31 दिसंबर 2010

यहाँ भी मिल सकती है नौकरी

केस 1- गायिका आकांक्षा जाचक ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर अपने रिकॉर्ड, गाने के उद्देश्य, उपलब्धियों सहित कुछ गीत भी डाउनलोड कर रखे हैं। इतना ही नहीं, किसी खास अवसर पर वे अपनी फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोगों को स्क्रेप में भी अपने द्वारा गाया गीत ही भेजती हैं।

केस 2- सॉफ्टवेयर इंजीनियर अनुराग ने अपनी ऑरकुट प्रोफाइल पर सभी प्रोजेक्ट्स की डिटेल दे रखी है। पुरानी कंपनी में जहाँ वे काम कर चुके हैं, उसके साथ ही वर्तमान कंपनी की डिटेल सहित खुद के पद, जॉब प्रोफाइल आदि के बारे में भी दर्शा रखा है।

केस 3- मीडिया प्रोफेशनल अभिनव ने भी अपनी ऑरकुट प्रोफाइल में अपने कार्यक्षेत्र और बीट्‍स के बारे में निर्धारित तरीके से बताया है। इसी के साथ उन्होंने अपनी एक्सक्लूसिव स्टोरी फोटो के साथ यहाँ लोड कर रखी है।

एचआर हेड कहते हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स से अच्छे उम्मीदवारों की हाइरिंग करना काफी पुराना फंडा है। यह बात अलग है कि यह लाइमलाइट में अब आया है। वे बताते हैं हेड हंटर्स फेसबुक, ऑरकुट या लिंक्डइन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स अचानक से विजिट करते हैं।

यहाँ वे प्रोफाइल में दी गई जानकारियों के जरिए जॉब सीकर्स (जॉब लेने वाले) को तलाशते हैं। उनकी प्रोफाइल को आधार बनाकर वे कम्युनिटी के ऑनर से कॉन्टेक्ट करते हैं और निर्धारित व्यक्ति के बारे में जानकारियाँ लेते हैं। उन्होंने कहा, इसलिए कोई फ्रेशर हो या अनुभवी व्यक्ति अपनी प्रोफाइल में जानकारियों को अच्छे से सजाकर जॉब प्रोफाइडर को आकर्षित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मीडिया संबंधित कोर्स कर चुके फ्रेशर हाल ही में स्वयं द्वारा पूरा किया गया प्रोजेक्ट अपलोड कर सकते हैं। वे अपनी प्रोफाइल पर लिंक भी क्रिएट कर सकते हैं।

एक अन्य एचआर मैनेजर कहती हैं, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए किसी व्यक्ति की स्कील्स के बारे में पता चलता है और कंपनी की कॉस्ट में कट भी हो जाता है। वे कहती हैं हाँ लेकिन यह ध्यान रखने योग्य बात है कि ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट से शॉर्टलिस्ट होने के बाद अपने रिज्यूम को अच्छे-से तैयार करें।

जब भी इंटरव्यू के लिए जाएँ, अपने सीवी में किसी भी झूठी बात का समावेश न करें, क्योंकि आपके सीवी को आपकी ऑरकुट प्रोफाइल से वेरीफाई भी किया जा सकता है। इसके अलावा स्क्रेपबुक को चेक करके ब्रेकग्राउंड चेकिंग भी की जा सकती है।इंदौर। इन तीन केसेस के जरिए हम बताना चाह रहे हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइट केवल चैटिंग, दोस्तों से कनेक्ट रहने और एंटरटेनमेंट के लिए ही नहीं है, बल्कि इसके जरिए अब कंपनियाँ व जॉब प्रोफाइडर अपने-अपने श्रेत्र के बेहतर कर्मचारियों को भी ढूँढ़ रहे हैं यानी अब क्लासीफाइड्स को भूल जाइए...।

अब अदद उम्मीदवार ढूँढने वाले लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सही उम्मीदवार का चयन करने लगे हैं। ऐसे में हो सकता है आपकी ऑरकुट या लिंक्डइन प्रोफाइल इनका अगला डेस्टिनेशन हो।

29 दिसंबर 2010

गुरू कैसा हो?

जिस गुरू, संत-महापुरूष में ये सब बातें हों-
1 - जो हमारी दृष्टि में वास्तविक बोध्वान, तत्वग्य दीखते हों और जिनके सिवाय और किसी में वैसी अलौकिकता, विलाक्शंता नहीं दीखती हो.
2 - जो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि साधनों को तत्व से ठीक-ठीक जानने वाले हों.
3 - जिनके संगसे, वचनों से हमारे ह्रदय में रहने वाली शंकाएं बिना पूछे ही स्वतः दूर हो जाती हों.
4 - जिनके पास में रहने से प्रसन्नता, शान्ति का अनुभव होता हो.
5 - जो हमारे साथ केवल हमारे हितके लिये ही संबंध रखते हुए दीखते हों.
6 - जो हमारे से किसी भी वास्तु की किंचिन्मात्र भी आशा न रखते हों.
7 - जिनकी सम्पूर्ण चेष्टाएं केवल साधकों के हित के लिये ही होती हों.
8 - जिनके पासे में रहने से लक्ष्य की तरफ हमारी लगन स्वतः बढ़ती हो.
9 - जिनके संग, दर्शन, भाषण, स्मरण आदि से हमारे दुर्गुण-दुराचार दूर होकर स्वतः सद्गुण-सदाचार रूप देवी संपत्ति आती हो.

श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज के प्रवचन से

श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज के कल्याणकारी वचन

दुःख क्यों होता है ?

सुनना चाहते हैं, इसलिए न सुनने का दुःख होता है.
देखना चाहते हैं, इसलिए न दीखने का दुःख होता है.
बल चाहते हैं, इसलिए निर्बलता का दुःख होता है.
धन चाहते हैं, इसलिए निर्धनता का दुःख होता है.
जवानी चाहते हैं, इसलिए बुढापे का दुःख होता है.
जीना चाहते हैं, इसलिए मरने का दुःख होता है.
तात्पर्य है कि वास्तु के अभाव से दुःख नहीं होता, प्रत्युत उसकी चाहना से दुःख होता है.


दुःख दूर करने का उपाय

संसार की मात्रा वास्तु का निरंतर वियोग हो रहा है. उत्पन्न होते ही शरीर में विनाश की क्रिया आरम्भ हो जाती है. इसलिए बालक जन्मता है तो वह बड़ा होगा कि नहीं होगा, पढेगा कि नहीं पढेगा, व्यापार आदि करेगा कि नहीं करेगा, विवाह करेगा कि नहीं करेगा, उसकी संतान होगी कि नहीं होगा, वह धनी बनेगा कि नहीं बनेगा आदि सब बातों में संदेह रहता है, पर वह मरेगा कि नहीं मरेगा- इस बात में कोई संदेह नहीं रहता. अगर इस संदेहरहित बात को हम वर्तमान में ही धारण कर लें अर्थात जिसका वियोग अवश्यम्भावी है, उसके वियोग को वर्मान में ही स्वीकार कर लें और उसमें सुख की आशा न रखें तो फिर हमें दुखी नहीं होना पडेगा.
                                                                                                                                                                                                         (प्रवचन से)
                     

24 दिसंबर 2010

परहित में निहित स्वहित

पार्वती ने तप करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया, संतुष्ट किया। शिवजी प्रकट हुए और पार्वती के साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया। वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। इतने में थोडे दूर सरोवर में एक मगर ने किसी बच्चे को पकडा। बच्चा रक्षा के लिए चिल्लाने लगा। पार्वती ने गौर से देखा तो वह बच्चा बडी दयनीय स्थिति में है: मुझ अनाथ को बचाओ॥ मेरा कोई नहीं..बचाओ..बचाओ। वह चीख रहा है, आक्रंद कर रहा है। पार्वती का हृदय द्रवीभूत हो गया। वह पहुंचीं, वहां। सुकुमार बालक का पैर एक मगर ने पकड रखा है और घसीटता हुआ लिए जा रहा है गहरे पानी में। बालक क्रंदन कर रहा है: मुझ निराधार का कोई आधार नहीं। न माता है न पिता है। मुझे बचाओ.. बचाओ..बचाओ..।

पार्वती कहती है: हे ग्राह! हे मगरदेव!इस बच्चे को छोड दो। मगर बोला: क्यों छोडूं? दिन के छठे भाग में मुझे जो जो आ प्राप्त हो वह अपना आहार समझकर स्वीकार करना, ऐसी मेरी नियति है। ब्रह्माजीने दिन के छठे भाग में मुझे यह बालक भेजा है। अब मैं इसे क्यों छोडूं? पार्वती ने कहा :हे ग्राह! तुम इसको छोड दो। बदले में जो चाहिए वह मैं दूंगी।

तुमने जो तप किया और शिवजी को प्रसन्न करके वरदान मांगा, उस तप का फल अगर मुझे दे दो तो मैं बच्चे को छोड दूं। ग्राह ने यह शर्त रखी।
बस इतना ही?॥तो लो :केवल इस जीवन में इस अरण्य में बैठकर जो तप किया इतना ही नहीं बल्कि पूर्व जीवनों में भी जो कुछ तप किए हैं, उन सबका फल, वे सब पुण्य मैं तुमको दे रही हूं। इस बालक को छोड दो। जरा सोच लो। आवेश में आकर संकल्प मत करो। मैंने सब सोच लिया है।

पार्वती ने हाथ में जल लेकर अपनी संपूर्ण तपस्या का पुण्यफलग्राह को देने का संकल्प किया। तपस्या का दान होते ही ग्राह का तन तेजस्विता से चमक उठा। उसने बच्चे को छोड दिया और कहा: हे पार्वती! देखो! तुम्हारे तप के प्रभाव से मेरा शरीर कितना सुन्दर हो गया है! मैं कितना तेजपूर्णहो गया हूं! मानों मैं तेजपुंजबन गया हूं। अपने सारे जीवन की कमाई तुमने एक छोटे-से बालक को बचाने के लिए लगा दी? पार्वती ने जवाब दिया: हे ग्राह! तप तो मैं फिर से कर सकती हूं लेकिन इस सुकुमार बालक को तुम निगल जाते तो ऐसा निर्दोष नन्हा-मुन्ना फिर कैसे आता? देखते-ही-देखते वह बालक और ग्राह दोनों अन्तर्धान हो गए। पार्वती ने सोचा: मैंने अपने सारे तप का दान कर दिया। अब फिर से तप करूं। वह तप करने बैठीं। थोडा-सा ही ध्यान किया और देवाधिदेव भगवान शंकर प्रकट हो गए और बोले:
पार्वती! अब क्यों तप करती हो?
प्रभु! मैंने तप का दान कर दिया इसलिए फिर से तप कर रही हूं।
अरे सुमुखी! ग्राह के रूप में भी मैं था और बालक के रूप में भी मैं ही था। तेरा चित्त प्राणिमात्र में आत्मीयता का एहसास करता है कि नहीं, इसकी परीक्षा लेने के लिए मैंने यह लीला की थी। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक का एक हूं। अनेक शरीरों में शरीर से न्यारा अशरीरी आत्मा हूं। मैं तुझ से संतुष्ट हूं।
परहित बस जिन्हके मन माहीं।
तिन्हको जग दुर्लभ कछुनाहीं।

21 दिसंबर 2010

वाणी ही व्यक्तित्व की सही पहचान है

रघुनाथ मंदिर में श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए पण्डित माधवानन्दने कहा कि वाणी के सही इस्तेमाल करने पर ही व्यक्ति के व्यक्तित्व की सही पहचान होती है। इसी के माध्यम से कोई संत-महात्मा बन जाता है और कोई डाकू-लुटेरा। उन्होंने कहा कि मनुष्य को मन, वचन व कर्म से नि:स्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए। मन में किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं रखना चाहिए तथा अपनी वाणी से किसी को कठोर शब्द नहीं कहने चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य के बोलचाल के ढंग के माध्यम से ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण भी होता है।

इसी के माध्यम से कोई संत-महात्मा बन जाता है और कोई डाकू-लुटेरा बन जाता है। यह मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने भाषाई स्वर का किस प्रकार इस्तेमाल करता है। उन्होंने कहा कि एकता के अभाव में अधिकतर लोग अपनी शक्ति का उपयोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए करते हैं जबकि उन्हें अपनी शक्ति का उपयोग आपस में लडने की बजाय अन्याय व दूसरी बुराईयों से लडने के लिए करना चाहिए। मनुष्य में भक्ति भावना व संस्कार ग्रहण करने की प्रवृति गायब होती जा रही है, जिसके चलते हमारे समाज में निरन्तर बुराइयों को अपनाने की प्रवृति को बढावा मिल रहा है।

बुराइयों पर विजय प्राप्त करने पर ही मनुष्य का सर्वागीण विकास संभव है। उन्होंने कहा कि मानव सेवा ही सबसे बडा धर्म है इसलिए मनुष्य को अपनी शक्ति का उपयोग मानव सेवा करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मानव सेवा में लीन रहते हैं वे मनुष्य सदैव बुराईयों से दूर रहते हैं। जिसके कारण उन्हें मानव सेवा करने पर अत्यन्त खुशी महसूस होती है। उन्होंने कर्म के संदर्भ में कहा कि मनुष्य द्वारा किया गया कर्म ही उसका भाग्य विधाता होता है अच्छे कर्मो से ही अच्छे भविष्य का निर्माण होता है।

19 दिसंबर 2010

नए वर्ष में खुशी का पैगाम

हेलो दोस्तो! यह कैसा विचित्र सा समय है। वर्ष के बीत जाने का दुख और नए वर्ष के आने की खुशी, दोनों ही अहसास इस कदर घुलमिल गए हैं कि उनमें भेद कर पाना कठिन हो रहा है। ऐसा लगता है मानो हम बीते वर्ष के साथ अभी पूरी तरह जी भी नहीं कह पाए थे कि वह हाथ से निकल गया। कितना कीमती था वह हर पल, हर लम्हा, हर दिन, हर सप्ताह और हर महीना! आज उसकी अहमियत समझ में आ रही है। मन में यही कसक उठती है कि काश एक बार फिर से यही वर्ष जीने को मिल जाए तो वे सारे पल जिसकी हम कद्र नहीं कर पाए, उसे आदरपूर्वक गले लगा लेते। वर्ष के हर क्षण का सदुपयोग कर पाते। पर गया वक्त कभी हाथ आया है क्या? इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए नए वर्ष का पूरे सम्मान के साथ स्वागत करना चाहिए।

जो छूट गया उसका अफसोस करने के बजाए जो आने वाला है उसके स्वागत की तैयारी करनी है हमें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारी जरा सी चूक से आने वाला समय भी हमसे कतराकर चला जाएगा। हमारा फर्ज बनता है कि आने वाले हर लम्हे के लिए हम सतर्क हो जाएँ। आने वाले हर पल का हिसाब हमारे मन में, हमारी डायरी में भली-भाँति होना चाहिए। आने वाले वर्ष का हर लम्हा, हर दिन हमारे लिए अनेक अनमोल तोहफे और कामयाबी की सौगात लेकर खड़ा है। उसे जतन और प्यार से हासिल करने का सचेत प्रयास हमें जी-जान से करना चाहिए। आने वाला हर समय खुशियों के अनेक रंगों के गुलदस्ते लिए हमारे इंतजार में है इसलिए बेहद चतुराई से आलस को चकमा देकर उसे हमें हासिल करना है।

यह बहुत ही सही समय है जब हमें बारीकी से विचार कर लेना चाहिए कि हम कहाँ-कहाँ चूक गए और हमें संकल्प लेना चाहिए कि वह भूल हम फिर नहीं दुहराएँ। समय तभी तक हमारा है जब तक हम कुछ सोच सकते हैं और उसके अनुरूप कार्य कर सकते हैं। जब हमारे अंदर वह ताकत नहीं बचती कि हम अपनी सोच को साकार कर सकें तो वह समय हमारा होकर भी हमारा नहीं होता इसीलिए उन सभी लोगों के लिए यह समय बेशकीमती बन जाता है जो वयस्क हैं और जिन्हें अपने सपने को साकार करने का मौका मिला है।

हमें आने वाले वर्ष में इस बात का बेहद सतर्कता से ध्यान रखना चाहिए कि हम खुद को न भूलें। समय का सही उपयोग तभी होता है जब हम स्वयं को खुश रखने के बारे में गंभीरता से सोचें। एक खुश व्यक्ति अपनों को भी खुश रखने की चेष्टा करता है।

कहते हैं प्रेम से जो खुशी मिलती है वह और किसी चीज से नहीं मिल सकती। प्रेम से जो प्रेरणा मिलती है वह हर हौसले को इतना बुलंद कर देती है कि सागर, पर्वत सब तुच्छ जान पड़ते हैं पर प्रेम के सही मायने तभी तक सार्थक लगते हैं जब तक इसकी ताकत से जीवन को सकारात्मकता के साथ रचा जाए। इसकी ताकत का सही उपयोग तभी होता है जब प्रेम की भावना में मिट जाने के बजाए निर्माण की सोचें।

" हमें आने वाले वर्ष में इस बात का बेहद सतर्कता से ध्यान रखना चाहिए कि हम खुद को न भूलें। समय का सही उपयोग तभी होता है जब हम स्वयं को खुश रखने के बारे में गंभीरता से सोचें।"
प्यार के रिश्ते में भावनाओं का नियंत्रण बेहद जरूरी है। जिस प्रकार संभलकर बिजली का उपयोग करने पर हमारा घर रोशन हो उठता है पर जरा सी लापरवाही से सब कुछ खाक हो जाता है। उसी प्रकार प्रेम से भी जीवन में तभी तक प्रकाश मिलता है जब तक हम होश में रहें। आवेश में किए गए वायदे, बड़े-बड़े दावे पूरे नहीं होने पर वे साथी को बहुत आहत करते हैं। इस रिश्ते में यदि लंबी रेस का घोड़ा बनना है तो कछुए की चाल चलना ही ठीक है। धीमी गति ही सही पर आप मंजिल तक सोच-समझकर पहुँच तो पाएँगे।

यदि प्रेम में कोई भी साथी दूसरे को गंभीरता से नहीं लेता है, केवल अपनी सुविधा, अपनी मर्जी से रिश्ते को चलाना चाहता है तो सामने वाला अपना धैर्य खो देता है। कोई पूरी निष्ठा, ईमानदारी से कितना भी समर्पित भाव क्यों न रखता हो उसके बलिदान की भी सीमा होती है। एक वक्त आता है जब ऐसे रिश्ते बेजान होकर टूट जाते हैं। प्रेम के रिश्ते में दोस्ती की भावना को सबसे ज्यादा अहमियत देनी चाहिए ताकि दोनों को समान रूप से उसकी शक्ति मिलती रहे।

प्रेम करने वाले एक-दूजे के साथ चाहे जैसा भी व्यवहार करें, जितना भी समय बिताएँ पर नेकनीयती का दामन न छोड़ें। यदि एक दूसरे के बारे में नीयत साफ न हो तो वह प्यार अपनी गरिमा खो देता है। कई बार अच्छा समय बिताने को भी प्यार का नाम दे देते हैं। पर समय के बीतने के साथ ही उसकी गहराई समझ में आ जाती है। दोनों की भावना, नीयत एक समान है या नहीं इसे जानने का एक ही तरीका है, समय। जिस रिश्ते को दूर तक ले जाना है, उसे धीमी गति से परखने का मौका देना चाहिए।

नए वर्ष में पूरी ईमानदारी से रिश्ते को निभाने का संकल्प लें। जिनके दिल टूट गए हैं उनके लिए जिंगल बेल अवश्य बजेंगे। बस इस बार प्यार का दामन जीवन को संवारने के लिए थामें, जिंदगी में घुन लगाने के लिए नहीं।

14 दिसंबर 2010

पितरों का श्राद्ध आवश्यक है

पितरों की संतुष्टि के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जाने वाले तर्पर्ण, ब्राह्मण भोजन, दान आदि कर्मों को श्राद्ध कहा जाता है. इसे पितृयज्ञ भी कहते हैं. श्राद्ध के द्वारा व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है और पितरों को संतुष्ट करके स्वयं की मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है.

श्राद्ध के प्रकार
शास्त्रों में श्राद्ध के निम्नलिखित प्रकार बताये गए हैं -

1.    नित्य श्राद्ध : वे श्राद्ध जो नित्य-प्रतिदिन किये जाते हैं, उन्हें नित्य श्राद्ध कहते हैं. इसमें विश्वदेव नहीं होते हैं.
2.    नैमित्तिक या एकोदिष्ट श्राद्ध : वह श्राद्ध जो केवल एक व्यक्ति के उद्देश्य से किया जाता है. यह भी विश्वदेव रहित होता है. इसमें आवाहन तथा अग्रौकरण की क्रिया नहीं होती है. एक पिण्ड, एक अर्ध्य, एक पवित्रक होता है.
3.    काम्य श्राद्ध : वह श्राद्ध जो किसी कामना की पूर्ती के उद्देश्य से किया जाए, काम्य श्राद्ध कहलाता है.
4.    वृद्धि (नान्दी) श्राद्ध : मांगलिक कार्यों ( पुत्रजन्म, विवाह आदि कार्य) में जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृद्धि श्राद्ध या नान्दी श्राद्ध कहते हैं.
5.     पावर्ण श्राद्ध : पावर्ण श्राद्ध वे हैं जो आश्विन मास के पितृपक्ष, प्रत्येक मास की अमावस्या आदि पर किये जाते हैं. ये विश्वदेव सहित श्राद्ध हैं.
6.    सपिण्डन श्राद्ध : वह श्राद्ध जिसमें प्रेत-पिंड का पितृ पिंडों में सम्मलेन किया जाता है, उसे सपिण्डन श्राद्ध कहा जाता है.
7.    गोष्ठी श्राद्ध : सामूहिक रूप से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे गोष्ठीश्राद्ध कहते हैं.
8.    शुद्धयर्थ श्राद्ध : शुद्धयर्थ श्राद्ध वे हैं, जो शुद्धि के उद्देश्य से किये जाते हैं.
9.    कर्मांग श्राद्ध : कर्मांग श्राद्ध वे हैं, जो षोडश संस्कारों में किये जाते हैं.
10.    दैविक श्राद्ध : देवताओं की संतुष्टि की संतुष्टि के उद्देश्य से जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें दैविक श्राद्ध कहते हैं.
11.    यात्रार्थ श्राद्ध : यात्रा के उद्देश्य से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे यात्रार्थ कहते हैं.
12.    पुष्टयर्थ श्राद्ध : शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक पुष्टता के लिये जो श्राद्ध किये जाते हैं, उन्हें पुष्टयर्थ श्राद्ध कहते हैं.
13.    श्रौत-स्मार्त श्राद्ध : पिण्डपितृयाग को श्रौत श्राद्ध कहते हैं, जबकि एकोदिष्ट, पावर्ण, यात्रार्थ, कर्मांग आदि श्राद्ध स्मार्त श्राद्ध कहलाते हैं.

कब किया जाता है श्राद्ध?
श्राद्ध की महत्ता को स्पष्ट करने से पूर्व यह जानना भी आवश्यक है की श्राद्ध कब किया जाता है. इस संबंध में शास्त्रों में श्राद्ध किये जाने के निम्नलिखित अवसर बताये गए हैं -
1.   आश्विन मास के पितृपक्ष के 16 दिन.
2.   वर्ष की 12 अमावास्याएं तथा अधिक मास की अमावस्या.
3.   वर्ष की 12 संक्रांतियां.
4.   वर्ष में 4 युगादी तिथियाँ.
5.   वर्ष में 14 मन्वादी तिथियाँ.
6.   वर्ष में 12 वैध्रति योग
7.   वर्ष में 12 व्यतिपात योग.
8.   पांच अष्टका.
9.   पांच अन्वष्टका
10.   पांच पूर्वेघु.
11.   तीन नक्षत्र: रोहिणी, आर्द्रा, मघा.
12.   एक कारण : विष्टि.
13.   दो तिथियाँ : अष्टमी और सप्तमी.
14.   ग्रहण : सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण.
15.   मृत्यु या क्षय तिथि.

क्यों आवश्यक है श्राद्ध?
श्राद्धकर्म क्यों आवश्यक है, इस संबंध में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं -
1.    श्राद्ध पितृ ऋण से मुक्ति का माध्यम है.
2.    श्राद्ध पितरों की संतुष्टि के लिये आवश्यक है.
3.    महर्षि सुमन्तु के अनुसार श्राद्ध करने से श्राद्धकर्ता का कल्याण होता है.
4.    मार्कंडेय पुराण के अनुसार श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितर श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, संतति, धन, विघ्या, सभी प्रकार के सुख और मरणोपरांत स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं.
5.    अत्री संहिता के अनुसार श्राद्धकर्ता परमगति को प्राप्त होता है.
6.    यदि श्राद्ध नहीं किया जाता है, तो पितरों को बड़ा ही दुःख होता है.
7.    ब्रह्मपुराण में उल्लेख है की यदि श्राद्ध नहीं किया जाता है, तो पितर श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को शाप देते हैं और उसका रक्त चूसते हैं. शाप के कारण वह वंशहीन हो जाता अर्थात वह पुत्र रहित हो जाता है, उसे जीवनभर कष्ट झेलना पड़ता है, घर में बीमारी बनी रहती है.

श्राद्ध-कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही करें 
श्राद्ध कर्म को शास्त्रोक्त विधि से ही करना चाहिए. शास्त्रों में दिए गए नियमों का पूर्णतः पालन होना चाहिए, तभी श्राद्ध कर्म अपने उद्देश्य की पूर्ती कर पाते हैं. महाभारत के अनुशासन पर्व में इस संबंध में एक आख्यान मिलता है. भीष्म अपने पिता शांतनु का श्राद्ध करने के लिये हरिद्वार गए. वहां उन्होंने कई सिद्ध ऋषियों को बुलाकर श्राद्ध कर्म आरम्भ किया. एकाग्रचित होकर उन्होंने जैसे ही विधिवत पिंडदान देना आरम्भ किया, तो पिण्डदान देने के लिये पिण्ड वेदी पर जो कुश बिछाए गए थे, उनमें से एक हाथ निकलकर बाहर आया. यह हाथ भीष में पिता शांतनु का था. शांतनु स्वयं अपने निमित्त पिण्ड का दाल लेने के लिये उपस्थित हो गए थे. ज्ञानी पुरूष भीष्म ने पिण्ड का दान उनके हाथ में न करके इस हेतु बनाई गयी वेदी के ऊपर रखे कुशों पर किया, क्योंकि शास्त्रों में यही कहा गया है की कुशों पर पिण्डदान करें -- 'पिण्डो देयः कुशोष्वीति.' ऐसी करने पर शांतनु का हाथ अदृश्य हो गया. भीष्म ने विधिवत श्राद्ध कर्म पूर्ण किया और वापस लौट आए. रात्री में शांतनु ने भीष्म को स्वप्न दिया और प्रसन्नतापूर्वक कहा की 'भारत श्रेष्ठ! तुम शास्त्रीय सिद्धांत पर दृढतापूर्वक डटे हुए हो, हम इससे बहुत प्रसन्न हैं, तुम त्रिकालदर्शी होओ और अंत में तुम्हें भगवान् विष्णु की प्राप्ति ही, साथ ही जब तुम्हारी इच्छा हो, तभी मृत्यु तुम्हारा स्पर्श करे.' ऐसा आशीर्वाद देकर शांतनु ने परम मुक्ति प्राप्त की और पितामह भीष्म को भी पितरों की भक्ति का फल प्राप्त हुआ. कहने का तात्पर्य यही है की श्राद्धों को शास्त्रोक्त विधि के अनुरूप हेए करना चाहिए.

श्राद्ध के लिये ज्ञातव्य बातें ... ...
1.    श्राद्ध की सम्पूर्ण प्रक्रिया दक्षिण की ओर मुंह करके तथा अपसव्य (जनेऊ को दाहिने कंधे पर डालकर बाएं हाथ के नीचे कर लेने की स्थिति) होकर की जाती है.
2.    श्राद्ध में दूध, गंगाजल, मधु, तसर का कपड़ा, दोहित्र, कुतप, कृष्ण तिल और कुश ये आठ बड़े महत्व के प्रयोजनीय हैं.
3.    श्राद्ध में पितरों को भोजन सामग्री देने के लिये हाथ से बने हुए मिटटी के (चाक से बने हुए न हों और कच्चे हों) बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए. मिट्टी के बने हुए बर्तनों के अलावा लकड़ी के बर्तन, पत्तों के दोने (केले के पत्ते का नहीं हों) का भी प्रयोग किया जा सकता है.
4.    श्राद्ध में पितरों को भोजन सामग्री देने के लिये चांदी के बर्तनों का महत्व विशेष है. सोने, ताम्बे और कांसे के बर्तन भी ग्राह्य हैं. इसमें लोहे के बर्तनों का कदापि प्रयोग न करें.
5.    श्राद्ध में सफ़ेद पुष्पों का प्रयोग करना चाहिए. कमल का भी प्रयोग किया जा सकता है. श्राद्ध में कदंब, देवड़ा, मौलश्री, बेलपत्र, करवीर, लाल तथा काले रंग के पुष्प, तीक्ष्ण गंध वाले पुष्प आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए.
6.    श्राद्ध में तुलसीदल का प्रयोग आवश्यक है.
7.   श्राद्ध में गाय के दूध एवं उससे बनी हुई वस्तुएँ, जौ, धान, तिल, गेहूं, मूंग, आम, बेल, अनार, आंवला, खीर, नारियल, फालसा, नारंगी, खजूर, अंगूर, चिरौंजी, बेर, इन्द्रजौ, मटर, कचनार, सरसों, सरसों का तेल, तिल्ली का तेल आदि का प्रयोग करना चाहिए. श्राद्ध में उरद, मसूर, अरहर, गाजर, गोल लौकी, बैंगन, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, काला जीरा, सिंघाड़ा, जामुन, पिप्पली, सुपारी, कुलथी, कैथ, महुआ, अलसी, पीली सरसों, चना, मांस, अंडा आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए.
8.    श्राद्ध बिना आसन के नहीं करना चाहिए. आसन में भी कुश, तृण, काष्ठ (लोहे की कील लगी हुए ना हो), ऊन, रेशम के आसन प्रशस्त हैं. 
9.    श्राद्ध में भोजन करने वाले ब्राह्मण को भोजन करते समय आवश्यक रूप से मौन रहना चाहिए.
10.    श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मण को भोजन कराने से पूर्व उनको बिठाकर श्रद्धापूर्वक उनके पैर धोने चाहिए.
11.    श्राद्धकर्ता को श्राद्ध के दिन दातुन, पान का सेवन, शरीर पर तेल की मालिश, उपवास, स्त्री संभोग, दवाई का सेवन, दूसरे का भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए.
12.    श्राद्ध के दिन भोजन करने वाले ब्राह्मण को पुनर्भोजन (दुबारा खाना), यात्रा, भार ढोना,शारीरिक परिक्श्रम करना, मैथुन, दान, प्रतिग्रह तथा होम नहीं करना चाहिए.
13.    श्राद्ध में श्रीखण्ड, सफ़ेद चन्दन, खस, गोपीचन्दन का ही प्रयोग करना चाहिए. श्राद्ध में कस्तूरी, रक्त चन्दन, गोरोचन आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए.
14.    श्राद्ध में अग्नि पर अकेले घी नहीं डालना चाहिए.
15.    निर्धनता की स्थिति में केवल शाक से श्राद्ध करना चाहिए. यदि शाक भी न हो, तो घास काटकर गाय को खिला देने से श्राद्ध सम्पन्न हो जाता है. यदि किसी कारणवश घास भी उपलब्ध न हो, तो किसी एकांत स्थान पर जाकर श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक अपने हाथों को ऊपर उठाते हुए पितरों से प्रार्थना करें-
न मेsस्ति वित्तं न धनं नान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्नोsस्मि।
तृष्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वत्मर्नि मारूतस्य!!

हे मेरे पितृगण! मेरे पास श्राद्ध के उपयुक्त न तो धन है, न धान्य आदि. हाँ, मेरे पास आपके लिये श्रद्धा और भक्ति है. मैं इन्हीं के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूँ. आप तृप्त हो जाएं. मैनें दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है.
16.    गया, पुष्कर, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में श्राद्ध किये जाने का विशेष महत्व है.
17.    श्राद्ध ऐसी भूमि पर किया जाना चाहिए जिसका ढाल दक्षिण दिशा की ओर हो.
18.    पितरों के उद्देश्य से किये जाने वाले दान में -- गाय, भूमि, तिल, सोना, घी, वस्त्र, धान्य, गुड, चांदी तथा नमक में से एक या अधिक या सभी वस्तुएँ होनी चाहिए. इस सभी वस्तुओं का दान इस महादान कहलाता है.
19.    धान्य में सप्तधान्य देने का विधान भी है. सप्तधान्य में जौ, गेहूं (कंगनी), धान, तिल, टांगुन(मूंग), सांवा और चना होता है.
20.    मृत्यु के समय जो तिथि होती है, उसे ही मरण तिथि माना जाता है और श्राद्ध उसी तिथि को करना चाहिए. मरण तिथि के निर्धारण में सूर्यदयकालीन तिथि ग्राह्य नहीं है.
21.    अर्ध्यप्रदान करने के बाद एकोदिष्ट श्राद्ध में पात्र को सीधा रखना चाहिए, जबकि पार्वण श्राद्ध में उलटा रखना चाहिए.
22.    पति के रहते मृत नारी के श्राद्ध में ब्राह्मण के साथ सौभाग्यवती ब्राह्मणी को भी भोजन कराना चाहिए.
23.    श्राद्ध के समय श्राद्ध कर्ता को पवित्री धारण अवश्य करनी चाहिए.

12 दिसंबर 2010

भगवान गणेश के विभिन्न अवतार

1. महोत्कट विनायक 
कृतयुग में भगवान गणपति 'महोत्कट विनायक' के नाम से प्रख्यात हुए. अपने महान उत्कट ओजशक्ति के कारण वे 'महोत्कट' नाम से विख्यात हुए. उन महातेजस्वी प्रभु के दस भुजाएं थीं, उनका वाहन सिंह था, वे तेजोमय थे. उन्होंने देवांतक तथा नरान्तक आदि प्रमुख दैत्यों के संत्रास से संत्रस्त देव, ऋषि-मुनि, मनुष्यों तथा समस्त प्राणियों को भयमुक्त किया. देवान्तक से हुए युद्ध में वे द्विदन्ती से एकदन्ती हो गए.

2. मयूरेश्वर
त्रेतायुग में महाबली सिन्धु के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिये भगवान् ने मयूरेश्वर के रूप में अवतार लिया. यह अवतार भाद्रपदशुक्ला चतुर्थी को अभिजित मुहूर्त में हुआ था. इस अवतार में गणेश माता पार्वती के यहाँ अवतरित हुए थे. इस अवतार में गणेशजी के षडभुजा थीं, उनके चरण कमलों में छत्र, अंकुश एवं ऊर्ध्व रेखायुकृत कमल आदि चिन्ह थे. उनका नाम मयूरेश पडा. मयूरेश रूप में भगवान् गणेश ने बकासुर, नूतन, कमालासुर, सिन्धु एवं पुत्रों और उसकी अक्षोहिणी सेना को मार गिराया तथा देवता, मनुष्य आदि को दैत्यों के भय से मुक्त कराया.

3. श्री गजानन
द्वापर युग में राजा वरेण्य के यहाँ भगवान् गणेश गजानन रूप में अवतरित हुए. वे चतुर्भुजी थे. नासिका के स्थान सूंड सुशोभित थी. मस्तक पर चन्द्रमा तथा ह्रदय पर चिन्तामणि दीप्तिमान थी. वे दिव्य गंध तथा दिव्य वस्त्राभारणों से अलंकृत थे. उनका उदार विशाल एवं उन्नत था, हाथ-पाँव छोटे-छोटे और कर्ण शूर्पाकार थे. आँखें छोटी-छोटी थीं, ऐसा विलक्षण मनोरम रूप था गजानन जी का. इस अवतार में भगवान् गणेश ने सिन्दूर नामक दानव को उसकी सेना सहित परास्त किया था और सिन्दूर को युद्ध भूमि में मार डाला. उस समय क्रुद्ध गजानन ने उस सिन्दूर का रक्त अपने दिव्य अंगों पर पोत लिया. तभी से वे सिंदूरहा, सिन्दूरप्रिय तथा सिन्दूरवदन कहलाये.

4. श्री धूम्रकेतु
श्री गणेश जी का कलियुगीय भावी अवतार धूम्रकेतु के नाम से विख्यात होगा. कलि के अंत में घोर पापाचार बढ़ जाने पर, वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा नष्ट हो जाने पर, देवताओं की प्रार्थना पर सदधर्म के पुनः स्थापन के लिये वे इस पृथ्वी पर अवतरित होंगे और कलि का विनाश कर सतयुग की अवतारना करेंगे.

पूर्व में गणेशपुराण में वर्णित भगवान् के चार लीलावतारों का स्वल्प परिचय दिया गया है. आगे मुद्गलपुराण पर आधारित गणेश जी के अनंत अवतारों में से मुख्य आठ अवतारों का यहाँ स्थानाभाव के कारण नामोल्लेख मात्र किया जा रहा है -

1.  वक्रतुंग - इनका वाहन सिंह है तथा ये मत्सरासुर के हंता हैं.
2.  एकदन्त - ये मूषकवाहन एवं मदासुर के नाशक हैं.
3.  महोदर - इनका वाहन मूषक है, ये ज्ञानदाता तथा मोहासुर के नाशक हैं.
4.  गजानन - इनका वाहन मूषक है, ये सान्ख्यों को सिद्धि देने वाले एवं लोभासुर के हंता हैं.
5.  लम्बोदर - इनका वाहन मूषक है तथा ये क्रोधासुर का विनाश करने वाले हैं.
6.  विकट - इनका वाहन मयूर है तथा ये कामसुर के प्रहर्ता है.
7.  विध्नराज - इनका वाहन शेष है और ये ममासुर के प्रहर्ता है. 
8.  धूम्रवर्ण - इनका वाहन मूषक है तथा ये अहंतासुर के नाशक हैं.

गणपति के विभिन्न स्वरुप 
बालगणपति  - रक्तवर्ण, चतुर्हस्त
 तरूणगणपति- रक्तवर्ण, अस्टहस्त
भक्तगणपति - श्वेतवर्ण, चतुर्हस्त
वीरगणपति - रक्तवर्ण, दशभुज
शक्तिगणपति - सिन्दूरवर्ण, चतुर्भुज
द्विजगणपति - शुभ्रवर्ण, चतुर्भुज
सिद्धगणपति - पिंगलवर्ण, चतुर्भुज
विध्नगणपति - स्वर्णवर्ण, दशभुज
क्षिप्रगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्हस्त
हेरम्बगणपति - गौरवर्ण, अस्टहस्त, पंचमातंगमुख, सिंहवाहन 
लक्ष्मीगणपति - गौरवर्ण, दशभुज
महागणपति - रक्तवर्ण, दशभुज
विजयगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्हस्त
नृत्तगणपति - पीतवर्ण, चतुर्हस्त
ऊर्ध्वगणपति - कनकवर्ण , षड्भुज
एकाक्षरगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्भुज
वरगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्हस्त
त्रयक्षगणपति - स्वर्णवर्ण, चतुर्बाहू
क्षिप्रप्रसादगणपति - रक्तचंदनाडिकत, षड्भुज
हरीद्वागणपति - हरिद्वर्ण, चतुर्भुज
एकदंतगणपति - श्यामवर्ण, चतुर्भुज 
सृष्टिगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्भुज
उद्दण्डगणपति - रक्तवर्ण, द्वादशभुज
ऋणमोचनगणपति - शुक्लवर्ण, चतुर्भुज
ढुण्ढिगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्भुज
द्विमुखगणपति - हरिद्वर्ण, चतुर्भुज
त्रिमुखगणपति - रक्तवर्ण, षड्भुज
सिंहगणपति - श्वेतवर्ण, अष्टभुज
योगगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्भुज
दुर्गागणपति - कनकवर्ण , अस्टहस्त
संकष्टहरणगणपति - रक्तवर्ण, चतुर्भुज

11 दिसंबर 2010

सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है मानव: कर्णसिंह

सौलधा के सत्संग भवन में प्रवचन सुनाते हुए पंडित कर्ण सिंह ने कहा कि मनुष्य जीवन इस सृष्टि की सबसे अनुपम कृति है। अत: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को सुधारने के लिए अच्छे कर्म करने के साथ-साथ रामनाम का जाप करे। राम नाम का जाप करने से जहां मनुष्य का मन शुद्ध होता है। वहीं मनुष्य इससे परोपकारी भी हो जाता है।

पंडित जी ने कहा कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इच्छाओं को त्याग कर दूसरों के भला ही सोचे और अपने मन को स्थिर करे। इस प्रकार सत्कर्म करने का फल उसे अवश्य मिलेगा और उसका जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा।

उन्होंने कहा कि मनुष्य द्वारा श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति में अनेक बाधाएं आना स्वाभाविक है, परंतु मनुष्य अध्यात्म के बल पर सभी बाधाओं को आसानी से पार कर लेता है। अध्यात्म की शक्ति मनुष्य को प्रेरणा देती है कि वह कर्म फल की प्राप्ति के लिए आत्म समर्पण कर दे। साधना करने के परिणाम काफी सुखद होते हैं। हालांकि प्रारंभ में साधना करते हुए मनुष्य को कुछ परेशानियों का सामना करना पडता है परंतु आखिरकार इसके परिणाम काफी सुखद होते है।

उन्होंने कहा कि धर्म जीवन का अभिन्न अंग है और धर्म के सेवन से ही प्रकृति में परिवर्तन आता है और मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का आविर्भाव होता है। ईश्वर की उपासना समर्पण भाव से की जानी चाहिए और मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अंदर के रोग-द्वेष को अपने विवेक की कैची से काट डाले तभी कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए मानव को इंद्रियों पर काबू पाना सीखना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रियों का संचालन करना मानव को सिखाया है। इंद्रियों का संचालन ही हृदय का गोकुल है।

उन्होंने कहा कि भोजन थाली में होगा तो पेट में भी होगा और अगर थाली ही खाली हो तो पेट भरने की आश छोड देनी चाहिए। कुछ लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, लेकिन इस पूजा से ही अंदर की पूजा तक पहुंचा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि अंदर की पूजा को जानने से पहले यानी भगवान को जानने के लिए अंदर की पूजा से पहले बाहर की पूजा बहुत जरूरी है। आंखे जो बाहर देखती है उसी का ध्यान अंदर करती है। इसी प्रकार से कान बाहर से सुनकर उसका अंदर चिंतन करते है इसलिए पूजा की जोत की ज्वाला शरीर के बाहर तक ही नहीं बल्कि अंदर तक भी जानी बहुत जरूरी है।

09 दिसंबर 2010

होम्‍योपैथी क्षेत्र में अपार संभावनाएँ


आज की आपाधापी वाली जिंदगी में बीमारियों ने मनुष्य के शरीर में अपनी पैठ बना ली है, तो लोग भी उनका जड़ से इलाज चाहते हैं। इसके लिए वह होम्‍योपैथी का सहारा लेते हैं। यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें उपचार में तो समय लगता है लेकिन यह बीमारी को जड़ से मिटाती है। यही कारण है जिसके कारण यह पद्धति तेजी से लोकप्रिय हो रही है। अगर आप चाहें तो इस क्षेत्र में अपना भविष्य देख सकते हैं।
इस क्षेत्र की खासियत यह है कि यह आर्थराइटिस, डायबिटीज, थायरॉइड और अन्य तमाम गंभीर मानी जाने वाली बीमारियों का प्रभावी इलाज करती है और वह भी बिना किसी साइड इफेक्ट के। आमतौर पर यह धारणा है कि होम्‍योपैथी दवाईयों का असर बहुत देर से होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, यह पद्धति केवल पुरानी और गंभीर बीमारियों को पूरी तरह ठीक करने में थोड़ा समय लेती है, अन्यथा बुखार, सर्दी-खांसी या अन्य मौसमी या छोटी-मोटी बीमारियों में होम्‍योपैथिक दवाएँ उतनी ही तेजी से असर करती हैं, जितनी कि अन्य पद्धतियों की दवाएँ।
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भारत में होम्‍योपैथी शिक्षा की शुरुआत 1983 में ग्रेजुएट लेवल और डिप्लोमा कोर्स से हुई। इस समय देश में 186 होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से 35 सरकारी कॉलेज हैं। शेष निजी संस्थाओं द्वारा संचालित हैं। होम्‍योपैथी डॉक्टर बनने के लिए कई कोर्स हैं। इनमें सबसे आरंभिक कोर्स है - बैचलर ऑफ होमियोपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी यानी बीएचएमएस। इनमें प्रवेश के लिए आपको फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और अंग्रेजी विषयों के साथ कम से कम 45 प्रतिशत अंकों से 12वीं पास होना आवश्यक है।
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बीएचएमएस में प्रवेश पाने के लिए आपको ऑल इंडिया एंट्रेंस एग्जामिनेशन देना पड़ेगा। इस कोर्स की कुल अवधि साढे पाँच वर्ष है जिसमें 6 माह की इंटर्नशिप भी शामिल है। इसके बाद डिप्लोमा इन होमियोपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी यानी डीएचएमएस किया जा सकता है। इसकी अवधि चार वर्ष है। इस क्रम में होमियोपैथ में एमडी भी किया जा सकता है। जिसकी निर्धारित अवधि तीन वर्ष है। यह पोस्ट ग्रेजुएट स्तर का कोर्स है। इसके तहत पीडियाट्क्सि, मेटेरिया मेडिका, होमियोपैथिक फिलॉसफी, रेपर्टरी, साइकियाट्रि‍स्‍ट, फार्मेस आर्गेनॅन ऑफ मेडिसिन आदि में विशेषज्ञता हासिल की जा सकती है। इस क्षेत्र में करियर की अपार संभावनाएँ है। कोर्स करने के बाद आपको सरकारी या निजी अस्पताल में होमियोपैथी डॉक्टर के रूप में नौकरी मिल सकती है।
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इसके अलावा क्लिनिक्स, चैरिटेबल इंस्टिट्यूट, रिसर्च इंस्टिट्यूट, मेडिकल कॉलेजों में भी काम मिल सकता है। इन सभी के अलावा आप खुद का काम भी कर सकते हैं। वाणिज्य संस्थान एचोसैम की रिपोर्ट के आधार पर भारत में होमियोपैथी का बाजार इस समय करीब 12।5 अरब रुपए का है। उम्मीद की जा रही है कि 2010 तक यह 26 अरब रुपए का हो जाएगा। होम्‍योपैथी का बाजार प्रतिवर्ष 25-30 प्रतिशत की गति से आगे बढ़ रहा है।
लोगों के बीच होम्‍योपैथिक चिकित्सा की जितनी मांग बढ़ रही है, उस अनुपात में पर्याप्त चिकित्सक नहीं है। होम्‍योपैथ का एक अच्छा डॉक्टर प्रतिदिन तीन-चार हजार रुपए आराम से कमा लेता है। भारत में एलोपैथी और आयुर्वेद के बाद होमियोपैथी तीसरी सर्वाधिक लोकप्रिय चिकित्सा पद्धति है। हालाँकि, आज यह सबसे तेजी से आगे बढ़ रही है।
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शिक्षण संस्थान:
गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली
डॉ. बी।आर सूर होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली
नेहरु होम्‍यो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, नई दिल्ली
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ होम्‍योपैथी, कोलकाता
बैक्सन होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज, नोएडा
कानपुर होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, कानपुर नेशनल होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल,लखनऊ

आपके अंदाज में है सेक्स अपील

हिन्दी सिनेमा के सबसे सेक्सी दृश्यों को याद करें। शायद आपके आंखों के आगे बारिश में भीगती नायिका की झलक कौंध जाएगी। जिसके कपड़े भीगकर बदन से चिपक गए हों। पारदर्शी कपड़ों से शरीर बाहर झांक रहा हो। इससे भी ज्यादा सेक्सी आपको लगी होंगी शायद उस अभिनेत्री की अदाएं। यह साफ बताता है कि हमारी सेक्सुअल फैंटेसी में शारीरिक भाव-भंगिमाएं यानी कि बॉडी लैंग्वेज की क्या भूमिका है।

शरीर की भाषा और स्त्रियां
अगर स्त्रियों की बात करें तो कई बार कम खूबसूरत स्त्रियां अपनी बॉडी लैंग्वेज के चलते पुरुषों को अपना दीवाना बना लेती हैं। बहुत सी युवतियों की चाल, उनके बैठने, देखने और बात करने का अंदाज भर पुरुषों के भीतर उनके प्रति चाहत भड़काने लगता है। कई बार उनकी आंगिक भाषा से यह अनायास झलकता है और कई बार कुछ स्त्रियों द्वारा जानबूझकर शरीर की भाषा तय की जाती है।
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सेक्सी लुक के प्रति सतर्कता बढ़ी
गौर करें तो हम पाएंगे कि आज के दौर में स्त्रियां अपने सेक्सी लुक के प्रति भी जागरुक हो रही हैं। वे पहले के मुकाबले अपने चलने, उठने-बैठने के तरीके को लेकर ज्यादा सतर्क हो गई हैं। वे पहले की तरह अपनी सेक्स अपील को छिपाती नहीं है बल्कि उसे साफ या कई बार आक्रामक तरीके से सामने भी रखती हैं। पतली कमर, उन्नत स्तन और भरे हुए नितंब उनमें शर्म नहीं गर्व की भावना पैदा करते हैं।

जो दीवाना बना दे...
स्त्रियों के शरीर की बनावट भी ऐसी होती है कि वे उसका इस्तेमाल बड़ी आसानी से पुरुषों के भीतर सेक्स की चाह भड़काने के लिए कर सकती हैं। खास तौर पर उनके वक्ष, कमर और जांघें पुरुषों के लिए हमेशा आकर्षण का विषय होती हैं। इतना ही नहीं स्त्रियों की कुछ हरकतें हमेशा पुरुषों के भीतर काम भावना को भड़काती हैं। मसलन उनके होठों की हरकत, अपनी जीभ पर जुबान फेरना या फिर आहिस्ता-आहिस्ता कुछ खाना भी पुरुषों को दीवाना बना सकता है।

पुरुषों के अंदाज
शरीर की यह भाषा पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों में भी काम करती है। आम तौर पर किसी कमरे में धीमी और सधी चाल से प्रवेश करने वाला पुरुष वहां बैठी स्त्रियों का ध्यान अनायास ही अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। यह सधी चाल बताती है कि उसका अपने-आप पर कंट्रोल है। अब पुरुषों का खुद पर कंट्रोल होना सेक्स में कितनी अहमियत रखता है, शायद यह बताने की जरूरत नहीं... कई युवतियों को स्मोकिंग करने पुरुष भाते हैं, भले वे अपने भावी पति का सिगरेट पीना सख्त नापसंद करें।
हालांकि यह सच है कि शरीर की इस भाषा का आज तक कोई सर्वसम्मत व्याकरण नहीं बन सका है। किसी को किसी का कोई भी अंदाज भा सकता है। लड़कियों का अपने बालों की लट उंगलियों से सुलझाना, तो कभी उनकी स्मार्टनेस तो कभी बे-परवाही और कभी एक्सपोज़ करना तो कभी शर्माना...

क्रोध में मनुष्य स्वयं को भूल जाता है

रघुनाथ मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए पंडित गोविन्दरामने कहा कि क्रोध में मनुष्य सही निर्णय नहीं कर पाता क्योंकि क्रोध की अग्नि में वह सब अच्छाई बुराई को भूलकर केवल अपने स्वार्थ को देखता है।

पंडित जी ने कहा कि जब भक्त प्रह्लाद ने दैत्य बालकों को संकीर्तन में लगा दिया तो गुरु पुत्र भयभीत होकर हिरण्य कश्यप के पास पहुंचे और उसे कहा कि महाराज प्रह्लाद ने तो सारे बच्चों को ही बिगाड दिया है। यह बात हिरण्य कश्यप से सहन हुई और क्रोधित होकर उसने निश्चय किया कि मैं अपने हाथों से प्रह्लाद का वध करूंगा। वह काला नाग की तरह फुंकारता हुआ उसके विद्यालय पहुंचा।

प्रह्लाद ने अपने पिता को साष्टांग प्रणाम किया और कहा कि पिता जी आप स्वाभाविक नहीं लग रहे हो। आपकी परेशानी का क्या कारण है? क्या मैं आपकी कुछ सहायता करूं? उसने त्रिलोकी कांपती हैं, वृक्षों में फल आ जाते हैं, सागर रत्‍‌नों के साथ खडा हो जाता है, उसका तुम किसकी शक्ति और साहस से विरोधी कर रहे हो। प्रह्लाद ने कहा कि पिता जी शक्ति तो एक ही है। आपके जिस शक्ति से त्रिलोकी कांपती है उस नारायण की शक्ति से।

वहीं, शक्ति सभी का संचालन करती है। आप भी दैवी भाव ग्रहण कर मेरे साथ संकीर्तन कीजिए, आपको शांति मिलेगी। हरण्यकश्पने कहा कि मुझे पता लग गया है कि तेरी मौत नजदीक आ गई है, इसलिए तेरी बुद्धि काम नहीं कर रहीं। प्रह्लाद ने कहा कि नारायण की इच्छा के बिना कोई किसी को नहीं मार सकता। उसने कहा कि जो नारायण मेरे भय से सामने नहीं आती पहले मैं उससे ही निपटूं। बता तेरा नारायण कहां है? मेरे अंदर, तेरे अंदर, मेरे तलवार में, इस खंभे में भी। प्रह्लाद ने बडी विनम्रता से कहा कि सकारात्मक जवाब दिया और कहा कि नारायण तो सभी जगह विद्यमान हैं। हिरण्य कश्यप ने खंभे में पूरी शक्ति से मुक्का मारा। जोर की आवाज हुई,उसने सोचा इसकी बात सच है। तभी भगवान नरसिंह का रूप धारण कर प्रकट होते हैं। प्रह्लाद शांत खडे हैं। उन्हें देखते ही भगवान आवेश में आ जाते है और जोर से हंसते हैं। उनके दांतों से तीव्र प्रकाश निकलता है जिससे हिरण्य कश्यप की आंखें बंद हो जाती है और भगवान उसे पकड लेते हैं।

मुक्तिदायिनी है बाबा विश्वनाथ की काशी

काशी संसार की सबसे पुरानी नगरी है। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है-काशिरित्ते॥ आप इवकाशिनासंगृभीता:।पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरिके आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदुसरोवरबन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधवके नाम से प्रतिष्ठित हुए। ऐसी एक कथा है कि जब भगवान शंकर ने कु्रद्ध होकर ब्रह्माजीका पांचवां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षो तक अनेक तीर्थो में भ्रमण करने पर भी वह सिर उनसे अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थकहलाया। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजीसे अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गई।

एक अन्य कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदासने गंगातटपर वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को अपने मायके (हिमालय-क्षेत्र) में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्धक्षेत्रमें रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रियलगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आकर रहने लगे। राजा दिवोदासअपनी राजधानी काशी का आधिपत्य खो जाने से बडे दु:खी हुए। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान मांगा- देवता देवलोक में रहें, भूलोक (पृथ्वी) मनुष्यों के लिए रहे। सृष्टिकर्ता ने एवमस्तु कह दिया। इसके फलस्वरूप भगवान शंकर और देवगणोंको काशी छोडने के लिए विवश होना पडा। शिवजी मन्दराचलपर्वत पर चले तो गए परंतु काशी से उनका मोह भंग नहीं हुआ। महादेव को उनकी प्रिय काशी में पुन:बसाने के उद्देश्य से चौसठ योगनियों,सूर्यदेव, ब्रह्माजीऔर नारायण ने बडा प्रयास किया। गणेशजीके सहयोग से अन्ततोगत्वा यह अभियान सफल हुआ। ज्ञानोपदेश पाकर राजा दिवोदासविरक्त हो गए। उन्होंने स्वयं एक शिवलिङ्गकी स्थापना करके उसकी अर्चना की और बाद में वे दिव्य विमान पर बैठकर शिवलोक चले गए। महादेव काशी वापस आ गए।

काशी का इतना माहात्म्य है कि सबसे बडे पुराण स्कन्दमहापुराण में काशीखण्ड के नाम से एक विस्तृत पृथक विभाग ही है। इस पुरी के बारह प्रसिद्ध नाम- काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनन्दकानन,महाश्मशान,रुद्रावास,काशिका,तप:स्थली,मुक्तिभूमि,शिवपुरी, त्रिपुरारिराजनगरीऔर विश्वनाथनगरीहैं।

स्कन्दपुराणकाशी की महिमा का गुण-गान करते हुए कहता है-
भूमिष्ठापिन यात्र भूस्त्रिदिवतोऽप्युच्चैरध:स्थापिया
या बद्धाभुविमुक्तिदास्युरमृतंयस्यांमृताजन्तव:।
या नित्यंत्रिजगत्पवित्रतटिनीतीरेसुरै:सेव्यते
सा काशी त्रिपुरारिराजनगरीपायादपायाज्जगत्॥

भूतल पर होने पर भी पृथ्वी से संबद्ध नहीं है, जो जगत की सीमाओं से बंधी होने पर भी सभी का बन्धन काटनेवाली(मोक्षदायिनी) है, जो महात्रिलोकपावनीगङ्गाके तट पर सुशोभित तथा देवताओं से सुसेवितहै, त्रिपुरारि भगवान विश्वनाथ की राजधानी वह काशी संपूर्ण जगत् की रक्षा करे।

सनातन धर्म के ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप विदित होता है। कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अत:प्रलय होने पर भी इसका नाश नहीं होता है। वरुणा और असि नामक नदियों के बीच पांच कोस में बसी होने के कारण इसे वाराणसी भी कहते हैं। काशी नाम का अर्थ भी यही है-जहां ब्रह्म प्रकाशित हो। भगवान शिव काशी को कभी नहीं छोडते। जहां देह त्यागने मात्र से प्राणी मुक्त हो जाय, वह अविमुक्त क्षेत्र यही है। सनातन धर्मावलंबियों का दृढ विश्वास है कि काशी में देहावसान के समय भगवान शंकर मरणोन्मुख प्राणी को तारकमन्त्रसुनाते हैं। इससे जीव को तत्वज्ञान हो जाता है और उसके सामने अपना ब्रह्मस्वरूपप्रकाशित हो जाता है। शास्त्रों का उद्घोष है-
यत्र कुत्रापिवाकाश्यांमरणेसमहेश्वर:।
जन्तोर्दक्षिणकर्णेतुमत्तारंसमुपादिशेत्॥
काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारकमन्त्रसुनकर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में काशीखण्ड में लिखा भी है-
अन्यानिमुक्तिक्षेत्राणिकाशीप्राप्तिकराणिच।
काशींप्राप्य विमुच्येतनान्यथातीर्थकोटिभि:।।

ऐसा इसलिए है कि पांच कोस की संपूर्ण काशी ही विश्व के अधिपति भगवान विश्वनाथ का आधिभौतिक स्वरूप है। काशीखण्ड पूरी काशी को ही ज्योतिíलंगका स्वरूप मानता है-
अविमुक्तंमहत्क्षेत्रं<न् द्धह्मद्गद्घ="द्वड्डद्बद्यह्लश्र:पञ्चक्रोशपरीमितम्।">पञ्चक्रोशपरीमितम्।
ज्योतिíलङ्गम्तदेकंहि ज्ञेयंविश्वेश्वराभिधम्॥

पांच कोस परिमाण के अविमुक्त (काशी) नामक क्षेत्र को विश्वेश्वर (विश्वनाथ) संज्ञक ज्योतिíलंग-स्वरूपमानना चाहिए।
अनेक प्रकाण्ड विद्वानों ने काशी मरणान्मुक्ति:के सिद्धांत का समर्थन करते हुए बहुत कुछ लिखा और कहा है। रामकृष्ण मिशन के स्वामी शारदानंदजीद्वारा लिखित श्रीरामकृष्ण-लीलाप्रसंग नामक पुस्तक में श्रीरामकृष्णपरमहंसदेवका इस विषय में प्रत्यक्ष अनुभव वíणत है। वह दृष्टांत बाबा विश्वनाथ द्वारा काशी में मृतक को तारकमन्त्रप्रदान करने की सत्यता उजागर करता है। लेकिन यहां यह भी बात ध्यान रहे कि काशी में पाप करने वाले को मरणोपरांत मुक्ति मिलने से पहले अतिभयंकरभैरवी यातना भी भोगनी पडती है। सहस्रोंवर्षो तक रुद्रपिशाचबनकर कुकर्मो का प्रायश्चित करने के उपरांत ही उसे मुक्ति मिलती है। किंतु काशी में प्राण त्यागने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता।
फाल्गुन शुक्ल-एकादशी को काशी में रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और काशी में होली का पर्वकाल प्रारंभ हो जाता है।
मुक्तिदायिनीकाशी की यात्रा, यहां निवास और मरण तथा दाह-संस्कार का सौभाग्य पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप तथा बाबा विश्वनाथ की कृपा से ही प्राप्त होता है। तभी तो काशी की स्तुति में कहा गया है-यत्र देहपतनेऽपिदेहिनांमुक्तिरेवभवतीतिनिश्चितम्।
पूर्वपुण्यनिचयेनलभ्यतेविश्वनाथनगरीगरीयसी॥
विश्वनाथजी की अतिश्रेष्ठनगरी काशी पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप से ही प्राप्त होती है। यहां शरीर छोडने पर प्राणियों को मुक्ति अवश्य मिलती है।

03 दिसंबर 2010

ज्ञान का सागर - अनमोल वचन (126 - 150)

126  सदा, सहज व सरल रहने से आतंरिक खुशी मिलती है.
127  मन की शांति के लिये अंदरूनी संघर्ष को बंद करना जरूरी है. जब तक अंदरूनी युद्ध चलता रहेगा, शांति नहीं मिल सकती.
128  किसी का बुरा मत सोचो; क्योंकि बुरा सोचते-सोचते एक दिन अच्छा भला व्यक्ति भी बुरे रास्ते पर चल पड़ता है.
129  सारा संसार ऐसा नहीं हो सकता, जैसा आप सोचते हैं. अतः समझौतावादी बनो.
130  महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिये बहुत कष्ट सहना पड़ता है, जो तप के समान होता है; क्योंकि ऊंचाई पर स्थिर रह पाना आसान काम नहीं है.
131  जैसे प्रकृति का हर कारण उपयोगी है, ऐसे ही हमें अपने जीवन के हर क्षण को परहित में लगाकर स्वयं और सभी के लिये उपयोगी बनाना चाहिए.
132  हर व्यक्ति संवेदनशील होता है, पत्थर कोई नहीं होता; लेकिन सज्जन व्यक्ति पर बाहरी प्रभाव पानी की लकीर की भांति होता है.
133  जहाँ भी हो जैसे भी हो कर्मशील रहो, भाग्य अवश्य बदलेगा; अतः मनुष्य को कर्मवादी होना चाहिए, भाग्यवादी नहीं.
134  सभी मन्त्रों से महामंत्र है कर्म मंत्र. कर्म करते हुए भजन करते रहना ही प्रभु की सच्ची भक्ति है.
135  जूँ, खटमल की तरह दूसरों पर नहीं पलना चाहिए, बल्कि अंत समय तक कार्य करते जाओ; क्योंकि गतिशीलता जीवन का आवश्यक अंग है.
136  बाहर मैं, मेरा और अंदर तू, तेरा, तेरी के भाव के साथ जीने का आभास जिसे हो गया, वह उसके जीवन की एक महान व उत्तम प्राप्ति है.
137  भाग्यशाली होते हैं वे, जो अपने जीवन के संघर्ष के बीच एक मात्रा सहारा परमात्मा को मानते हुए आगे बढ़ते जाते हैं.
138  सन्यासी स्वरुप बनाने से अहंकार बढ़ता है. कपडे मन रंग्वाओ, मन को रंगों तथा भीतर से सन्यासी की तरह रहो.
139  जीवन चलते का नाम है. सोने वाला सतयुग में रहता है, बैठने वाला द्वापर में, उठ खडा होने वाल त्रेता में, और चलने वाला सतयुग में इसलिए चलते रहो.
140  अपनों व अपने प्रिय से धोखा हो या बीमारी से उठो हो या राजनीति में हार गया हो या शमशान घर में जाओ; तब जो मन होता है, वैसा मन अगर हमेशा रहे तो मनुष्य का कल्याण हो जाए.
141  मनुष्य का मन कछुए की भांति होना चाहिए, जो बाहर की चोटें सहते हुए भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता और धीरे-धीरे मंजिल पर पहुँच जाता है.
142  हर शाम में एक जीवन का समापन हो रहा है और हर सवेरे में नए जीवन की शुरूरात होती है.
143  भगवान् को अनुशाशन एवं सुव्यवस्थितपना बहुत पसंद है. अतः उन्हें ऐसे लोग ही पसंद आते हैं, जो सुव्यवस्था व अनुशाशन को अपनाते हैं.
144  आज का मनुष्य अपने अभाव से इतना दुखी नहीं है, जितना दूसरे के प्रभाव से होता है.
145  जानकारी व वैदिक ज्ञान का भार तो लोग सिर पर गधे की तरह उठाये फिरते हैं और जल्द अहंकारी भी हो जाते हैं, लेकिन उसकी सरलता का आनंद नहीं उठा सकते हैं.
146  जहाँ सत्य होता है, वहां लोगों की भीड़ नहीं हुआ करती; क्योंकि सत्य जहर होता है और जहर को कोई पीना या लेना नहीं चाहता है. इसलिए आजकल हर जगह मेला लगा रहता है.
147  दिन में अधूरी इच्छा को व्यक्ति रात को स्वप्न के रूप में देखता है. इसलिए जितना मन अशांत होगा, उतने ही अधिक स्वप्न आते हैं.
148  कई बच्चे हजारों मील दूर बैठे भी माता-पिता से दूर नहीं होते और कई घर में साथ रहते हुई भी हजारों मील दूर होते हैं.
149  जो व्यक्ति हर स्थिति में प्रसन्न और शांत रहना सीख लेता है, वह जीने की कला प्राणी मात्रा के लिये कल्याणकारी है.
150  जो व्यक्ति आचरण की पोथी को नहीं पढता, उसके पृष्ठों को नहीं पलटता, वह भला दूसरों का क्या भला कर पायेगा.

02 दिसंबर 2010

वास्तुदोष निवारण के आसान उपाय

  अपने घर के उत्तरकोण में तुलसी का पौधा लगाएं
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   हल्दी को जल में घोलकर एक पान के पत्ते की सहायता से अपने सम्पूर्ण घर में छिडकाव करें. इससे घर में लक्ष्मी का वास तथा शांति भी बनी रहती है.

  अपने घर के मन्दिर में घी का एक दीपक नियमित जलाएं तथा शंख की ध्वनि तीन बार सुबह और शाम के समय करने से नकारात्मक ऊर्जा घर से बहार निकलती है.

  घर में सफाई हेतु रखी झाडू को रस्ते के पास नहीं रखें. यदि झाडू के बार-बार पैर का स्पर्थ होता है, तो यह धन-नाश का कारण होता है. झाडू के ऊपर कोई वजनदार वास्तु भी नहीं रखें.
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  अपने घर में दीवारों पर सुन्दर, हरियाली से युक्त और मन को प्रसन्न करने वाले चित्र लगाएं. इससे घर के मुखिया को होने वाली मानसिक परेशानियों से निजात मिलती है.

6   वास्तुदोष के कारण यदि घर में किसी सदस्य को रात में नींद नहीं आती या स्वभाव चिडचिडा रहता हो, तो उसे दक्षिण दिशा की तरफ सिर करके शयन कराएं. इससे उसके स्वभाव में बदलाव होगा और अनिद्रा की स्थिति में भी सुधार होगा.

7   अपने घर के ईशान कोण को साफ़ सुथरा और खुला रखें. इससे घर में शुभत्व की वृद्धि होती है.

8   अपने घर के मन्दिर में देवी-देवताओं पर चढ़ाए गए पुष्प-हार दूसरे दिन हटा देने चाहिए और भगवान को नए पुष्प-हार अर्पित करने चाहिए.

9   घर के उत्तर-पूर्व में कभी भी कचरा इकट्ठा न होने दें और न ही इधर भारी मशीनरी रखें.

10  अपने वंश की उन्नति के लिये घर के मुख्यद्वार पर अशोक के वृक्ष दोनों तरफ लगाएं.

11   यदि आपके मकान में उत्तर दिशा में स्टोररूम है, तो उसे यहाँ से हटा दें. इस स्टोररूम को अपने घर के पश्चिम भाग या नैऋत्य कोण में स्थापित करें.

12   घर में उत्पन्न वास्तुदोष घर के मुखिया को कष्टदायक होते हैं. इसके निवारण के लिये घर के मुखिया को सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए.

13   यदि आपके घर का मुख्य द्वार दक्षिणमुखी है, तो यह भी मुखिया के के लिये हानिकारक होता है. इसके लिये मुख्यद्वार पर श्वेतार्क गणपति की स्थापना करनी चाहिए.

14   अपने घर के पूजा घर में देवताओं के चित्र भूलकर भी आमने-सामने नहीं रखने चाहिए इससे बड़ा दोष उत्पन्न होता है.

15   अपने घर के ईशान कोण में स्थित पूजा-घर में अपने बहुमूल्य वस्तुएँ नहीं छिपानी चाहिए.

16  पूजाकक्ष की दीवारों का रंग सफ़ेद हल्का पीला अथवा हल्का नीला होना चाहिए.

17  यदि आपके रसोई घर में रेफ्रिजरेटर नैऋत्य कोण में रखा है, तो इसे वहां से हटाकर उत्तर या पश्चिम में रखें.

18   दीपावली अथवा अन्य किसी शुभ मुहूर्त में अपने घर में पूजास्थल में वास्तुदोशनाशक कवच की स्थापना करें और नित्य इसकी पूजा करें. इस कवच को दोषयुक्त स्थान पर भी स्थापित करके आप वास्तुदोषों से सरलता से मुक्ति पा सकते हैं.
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19   अपने घर में ईशान कोण अथवा ब्रह्मस्थल में स्फटिक श्रीयंत्र की शुभ मुहूर्त में स्थापना करें. यह यन्त्र लक्ष्मीप्रदायक भी होता ही है, साथ ही साथ घर में स्थित वास्तुदोषों का भी निवारण करता है.

20   प्रातःकाल के समय एक कंडे पर थोड़ी अग्नि जलाकर उस पर थोड़ी गुग्गल रखें और 'ॐ नारायणाय नमन' मंत्र का उच्चारण करते हुए तीन बार घी की कुछ बूँदें डालें. अब गुग्गल से जो धूम्र उत्पन्न हो, उसे अपने घर के प्रत्येक कमरे में जाने दें. इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा ख़त्म होगी और वातुदोशों का नाश होगा.

21  घर में किसी भी कमरे में सूखे हुए पुष्प नहीं रखने दें. यदि छोटे गुलदस्ते में रखे हुए फूल सूख जाएं, तो उस्मने नए पुश्व लगा दें और सूखे पुष्पों को निकालकर बाहर फेंक दें.

22  सुबह के समय थोड़ी देर तक निरंतर बजने वाली  गायत्री मंत्र की धुन चलने दें. इसके अतिरिक्त कोई अन्य धुन भी आप बजा सकते हैं.

23  सायंकाल के समय घर के सदस्य सामूहिक आरती करें. इससे भी वास्तुदोष दूर होते हैं.

24 नवंबर 2010

आयुर्वेद और कामसूत्र दे सेक्स पावर


दाम्पत्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है- सेक्स, इसलिए हर पति-पत्नी को सेक्स के बारे में अपने साथी के विचारों और सेक्स संबंधों से होने वाले फायदे की जानकारी होनी चाहिए. यह जानकारी हमें मिलती है - कामसूत्र से. उसी तरह संभोग सुख का आनंद उठाने की शक्ति प्रदान करता है - आयुर्वेद.
आयुर्वेद में ऐसी कई चीजों का उल्लेक्ख है जिनका नियमित रूप से सेवन करने से जहाँ यौन विकार नष्ट होते हैं वहीं शरीर में स्फूर्ति और शक्ति का संचार होता है. पुराने जमाने में हर घर में इन आयुर्वेद से जुडी चीजों का प्रयोग किसी न किसी रूप में होता था. आजकल की व्यस्त जिन्दगी में नवविवाहित दम्पति ही नहीं बल्कि प्रौढ़ दम्पति भी सेक्स समस्याओं से ग्रस्त हैं और इसके लिये वह बाजार में बिकने वाली दवाओं का सेवन करने लगते हैं. अगर दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाना है तो हमें आयुर्वेदिक जडी-बूटियों की ओर लौटना ही होगा. तभी हम सही मायने में दाम्पत्य जीवन की सेक्स लाइफ का आनंद उठा सकते हैं, साथ ही हष्ट -पुष्ट बने रह सकते हैं. आयुर्वेद में उपयोग में लाई जाने वाली कुछ मुख्य चीजें इस प्रकार है- 

अश्वगंधा का सेवन करने से वात प्रधान रोग नष्ट होते हैं इसीलिये वात प्रधान रोगों के लिये इसका सेवन करने की सलाह दी जाती है. सेवन करने से बहुत लाभ मिलता है. साथ ही यह अश्वगंधा पाक धातु की निर्बलता भी नष्ट करता है, क्योंकि यह पौष्टिक, अग्नि प्रदीपक और शक्ति संवर्धक होता है. शुक्राशय, वातवाहिनी नाडी और गुर्दों पर इसका गुणकारी प्रभाव पड़ता है. शीत ऋतु में अश्वगंधा पाक का सेवन करने से यौनशक्ति बढ़ती है, अतः यौन आनंद बढ़ता है. अश्वगंधा पाक 10-10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम दूध या शहद के साथ सेवन करने से यौनशक्ति में आश्चर्यजनक फायदा होता है.
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एरंड पाक का सेवन करने से शारीरिक दुर्बलता नष्ट होती है, पाचन शक्ति तीव्र होने से भोजन शीघ्र पचता है और शारीरिक यौनशक्ति विकसित होती है. शीतऋतु में एरंड  पाक का सेवन करने से मुंह का रोग नष्ट होता है तथा अन्य वात विकारों में भी यह बहुत गुणकारी होता है. इसे 10 से 20 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन करना चाहिए.

कौंच पाक के गुणकारी कौंच पाक तैयार किया जाता है. शीतऋतु में इसका सेवन करने से पुरूषत्व शक्ति विकसित होती है तथा वीर्य के अभाव में उत्पन्न नपुसंकता नष्ट होती है. इससे यौन क्षमता बढ़ने से पुरूष देर तक यौन समागमन में संलग्न रहकर अधिक यौन आनंद प्राप्त कर सकता है. 20-30 ग्राम की मात्रा में कौंच पाक का सेवन करने से और ऊपर से दूध पीने से यौन शक्ति विकसित होती है तथा यह शारीरिक शक्ति भी बढाता है.
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नारियल से शीतवीर्य, स्निग्ध और पौष्टिक होने के कारण इसका सेवन करने से पित्त विकृति से उत्पन्न रोग नष्ट होते हैं तथा शरीर में शुक्र (वीर्य) के अभाव से उत्पन्न निर्बलता में अतिशीघ्र लाभ होता है. नारियल पाक का सेवन सभी ऋतुओं में किया जा सकता है. प्रतिदिन 10 से 20 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ इसका सेवन करने से भरपूर शक्ति एवं शारीरिक आकर्षण में वृद्धि होती है.
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अदरक के सेवन से वात विकार नष्ट होते हैं. शीतऋतु में अदरक का सेवन करने से वात रोगों से मुक्ति मिलती है. प्रतिदिन 10 से 20 ग्राम की मात्रा में अदरक पाक सुबह-शाम सेवन करने से अग्निमांध, श्वास, खांसी आदि रोग नष्ट होते हैं और पाचनक्रिया मजबूत होती है.

आम्र-पाक वीर्यवर्धक होता है, अतः शुक्र (वीर्य) विकार से पीड़ित पुरूषों के लिये इसका सेवन बहुत लाभप्रद है. आम्र-पाक से रक्त का निर्माण होता है तथा वीर्य की वृद्धि होने से यौनशक्ति विकसित होती है. भोजन से पहले 20 से 25 ग्राम की मात्रा में दूध या जल के साथ आम्र-पाक सेवन करने से शारीरिक शक्ति विकसित होती है.

छुहारे में खजूर के सभी गुण विघमान रहते हैं तथा इनका यौन शक्ति व क्षमता पर बेहद चमत्कारी प्रभाव पड़ता है. वीर्य का अभाव होने पर छुहारे को दूध में उबालकर सेवन करने से वीर्य वृद्धि होती है तथा शारीरिक शक्ति बढ़ती है.

शारीरिक व पुरूष शक्ति विकसित करने के लिये मूसली पाक बहुत गुणकारी होता है. 6 से 10 ग्राम की मात्रा में मूसली पाक का सेवन करके ऊपर से दूध पीने से धातु निर्बलता नष्ट होती है तथा वीर्य की वृद्धि होने से मनुष्य देर तक यौन समागमन कर पाने में सक्षम होता है.

बादाम पाक का सेवन करने से बल, वीर्य और ओजा की वृद्धि होती है. बादाम पाक रस-रक्तादी धातुओं की वृद्धि करके शरीर की शक्ति और कांटी बढ़ा देता है. नपुंसकता और स्नायु दुर्बलता में बादाम पाक का सेवन बेहद फायदेमंद है. 10 से 20 ग्राम की मात्रा में बादाम पाक प्रतिदिन दूध के साथ सेवन करने से मस्तिष्क  और ह्रदय की निर्बलता नष्ट होती है तथा शरीर हष्ट-पुष्ट होता है.

सौंठ पाक का सेवन करने से स्त्रियों के कई रोग नष्ट होते हैं. यह शारीर की निर्बलता को नष्ट करके शरीर को सुन्दर बनाता है तथा ऋतुस्त्राव संबंधी विकारों में भे बेहद फायदेमंद है. ऋतुस्त्राव में होने वाले कष्ट को यह पाक नष्ट करता है तथा योनि विकारों में भी इसके सेवन से लाभ मिलता है.

सर्दी के दिनों में इसे हलवे, दूध, अन्य पेयों अथवा खाघ पदार्थों में मिलाकर खाने की प्रथा है. केसर शरीर के विभिन्न अंगों को शक्ति देने में उपयोगी है. इसके प्रयोग से वृद्ध शरीर में भी जान पड़ जाती है. केसर का स्वभाव कुछ अधिक गर्म होता है, इसलिए इसे गर्भवती महिलाएं और उच्च रक्तचाप वाले रोगियों को प्रयोग में नहीं लाना चाहिए, परन्तु जिन महिलाओं को मासिक धर्म आने में कष्ट हो वे यदि इसका प्रयोग करें तो लाभ होगा.

का सेवन करने से सभी तरह के विकार दूर होते हैं तथा शारीरिक निर्बलता, अतिसार, मस्तिष्क के रोग और धातु स्नान में बहुत लाभ मिलता है. दिन में दो-तीन बार 6 से 10 ग्राम की मात्रा में जल के साथ अनार का सेवन करने से काफी लाभ होता है. इसका अवलेह बनाने के लिये चाशनी में जावित्री, काली मिचर, जायफल, पीपल, सौंठ, दाल-चीनी  और लौंग का चूर्ण प्रयोग में लाया जाता है.

गुग्गलु का प्रयोग समस्त वायुरोगों में किया जाता है. गुग्गलु की विशेषता यह है की यदि इसे एक लाख बार मूसली से कूटा जाए तो इसमें समस्त रोगों का नाश होता है और शारीरिक शक्ति में बढ़ोत्तरी होती है. इसके प्रयोग से प्रमेह, प्रदर वीर्य दोष संबंधी रोग दूर होते हैं. हरद, सौंठ और गुग्गलु चूर्ण से बने दो से चार गोली सुबह-शाम गर्म जल या दूध के साथ लेने से धातुओं की वृद्धि होती है और यौन शक्ति मजबूत होती है.

लहसुन पाक का सेवन लिंग दुर्बलता और नपुंसकता को दूर करता है. अपनी शक्ति के अनुसार 10 से 20 ग्राम तक लहसुन की कलियाँ शहद के साथ सुबह-शाम खाने पर कामशक्ति जाग्रत होती है और नपुंसकता का दमन करती है. स्त्रियों के लिये भी लहसुन काफी फायदेमंद है.

सुपारी पाक स्त्रियों के स्वस्थ्य सौंदर्य के लिये बहुत गुणकारी होती है तथा पुरूषों को इसके सेवन से शारीरिक शक्ति विकसित होती है. सुपारी पाक का सेवन करने से स्त्रियों के सभी योनि विकार नष्ट होते हैं तथा इस पाक से गर्भाशय को शक्ति मिलाती है.

के सेवन से काम शक्ति की कमी, प्रमेह रोग, दुर्बलता हस्तमैथुन आदि पुरूष रोग दूर होते हैं. एक चम्मच शहद और एक चम्मच ताजा प्याज का रस मिलाकर सुबह-शाम पीने से कामभाव का ठहराव कम होता है और इससे काम भावना में जादू सा असर होता है.

दाल-चीनी में औषधीय गुण पाए जाते हैं. प्रोटीन, वसा, रेशा, कार्बोहाइड्रेट्स, कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, विटामिन बी एवं सी काफी मात्रा में पाए जाते हैं. रात को सोते समय दाल-चीनी का बारीक चूर्ण 4 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ लेकर दूध पीने से वीर्य की वृद्धि होती है एवं पाचन संबंधी दोष दूर होते हैं.

14 नवंबर 2010

क्या हो सेक्स की सही उम्र

सहमति के आधार पर सेक्स करने की मिनिमम उम्र कितनी होनी चाहिए, यह एक बहस का विषय है, लेकिन हाल ही में लॉ कमिशन ने इस मुद्दे पर अपनी बेबाक राय जाहिर की। आइये जानते हैं, इस बारे में एक्सर्पट्स क्या सोचते हैं:-

पिछले दिनों लॉ कमिशन ने लड़कियों के लिए सहमति के आधार पर सेक्स की उम्र 16 साल करने की सिफारिश की। कमिशन की इस सिफारिश ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। कई एक्सपर्ट का मानना है कि सेक्स के लिए 16 साल की उम्र बहुत कम है। सेक्स एंड मैरिज थेरेपिस्ट डॉक्टर विनोद छब्बी कहते हैं, '18 साल से कम उम्र में सेक्स करने की छूट देना ठीक नहीं है। वैसे भी उम्र को सेक्स करने की छूट देने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 16 साल की उम्र में लड़की सेक्स के लिए इमोशनली तैयार होती है?'

देखा जाए तो इन मामलों में इमोशंस बहुत बड़ा रोल निभाते हैं। सोशल वर्कर और काउंसिलर निवेदिता कश्यप बताती हैं, '13 साल की उम्र से बच्चों में सेक्स के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है। ऐसे में अगर उन्हें छूट दे दी जाए, तो वे इसे सिर्फ एक खेल की तरह लेंगे। लड़कों पर भले ही इस बात का कोई फर्क न पड़े, लेकिन लड़कियां हर चीज से इमोशनली जुड़ जाती हैं। ऐसे में उनकी स्टडी और फैमिली रिलेशन प्रभावित हो सकते हैं।'

अगर लड़कियां सेक्स से इमोशनली जुड़ जाएं तो उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। 18 वर्षीय स्टूडेंट मंजूषा अपनी फ्रेंड का उदाहरण देती हैं, 'मेरी फ्रेंड ने अपने बॉयफ्रेंड के साथ फिजिकल रिलेशन बनाए थे। उसका मानना था कि यह बॉयफ्रेंड के साथ की जाने वाली सबसे कूल एक्टिविटी है। वह अपने बॉयफ्रेंड से भावनात्मक रूप से भी जुड़ गई थी। उसे भरोसा था कि उसका बॉयफ्रेंड उसके अलावा किसी और लड़की से रिलेशन नहीं बनाएगा, लेकिन जब उसे पता चला कि उसके बॉयफ्रेंड के किसी और लड़की के साथ भी रिलेशन हैं, तो उसे काफी झटका लगा।' डॉ विनोद के मुताबिक, इस उम्र के लड़के और लड़कियां गर्भधारण से बचने के साधनों का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते। उन्हें लगता है कि यह सब झंझट है। ऐसे में उन्हें सेक्सुअल डिजीज होने का खतरा भी बना रहता है।

20 साल के रितिक भी 16 की उम्र में सेक्स की छूट देने से सहमत नहीं हैं। वह कहते हैं, 'ज्यादा दिनों की बात नहीं है, जब डीपीएस एमएमएस कांड को लेकर हंगामा हुआ था। उसमें सभी लड़के-लड़कियों की उम्र 16 से कम ही रही होगी।' उधर निवेदिता कहती हैं, 'हमारे यहां के गांवों में आज भी बाल विवाह का चलन काफी जोरों पर है। वहां के बच्चे टेलिविजन, नेट, किताबों और दोस्तों के माध्यम से सेक्स के बारे में काफी तेजी से जान रहे हैं। अगर हमारे लॉ मेकर्स उन्हें ध्यान में रखकर सेक्स की उम्र निर्धारित कर रहे हैं, तो इसे कम से कम 18 साल किया जाना चाहिए।'

ऐसा भी नहीं है कि सभी एक्सपर्ट सेक्स की उम्र को 16 साल किए जाने के खिलाफ हैं। फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉक्टर कामिनी राव कहती हैं, '16 साल का कोई भी बच्चा अपनी जरूरतों के बारे में अच्छी तरह जानता है। वह काफी मैच्योर होता है और अपने फैसले खुद ले सकता है। जरूरी नहीं कि इस उम्र के बच्चों के बीच होने वाले सेक्स का रिजल्ट प्रेग्नेंसी ही हो।' ब्रिटनी स्पियर्स की बहन जैमी लिन के कम उम्र में प्रेग्नेंट होने की घटना याद दिलाने पर वह कहती हैं, 'इतनी कम उम्र में इस तरह के कदम वही बच्चे उठाते हैं, जो अपनी वैल्यूज को भूल चुके हैं। हमें अपने बच्चों को संस्कारी बनाना चाहिए। पैरंट्स को कभी भी अपने टीनएज बच्चों को जरूरत से ज्यादा फ्रीडम नहीं देनी चाहिए।'

11 नवंबर 2010

रामसेतु आध्यात्मिक महत्व का महातीर्थ


वर्तमान समय में श्रीरामसेतु सर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा 8 अक्टूबर 2002 को रामेश्वरमके समीप भारत और श्रीलंका के मध्य समुद्र में एक सेतु खोज लेने के बाद श्रीरामसेतु को काल्पनिक कहकर इसके अस्तित्व को नकार सकना संभव नहीं है। सीताहरण के बाद श्रीराम की वानर सेना ने लंका पर चढाई करने के लिए समुद्र पर सेतु बनाया था। राम-नाम के प्रताप से पत्थर पानी पर तैरने लगे।

रामसेतु का धार्मिक महत्व केवल इससे ही जाना जा सकता है कि स्कन्दपुराण के ब्रह्मखण्ड में इस सेतु के माहात्म्य का बडे विस्तार से वर्णन किया गया है। नैमिषारण्य में ऋषियों के द्वारा जीवों की मुक्ति का सुगम उपाय पूछने पर सूत जी बोले-
दृष्टमात्रेरामसेतौमुक्ति: संसार-सागरात्।
हरे हरौचभक्ति: स्यात्तथापुण्यसमृद्धिता।
रामसेतु के दर्शन मात्र से संसार-सागर से मुक्ति मिल जाती है। भगवान विष्णु और शिव में भक्ति तथा पुण्य की वृद्धि होती है। इसलिए यह सेतु सबके लिए परम पूज्य है।

सेतु-महिमा का गुणगान करते हुए सूतजी शौनक आदि ऋषियों से कहते हैं- सेतु का दर्शन करने पर सब यज्ञों का, समस्त तीर्थो में स्नान का तथा सभी तपस्याओं का पुण्य फल प्राप्त होता है। सेतु-क्षेत्र में स्नान करने से सब प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा भक्त को मरणोपरांत वैकुण्ठ में प्रवेश मिलता है। सेतुतीर्थका स्नान अन्त: करण को शुद्ध करके मोक्ष का अधिकारी बना देता है। पापनाशक सेतु तीर्थमें निष्काम भाव से किया हुआ स्नान मोक्ष देता है। जो मनुष्य धन-सम्पत्ति के उद्देश्य से सेतु तीर्थ में स्नान करता है, वह सुख-समृद्धि पाता है। जो विद्वान चारों वेदों में पारंगत होने, समस्त शास्त्रों का ज्ञान और मंत्रों की सिद्धि के विचार से सर्वार्थसिद्धिदायक सेतु तीर्थ में स्नान करता है, उसे मनोवांछित सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। जो भी सेतुती र्थमें स्नान करता है, वह इहलोक और परलोक में कभी दु:ख का भागी नहीं होता। जिस प्रकार कामधेनु, चिन्तामणि तथा कल्पवृक्ष समस्त अभीष्ट वस्तुओं को प्रदान करते हैं, उसी प्रकार सेतु-स्नान सब मनोरथ पूर्ण करता है।

रामसेतु के क्षेत्र में अनेक तीर्थ स्थित हैं अत: स्कन्दपुराण में सेतु यात्रा का क्रम एवं विधान भी वर्णित है। सेतु तीर्थमें पहुंचने पर सेतु की वन्दना करें-
रघुवीरपदन्यासपवित्रीकृतपांसवे।
दशकण्ठशिरश्छेदहेतवेसेतवेनम:॥
केतवेरामचन्द्रस्यमोक्षमार्गैकहेतवे।
सीतायामानसाम्भोजभानवेसेतवेनम:॥
श्रीरघुवीर के चरण रखने से जिसकी धूलि परम पवित्र हो गई है, जो दशानन रावण के सिर कटने का एकमात्र हेतु है, उस सेतु को नमस्कार है। जो मोक्ष मार्ग का प्रधान हेतु तथा श्रीरामचन्द्रजी के सुयश को फहराने वाला ध्वज है, सीताजी के हृदय कमल के खिलने के लिए सूर्यदेव के समान है, उस सेतु को मेरा नमस्कार है।

श्रीरामचरितमानस में स्वयं भगवान श्रीराम का कथन है-
मम कृत सेतु जो दरसनुकरिही।
सो बिनुश्रम भवसागर तरिही॥
जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह कोई परिश्रम किए बिना ही संसार रूपी समुद्र से तर जाएगा। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के युद्धकाण्ड के 22वें अध्याय में लिखा है कि विश्वकर्मा के पुत्र वानरश्रेष्ठनल के नेतृत्व में वानरों ने मात्र पांच दिन में सौ योजन लंबा तथा दस योजन चौडा पुल समुद्र के ऊपर बनाकर रामजी की सेना के लंका में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। यह अपने आप में एक विश्व-कीर्तिमान है। आज के इस आधुनिक युग में नवीनतम तकनीक के द्वारा भी इतने कम समय में यह कारनामा कर दिखाना संभव नहीं लगता।

महíष वाल्मीकि रामसेतु की प्रशंसा में कहते हैं- अशोभतमहान् सेतु: सीमन्तइवसागरे। वह महान सेतु सागर में सीमन्त(मांग) के समान शोभित था। सनलेनकृत: सेतु: सागरेमकरालये।शुशुभेसुभग: श्रीमान् स्वातीपथइवाम्बरे॥ मगरों से भरे समुद्र में नल के द्वारा निíमत वह सुंदर सेतु आकाश में छायापथ के समान सुशोभित था। नासा के द्वारा अंतरिक्ष से खींचे गए चित्र से ये तथ्य अक्षरश:सत्य सिद्ध होते हैं।
स्कन्दपुराणके सेतु-माहात्म्य में धनुष्कोटितीर्थ का उल्लेख भी है-
दक्षिणाम्बुनिधौपुण्येरामसेतौविमुक्तिदे।
नुष्कोटिरितिख्यातंतीर्थमस्तिविमुक्तिदम्॥
दक्षिण-समुद्र के तट पर जहां परम पवित्र रामसेतु है, वहीं धनुष्कोटिनाम से विख्यात एक मुक्तिदायक तीर्थ है। इसके विषय में यह कथा है-भगवान श्रीराम जब लंका पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त भगवती सीता के साथ वापस लौटने लगे तब लंकापति विभीषण ने प्रार्थना की- प्रभो! आपके द्वारा बनवाया गया यह सेतु बना रहा तो भविष्य में इस मार्ग से भारत के बलाभिमानीराजा मेरी लंका पर आक्रमण करेंगे। लंका-नरेश विभीषण के अनुरोध पर श्रीरामचन्द्रजी ने अपने धनुष की कोटि (नोक) से सेतु को एक स्थान से तोडकर उस भाग को समुद्र में डुबो दिया। इससे उस स्थान का नाम धनुष्कोटि हो गया। इस पतित पावनतीर्थ में जप-तप, स्नान-दान से महापातकों का नाश, मनोकामना की पूर्ति तथा सद्गति मिलती है। धनुष्कोटिका दर्शन करने वाले व्यक्ति के हृदय की अज्ञानमयी ग्रंथि कट जाती है, उसके सब संशय दूर हो जाते हैं और संचित पापों का नाश हो जाता है। यहां पिण्डदान करने से पितरोंको कल्पपर्यन्त तृप्ति रहती है। धनुष्कोटि तीर्थ में पृथ्वी के दस कोटि सहस्र(एक खरब) तीर्थो का वास है।

वस्तुत: रामसेतु महातीर्थहै। विद्वानों ने इस सेतु को लगभग 17,50,000 साल पुराना बताया है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में निर्दिष्ट काल-गणना के अनुसार यह समय त्रेतायुगका है, जिसमें भगवान श्रीराम का अवतार हुआ था। सही मायनों में यह सेतु रामकथा की वास्तविकता का ऐतिहासिक प्रमाण है। समुद्र में जलमग्न हो जाने पर भी रामसेतु का आध्यात्मिक प्रभाव नष्ट नहीं हुआ है।
स्कंदपुराण, कूर्मपुराण आदि पुराणों में भगवान शिव का वचन है कि जब तक रामसेतु की आधारभूमि तथा रामसेतु का अस्तित्व किसी भी रूप में विद्यमान रहेगा, तब तक भगवान शंकर सेतु तीर्थमें सदैव उपस्थित रहेंगे।
अत: श्रीरामसेतु आज भी दिव्य ऊर्जा का स्रोत है। पुरातात्विक महत्व की ऐसी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षण प्रदान करते हुए हमें उसकी हर कीमत पर रक्षा करनी चाहिए। यह सेतु श्रीराम की लंका- विजय का साक्षी होने के साथ एक महा तीर्थ भी है।

03 नवंबर 2010

उज्जैन के चौरासी महादेव

11 श्रावण मास में शिव पूजा का अपना अलग महत्व है। महाकाल की नगरी उज्जैन की बात हो, तो यह महत्व दोगुना हो जाता है। यहाँ स्थित 84 महादेवों की अर्चना श्रावण माह में विशेष रूप से की जाती है।
इनके महात्म्य को पुराणों में विस्तृत रूप से समझाया गया है। अलग-अलग नाम से स्थापित इन 84 महादेवों की आराधना का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न है।

(1) अगस्तेश्वर महादेव
अगस्तेश्वर महादेव मंदिर हरसिद्धि मंदिर के पीछे स्थित संतोषी माता मंदिर परिसर में है। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख के अनुसार जब दैत्यों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली, तब निराश होकर देवता पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।
वन में भटकते हुए एक दिन उन्होंने सूर्य के समान तेजस्वी अगस्तेश्वर तपस्वी को देखा। देवताओं के हाल को देखकर अगस्त्य ऋषि क्रोधित हुए। फलस्वरूप ज्वाला उत्पन्न हुई और स्वर्ग से दानव जलकर गिरने लगे। भयभीत होकर ऋषि आदि पाताल लोक चले गए। इससे अगस्त्य ऋषि दुःखी हुए। वे ब्रह्माजी के पास गए और कहने लगे कि मैंने ब्रह्म हत्या की है, अतः ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरा उद्धार हो।
ब्रह्मा ने कहा कि महाकाल वन के उत्तर में वट यक्षिणी के पास उत्तम लिंग है। उनकी आराधना से तुम पाप से मुक्त हो जाओगे। ब्रह्माजी के कथन पर अगस्त्य ऋषि ने तपस्या की और भगवान महाकाल प्रसन्न हुए। भगवान ने उन्हें वर दिया कि जिस देवता का लिंग पूजन तुमने किया है, वे तुम्हारे नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध होंगे।
जो मनुष्य भावभक्ति से अगस्तेश्वर का दर्शन करेगा, वह पापों से मुक्त होकर सभी मनोकामनाओं को प्राप्त करेगा। तभी से श्रावण मास में विशेष रूप से अगस्तेश्वर महादेव की आराधना श्रद्धालुजन करते हैं।

(2) लिंग गुहेश्वर महादेव मंदिर
रामघाट पर पिशाच मुक्तेश्वर के पास सुरंग के भीतर स्थित है। इनके दर्शन मात्र से ही उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि ऋषि मंकणक वेद-वेदांग में पारंगत थे। सिद्धि की कामना में हमेशा तपश्चर्या में लीन रहते थे।
एक दिन पर्वत पुत्र विद्ध के हाथ से कुशाग्र नामक शाकरस उत्पन्न हुआ। ऋषि मंकणक को अभिमान हुआ कि यह उनकी सिद्धि का फल है। वे गर्व करके नृत्य करने लगे। इससे सारे जगत में त्रास फैल गया। पर्वत चलने लगे, वर्षा होने लगी, नदियाँ उल्टी बहने लगीं तथा ग्रहों की गति उलट गई। देवता भयभीत हो महादेव के पास गए।
महादेव ऋषि के पास पहुँचे और नृत्य से मना किया। ऋषि ने अभिमान के साथ शाकरस की घटना का जिक्र किया। इस पर महादेव ने अँगुष्ठ से ताड़ना कर अँगुली के अग्रभाग से भस्म निकाली और कहा कि देखो मुझे इस सिद्धि पर अभिमान नहीं है और मैं नाच भी नहीं रहा हूँ। इससे लज्जित होकर ऋषि ने क्षमा माँगी और तप का वरदान माँगा।
महादेव ने आशीर्वाद देकर कहा कि महाकाल वन जाओ, वहाँ सप्तकुल में उत्पन्न लिंग मिलेगा। इसके दर्शन मात्र से तुम्हारा तप बढ़ जाएगा। ऋषि को लिंग गुहा के पास मिला। लिंग दर्शन के बाद ऋषि तेजस्वी हो गए और दुर्लभ सिद्धियों को प्राप्त कर लिया। बाद में लिंग गुहेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऐसा कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार होता है।

(3) ढूँढ़ेश्वर महादेव
शिप्रा तट स्थित रामघाट के समीप धर्मशाला के ऊपरी भाग पर स्थित है। रुद्र देवता ने इन्हें स्वर्ग दिलाने वाला, सर्वपाप हरण करने वाला बताया है। पुराणों के अनुसार कैलाश पर्वत पर ढूँढ़ नामक गणनायक था। वह कामी और दुराचारी था।
एक दिन वह इंद्र के दरबार में जा पहुँचा और रंभा की फूलों से पिटाई कर दी। यह देखकर इंद्र ने शाप दिया, जिससे वह मृत्युलोक में मूर्छित होकर गिर गया। होश में आने पर उसे अपने कृत्य पर क्षोभ हुआ और वह महेन्द्र पर्वत पर तप करने लगा।
जब उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हुई तो उसने धर्मकर्म त्याग दिया। तभी भविष्यवाणी हुई कि महाकाल वन जाओ, वहाँ कार्यसिद्धि होगी। वह वन में पहुँचा और सम्प्रतिकारक के शुभ लिंग के दर्शन किए।
तप-आराधना से प्रसन्न होकर लिंग ने वरदान दिया। तब ढूँढ़ ने कहा कि मेरे नाम से आपको जाना जाए। तभी से ढूँढ़ेश्वर महादेव के नाम से वह लिंग प्रसिद्ध हुआ। इनके महात्म्य से व्यक्ति महादेव लोक को प्राप्त होता है।

(4) डमरूकेश्वर महादेव
वैवस्वत कल्प में रू रू नाम का महाअसुर था। उसका पुत्र महाबाहु बलिष्ठ वज्र था। महाकाय तीक्ष्ण दंत वाले इस असुर ने देवताओं के अधिकार तथा संपत्ति छीन ली और स्वर्ग से निकाल दिया।
पृथ्वी पर वेद पठन-यज्ञ आदि बंद हो गए और हाहाकार मच गया। तब सभी देवता-ऋषि आदि एकत्रित हुए और असुर के वध का विचार किया। विचार करते ही तेज पुंज के साथ एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उसने बारंबार अट्टाहास किया, जिससे बड़ी संख्या में देवियाँ उत्पन्ना हुईं। उन सभी ने मिलकर वज्रासुर से युद्ध किया।
दैत्य युद्ध स्थल से भागने लगे तो वज्रासुर ने माया प्रकट की। माया से कन्याएँ मोह को प्राप्त हो गईं। तब देवी कन्याओं को लेकर महाकाल वन में गईं, लेकिन वज्रासुर भी उनके पीछे-पीछे वन में पहुँच गया। यह समाचार नारद मुनि ने शिवजी को दिया।
शिवजी ने उत्तम भैरव का रूप धारण किया और वज्रासुर पर डमरू से प्रहार शुरू कर दिया। डमरू के शब्द से उत्तम लिंग उत्पन्न हुआ, जिससे निकली ज्वाला में वज्रासुर भस्म हो गया। उसकी सेना का भी नाश हो गया। तब देवताओं ने उत्तम लिंग का नाम डमरूकेश्वर रखा। इनके दर्शन से सभी दुःख दूर हो जाते हैं। श्री डमरूकेश्वर महादेव का मंदिर राम सीढ़ी के ऊपर स्थित है।

(5) अनादिकल्पेश्वर महादेव
अनादि समय में कथा के पहले एक उत्तम लिंग पृथ्वी पर प्रकट हुआ। उस समय अग्नि, सूर्य, पृथ्वी, दिशा, आकाश, वायु, जल, चन्द्र, ग्रह, देवता, असुर, गंधर्व, पिशाच आदि नहीं थे।
इस लिंग से जगत्स्थावर जंगम उत्पन्न हुए। इसी लिंग से देव, पितृ, ऋषि आदि के वंश उत्पन्न हुए। इस लिंग को अनादि सृष्टा माना जाने लगा। ब्रह्मा तथा शिवजी में इस बात पर विवाद हो गया कि सृष्टि का निर्माता कौन है। दोनों स्वयं को मानने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि महाकाल वन में कल्पेश्वर लिंग है, यदि उसका आदि या अंत देख लोगे तो जान जाओगे कि वही सृष्टिकर्ता है।
ब्रह्मा तथा शिव उसके आदि तथा अंत को नहीं खोज पाए। तब उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर अनादिकल्पेश्वर नाम से यह लिंग प्रसिद्ध होगा। इसके दर्शन मात्र से ही सारे पाप नष्ट हो जाएँगे। यह लिंग महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित है।

(6) स्वर्णजालेश्वर महादेव
जब महादेव को उमा के साथ कैलाश पर्वत पर क्रीड़ा करते सौ बरस बीत गए तो देवताओं ने अग्नि नारायण को उनके पास भेजा। महादेव ने अग्नि के मुँह में वीर्य डाल दिया। इससे अग्नि जलने लगा और वीर्य को गंगाजी में डाल दिया। फिर भी मुख में वीर्य के शेष रहने पर अग्नि जलने लगा।
इस वीर्य शेष से अग्नि को पुत्र हुआ। इस तेजस्वी पुत्र का नाम सुवर्ण पुत्र था। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं तथा असुरों में युद्ध शुरू हो गया। दोनों ओर से अनेक मर गए। इस पर ब्रह्मघातक सुवर्ण को शिवजी ने बुलाया और श्राप दिया कि उसका शरीर बल के सहित विकारमय हो जाए तथा धातु रूप बन जाए।
पुत्र मोह में अग्नि ने महादेव से कहा कि ये आपका ही पुत्र है, इसकी रक्षा आप ही करो। लोभवश महादेव ने उसे अभयदान दे दिया और वरदान माँगने को कहा। उसे यह भी कहा कि तुम महाकाल वन में जाकर कर्कोटकेश्वर के दक्षिण भाग में स्थित लिंग के दर्शन करो। दर्शन मात्र से तुम कृतकृत्य हो जाओगे।
सुवर्ण के द्वारा उस लिंग के दर्शन-पूजन से प्रसन्ना हो महादेव ने वरदान दिया कि तुम्हारी अक्षयकीर्ति होगी तथा तुम स्वर्णजालेश्वर के नाम से प्रसिद्धि पाओगे। जो भी तुम्हारी अर्चना करेगा वह पुत्र-पौत्र का सुख प्राप्त करेगा। ये महादेव राम सीढ़ी पर स्थित है।

(7) त्रिविष्टपेश्वर महादेव
वाराह कल्प में पुण्यात्मा देव ऋषि नारद स्वर्गलोक गए। वहाँ इंद्रदेव ने नारदजी से महाकाल वन का माहात्म्य पूछा। नारदजी ने कहा कि महाकाल वन में महादेव, गणों के साथ निवास करते हैं। वहाँ साठ करोड़ हजार तथा साठ करोड़शत लिंग निवास करते हैं। साथ ही नवकरोड़ शक्तियाँ भी निवास करती हैं।
यह सुनकर सभा में बैठे सभी देवता तथा इंद्र महाकाल वन पहुँचे। उनके पहुँचने पर आकाशवाणी हुई कि आप सभी देवता मिलकर एक लिंग की स्थापना कर्कोटक से पूरब में और महामाया के दक्षिण में करें। यह सुनकर देवताओं तथा इंद्र ने एक लिंग की स्थापना की। इंद्र ने लिंग को स्वयं का नाम 'त्रिविष्टपेश्वर' दिया।
महाकाल मंदिर में स्थित ओंकारेश्वर मंदिर के पीछे स्थित त्रिविष्टपेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना अष्टमी, चतुर्दशी तथा संक्रांति को करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

(8) कपालेश्वर महादेव
वैवस्वत कल्प में, त्रेतायुग में, महाकाल वन में पितामह यज्ञ कर रहे थे। वहाँ ब्राह्मण समाज बैठा था। महादेव कापालिक वेश में वहाँ पहुँच गए। यह देखकर ब्राह्मणों ने क्रोधित हो उन्हें हवन स्थल से चले जाने को कहा। कापालिक वेश धारण किए महादेव ने ब्राह्मणों से अनुरोध किया कि मैंने ब्रह्म हत्या का पाप नाश करने के लिए बारह वर्ष का व्रत धारण किया है। अतः मुझे पापों का नाश करने हेतु अपने साथ बिठाएँ। ब्राह्मणों द्वारा इंकार करने पर उन्होंने कहा कि ठहरो, मैं भोजन करके आता हूँ।
तब ब्राह्मणों ने उन्हें मारना शुरू कर दिया। इससे उनके हाथ में रखा कपाल गिरकर टूट गया। इतने पर कपाल पुनः प्रकट हो गया। ब्राह्मणों ने क्रोधित होकर कपाल को ठोकर मार दी। जिस स्थान पर कपाल गिरा वहाँ करोड़ों कपाल प्रकट हो गए। ब्राह्मण समझ गए कि यह कार्य महादेव का ही है।
उन्होंने शतरुद्री मंत्रों से हवन किया। तब प्रसन्ना होकर महादेव ने कहा कि जिस जगह कपाल को फेंका है, वहाँ अनादिलिंग महादेव का लिंग है। यह समयाभाव से ढँक गया है। इसके दर्शन से ब्रह्म हत्या का पाप नाश होगा। इस पर भी जब दोष दूर नहीं हुआ तब आकाशवाणी हुई कि महाकाल वन जाओ। वहाँ महान लिंग गजरूप में मिलेगा। वे आकाशवाणी सुनकर अवंतिका आए।
लिंग दर्शन करते समय हाथ में स्थित ब्रह्म मस्तक पृथ्वी पर गिर गया। तब महादेव ने इसका नाम कपालेश्वर रखा। बिलोटीपुरा स्थित राजपूत धर्मशाला में स्थित कपालेश्वर महादेव के दर्शन करने मात्र से कठिन मनोरथ पूरे होते हैं।

(9) स्वर्गद्वारेश्वर महादेव
नलिया बाखल स्थित स्वर्गद्वारेश्वर महादेव के पूजन-अर्चन से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा मोक्ष मिलता है। पुराणों में अंकित जानकारी अनुसार अश्विनी तथा उमा की बहनें, कैलाश पर्वत पर उमा से मिलने आईं तथा यज्ञ में बुलाने पर पिता के यहाँ यज्ञ में गईं।
वहाँ उन्हें पता चला कि उनके पति को आमंत्रित नहीं किया गया है। तब उमा ने अपमानित हो प्राण त्याग दिए। जब उमा पृथ्वी पर अचेतन दिखीं तो सैकड़ों गण क्रोधित होकर वहाँ पहुँचे और युद्ध शुरू कर दिया। इस बीच वीरभद्र गण ने इंद्र को त्रिशूल मार दिया। ऐरावत हाथी को मुष्ठी से प्रहार कर ताड़ित किया।
यह देख विष्णुजी को क्रोध आया और सुदर्शन चक्र फेंका। उसने गणों का नाश किया। गण घबराकर महादेव के पास गए। महादेव ने गणों को स्वर्ग के द्वार पर भेज दिया। देवताओं को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हुई तो वे ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने महादेव की आराधना करने को कहा।
इंद्र देवताओं सहित महाकाल वन में कपालेश्वर के पूर्व में स्थित द्वारेश्वर गए। पूजन कर स्वर्गद्वारेश्वर के दर्शन मात्र से स्वर्ग के द्वार खुल गए। तबसे स्वर्गद्वारेश्वर महादेव प्रसिद्ध हुए।

(10) कर्कोटेश्वर महादेव
हरसिद्धि मंदिर परिसर स्थित कर्कोटेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से विष बाधा दूर हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि माता उमा ने सर्पों को श्राप दिया कि मेरा वचन पूरा नहीं करने से तुम जन्मेजय के यज्ञ में अग्नि में जल जाओगे। श्राप सुनकर सर्प भयभीत होकर भागने लगे।
नागेन्द्र एलापत्रक नामक सर्प ब्रह्माजी के पास गया और सारा वृत्तांत सुनाया। ब्रह्मा ने उन्हें महाकाल वन जाने को कहा। उन्होंने कहा कि वहाँ जाकर महामाया के समीप महादेव की आराधना करो। यह सुनकर कर्कोटक नाम का सर्प स्वेच्छा से महामाया के सामने बैठकर महादेव की अर्चना करने लगा।
महादेव ने प्रसन्ना होकर वरदान दिया कि जो सर्प विष उगलने वाला क्रूर होगा उसका नाश होगा किंतु धर्माचरण करने वाले साँपों का नाश नहीं होगा। तभी से वह शिवलिंग कर्कोटेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गया। इनके दर्शन से कभी भी सर्प पीड़ा नहीं होती है।

(11) सिद्धेश्वर महादेव
सिद्धनाथ स्थित सिद्धेश्वर महादेव सिद्धि देने वाले हैं। इनकी सिद्धि करने पर अपुत्र को पुत्र, विद्यार्थी को विद्या प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि देवदारू वन में ब्राह्मण एकत्रित हुए और स्पर्धा के साथ तपश्चर्या करने लगे। तरह-तरह के व्रत व आसन करने के बाद भी सैकड़ों वर्षों तक उन्हें सिद्धि प्राप्त नहीं हुई।
तब वे तपश्चर्या की निंदा कर नास्तिकता का विचार करने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि ईर्ष्या तथा स्पर्धा से किए तप से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। तुम सभी महाकाल वन जाओ और सिद्धि देने वाले महादेव की आराधना करो।
यह सुनकर वे महाकाल वन गए और सर्वसिद्धि देने वाले शिवलिंग के दर्शन किए। उनका मनोरथ पूरा हुआ। उसी दिन से वह लिंग सिद्धेश्वर महादेव के नाम से ख्यात हुआ।

(12) लोकपालेश्वर महादेव
हरसिद्धि दरवाजा स्थित लोकपालेश्वर महादेव के दर्शन प्रत्येक अष्टमी को करने पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। साधक विमान में बैठकर इंद्रलोक जाते हैं तथा सुख को प्राप्त कर ब्रह्मलोक में गमन करते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप के समय हजारों दैत्यगण उत्पन्ना हुए। उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी पर स्थित आश्रमों को नष्ट कर दिया। यज्ञ-अग्निकुंडों को मांस-मदिरा-रक्त से भर दिया। देवता भयभीत होकर विष्णु भगवान के पास गए। भगवान विष्णु उपाय सोचते तब तक दैत्यगणों ने इंद्र, वरूण, धर्मराज, अरुण, कुबेर आदि को जीत लिया। देवताओं की व्याकुलता देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें महाकाल वन जाकर महादेव की आराधना करने को कहा।
जब देवतागण महाकाल वन जा रहे थे तो रास्ते में दैत्यों ने उन्हें रोक लिया। वे पुनः भगवान विष्णु के पास गए तब उन्होंने कहा कि शिवभक्त बनकर शरीर पर भभूत लगाकर जाओ। ऐसा करने पर जब वे महाकाल वन पहुँचे तो महान लिंग, तेज से युक्त देखा। इससे निकलने वाली ज्वाला से सभी दैत्य जल गए।
इसका माहात्म्य जानकर देवताओं (लोकपाल) ने उनका नाम लोकपालेश्वर महादेव रखा।

(13) मनकामनेश्वर महादेव
गंधर्ववती घाट स्थित श्री मनकामनेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से सौभाग्य प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है कि एक समय ब्रह्माजी प्रजा की कामना से ध्यान कर रहे थे। उसी समय एक सुंदर पुत्र उत्पन्ना हुआ। ब्रह्माजी के पूछने पर उसने कहा कि कामना की आपकी इच्छा से, आपके ही अंश से उत्पन्ना हुआ हूँ। मुझे आज्ञा दो, मैं क्या करूँ?
ब्रह्माजी ने कहा कि तुम सृष्टि की रचना करो। यह सुनकर कंदर्प नामक वह पुत्र वहाँ से चला गया, लेकिन छिप गया। यह देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हुए और नेत्राग्नि से नाश का श्राप दिया। कंदर्प के क्षमा माँगने पर उन्होंने कहा कि तुम्हें जीवित रहने हेतु 12 स्थान देता हूँ, जो कि स्त्री शरीर पर होंगे। इतना कहकर ब्रह्माजी ने कंदर्प को पुष्य का धनुष्य तथा पाँच नाव देकर बिदा किया।
कंदर्प ने इन शस्त्रों का उपयोग कर सभी को वशीभूत कर लिया। जब उसने तपस्यारत महादेव को वशीभूत करने का विचार किया तब महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। इससे कंदर्प (कामदेव) भस्म हो गया। उसकी स्त्री रति के विलाप करने पर आकाशवाणी हुई कि रुदन मत कर, तेरा पति बिना शरीर का (अनंग) रहेगा। यदि वह महाकाल वन जाकर महादेव की पूजा करेगा तो तेरा मनोरथ पूर्ण होगा।
कामदेव (अनंग) ने महाकाल वन में शिवलिंग के दर्शन किए और आराधना की। इस पर प्रसन्ना होकर महादेव ने वर दिया कि आज से मेरा नाम, तुम्हारे नाम से कंदर्पेश्वर महादेव नाम से प्रसिद्ध होगा। चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी को जो व्यक्ति दर्शन करेगा, वह देवलोक को प्राप्त होगा।

(14) कुटुम्बेश्वर महादेव
सिंहपुरी क्षेत्र स्थित कुटुम्बेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से गोत्र वृद्धि होती है। ऐसा कहा जाता है कि जब देवों तथा दैत्यों ने क्षीरसागर का मंथन किया तब उसमें से ऐसा विष निकला, जिसने चारों ओर त्राहि मचा दी।
देवताओं ने महादेव से स्तुति की कि वे इससे उनकी रक्षा करें। महादेव ने मोर बनकर उस विष को पी लिया, किंतु वे भी इसे सहन नहीं कर पाए। तब महादेव ने शिप्रा नदी को वह विष दे दिया। शिप्रा ने इसे महाकाल वन स्थित कामेश्वर लिंग पर डाल दिया। वह लिंग विषयुक्त हो गया। इसके दर्शन मात्र से ब्राह्मण आदि मरने लगे।
महादेव को मालूम होने पर उन्होंने ब्राह्मणों को जीवित किया तथा वरदान दिया कि आज से जो भी इस लिंग के दर्शन करेगा वह आरोग्य को प्राप्त होगा तथा कुटुम्ब में वृद्धि करेगा। तब से यह लिंग कुटुम्बेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।

(15) इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव
पटनी बाजार क्षेत्र में, मोदी की गली स्थित इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव के दर्शन से यश तथा कीर्ति प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि महिपति के राजा इन्द्रद्युम्नेश्वर थे। उन्होंने पृथ्वी की रक्षा पुत्रवत की।
धार्मिक प्रवृत्ति के ये राजा स्वर्ग को प्राप्त हुए। पुण्य का हिस्सा पूर्ण होने पर वे पृथ्वी पर गिर पड़े। इससे उन्हें शोक-संताप हुआ। उन्होंने विचार किया कि बुरे काम करने पर ही स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरना पड़ता है, अतः पाप कर्म त्यागकर कीर्ति बढ़ाना चाहिए।
वे स्वर्ग प्राप्ति की आकांक्षा में हिमालय पर्वत पर गए और मार्कण्डेय मुनि के दर्शन कर तपश्चर्या का फल पूछा। मुनि ने उन्हें महाकाल की आराधना करने को कहा। इन्द्रद्युम्न की तप आराधना से प्रसन्ना होकर उन्हें वरदान मिला कि यह लिंग उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध होकर 'इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव' कहलाएगा।

(16) ईशानेश्वर महादेव
पटनी बाजार क्षेत्र में मोदी की गली के बड़े दरवाजे में स्थित श्री ईशानेश्वर महादेव की आराधना से कीर्ति, लक्ष्मी तथा सिद्धि प्राप्त होती है।
ऐसा कहा जाता है कि मंडासुर के पुत्र तुहुण्ड ने देवताओं पर बहुत जुल्म किए। उसने ऋषि, यक्ष, गंधर्व एवं किन्नारों को भी अपने अधिकार में कर लिया। इंद्र को जीतकर ऐरावत हाथी को अपने मकान के दरवाजे पर बाँध लिया। देवताओं के अधिकारों का हरण कर उन्हें स्वर्ग जाने से रोक दिया।
उनकी ऐसी स्थिति देखकर मुनि नारद ने कहा कि 'महाकाल वन जाओ। वहाँ इंद्रद्युम्नेश्वर महादेव के पास पूर्व दिशा में स्थित लिंग का पूजन-आराधना करो। ईशान कल्प में इसी लिंग की कृपा से राजा ईशान ने अपना खोया राज्य प्राप्त किया था।'
यह वचन सुनकर देवतागण, महाकाल वन गए। वहाँ उन्होंने लिंग की आराधना की। लिंग से अचानक धुआँ निकलने लगा। फिर ज्वाला निकली, उस ज्वाला ने तुहुण्ड को परिवार सहित जलाकर भस्म कर दिया। देवताओं ने लिंग का नाम ईशानेश्वर महादेव रखा।

(17) अप्सरेश्वर महादेव
मोदी की गली में ही कुएँ के पास स्थित अप्सरेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से ही अभिष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। इनको स्पर्श करने से राज्य-सुख तथा मोक्ष मिलता है।
एक बार नंदन वन में इंद्रदेव विराजित थे। अप्सरा रंभा नृत्य कर उनका मनोरंजन कर रही थी। अचानक कोई विचार आने पर रंभा की लय बिगड़ गई। इस पर इंद्र क्रोधित हुए और श्राप दिया कि वह कांतिहीन होकर मृत्युलोक में गमन करे।
रंभा पृथ्वी पर गिर पड़ी और रूदन करने लगी। उसकी सखी अप्सराएँ भी वहाँ आ गईं तभी वहाँ से मुनि नारद गुजरे। उन्होंने रंभा की जबानी सारा वृत्तांत सुना तो बोले- 'रंभा तुम महाकाल वन जाओ। वहाँ मनोरथपूर्ण करने वाला लिंग मिलेगा। उसके पूजन, आराधना से तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। उर्वशी अप्सरा को भी इनके पूजन से पुरुरवा राजा पति के रूप में मिले थे।'
ऐसा कहने पर रंभा ने लिंग की आराधना की। इस पर महादेव प्रसन्ना हुए और रंभा को आशीर्वाद दिया कि वह इंद्र की वल्लभप्रिया बनेगी तथा यह लिंग अप्सरेश्वर महादेव के नाम से जाना जाएगा।

(18) कलकलेश्वर महादेव
श्री कलकलेश्वर महादेव के दर्शन से कलह नहीं होता है। एक बार महादेव ने उमा को महाकाली नाम से पुकारा। इस बात को लेकर महादेव-उमा में कलह बढ़ गया। कलह के कारण तीनों लोक कम्पित होने लगे। यह देख देव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व आदि भय को प्राप्त हुए।
इस भीषण हो-हल्ले में पृथ्वी के गर्भ से एक लिंग निकला। उस लिंग से शुभ एवं सुख वचन की वाणी निकली। लिंग ने त्रिलोक को शांति के वचन कहे। इस पर देवताओं ने उस लिंग का नाम कलकलेश्वर महादेव रखा।
इसका पूजन-अर्चन करने वाले मनुष्य को दुःख, व्याधि तथा अकाल मौत से मुक्ति मिलती है। ये महादेव मोदी की गली में कुएँ के सामने स्थित हैं।

(19) नागचंद्रेश्वर महादेव
पटनी बाजार स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव के दर्शन से निर्माल्य लंघन से उत्पन्ना पाप का नाश होता है। ऐसा कहा जाता है कि देवर्षि नारद एक बार इंद्र की सभा में कथा सुना रहे थे। इंद्र ने मुनि से पूछा कि हे देव, आप त्रिलोक के ज्ञाता हैं। मुझे पृथ्वी पर ऐसा स्थान बताओ, जो मुक्ति देने वाला हो।
यह सुनकर मुनि ने कहा कि उत्तम प्रयागराज तीर्थ से दस गुना ज्यादा महिमा वाले महाकाल वन में जाओ। वहाँ महादेव के दर्शन मात्र से ही सुख, स्वर्ग की प्राप्ति होती है। वर्णन सुनकर सभी देवता विमान में बैठकर महाकाल वन आए। उन्होंने आकाश से देखा कि चारों ओर साठ करोड़ से भी शत गुणित लिंग शोभा दे रहे हैं। उन्हें विमान उतारने की जगह दिखाई नहीं दे रही थी।
इस पर निर्माल्य उल्लंघन दोष जानकर वे महाकाल वन नहीं उतरे, तभी देवताओं ने एक तेजस्वी नागचंद्रगण को विमान में बैठकर स्वर्ग की ओर जाते देखा। पूछने पर उसने महाकाल वन में महादेव के उत्तम पूजन कार्य को बताया। देवताओं के कहने पर कि वन में घूमने पर तुमने निर्माल्य लंघन भी किया होगा, तब उसके दोष का उपाय बताओ।
नागचंद्रगण ने ईशानेश्वर के पास ईशान कोण में स्थित लिंग का महात्म्य बताया। इस पर देवता महाकाल वन गए और निर्माल्य लंघन दोष का निवारण उन लिंग के दर्शन कर किया। यह बात चूँकि नागचंद्रगण ने बताई थी, इसीलिए देवताओं ने इस लिंग का नाम नागचंद्रेश्वर महादेव रखा।

(20) प्रतिहारेश्वर महादेव
पटनी बाजार स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव के पास प्रतिहारेश्वर महादेव का मंदिर है। इनके दर्शन मात्र से व्यक्ति धनवान बन जाता है। एक बार महादेव उमा से विवाह के बाद सैकड़ों वर्षों तक रनिवास में रहे।
देवताओं को चिंता हुई कि यदि महादेव को पुत्र हुआ तो वह तेजस्वी बालक त्रिलोक का विनाश कर देगा। ऐसे में गुरु महा तेजस्वी ने उपाय बताया कि आप सभी महादेव के पास जाकर गुहार करो। जब सभी मंदिराचल पर्वत पहुँचे तो द्वार पर नंदी मिले। इस पर इंद्र ने अग्नि से कहा कि हंस बनकर नंदी की नजर चुराकर जाओ और महादेव से मिलो।
हंस बने अग्नि ने महादेव के कान में कहा कि देवतागण द्वार पर खड़े इंतजार कर रहे हैं। इस पर महादेव द्वार पर आए तथा देवताओं की बात सुनी। उन्होंने देवताओं को पुत्र न होने देने का वचन दिया। लापरवाही के स्वरूप उन्होंने नंदी को दंड दिया। नंदी पृथ्वी पर गिरकर विलाप करने लगा।
नंदी का विलाप सुनकर देवताओं ने नंदी से महाकाल वन जाकर शिवपूजा का महात्म्य बताया। नंदी ने वैसा ही किया। उसने लिंग पूजन कर वरदान प्राप्त किया। लिंग से ध्वनि आई कि तुमने महाभक्ति से पूजन किया है अतः तुम्हें वरदान है कि तुम्हारे नाम प्रतिहार (नंदीगण) से यह लिंग जाना जाएगा। तब से उसे प्रतिहारेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्धि मिली।

(21) दुर्धरेश्वर महादेव
छोटी रपट के पास स्थित गंधर्ववती घाट पर दुर्धरेश्वर महादेव मंदिर है। इनके दर्शन से मनुष्य पापमुक्त हो वांछित फल पाता है। एक बार नेपाल का राजा दुर्धष वन में शिकार को गया। थकने पर एक सरोवर से जलपान कर वहीं सो गया।
वह सरोवर सिद्ध देवकन्याओं का स्नानागार था। तीन स्त्रियों का पति दुर्धष देवकन्याओं के आने पर मोहित हो गया। कल्प मुनि की कन्या राजा पर मोहित होकर बोली कि आप मेरे पिताश्री से मुझे माँग लो। राजा के निवेदन पर मुनि ने कन्यादान कर दिया। इस पर राजा अपना राजपाट तथा स्त्रियों को भूलकर मुनि कन्या के साथ घर जमाई बनकर रहने लगा।
एक दिन राक्षस ने मुनि कन्या का अपहरण कर लिया। राजा ने पत्नी वियोग से दुःखी हो मुनि से उपाय जाना। मुनि ने कहा कि महाकाल वन जाकर शिप्रा तट स्थित ब्रह्मेश्वर से पश्चिम में जाओ। वहाँ स्थित लिंग की तपस्या करने पर तुम्हारा मनोरथपूर्ण होगा।
राजा ने ऐसा ही किया, तब लिंग से आकाशवाणी हुई कि मैंने राक्षस का नाश कर मुनि कन्या को छुड़ा लिया है। तुम सुखपूर्वक इसके साथ रहो। इस लिंग का पूजन कर दुर्धष ने मनोरथ प्राप्त किया, तभी से इसका नाम दुर्धरेश्वर महादेव पड़ा।

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