24 अप्रैल 2010

रामनगर महल और उसकी चित्रकारी


हजारों वर्षों तक प्राकृतिक आपदाओं और इंसानी बर्बरता का कहर झेलने के बावजूद भारत में चित्रकला आज भी जीवित है। अजंता की गुफाओं (महारास्ट्र में औरंगाबाद जिला) में मौजूद भित्तिचित्र दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पांचवीं शताब्दी तक की भारतीय चित्रकला के सम्रद्ध सांस्कृतिक विरासत और परम्परा की दास्ताँ ब्यान करते हैं। इन 29 बौद्ध गुफाओं को ज्वालामुखीय शैल सतह पर बड़े परिश्रम और लग्न से बनाया गया है ताकि ये सजीव प्रतीत हों। इतना समय गुजरने के बाद भी अजन्ता के समृद्ध परम्पराएं आज भी अक्षुण्ण हैं, जबकि इन्हें कलाकारों द्वारा बाद के काल में चित्र संबंधी बनावट, चित्रण और रंगों को बेहतरीन ढंग से मिलाने की जानकारी होने से पहले बनाया गया था। जैन सम्प्रदाय के व्यापारी वर्ग ने धार्मिक पारंपरिक संरक्षण के माध्यम से चित्रकला परंपरा को अपने मंदिरों की दीवारों, ताड़पत्रों आदि पर चित्रकारी करके उसे जीवित रखा। देश की सीमाओं पर बार-बार आक्रमण होने के कारण 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में कला की क़द्र घटने लगी तो वैष्णव धर्म के लोकप्रिय सम्प्रदाय ने उत्तरी भारत में समाज के विभिन्न वर्गों में भक्ति आन्दोलन चलाया। भक्ति आन्दोलन भगवान् विष्णु, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम और भगवान् कृष्ण के अवतारों पर केन्द्रित था, जिससे विविध कला रूपों को प्रोत्साहन मिला।
राजस्थान और पहाडी रियासतों के राजा राम लीला और कृष्ण लीला से काफी प्रभावित थे। उन्होंने कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया तथा भक्ति काव्य को चटकीले रंगों में चित्रित करने का आदेश दिया और इन चित्रकलाओं के कारण ही अविभाजित पंजाब में पहाडी शैली के विभिन्न लघु चित्रकला शैलियों का आर्विभाव हुआ। पहाडी शैली की चित्रकला का विकास भसौली, जम्मू, कांगडा और गुलेर रियासतों के दायरे में हुआ, जबकि 16वीं शाताब्दी के दौरान कुछ अन्य रियासतें अपनी निजी स्थापित करने का प्रयास कर रही थीं। इन रियासतों के जागीरदारों में आपस में कला को लेकर होड लगी हुई थी। उन्होंने अपने उभरते कलाकारों का एक दल बनाने तथा नए कलाकारों को प्रशिक्षित करने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करना प्रारंभ किया। परिणामस्वरूप, ऊधमपुर, रियासी, बंद्राल्टा (रामपुर), चम्बा, कुल्लू, मण्डी, बिलासपुर आदि जैसी पहाडी रियासतों ने लघु चित्रकला परम्पराओं में नई ऊंचाइयां छूने का प्रयास किया। मुग़ल काल में औरंजेब की ताजपोशी होने के बाद मुग़ल दरबार के कलाकार दूसरी रियासतों को पलायन कर गए क्योंकि मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने बादशाह अकबर के दरबार में नियुक्त बहुत से दरबारी चित्रकारों को संरक्षण देना बंद कर दिया था।

जम्मू लघु चित्रकला शैली में पुंछ, रामनगर, रियासी चित्रकला परंपरा शामिल हैं जो अपने रंगो, चित्रों और आत्मपरक सौंदर्य की दृष्टी से विख्यात हैं। यह चित्रकारी देवी-देवताओं के तीन उपाख्यानों प्राकृतिक सौन्दर्य की सुरम्य प्रस्तुति, फूलों तथा किनारों पर ज्यामिति डिजाइन तक ही सीमित है। यह चित्रकारी रामायण और महाभारत पर आधारित है। प्रेम को भारतीय चित्रकला परम्परा के मुख्य प्रतीक चिन्हों जैसे राधा-कृष्ण, पक्षियों की जोड़ी, उमड़ते-घुमड़ते मेघों, केले और कचनार के पेड़ों, आम्रवनों, कमल आदि के माध्यम से दर्शाया गया है। लाल, नीला और पीला रंग क्रमश: सृष्टी, जीवन और मृत्यु का प्रतीक माना जाता है। कैनवास या चित्रकला की पृष्ठभूमि को और अधिक आकर्षक तथा चमकदार बनाने के लिये अंडे की जर्दी, उबलते चावलों की मांड, जैविक बीजों, शीरे और पशुओं की हड्डियों के चूर्ण आदि का इस्तेमाल किया जाता था।

रामनगर, जो ब्रांद्राल्टा राज्य की तत्कालीन राजधानी थी, हरी-भरी शिवालिक पहाड़ियों के बीच, मध्य-हिमालय पर्वत श्रृंखला में रामनगर खड्ड के बायें तट पर स्थित है। यह स्थल धार सड़क के किनारे ऊधमपुर से पश्चिम में लगभग 40 कि.मी. पर तथा जम्मू से लगभग 105 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। रामनगर की पहाड़ियों पर बसा यह स्थान शहर की भाग-दौड़ वाली जिन्दगी से दूर एक खूबसूरत जगह है, जहाँ से घाटी का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

रामनगर महल परिसर किले की पश्चिम चारदीवारी से होकर गुजरने वाले नाले के ठीक ऊपर रामनगर की पहाड़ियों की ढलान पर बना है। सम्भवत: यह नाला चट्टानों में बने गहरे दर्रे से महल को सुरक्षा प्रदान करता होगा।

पूरा महल रामनगर शहर से अधिक ऊंचे स्थान पर है जहाँ से पहाडी की ढलान पर मुख्य सड़क दिखाई देती है। परिसर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की और है, जिसका रास्ता उत्तर दिशा में स्थित है शीशा महल और दक्षिण हिस्से में स्थित एक हांल, जिसे दरबार हांल के नाम से जाना जाता है, से होकर गुजरता है।

शीश महल परिसर के प्रवेश द्वार तक सीढ़ियों से चढकर पहुंचा जा सकता है जहाँ एक खुली ड्योढी है। सामने की और दोनों तरफ बने विशाल चबूतरों सहित खुले बुर्ज हैं, जो किले का आभास कराते हैं। यहाँ तीन पुरानी तोपें हैं जिन्हें रामनगर के किले से लाया गया था। मुख्य प्रवेश द्वार से पहले आँगन से ऊंची जगह पर शीश महल है जिसमें रामनगर की लघु चित्रकला शैली के खूबसूरत लघु-चित्रों को प्रदशित किया गया है।

दरबार महल में भित्तिचित्र हैं जो रामायण, भागवत और पुराणों के प्रसंगों पर आधारित हैं। इसके अलावा, यहाँ राजा सुचेत सिंह के चित्र भी हैं। उत्तर दिशा की और आगे जाने पर एक शीश महल आता है, जिसकी दीवारों को विभिन्न डिजाइनों में बड़े आकार के कांच और छोटे शीशों से सजाया गया है तथा बाद में विक्टोरिया परिधान में खूबसूरत फ्रांसीसी महिलाओं की अर्द्ध-प्रतिमाओं के फ्रांसीसी लीथोग्रफ भी लगाए गए।

रंगमहल की दीवारों को बारीक शीशे की उत्कृस्ट कारीगरी से सजाया गया है और पट्टियों पर शिकार करते हुए और दरबार के दृश्यों के अलावा नायिकाओं, रागनियों और कृष्ण-लीला के दृश्यों को प्रदशित किया गया है। चित्रित पट्टियों के बीच में कुछ शीशे लगे हुए थे, ब्रिटिश काल के दौरान उनकी जगह पर खूबसूरत महिलाओं के फ्रांसीसी लीथोग्राफ लगा दिए गए।

रामनगर शहर शिवालिक पहाड़ियों के प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ है जिसमे अनेक झरने बहते हैं, जो इसकी आसपास के परिवेश को हरा-भरा रखते हैं। यह क्षेत्र कभी पहाडी रियासत हुआ करता था, जिस पर चन्द्र वंश के चम्बा शासक के परिवार से जुड़े बंद्राल राजपूत शासन किया करते थे। बंद्राल्टा राजा भूपेन्द्र देव ने, सिक्ख फौजों द्वारा उन्हें गद्दी से उतारे जाने तक यहाँ सन 1821 ईस्वी तक शासन किया। राजा को मजबूर होकर रामनगर छोडना पडा और उन्होंने अम्बाला (हरियाणा) की पहाड़ियों में शरण ली। रामगर प्राचीन बंद्राल्टा रियासत की राजधानी भी रह चुका है और इसकी बागडोर राजा सुचेत सिंह को सौंपी गयी थी, जो महाराजा रणजीत सिंह (सन 1819-39 ईस्वी) के सिक्ख दरबार में जांबाज सिपहसालार थे। राजा सुचेत सिंह, जम्मू के राजा गुलाब सिंह के भाए भी थे, जो प्राचीन बंद्राल्टा राज्य के शासक बने।

बंद्राल्टा जागीरदारों ने राजा सुचेत सिंह के शासन काल के दौरान 19वीं शताब्दी में इसका नाम बदलकर रामनगर कर दिया। राजा सुचेत सिंह कला और वास्तुकला के महान पारखी थे। उन्होंने रामनगर महल में काफी रूचि दिखाई और शीश महल तथा पुराना महल का निर्माण करवाया। उन्होंने शहर में स्थित किले का जीर्णोद्वार भी करवाया। सन 1844 ईस्वी में रामनगर पर गद्दीनशीं होने के बाद राजा रामसिंह ने नया महल बनवाया। वे रणबीर सिंह के पुत्र थे, जो 1856 ईस्वी में जम्मू व कश्मीर के महाराजा बने और उन्होंने 1880 ईस्वी तक राज किया। राजा सुचेत सिंह ( सन 1801-1844 ईस्वी) और राजा राम सिंह दोनों का कोई वारिस नहीं था, जिसके परिणामस्वरुप सन 1887 ईस्वी में राजा राम सिंह की मृत्यु के बाद उनकी जागीर का जम्मू साम्राज्य में विलय हो गया। कांगड़ा के राजा संसार चन्द की ही तरह राजा सुचेत सिंह भी कला के महान पारखी थे। इसलिये बन्द्राल जागीरदारों के इलाकों में बन्द्राल्टा चित्रकला शैली का उदभव हुआ और यह राजा सुचेत सिंह के शासनकाल में खूब फला-फूला। रामनगर के शीश महल में भित्तिचित्र बनवाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। रामनगर महल परिसर में शीश महल, पुराना महल और नवा महल स्थित हैं जो एक- दूसरे के काफी नजदीक हैं। रामनगर की पहाड़ियों की ढलान पर स्थित ये महल घाटी की खूबसूरती को बढाते हैं।

पुराना महल परिसर में अनेक कमरे हैं। यह तीन मंजिला है और इसकी दीवारें बहुत ऊंची हैं, जिसमें समान दूरी पर बने बुर्ज इसकी शोभा बढाते हैं। कमरों की दीवारों को गचकारी (बारीक चूना) से सजाया गया है और इस पर फूल-पट्टियों और ज्यामिती डिजाइन बनाए गए हैं। अंदरुनी छत में लगी लकड़ी के हिस्सों को भी काफी सजाया गया है। अंदरूनी छत के उभारदार कोने कमल के आकार के हैं। नवा महल के अन्दर एक आँगन है इसके चारों ओर हांल हैं और आमने-सामने दो प्रवेश द्वार हैं। बाहरी ऊंची दीवारों को टेक लगाकर सहारा दिया गया है। हांल की कृत्रिम अंदरूनी छत लकड़ी की कड़ियों से बनी है जिस पर फूलों के दिजाएं बने हुए हैं। शीश महल पुरानी हवेलियों की तरह बना हुआ एक अनूठा भवन है, जिसके चौड़े अलंकृत प्रवेश-द्वार के दोनों ओर सजावट कक्ष हैं, जिनके दाईं ओर भित्तिचित्र बने हुए हैं। इसमें तीन हांल हैं जो दरबार हाल, शीश महल और रंग महल के नाम से जाने जाते हैं। दरबार हाल की विशाल दीवारों को भित्तिचित्रों से सजाया गया है। चित्रकला बंद्राल्टा शैली की विशिस्ट पहाड़ी शैली को दर्शाती है। इनमें महाभारत और रामायण के प्रसंगों को बड़ी दक्षता और कुशलता से चित्रित किया गया है। दीवार पर राजा सुचेत सिंह का दरबार में अपने दरबारियों के साथ एक बेहद खूबसूरत चित्र भी बनाया गया है जो बरबस आकर्षित करता है। युद्ध के कुछ दृश्यों में राज सुचेत सिंह को नायक के रूप में चित्रित किया गया है, जो हांल की श्वेत पृष्ठभूमि को भव्यता प्रदान करते हैं। सम्भवतः इस हल का उपयोग शाही दरबार के रूप में किया जाता होगा। दूसरा कक्ष छोटा है जिसे शिकार दरबार के दृश्यों और राजाओं तथा दरबारियों के चित्रों सहित नदियों, बेलों, पगडण्डी और फूलों की पट्टियों से सजाया गया है।

दीवारों पर बनी पट्टियों में सबसे अधिक आकर्षक पट्टियां वे हैं जिनके ऊपरी कोने पर लगे स्लैब पर नायकों के चित्र बने हुए हैं। गठीले बदन पर सजी अलंकृत वेशभूसा, बारीक कढाई लाल, सफ़ेद और आसमानी रंग की किनारी से सजी हुई है। इसमें सुनहरी पत्तियां लगाई गई हैं। इन चित्रकाओं में बन्द्राल्टा शैली के कुछ उत्क्रस्त पहलुओं की झलक मिलती हैं, जिसकी अवधारणा जम्मू और भासौली की लघु चित्रकारी शैली से प्रभावित है। कुछ आलों में राजकुमारियों और नायिकाओं के चित्र बनाये गए थे, जिन्हें कुछ ब्रिटिश निवासियों द्वारा यूरोपीय मूल की अंग्रेज सुंदरियों के चित्रों से बदल दिया गया था। बीच में लगी कुछ पट्टियों के मूल चित्रों को हटाकर उनके स्थान पर यूरोपीय लीथोग्रफ लगा दिए गए थे। रंगमहल की दीवारों को भगवान् कृष्ण और गोपियों की प्रेम लीलाओं के अनेक चित्रों से सजाया गया है। महल के इस हिस्से का प्रयोग सम्भवतः शाही परिवार के मनोरंजन, संगीत और नृत्य के लिये किया जाता होगा, इसलिये इसे रंगमहल के नाम से जाना जाता हैं।

रंगमहल का अगला कक्ष शीश महल के नाम से जाना जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस कक्ष में उत्तल शीशे लगे हुए हैं, जिनके बीचों-बीच सुंदर चित्र बने हुए हैं, रामनगर महल परिसर की इन चित्रकलाओं को अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा परिरक्षित और संरक्षित किया जा रहा है क्योंकि इसे रास्ट्रीय महत्व के स्मारक का दर्जा दिया गया है। किसी काल की बहुमूल्य अमूर्त विरासत को नष्ट किये बिना हमें उसे भावी पीढ़ी को सौंपना होगा अन्याथा इनका संरक्षण न करने के लिये भावी पीढियां, वर्त्तमान पीढी को दोषी ठहराएंगी। इससे पहले कि बन्द्राल्टा की यह अद्वित्य चित्रकला परंपरा लुप्त हो जाएँ, इन्हें भावी पीढी को सौंपे जाने की आवश्यकता है।

अथ ज्ञानमाला

कृष्ण अर्जुन संवाद
एक दिन राजा परीक्षित सिंहासन पर बैठे थे कि उसी समय व्यास जी के पुत्र श्री शुक्रदेव जी आयें। राजा ने देखते ही सिहासन से उतर खड़े हुए और ऋषि के चरणारविन्द में गिर के साष्टांग दंडवत की। फिर बड़े आदर और सत्कार से उन को सुंदर स्थान में ले जाकर रत्न जटित सिंहासन पर बैठा, दोनों चारण कमलों को धो कर चरणोदक लिया और विधिपूर्वक पूजन करके, नाना प्रकार की सामग्री से भोजन कराए। फिर घंटानाद सहित आरती उतारी। तब तो राजा के मन के लगन देख श्री शुक्रदेव्जी प्रसन्न हुए। उस समय राजा ने दोनों "कर" (हाथ) जोड़ करके विनती की कि हे कृपासिंधु! हे दीनदयालु आप की कृपा से सदैव वेद पुराण के सुनने से मेरे ह्रदय में प्रकाश और आनंद प्राप्त होता है, परन्तु अब मेरे मन में मोह प्राप्त हुआ कि संसार में उंच और नीच दो कर्म हैं। सो कृपा करके इन दोनों कर्मों के भेद पृथक पृथक कह कर मेरे मन का संदेह निवारण कीजेये। राजा का यह प्रश्न सुन कर श्री शुक्रदेवजी बहुत प्रसन्न हुए और आज्ञा दी कि हे राजन! तेरे प्रश्न से सारे मनुष्यों को बड़ा लाभ है और जो यह सन्देश तेरे मन में उपजा है। सोई अर्जुन के मन में भी उपन्न हुआ था, सो श्रीकृष्णजी ने जो उनके प्रश्न का उत्तर दिया सोए में तेरे आगे कहता हूँ सो सुनो।
श्री शुक्रदेवजी राजा परीक्षित से कहते हैं कि हे राजन! एक दिन प्रातः काल श्रीकृष्णजी अर्जुन के घर पधारे तो खबर पाई कि अर्जुन सोये हैं। यह बात श्रीकृष्णजी अचम्भे में हो रहे पर महावीर अर्जुन ने श्री कृष्णजी को स्वप्न में देखा और शीघ्र जाग उठे। तब सेवक ने अर्जुन से कहा कि हे स्वामी। श्रीकृष्णजी पधारे हैं। यह सुन अर्जुन दौड़ कर श्रीकृष्णजी के चरणारविन्द में गिरे और दंडवत करे के दोनों कर (हाथ) जोड़ विनती की कि, हे सचिदानंद जगदीश! हम से यह अपराध अनजान में हुआ सो आप क्षमा कर मेरी रक्षा कीजिये।
यह सुन के श्रीकृष्णजी अर्जुन से कहें - हे अर्जुन तू बड़ा बुद्धिमान और ज्ञानी है। इस समय तुझे स्वप्न अवस्था में देख बहुत सोच किया क्योंकि मनुष्य देह बहुत कठिनता से प्राप्त होती है, सो इस देहको पाकर ऐसे समय सोना बुद्धिमानों को योग नहीं हैं। श्रीकृष्ण का यह वचन सुन अर्जुन ने फिर विनती करके प्रश्न किया कि, हे दीन दयालु दीनबंधु! जो अपराध सेवक से अनजाने में हो गया है सो कृपा दृष्टी से क्षमा करके अब आप आज्ञाकारी से आज्ञा करो कि कौन कौन से अहितकारे कर्मो का त्याग करना आवश्यक है। तब श्री कृष्णजी ने उत्तर दिया, मित्र! जो बातें वेद में गुप्त और देवताओं ने नहीं जानी हैं सो तेरे आगे कहता हूँ। तू मन लगा कर सुन। इन बातों को तू और जो कोई अर्जुन के इस पद को अंगीकार करेगा सो पाप बंधन से छूटकर मुक्ति पावेगा।

आगे शिक्षा में श्रीकृष्णजी अर्जुन से कहते हैं :
  1. हे अर्जुन! प्रातःकाल जिस समय श्रीसूर्यनारायण उदय हों, उस समय मनुष्य  को सोना योग्य नहीं है, क्योंकि एक पहर रात्री बाकी रहने पर देवता का आगमन होता है। इसलिए मनुष्य को चाहिय कि दो चार घड़ी सवेरे उठ परम दयालु परमेश्वर के ध्यान में मन लगा के भजनानंद में मग्न रहे और अरुणोदय होते ही स्नान कर श्रीसूर्यनारायण को जल अर्पण कर दंडवत करे और पितृदेव को जल देवे जिस से श्रीसूर्यनारायण और पितृ  देवता बलवान होकर प्रसन्नता से आशीर्वाद देवें। जो मनुष्य इस विधि को अंगीकार करेंगे वे इस लोक और परलोक दोनों को सुख भोगेंगे।
  2. हे अर्जुन! जो कोई संध्या समय घर के आगन में झाडू देता है वह अवश्य दरिद्री होता है, क्योंकि वह समय लक्ष्मीजी के घर में आगमन करने का है। वह जिसके हाथ में झाडू देखती है उसको शाप देकर चली जाती है।
  3. हे अर्जुन! पूर्व रात्री का दीपक बाती जलने से बाकी बचे तो उस बाती को दुसरे दिन न जलावे। यदि जलावे तो महापाप है। इस पाप से मनुष्य-स्त्री बहुत काल तक बाँझ रहेगी। अर्जुन ने श्रीकृष्ण के मुखारविंद से यह शिक्षा सुनकर पश्चाताप किया और चकित हुए, फिर दोनों कर जोड़ के विनती की कि, के अनाथों के नाथ दयासिंधो वासुदेव! आपने जो शिक्षा दी उसके सुनने से दास के मन में अति आनंद प्राप्त हुआ है। कृपा करके कुछ और शिक्षा दीजिये।
  4. हे अर्जुन! मनुष्य को चाहिए कि जलते दीपक को न बुझावे। जो कोई दीपक से दीपक जोड़े तो वह पातकी होता है।
  5. हे अर्जुन! व्रती मनुष्य चारपाई(खाट) पर सोवे तो व्रत निष्फल जाता है, क्योंकि जिस देवता का व्रत धारण किये हो सो देवता व्रत के दिन मनुष्य की देह में वास करते हैं। इसलिये व्रते व्रत के दिन स्वच्छता से रहे और चारपाई पर नहीं पर पृथ्वी पर सोये। स्त्री से अलग रहे, एक बार फलाहार कर कुछ ब्रह्मण को देवे तो देवता प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और व्रत फलदायक होता है।
  6. हे अर्जुन! व्रत के दिन किसी को अपना जूठा न देना चाहिए, क्योंकि जो कोई जूठा खायेगा तो व्रत के फल का भागी होगा। यह बड़ा दोष है।
  7. हे अर्जुन! जो मनुष्य ताम्बे के पात्र को जूठाकर अशुद्ध करे या अशौच (toilet) स्थान में ले जाय सो अन्तकाल नरकवासी होता है, क्योंकि सब धातुओं में ताम्बा महापवित्र है। इसलिए जो मनुष्य ताम्बे के पात्र में जल भरके स्नान करे सो गंगा जल के समान फल गाता है. तिल, अन्न, जल अर्पण करे तो महापुण्य है।
  8. हे अर्जुन! जो मनुष्य अपने घर में टूटी खाट फूटे बर्तन रखते हैं वे दरिद्री होते हैं।
  9. हे अर्जुन जो मनुष्य नारायण का नाम लेके खाया पीया करे और चलते फिरते उठते बैठते जो काम करे परमेश्वर का नाम लेके करे तो इस महा सुकर्म फल से इस लोक में सुखों का परम आनंद पाता हैं। यह नाम महा पुनीत है और जो मनुष्य चलते फिरते डगर बात में बार बार जो मन में आवे सो लेकर खावे और परमेश्वर का नाम ना उच्चारण करे, तो दोष है। वेह विपत्ति के बंधन से कभी नहीं छूटता।
  10. हे अर्जुन! किसी मनुष्य के संग एक पात्र में भोजन करना बड़ा दोष है क्योंकि न जाने पूर्व के जन्म में वह मनुष्य कौनसी दशा में था। भोजन के कारण उसके पूर्व जन्म की किर्तियाँ अन्तःकरण  में प्राप्त हो जायेंगी, इसलिये ऐसे नीच काम को अंगीकार न करना चाहिए।
  11. हे अर्जुन! भोजन करने के समय अन्न देवता मुख में पधारते हैं, इसलिये मौन धर कर भोजन करना उचित है, क्योंकि बतलाने में मिथ्या वचन मुख से निकले तो अन्न्देव के क्रोध से इसी जन्म में विपत्ति में बंधे। इसलिये मनुष्य को चाहिए कि एक चित होकर चौरस (पलती मार कर) बैठ कर दाहिने, बाएं देख और अन्न्देवकी बधाई करके भोजन करे तो इस कर्म से वह सदा सुखी रहे। अर्जुन ने प्रश्न किये कि हे जगदीश जगतगुरो! भोजन करते समय कुछ कहना किसी से आवश्यक हो तो कैसे कहना चाहिए? श्रीकृष्णजी ने आगया दी कि बोलना आवश्यक ह तो मन में अन्न्देव से प्रार्थना करके सच्चिदानंद भगवान् का नाम लेके पांचग्रास ले और आचमन करके बोले और किसी की बुराई न करें और न खोटा वचन बोले।
  12. हे अर्जुन! दीपक व सूर्य की ज्योति से खाट की छाया मनुष्य की देह पर पड़े तो दोष है।
  13. हे अर्जुन! यदि मनुष्य बाग़, तालाब और नदी के किनारे दिशा(toilet) जाय तो बहुत काल नरक में पड़े।
  14. हे अर्जुन! मनुष्य किसी की कोई वास्तु पुण्य देकर अथवा और भाति लेवे और भूल से या अहंकार के कारण नहीं दे तो महा पाप है। अगले जनम में देगा उस मनुष्य को उचित है जो मुख से कहे सो पूरा करे।
  15. हे अर्जुन! कोई मनुष्य किसी से कुछ मांगे और वह दे देवे तो इस पुण्य का फल अश्वमेघ यज्ञ के समान है क्योंकि जीव की प्रसन्नता ने जो दिया है उसी में संतोष रखे।
  16. हे अर्जुन! मनुष्य के अर्थ चारपाई (खाट) यह चौकी पर बैठ के ब्रह्म जगदीश का पूजन करे तो फलदायक नहीं होता। इसलिये मनुष्य को उचित है की खूब पवित्र स्थान में ऊनी वस्त्र मृगछाला कुशासन पर स्त्री सहित बैठे। पूर्व यह उत्तर की और मुख कर त्रिलोकी नाथ के ध्यान और स्मरण में मन लगावे तो फलदायक होता है।
  17. हे अर्जुन! द्वादशी के पुराण का श्रवण और पाठ अयोग्य है क्योंकि उस दिन व्यासजी दिन भर परमेश्वर के पूजन ध्यान में मनको स्थिर कर बैठते हैं। कदाचित कोई पुराण वांचे तो उनका मन ध्यानावस्था में पुराण की और चलायमान होता है।
  18. हे अर्जुन! व्रत के दिन और आदित्यवार (sunday) को दर्पण में मुख देखना अयोग्य है, तिलक लगाने के समय देखे क्योंकि तिलक नारायण रूप है।
  19. हे अर्जुन! जो मनुष्य मन को रोक एक चित हो प्रीती भाव से कथा श्रवण करते हैं वे वैकुण्ठ में नाना प्रकार के सुख पावेंगे।
  20. हे अर्जुन! दक्षिण की ओर पाँव करके सोना बड़ा अशुभ है।
  21. हे अर्जुन! गृहस्थ के घर में पीपल, इमली आदि वृक्षों को रखना नहीं चाहिए क्योंकि प्रति दिन एक बार पितृ  देवता अपने पुत्र के घर आते हैं। जो ब्रह्मण को मिठाई खाते देखें तो प्रसन्न हो आशीर्वाद देवें, पर वृक्ष के देव, भूतादिक वास देख कर उनके दर से घर में नहीं आते, श्राप दे जाते हैं। सो मनुष्य निर्धन होके सदा दुखी रहता है। इसलिये घर में ऐसे वृक्ष अशुभ है।
  22. हे अर्जुन! मनुष्य बड़ी कठिनाई और बड़े जप त़प से फल को प्राप्त होता है। इस देह में पाप के अहंकार की फांसी गले में मलना अयोग्य है। देखो सदा सिर के बाल तो मौत के हाथ में रहते हैं और न जाने की किस समय शरीर से जीव न्यारा हो जाए। इस पर भी यदि मनुष्य कहे कि अभी लड़के हैं, जवान से बुढ़ापे में भजन किया जाएगा। यह भूल है। क्षणभर भी देह में जूठा भरोसा न करे। मनुष्य को उचित है कि क्रोध लोभ को त्याग कर अहंकार और बुराई से अलग रहे। इश्वर ने जो कुछ दिया है, उसमें संतोष रखे। हर्ष और हानि लाभ, भले बुरे को समान जाने। सब जीवों में पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर को एकसा देखे और सदा सचिदानंद नारायण के ध्यान स्मरण में मन लगावे। सदा प्रसन्न रहे क्योंकि अन्तकाल माता, पिता, और भाई सहायक नहीं होते, केवल सुकर्म ही सहायक होता है।
  23. हे अर्जुन! आम के वृक्ष तथा बाग़ के वृक्ष काटने का दोष ब्रह्महत्या के समान हैं और बाग़ लगाने का पुण्य हजार यज्ञ के समान है। इसलिये उचित हैं कि सम्पूर्ण लगाने की ससमर्थ्य न हो तो सिर्फ मेवा के पांच वृक्ष सठौर (आँगन, बगीचा, मन्दिर आदि स्थान) में लगा जीवन सफल करे क्योंकि वृक्ष लगाने का पुण्य अश्वमेघ यज्ञ के समान है। जब मेघ बरसता है तो उन वृक्षों के पत्तों से जल के बूँद पृथ्वी पर पड़ते हैं जिसका पुण्य अक्षय है। जैसे पतिव्रता स्त्री को अपने पति की सेवा अखण्ड पुण्य फलदायक है, उसी प्रकार इस पुण्य की महिमा कहने में नहीं आती। जो लगावे उसके पांच पुश्त के पुरुष वैकुण्ठ में वास पावें।
  24. हे अर्जुन! जो मनुष्य तुलसीजी का वृक्ष अपने घर में रखे यह प्रतिदिन स्नान करके जल से सीचें, चन्दन, अक्षत, पुष्पों से पूजन करे यह रात को दीपक बारे तो उस घर में भूत व प्रेत नहीं आतें। लक्ष्मी का प्रकाश रहता है यह अश्वेमेघ यज्ञ के समान फलदाई है। जो कदाचित नित्य नहीं बने तो कार्तिक में या अगहन में प्रतिदिन पूजन करें या आंवला के वृक्ष तले जाय के ब्रह्मण को भोजन करावे तो उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान फल हो।
  25. हे अर्जुन! जो मनुष्य जिस पात्र में भोजन करके उसको मांजे नहीं और बचे हुए जूठन को उसी पात्र में रखे तो महा दोष है, अन्न के शाप से वह मनुष्य सदा दरिद्र और दुखी रहे।
  26. हे अर्जुन! जो मनुष्य अपने घर और आँगन को प्रतिदिन झाड बुहार कर साफ़ नहीं रखते वे महादोष के कारण पितृ देवता के शाप से छ: महीनों में गरीब हो जाते हैं। यह बात भी जाननी चाहिए कि पुत्र के कार्यो से पितृदेव वैकुण्ठ या नरक में जाते हैं।
  27. हे अर्जुन! जो मनुष्य स्नान करके तिलक नहीं लगाते उन का स्नान करना पशु के समान है, और कदाचित ब्रह्मण तिलक न करे तो उन को दण्डवत करना अयोग्य है। बिना तिलक किये ब्रह्मण का माथा देखना बड़ा दोष है। तिलक धारी को देख के यम दूत डरते हैं।
  28. हे अर्जुन! मनुष्य की देह बहुत कठिनता से प्राप्त होती है। कदाचित दही का भोजन प्रतिदिन प्राप्त नहीं होये तो पूर्णमासी को अवश्य भोजन करना चाहिए क्योंकि इस का महा पुण्य है।
  29. हे अर्जुन! जो मनुष्य अपने घर में एक दीप आठो पहर जलाए रखे, किसी समय बुझने न दे, तो पितृदेव अति प्रसन्नता से आशीर्वाद देते हैं और अगले जनम में भगवान् की कृपा से संतान का सुख पाकर अंत समय वैकुण्ठ धाम पाता है।
  30. हे अर्जुन! हाथ, कान, गले में सोना पहनना उत्तम है क्योंकि स्नान करने के समय जल सोने से लग के शरीर पर पड़ता है सो गंगा जल के समान है।
  31. हे अर्जुन! मेघ वर्षा के समय सूर्य उदय हो तो उस समय (घाम और पानी) का स्नान गंगा स्नान के समान हो जो देवताओं को भी प्राप्त नहीं होता।
  32. हे अर्जुन! जो मनुष्य हाथ पर रोटी धरके खाए सो थोड़े ही काल में दरिद्र हो जाता है।

23 अप्रैल 2010

कष्ट निवारण - उपाय - 9

कार्यक्षेत्र के व्यवधान दूर करने हेतु
यदि आपका व्यवसाय तकनीकी क्षेत्र का है और आपके व्यवसाय में हमेशा कोई न कोई मशीन बहुत जल्दी खराब होती हो तो यह उपाय बहुत ही लाभदायक रहेगा। किसी भी माह के प्रथम गुरुवार के दिन हल्दी, कुंकुम और केसर की स्याही बनाकर नौ इंच सफेद कच्चे धागे को रंग लें। तत्पश्चात उसमें नौ गांठ लगा दें। मशीन के ऊपर उसी स्याही से स्वास्तिक बनाकर उस धागे को बांध दें। मशीन खराब नहीं होगी और कर्मचारी में मन लगाकर काम करेंगे

सुख-शांति हेतु
यदि आपके परिवार में हमेशा कलह रहता हो पारिवारिक सदस्य सुख शांति से न रहते हो तो शनिवार के दिन सुबह काले कपड़े में जटा वाले नारियल को लपेटकर उस पर काजल की 21 बिंदी लगा लें। और घर के बाहर लटका दें। हमेशा घर बुरी नजर से बच कर रहेगा और हमेशा सुख-शांति रहेगी।

कार्य सफलता के लिए
किसी भी शुभ कार्य के लिए घर से बाहर निकलने से पूर्व दही में गुड़ या चीनी मिलाकर सेवन करके बाहर निकलने से कार्य में सफलता मिलती है। साथ ही घर से बाहर निकलते समय अपने पास कुछ धन राशि रख दें इस धन राशि से किसी जरूरत मंद व्यक्ति को खाने की चींज देकर निकल जाएं कार्य सफलता मिल जाएगी।

यदि जातक के अपने कर्म ठीक है, कार्य व्यवसाय में वह ईमानदारी से परिश्रम करता हो, उसके बावजूद भी कार्य में सफलता नहीं मिल रही हो अथवा घर में शांति नहीं हो तो इस प्रयोग से अवश्य शांति मिलेगी। प्रतिदिन स्नान के जल में एक आम का पत्ता, एक पीपल का पत्ता, दुर्वा-11, तुलसी का एक पत्ता और एक बिल्व पत्र डालकर मृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए स्नान करें तो सभी प्रकार के ग्रह पीड़ा व कष्टों से मुक्ति मिलेगी। मंत्र इस प्रकार है।-

ओम त्रयम्बकं यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनं ऊर्व्वारुकमिव वंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मां मृतात्।

भगवान दत्तात्रोय को ब्रह्मा-विष्णु-महेष की शक्तियों का संयोग कहा जाता है। अत: दत्ताात्रोय जी की साधना गूलर के पेड़ के नीचे बैठकर करने से शीघ्र फलदायी होती है। उत्तार पूर्व की ओर मुख करके 'ओम द्रां दत्तात्रोय नम:' मंत्रों का 21 दिन निरंतर 21 माला जप करने से बहुत लाभ मिलता है। पूजा में श्वेत चंदन, पुष्प और केवड़े के इत्रा का प्रयोग करना चाहिए।

अक्षय तृतीया या किसी भी शुक्रवार की रात्रि को कांसे या पीतल की थाली में काजल लगाकर काली कर दें और फिर चांदी की शलाका से लक्ष्मी का चित्र बनाएं चाहे वह कैसा भी बने, फिर चित्र के ऊपर ऐष्वर्य लक्ष्मी यंत्र स्थापित कर दें और एक निष्ठ होकर, मात्र एक सफेद धोती ही पहनकर, उत्तार दिषा की ओर मुंह कर, सामने गेहूं के आटे के चार दीपक बनाए और उसमें किसी भी प्रकार का तेल भरकर प्रज्जवलित करें और थाली के चारों कोनों पर रखे मूंगों की माला से निम्न मंत्र का एक रात्रि में 51 माला मंत्र जप करें। ओउम्ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं ह्रीं ह्रीं फट्॥ जब मंत्र पूरा हो जाए तो रात्रि में वहीं विश्राम करें और जमीन पर ही सो जाएं।

अगर आप कर्ज से परेषान है तो सफेद रुमाल लें। पांच गुलाब के फूल, एक चांदी का पत्ता, थोड़े से चावल, गुड़ लें। मंदिर में जाकर रुमाल को रखकर इन चीजों को हाथ में ले लें और 21 बार गायत्री मंत्र का पाठ करें। इनको इकठ्ठा कर कहें मेरी परेषानी दूर हो जाएं तथा मेरा कर्जा उतर जाए। फिर इन सबको ले जाकर बहते जल में प्रवाह कर दें। यह प्रक्रिया सोमवार को करनी चाहिए। अगर इसे विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति के सामने किया जाए तो और भी अच्छा होता है। इसे कम से कम 7 सोमवार करना चाहिए।

बचत के लिये
आप अनावश्यक खर्चें से परेशान है, आपके हाथ से न चाहते हुये भी खर्चा अधिक हो जाता हो तो यह प्रयोग आपके लिये बहुत ही लाभदायक रहेगा। किसी भी माह के पहले सोमवार को 11 गोमती चक्र, 11 कौड़ी, 11 लौंग लें। पीलेवस्त्र में रख कर अपने पूजा स्थान में रख दें। श्रद्धापूर्वक पंचोपचार पूजन करें। धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, अक्षत अर्पित करें। तत्पश्चात ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्मयै: नम:। 11 माला जाप करें। ऐसा 7 दिन नियमित रूप से पूजन और जाप करें। पुन: दूसरे सोमवार को श्रद्धापूर्वक पूजन और जाप के उपरांत उसमें से 4 गोमती चक्र, 4 कौड़ी, 4 लौंग घर के चारों कोनों में गड्डा खोदर कर डाल दें। शेष बचें 5 गोमती चक्र, 5 कौड़ी, 5 लौंग को लाल वस्त्र में बांधकर अपनी तिजारी में रख दें। और दो गोमती चक्र, दो कौड़ी और दो लोंग को श्रद्धापूर्वक किसी भी भगवान के मंदिर में अर्पित कर दें। मनोवांछित सफलता प्राप्त होगी।

स्वास्थ्य के लिये
यदि आपका बच्चा बहुत जल्दी-जल्दी बीमार पड़ रहा हो और आप को लग रहा कि दवा काम नहीं कर रही है, डाक्टर बीमारी खोज नहीं पा रहे है। तो यह उपाय शुक्ल पक्ष की अष्टमी को करना चाहिये। आठ गोतमी चक्र ले और अपने पूजा स्थान में मां दुर्गा के श्रीविग्रह के सामने लाल रेशमी वस्त्र पर स्थान दें। मां भगवती का ध्यान करते हुये कुंकुम से गोमती चक्र पर तिलक करें। धूपबत्ती और दीपक प्रावलित करें।धूपबत्ती की भभूत से भी गोमती चक्र को तिलक करें। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे की 11 माला जाप करें। जाप के उपरांत लाल कपड़े में 3 गोमती चक्र बांधकर ताबीज का रूप देकर धूप, दीप दिखाकर बच्चे के गले में डाल दें। शेष पांच गोमती चक्र पीले वस्त्र में बांधकर बच्चे के ऊपर से 11 बार उसार कर के किसी विराने स्थान में गड्डा खोदकर दबा दें। आपका बच्चा हमेशा सुखी रहेगा।

आर्थिक सम्पनता के लिये
आप चाहते है कि आपकी आर्थिक संपंता स्थिर रहें के लिए उचित परिश्रम का लाभ प्रान्त हो, किसी भी माह के प्रथम शुक्ल पक्ष को यह प्रयोग आरंभ करें और नियमित 3 शुक्रवार को यह उपाय करें। प्रत्येक दिन नित्यक्रम से निवृत्त होकर स्नानोंपरांत अपने घर में अपने पूजा स्थान में घी का दीपक जलाकर मां लक्ष्मी को मिश्री और खीर का भोग लगायें। तत्पश्चात 11 वर्ष की आयु से कम की कन्याओं को श्रद्धापूर्वक भोजन करायें। भोजन में खीर और मिश्री जरूर खिलायें। भोजन के उपरांत श्रद्धानुसार लाल वस्त्र भेंट करें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी की अवश्य कृपा होगी।

दांपत्य सुख हेतु
यदि चाहते हुए वैवाहिक सुख नहीं मिल पा रहा है, हमेशा पति-पत्नि में किसी बात को लेकर अनबन रहती हो तो किसी भी शुक्रवार के दिन यह उपाय करें। मिट्टी का पात्र ले जिसमें सवा किलो मशरूम आ जाएं। मशरूम डालकर अपने सामने रख दें। पति-पत्नि दोनों ही महामृत्युंजय मंत्र की तीन माला जाप करें। तत्पश्चात इस पात्र को मां भगवती के श्री चरणों में चुपचाप रखकर आ जाए। ऐसा करने से मां भगवती की कृपा से आपका दांपत्य जीवन सदा सुखी रहेगा।

रोजगार के लिये
अगर आपको रोजगार की समस्या आ रही हो या आपके व्यवसाय में आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ रहा हो अथवा हाथ में आये अच्छे मौके निकले जा रहे हो तो ऐसी अवस्था में किसी भी माह के शुक्ल पक्ष को यह उपाय आरंभ करें। सौ ग्राम जौ, सौ ग्राम देसी चना, सौ ग्राम उड़द का आटा लें तीनों आटों को मिक्स करके गूंथ लें और इस आटे की 108 गोलियां बना लें। गोली बनाते समय ॐ श्रीं नम: का जाप करते रहें गोलियां बनाकर किसी स्वच्छ थाली में रख दें। तत्पश्चात दीपक जलायें और ॐ नम: कमलवासिन्यै स्वाहा। 11 माला जाप करें। और जप माला स्फटिक की प्रयोग करें तो बहुत अच्छा रहेगा। जप के बाद स्वच्छ पात्र में जल और गंगा जल भर कर माला को पात्र में रख दें। प्रात:काल उस जल में से माला को निकालकर उस जल को अपने घर, दुकान या व्यापारिक स्थान में छिड़क दें। ऐसा नियमित 108 दिन तक करें। 108 दिन के बाद माला को बहते पानी में प्रवाह कर दें।

कार्य बाधा निवारण के लिए
लाल कपड़े के ऊपर कुं कुम की स्याही बनाकर लाल चंदन की लकड़ी से गीता के ग्यारहवें अध्याय के 36वें शोक को श्रद्धापूर्वक लिखें। और अपने घर के दायीं ओर किसी भी कोने में टांग दें। किसी भी प्रकार की कार्य बाधा हो उसका निवारण हो जाएगा।

विवाह में विलम्ब के उपाय
जिस जातक की जन्म कुंडली में बृहस्पति नीच का हो, 6, 8, 12 भावों में क्रूर ग्रहों के साथ बैठा हो अथवा दृष्ट हो, प्रबल मार्केष हो तो ऐसी अवस्था में यह उपाय रामबाण का काम करता है। गुरुपुष्य नक्षत्र के दिन गुरु की होरा में केले की जड़ को पूजनादि करके खोदकर घर लाएं। उस जड़ को पूजन स्थान में रखकर श्रध्दापूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करके पीले कपड़े में लपेटकर अथवा सोने में जड़वाकर गले या दाहिनी भुजा में धारण करें। इससे गुरुजन्य दोषों का निवारण एवं व्यवसाय में लाभ होता है। साथ ही जिनके विवाह में विलम्ब हो रहा है उन्हें भी इस प्रयोग से शीघ्र लाभ होता है।

यदि किसी के विवाह में विलम्ब हो रहा है तो उसे बृहस्पतिवार का व्रत करना चाहिए। बृहस्पति व्रत कथा सुननी चाहिए तथा प्रत्येक गुरुवार को हल्दी की गांठ बिस्तर के नीचे लेकर सोएं।

यदि पति से झगड़ा होता है तो शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार को पत्नी अषोक वृक्ष की जड़ में घी का दीपक और चंदन की अगरबत्ती जलाए, नैवेद्य चढ़ाए। पेड़ को जल अर्पित करते समय उससे अपनी कामना करनी चाहिए। फिर वृक्ष से सात पत्तो तोड़कर घर लाएं, श्रध्दा से उनकी पूजा करें व घर के मंदिर में रख दे। अगले सोमवार फिर से यह उपासना करे तथा सूखे पत्ताों को बहते जल में प्रवाहित कर दें।

समय पर विवाह न हो रहा हो तो शुक्ल पक्ष में किसी गुरुवार के दिन प्रात:काल उठकर स्नान करें। पीले वस्त्र पहल लें। बेसन को देषी घी में सेंककर बूरा मिलाकर 108 लड्डू बनाएं। पीले रंग की टोकरी में पीले रंग का कपड़ा बिछाकर उसमें ये लड्डू रख दें। इच्छानुसार कुछ दक्षिणा भी रख दें। यह सारा सामान षिव मंदिर में जाकर गणेष, पार्वती तथा षिवजी का पूजन कर मनोवांछित वर प्राप्ति का संकल्प कर किसी ब्राह्मण को दे दें। इससे शीघ्र विवाह की संभावना बनेगी।

कष्ट निवारण - उपाय - 8

व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ के लिए
व्यवसाय में मनोनुकूल लाभ प्राप्ति नहीं हो रही हो तो किसी भी शनिवार के दिन नीले कपड़े 21 दानें रक्त गुंजा के बांधकर तिजोरी में रख दें। हर रोज धूप, दीप अवश्य दिखाएं। अपने इष्ट देव का ध्यान करें। ऐसा नियमित करने से व्यापार में लाभ मिलेगा और सफलता भी प्राप्त होगी।

धन खर्च रोकने हेतु
यदि परिवार मे अनावश्यक दुघर्टनाओं की वजह से या कोर्ट-कचहरी की वजह से अनावश्यक धन खर्च बढ़ रहा हो तो हर मंगलवार को स्वच्छ लाल वस्त्र सवा किलो लाल मसूर बांधकर पारिवारिक सदस्यों के ऊपर से 11 बार उसार कर कपड़े सहित बहते पानी में प्रवाह कर दें। परेशानियों से छुटकारा मिल जाएगा।

धन प्राप्ति हेतु
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद धन की प्राप्ति नहीं होने पर किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार को यह उपाय प्रारंभ करें। और लगातार एक साल तक करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत किसी तांबे के पात्र स्वच्छ जल भर के उसमें थोड़ा गंगा जल और शहद मिलाकर सूर्योदय से पूर्व भगवान शिव के शिवलिंग पर ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए चढ़ा दें। लाभ मिलेगा।

बच्चे के बीमार होने पर
यदि आपका बच्चा बीमार है जो भी खाता है उसकी उल्टी कर देता है। एक पान के पत्ते पर एक बूंदी का लड्डू, पांच गुलाब के फूल रखकर बच्चे के ऊपर से सात बार उसार कर चुपचाप किसी मंदिर में रखकर आ जाएं कष्टों से छुटकारा मिल जाएगा।

भूख लगने के लिए
यदि आपको भूख तो है लेकिन खाना मुंह में नहीं जा रहा हो तो प्रात:काल भोजन करते समय अपने भोजन में से एक रोटी निकाल दें उस रोटी को बरगद के पत्ते पर रखकर रोटी के उपर एक लौंग, एक इलायची, एक साबुत सुपारी और थोड़ी सी केसर डाल दे और अपने ऊपर से सात बार उसार कर किसी चौराहे पर चुपचाप रखकर आ जाएं। भूख लगने लगेगी मन प्रसन्न रहेगा।

व्यापार व नौकरी में स्थिरता हेतु
वे लोग जो अपने व्यापार व नौकरी को लेकर हमेशा तनाव में रहते हैं। बार-बार अपना कारोबार बदलते है व बार-बार नौकरी बदलते है तथा कहीं पर भी स्थिर नहीं रह पाते हैं। उन्हें यह प्रयोग जरूर अजमाना चाहिए। 17 इंच लंबा काला रेशमी धागा ले उसे लाल चंदन, कुंकम व केसर को घोलकर उसे रंग लें। तत्पश्चात 'ॐ हं पवननंदनाय स्वाहा' मंत्र का जाप करते हुए आठ गांठ लगा दें। प्रत्येक गांठ पर एक सौ आठ पर इस मंत्र का जाप करें। तत्पश्चात इस अभिमंत्रित धागे को अपने कारोबार के मुख्य द्वार पर बांध दे। नौकरी से संबंधित लोगों को अपनी चेयर या मेज की दराज में रख ले या कुर्सी पर यह धागा बांध लें। कारोबार व नौकरी में अवश्य स्थिरता आ जायेगी।

बचत के लिये
आप अनावश्यक खर्चें से परेशान है, आपके हाथ से न चाहते हुये भी खर्चा अधिक हो जाता हो तो यह प्रयोग आपके लिये बहुत ही लाभदायक रहेगा। किसी भी माह के पहले सोमवार को 11 गोमती चक्र, 11 कौड़ी, 11 लौंग लें। पीलेवस्त्र में रख कर अपने पूजा स्थान में रख दें। श्रद्धापूर्वक पंचोपचार पूजन करें। धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, अक्षत अर्पित करें। तत्पश्चात ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्मयै: नम:। 11 माला जाप करें। ऐसा 7 दिन नियमित रूप से पूजन और जाप करें। पुन: दूसरे सोमवार को श्रद्धापूर्वक पूजन और जाप के उपरांत उसमें से 4 गोमती चक्र, 4 कौड़ी, 4 लौंग घर के चारों कोनों में गड्डा खोदर कर डाल दें। शेष बचें 5 गोमती चक्र, 5 कौड़ी, 5 लौंग को लाल वस्त्र में बांधकर अपनी तिजारी में रख दें। और दो गोमती चक्र, दो कौड़ी और दो लोंग को श्रद्धापूर्वक किसी भी भगवान के मंदिर में अर्पित कर दें। मनोवांछित सफलता प्राप्त होगी।

दुकान की बिक्री बढ़ाने हेतु
आप मेहनत कर रहे हैं दुकान में पूरा सामान है परन्तु बिक्री नही हो रही हो अपनी दुकान में लक्ष्मी जी का चित्र लगाकर उनके आगे धूप व दीप जलाकर प्रणाम करें प्रणाम करके 108 बार ॐ नम: कमलवासिन्यै स्वाहा। मंत्र का जाप करने के बाद अपना कार्य आरंभ करें या दुकानदारी शुरू करें। कारोबार में वृद्धि होगी, ग्राहक आने लगेंगे और काम भी बढ़ेगा।

सोचा काम बनाने के लिए
संपूर्ण प्रयासो के बावजूद भी सोचा हुआ काम पूरा नहीं होता हो तो मंगलवार के दिन यह उपाय प्रारंभ करें। और लगातार 21 मंगलवार करें। हर मंगलवार को नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत जटा वाले नारियल के ऊपर सवा मीटर लाल कपड़ा लपेटकर 21 बार कलावा लपेट लें। तत्पश्चात लाल कपड़े के ऊपर 21 कुंकुम की बिंदी लगा लें। नारियल को अपने ऊपर से 21 बार उसार कर के अपने पूजाा स्थान में रख दें। वहीं बैठकर एक पाठ सुंदरकांड का पाठ करें। तपश्चात अपनी मनोकामना का ध्यान करते हुए इस नारियल को बहते पानी व तालाब में प्रवाह कर दें।

कष्ट निवारण - उपाय - 7

सम्पूर्ण कष्ट निवारण प्रयोग
यदि आपको आपके व्यापारिक कार्यों में अप्रत्याशितबाधाएं आ रहीं हैं तो आज के दिन यह उपाय शुरु करें। घी का दीपक जला दें। एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ चंद्रघंटा देव्यै नम:, एक पाठ श्री गणेश स्तोत्र प्रतिदिन सुबह नियमित रूप से करें। पूजा करने के उपरांत हर रोज गाय को हरी घास खिलाएं। हरा चारा डालें। ऐसा 43 दिन, 86 दिन या 172 दिन करें।

बाधा निवारण और बाधा विनाशक प्रयोग
यदि किसी के भी साथ अप्रत्याशित, बार-बार बिना किसी कारण परेशानी आ रही हो, मन बेचेन रहता हो, अनहोनी दुर्घटनाएं घट रही हों और एक्सीडेंट होता हो तो 800 ग्राम चावल दूध से धो कर पवित्र पात्र में अपने सामने रख लें और एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ चंद्रघंटा देव्यै नम: और एक माला मंगलकारी शनि मंत्र का जाप करें। तत्पश्चात इस सामग्री को अपने ऊपर से 11 बार उसार करके किसी तालाब अथवा बहते पानी में प्रवाह करें और दूध किसी कुत्ते को पिला दें। यह उपाय लगातार 43 दिनों तक करें। इस समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।

आयु, यश, बल व ऐश्वर्य प्रदान करने वाला अद्भुत प्रयोग
सम्पूर्ण परिश्रम, प्रयास और कठिन मेहनत के बावजूद बदनामी का सामना करना पड़ रहा हो, समाज में जग हंसाई हो रही हो, व्यापार वृध्दि के लिए किए गए सम्पूर्ण प्रयास विफल हो रहे हो, तो आज का दिन उन लोगों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। चार कुम्हड़े (काशीफल या कद्दू), चौकी पर लाल कपड़ा बिछा कर इन सबको उस पर रख दें। धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प अर्पित करने के बाद पांच माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम:, एक माला ॐ शं शनैश्चराय नम: का जाप करें। तत्पश्चात इनको अपने ऊपर से 11 बार उसार लें, उसारने के बाद छोटे-छोटे टुकड़े करके किसी तालाब में डाल दें। सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी।

चर्म रोगों से छुटकारा के लिए अद्भुत प्रयोग
जिन्हें बार-बार, शरीर में फोड़ा-फुंसी होती हो या कोई न कोई चर्म रोग हमेशा रहता हो उन्हें आज के दिन यह उपाय प्रारम्भ करना लाभदाय रहेगा। एक चाँदी की कटोरी ले लें उसमें स्वच्छ जल भर कर 18 पत्ते तुलसी के, 9 पत्ते नीम के और 3 पत्ते बेलपत्र के डाल लें। अपने सामने स्वच्छ आसन पर रख दें। तत्पश्चात घी का दीपक और चंदन का धूप जला कर एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामूण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम: और शनि पत्नी नाम स्तुति की एक माला करने से लाभ होगा।

ग्रह कलह निवारण प्रयोग
यदि आपके परिवार में बिना किसी कारण ही अशांति बनी रहती है। पारिवारिक सदस्य यदि एक साथ बैठ नहीं पाते। किसी न किसी बात को लेकर गृह कलह होता रहता है तो आज के दिन किसी भी समय सुबह, दोपहर शाम यह उपाय शुरू करें। लकड़ी की चौकी बिछाएं। उसके ऊपर पीला वस्त्र बिछाएं। चौकी पर पांच अलग-अलग दोनो पर अलग-अलग मिठाई रखें। दोनों में पांच लौंग, पांच इलायची और एक नींबू भी रखें। धूप-दीप, पुष्प, अक्षत अर्पित करने के उपरांत एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ú स्कं द माता देव्यै नम: मंत्र का जाप करें। साथ ही एक माला जाप शनि पत्नी नाम स्तुति की करें। तत्पश्चात यह समस्त सामग्री किसी पीपल के पेड़ के नीचे चुपचाप रखकर आना चाहिए। बहुत जरूरी है कि अपने घर में प्रवेश से पहले हाथ-पैर अवश्य धो लें। ऐसा नियमित 43 दिनों तक करें। पारिवारिक सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा। वैसे यह उपाय किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी से प्रारम्भ किया जा सकता है।

पारिवारिक कष्ट निवारण या पति-पत्नी मन-मुटाव निवारण प्रयोग
कई परिवार ऐसे देखे गए हैं कि उनके परिवार में किसी प्रकार की कमी नहीं है। भरा-पूरा परिवार है। धन-दौलत सब कुछ है लेकिन सुख-शांति नहीं है और कोई कारण समझ में नहीं आता। तो पांचवें नवरात्र में इस उपाय को शुरु करना चाहिए। वैसे तो यह उपाय शुक्ल पक्ष की किसी भी पंचमी को शुरु किया जा सकता है और उसे 43 दिनों तक नियमित करना चाहिए। अपने पूजा स्थान में ईशान कोण में एक चौकी लगाकर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर हल्दी और केसर मिला कर स्वास्तिक बनाएं। स्वास्तिक के ऊपर कलश स्थापित करें। कलश में जल भर कर थोड़ा सा गंगाजल डालें। 7 मुट्ठी धनिया, 7 गांठ हल्दी और 7 बताशे डालें। पांच अशोक पेड़ के पत्तों को दबाकर कलश पर मिट्ठी की प्लेट रखें। उसमें 7 मुट्ठी गेहू और 7 मुट्ठी मिट्टी मिला कर प्लेट में रखें। तत्पश्चात एक जटा वाला नारियल रखें उस पर 7 बार कलावा लपेट कर स्थान दें। नारियल पर केसर और हल्दी का तिलक करें। शुध्द घी का दीपक जला कर गाय का घी, शक्कर, केला, मिश्री, दूध, मक्खन, हल्वा भोग के रूप में अर्पित करें। और रुद्राक्ष की माला पर पांच माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ स्कंद माता देव्यै नम: और पांच माला ॐ सर्व मंगलमांगल्यै शिवै सर्वाथ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तु ते। और माँ भगवती को प्रणाम करके उठ जाएं। और माँ भगवती को लगाए भोग को निर्जन व गरीब परिवार में बांट दें। माँ की आरती करें और कष्ट निवारण के लिए प्रार्थना करें। अगले दिन पुन: भोग व धूप-दीप अर्पित करें और पांच-पांच माला जाप करें। ऐसा नवमी तक करें। अंतिम दिन पांच कुंवारी कन्याओं को बुला कर भोजन कराएं। वस्त्र और दक्षिणा भेंट करें। नारियल फोड़ कर उस जल को पूरे घर में छिड़क दें। गिरी को परिवार के सदस्यों में बांट दें। बाकी समस्त पूजन सामग्री कलश सहित जल में प्रवाह कर दें।

कार्य सिद्धि हेतु
• किसी भी शुभ कार्य के लिए घर से बाहर निकलने से पूर्व दही में गुड़ या चीनी मिलाकर सेवन करके बाहर निकलने से कार्य में सफलता मिलती है। साथ ही घर से बाहर निकलते समय अपने पास कुछ धन राशि रख दें। इस धन राशि से किसी जरूरत मंद व्यक्ति को खाने की चींज देकर निकल जाएं, कार्य में सफलता मिल जाएगी।
• किसी भी कार्य की बाधा दूर करने के लिए 43 दिन तक हर रोज प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत हनुमान जी की प्रतिमा के समक्ष चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर चढ़ाएं और उनके श्रीचरणों के सिंदूर का तिलक अपने मस्तक पर लगा लें। कार्य बाधा दूर हो जाएगी।

मनोकामना पूर्ति हेतु
हर रोज नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत 108 बिल्वपत्र के ऊपर सफेद चंदन से ॐ नम: शिवाय चंदन की लकड़ी से लिखें। महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग पर चढ़ा दें। संपूर्ण मनोकामना पूर्ण होगी।

धन की प्राप्ति हेतु
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद धन की प्राप्ति नहीं होने पर किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार को यह उपाय प्रारंभ करें। और लगातार एक साल तक करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत किसी तांबे के पात्र स्वच्छ जल भर के उसमें थोड़ा गंगा जल और शहद मिलाकर सूर्योदय से पूर्व शिवलिंग पर ॐ नम: शिवाय का जाप करते हुए चढ़ा दें। इससे लाभ मिलेगा।

बच्चे के कष्टों से छुटकारा हेतु
यदि आपका बच्चा बीमार है और वह जो भी खाता है, उसकी उल्टी कर देता है तो उसके उपचार के लिए एक पान के पत्ते पर एक बूंदी का लड्डू, पांच गुलाब के फूल रखकर बच्चे के ऊपर से सात बार उसार कर चुपचाप किसी मंदिर में रखकर आ जाएं, कष्टों से छुटकारा शीघ्र मिल जाएगा।

कष्ट निवारण - उपाय - 6

रुके धन की वापसी हेतु
किसी भी गणेश जी के मंदिर में हर रोज नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत पान के पत्ते पर 5 लड्डू रखकर इस मंत्र की ॐगणेश लक्ष्मी वागदेवी मम् वाक्यं सिद्धं कुरु कुरु स्वाहा 5 माला जाप श्रद्धापूर्वक जाप करने से रुका हुआ धन प्राप्त होगा। जाप के उपरांत लड्डू गाय को अपने हाथ से खिला दें।

धन और समृद्धि प्राप्ति हेतु
किसी भी रवि पुष्य नक्षत्र के दिन नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत प्रात:काल शुभ मूहर्त में अपने पूजा स्थान में संपूर्ण श्री यंत्र स्थापित करें। और हर रोज सुबह-शाम श्रद्धापूर्वक पंचोपचार पूजन करने के उपरांत मिट्टी के दीपक में घी भरकर खड़ी ज्योत लगाकर प्रज्वलित करें। तत्पश्चात तीन-तीन पाठ लक्ष्मी सूक्त, एक माला ॐ श्री विष्णवे नम: और एक माला ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौ गं गणपतये वरदये सर्वजन वश मानय ठ:ठ: ॐ मंत्र की जाप करें। ऐसा नियमित 40 दिन करने से कारोबारी समस्याओं का निवारण होगा धन की प्राप्ति होगी।

संपूर्ण कष्टों से छुटकारे हेतु
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत कांसे की थाली मे कुंकुंम केसर ढेरी बनाए चावल की ढेरी के ऊपर कनक धारा यंत्र को स्थापित करें। स्वच्छ जल में गंगाजल मिलाकर छींटा दें। कुंकुम से तिलक करें। धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प और अक्षत अर्पित कर श्रद्धापूर्वक पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्ज्वलित करें। कंबल का शुद्ध आसन बिछाकर एक माला इस ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी आगच्छ आगच्छ मम गृह तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा मंत्र की जाप करें। साथ ही इस 'ॐ वं श्री वं एं ह्रीं क्लीं कनकधारायै स्वाहा।' मंत्र की पांच माला जाप करें। ऐसा नियमित सुबह-शाम पूजन करके लगातार 40 दिन जाप करें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

आर्थिक संकट निवारण प्रयोग
नवरात्र के दूसरे दिन थोड़ी सी चाँदी खरीद कर लाएं। उस चाँदी का अपने सामने सुनहार से अपनी कनिष्टा उंगली के नाप का बिना जोड़ का छल्ला बनाएं। और रात्रि 10 से 12 बजे के बीच में पूजा करें। पूजा के समय लाल चौकी पर लाल वस्त्र बिछा कर 250 ग्राम शहद आए इतना बड़ा मिट्टी का पात्र और उसमें शहद भर दें। इस पात्र को चौकी के ऊपर रख दें। धूप-दीप, नेवैद्य पुष्प अक्षत अर्पित करने के बाद केसर से पात्र को तिलक करें। तत्पश्चात वह छल्ला उस पात्र में डूबों दें। और वहीं शुध्द कम्बल के आसन पर बैठ कर सफेद हकीक की माला पर सात माला ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ माँ ब्रह्मचारिणी देव्यै नम: की करें एवं सात माला कमलगट्टे की माला पर ॐ र्श्री श्रिययै नम: की जाप करें। तत्पश्चात पात्र पर मिट्टी का ढक्कन लगाकर लाल कपड़े से बांध दें। अपने ऊपर से 11 बार वार कर अपने पूजा स्थान में रख दें। प्रात: काल ब्रह्ममर्ुहूत्त में पात्र खोलकर अंगूठी को बाहर निकाल लें। पंचामृत से शुध्द कर लें। धूप-दीप जला करके एक माला पुन: ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ माँ ब्रह्मचारिणी देव्यै नम: की और एक माला ॐ र्श्री श्रिययै नम: की मानस जाप करें। सूर्योदय से पहले इस मिट्टी के पात्र को किसी शिव मंदिर में बिना किसी से बोले रख आएं। आर्थिक सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

बचत और बरकत के लिए अद्भुत प्रयोग
सम्पूर्ण प्रयास के बावजूद भी परेशानियां आपका साथ नहीं छोड़ रही है और दरिद्रता जोंक की तरह आपसे चिपकी हुई है। कठिन परिश्रम की कमाई एक पल में कहां छू मंतर हो जाती है पता ही नहीं चलता। घर में बरकत नजर ही नहीं आ रही है। अद्भुत उपाय जो मैं बताने जा रहा हूँ। नवरात्रे के दूसरे दिन यह उपाय शुरु करना बहुत ही अनुकूल माना गया है। और यह उपाय रात्रि 8 से 12 बजे के बीच में किया जाए तो बहुत ही अच्छा रहता है। एक चौकी ले लें उस पर लाल कपड़ा बिछा कर 21 मुट्ठी हल्दी से रंगे हुए चावल की ढेरी लगाएं। उसके ऊपर 11 गोमती चक्र, एक लघु दक्षिणावर्ती शंख। 11 तांबे के छेद वाले सिक्के ढेरी के ऊपर रख दें। साथ ही सर्वबाधा मुक्ति निवारण यंत्र एवं अष्टमहालक्ष्मी यंत्र और दुर्गा यंत्र भी स्थापित कर दें तो सोने में सुहागा रहेगा। कुमकुम से तिलक कर लें। धूप-दीप, अक्षत, पुष्प अर्पित कर माँ भगवती से प्रार्थना करें। शुध्द कम्बल का आसन बिछा कर मूंगे की माला पर पांच माला ॐ गं गणपतये नम:॥, दो माला ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ माँ ब्रह्मचारिणी देव्यै नम: और एक माला लक्ष्मी बीज मंत्र ॐ ह्रीं पद्मे स्वाहा। की मानस जाप करें। तत्पश्चात समस्त सामग्री अपने ऊपर से 11 बार उसार कर घर के किसी मंदिर या शुध्द कोने में रख दें। प्रात: काल ब्रह्ममर्ुहूत्त में यह समस्त सामग्री जल में प्रवाहित कर दें।

सम्पूर्ण कष्ट निवारण प्रयोग
यदि आपको आपके व्यापारिक कार्यों में अप्रत्याशितबाधाएं आ रहीं हैं तो आज के दिन यह उपाय शुरु करें। घी का दीपक जला दें। एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ चंद्रघंटा देव्यै नम:, एक पाठ श्री गणेश स्तोत्र प्रतिदिन सुबह नियमित रूप से करें। पूजा करने के उपरांत हर रोज गाय को हरी घास खिलाएं। हरा चारा डालें। ऐसा 43 दिन, 86 दिन या 172 दिन करें।

बाधा निवारण और बाधा विनाशक प्रयोग
यदि किसी के भी साथ अप्रत्याशित, बार-बार बिना किसी कारण परेशानी आ रही हो, मन बेचेन रहता हो, अनहोनी दुर्घटनाएं घट रही हों और एक्सीडेंट होता हो तो 800 ग्राम चावल दूध से धो कर पवित्र पात्र में अपने सामने रख लें और एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ चंद्रघंटा देव्यै नम: और एक माला मंगलकारी शनि मंत्र का जाप करें। तत्पश्चात इस सामग्री को अपने ऊपर से 11 बार उसार करके किसी तालाब अथवा बहते पानी में प्रवाह करें और दूध किसी कुत्ते को पिला दें। यह उपाय लगातार 43 दिनों तक करें। इस समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।

आयु, यश, बल व ऐश्वर्य प्रदान करने वाला अद्भुत प्रयोग
सम्पूर्ण परिश्रम, प्रयास और कठिन मेहनत के बावजूद बदनामी का सामना करना पड़ रहा हो, समाज में जग हंसाई हो रही हो, व्यापार वृध्दि के लिए किए गए सम्पूर्ण प्रयास विफल हो रहे हो, तो आज का दिन उन लोगों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। चार कुम्हड़े (काशीफल या कद्दू), चौकी पर लाल कपड़ा बिछा कर इन सबको उस पर रख दें। धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प अर्पित करने के बाद पांच माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम:, एक माला ॐ शं शनैश्चराय नम: का जाप करें। तत्पश्चात इनको अपने ऊपर से 11 बार उसार लें, उसारने के बाद छोटे-छोटे टुकड़े करके किसी तालाब में डाल दें। सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी।

चर्म रोगों से छुटकारा के लिए अद्भुत प्रयोग
जिन्हें बार-बार, शरीर में फोड़ा-फुंसी होती हो या कोई न कोई चर्म रोग हमेशा रहता हो उन्हें आज के दिन यह उपाय प्रारम्भ करना लाभदाय रहेगा। एक चाँदी की कटोरी ले लें उसमें स्वच्छ जल भर कर 18 पत्ते तुलसी के, 9 पत्ते नीम के और 3 पत्ते बेलपत्र के डाल लें। अपने सामने स्वच्छ आसन पर रख दें। तत्पश्चात घी का दीपक और चंदन का धूप जला कर एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामूण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम: और शनि पत्नी नाम स्तुति की एक माला करने से लाभ होगा।

डूबा हुआ पैसा प्राप्ति का सरल उपाय
यदि आपका पैसा कहीं फंस गया हो, या जिसको भी आप पैसा देते हैं वह पैसा वापस नहीं देता हो, तो 11 गोमती चक्र को हरे कपड़े में बांध कर पवित्र थाली में अपने सामने रख दें, घी का दीपक जलाएं, एक माला ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामूण्डाय विच्चे ॐ कूष्माण्डा देव्यै नम: और एक माला ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम: का जाप करें। तत्पश्चात इस सामग्री को किसी सुनसान जगह में उस व्यक्ति का ध्यान करते हुए गढ्डा खोद कर दबा दें। इस उपाय से आपका धन आपको वापस अवश्य मिलेगा। उपाय आज के दिन दोपहर 12 बजे से शुरू करें और लगातार 43 दिन तक नियमित करें।

कष्ट निवारण - उपाय - 5

शारीरिक, पारिवारिक व आर्थिक समस्या समाधान हेतु
यदि आपका कार्यक्षेत्र न्यायपालिका से जुड़ा हो, आप वहां पर क्लर्क हैं, चपरासी हैं, वकील हैं या न्यायाधीश हैं और आपको जीवन में अप्रत्याशित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। आपको आर्थिक, पारिवारिक व शारीरिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा है और कार्य में सफलता नहीं मिल रही हो तो 2 मुखी रुद्राक्ष, 4 मुखी रुद्राक्ष, 7 मुखी रुद्राक्ष और 14 मुखी रुद्राक्ष लाल धागे में गूंथकर धारण करना बहुत ही अनुकूल और शुभ फल दायक होता है।हाथ से खिलाएं तो घर में शांति आ जायेगी। ऐसा 43 दिन नियमित रूप से करें।

व्यवसायिक परेशानी का निवारण
रवि पुष्य योग के दिन नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने पूजा स्थान में लक्ष्मी बीसा यंत्र एवं कुबेर यंत्र की श्रद्धापर्वूक स्थापना करने के उपरांत धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और अक्षत से पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात शुद्ध आसन बिछाकर स्फटिक की माला पर 11 माला इस ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्यादि पताये धन धान्य समृद्धि में देही दापय दापय स्वाहा मंत्र की जाप करें। संपूर्ण व्यावसायिक परेशानियों का निवारण होगा। हर रोज इस मंत्र की सुबह-शाम एक माला जाप करने से अवश्य धन में वृद्धि होगी।

कार्य बाधा निवारण हेतु
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद कार्यों में अप्रत्याशित बाधा आ रही हो तो मंगलवार के दिन स्नानोपरांत किसी स्वच्छ मिट्टी के पात्र में श्रद्धानुसार मशरूम भरकर अपने ऊपर से 11 बार उसार कर किसी एकांत जगह में चुपचाप रखकर आने से सभी प्रकार की कार्य बाधा दूर हो जाएगी।

परिवार में सुख-शांति हेतु
यदि आपके घर में पारिवारिक सदस्यों के अक्खड़ स्वभाव के कारण नित्य कलह हो रहा हो, हर कोई मार-पीट करने के लिए उतारू हो, आपसी वैमनस्यता के कारण पारिवारिक सदस्य साथ नहीं बैठ पा रहे हों तो यह उपाय करें। रविवार के दिन 7 गोबर के दीपक में तिल का तेल भरकर प्रज्वलित कर लें। उसमें एक-एक डली गुड़ के डाल दें और पारिवारिक सदस्यों के ऊपर से 7 बार उसार करके इन दीपकों को घर की मुख्य चौखट के सामने रख दें। परिवार में सुख-शांति रहेगी और कष्टों से छुटकारा मिल जाएगा।

बुरी नजर से बचाव हेतु
यदि आपके परिवार में हमेशा कलह रहता हो पारिवारिक सदस्य सुख-शांति से न रहती हों तो शनिवार के दिन सुबह काले कपड़े में जटा वाले नारियल को लपेटकर उस पर काजल की 21 बिंदी लगा लें। और घर के बाहर लटका दें। हमेशा घर बुरी नजर से बच कर रहेगा और हमेशा सुख-शांति रहेगी।

काम में मन लगाने के लिए
यदि आपका मन काम में नहीं लग रहा हो, हमेशा आलस्य रहता हो तो शनिवार के दिन यह उपाय करें: मिट्टी के सात सकोरे में देसी गाय का कच्चा दूध भरे। अपने ऊपर से सात बार उसार कर यह दूध किसी कुत्ते को पिला दें। इस परेशानी से छुटकारा मिल जाएगा।

व्यवसायिक समस्याओं के निवारण हेतु
व्यवसायिक समस्याओं के निवारण के लिए व्यवसायिक सात दाने फिटकरी के, सात साबुत नमक की डली, सात देसी चने के दाने अपने दुकान में खड़े होकर के अपने ऊपर से 21 बार उसारे और अपने व्यवसायिक स्थल से बाहर किसी तिराहे पर जाकर दक्षिण दिशा की ओर उछाल दें। बिना पीछे देखे अपने व्यावसायिक स्थल पर लौट आएं। समस्याओं का निवारण होगा।

पढ़ाई में मन लगाने हेतु
आपके बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा हो, हमेशा इधर-उधर भटकता फिरता है, न समय पर सोता है, न समय पर खाता है, बहुत ज्यादा जिद्द करता है तो ऐसी अवस्था में शनिवार के दिन 7 लाल मिर्च, 7 चुटकी अजवायन, 7 काली मिर्च, 21 दानें पीली सरसों किसी मिट्टी के पात्र में आग जलाकर उसमें डाल दें। उस पात्र को अपने बच्चे के ऊपर से 7 बार उसारे और उसका धुआं भी बच्चे को दिखाएं ऐसा लगातार 7 दिन करने से परेशानियों से छुटकारा मिल जाएगा।

व्यापारिक समस्याओं का निवारण
किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत पीले कपड़े में हल्दी से रंगे हुए सात मुट्ठी पीले चावल, सात गोमती चक्र, सात कौड़ी रखकर उसको पोटली बना दें। पोटली के ऊपर हल्दी, कुंकुम और केसर से सात स्वास्तिक बनाएं। तत्पश्वचात इस पोटली को लेकर संपूर्ण घर की परिक्रमा करते हुए घर से बाहर निकल जाए और किसी बहते पानी में या सरोवर या तालाब में प्रवाह कर दें। व्यापारिक समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

भय निवारण
यदि आपका छोटा बच्चा रात में हमेशा डरता है या अनावश्यक रोता है तो बच्चे के सिरहाने पर हरे कपड़े में 7 डली फिटकरी बांधकर रख दें। उसे रात में डर नहीं लगेगा। सुबह उस फिटकरी को तालाब में प्रवाह कर दें।

कष्ट निवारण - उपाय - 4

दुर्घटना से बचाव हेतु
आपके वाहन में काले धागे में 7 पीली कौड़ियां, 7 तांबे वाले छेद वाले सिक्के बांधकर लटका देने से आपका वाहन हमेशा दुर्घटनाओं से बचा रहेगा।

धन प्राप्ति
कनकधारा यंत्र की अपनी ही एक महिमा है यदि श्रध्दापूर्वक अपने घर में कनकधारा यंत्र को स्थापित करके नित प्रतिदिन धूप-दीप, नैवेद्य और पुष्प अर्पित करें तो बहुत लाभ होगा। इसके साथ ही प्रतिदिन घी का दीपक जला कर 'ॐ वं श्री वं एं ह्रीं क्लीं कनकधारायै स्वाहा।' कनकधारा मंत्र को स्फटिक की माला पर ग्यारह माला प्रतिदिन सुबह और शाम जाप करने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और जीवन की सारी समस्याओं का निवारण हो जाता है।

रोजगार प्राप्ति हेतु
अगर आपको नौकरी या काम नहीं मिल रही हैँ तो एक दाग रहित बड़ा नींबू लें और चौराहे पर बारह बजे से पहले जाकर, उसके चार हिस्से कर लें और चारों दिशाओं में दूर-दूर फैंक दें। फलस्वरूप बेरोजगारी की समस्या समाप्त हो जाएगी।

धन-वृध्दि के स्रोत हेतु
कभी-कभी मनुष्य लाख कोशिश करता है किन्तु आमदनी हमेशा खर्च से अधिक रहती है। इसलिए उसे पूंजी में से ही खर्च करना पड़ता है। कई प्रकार के तरीके अपना कर जब भी घर में कुछ धन एकत्र होता है सहसा खर्च बढ़ जाता है और आर्थिक स्थिति पहले की तरह नाजुक ही बनी रहती है। ऐसी स्थिति से उबरने के लिए यदि शास्त्रोक्त उपाय का सहारा लिया जाए तो उससे काफी राहत मिलती है। इसके लिए जातक को शुक्ल पक्ष पर अष्टमी से पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात में चंद्रमा को दही-भात का नैवेद्य श्रध्दापूर्वक अर्पित किया जाना चाहिए। यह दही-भात का नैवेद्य को चंद्रमा को केवल केले के पत्ते पर ही समर्पित करना चाहिए। नैवेद्य को चाँदी की छोटी सी कटोरी में भी रखा जा सकता है। नैवेद्य के पास शुध्द घी का दीपक जलाकर अवश्य रखें। साथ ही एक माला लक्ष्मी बीज मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीदं। श्रीं ह्रीं महालक्ष्म्यै नम:। का भी जाप करें। पूर्णिमा के दिन जो नैवेद्य चन्द्रमा को अर्पित करें, उसका थोड़ा प्रसाद स्वयं भी ग्रहण करें। इस उपाय से बड़ी सरलता से धन-वृध्दि के नए-नए स्रोत खुलने लगते हैं।

धन हानि रोकने हेतु
यदि अप्रत्याशित व्यावसायिक परेशानियों से जूझना पड़ रहा हो तो किसी भी रविवार के दिन नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत रवि की होरा में अपने पूजा स्थान में मां लक्ष्मी के श्रीविग्रह की स्थापना करें। साथ में व्यापाार वृद्धि यंत्र भी स्थापित करें। तत्पश्चात पूजा स्थान में चौकी बिछाकर उसपर पीला वस्त्र बिछा दें। उस पर हल्दी से रंगे हुए चावलों की 9 ढेरी बनाएं। प्रत्येक ढेरी पर 9 चौमुखा घी का दीपक प्रज्वलित करें। तत्पश्चात 108 कमलगट्टे के ऊपर मां लक्ष्मी क ध्यान करते हुए केसर से 'श्री' अंकित करें। प्रत्येक कमलगट्टे को अपने हाथ में लेकर इस मंत्र का जाप करते हुए कमलगट्टे को लक्ष्मी के श्रीचरणों में अर्पित कर दें। ऐसा 108 कमलगट्टे को जाप करते हुए अर्पित कर दें। पूजा समाप्ति के बाद श्रद्धापूर्वक एक कमल गट्टा मां लक्ष्मी से मांगकर पीले कपड़े में लपेट कर अपनी तिजोरी में रख दें। मां लक्ष्मी की कृपा होगी। परिवार में सुख-शांति रहेगी और धन हानि का भय कभी नहीं रहेगा।

शत्रु षडयन्त्र
जिन जातक-जातिकाओं को अप्रत्याशित रूप से लगातार शत्रु षडयन्त्र की वजह से कारोबार में हानि, चोरी आदि का सामना करना पड़ रहा हो तो उनसे मुक्ति पाने के लिए वे इस उपाय से लाभ उठा सकते हैं। यह उपाय अचूक है। इसके लिए अपने ही हाथों से अमावस्या तिथि को कुश उखाड़ लें और उसकी जड़ ले आएं। फिर उस जड़ को बिल्व (बेल) के पंचांग तथा सिन्दूर के साथ चूर्ण बनाकर उससे चन्दन की लकड़ी की कलम से भोजपत्र के ऊपर - 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि अन्नपूर्णे स्वाहा।' मंत्र को लिखें। उसके बाद इस भोजपत्र पर लिखे मंत्र को कांसे की थाली पर रख दें, पंचोपचार से उसका पूजन करें। बाद में देसी गाय के घी का दीपक जला कर इस मंत्र की तीन माला प्रतिदिन करें और ऐसा 44 दिनों तक करें। जितनी माला रोज हो जाए उसके दशांश का हवन प्रतिदिन करें। ऐसा लगातार 44 दिनों तक करें। श्रध्दा भाव से यदि आप इस प्रयोग को करते हैं तो कष्ट मिटेंगे साथ ही धन लाभ भी होगा।

बरकत हेतु
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी घर में पैसा नहीं टिकता हो, हमेशा मांगने वाले दरवाजे पर खड़े रहते हो, पैसे को लेकर हमेशा दयनीय स्थिति बनी रहती हो तो किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार के दिन यह प्रयोग आरंभ करें। और नियमित 40 दिन करने से घर में धन की कमी नहीं रहेगी। नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत घर के मुख्य द्वार पर कुंकुम से त्रिकोण बनाएं और त्रिकोण के मध्य में चौमुखा तिल के तेल का दीपक रख दें साथ में एक लोटा जल भी भरकर रख दें। दीपक प्रज्वलित करने के बाद एक परिक्र मा दीपक की कर लें और अपने घर में आ जाएं। जब दीपक बुझ जाएं तो बचे हुए तेल व दीपक को पीपल के पेड़ में चढ़ा दें और जल भी अर्पित कर दें। ऐसा करने से धन बहुत ही सरलता पूर्वक प्राप्त होगा।

व्यवसाय में उतार-चढ़ाव
यदि आपका कार्य हमेशा रुक-रुक कर होता हो या आपके व्यवसाय में हमेशा उतार-चढ़ाव का दौर चलता रहता हो, कारोबार में घाटा आपका पीछा नहीं छोड़ रहा हो तो यह उपाय किसी भी शनिवार को प्रारंभ करें। हर रोज एक ही निर्धारित समय पर इस उपाय को करें। नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने पूजा स्थान में एक जगह सुंदर गाय के गोबर से लीप-पोत कर शुद्ध कर लें। उस पर कुं कुंम हल्दी और केसर मिलाकर एक त्रिकोण बनाएं। त्रिकोण के तीनों कोणों पर सिंदुर से ह्री लिख दें। और त्रिकोण के मध्य में अपनी कंपनी का नाम लिखें। अब 21 मूुट्टी साबुत उड़द उस पर बिछा दें। उड़द के ऊपर कंबल का सुंदर आसन बिछा कर अपने सामने चौमुखा घी का दीपक जला कर श्री महा लक्ष्मी का श्रद्धापूर्वक ध्यान करें और इस मंत्र की पांच माला जाप करें। ऐसा नियमित 186 दिन करें। पूजन सामग्री हर रोज नवीन प्रयोग में लाना बहुत जरूरी है।

श्री वृद्धि के लिए
आपके घर में लक्ष्मी की वृद्धि हो इसके लिए आप नियमित रूप से नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत अपने पूजा स्थान में हनुमान जी के आगे घी का दीपक प्रज्वलित करके हर रोज शाम इस ॐ नमो हनुमते भय भंजनाय सुखम् कुरु-कुरु फट् स्वाहा मंत्र की 11 माला का जाप 40 दिन नियमित करने से संपूर्ण सुख-समृद्धि व धन की वृद्धि होती है।

कारोबार में घाटा
यदि कारोबार में अनावश्यक विघ् आ रहा हो, व्यापार में घाटा हो रहा हो, कर्मचारी साथ नहीं दे रहे हो, हमेशा कोई न कोई बात को लेकर व्यावसायिक प्रतिष्ठान में परेशानी आ रही हो तो किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अपने पूजा स्थान मेंं मां दुर्गा श्री विग्रह एवं दुर्गा यंत्र की स्थापना करें। और हर रोज एक पाठ दुर्गा सप्तशती का करें ऐसा 108 दिन नियमित पाठ करने से संपूर्ण परेशानियों का निवारण होगा। सभी प्रकार की विघ् बाधाएं दूर होंगी। मां लक्ष्मी की कृ पा भी होगी। यदि आपके पास समय नहीं है आप मजबूर है ऐसी अवस्था में केवल चौथे अध्याय एवं कवच, अर्गला, कीलक, नवार्ण या सिद्धि कुंजी स्तोत्र का पाठ करने से भी उतना ही लाभ मिलेगा।

कष्ट निवारण - उपाय - 3

कार्य में सफलता प्राप्ति हेतु
किसी भी शुभकार्य सौदे या समझौते पर जाने से पूर्व अपने पूजा स्थान में घी का दीपक जलाकर मां भगवती का ध्यान करते हुए सर्वमंगल मांगल्ये शिवेसर्वासाधिके शरण्येत्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते। मंत्र का जाप करके घर से बाहर निकलें, सफलता मिलेगी।

दांपत्य संबंधों में प्रगाढ़ता के लिए
यदि पति-पत्नी दोनों एक साथ रहने में कठिनाई महसूस करते हों, एक-साथ रहने के सारे प्रयास यदि विफल हो रहे हों तो किसी भी सोमवार के दिन दोनों पति-पत्नी अशोक वृक्ष की पूजा करके 11 पत्ते तोड़कर लाएं। स्वच्छ जल व गंगाजल से पवित्र करके दोनों पति-पत्नी पंचोपचार पूजन करें। हर रोज घी का दीपक जलाकर एक माला गायत्री मंत्र की जाप करें। ऐसा वापस सोमवार आएं तब तक करें। सोमवार के दिन नए पत्ते रखें और पुराने पत्ते बहते पानी में प्रवाह कर दें। ऐसा करने से दांपत्य प्रेम प्रगाढ़ हो जाएगा।

परीक्षा से भय
यदि आपका बच्चा परीक्षा देते समय घबराता हो, यदि वह याद किया हुआ पाठ भूल जाता हो तो यह उपाय परीक्षा के एक महीने पूर्व शुरू कर दें। हर रोज गणेश जी के मंदिर में जाकर 11 बूंदी के लडडू चढ़ाएं, और वहीं बैठकर ॐ वक्रतुण्डाय महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:। निर्विघं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा। साथ ही इस एकदन्तो महाबुद्धिये, सर्वज्ञो गणनायक:। सर्वसिद्धि करो देवा गौरी पुत्र विनायक:॥ मंत्र का 11 बार जाप करें। ऐसा पूरे महीने हर रोज करें। सफलता मिलेगी।

परेशानियों से छुटकारा हेतु
हर रोज नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत हनुमान जी के मंदिर में मिट्टी के दीपक में चमेली का तेल भरकर पांच बत्ती का दीपक प्रज्वलित करें और वहीं बैठ कर एक पाठ हनुमान बाहुक का रोज करने से सभी प्रकार की बाधायें व परेशानियों का निवारण हो जाएगा।

गृह-बाधा शमन व सुरक्षा हेतु
हर रोज स्नानोपरांत मुख्य दरवाजे के बाहर कुंकुंम व केसर घोलकर स्वास्तिक बनाएं। उसके ऊपर हल्दी से रंगे पीले चावल की ढेरी बनाए और ढेरी के ऊपर चौमुखा घी का दीपक रख दें। ऐसा नियमित करने से आपका घर समस्त प्रकार की बाधाओं से सुरक्षित रहेगा।

दांपत्य सुख में वृद्धि के उपाय
विवाह-शादी के सात दिन पूर्व पीले कपड़े में नौ हल्दी साबुत गांठ, 9 पुराने पीतल के सिक्के, 9 टुकडे क़ेसर, 9 टुकड़े गुड़, 9 जोड़े चने की दाल बांधकर पोटली बना दे और अपने सामने रख दें। घी का दीपक जलाकर सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्यै त्र्यम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते। इस मंत्र की 5 माला जाप करें। जाप के उपरांत अपने ऊपर से 9 बार उसार करके किसी पीपल के पेड़ के नीचे रख के आ जाएं। ऐसा नियमित 7 दिन करने से वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।

संतान सुख की उपलब्धि हेतु
संतान सुख की प्राप्ति के लिए मंगलवार के दिन अपने वजन के बराबर गेहूं का आटा पीसवा लें और उसकी 108 बड़ी गोली बना लें। इन गोलियों को अच्छी तरह सेंक कर जब यह ठंडी हो जाएं तो अपने हाथ से गाये को खिला दें। ऐसा 43 मंगलवार करें। अवश्य सफलता मिलेगी।

वैवाहिक सुख हेतु
यदि चाहते हुए वैवाहिक सुख नहीं मिल पा रहा है, हमेशा पति-पत्नी में किसी बात को लेकर अनबन रहती हो तो किसी भी शुक्रवार के दिन यह उपाय करें। मिट्टी का पात्र ले जिसमें सवा किलो मशरूम आ जाएं। मशरूम डालकर अपने सामने रख दें। पति-पत्नी दोनों ही महामृत्युंजय मंत्र की तीन माला जाप करें। तत्पश्चात इस पात्र को मां भगवती के श्री चरणों में चुपचाप रखकर आ जाएं। ऐसा करने से मां भगवती की कृपा से आपका दांपत्य जीवन सदा सुखी रहेगा।

दांपत्य सुख में वृद्धि के उपाय
विवाह-शादी के सात दिन पूर्व पीले कपड़े में नौ हल्दी साबुत गांठ, 9 पुराने पीतल के सिक्के, 9 टुकडे क़ेसर, 9 टुकड़े गुड़, 9 जोड़े चने की दाल बांधकर पोटली बना दे और अपने सामने रख दें। घी का दीपक जलाकर सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्यै त्र्यम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते। इस मंत्र की 5 माला जाप करें। जाप के उपरांत अपने ऊपर से 9 बार उसार करके किसी पीपल के पेड़ के नीचे रख के आ जाएं। ऐसा नियमित 7 दिन करने से वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।

तनाव से छुटकारा हेतु
रवि पुष्य नक्षत्र के दिन श्रद्धापूर्वक सफेद आक के पौधे का पंचोपचार यानी धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और अक्षत पूजन करें। और लकड़ी से खोदकर छोटा सा जड़ का टुकड़ा लें। इस जड़ को सफेद कपड़े में बांधकर या किसी चांदी के ताबीज में भरकर गले में धारण करने से संपूर्ण मानसिक तनाव से छुटकारा मिलेगा।

कष्ट निवारण - उपाय 2

बरकत के लिए
पूरे वर्ष सुख-शांति व आनंद से बिताने के लिए धन तेरस से लेकर दीपावली तक लगातार तीन दिन सुबह-शाम अपने पूजा स्थान में भगवान गणपति की तस्वीर के सामने चौमुखा घी का दीपक जलाकर गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र के 108 पाठ करें। पाठ के उपरांत गाय को अपने हाथ से पालक खिलाएं। इस प्रयोग से संपूर्ण कार्य बाधा समाप्त हो जाएगी।

रोजगार बाधा निवारण
जिस जातक की जन्मकुंडली में बृहस्पति की स्थिति अनुकूल नहीं हो ऐसी अवस्था में उसे कारोबार व रोजगार में समस्या आती है। इसके उपाय के लिए किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार के दिन 11 दाने सफेद गुंजा, 11 छेद वाले तांबे के सिक्के लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर घर के किसी कोने में रख दें और गाय को हर रोज गुड़ व चना खिलायें। कारोबार में लाभ होने लगेगा। ऐसा 40 दिन करें। 40 दिन के बाद समस्त सामग्री को अपने ऊपर 11 बार उसारकर के बहते पानी में प्रवाह कर दें।

धन आगमन हेतु
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी सोचा हुआ काम पूरा नहीं होता हो तो मंगलवार के दिन यह उपाय प्रारंभ करें। और लगातार 21 मंगलवार तक करते रहें। हर मंगलवार को नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत जटा वाले नारियल के ऊपर सवा मीटर लाल कपड़ा लपेटकर 21 बार कलावा लपेट लें। तत्पश्चात लाल कपड़े के ऊपर 21 कुंकुम की बिंदी लगा लें। नारियल को अपने ऊपर से 21 बार उसार कर के अपने पूजा स्थान में रख दें। वहीं बैठकर एक पाठ सुंदरकांड का पाठ करें। तपश्चात अपनी मनोकामना का ध्यान करते हुए इस नारियल को बहते पानी व तालाब में प्रवाह कर दें।

मनोनुकूल कार्य-सफलता
मनोनुकूल कार्य-सफलता प्राप्त करने के लिए गुरुवार के दिन अपने पूजा स्थान में पूर्व दिशा में मुंह करके बैठ जाएं। स्वच्छ पात्र में 7 लौंग फूल सहित, 7 कपूर की डली रख दें। मां गायत्री का ध्यान करते हुए कपूर और लौंग को जला लें। जब तक कपूर और लौंग जले गायत्री मंत्र का जाप करते रहना चाहिए। जलने के बाद बनी भस्म को प्रतिदिन तीन बार गायत्री मंत्र का जाप करने के बाद तिलक लगा लें। सफलता मिलेगी।

मनोकामना पूर्ति हेतु
हर रोज नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत 108 बिल्वपत्र के ऊपर सफेद चंदन से ॐ नम: शिवाय चंदन की लकड़ी से लिखें। महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए उसे शिवलिंग पर चढ़ा दें। इससे संपूर्ण मनोकामना पूर्ण होगी।

व्यापारिक समस्याओं के समाधान हेतु
किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत पीले कपड़े में हल्दी से रंगे हुए सात मुट्ठी पीले चावल, सात गोमती चक्र, सात कौड़ी रखकर उसको पोटली बना दें। पोटली के ऊपर हल्दी, कुंकुम और केसर से सात स्वस्तिक बनाएं। तत्पश्चात इस पोटली को लेकर संपूर्ण घर की परिक्रमा करते हुए घर से बाहर निकल जाएं और किसी बहते पानी में या सरोवर या तालाब में प्रवाह कर दें। इससे व्यापारिक समस्याओं का निवारण हो जाएगा।

बच्चे का भय दूर करने के लिए
एक लोहे के तवे के ऊपर 21 कुंकुम की बिंदी लगाएं। उस तवे को बच्चे के ऊपर से 11 बार उसार कर बच्चे की चारपाई के नीचे उलटा रखने से बच्चा भय से मुक्त हो जाता है और रोता भी नहीं।

धन लाभ हेतु
किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार के दिन यह उपाय आरंभ करें और लगातार 7 शुक्रवार को करें। हर शुक्रवार के दिन सायंकाल मां भगवती के मंदिर में जाकर नौ वर्ष से छोटी उम्र की सात कन्याओं को श्रद्धानुसार भोजन कराएं। भोजन में खीर और मिश्री का प्रसाद अवश्य होना चाहिए। भोजन के उपरांत कन्याओं का पूजन करें और वस्त्र और दक्षिणा समर्पित करें। इससे धन लाभ होगा।

बाधा निवारण हेतु
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद कार्यों में अप्रत्याशित बाधा आ रही हो तो मंगलवार के दिन स्नानोपरांत किसी स्वच्छ मिट्टी के पात्र में श्रद्धानुसार मशरूम भरकर अपने ऊपर से 11 बार उसार कर किसी एकांत जगह में चुपचाप रखकर आने से सभी प्रकार की कार्य बाधा दूर हो जाएगी।

रोजगार प्राप्ति हेतु
संपूर्ण प्रयास करने के बावजूद आर्थिक संपन्नता नहीं हो रही हो, घर में धन आ ही नहीं रहा हो तो किसी भी महीने के प्रथम बुधवार के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर स्नानोपरांत ब्रह्म मर्ुहूत्त में तीन मिट्टी के पात्र लें। एक पात्र में हरा कपड़ा बिछाकर सवा किलो साबुत मूंग भर दें। दूसरे पात्र में नीला कपड़ा बिछाकर सवा किलो साबुत उड़द भर दें। तीसरे पात्र में सफेद कपड़ा बिछकार साबुत नमक भर दें। तीनों पात्रों के मुंह उसी रंग के कपडे से ढक दें और इन तीनों पात्रों को घर के ईशान कोण में गङ्ढा खोदकर दबा दें। कारोबार में सफलता अवश्य प्राप्त होगी।

कुछ ज्ञातव्य बातें ( kuch Gyaatvy baaten )

त्रिदेव - ब्रह्मा-सर्जक, विष्णु-पालक, शिव-संहारक।
तीन गुण - सत्व, रज, तम।
तीन काल - भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल।
तीन लोक - स्वर्ग्लोग, मृत्युलोक, पाताललोक।
ताप त्रय - दाहिक, दैविक, भौतिक।
चार आश्रम - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास।
चतुर्युग - सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग।
चार धाम - पूर्व में जगन्नाथ, पश्चिम में द्वारिका, उत्तर में केदारनाथ और दक्षिण में रामेश्वरम।
चार पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
चार अन्तरेंद्रिय - मन, बुद्धि, चित और अहंकार।
पांच ज्ञानेन्द्रियाँ - नेत्र, कान, नासिका, जीभ, त्वचा।
पांच कामेंद्रियाँ - मुख, हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ।
पांच तत्व - पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश।
पांच प्राण वायु - प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान।
पांच सम्रदाय - वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य, सौर।
पांच पुष्प - चम्पा, आम, शमी, कमल, कनेर।
पञ्चकन्या - अहल्या, द्रौपदी, कुंती, तारा, मंदोदरी।
पंचोपचार पूजा - गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेध अर्पण करना।
पञ्च रत्न - सोना, हीरा, मोती, माणिक्य, नीलम।
पञ्चपल्लव - बट, गुलर, पीपल, आम, पाकड़, पांच वृक्षों के पत्ते पञ्चपल्लव कहे जाते हैं. पूजा के समय में प्रयोग होते हैं।
पञ्चगव्य - गो दूध, गो मूत्र, गोबर, गाय घी, गाय दही, पांच पदार्थों से पूजा से पूर्व इन से स्नान और पान आतंरिक और बाह्म शुद्धी हेतु किया जाता है।
मधुपर्क - घी, शहद और दही का मिश्रण ही मधुपर्क है।
पंचामृत - दूध, दही, घी, मधु, शक्कर के मिश्रण से तैयार होता है। पूजा अभिषेक में इस का प्रयोग किया जाता है।
पंचामृत पान करने से क्या लाभ है। दूध-बौद्धिक और मानसिक शक्ति, दही-विजय प्राप्ति, घी-विद्या प्राप्ति, मधु-आयु, शक्कर-शत्रुनाश और पाँचों के समिश्रम से भक्ति प्राप्त होती है।
षटविकार - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य।
षट रस - मधुर, अम्ल, तिक्त, कटु, लावन, कषाय।
वेद के छ: अंग - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छ्न्द, नीरूक्त।
गृहस्थ के नित्य छ: कर्म - देव पूजन, अतिथि सत्कार, तुलसी पूजा, गौयास, सूर्य अर्द्ध, दीपदान
मुख्य छ: सरोवर - राजस्थान में पुष्कर, कुरुषेत्र में ब्रह्मसरोवर, निमिषारण्य में चक्तीर्थ, कुरुषेत्र महाभारत युद्धस्थली में ज्योतिसार, पंजाब में अमृतसर और गोवर्धन में मानसी गंगा।
सप्तसागर - क्षारोद, इक्षुरसोद, सुरोद, घृतोद, क्षोरोद, दधिमण्डोद, शुद्धोद।
सप्तद्विप - जम्बू, प्लक्ष, शालमलि, कुश, कौंच शाक, पुष्कर।
सात प्रकार का दान - अन्न, सम्पत्ति, बुद्धि, श्रम, रक्त, जीव, कन्यादान।
सप्त ऋषि - गौतम, भारद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, वशिश्ठ, कश्यप, अत्रि।
सप्तपुरि - काशी, कांची, माया, (हरिद्वार), अयोध्या, द्वारिका, मथुरा अवन्तिका (उज्जैन)।
प्रमुख सात बन - काम्यक, अदिति, व्यास, फ़लकी, सूर्य, मधु, पुण्यशीत।
प्रमुख सात नदियां - गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिन्ध, कावेरी।
सात पर्वत - हिमालय, निषध, विन्ध्य, माल्यवान, पारियात्र, गंधमादन, हेमकूट।
अष्टगंध - चंदन, अगर, देवदारु, केसर, कपूर्र, जटामासी, गोरोचन, शैलज, आदि का मिश्रन यन्त्र लेखन में प्रयोग किया जात है।
अष्टांग अर्ध - जल, दूध, कुश, दही, अक्षत, तिल, जौ, पीली सरसों इन आठ वस्तुओं को मिला कर सूर्य अर्ध दिया जाता है.
नौ धातुएं - सोना चांदी, तांबा, पीतल, कांसा, सीसा, जस्ता, रांगा और लोहा।
नवधा भक्ति - श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, बंदन, सख्य, दास्य, आत्मनिवदन।
नौ भूभाग - भारत, इलावर्त, किंपुरुष, भद्र, केतुमाल, हरि, हिरण्य, रम्य, कुश।
नवदुर्गा - शैलपुत्री, ब्रह्मचरिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, सकन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नौ कुमारी - कुमारिका, त्रिमूर्ति, कल्यानी, रोहिनी, काली, चंडीका, शांभवी, दुर्गा, सुभद्रा, इन नौ कुमारियों की पूजा दुर्गा पूजन के समय नौ कन्या के रूप में होती है।
षोडशोपचार पूजा - आहावान, आसन, पाघ, अर्ध्य, आचमन, स्नान, वस्त्र यज्ञोपवीत, सुगंध, अक्षत, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद, ताम्बूल, पुष्पांजली, (प्रदक्षिना) आदि भगवान् के सोलह कला पूर्ण शरीर का निर्माण करना ही सोहल उपचार की पूजा का विधान है।
हवन हेतु उपयुक्त लकडी - शमी, ढाक, बट, पीपल, गूलर, जड, बेल, आम, चंदन कपूर्र, चीड, साल, देवदारू, और खैर के वृक्षों की लकडी हवन के लिये उत्तम है।
हवन सामग्री मिश्रण - एक भाग चावल, चावल से दो गुना घी, चावल से तीन गुना जौ, चावल से चार गुना तिल, और शक्कर इच्छानुसार का मिश्रण ही उत्तम समग्री बताई गई है।

परमात्मा में विश्वास

1. परमात्मा में सही विश्वास का अर्थ है - निर्भयता।

2. मनोविकारो पर विजय प्राप्त करना ही आत्मा दी सच्ची स्वतंत्रता है।

3. दो सबसे माहान चिकित्सक है - परमात्मा और समय।

4. शांति व सहनशीलता वातानुकूलित कक्ष जैसी शीतलता प्रदान करती है।

5. चिंताग्रस्त व्यक्ति जीवन में कई बार मरता है।

6. भय को दूर भागने के लिए ज्ञान व विवेक की प्राप्ति ही एकमात्र उपाय है।

7. गुरु के पाने के बाद कुछ और पाने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

8. यदि आपको अपने ही अन्दर शांति नहीं मिल पाती तो भला इस विश्व मे कही और कैसे पा सकते हो।

9. अविश्वासी व्यक्ति कभी शांत नहीं रह सकता, मन की शांति के बिना क्या ख़ुशी संभव है।

10. आप अनुमान लगाने का जितना अधिक प्रयत्न करेगे उतना ही अधिक परेशांन होगे।

11. क्रोधी व्यक्ति वास्तव मे स्वयम के साथ क्रोधित होता है।

12. यदि आप प्रेमयुक्त होने के साथ साथ नियमयुक्त होकर नहीं रह सकते तो आपमे अवश्य किसी शक्ति की कमी है।

अनमोल वचन

1. हमारे वचन चाहे कितने भी श्रेष्ठ क्यों न हो, परन्तु दुनिया हमे हमारे कर्मो के द्वारा पहचानती है।
2. यदि आप मरने का डर है तो इसका यही अर्थ है की आप जीवन के महत्व को ही नहीं समझते।
3. अधिक सांसारिक ज्ञान अर्जित करने से अंहकार आ सकता है, परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान जितना अधिक अर्जित करते है उतनी ही नम्रता आती है।
4 वही सबसे तेज चलता है, जो अकेला चलता है।
5. प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असम्भव नजर आता है।
6. ऊद्यम ही सफलता की कुंजी है।
7. एकाग्रता से ही विजय मिलती है।
8. कीर्ति वीरोचित कार्यो की सुगन्ध है।
9. भाग्य साहसी का साथ देता है।
10. सफलता अत्यधिक परिश्रम चाहती है।
11. विवेक बहादुरी का उत्तम अंश है।
12. कार्य उद्यम से सिद्ध होते है, मनोरथो से नही।
13. संकल्प ही मनुष्य का बल है।
14. प्रचंड वायु मे भी पहाड विचलित नही होते।
15. कर्म करने मे ही अधिकार है, फल मे नही।
16. मेहनत, हिम्मत और लगन से कल्पना साकार होती है।
17. अपने शक्तियो पर भरोसा करने वाला कभी असफल नही होता।
18. मुस्कान प्रेम की भाषा है।
19. सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता और भी दुर्लभ है।
20. अहंकार छोडे बिना सच्चा प्रेम नही किया जा सकता।
21. प्रसन्नता स्वास्थ्य देती है, विषाद रोग देते है।
22. प्रसन्न करने का उपाय है, स्वयं प्रसन्न रहना।
23. अधिकार जताने से अधिकार सिद्ध नही होता।
24. एक गुण समस्त दोषो को ढक लेता है।
25. दूसरो से प्रेम करना अपने आप से प्रेम करना है।
26. समय महान चिकित्सक है।
27. समय किसी की प्रतीक्षा नही करता।
27. हर दिन वर्ष का सर्वोत्तम दिन है।
28. एक झूठ छिपाने के लिये दस झूठ बोलने पडते है।
29. प्रकृति के सब काम धीरे-धीरे होते है।
30. बिना गुरु के ज्ञान नही होता।
31. आपकी बुद्धि ही आपका गुरु है।
32. जिग्यासा के बिना ज्ञान नही होता।
33. बिना अनुभव के कोरा शाब्दिक ज्ञान अंधा है।
34 अल्प ज्ञान खतरनाक होता है।
35. कर्म सरल है, विचार कठिन।
36. उपदेश देना सरल है, उपाय बताना कठिन।
37. धन अपना पराया नही देखता।
38. जैसा अन्न, वैसा मन।
39. अहिंसा सर्वोत्तम धर्म है।
40. बहुमत की आवाज न्याय का द्योतक नही है।
41. अन्याय मे सहयोग देना, अन्याय के ही समान है।
42. विश्वास से आश्चर्य-जनक प्रोत्साहन मिलता है।

22 अप्रैल 2010

भरोसा रखिए, आप सुरक्षित महसूस करेंगे


हमारी भक्ति एक तरह की सौदेबाजी हो गई है। मंदिर जा रहे हैं तो भगवान से यह अपेक्षा रखते हैं कि हम आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से सुरक्षित रहेंगे। अगर थोड़ी भी गड़बड़ होती है तो हमारी भक्ति डगमगा जाती है। भक्ति का सबसे बड़ा सूत्र है भरोसा, अगर आप को परमात्मा पर ही भरोसा नहीं है तो फिर आप उससे सुरक्षा की ग्यारंटी कैसे मांग सकते हैं। वास्तव में हमें उससे कुछ मांगने की जरूरत भी नहीं है, हम सिर्फ उसकी व्यवस्था पर, शक्ति पर भरोसा रखें तो बाकी वो खुद ही आपका ध्यान रखेंगे।

भक्त भगवान पर भरोसा करते हैं और सुरक्षा की ग्यारंटी भी चाहते हैं। हम जितना संसार से अपने आपको सुरक्षित रखना चाहेंगे हमें परमात्मा के प्रति विश्वास पैदा करने में उतनी ही बाधा आएगी। संसार में रहकर हम प्रयास करते हैं सुरक्षा का एक घेरा हमारे आसपास बन जाए। हमारे लिए कभी-कभी परमात्मा भी सुरक्षा करने की वस्तु हो जाता है जबकि होना चाहिए विश्वास। आप परमात्मा पर भरोसा रखिए उसके बाद भूल जाइए कि आप सुरक्षित हैं या असुरक्षित, बाकि काम ईश्वर देखेंगे। परमात्मा पर विश्वास होना अपने आपमें ही एक बहुत बड़ी सुरक्षा है।भगवान हमेशा अपने भक्तों से कहते हैं तुम लोग सुखद संभावना के पात्र हो। इसलिए असंतोष और असमंजस से बाहर निकलो। भगवान तीन तरह के भक्तों को सावधान करते हुए कहते हैं मैं उन लोगों से नाराज रहता हूं जो अन्याय करते हैं, सीधे-सीधे अन्याय सहते हैं और तीसरे वो लोग जो इन दोनों स्थितियों को देखते हैं। इस मामले में मुझे मूकदर्शक और गैर जिम्मेदार लोग पसंद नहीं हैं। मैं अपने भक्तों का अंतिम समय तक और पुन: आरंभ तक साथ देता हूं। मेरे पास सुधार की संभावना है और दुलार के अनेक अवसर हैं जो मैं भक्तों के लिए सुरक्षित रखता हूं। फिर भी भक्त हैं कि वे मुझे ही धोखा देने को तैयार रहते हैं। हम भक्तों को यह समझना होगा कि अभी वह धूल ही नहीं बनी है जो भगवान की आंख में झोंकी जा सके।इसलिए सांसारिक सुरक्षाओं पर अधिक मत टिकिए। धन, भवन, रिश्ते, पद ये सब सांसारिक सुरक्षा के दृश्य हैं जो माया की तरह हैं। आज है कल नहीं रहेंगे। भवन में रहो, भवन को अपने भीतर मत रखो। धन आपके खाते में हो आपके दिल में न हो। हृदय में भगवान के प्रति विश्वास हो तो देह को भले ही संसार में उतार दें फिर खतरा नहीं रहेगा।

ज्ञान के साथ ही अपनी चैतन्यता को जागृत करें

हम जब कोई ज्ञान हासिल करते हैं तो उसी के बोझ तले दब जाते हैं। वह ज्ञान ही हमें संपूर्ण लगने लगता है। हम अपनी चेतनता पर ध्यान नहीं देते केवल उस ज्ञान के बखान में लग जाते हैं। इससे नुकसान यह होता है कि हम जीने का अपना स्वभाव खो देते हैं। जबकि ज्ञानी जिसका ज्ञान उसकी चेतनता पर हावी नहीं होता वह उस ज्ञान को अपने जीने में लगाता है और जीने के कहीं ज्यादा लुत्फ भी उठाता है।

महापुरुषों की एक विशेषता होती है वे जितना जानते हैं उससे अधिक उसे जी लेते हैं। उनका ज्ञान उनकी चैतन्यता पर हावी नहीं हो पाता। वे ज्ञान के बोझ से दबते नहीं वे चैतन्यता के बोध से हल्के रहते हैं और इसी से उनके जीवन में एक संतुलन आ जाता है। किसी भी धर्म के धर्मगुरु या महान पुरुष हुए हों उन्होंने अपने अभाव और अपनी समृद्धि को अपनी अध्यात्म की यात्रा में साधक बनाया बाधक नहीं। जिनका इस्लाम से कम परिचय है ऐसे लोग शायद ही जानते होंगे कि हजरत मोहम्मद का बचपन बहुत कष्टों में बीता था। पिता की मृत्यु जन्म से दो महिने पहले ही हो चुकी थी। उनकी उम्र जब ६ साल की थी तो उनकी मां अमीना बीबी उन्हें लेकर मदीना गईं लेकिन रास्ते में मां का देहांत हो गया। अनाथ बालक मोहम्मद किसी तरह वापस मक्का लौटे। दादा बूढ़े थे और गरीब भी। लेहाजा मोहम्मद पढ़-लिख नहीं सके । लेकिन जाते-जाते दादा ने मोहम्मद को अपने दूसरे बेटे अबू तालीब के हवाले कर दिया। चाचा ने पाला लेकिन अभाव ने मोहम्मद के भीतर गजब की समझदारी भर दी। ऐसा कहते हैं जब उनकी उम्र १३ साल थी तब व्यापार के सिलसिले में उनके चाचा उन्हें सीरिया ले गए थे। जिनसे भी मोहम्मद मिलते लोग प्रभावित हो जाते। बातों की प्रस्तुति वे इतनी प्रभावशाली करते थे कि एक ईसाई पादरी उनके भीतर की आध्यात्मिकता को देखकर दंग रह गए। आगे जाकर मोहम्मद क्या हुए ये दुनिया जानती है। इंसान की जिंदगी में सुविधाएं होना जरूरी नहीं है। प्रतिकूलताएं भी प्रगति का करण बन सकती हैं यदि जाने हुए को जीने की कला आ जाए। सोचने से जीवन के सत्य हाथ नहीं आते। उन्हें पकड़ना हो तो जीना पड़ता है। मोहम्मद किसी भी उम्र में रहे हों उनका ज्ञान ही उनका अस्तित्व बन गया था। फूल में यदि सुगंध है तो वह और भी खुबसूरत हो जाता है बस महापुरुष हमें यही सिखाते हैं। कुरआन मोहम्मद की सुगंध का नाम है।

रिश्ता कोई भी हो, उसमें पवित्रता जरूरी है

आधुनिकता से एक नुकसान यह हुआ है कि हमारी निजता अपवित्र हो रही है। सामाजिक जीवन में पारदर्शिता नहीं बची। रिश्तों के सहेजना और उनकी गरिमा को बरकरार रखना जरूरी है। अगर हमारा निजत्व ही पवित्र नहीं है तो फिर हम परमात्मा के पथ से काफी दूर हो जाएंगे। कोशिश करें अपने रिश्ते दुनिया और दुनिया बनाने वाले दोनों से ही पवित्र हों।

इस समय रिश्तों की व्यवहारिकता पर जोर दिया जाता है जबकि ध्यान दिया जाना चाहिए पवित्रता पर। आपसी संबंध उपहारों की तरह बना दिए गए हैं। इस हाथ दो, उस हाथ लो। रिश्तों में जब लेने-देने की नीयत आ जाए तब जीवन में लोभ, स्वार्थ, षडयंत्र और अशांति आना ही है। जैसे हम दुनिया में इस तरह से रिश्ते निभा रहे हैं वैसे ही दुनिया बनाने वाले भी निभाने लगते हैं और यहीं से गड़बड़ शुरु हो जाती है। भगवान से हमारा रिश्ता कैसे हो यह सवाल हर भक्त के मन में आता रहता है। क्या हम करें और क्या वो करेगा सवाल के इस झूले में हमारी भक्ति झूलती रहती है। श्रीकृष्ण अवतार में सुदामा प्रसंग इस प्रoA का उत्तर देता है। सांदीपनि आश्रम में बचपन में श्रीकृष्ण-सुदामा साथ पढ़े थे। बाद में श्रीकृष्ण राजमहल में पहुंच गए और सुदामा गरीब ही रह गए। सुदामा की पत्नी ने दबाव बनाया और सुदामा श्रीकृष्ण से कुछ सहायता लेने के लिहाज से द्वारिका आए। एक मित्र दूसरे मित्र से कैसे व्यवहार करे इसका आदर्श प्रस्तुत किया श्रीकृष्ण ने। खूब सम्मान दिया सुदामा को लेकिन विदा करते समय खाली हाथ भेज दिया। वह तो बाद में अपने गांव जाकर सुदामा को पता लगा श्रीकृष्ण ने उनकी सारी दुनिया ही बदल दी। भगवान के लेने और देने के अपने अलग ही तरीके होते हैं। बस हमें इन्हे समझना पड़ता है। वह दिखाकर नहीं देता पर खुलकर देता है। इस प्रसंग का खास पहलू यह है कि सुदामा ने पूछा था कृष्ण मैं गरीब क्यों रह गया। आपका भक्त होकर भी? श्रीकृष्ण बोले थे बचपन की याद करो, गुरु माता ने एक बार तुम्हे चने दिए थे कि जब जंगल में लकड़ी लेने जाओ तो कृष्ण के साथ बांटकर खा लेना। तुमने वो चने अकेले खा लिए, मेरे हिस्से के भी। जब मैंने पूछा था तो तुम्हारा जवाब था, कुछ खा नहीं रहा हूं बस ठंड से दांत बज रहे हैं। भगवान की घोषणा है जो मेरे हिस्से का खाता है और मुझसे झूठ बोलता है उसे दरिद्र होना पड़ेगा।

सिर्फ बड़े होने से नहीं आता बड़प्पन

कई लोगों को यह शिकायत होती है कि वे घर, परिवार या समाज के बड़े हैं लेकिन उन्हें वैसा सम्मान नहीं मिलता। छोटे उनकी राय को नहीं मानते, कभी-कभी तो ऐसे में घर के बड़े-बुजुर्ग डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। सम्मान का अधिकार हमारा है लेकिन जो बड़े हैं उन्हें भी एक बार यह सोचना चाहिए कि क्या वे व्यवहार, सोच और चिंतन में बड़े हैं।

हमारे व्यवहार और विचारों में भी बड़प्पन झलकना चाहिए। जो लोग घर में या किसी व्यवस्था में उम्र में बड़े हों, शीर्ष पद पर हों उन्हें निर्णय लेने में गहराई और दूरदर्शिता बनाए रखना चाहिए। श्रीराम के एक निर्णय से संकेत मिलता है। जब विभीषण ने श्रीराम की शरण ली। श्रीराम ने शरणागत वत्सलता की रघुकुल रीत निभाई और विभीषण के सिर पर कृपा का हाथ रख दिया। श्रीराम के मित्र और वानरराज सुग्रीव इस निर्णय से सहमत नहीं थे। उन्होंने राय दी थी - भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बांधि मोहि अस भावा।। कहा- ‘‘हे रघुवीर! विभीषण पर विश्वास करना ठीक नहीं है। आखिर वह शत्रु का भाई है। संभव है, हमारा भेद लेने आया हो। इसे बांधकर रखना उचित होगा।’’ सुग्रीव अपनी असहमति की स्पष्ट राय दे चुके थे। श्रीराम ने उनका भी मान रखने के लिए कहा था - मित्र सुग्रीव, तुमने नीति तो अच्छी बताई है लेकिन मेरा प्रण है शरणागत के भय को दूर करने का। फिर श्रीराम ने विभीषण को स्वीकार किया। न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि समुद्र से जल मंगाकर विभीषण का राज्याभिषेक भी कर दिया। यहां श्रीराम का निर्णय सवरेपरि रहा।जब जीवन सामूहिक स्थितियों में हो तब शीर्ष पुरुषों को निर्णय लेने में कई एंगल पर अपना ध्यान टिकाना पड़ता है। विभीषण से सुग्रीव सहमत नहीं थे और लक्ष्मण, सुग्रीव तथा विभीषण दोनों से ही असहमत रहे किन्तु श्रीराम के लिए यह तीनों महत्वपूर्ण थे। इन तीनों से श्रीराम के जो सम्बन्ध थे उनमें हनुमान एक महत्वपूर्ण कड़ी थे। हनुमान सेवा और प्रेम का पर्याय है। श्रीराम जानते थे मुझे निर्णय मेरी दृष्टि से लेना है किन्तु सहमत और प्रसन्न सबको रखना है। बड़प्पन इसी का नाम है।

..तो गृहस्थी वैकुंठ होगी, जंजाल नहीं

आधुनिक दौर में नैतिक मूल्यों का जितना पतन हुआ है, उतना किसी का नहीं। रिश्तों की मजबूत डोर कमजोर पड़ती जा रही है, रिश्तों के बंधन अब बोझ हो गए हैं। युवाओं को दाम्पत्य अब भारी और भविष्य में रुकावट लगने लगा है। जबकि विवाह केवल एक रस्म नहीं, संस्कार है जो जीवन के लिए आवश्यक ही नहीं, कई मायनों में लाभदायक भी है।

विवाह शौक, मजबूरी, जरूरत नहीं एक दिव्य परंपरा है। ऐसी जीवन शैली है जो आध्यात्मिक और सांसारिक लक्ष्य में साधक बनती है बाधक नहीं। आज अगहन शुक्ल पंचमी, श्रीराम विवाहोत्सव को, उनके पावन प्रसंग को याद करें। नया कुछ नहीं है सभी का विवाह होता है, लेकिन यहां जो अनूठा घटा उसे जीवन से जोड़ा जा सकता है। जनकराजा की सभा में रखा धनुष टूटा था उसके पश्चात ही विवाह हो पाया था। धनुष का पूरा गठन और क्रिया अहंकार का प्रतीक है। श्रीराम ने पहले अहंकार तोड़ा फिर दाम्पत्य में प्रवेश किया था। यदि अपने-अपने अहंकार के साथ गृहस्थी आरंभ होगी तो घर को अशांति का अड्डा और उपद्रव का अखाड़ा बनने से कौन रोक सकेगा।हमारे यहां परिवारों में विवाह पूर्व वर-वधु की खूब तैयारी की जाती है। घर बाजार एक कर दिए जाते हैं। पता ही नहीं चलता कि शादी हो रही है या धंधा हो रहा है। हर रीति रीवाज पर दिखावा इतना हावी हो जाता है कि हम भूल ही जाते हैं कि परिवार प्रदर्शन पर नहीं, प्रेम पर टिका होना चाहिए।भरपूर शारीरिक और सांसारिक तैयारी के साथ युवक-युवती, पति-पत्नी बना दिए जाते हैं। पति-पत्नी बनने के पूर्व अहंकार का गलना और प्रेम के पनपने की ओर कोई ध्यान ही नहीं दे पाता। परिणाम होता है विवाह पश्चात पति-पत्नी के रूप में दो महत्वाकांक्षाएं टकरा जाती है, दो आस्तित्व भिड़ जाते हैं। अपने-अपने सपने चूर हो जाते हैं और दोषारोपण, लंबा सिलसिला शुरू होता है, संभवत: आजीवन ही।पुन: चलें श्रीराम-सीता विवाह की ओर। पहले अहंकार तोड़ा फिर वरमाला डाली, यानि एक-दूसरे की प्रत्येक गतिविधि की पूर्ण स्वीकृति प्रसन्नता के साथ। फिर गठबंधन यानि जुड़ाव। यही क्रम है भगवान से भक्ति के मिलने का। श्रीराम-सीता विवाह भक्ति के भगवान से मिलने का पर्व है। हम भी अपनी भक्ति को भगवान से जोड़ने का ऐसा प्रयास करें और इसी प्रयास को दाम्पत्य में उतारें, फिर गृहस्थी वैकुंठ होगी जंजाल नहीं।

योग्यता के साथ चाहिए निष्ठा भी

आधुनिक दौर में प्रतिभाशाली लोग तो तैयार हो रहे हैं, लेकिन उनमें नहीं है तो निष्ठा। बिना निष्ठा के हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। प्रतिभा कितनी ही ऊंची क्यों न हो लेकिन अगर उसमें निष्ठा नहीं है तो फिर वह किसी काम की नहीं। बिना निष्ठा के आने वाली प्रतिभा केवल भ्रष्टाचार लेकर आती है।

मालिक या स्वामी के प्रति निष्ठावान होना एक अच्छी व्यवस्था के लिए आदर्श स्थिति है। अपने गुण, योग्यता और परिश्रम के कारण ही कोई व्यक्ति शीर्ष पर होता है और स्वामी या मालिक की भूमिका में रहता है। बॉस इज ऑलवेज करेक्ट का एक अर्थ यह होता है कि अपनी शीर्ष व्यवस्था के प्रति हमारी प्रतिबद्घता। हस्तिनापुर की राजगादी के प्रति भीष्म की निष्ठा इसी का प्रतीक है। उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि आजीवन विवाह नहीं करेंगे। इच्छामृत्यु के वरदान से विभूषित भीष्म का यह भी संकल्प था कि हस्तिनापुर की गादी पर बैठने वाले हर राजा में अपने पिता की छवि देखेंगे। धृतराष्ट्र राजा बने और उन्होंने भीष्म की इच्छा के प्रतिकूल कई निर्णय भी लिए। राज्य का बंटवारा हो या द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग या फिर युद्ध का निर्णय। न चाहते हुए भी भीष्म राजगादी के निर्णयों का सम्मान करते रहे। दुर्योधन से भीष्म सभी प्रकार से असहमत रहते थे। किंतु चूंकि वह राजा था अत: उसके पक्ष में युद्ध के लिए वे संकल्पित भी थे। जब युद्ध में भीष्म ने पांडव सेना को परेशान कर दिया था तब पांडवों ने भीष्म के पास जाकर सलाह लेने का विचार किया था। उस समय युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को एक प्रसंग सुनाया था। समयस्तु कृत: कश्चिन्मम भीष्णोम संयुगे। मन्त्रायिष्ये तवार्थाय न तु तोत्स्ये कथश्चन। दुर्योधनार्थ योत्स्यामि सत्यमेवदिति प्रभो॥ मेरी भीष्मजी के साथ एक शर्त हो चुकी है। उन्होंने कहा है कि मैं युद्ध में तुम्हारे हित के लिए सलाह दे सकता हूं परंतु तुम्हारी ओर से किसी प्रकार का युद्ध नहीं करूंगा। युद्ध तो मैं केवल दुर्योधन के लिए ही करूंगा। भीष्म का यह सिद्धांत संपूर्ण रूप से सही न होते हुए भी इतना संदेश तो देता है कि लॉयल्टी बनाए रखना चाहिए। निष्ठा भी एक योग्यता बन जाती है किन्तु योग्यता में यदि निष्ठा न हो तो वह भ्रष्टाचार को जन्म दे देती है।

भगवान का अनमोल तोहफा है जीवन

भगवान ने मनुष्य जीवन के रूप में हमें अनमोल तोहफा दिया है। सो इसका लुत्फ उठाएं, इसे नुकसान न पहुंचाएं। प्रतिस्पर्धी दौर में सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि हमारी युवा पीढ़ी का आत्मबल कमजोर पढ़ गया। किताबी ज्ञान की होड़ में दौड़ रहे लोग अध्यात्म से दूर हो गए। यहीं से सिलसिला शुरू हुआ है हमारे आत्मबल के पतन का।

असली त्याग तब होता है जब आप ये जान लेते हैं कि हमारा कुछ भी नहीं है और जब इस भाव से छोड़ते हैं तब त्याग घटता है। लोग संसार छोड़ने की बात करते हैं लेकिन गहराई में देखा जाए तो संसार हमारा है ही कहां जिसे हम छोड़ेंगे। इसे समझ लेंगे तो संसार में रहने का मजा ही बदल जाएगा। गौतम बुद्ध ने एक बड़ी सुंदर बात कही है। जैसे भंवरा फूल और उसकी गंध को बिना नुकसान पहुंचाए उसका रस ले लेता है वैसे ही हमारे मुनिगण गांव में भिक्षाटन करें। बात बहुत बढ़िया है। जैसे भंवरा बिना कोई नुकसान किए रस लेकर चल दिया वैसे ही हम जिंदगी को बिना कोई हानि पहुंचाए जीवन को जी लें। यह अहिंसा का उदाहरण है। हम रस तो ले सकते हैं पर किसी को नुकसान पहुंचाने के अधिकारी नहीं हैं। अहिंसा का ऐसा भाव जीवन में आते ही अशांति चली जाएगी। बुद्ध समझा रहे हैं जीवन हमें जो भी रस दे उस रस को ले लिया जाए और धन्यवाद दे दिया जाए। कहीं ऐसे भंवरे न बन जाएं जो रस चूसने में इतने मशगूल हो जाते हैं कि फिर उड़ना ही भूल जाते हैं और शाम को जब कमल के फूल की पंखूड़ियां बंद हो जाती है तो उसमें कैद हो जाते हैं। बस दुनिया में यही हमारी जिंदगी का उसूल हो जाए। यह दुनिया हमारे लिए कारागृह न बन जाए। रस लें आभार दें और बिना कोई नुकसान पहुंचाए मुक्त हो जाएं। प्रकृति से जो संबंध बुद्ध ने जोड़ा है उसके लिए भारतीय पद्धति का आश्विन मास (इस वर्ष ४ सितंबर से ४ अक्टूबर) बड़ा अनुकूल है। इसी माह में नवरात्रि आरंभ होती है। नवरात्र का अर्थ है नई रातें। यहीं से दिन छोटे और रात बड़ी होने लगेंगी। इस ऋतु परिवर्तन काल में नौ दिन शक्ति आराधना से हम भंवरे की तरह फूल को बिना नुकसान पहुंचाए रसानुभूति कर सकते हैं।

अपने भीतर की योग्यता और संभावनाओं को जगाएं

दुनिया उसके पीछे भाग रही है जिसके पास पॉवर है, जो बड़ी हस्ती है, कुछ परिवर्तन का माद्दा रखता है। उगते सूरज को सभी नमस्कार करते हैं। हमारे मन में हमेशा लालसा रहती है कि कोई बड़ा आदमी हमें अपना नजदीकी बना ले। नजदीकियां बनाना है तो पहले खुद के भीतर इतनी योग्यता और संभावनाओं को जगाना पड़ेगा। आध्यात्मिक जीवन में भी परमात्मा की निकटता पाने के लिए अपने भीतर की संभावनाओं को जगाना पड़ेगा।

दुनिया में रहते हुए अनेक लोगों को कई बार ऐसा लगता है कि किसी बड़ी हस्ती की निकटता प्राप्त हो जाए। कोई दिव्यात्मा हमें स्पर्श कर ले और यदि ऐसा होता है तो कभी-कभी हमें एक नई ऊर्जा प्राप्त होती है। इसे अध्यात्म ने सान्निध्य ऊर्जा कहा है एनर्जी ऑफ प्रॉक्सीमिटी और जब ऐसी ऊर्जा मिले तो उसका उपयोग करना हमें आना चाहिए।

श्री हनुमानजी के जीवन में एक अवसर ऐसा आया था। राजा सुग्रीव के आदेश पर जब वानर चारों दिशाओं में सीताजी की खोज के लिए भेजे गए तो कहते हैं हनुमानजी सबसे पीछे थे। श्रीराम सबको बिदाई दे रहे थे तो लिखा गया है च्च्पाछें पवन तनय सिरु नावा, जानि काज प्रभु निकट बोलावाज्‍ज जो व्यक्ति सबसे पीछे आया है राम ने उन्हें काम का विचार कर अपने निकट बुलाया। श्रीराम को सीताजी के पास दूत के रूप में भेजने के लिए किसी का तो चयन करना ही था। ये सारी संभावना उन्हें हनुमानजी महाराज में दिख गई। हर बीज वृक्ष नहीं बनता लेकिन चैतन्य लोग उस एक बीज को पकड़ लेते हैं जिसमें वृक्ष बनने की संभावना है।राम चैतन्य थे और हनुमान, बीज में भरी हुई संभावना थे। बात यहीं समाप्त नहीं हुई च्च्परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।ज्‍ज अपने हाथों से श्रीरामजी ने हनुमानजी को स्पर्श किया और अंगुठी सौंप दी। यहां हनुमानजी को एक दिव्य सत्ता की निकटता और स्पर्श दोनों मिल गए। इस सान्निध्य ऊर्जा का उपयोग उन्होंने लंका में जाकर किया। हमें यही सीखना है। अच्छे, समझदार सक्षम और बड़े लोगों का साथ मिले ऐसा प्रयास करें किंतु उस संग से जो ऊर्जा मिले उसका भरपूर सद्उपयोग किया जाए। साथ देने के लिए इस समय सर्वाधिक सुलभ देवता हनुमानजी महाराज हैं। वे आपके पास कभी भी आ जाएंगे।

अगर सीधे पहुंचना हो परमात्मा तक

परमात्मा यानी उस परम शक्ति तक हम सीधे भी पहुंच सकते हैं। इसके लिए भक्ति नहीं हमें प्रयास करना होगा खुद को साधने का। खुद के स्वाभाव को फकीराना बनाना होगा। हम तीर्थो में जाते हैं तो मंदिर और प्रतिमाओं तक ही सीमित रह जाते हैं, कभी उसके भीतर यानी परमात्मा को समझने की कोशिश भी नहीं करते।

सीधे ईश्वर तक पहुंचने की तड़प आदमी के भीतर फकीरी ला देती है। मुस्लिम फकीरों की परंपरा में शिबली का नाम अदब से लिया जाता है। उनका आग्रह रहता था कि सीधे अल्लाह तक पहुंचो। अपनी इस बात को कहने के उनके ढंग निराले होते थे। धर्मस्थलों का लोगों ने उपयोग केवल दिखावे के लिए किया है इस पर शिबली को आवेश भी रहता था। एक बार वे हाथ में जलते हुए अंगारे लेकर घूम रहे थे। लोगों ने सवाल पूछा तो शिबली का जवाब था इससे खान-ए-काबा को जलाने की तैयारी है। लोगों को नाराजी आना स्वाभाविक थी। ये मुसलमान होकर काबा यानी मुसलमानों के सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्थान के लिए ऐसा कह रहे हैं, लेकिन जब शिबली फकीर ने अपनी बात को और साफ करके जवाब दिया तो लोग चौंके, शर्मिन्दा भी हुए और खुश भी। बात इशारे में की गई थी। उनका कहना था इसलिए ऐसा करना चाहता हूं लोग केवल वहीं की इबादत पर टिक जाते हैं और सीधे खुदा की ओर नहीं चलते। शिबली का इशारा था लोग केवल काबा की जगह पर न टिकें बल्कि साहबे काबा (परमात्मा, उस स्थान के मालिक) पर टिकें।सचमुच हम लोगों का जीवन ऐसा ही हो जाता है कि हम खुदा को सुनते हैं खुदा की नहीं सुनते। एक दफा शिबली के हाथ जलती लकड़ियां देख फिर सवाल पूछा गया, अब किसे जलाने का इरादा है। जवाब बेमिसाल ही आया। जन्नत (स्वर्ग) और दोजख (नर्क) दोनों को जला दूंगा। अभिव्यक्ति की निराले तौर तरीके के साथ फकीर बोले जन्नत और दोजख के डर से लोग उस ऊपर वाले की इबादत करें यह गलत है। व्यक्ति निलरेभ, निर्भय और निर्दोष होना चाहिए। हमें समझना होगा कि जीवन एक सतत् प्रशिक्षण है। संत फकीर अपने-अपने अन्दाज से हमें सिखाते जाते हैं।

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