01 अप्रैल 2010

श्री गणपति क़ी स्तुति


ॐ नमस्ते गणपतये । त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्तासी । त्वमेव केवलं धर्तासि । त्वमेव केवलं हर्तासि । त्वमेव सर्व खल्विदंब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्मासि नित्यम ॥ १ ॥
ऋतुं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥
अवत्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम । अव दातारम । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यंम् । अव पश्चात्तात् । अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणयात्तात् । अव चौध्वार्त्तात् । अवधरात्तात् । सर्वतो माँ पाहि पाहि समंतातं ॥ ३ ॥
त्वं वांगमयस्त्वं चिन्मय: । त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय: । त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोसि । त्वं प्रत्यक्षं ब्रहमासि । त्वं ज्ञानमयो विग्यन्मयोसी ॥ ४ ॥
सर्व जगदिदम त्वत्तस्तिष्टति । सर्व जगदिदम त्वयि लयमेष्यति । सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति । सर्व जगदिदं त्वयि अत्येति । त्वं भूमिरारोsनलोsनिलो नम: । त्वं चत्वारि वाकपदानि ॥ ५ ॥
ॐ नमस्गण्पतयेते ।

हे ओमकार स्वरुप गणेश जी ! आपको मेरा नमस्कार हो। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म है। इस सृष्टी को धारण करने वाले आप हो उसका रक्षण करने वाले आप हो और आप उसका संहार भी करते हो। यह सर्व जो ब्रह्म स्वरुप में रहा है वह अप ही हो। में तो सृष्टी के नियमानुसार वाणी उच्चारण करता हूँ। में सच ही बोलता हूँ क़ी आप मेरा रक्षण करो आपको ऐसा वर्णन करने वाले मेरा आप रक्षण करो। में आपके निमित्त के लिये दान करने वाले मेरा आप रक्षण करो। में आपके शिष्य सामान हूँ, अतः आप मेरा रक्षण करो। सभी विध्नों में आप मेरा पश्चिम दिशा से रक्षण करो। पूर्व दिशा में से मेरा रक्षण करो। पाताल की दिशा में से रक्षण करो। आप प्रत्येक वास्तु में से मेरा रक्षण करो। आप चारो तरफ से मेरा रक्षण करो। आप वाणी रूप हो, जीवरूप हो, आनंदमय हो, ब्रह्म, रूप हो, ज्ञानमय हो और विज्ञानमय भी हो। यह सारा संसार आपके द्वार उत्पन्न हुआ है। और आपके द्वारा चलता है। यह सर्व जगत आपमें ही लय होता है। आपके द्वारा उत्पन्न हुआ है। और आपके द्वारा चलता है। यह सर्व जगत आपमें ही लय होता है। आपके द्वारा ही फिर शुरू होता है। आप पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशरूप हो। परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी ये चार वाणी के आप उदगाता हो। ऐसे आप गणपति को मेरा नमस्कार हो
इन्हें भी देखें :-
श्री नवग्रह स्तुति
श्री दशावतार स्तुति

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