ऐसे में सबसे प्रभावी हल है, माफ करना या भूल जाना। यह सामान्य राय है कि आपको बहुत सी हिम्मत, विश्वास और प्रयास चाहिए अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने के लिए। लेकिन ऐसा हर समय नहीं होता। यह ठीक है कि इमोशंस पर नियंत्रण के लिए आपको हिम्मत जुटानी पडती है और विशेष प्रयास भी करने पडते हैं, लेकिन इससे ज्यादा हिम्मत जुटानी पडती है इन सबको सहने के लिए। कडवाहट को भुलाने में ही समझदारी है। बेहतर संबंधों के लिए कोशिशें हमेशा जारी रखें। इस बीच अपने को समय देना न भूलें। मन शांत व सुखी होने पर ही आप सही दिशा में सोच पाएंगी।

दोस्ती या रिश्तेदारी किसका पलड़ा भारी

ईगो से दूर रखें दोस्ती को
मधुश्री, गायिका
पारिवारिक संबंध के नाम पर मेरे जीवन में अब सिर्फ मेरी मम्मी और बहनें हैं, जो मुझे जी-जान से ज्यादा प्यार करती हैं। मैंने गायन के क्षेत्र में अपना करियर बनाने के लिए वर्षो पहले अपना शहर कोलकाता छोड दिया था। उसके बाद से रिश्तेदारों से मेरा संपर्क टूट सा गया। इसलिए मेरी जिंदगी में शुरू से ही दोस्तों की बहुत खास जगह रही है। मेरे स्कूल के दिनों की एक सहेली का नाम राखी है, उससे आज भी हमारी दोस्ती कायम है। इसी तरह मेरे कॉलेज के दिनों के दोस्त शुभ्रो से मेरी इतनी सच्ची दोस्ती है। आज भी जरूरत पडने पर हम एक-दूसरे की मदद को तैयार रहते हैं। मेरा मानना है कि दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है, जो सामाजिक बंधनों की सभी सीमाओं से परे है। अपने दोस्तों से मेरा बेहद बेतकल्लुफी का रिश्ता है। कभी-कभी हमारे बीच लडाई भी हो जाती है। लेकिन थोडी ही देर के भीतर हम ऐसे हंसने-बोलने लगते हैं जैसे हमारे बीच कभी कोई झगडा हुआ ही नहीं। मेरा मानना है कि दोस्ती में ईगो का टकराव नहीं होना चाहिए। अगर मेरा कोई खास दोस्त मुझसे नाराज होता है तो मैं इस बात का इंतजार नहीं करती कि पहले वह सॉरी बोले। जैसे ही मुझे इस बात का एहसास होता है कि मुझसे गलती हुई है, तो मैं तुरंत सॉरी बोल देती हूं।

जरूरी है विचारों का मिलना
शिखा शर्मा, डायटीशियन
मेरे लिए यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कोई व्यक्ति कैसा है? चाहे वह दोस्त हो या रिश्तेदार, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पडता। जिससे मेरे विचार मिलते हों, उससे बातें करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। मेरी एक खास सहेली है रेवा चोपडा, जो नर्सरी से बारहवीं तक मेरे साथ पढी है। अब वह साइंटिस्ट बन चुकी है और अमेरिका में रहती है, लेकिन उससे आज भी मेरी दोस्ती कायम है। यह बात सच है कि रिश्तेदारों की तुलना में दोस्त हमारे दिल के ज्यादा करीब होते हैं, क्योंकि दोस्ती में हम सहज होते हैं और रिश्तेदारों की तरह दोस्त हर बात पर शिकायत नहीं करते। अगर किसी से मेरी सच्ची दोस्ती है तो वर्षो बाद भी हम पहले जैसी गर्मजोशी से मिलते हैं। लेकिन रिश्तेदारी निभाने के लिए काफी मेहनत करनी पडती है। चाहे वह मेरा रिश्तेदार या दोस्त कोई भी हो, मतभेद होने पर अगर मुझे अपनी गलती महसूस होती है तो मैं बिना देर किए माफी मांग लेती हूं। अकसर लोग अपने करीबी संबंधों को गंभीरता से नहीं लेते। मैं इसे बहुत गलत मानती हूं किजो लोग हमेशा हमारे साथ रहते हैं, उन्हें हम सॉरी, थैंक्यू बोलने या उनके किसी अच्छे काम की प्रशंसा करने की जरूरत नहीं समझते। जबकि इन छोटे-छोटे शब्दों से रिश्ते और भी प्रगाढ हो जाते हैं।

बहुत खास जगह है दोस्तों की
मैत्रेयी पुष्पा, साहित्यकार
मेरे लिए तो दोस्त ही सब कुछ हैं। मुझे अपने दोस्त इसलिए अच्छे लगते हैं क्योंकि दोस्त हम अपनी मर्जी से चुनते हैं, जबकि रिश्तेदार हमारे लिए पहले से ही तय होते हैं, उन्हें बदल पाना संभव नहीं है। रिश्तेदारी में अगर कोई व्यक्ति हमें नापसंद हो तब भी मजबूरी में उससे संबंध निभाना ही पडता है। जबकि दोस्ती में ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती। हम अपने दिल की जो बातें माता-पिता या भाई-बहनों से नहीं कह पाते वे सारी बातें दोस्तों से कहते हैं। जहां तक मेरे दोस्तों का सवाल है तो बचपन से अब तक कई लोगों से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हुई और आज भी पुरानी सहेलियों से संपर्क बना हुआ है। मेरी बचपन की सहेली कांति भोपाल में रहती है। आज भी जब मैं भोपाल जाती हूं तो उससे जरूर मिलती हूं। निर्मला राजे मेरे कॉलेज के दिनों की घनिष्ठ सहेली हैं, जिनसे अब भी मिलना-जुलना होता रहता है। इसके अलावा साहित्यिक जगत में राजेंद्र यादव मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं, जिन्होंने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया है। हालांकि भारतीय समाज में आज भी स्त्री और पुरुष की मित्रता को लोग शक की निगाहों से देखते हैं, लेकिन मुझे इन बातों से कोई फर्क नहीं पडता। मेरा मानना है कि संकट की घडी में दोस्त ही आपके काम आते हैं। रिश्तेदार और जाति-बिरादरी के लोग मदद करने के बजाय अकसर मुश्किलें बढा देते हैं।

दोनों की है अहमियत
अंशु पाठक, इंटीरियर डिजाइनर
मेरा मानना है कि किसी भी इंसान के सामाजिक जीवन में रिश्तेदारों और दोस्तों की समान अहमियत होती है। दोनों में से किसी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मुझे ऐसा लगता है कि स्त्रियों के जीवन में रिश्तेदारों का स्थान ज्यादा महत्वपूर्ण होता है क्योंकि किसी लडकी की शादी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार से होती है। इसलिए शादी के बाद पति के रिश्तेदारों से बेहतर संबंध बनाए रखने की जिम्मेदारी पत्नी की ही मानी जाती है। हालांकि मुझे ऐसा लगता है कि दोस्ती की तुलना में रिश्तेदारी निभाना ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि रिश्तेदारी में अपेक्षाएं अधिक होती हैं। इसके अलावा रिश्तेदार दूसरों से आपकी बुराइयां करने से भी बाज नहीं आते। फिर हमें सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए संतुलन बनाकर चलना पडता है। आज की दिनचर्या इतनी व्यस्त है कि लोगों के पास एक-दूसरे से मिलने-जुलने का समय नहीं होता। लेकिन ई मेल और एसएमएस जैसी आधुनिक तकनीकों के कारण अब समय के अभाव में भी दूर बैठे दोस्तों और रिश्तेदारों से संपर्क कायम रखना आसान हो गया है।

गहरा होता है खून का रिश्ता
रानी खानम, कथक नृत्यांगना
वैसे, तो हर संबंध की अपनी अलग गरिमा और अहमियत होती है। हमारे लिए दोस्त और रिश्तेदार दोनों ही जरूरी हैं। लेकिन मुझे ऐसा महसूस होता है कि खून का रिश्ता बहुत गहरा होता है। कई बार रिश्तेदार भी बहुत अच्छे दोस्त साबित होते हैं। रिश्तेदार हमारे पारिवारिक जीवन से संबंधित होते हैं। भले ही उनके साथ लंबे अरसे से हमारा मिलना-जुलना न हो, फिर भी जब कभी उनसे हमारी मुलाकात होती है तो हम उनके साथ अलग ही तरह का जुडाव महसूस करते हैं। उनसे जुडी सारी पुरानी यादें फिर से ताजा हो उठती हैं। मेरा मानना है कि चाहे दोस्ती हो या रिश्तेदारी, किसी भी इंसान को अपने संबंधों का निर्वाह बहुत ईमानदारी से करना चाहिए। जिंदगी में दोनों रिश्ते होने बहुत जरूरी हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो रिश्तेदारों के बिना अपना पूरा जीवन गुजार देते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम होता कि वह जीवन की ढेर सारी खुशियों से वंचित रह गए। दोस्तों की भी हमारी जिंदगी में खास जगह होती है क्योंकि उनके साथ हमारा बेहद बेतकल्लुफी भरा रिश्ता होता है। जहां तक मेरी जिंदगी का सवाल है तो मेरी दोनों बडी बहनों शमशाद और शहनाज से मेरा बेहद दोस्ताना रिश्ता है और हर जरूरत पर वे हमेशा मेरी मदद के लिए हाजिर होती हैं।

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