23 नवंबर 2011

प्रेम के चार रूप : भक्ति, श्रद्धा, मैत्री और स्नेह

जीवन के दो रूप हैं- स्वार्थ केन्द्रित और पर-केन्द्रित। एक तीसरा रूप है- परमार्थ- केन्द्रित जिसमें स्वार्थ और पर का भेद समाप्त हो जाता है। स्वार्थ- केन्द्रित जीवन भोग है, पर- केन्द्रित त्याग है और परमार्थ- केन्द्रित प्रेम है। भोग में घुटन है, त्याग में कष्ट है, प्रेम में आनंद है।

इसमें प्रेम के चार रूप हैं- भक्ति, श्रद्धा, मैत्री और स्नेह। अस्तित्व- मात्र के प्रति भक्ति है, बड़ों के प्रति प्रेम श्रद्धा है, बराबर वालों से प्रेम मैत्री है और छोटों के प्रति प्रेम स्नेह है। प्रेम के इन चारों ही रूपों में अहंकार का विसर्जन रहता है जिसे हमने अस्तित्व कहा उसे सामान्य भाषा में भगवान् कहते हैं। हम अस्तित्व का एक भाग हैं। इस बोध में भक्तिभाव उत्पन्न होता है। अस्तित्व ही अस्तित्व के लिए कुछ कर रहा है, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। यह भावभक्ति है।

अस्तित्व निराकार है। वह साकार बनता है हमारे परिवेश के रूप में। माता-पिता, गुरूजन भी अस्तित्व का ही रूप हैं। इसलिए इन्हें हम भगवान् ही कहते हैं-
"गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु:, गुरूर्देवो महेश्वर:। गुरू: साक्शात्परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।"
गुरूजनों के प्रति यह श्रद्धा हममें नमनीयता लाती है, ग्रहणशीलता लाती है। हम ग्रहणशील होते हैं तो कुछ सीख पाते हैं- 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्'। उद्दण्ड व्यक्ति कुछ नहीं सीख पाता। श्रद्धा में झुकना पड़ता है तो अहंकार छोड़ना पड़ता है। बराबर वालों से मैत्री होती है| मैत्री में परायापन नहीं होता। जिस रहस्य को हम किसी से नहीं कह सकते उसे मित्र से कह कर मन हल्का कर लेते हैं। मित्रता में अद्वैत रहता है। यह अद्वैत भी भगवान् का ही एक रूप है। अर्जुन की श्रीकृष्ण से मैत्री थी तो उसके लिए श्रीकृष्ण भगवान् ही बन गये।

अपने से छोटों के प्रति प्रेम स्नेह कहलाता है। यही वात्सल्य-रस है। हमारे यहाँ एक शब्द प्रचलित है- बाल-गोपाल। अर्थ यह है की छोटे बच्चे भी भगवान् का ही एक रूप हैं। वे सब कार्य नि:स्वार्थ-भाव से करते हैं। वे सरल होते हैं। उनमें अपने पराये का भेद नहीं होता। साधना का उत्कृष्ट रूप यह है की व्यक्ति बच्चा बन जाये। इस प्रकार प्रेम नर में ही नारायण की प्रतिष्ठा कर देता है। सेवा, त्याग, तपस्या आदि नैतिकता के शब्द हैं; प्रेम अध्यात्म का शब्द है। नैतिकता में दबाव रहता है कर्तव्य-भावना का। प्रेम में कोई दबाव नहीं होता।

अहंकार का पत्थर हटे तो प्रेम का झरना फूट सकता है। प्रेम ही ज्ञान है- 'ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' प्रेम ही जीवन है। प्रेम के बिना व्यक्ति का सांस लेना ऐसा ही है जैसा लोहार की धौंकनी का चलना।

जीवन जीने की कला : जरा रखिये सकारात्मक सोच

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धैर्य और आशा के साथ अपने प्रेरणा पूर्ण नवाचारों के माध्यम से लक्ष्य प्राप्ति के दृष्टिकोण को पूरा करने में समर्थ एवं सफल होने को ही सकारात्मक सोच कहा गया है।

सकारात्मक सोच क्यों-
इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, और चेतना के विकास के साथ ही मानव ने प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया जो अन्य जातियां नहीं कर सकी, और उन्हीं प्रश्नों को पूरा करने की चाह में आज हम कहाँ आ पहुंचे हैं।
आज प्रत्येक व्यक्ति की परम इच्छा होती है की लोग उसकी प्रशंसा करें, उसके कार्य को सराहा जाए, उससे मिलना एवं बात करना पसंद करें, और यही प्रश्न वह अपने आप से पूछता है की मैं अपने आप में ऐसा क्या आकर्षण निर्मित करूँ कि मेरे प्रश्नों का हल प्राप्त हो जाए।
आकर्षण का नियम जीवन का महान रहस्य है।
आकर्षण का नियम कहता है कि सामान चीजें, सामान चीजों को आकर्षित करती हैं, इसलिए जब आप एक विचार सोचते हैं तो आप उसी जैसे अन्य विचारों को अपनी और आकर्षित करते हैं।
विचार चुम्बकीय है और हर विचार की एक फ्रिक्वेंसी होती है, जब आपके मन में विचार आते हैं तो वे ब्रह्माण्ड में पहुँचते है और चुम्बक की तरह उसी फ्रिक्वेंसी वाली सारी चीजों को आकर्षित करते हैं। हर भेजी गयी चीजें स्त्रोत तक यानी आप तक लौटकर आती हैं।
आप मानवीय ट्रांसमिशन टाँवर की तरह हैं और अपने विचारों की फ्रिक्वेंसी प्रसारित कर रहें हैं, अगर आप अपनी जिंदगी में कोई चीज बदलना चाहते हैं तो अपने विचार बदलकर फ्रिक्वेंसी बदल लीजिये।
आपके वर्त्तमान विचार आपके भावी जीवन का निर्माण कर रहे हैं। आप जिसके बारे में सबसे ज्यादा सोचते हैं, या जिस पर सबसे ज्यादा ध्यान केन्द्रित करते हैं, वह आपकी जिंदगी में प्रकट हो जाएगा।

आपके विचार वस्तु बन जाते हैं-
आपके विचार वस्तु कैसे बन जाते हैं, आपको बताना चाहूंगा इस कहानी से: अफ्रीका का एक कबीला जिसके बारे में कहावत थी कि वे जब भी डांस करते हैं, बारिश होती है, तब उनसे इसका राज जाना गया तो पता चला कि वो तब तक डांस करते हैं जब तक वर्षा नहीं हो जाती।

सकारात्मक सोच कैसे-
वजन कम करने के लिए वजन कम करने पर ध्यान केन्द्रित न करे। इसके बजाय अपने आदर्श वजन पर ध्यान केन्द्रित करें। अपने आदर्श वजन की संभावनाएं महसूस करेंगे तो आप इसका आह्वान करके इसे अपनी और आकर्षित कर सकेंगे।
आकर्षण के नियम की शक्ति महसूस करने के लिए छोटी चीजों से शुरूआत करें, सफलता मिलने पर बड़ी चीजों की कल्पना करने लगेंगे। उम्मीद एक प्रबल आकर्षण शक्ति है उन चीजों की उम्मीद करें जिन्हें आप चाहते हैं उन चीजों की उम्मीद न करें, जिन्हें आप नहीं चाहते है। आकर्षण के नियम का लाभ लेने के लिए इसे सिर्फ एक बार की घटना न बनाकर इसको आदत में शामिल कर लें।
हंसी, खुशी को आकर्षित करती है। नकारात्मक को नष्ट करती है और चमत्कारिक इलाज की और ले जाती है क्योंकि खुशी के साइड इफेक्ट्स पर किये गये शोधों में पाया गया है कि खुश लोग ज्यादा सफल होते हैं, क्योंकि खुश लोग -
-    मजबूत रिश्तों का आनंद उठाते है।
-    कम बीमार पड़ते है।
-    उम्मीद हमेशा ज़िंदा रखते है।
-    बुरे अनुभवों से जल्दी उभर जाते है।

महत्वपूर्ण बातें -
-     आप अपने आपको अभी अच्छा महसूस करें।
-     काम को इस तरीके से करे जिससे आप खुशी महसूस करें, जिससे खुशियाँ आपकी तरफ दौड़ी आयेंगी।
-     आलोचना करने से कभी कोई सुधरता नहीं अलबत्ता सम्बन्ध जरूर बिगड़ जाते हैं।

लोगों को प्रभावित करने के मूल तरीके -
-     बुराई मत करों, निंदा मत करो, शिकायत मत करो।
-     सच्ची तारीफ़ करने की आदत डालिये।
-     सामने वाले आदमी में प्रबल इच्छा जगाइये।

लोगों का चहेता बनने के तरीके -
-     दूसरे लोगों में सचमुच रुचि लें।
-     मुस्करायें।
-     याद रखें किसी व्यक्ति का नाम उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण और मधुरतम शब्द होता है।
-     बोलने वाले सबकी पसंद नहीं होते किन्तु सुनने वाले सबको भाते हैं, अच्छा श्रोता बनाने का प्रयास करें।
-     सामने वाले व्यक्ति की रुचि के विषय में बात करें।
-     सामने वाले व्यक्ति के महत्वपूर्ण होने का अहसास करायें और ईमानदारी से करायें।
-     गलती मानने का अर्थ यह है कि अब आप पहले से बेहतर है।

लोगों से अपनी बात कैसे मनवायें -
-     बहस से एक ही फायदा हो सकता है और वह है इससे बचना।
-     दूसरे व्यक्ति के विचारों के प्रति सम्मान दिखाएँ और यह कभी नहीं कहे- "आप गलत है"
-     अगर गलती आपकी हो तो तत्काल और पूरी तरह अपनी गलती मान लें।
-     बातचीत दोस्ताना तरीके से शुरू करें।
-     सामने वाले से तत्काल हाँ हाँ कहलवाने का प्रयास करें।
-     सामने वाले आदमी को ज्यादा बातें करने दें।
-     दूसरे व्यक्ति को यह लगने दे कि यह विचार उसी का है।
-     ईमानदारी से सामने वाले व्यक्ति का नजरिया समझने की कोशिश करें। सामने वाले व्यक्ति के विचारों और इच्छाओं के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करने का प्रयास करें।
-     तारीफ़ और सच्ची प्रशंसा से बात शुरू करें।
-     लोगों की गलतियाँ सीधे तरीके से न बतायें।
-     किसी की आलोचना करने से पहले अपनी गलती बतायें।
-     सीधे आदेश देने की बजाय प्रश्न पूछना अधिक बेहतर होगा।
-     थोड़े से भी सुधार की तारीफ़ करें और हर सुधार पर तारीफ़ करें।
-     सामने वाले व्यक्ति को कई काम इस तरह सौपें कि वह आपका कहा काम खुशी से कर दें।

यदि यह सब अपने दैनिक जीवन में कर सकें तो अच्छा होगा।
                                                                                                                                                                          - कपिल, अलवर

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