21 फ़रवरी 2012

नागचंद्रेश्वर मंदिर में सर्पशैय्या पर आसीन है शिव परिवार

उज्जैन।देश के बारह ज्योतिर्लिगोंमें प्रमुख प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के शीर्ष पर स्थित नागचंद्रेश्वरमंदिर में देवाधिदेव भगवान शिव की एक ऐसी विलक्षण प्रतिमा है, जिसमें वह अपने पूरे परिवार के साथ सर्प सिंहासन पर आसीन है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार सर्प भगवान शिव का कंठाहारऔर भगवान विष्णु का आसन है लेकिन यह विश्व का संभवत:एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव, माता पार्वती एवं उनके पुत्र गणेशजीको सर्प सिंहासन पर आसीन दर्शाया गया है। वर्ष में केवल एक दिन नागपंचमी पर इस मंदिर के पट 24घंटे के लिए खुलते है और इस दौरान दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड उमड पडती है। शनिवार को नागपंचमी का पर्व होने की वजह से शुक्रवार की मध्यरात्रि से ही इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शनों के लिए भक्तों की कतार लगने का सिलसिला आरंभ हो जाएगा।

महाकाल भक्त मंडल के अध्यक्ष एवं महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित रमण त्रिवेदी ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सर्पोके राजा तक्षक ने भगवान शंकर की यहां घनघोर तपस्या की थी। तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और तक्षक को अमरत्व का वरदान दिया। ऐसा माना जाता है कि उसके बाद से तक्षक नाग यहां विराजितहै, जिस पर शिव और उनका परिवार आसीन है। एकादशमुखीनाग सिंहासन पर बैठे भगवान शिव के हाथ-पांव और गले में सर्प लिपटे हुए है।

इस अत्यंत प्राचीन मंदिर का परमार राजा भोज ने एक हजार और 1050ईस्वी के बीच पुनर्निर्माण कराया था। 1732में तत्कालीन ग्वालियर रियासत के राणाजीसिंधिया ने उज्जयिनीके धार्मिक वैभव को पुन:स्थापित करने के भागीरथी प्रयास के तहत महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। प्रतिवर्ष श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का पर्व पडता है और इस दिन नाग की पूजा की जाती है।

इस दिन कालसर्पयोग की शांति के लिए यहां विशेष पूजा के आयोजन भी होते है। श्री महाकाल ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के संचालक और ज्योतिषाचार्य पंडित कृपाशंकर व्यास ने बताया कि नागचन्द्रेश्वरमंदिर दुनिया में अपनी तरह का एक ही मंदिर है।उन्होने कहा कि यहां पूजा-पाठ का विशेष महत्व है।

पांच कोस की काशी है ज्योतिर्लिग

काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ कहते हैं-इदं मम प्रियंक्षेत्रं पञ्चक्रोशीपरीमितम्। पांच कोस तक विस्तृत यह क्षेत्र (काशी) मुझे अत्यंत प्रिय है। पतितपावनीकाशी में स्थित विश्वेश्वर (विश्वनाथ) ज्योतिर्लिगसनातनकाल से हिंदुओं के लिए परम आराध्य है, किंतु जनसाधारण इस तथ्य से प्राय: अनभिज्ञ ही है कि यह ज्योतिर्लिगपांच कोस तक विस्तार लिए हुए है- पञ्चक्रोशात्मकं लिङ्गंज्योतिरूपंसनातनम्।ज्ञानरूपा पञ्चक्रोशात् मकयह पुण्यक्षेत्र काशी के नाम से भी जाना जाता है-ज्ञानरूपा तुकाशीयं पञ्चक्रोशपरिमिता। पद्मपुराणमें लिखा है कि सृष्टि के प्रारंभ में जिस ज्योतिर्लिगका ब्रह्मा और विष्णुजीने दर्शन किया, उसे ही वेद और संसार में काशी नाम से पुकारा गया-
यल्लिङ्गंदृष्टवन्तौहि नारायणपितामहौ।
तदेवलोकेवेदेचकाशीतिपरिगीयते॥
पांच कोस की काशी चैतन्यरूपहै। इसलिए यह प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होती। प्राचीन ब्रह्मवैक्‌र्त्तपुराणमें इस संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख है कि अमर ऋषिगण प्रलयकालमें श्री सनातन महाविष्णुसे पूछते हैं-हे भगवन्!वह छत्र के आकार की ज्योति जल के ऊपर कैसे प्रकाशित है, जो प्रलय के समय पृथ्वी के डूबने पर भी नहीं डूबती? महाविष्णुजी बोले-हे ऋषियों! लिंगरूपधारीसदाशिवमहादेव का हमने (सृष्टि के आरम्भ में) तीनों लोकों के कल्याण के लिए जब स्मरण किया, तब वे शम्भु एक बित्ता परिमाण के लिंग-रूप में हमारे हृदय से बाहर आए और फिर वे बढते हुए अतिशय वृद्धि के साथ पांच कोस के हो गए-
लिङ्गरूपधर:शम्भुहर्दयाद्बहिरागत:।
महतींवृद्धिमासाद्य पञ्चक्रोशात्मकोऽभवत्॥
यह काशी वही पंचक्रोशात्मकज्योतिर्लिगहै। काशीरहस्य के दूसरे अध्याय में यह कथानक मिलता है।
स्कन्दपुराणके काशीखण्डमें स्वयं भगवान शिव यह घोषणा करते हैं-अविमुक्तं महत्क्षेत्रं पञ्चक्रोशपरिमितम्।
ज्योतिर्लिङ्गम्तदेकंहि ज्ञेयंविश्वेश्वराऽभिधम्।।
पांच कोस परिमाण का अविमुक्त (काशी) नामक जो महाक्षेत्रहै, उस सम्पूर्ण पंचक्रोशात्मकक्षेत्र को विश्वेश्वर नामक एक ज्योतिर्लिङ्गही मानें। इसी कारण काशी प्रलय होने पर भी नष्ट नहीं होती। काशीखण्डमें भगवान शंकर पांच कोस की पूरी काशी में बाबा विश्वनाथ का वास बताते हैं-
एकदेशस्थितमपियथा मार्तण्डमण्डलम्।
दृश्यतेसवर्गसर्वै:काश्यांविश्वेश्वरस्तथा॥
जैसे सूर्यदेव एक जगह स्थित होने पर भी सबको दिखाई देते हैं, वैसे ही संपूर्ण काशी में सर्वत्र बाबा विश्वनाथ का ही दर्शन होता है।
स्वयं विश्वेश्वर (विश्वनाथ) भी पांच कोस की अपनी पुरी (काशी) को अपना ही रूप कहते हैं- पञ्चक्रोश्या परिमितातनुरेषापुरी मम। काशी की सीमा के विषय में शास्त्रों का कथन है-असी- वरणयोर्मध्ये पञ्चक्रोशमहत्तरम। असी और वरुणा नदियों के मध्य स्थित पांच कोस के क्षेत्र (काशी) की बडी महिमा है। महादेव माता पार्वती से काशी का इस प्रकार गुणगान करते हैं-सर्वक्षेत्रेषु भूपृष्ठेकाशीक्षेत्रंचमेवपु:।
भूलोक के समस्त क्षेत्रों में काशी साक्षात् मेरा शरीर है।
पञ्चक्रोशात् मकज्योतिर्लिग-स्वरूपाकाशी सम्पूर्ण विश्व के स्वामी श्री विश्वनाथ का निवास-स्थान होने से भव-बंधन से मुक्तिदायिनीहै। धर्मग्रन्थों में कहा भी गया है-काशी मरणान्मुक्ति:।काशी की परिक्रमा करने से सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा का पुण्यफलप्राप्त होता है। भक्त सब पापों से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है। तीन पंचक्रोशी-परिक्रमाकरने वाले के जन्म-जन्मान्तर के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। काशीवासियोंको कम से कम वर्ष में एक बार पंचकोसी-परिक्रमाअवश्य करनी चाहिए क्योंकि अन्य स्थानों पर किए गए पाप तो काशी की तीर्थयात्रा से उत्पन्न पुण्याग्निमें भस्म हो जाते हैं, परन्तु काशी में हुए पाप का नाश केवल पंचकोसी-प्रदक्षिणा से ही संभव है। काशी में सदाचार-संयम के साथ धर्म का पालन करना चाहिए। यह पर्यटन की नहीं वरन् तीर्थाटन की पावन स्थली है।
वस्तुत:काशी और विश्वेश्वर ज्योतिर्लिगमें तत्त्‍‌वत:कोई भेद नहीं है। नि:संदेह सम्पूर्ण काशी ही बाबा विश्वनाथ का स्वरूप है। काशी-महात्म्य में ऋषियों का उद्घोष है-काशी सर्वाऽपिविश्वेशरूपिणीनात्रसंशय:। अतएव काशी को विश्वनाथजीका रूप मानने में कोई संशय न करें और भक्ति-भाव से नित्य जप करें-शिव: काशी शिव: काशी, काशी काशी शिव: शिव:।
ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि (निर्जला एकादशी) के दिन श्री काशीविश्वनाथकी वार्षिक कलश-यात्रा वाराणसी में बडी धूमधाम एवं श्रद्धा के साथ आयोजित होती है, जिसमें बाबा का पंचमहानदियोंके जल से अभिषेक होता है।

प्राचीन देवी मंदिर में पूरी होती है मनोकामना

गाजियाबाद [आशुतोष यादव ]। डासना स्थित प्राचीन देवी मंदिर में आज तक जो भी श्रद्धा के साथ माई के दरबार में गया वह खाली हाथ वापस नहीं आया। क्षेत्रीय लोगों व मंदिर के महंत का दावा है कि मंदिर के पास स्थित तालाब में नहाने से चर्मरोग दूर हो जाता है।

शारदीय नवरात्रके अवसर पर मंदिर में नौ दिवसीय शतचंडी यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इस यज्ञ में देश के 11अखाडों के धर्म प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। मंदिर के महंत का दावा है कि देवी चंडी की पूजा मुगल काल से चली आ रही है। मुगलों शासक ने मंदिर पर हमला बोल दिया गया था। उस दौरान मंदिर के सेवादार ने देवी की मूर्ति तालाब में डाल दिया था। देवी मंदिर के पास में ही महाभारत काल का बना हुआ शिवमंदिर भी मौजूद है।
गाजियाबाद से आठ किमी दूर हापुड रोड पर जेल रोड से दक्षिण दिशा में डासना कस्बे में चंडी देवी का मंदिर है। देवी की मूर्ति कसौटी पत्थर से निर्मित है। बताया जाता है कि इस तरह की मूर्ति उत्तर भारत में अकेली प्रतिमा है। मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती का दावा है कि देश में इस तरह कसौटी पत्थर की तीन व पाकिस्तान में एक प्रतिमा हैं। कलकत्ता के दक्षिणेश्वरकाली मां की प्रतिमा, गोहाटी में कामाख्यादेवी, डासना में काली मां की व पाकिस्तान में इंग्लाजदेवी की मूर्ति कसौटी पत्थर की बनी है।

स्थानीय श्रद्धालुओं का दावा है कि मंदिर में प्रतिमा को जितनी बार निहारा जाता है प्रतिमा की भाव भंगिमा बदली नजर आती है। बताया जाता है कि मुगल शासकों ने हमले के दौरान मंदिर को नष्ट कर दिया था। तत्कालीन मंदिर के पुजारी ने देवी प्रतिमा को तालाब में डूबो दिया था।
कई सालों के बाद मंदिर में जगद्गिरि महाराज ने तपस्या की थी। एक दिन स्वप्न में देवी ने जगद्गिरि को स्वप्न में आदेश दिया कि मुझे तालाब से निकाल कर मंदिर में प्रतिष्ठापित करो। श्री गिरि ने स्वप्न टूटते ही तालाब से प्रतिमा निकालकर मंदिर में प्रतिष्ठापित किया था। कई वर्षो के बाद मौनी बाबा व ब्रम्हानंदसरस्वती ने मंदिर के जीर्णोद्धार में विशेष सहयोग किया था। एक मान्यता यह भी है कि पाडंवोंने अज्ञातवास के दौरान मंदिर में समय व्यतीत किया था। पांडव काल का शिव मंदिर भी मौजूद है।

मंदिर के पुजारी स्वामी केशवानंदका दावा है कि मंदिर के निर्माण के समय घना जंगल था। मंदिर के पास तालाब में एक शेर प्रतिदिन पानी पीने आता था। पानी पीने के बाद शेर बिना किसी को कोई हानि पहुंचाए देवी प्रतिमा के सामने कुछ देर तक बैठने के बाद वापस चला जाता था। बताया जाता है कि शेर ने अपने प्राण मंदिर में त्याग दिए थे। उसकी मौत के बाद देवी प्रतिमा के सामने शेर की प्रतिमा बनाई गई, जो आज भी मौजूद है।

मंदिर के महंत का दावा है कि देवी भक्तों द्वारा दी गई सात्विक पूजा स्वीकार करती हैं। तांत्रिक पूजा नहीं स्वीकार करती हैं। नवरात्रके अवसर पर आज भी कई प्रांतों के लोग देवी दर्शन के लिए मंदिर में पहुंचते हैं। मंदिर के पास ही रामलीला का मंचन भी किया जाता है। वर्तमान में तालाब उपेक्षित होने के कारण कमल, कुमुदनीव जंगली घासों से अटा हुआ है।

रथयात्रा भगवान जगन्नाथ की

हमारे यहां चार तीर्थस्थलचार धाम के रूप में प्रतिष्ठित हैं। ये हैं- बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम्और जगन्नाथपुरी।जगन्नाथपुरीमें भगवान जगन्नाथ की पूजा होती है। भगवान जगन्नाथ को दारुब्रह्मव काष्ठब्रह्मभी कहा जाता है। भगवान का यह विग्रह दारु अथवा काष्ठ से बनाया जाता है। जिस वर्ष दो आषाढ पडते हैं, भगवान का पुराना काष्ठ-कलेवर बदल कर नव काष्ठ-कलेवर में प्राण-प्रतिष्ठा करके उन्हें रत्नवेदीपर प्रतिष्ठित कर दिया जाता है। वर्ष में दो आषाढ कम-से-कम आठ और अधिक से अधिक उन्नीस वर्ष में पडते हैं। गत शताब्दी में कुल छह बार भगवान को नव-कलेवर प्राप्त हुए। प्राचीन कलेवर का दाह-संस्कार मंदिर-परिसर के भीतर एक निर्धारित स्थान पर किया जाता है। इस स्थान को कोइलीबैकुण्ठ कहते हैं। नव-कलेवर का निर्माण चैत्र शुक्ल दशमी को प्रारम्भ होता है।

दयितापति(प्रधान पुजारी) दलबलके साथ काटकपुरदेउलीमंडप नामक स्थान पर जाता है और वहां से नीम का वृक्ष कटवा कर पुरी लाता है। पहले यह वृक्ष नृसिंह मंदिर में रखा जाता है। उसके बाद श्री मंदिर जगन्नाथ मंदिर लाया जाता है। यहां विश्वकर्मा मंडप में निंबकाष्ठसे भगवान जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा के विग्रहोंका निर्माण होता है। ज्ञातव्य है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी पुरी में भगवान जगन्नाथ के रूप में विद्यमान हैं। उनके साथ अग्रज बलराम और अग्रजा सुभद्रा यहां त्रिमूर्ति के रूप में विराजमान हैं।

भगवान जगन्नाथ के रथ का निर्माण लकडी से होता है। लकडी दशपल्लाजंगल से लाई जाती है। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नन्दिघोष है। इसे चक्रध्वज,गरुडध्वजऔर कपिध्वजभी कहते हैं। इसमें जुते घोडों के नाम शंख, बलाहक,श्वेत एवं हरिदाश्वहैं। रथ के सभी घोडे श्वेत वर्ण के होते हैं। इस रथ के रक्षक नृसिंह भगवान हैं। बलराम के रथ का नाम तालध्वजहै। इसे बहलध्वजभी कहते हैं। रथ के सभी घोडे कृष्ण वर्ण के होते हैं और उनके नाम तीव्र, घोर, दीर्घाश्रमएवं सुवर्णनाभहैं। रथ के रक्षक वासुदेव हैं। सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलनहै। इसे पद्मध्वजभी कहा जाता है। इसकी घोडिया भूरा रंग की होती हैं और उनके नाम रोचिका,मोचिका,जिता एवं अपराजिता है। रथ की रक्षिकाजयदुर्गाहैं।

रथयात्रा समारोह प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया से प्रारम्भ होकर आषाढ शुक्ल दशमी को समाप्त होता है। भगवान जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा के रथों को आषाढ शुक्ल प्रतिपदा को सुसज्जित करके सिंह द्वार के सामने अगल-बगलखडा कर दिया जाता है। रथ का निर्माण पुरी राजभवन के सामने होता है। इस स्थान को रथ खडा कहते हैं। रथयात्रा को घोष-यात्रा अथवा गुण्डिचायात्रा भी कहा जाता है। रथयात्रा से दो सप्ताह पूर्व जेठ पूर्णिमा को तीनों प्रतिमाओं को स्नान कराया जाता है। इसके लिए इन्हें रत्‍‌नवेदीसे उठाकर स्नान-मंडप में लाया जाता है। स्नान-मंडप तीस फीट ऊंचा है। प्रत्येक मूर्ति को 108घडों से स्नान कराया जाता है। अति स्नान के कारण देवगण रुग्ण हो जाते हैं। 15दिनों तक विभिन्न जडी-बूटियों से उनकी चिकित्सा की जाती है। इन दिनों देव विग्रहोंका दर्शन जनता नहीं कर पाती है। देवगणोंको जडी-बूटियों का भोग लगाया जाता है। इस कर्मकाण्ड को स्नान पूर्णिमा कहते हैं।

रथयात्रा के दिन देव प्रतिमाओं को गाजे-बाजेके साथ रत्नवेदीसे उठाकर रथ पर स्थापित किया जाता है। इस कर्मकाण्ड को पहन्डिविजय कहते हैं। सेवक लोग मूर्तियों को इस प्रकार लाते हैं कि दर्शकों को ऐसा लगता है, जैसे मूर्तियां स्वयं चलकर आ रही हैं। मूर्तियों के रथ पर विराजमान होने के बाद पुरी के गजपति महाराज पालकी पर चढकर राजभवन से सिंहद्वार स्थित रथ तक आते हैं। वे रथ पर चढते हैं और सोने की मूठ वाली झाडू से रथ की सफाई करते हैं। इसे छेरा पहरा कहा जाता है। छेरा पहरा के बाद रथयात्रा का क्रम प्रारम्भ होता है। श्रीमंदिरसिंहद्वार से गुण्डिचामंदिर की दूरी तीन किलोमीटर है। इस दूरी को तय करने में लगभग 24घण्टे लग जाते हैं। रथ को रोककर लोग पूजा करते हैं। फूल-मालाएं चढाते हैं। रथारूढदेव प्रतिमाओं को नमन करते हैं, साष्टांग दण्डवत करते हैं। रथ खींचने वालों की संख्या 4000से ऊपर होती है। रथयात्रा अपराह्न चार बजे से प्रारम्भ होती है। गुण्डिचामंदिर पहुंचने के बाद मूर्तियां को रथों से उतार कर मंदिर में रख दिया जाता है। रथयात्रा के तीसरे दिन लक्ष्मी देवी भगवान जगन्नाथ के दर्शन हेतु गुण्डिचामंदिर आती हैं। उनका आगमन गाजे-बाजेके साथ शोभायात्रा के रूप में होता है। भगवान जगन्नाथ के सेवक लक्ष्मी जी को आते देखकर दरवाजा बंद कर लेते हैं। इस बात से रुष्ट होकर लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ के रथ के एक भाग को तोड देती हैं। इस कर्मकाण्ड का नाम हेरापंचमी है।

अन्तत:गुण्डिचामंदिर से भगवान जगन्नाथ की प्रतियात्राशुरू होती है। इसे बाहुडायात्रा कहते हैं। भगवान जगन्नाथ सात दिनों तक गुण्डिचामंदिर में प्रवास करते हैं। इसके बाद वे श्रीमंदिरलौटते हैं। भगवान की वापसी यात्रा वैशाख शुक्ल दशमी को प्रारम्भ होती है। श्रीमंदिरलौटने पर तीनों मूर्तियों को रत्नवेदीपर स्थापित कर दिया जाता है। इसके बाद नियमित देवपूजा,देवदर्शनऔर भोग का क्रम प्रारम्भ हो जाता है।

साक्षात् रुद्र हैं श्री भैरवनाथ

श्रीभैरवनाथसाक्षात् रुद्र हैं। शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वेदों में जिस परमपुरुष का नाम रुद्र है, तंत्रशास्त्रमें उसी का भैरव के नाम से वर्णन हुआ है। तन्त्रालोक की विवेकटीका में भैरव शब्द की यह व्युत्पत्ति दी गई है- बिभíत धारयतिपुष्णातिरचयतीतिभैरव: अर्थात् जो देव सृष्टि की रचना, पालन और संहार में समर्थ है, वह भैरव है। शिवपुराणमें भैरव को भगवान शंकर का पूर्णरूप बतलाया गया है। तत्वज्ञानी भगवान शंकर और भैरवनाथमें कोई अंतर नहीं मानते हैं। वे इन दोनों में अभेद दृष्टि रखते हैं।

वामकेश्वर तन्त्र के एक भाग की टीका- योगिनीहृदयदीपिका में अमृतानन्दनाथका कथन है- विश्वस्य भरणाद्रमणाद्वमनात्सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवोभैरव:। भैरव शब्द के तीन अक्षरों भ-र-वमें ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उत्पत्ति-पालन-संहार की शक्तियां सन्निहित हैं। नित्यषोडशिकार्णव की सेतुबन्ध नामक टीका में भी भैरव को सर्वशक्तिमान बताया गया है-भैरव: सर्वशक्तिभरित:।शैवोंमें कापालिकसम्प्रदाय के प्रधान देवता भैरव ही हैं। ये भैरव वस्तुत:रुद्र-स्वरूप सदाशिवही हैं। शिव-शक्ति एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की उपासना कभी फलीभूत नहीं होती। यतिदण्डैश्वर्य-विधान में शक्ति के साधक के लिए शिव-स्वरूप भैरवजीकी आराधना अनिवार्य बताई गई है। रुद्रयामल में भी यही निर्देश है कि तन्त्रशास्त्रोक्तदस महाविद्याओंकी साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए उनके भैरव की भी अर्चना करें। उदाहरण के लिए कालिका महाविद्याके साधक को भगवती काली के साथ कालभैरवकी भी उपासना करनी होगी। इसी तरह प्रत्येक महाविद्या-शक्तिके साथ उनके शिव (भैरव) की आराधना का विधान है। दुर्गासप्तशतीके प्रत्येक अध्याय अथवा चरित्र में भैरव-नामावली का सम्पुट लगाकर पाठ करने से आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं, इससे असम्भव भी सम्भव हो जाता है। श्रीयंत्रके नौ आवरणों की पूजा में दीक्षाप्राप्तसाधक देवियों के साथ भैरव की भी अर्चना करते हैं।

अष्टसिद्धि के प्रदाता भैरवनाथके मुख्यत:आठ स्वरूप ही सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं पूजित हैं। इनमें भी कालभैरव तथा बटुकभैरव की उपासना सबसे ज्यादा प्रचलित है। काशी के कोतवाल कालभैरवकी कृपा के बिना बाबा विश्वनाथ का सामीप्य नहीं मिलता है। वाराणसी में निíवघ्न जप-तप, निवास, अनुष्ठान की सफलता के लिए कालभैरवका दर्शन-पूजन अवश्य करें। इनकी हाजिरी दिए बिना काशी की तीर्थयात्रा पूर्ण नहीं होती। इसी तरह उज्जयिनीके कालभैरवकी बडी महिमा है। महाकालेश्वर की नगरी अवंतिकापुरी(उज्जैन) में स्थित कालभैरवके प्रत्यक्ष मद्य-पान को देखकर सभी चकित हो उठते हैं।

धर्मग्रन्थों के अनुशीलन से यह तथ्य विदित होता है कि भगवान शंकर के कालभैरव-स्वरूपका आविर्भाव मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषकाल-व्यापिनीअष्टमी में हुआ था, अत:यह तिथि कालभैरवाष्टमी के नाम से विख्यात हो गई। इस दिन भैरव-मंदिरों में विशेष पूजन और श्रृंगार बडे धूमधाम से होता है। भैरवनाथके भक्त कालभैरवाष्टमी के व्रत को अत्यन्त श्रद्धा के साथ रखते हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से प्रारम्भ करके प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रदोष-व्यापिनी अष्टमी के दिन कालभैरवकी पूजा, दर्शन तथा व्रत करने से भीषण संकट दूर होते हैं और कार्य-सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। पंचांगों में इस अष्टमी को कालाष्टमी के नाम से प्रकाशित किया जाता है।

ज्योतिषशास्त्र की बहुचíचत पुस्तक लाल किताब के अनुसार शनि के प्रकोप का शमन भैरव की आराधना से होता है। इस वर्ष शनिवार के दिन भैरवाष्टमीपडने से शनि की शान्ति का प्रभावशाली योग बन रहा है। शनिवार 1दिसम्बर को कालभैरवाष्टमी है। इस दिन भैरवनाथके व्रत एवं दर्शन-पूजन से शनि की पीडा का निवारण होगा। कालभैरवकी अनुकम्पा की कामना रखने वाले उनके भक्त तथा शनि की साढेसाती, ढैय्या अथवा शनि की अशुभ दशा से पीडित व्यक्ति इस कालभैरवाष्टमीसे प्रारम्भ करके वर्षपर्यन्तप्रत्येक कालाष्टमीको व्रत रखकर भैरवनाथकी उपासना करें।

कालाष्टमीमें दिन भर उपवास रखकर सायं सूर्यास्त के उपरान्त प्रदोषकालमें भैरवनाथकी पूजा करके प्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है। मन्त्रविद्याकी एक प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपि से महाकाल भैरव का यह मंत्र मिला है- ॐहंषंनंगंकंसं खंमहाकालभैरवायनम:।
इस मंत्र का 21हजार बार जप करने से बडी से बडी विपत्ति दूर हो जाती है।। साधक भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ते) को नित्य कुछ खिलाने के बाद ही भोजन करे।
साम्बसदाशिवकी अष्टमूíतयोंमें रुद्र अग्नि तत्व के अधिष्ठाता हैं। जिस तरह अग्नि तत्त्‍‌व के सभी गुण रुद्र में समाहित हैं, उसी प्रकार भैरवनाथभी अग्नि के समान तेजस्वी हैं। भैरवजीकलियुग के जाग्रत देवता हैं। भक्ति-भाव से इनका स्मरण करने मात्र से समस्याएं दूर होती हैं।
इनका आश्रय ले लेने पर भक्त निर्भय हो जाता है। भैरवनाथअपने शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं।

शिव के प्रति सम्मान काशी-पंचक्रोशी यात्रा

काशी की महिमा विभिन्न धर्मग्रन्थों में गायी गयी है। काशी शब्द का अर्थ है, प्रकाश देने वाली नगरी। जिस स्थान से ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलता है, उसे काशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहान्त होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है, काश्यांमरणान्मुक्ति:।

काशी-क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए पुराकालमें पंचक्रोशीमार्ग का निर्माण किया गया। जिस वर्ष अधिमास (अधिक मास) लगता है, उस वर्ष इस महीने में पंचक्रोशीयात्रा की जाती है। पंचक्रोशी(पंचकोसी) यात्रा करके भक्तगण भगवान् शिव और उनकी नगरी काशी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। लोक में ऐसी मान्यता है कि पंचक्रोशीयात्रा से लौकिक और पारलौकिक अभीष्टिकी सिद्धि होती है। अधिमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। लोक-भाषा में इसे मलमासकहा जाता है। इस वर्ष मलमासप्रथम-ज्येष्ठ शुक्ल (अधिक) प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर द्वितीय-ज्येष्ठ कृष्णपक्ष(अधिक) अमावस्या तिथि को समाप्त होगा।

पंचक्रोशीयात्रा के कुछ नियम है, जिनका पालन यात्रियों को करना पडता है। परिक्रमा नंगे पांव की जाती है। वाहन से परिक्रमा करने पर पंचक्रोशी-यात्राका पुण्य नहीं मिलता। शौचादिक्रिया काशी-क्षेत्र से बाहर करने का विधान है। परिक्रमा करते समय शिव-विषयक भजन-कीर्तन करने का विधान है। कुछ ऐसे भी यात्री होते हैं, जो सम्पूर्ण परिक्रमा दण्डवत करते हैं। यात्री हर-हर महादेव शम्भो,काशी विश्वनाथ गंगे,काशी विश्वनाथ गंगे,माता पार्वती संगेका मधुर गान करते हुए परिक्रमा करते हैं। साधु, महात्मा एवं संस्कृतज्ञयात्री महिम्नस्त्रोत, शिवताण्डव एवं रुद्राष्टकका सस्वर गायन करते हुए परिक्रमा करते हैं। महिलाएं सामूहिक रूप से शिव-विषयक लोक गीतों का गायन करती हैं। परिक्रमा अवधि में शाकाहारी भोजन करने का विधान है। पंचक्रोशीयात्रा मणिकर्णिकाघाट से प्रारम्भ होती है। सर्वप्रथम यात्रीगणमणिकर्णिकाकुण्ड एवं गंगा जी में स्नान करते हैं। इसके बाद परिक्रमा-संकल्प लेने के लिए ज्ञानवापी जाते हैं। यहां पर पंडे यात्रियों को संकल्प दिलाते हैं। संकल्प लेने के उपरांत यात्री श्रृंगार गौरी, बाबा विश्वनाथ एवं अन्नपूर्णा जी का दर्शन करके पुन:मणिकर्णिकाघाट लौट आते हैं। यहां वे मणिकर्णिकेश्वरमहादेव एवं सिद्धि विनायक का दर्शन-पूजन करके पंचक्रोशीयात्रा का प्रारम्भ करते हैं। गंगा के किनारे-किनारे चलकर यात्री अस्सी घाट आते है। यहां से वे नगर में प्रवेश करते है। लंका,नरिया, करौंदी, आदित्यनगर,चितईपुरहोते हुए यात्री प्रथम पडाव कन्दवापर पहुंचते हैं। यहां वे कर्दमेश्वरमहादेव का दर्शन-पूजन करके रात्रि-विश्राम करते हैं। रास्ते में पडने वाले सभी मंदिरों में यात्री देव-पूजन करते हैं। अक्षत और द्रव्य दान करते हैं। रास्ते में स्थान-स्थान पर भिक्षार्थी यात्रियों को नंदी के प्रतीक के रूप में सजे हुए वृषभ का दर्शन कराते हैं और यात्री उन्हें दान-दक्षिणा देते हैं। कुछ भिक्षार्थी शिव की सर्पमालाके प्रतीक रूप में यात्रियों को सर्प-दर्शन कराते हैं और बदले में अक्षत और द्रव्य-दान प्राप्त करते हैं। कुछ सडक पर चद्दर बिछाए बैठे रहते हैं। यात्रीगणउन्हें भी निराश नहीं करते। अधिकांश यात्री अपनी गठरी अपने सिर पर रखकर पंचक्रोशीयात्रा करते हैं। परिक्रमा-अवधि में यात्री अपनी पारिवारिक और व्यक्तिगत चिन्ताओं से मुक्त होकर पांच दिनों के लिए शिवमय,काशीमयहो जाते हैं। दूसरे दिन भोर में यात्री कन्दवासे अगले पडाव के लिए चलते हैं। अगला पडाव है भीमचण्डी।यहां यात्री दुर्गामंदिरमें दुर्गा जी की पूजा करते हैं और पहले पडाव के सारे कर्मकाण्ड को दुहराते हैं। पंचक्रोशीयात्रा का तीसरा पडाव रामेश्वर है। यहां शिव-मंदिर में यात्रीगणशिव-पूजा करते हैं। चौथा पडाव पांचों-पण्डवा है। यह पडाव शिवपुर क्षेत्र में पडता है। यहां पांचों पाण्डव (युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल तथा सहदेव) की मूर्तियां है। द्रौपदीकुण्ड में स्नान करके यात्रीगणपांचों पाण्डवों का दर्शन करते हैं। रात्रि-विश्राम के उपरांत यात्री पांचवें दिन अंतिम पडाव के लिए प्रस्थान करते हैं। अंतिम पडाव कपिलधाराहै। यात्रीगणयहां कपिलेश्वर महादेव की पूजा करते हैं। काशी परिक्रमा में पांच की प्रधानताहै। यात्री प्रतिदिन पांच कोस की यात्रा करते हैं। पडाव संख्या भी पांच है। परिक्रमा पांच दिनों तक चलती है। कपिलधारासे यात्रीगणमणिकर्णिकाघाट आते हैं। यहां वे साक्षी विनायक (गणेश जी) का दर्शन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी भगवान् शंकर के सम्मुख इस बात का साक्ष्य देते हैं कि अमुक यात्री ने पंचक्रोशीयात्रा कर काशी की परिक्रमा की है। इसके उपरांत यात्री काशी विश्वनाथ एवं काल-भैरव का दर्शन कर यात्रा-संकल्प पूर्ण करते हैं।

सार्वभौम संस्कृति का प्रतीक चिह्न : स्वस्तिक

ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सूर्य को समस्त देवशक्तियोंका केंद्र और भूतल तथा अन्तरिक्ष में जीवनदाता माना गया है। स्वस्तिक को सूर्य की प्रतिमा मान कर इन्हीं विशेषताओं के प्रति श्रद्धाभिव्यक्तिजागृत करने का उपक्रम किया जाता है। पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है। विष्णु की चार भुजाओं की संगति भी कहीं-कहीं सुदर्शन चक्र के साथ बिठाई गई है।

गणेश की प्रतिमा की स्वस्तिक चिह्न के साथ संगति बैठ जाती है। गणपति की सूंड, हाथ,पैर, सिर आदि को इस तरह चित्रित किया जा सकता है, जिसमें स्वस्तिक की चार भुजाओं का ठीक तरह समन्वय हो जाए। ॐको स्वस्तिक के रूप में लिया जा सकता है। लिपि विज्ञान के आरंभिक काल में गोलाई के अक्षर नहीं, रेखा के आधार पर उनकी रचना हुई थी। ॐको लिपिबद्ध करने के आरंभिक प्रयास में उसका स्वरूप स्वस्तिक जैसा बना था। ईश्वर के नामों में सर्वोपरि मान्यता ॐकी है। उसको उच्चारण से जब लिपि लेखन में उतारा गया, तो सहज ही उसकी आकृति स्वस्तिक जैसी बन गई। आर्य धर्म और उसकी शाखा-प्रशाखाओं में स्वस्तिक का समान रूप से सम्मान है। बौद्ध, जैन, सिख धर्मो में उसकी समान मान्यता है। यूरोप और अमेरिका की प्राचीन सभ्यता में स्वस्तिक का प्रयोग होते रहने के प्रमाण मिलते हैं। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड के मावरीआदिवासी स्वस्तिक को मंगल प्रतीक की तरह प्रयुक्त करते हैं। साइप्रस की खुदाई में जो मूर्तियां मिली हैं, उन पर स्वस्तिक अंकित है। ऐसे ही प्रमाण मिश्र, यूनान आदि की खुदाई में उपलब्ध हैं। जापानी लोग स्वस्तिक को मन जी कहते हैं और धर्म-प्रतीकों में उसका समावेश करते हैं।
यास्कने स्वस्तिक को अविनाशी ब्रह्म की संज्ञा दी है। अमर कोश में उसे पुण्य, मंगल, क्षेम एवं आशीर्वाद के अर्थ में लिया है। निरुक्ति है-स्वस्ति क्षेमंकायतिकथयतिइति स्वस्तिक:। स्वस्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण। संस्कृत में सु-अस धातु से स्वस्तिक शब्द बनता है। सु अर्थात् सुन्दर, श्रेयस्कर, अस्अर्थात् उपस्थिति, अस्तित्व। जिसमें सौन्दर्य एवं श्रेयसका समावेश हो, वह स्वस्तिक है। स्वस्ति वाचन के प्रथम मन्त्र में लगता है स्वस्तिक का ही निरूपण हुआ है। उसकी चार भुजाओं को ईश्वर की चार दिव्य सत्ताओं का प्रतीक माना गया है।

स्वस्ति न: इन्द्रोवृद्धश्रवाकीर्तिवानइन्द्र को, स्वस्ति न: पूषाविश्व वेदा:सर्वज्ञ पूष को, स्वस्तिनस्ताक्ष्र्योअरिष्ट नेमि: में अरिष्ट निवारक ताक्‌र्ष्यको, और स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातुमें सर्वतोमुखी समृद्धि दाता बृहस्पति को कल्याण में योगदान देने के लिए आमन्त्रित किया गया है।

सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजीके चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है। इस प्रकार स्वस्तिक छोटा-सा प्रतीक है, पर उसमें विराट सम्भावनाएं समाई हैं। हम उसका महत्व समझें और उसे समुचित श्रद्धा मान्यता प्रदान करते हुए अभीष्ट प्रेरणा करें, यही उचित है।

अहंकार ईश्वर की उपासना में बाधक: गोविंदराम

बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पण्डित गोविंदराम ने कहा कि आकार का आधार तो निराकार ही है पर निराकार की अनुभूति के लिए आकार का आधार अपेक्षित है। लेकिन निराकार की अनुभूति उन्हें नहीं हो सकती जिन्हें देह का अभिमान होता है। इसका तात्पर्य है कि आकार ही अस्तित्व का बोध कराता है और अहम यानी मैं का परिचायक होने के कारण निराकार ब्रह्मा की उपासना में बाधक भी बनता है। इसलिए परम योगियों के लिए भी असाध्य निराकार साधना को सामान्य गृहस्थ जप तप के आधार पर अपनाता है तो उसे वह सुखानुभूति नहीं होती जो सगुण साकार के उपासक को साधना काल में प्राप्त होती है। निराकार में रमना या शून्य में स्थिर होने की साधना करना श्रेय तो है पर प्रेय नहीं। मैं का विसर्जन सगुण साकार में सुगम होता है। इसमें चंचल मन को विश्राम पाने के अनेक आलम्ब प्राप्त होते हैं।

पण्डित जी ने कहा कि निर्गुण निराकार में रमने के लिए कबीर को भी राम के नाम का आश्रय लेना पडा था। आश्रय अंतस चेतना की अरूप आस्था का कल्पित या मान्य भाव ही है। इसे परमतत्व, परब्रह्मा या कोई भी नाम दिया जा सकता है। अनाम को नाम देना नामधारी जीव की विवशता है। निराकार भी आकार हीन के लिए नाम हीन संबोधन ही है। उन्होंने कहा कि साधना का अर्थ ही है अपनेपन को कहीं विसर्जित कर देना, कोलाहल के सागर में शांति की तरंगों में खो जाना, सांसारिक साधनों को नकार देने का उपक्रम। साधना की जाती है आकार की अभीप्साओं को निराकार कर देने के लिए। धार्मिकता की स्थूलता के स्थान पर ध्यान साधना पद्घति का प्रचार विश्वव्यापी हो रहा है। अन्य साधना पथ का संबंध धार्मिक अधिक है पर ध्यान पथ में सभी का समावेश है। यहां न भाषा आडे आती है और न शास्त्र। यह मौन के अनुनाद का मार्ग है। यहां अवलोकन ही कर्मकाण्ड कहलाता है। यह मौन से मौन का संवाद है। यह आकार के विसर्जन और निराकार के सर्जन का संधिस्थल है।

उन्होंने कहा कि यहां सगुण भी तपते हैं और निर्गुण भी पनपते हैं। यह धार्मिकता विहीन आध्यात्मिकता का पथ है। योगी इसमें जीतता है और वियोगी इसमें रमण करता है। लेकिन जो न जप करता है और न कर्मकाण्ड पर अनन्य भाव से अपने आराध्य का चिंतन करता है,वह आकार से निराकार, सगुण से निर्गुण के भेद-विभेदों को अपने में आत्मसात् कर ध्यान की उस विराटता का आचरण करता है जो जीवन मुक्ति का सहचर होता है। ऐसा व्यक्ति कर्म के फलों के प्रति उदासीन तो होता है पर कर्म को सहज भाव से करता हुआ उस भक्त का आचरण करता है जिसके सामने ज्ञान की पारदर्शी दीवार अस्तित्व हीन होती है। प्रारब्ध का भोग वह ऐसे ही भोगता है जिस तरह समुद्र अपनी जल राशि पर उठने वाली तरंगों का आघात भोगता है। आज के आपाधापी जीवन में ईष्र्या-द्वेष से रहित जीवन यापन अनन्य चिंतन के साधना पथ का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

दूसरों के लिए जीते हैं धर्मात्मा: कर्णसिंह

गांव सौलधा के सत्संग भवन में उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच प्रवचन सुनाते हुए पंडित कर्णसिंह ने कहा कि धर्म की व्याख्या करते करते लोग थक जाते हैं, और समय समाप्त हो जाता है। ज्ञानी जन धर्म की परिभाषा में कुछ इस तरह उलझ जाते हैं कि संपूर्ण जीवन उसके रहस्य को समझने में व्यतीत हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति धर्मात्मा बनने की दिशा में नहीं चल पाता, क्योंकि अधिकांश लोग यही समझते हैं कि धर्म मार्ग उनके लिए बना ही नहीं है।

पंडित जी ने कहा कि मानवमात्र को यह मानना उपयोगी होगा कि धर्म केवल आचरण का विषय है, आख्यान-व्याख्यान का नहीं। सभी का लक्ष्य एक ही है मानव मात्र का कल्याण और विश्व शांति। धर्ममार्ग सदैव आनंद और शांति की ओर जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि सबका मालिक एक है, क्योंकि आनंद और शांति की अनुभूति समान होती है। धर्मात्मा कोई साधारण मानव ही होता है, जो अपने से अधिक अन्य को महत्व देता है। कहा गया है कि अपने लिए जीना कोई जीना नहीं। धर्मात्मा सदैव दूसरों के लिए जीता है और मरता भी है। वह निष्क्रिय धर्म विवेचक नहीं होता। उसका चरित्र पवित्र एवं उ“वल होता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में दूसरों का हित सर्वोपरि है। इसके लिए जंगल में धूनी रमाने से लेकर समाधिस्थ होने तक की यात्रा का संबंध पारंपरिक नहीं। धर्मात्मा तो गृहस्थ जीवन में भी रहकर लोक हितकारी प्रेरणा प्राप्त करता है। वह संसार के प्राणियों का हित न केवल चाहता है, वरन् उसके लिए हर पल तत्पर भी रहता है। उसके मन में मानव के प्रति द्वेष, घृणा की प्रवृति जन्म ही नहीं लेती। उसका हृदय जन-जन का प्रवेश द्वार होता है। हर व्यक्ति के लिए उसके हृदय में समान व सम्मानजनक स्थान होता है। ऐसा धर्मात्मा ही मानव का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाता है। मानव के लिए मानव का सिद्धान्त निरापद है, लेकिन उसका संवाहक धर्मात्मा ही समाज में सत्य धर्म का निरूपण कर पाता है। यह कठिन तपस्या के समान है कि लोग धर्मात्मा के चरित्र का अनुशीलन कर सकें, लेकिन यह अत्यंत सरल साधना है कि स्वयं सच्चा मानव बनने का प्रयास किया जाए। उन्होंने कहा कि प्राणी मात्र कभी घृणा का पात्र नहीं हो सकता। यद्यपि अनेक अवसरों पर विशेष सावधानीवश किसी प्राणी से कठोर व्यवहार की आवश्यकता अनिवार्य प्रतीत होती है, फिर भी उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि घृणा का बीजारोपण हो। मानव को सदैव मानव ही समझा जाए और इस तरह मानव के हित की परंपरा को आरंभ किया जाए। व्यवहारिक धरातल पर यह बात अटपटी सी लगने लगती है, परंतु धैर्य और विवेक के साथ इसी धर्म मार्ग का पालन करना होगा। धर्मात्मा का यही संदेश है।

जीवन में चार बातें होती हैं महत्वपूर्ण: गोविंदराम

बांके बिहारी मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए पंडित गोविंद राम ने कहा कि इंसान को मंदिर में, श्मशान में,रोगी के पास और महात्मा के पास सांसारिक बातें नहीं करनी चाहिए। ऐसे ही जीवन के लिए चार महावाक्य होते हैं, इनमें मेरा कुछ नहीं हैं,मुझे कुछ नहीं चाहिए, सब प्रभु का है केवल प्रभु मेरे अपने हैं।

पंडित जी ने कहा कि शरीर के लिए परिवार को, परिवार के लिए समाज को और समाज के लिए राष्ट्र को कभी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। ममता रहित होकर ही शरीर की सेवा करने में शरीर का हित और अपना कल्याण भी निहित है। यूं तो जीवन अनमोल है, लेकिन मृत्यु का डर वास्तव में उन्हीं को होता है जो वर्तमान का गलत प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार असल प्रेमी अपने प्रेमास्पदसे किसी प्रकार का सुख नहीं चाहता, वह तो सदा अपने प्रियतम के सुख में ही सुखी रहता है। अर्थात प्रभु को रस देने में ही मानव को रस मिलता है। यदि परमात्मा के साथ प्रेम किया है तो उनसे पे्रम के अलावा और कुछ मत चाहो। प्रभु तो सदा ही भक्त के प्रेम के भूखे होते हैं और सदा प्यार के बदले प्यार देने को तत्पर रहते हैं फिर अडचन क्या हैं? क्या वास्तव में हम उनसे उनका प्यार चाहते हैं या कुछ और? सच तो यह है कि हम उनकी याद भी इसलिए करते हैं कि वह हमारी इच्छाओं को पूरी करते रहें। हम संसार से काम लेना चाहते हैं पर स्वयं संसार के काम आने से खुद को बचाते हैं। हम भगवान को अपना बनाना चाहते हैं पर स्वयं उनका होने से डरते हैं। इन्हीं कारणों से जीवन में अनेक उलझनें उत्पन्न हो जाती है। उन्होंने कहा कि शिक्षा जीवन में सौंदर्य प्रदान करती है। शिक्षित व्यक्ति की मांग सदैव ही समाज को रहती है। शिक्षा एक प्रकार की साम‌र्थ्य है, पर शिक्षा के साथ दीक्षा अत्यंत आवश्यक है। अशिक्षित व्यक्ति से समाज को उतनी क्षति नहीं होती, जितनी दीक्षा रहित शिक्षित से होती है। एक दीक्षित व्यक्ति ही शिक्षा का सदुपयोग कर सकता है। प्रभु के मंगलमय विधान से हमें सेवा का साम‌र्थ्य और भावना हमारे पास है यदि आगे नहीं बढे तो मिला हुआ अवसर हाथ से निकल जाएगा और हम पीछे ढकेल दिए जाएंगे।उन्होंने कहा कि जीवन में जैसी भी परिस्थिति हो मानव यदि उसी के अनुसार आगे बढे तो उसे रास्ता अवश्य मिल जाएगा। बस शर्त यहीं है आग बढें। संयोग निश्चित नहीं है, विनाश निश्चित है। मनुष्य मिले हुए के सदुपयोग या दुरुपयोग करने में स्वतंत्र है, परंतु उसका फल भोगने में परतंत्र है।

तीन प्रकार के ऋणों से मुक्त होना जरूरी

बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पण्डित गोविन्दरामने कहा कि शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के लिए तीन प्रकार के ऋणों से मुक्त होना आवश्यक बताया गया है। ये हैं देव ऋण, ऋषि ऋण व पितर ऋण।
पितर ऋण अर्थात उनका ऋण जिन्होंने हमारा लालन-पालन किया व जो हमारे जन्म दाता हैं। अपने पितरोंका श्राद्ध करने के लिए मानव में श्रद्धा होनी चाहिए, आडम्बर नहीं। पण्डित जी ने कहा कि जिन माता-पिता ने हमारी आयु, अरोग्य व सुखोंके लिए कामना की और हर संभव प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त हुए बिना हमारा जीवन व्यर्थ है। उनका ऋण उतारने के लिए मनुष्य जीवन भर अपने माता पिता की सेवा-सुश्रूषा करता रहता है और इसी के तहत मरणोपरांत श्राद्ध कर्म द्वारा पितृ ऋण से मुक्त होने का प्रयास करता है। जब मनुष्य अपनी अंजलि में जल लेकर अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्रद्धा भाव से उन्हें जलांजलि अर्पित करता है तो इस कृत्य में उसका समर्पण एवं कृतज्ञता का भाव प्रकट होता है।

जल इसलिए क्योंकि उसे जीवन के लिए आवश्यक और सब जगह सुलभ माना गया है। उन्होंने कहा कि हिन्दु संस्कृति में यह मुख्य विशेषता है कि इसमें तुच्छ व उपेक्षित समझे जाने वाले प्राणियों को भी विशेष महत्व दिया जाता है। अन्य पक्षिओं की उपेक्षा कौवे को तुच्छ समझा जाता है। किन्तु श्राद्ध के समय सबसे पहले उसी को भोग दिया जाता है। हिन्दु धर्म में कौवे और पीपल को पितरोंका प्रतिक माना जाता है। पितृ पक्ष के इन दिनों में कौवे को ग्रास व पीपल को जल देकर पितरोंको तृप्त किया जाता है। श्राद्ध करना जीवन देने वाले व्यक्ति के प्रति श्रद्धा का भाव प्रदर्शित करना है।

शास्त्रों में माना गया है कि हर मरने वाले को शांति नहीं मिलती और न ही तुरंत मोक्ष प्राप्त होता है। पितृ पक्ष में पितरोंकी मोक्ष कामना करना ही श्राद्ध होता है। यह एक सामाजिक धारणा है कि यदि हम अपने पितरोंका श्राद्ध करेंगे तो हमारी आत्मा की शांति के लिए हमारी अगली पीढी भी हमारा श्राद्ध करेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि भगवान के अवतारोंका न तो निर्वाण दिवस करते हैं और न ही जीव जंतुओं का श्राद्ध तर्पण किया जाता है।

उन्होंने कहा कि दिवंगतोंकी शांति के लिए किया जाने वाला उपक्रम ही श्राद्ध है। हिन्दु धर्म में इसको श्राद्ध कहा जाता है। इसलाम को मानने वाले मगफिरतकी दुआ करके फतिहापढकर किसी न किसी रूप से अपने पितरोंको याद करते हैं। गरुड परम्परा के अनुसार तो जीवित व्यक्ति भी अपना श्राद्ध कर सकता है। बस शर्त यह है कि उसके बाद कोई उसका वंश चलाने वाला न हो।

वेद ही है परमात्मा की पवित्र वाणी

सौलधाके सत्संग भवन में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पंडित करण सिंह ने कहा कि वेद ही परमात्मा की पवित्र वाणी है जिसमें परमात्मा ने मनुष्य को सृष्टि में रहकर उत्तम तरीके से जीवन जीने के तरीका बताया है। आज मनुष्य वेद की शिक्षाओं को भुलाकर पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर रहा है जिसके कारण अधिकतर मनुष्य दुखी हैं।
पंडित जी ने कहा कि वेद में मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति के शिखर पर पहुंचने का मार्ग बताया गया है। वेद में वैज्ञानिक आधार पर जीवन जीने का आध्यात्मिक विकास का मार्ग बताया गया है। इस मार्ग पर चलकर मनुष्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। वेद में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों रास्तों को मिलाकर अपनाने की शिक्षा दी गई है।

केवल एक मार्ग पर चलकर मनुष्य अपने जीवन को उन्नति के शिखर पर नहीं पहुंचा सकता है। केवल एक मार्ग पर चलने वाले लोग गहरे अंधकार में डूब जाते हैं जिसके कारण अपने वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने के बजाय अंधेरे रास्तों में भटक कर जीवन को बर्बाद करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि केवल भौतिक मार्ग को अपनाने वाले लोग भौतिक सुख सुविधाओं को एकत्र करने में लगे रहते हैं। वे इन सुख सुविधाओं के माध्यम से शरीर को सुसज्जित करने में तो लगे रहते हैं किन्तु आत्मा के विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दे पाते हैं। जिसके कारण वे अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति की ओर एक कदम भी नहीं चल पाते हैं और परमात्मा द्वारा दिए गए इस अनुपम मानव जीवन को बर्बाद कर देते हैं।

दूसरी ओर केवल आध्यात्मिक मार्ग को अपनाने वाले लोग भी भौतिक साधनों का सहारा लिए बिना अपनी जीवन नौका को पार नहीं लगा सकते हैं। शरीर की रक्षा के लिए भौतिक साधनों का सहारा लेना आवश्यक हे। मनुष्य जीवन सुरक्षित रहने पर ही वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ सकता है। उन्होंने कहा कि आज हम वेद की शिक्षाओं को भूलकर पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने में लगे हैं। यह संस्कृति मनुष्य को केवल भौतिक मार्ग चलने के लिए प्रेरित करती हैं। यह मार्ग देखने में तो बहुत आकर्षक लगता है किन्तु अंत में यह दुख में गहरे सागर में ले जाकर जीवन को कष्ट भोगने के लिए मजबूर करता है। हमें वेद की शिक्षाओं का पालन करते हुए भौतिक और आध्यात्मिक मार्ग दोनों का समन्वय करके चलना चाहिए। दोनों मार्गो के समन्वय से ही मानव उन्नति के शिखर पर पहुंच सकता है।

विश्व में अशांति का कारण है द्वेष: गोपालदास

बाला जी मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए महंत गोपालदास ने कहा कि आज परिवार व समाज तथा विश्व में अशांति का कारण द्वेष, क्रोध तथा कामना है।
महंत जी ने कहा कि कामना से वैराग्य और संतोष दोनों का ही नाश होता है। जिस प्रकार मोर के पंख हमेशा हिलते रहते हैं। उसी प्रकार कामना ग्रस्त मनुष्य का मन भी सदा हिलता रहता है। द्वेष, क्रोध तथा कामना ही मनुष्य के समस्त दुखों का कारण हैं। पंडित जी ने कहा कि पशु दिन भर जंगल में जाकर आहार करते हैं और रात के समय आकर खूंटे से बांध दिए जाते हैं। उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य दिन को घर छोडकर व्यवहार के अर्थात सांसारिक क्रियाओं के फेर में फिरता रहता हैं और रात के समय घर में आ जाता हैं। इस प्रकार वह अपना सारा जीवन व्यर्थ कर देता हैं।

भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि हे अर्जुन जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भली भांति त्याग देता है उस काल से आत्मा से ही आत्मा में संतुष्ट हुआ स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति में चेतन शक्ति है और वही चेतन शक्ति यदि लोभ में चली जाए तो यह मनुष्य निर्मल होते हुए भी लोभी विकारी हो जाता है तथा सदाचारी से दुराचारी हो जाता है। गीता हमारे जीवन में एक दर्पण है। आज परिवार व समाज तथा विश्व में अशांति का कारण द्वेष, क्रोध तथा कामना है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख-दुख दोनों आयेंगे तथा जो दुख आने पर बौखला न जाए वही गीता के अनुसार स्थित प्रज्ञ है तथा उसी को स्थायी सुख की प्राप्ति हो सकती है।

भलाई को अपनाने पर स्वत:ही मनुष्य का कल्याण संभव है। इसीलिए विद्वानों ने कहा है कि बुराई त्याग दो भलाई अपने आप आ जाएगी। भलाई के दरवाजे पर अगर बुराई दस्तक देती है तो भलाई को अपमानित होना पडता है। लेकिन अगर बुराई के दरवाजे पर भलाई दस्तक दे तो वह बुराई को अपनी ओट में छुपा लेती हैं। सच कहा जाए तो इंसान मरने के बाद भी भलाई और बुराई के अलावा दुनिया से कुछ नहीं लेकर जाता है। समाज में इंसान का व्यवहार जैसा होता है मरने के बाद उसको वैसा ही कहा जाता है।

मनुष्य को हजारों चिंतायें होती हैं ।

मनुष्य को गुणहीन पत्नी । कपटी मित्र । दुराचारी राजा । कपूत । गुणहीन कन्या । कुत्सित देश का त्याग एकदम ही कर देना चाहिये । कलियुग मे स्वभाव से ही धर्म समाज से निकल जाता है । तप कर्म में स्थिरता नहीं रहती । सत्य प्राणियों के ह्रदय से दूर हो जाता है । प्रथ्वी बांझ के समान होकर फ़लहीन हो जाती है । मनुष्यों में कपट व्यवहार जाग जाता है । ब्राह्मण लालची हो जाते हैं । पुरुष स्त्रियों के वश में हो जाते हैं । स्त्रियां चंचल स्वभाव हो जाती हैं । नीच प्रवृति के लोग ऊंचे पदों पर पहुंच जाते हैं । अतः कलियुग में धर्मपूर्वक रहना बेहद कठिन हो जाता है । कपूत के होने से मनुष्य को सुख शान्ति नहीं मिलती । दुराचारिणी स्त्री से प्रेम की आशा भी कैसे की जा सकती है । कपटी मित्र का कैसे विश्वास किया जाय ? और भ्रष्ट राजा के राज्य में सुख से कैसे रहा जाय ? दूसरे का खाना । दूसरे का धन । दूसरे की स्त्री से ही सम्भोग । और दूसरे के घर में रहना । ये इन्द्र के एश्वर्य को भी नष्ट कर देते हैं । दुलार में बहुत से दोष हैं और ताडना में बहुत से गुण । इसलिये शिष्य और पुत्र आदि को केवल दुलार करना हरगिज उचित नहीं है । अधिक पैदल चलना प्राणियों के लिये बुडापे का कारण है । पर्वतों के लिये उसका जल बुडापे का कारण है । स्त्रियों को सम्भोग की प्राप्ति न होने से बुडापा आ जाता है । अधिक धूप से वस्त्रों का बुडापा होता है । नीच प्रकृति वाले दूसरे से कलह की इच्छा रखते हैं । मध्यम संधि की इच्छा रखते हैं । उत्तम दूसरे से सम्मान की इच्छा रखते हैं । आलसी व्यापारी । अभिमानी भृत्य । विलासी भिक्षुक । निर्धन कामी । तथा कटु वचन बोलने वाली वैश्या ये सदा अपने कार्य में असफ़ल रहते हैं । निरधन होते हुये दाता बनना । धन होते हुये कंजूस होना । पुत्र का आग्याकारी न होना । दुष्ट की सेवा करना । तथा दूसरे का अहित करते हुये मृत्यु को प्राप्त होना । ये मनुष्य के लिये दुश्चरित हैं । पत्नी से वियोग । अपनों के द्वारा अपमान । उधार का कर्ज । दुष्ट की सेवा करने की विवशता । धनहीन होने पर मित्रों का दूर हो जाना ये बातें मनुष्य को बिना अग्नि के ही जलाती हैं । मनुष्य को हजारों चिंतायें होती हैं । किन्तु नीच व्यक्ति द्वारा अपमान होने की चिंता । भूख से पीडित पत्नी की चिंता । प्रेम से हीन पत्नी की चिंता । तथा काम मे रुकावट ये चिंतायें तलवार के धार के समान चोट करती हैं । अनुकूल पुत्र । धन देने वाली विध्या । स्वस्थ शरीर । सत संगति । तथा मन के अनुकूल वश में हुयी पत्नी ये पुरुष के दुख को समूल नष्ट कर देते हैं । आयु । कर्म । धन । विध्या और मृत्यु ये जन्म के समय ही तय हो जाते हैं । बादल की छाया । दुष्ट का प्रेम । पराई औरत का साथ । जवानी और धन ये कब साथ छोड दें । कोई पता नहीं । इसी तरह जीवन का पता नहीं । धन का पता नहीं । यौवन का भी पता नहीं । स्त्री पुत्र का भी पता नही । किन्तु मनुष्य का धर्म कीर्ति और यश स्थायी होता है । सौ वर्ष का जीवन भी बहुत कम है । क्योंकि आधा तो रात में ही चला जाता है । बचा हुआ आधा रोग दुख और बुडापे की असमर्थता में चला जाता है । कुछ ठीक होता है । वह बाल अवस्था । स्त्री भोग और राज सेवा मे व्यतीत हो जाता है । मृत्यु दिन रात वृद्धावस्था के रूप में इस लोक में विचरण करती रहती है । और प्राणियों को खाकर अपना पेट भरती है । आकाश में घिरे बादल की छाया । तिनके की आग । नीच की सेवा । मृग मरीचिका का जल । वैश्या का प्रेम । और दुष्ट के ह्रदय में उत्पन्न हुयी प्रीत ये जल के बुलबुले के समान कुछ देर के होते हैं । निर्बल का बल राजा । बालक का बल रोना । मूर्ख का बल मौन है । औरत का बल हठ । और चोर का बल झूठ होता है । लोभ आलस्य और विश्वास ये तीन व्यक्ति का विनाश कर देते हैं । मनुष्य को भय से उसी समय तक भयभीत होना चाहिये । जब तक वह सामने नही आता । सामने आने पर निर्भीकता से उसका सामना करना चाहिये । कर्ज । आग । और रोग थोडे भी शेष रह जाने पर बार बार बडते जाते हैं । अतः उनको खत्म कर देना ही उचित है । वह सभा सभा नहीं जिसमें वृद्धजन नहीं । वे वृद्ध वृद्ध नहीं जो धर्म का उपदेश नही करते । वह धर्म नहीं जिसमें सत्य नहीं होता । वह सत्य नहीं जिसमें कपट हो ।

सौजन्य से - राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ

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