23 फ़रवरी 2011

संकष्ट चतुर्थी व्रत

यह व्रत आषाढ चतुर्थी को करते हैं। प्रात: स्नानादि दैनिक कार्य करने के बाद दाहिने हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर मम वर्तमानागामिसकल संकट निरसन पूर्वकसकलाभीष्टसिद्धयेसंकष्टचतुर्थीव्रतमहंकरिष्ये संकल्प करके दिनभर मौन रहकर अपना कार्य करें सायंकाल पुन: स्नान करके
तीव्रायै, ज्वालिन्यै, नन्दायै, भोगदायै, कामरूपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै,
 सत्यायैचदिक्षुविदिक्षु, मध्येविघ्ननाशिन्यैसर्वशक्तिकमलासनायैनम:
श्लोक से पीठ पूजा करने के बाद वेदी के बीच में स्वर्णादिधातु से निर्मित गणेशजी का-
गणेशाय नम: से आह्वान,विघ्ननाशिने नम: से आसन, लम्बोदराय नम: से पाद्य, चन्द्रार्धधारिणे नम: से अ‌र्घ्य, विश्वप्रियायनम: से आचमन, ब्रह्मचारिणे नम: से स्नान, कुमारगुरवे नम: से वस्त्र, शिवात्मजाय नम: से यज्ञोपवीत, रुद्रपुत्राय नम: से गन्ध, विघ्नहत्र्रे नम: से अक्षत, परशुधारिणे नम: से पुष्प, भवानीप्रीतिकत्र्रे नम: से धूप, गजकर्णाय नम: से दीपक, अघनाशिने नम: से नैवेद्य (आचमन), सिद्धिदाय नम: से ताम्बुल,सर्वभोगदायिने नम: से दक्षिणा अर्पण करके षोडशोपचारपूजनकरें। कर्पूर अथवा घी की बत्ती जलाकर नीराजन करें। दूर्वाकेअङ्कुरलेकर ॐगणाधिपायनम:, उमपपुत्रायनम:, अघनाशायनम:, विनायकायनम:,
ईशपुत्रायनम:, सर्वसिद्धिप्रदायककुमारगुरवेतुभ्यंपूजयामिप्रयत्नत:॥
स्तुति से दूर्वा अर्पण कर-यज्ञेन यज्ञ से मन्त्र-पुष्पांजलि अर्पण करें।
संसारपीडाव्यथितं हि मां सदा संकष्टभूतंसुमुख प्रसीद।
त्वंत्राहि मां मोचयकष्टसंघान्नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
इस श्लोक से नमस्कार करके
श्रीविप्राय नमस्तुभ्यंसाक्षाद्देवस्वरूपिणे।
गणेशप्रीतयेतुभ्यंमोदकान्वैददाम्यहम्॥
इससे मोदक, सुपारी, मूंग और दक्षिणा रखकर वायन(बायना) दें। चन्द्रोदय होने पर चन्द्रमा का गन्ध-पुष्पादि से विधिवत् पूजन करके
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यंनमस्तेज्योतिषांपते।
नमस्तेरोहिणीकान्तगृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥
इससे गणेशजीको तीन अ‌र्घ्यप्रदान करें।
तिथीनामुत्तमे देवि गणेशप्रियवल्लभे।
गृहाणाघ्र्यमयादत्तंसर्वसिद्धिप्रदायिके॥
इससे पुन:अ‌र्घ्यदें।
आयातस्त्वमुमापुत्र ममानुग्रहकाम्यया।
पूजितोऽसिमयाभक्त्यागच्छ स्थानंस्वकंप्रभो॥
इससे विसर्जन कर ब्राह्मणों को भोजन करायें और स्वयं नमक वर्जित भोजन करें।

Part 2 


व्यासजीने कहा है कि अधिक मास में चतुर्थी को गणेश्वरके नाम से पूजा करनी चाहिए। पूजन की विधि षोडशोपचारहै। सर्व प्रथम पंचामृत से स्नान कराना चाहिए। लाल कनेर का फूल चढ़ा कर लड्डू आदि का भोग लगावें। लाल चन्दन, रोली, अक्षत और दूब को एक-एक नाम से अलग-अलग चढ़ायें।
तत्पश्चात् विश्वप्रियाय नम: से वस्त्र, पुष्टिदाय नम: से चन्दन,
विनायकाय नम: से पुष्प,
उमासुताय नम: से धूप,
रूद्रप्रियाय नम: से दीप,
विघ्ननाशिने नम: से नैवेद्य अर्पित करें।
फलदात्रे नम: से ताम्बूल,
सङ्कष्टनाशिने नम: से फल चढ़ावें।
इसके बाद विघ्नविनायकगणेश जी की प्रार्थना करें।
संसारपीडाव्यथितंभर्यातंक्लेशान्वितंमां सुमुख! प्रसीद।
त्रायस्वमां दु:खदारिद्यनाशन!नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
हे सुन्दर मुखवालेगणेशजी!मैं भव-बाधा से ग्रस्त, भय से पीडि़त और क्लेशों से सन्तप्त हूं, आप मेरे पर प्रसन्न होइए। हे दु:ख-दारिद्रय के नाशक गणनायकजी! आप मेरी रक्षा करें। हे विघ्नों के विनाशक! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। फिर निम्नांकित मंत्र से पुष्पांजलि देकर चन्द्रमा को अ‌र्घ्यदेवें।
पुष्पांजल्यामिमंमन्त्रंचन्द्रायाऽघ्र्यप्रदापयेत्।
क्षीरम्भोधि-समुद्भूत!नमोनमोविघ्नविनाशनाय॥
हे क्षीरसागरसम्भव!हे द्विजराज,हे षोडश कलाओं के अधिपति। शंख से सफेद फूल, चन्दन, जल, अक्षत और दक्षिणा लेकर, हे रोहिणी के सहित चन्द्रमा! आप मेरे अ‌र्घ्यको स्वीकार करें, मैं आपको प्रणाम करता हूं। तदनन्तर ब्राह्मण को भोजन करावें। लड्डू और दक्षिणा दें। देवता और ब्राह्मण से बचे अन्न द्वारा स्वयं आहार ग्रहण करें। रात्रि में भूमि पर शयन करें, लालच विहीन होकर क्रोध से दूर रहें। हर महीने गणेश जी की प्रसन्नता के निमित्त व्रत करें। इसके प्रभाव से विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन प्राप्ति एवं कुमारी कन्या को सुशील वर की प्राप्ति होती है और वह सौभाग्यवती रहकर दीर्घकाल तक पति का सुखभोग करती है। विधवा द्वारा व्रत करने पर अगले जन्म में वह सधवा होती हैं एवं ऐश्वर्य-शालिनी बन कर पुत्र-पौत्रादि का सुख भोगती हुई अंत में मोक्ष पाती है। पुत्रेच्छुको पुत्र लाभ होता एवं रोगी का रोग निवारण होता है। भयभीत व्यक्ति भय रहित होता एवं बंधन में पड़ा हुआ बंधन मुक्त हो जाता है।

अनुष्ठान-अंगार की चतुर्थी व्रत

भगवान गणेश चतुर्थी तिथि के दिन प्रकट हुए थे। अतएव यह तिथि मंगलमूर्ती  गणपति को सर्वाधिक प्रिय है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में श्रीगणेश को चतुर्थी का स्वामी (अधिपति) बताया गया है। गणेशभक्त बडी श्रद्धा के साथ चतुर्थी के दिन व्रत रखते हैं। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात में चन्द्रमा को अ‌र्घ्यदेकर, गणेश-पूजन करने के बाद फलाहार ग्रहण किया जाता है। कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय-व्यापिनी चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इसके व्रत से सभी संकट-विघ्न दूर होते हैं। मंगलवार के दिन चतुर्थी का संयोग गणेश जी की उपासना में अत्यन्त शुभ एवं सिद्धिदायक होता है। मंगलवार की चतुर्थी अंगारकी चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। धर्मग्रन्थों में यह लिखा है कि अंगारकी चतुर्थी का इतना अधिक माहात्म्य है कि इस दिन विधिवत् व्रत करने से मंगलमूर्ती  श्रीगणेश तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं। अंगार की चतुर्थी का व्रत विधिवत् करने से सालभरकी चतुर्थियों के व्रत का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है।

गणेश पुराण के उपासना खण्ड में अंगार की चतुर्थी की कथा विस्तार से वर्णित है। पृथ्वीनन्दन मंगल अपनी तेजस्विता एवं रक्तवर्ण के कारण अंगारक भी कहे जाते हैं, जिसका मतलब है अंगारे के समान लाल। मंगल ने कठोर तप करके आदिदेव गजानन को जब संतुष्ट कर दिया, तब उन्होंने मंगल को यह वरदान किया कि मंगलवार के दिन चतुर्थी तिथि अंगारकी चतुर्थी के नाम प्रख्यात होगी। इस दिन सविधि व्रत करने वाले को एक वर्ष पर्यन्त चतुर्थी-व्रत करने का फल प्राप्त होगा। अंगार की चतुर्थी के प्रताप से व्रती के किसी भी कार्य में कभी विघ्न नहीं होगा। उसे संसार के सारे सुख प्राप्त होंगे तथा मंगलमूर्ती  गणेश उस पर सदैव कृपा करेंगे।

अनन्त चतुर्दशी व्रत

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन अनन्त भगवान की पूजा करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्रबांधा जाता है। कहा जाता है कि जब पाण्डव जुए में अपना सारा राज-पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनन्त सूत्र धारण किया। अनन्त चतुर्दशी-व्र तके प्रभाव से पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए।

व्रत-विधान-व्रत कर्ता प्रात:स्नान करके व्रत का संकल्प करें। शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान है, तथापि ऐसा संभव न हो सकने की स्थिति में घर में पूजा गृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्या पर लेटे भगवान विष्णु की मूíत अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों(गांठों) से युक्त अनन्तसूत्र(डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंत सूत्र की षोडशोपचार-विधिसे पूजा करें। पूजनोपरांत अनन्त सूत्र को मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें-
अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।
अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

अनंत सूत्र बांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य (भोग) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद व्रत-कथा को पढें या सुनें। कथा का सार-संक्षेप यह है- सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्य मुनि से किया। कौण्डिन्य मुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्त सूत्र बांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्त सूत्र पर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्यऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्य मुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुज अनन्त देव का दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्त सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्य मुनि ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मो का फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है।मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्य मुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

अनुष्ठान-अहोई अष्टमी व्रत

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। माताएं अहोईअष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय होई का पूजन किया जाता है। यह होई गेरु आदि के द्वारा दीवाल पर बनाई जाती है अथवा किसी मोटे वस्त्र पर होई काढकर पूजा के समय उसे दीवाल पर टांग दिया जाता है।

होई के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं।

उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों में अहोईमाता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की होई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोईमाता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अहोईअष्टमी की दो लोक कथाएं प्रचलित हैं।

उसमें से एक कथा में साहूकार की पुत्री के द्वारा घर को लीपने के लिए मिट्टी लाते समय मिट्टी खोदने हेतु खुरपा(कुदाल) चलाने से साही के बच्चों के मरने से संबंधित है। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि हमें कोई भी काम अत्यंत सावधानी से करना चाहिए अन्यथा हमारी जरा सी गलती से किसी का ऐसा बडा नुकसान हो सकता है, जिसकी हम भरपाई न कर सकें और तब हमें उसका कठोर प्रायश्चित करना पडेगा। इस कथा से अहिंसा की प्रेरणा भी मिलती है। अहोईअष्टमी की दूसरी कथा मथुरा जिले में स्थित राधाकुण्डमें स्नान करने से संतान-सुख की प्राप्ति के संदर्भ में है। अहोईअष्टमी के दिन पेठे का दान करें।

जिन स्थानों में अहोईअष्टमी की रात्रि में तारे को अ‌र्घ्यदेने की प्रथा है, वहां भी गुरुवार को ही व्रत रखा जाए क्योंकि इसी दिन तारों का दर्शन अष्टमी की अवधि में होगा। ब्रजमण्डलमें उदयातिथि की विशेष मान्यता होने तथा सप्तमी से विद्धाअष्टमी को ग्रहण न किए जाने के कारण यहां राधाकुण्डमें स्नान का पर्व 2नवंबर को माना जाएगा। ब्रज में व्रत-पर्व की तारीख का निर्णय वैष्णव सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है।

अनुष्ठान:-अचला सप्तमी

माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, अरोग्य सप्तमी आदि नामों से प्रसिद्ध है। इसी कारण पुराणों में इस तिथि के व्रत की विभिन्न नामों से अलग-अलग विधियां निर्दिष्ट हैं। भविष्यपुराणमें अचला सप्तमी के व्रत का माहात्म्य विस्तार से वर्णित है। इस व्रत का विधान भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। षष्ठी के दिन एक समय भोजन करें। सप्तमी को प्रात:काल किसी नदी या सरोवर में स्नान करें। स्नान हेतु अरुणोदय वेला को सर्वाधिक प्रभावकारी कहा गया है। किसी पात्र में तिल का तेल डालकर दीपक प्रज्वलित करें। दीपक को सिर पर रखकर भगवान सूर्य और सप्तमी तिथि का इस प्रकार ध्यान करें-
नमस्तेरुद्ररूपायरसानाम्पतयेनम:। 
वरुणायनमस्तेऽस्तुहरिवासनमोऽस्तुते॥
यावज्जन्मकृतंपाप मयाजन्मसुसप्तसु।
तन्मेरोगंचशोकंचमाकरीहन्तुसप्तमी॥
जननी सर्वभूतानांसप्तमी सप्तसप्तिके।
सर्वव्याधिहरेदेवि नमस्तेरविमण्डले॥

तत्पश्चात् दीपक को जल के ऊपर तैरा दें। फिर स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करें। इसके बाद चंदन से अष्टदल कमल बनायें। कमल के मध्य में शिव-पार्वती की स्थापना कर प्रणव-मंत्र से पूजा करें। कमल के आठ दलों में पूर्व से प्रारंभ करके भानु, रवि, विवस्वान्,भास्कर, सविता, अर्क, सहस्त्रकिरणतथा सर्वात्मा का पूजन करें। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र आदि उपचारों से विधिपूर्वक सूर्यदेव की पूजा करने के उपरान्त- स्वस्थानं गम्यताम्-यह कहकर विसर्जितकर दें। अन्त में ताम्र अथवा मिट्टी के पात्र में गुड और घी सहित तिलचूर्णतथा कान का आभूषण रखकर वह पात्र दुख-दुर्भाग्य के नाश की कामना से किसी आचार्य को दान दे दें। सूर्यनारायण से प्रार्थना करें सपुत्रपशुभृत्याय मेऽर्कोऽयंप्रीयताम्।

गुरु को वस्त्र, तिल आदि दक्षिणा में देकर अपनी साम‌र्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर व्रत को समाप्त करें। जो पुरुष उपर्युक्त विधि से अचला सप्तमी को स्नान करता है, उसे सम्पूर्ण माघ-स्नान का फल प्राप्त करता है। इस व्रत में एक समय नमकरहित(अलोना) खाना अथवा फलाहार किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अचलासप्तमीका व्रत करने पर सालभरके रविवारोंके व्रत का पुण्यफलप्राप्त हो जाता है।

अनुष्ठान: कमला-पुरुषोत्तमा-एकादशी व्रत

एकादशी के दिन वेदी को अक्षत से पूरित करें और सफेद वस्त्र से वेष्टित कर प्रसन्नता के साथ पूजन करें। चारों और केशव आदि नामों से वेदी को अंकित करें।

पूजा विधि:-
भगवान को पंचामृत से स्नान कराके स्थापित करें। गन्ध पुष्प, अक्षत आदि से संयुक्त और पवित्र जल से पूर्ण कुम्भ पर स्थापित कर, चतुर्भुजभगवान का लक्ष्मी जी के सहित आह्वान करें। सर्वतोभद्र मण्डल के देवताओं की पूजा कर स्थापित किए हुए कलश पर देव सानिध्य करके उसमें विष्णु का आह्वान करें। ॐभू: हे विष्णो!यहां बैठें, पूजा ग्रहण करें, अच्छी तरह प्रसन्न होकर वर का देने वाले हों। ओं भुव:प्रभु का आह्वान करता हूं। ओं स्व: प्रभु का आह्वान करता हूं। रुक्मिणी, जाम्बवती,सत्यभामा और कालिन्दी का दक्षिण और पश्चिमोत्तर दल में बीच में आह्वान कर; ईशानादि दिशाविभागमें शंख, चक्र, गदा और पद्म का आह्वान करें। उसके बारह पूर्व पत्रों में अनुक्रम से विमला, उत्कर्षिणी,ज्ञान, क्रिया, योगा प्रह्वा,सत्या:,ईशानाआदि देवियों को ग्रहों के साथ पद्म के मध्य में स्थापित करें। भगवान के आगे वेदिका पर गरुड़ की मूर्ति भी स्थापित करें एवं उसका आह्वान कर पूर्व आदि दिशाओं में क्रम से लोकपालोंको स्थापित करें।

इसके बाद पूर्व आदि दिशाओं के क्रम से नाम मन्त्रों से केशव आदि का आह्वान करें। केशव के लिए नमस्कार है, केशव का आह्वान करता हूं। केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, विधिक्रम,वामन, श्रीधर, हृषीकेश,पद्मनाभ, दामोदर-इन बारहों को शुक्ल एकादशी के दिन तथा संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युमन,अनिरुद्ध, पुरुषोत्तम, अधोक्षज,नरसिंह, अच्युत, जनार्दन, उपेन्द्र, हरि, श्रीकृष्ण इन्हें कृष्ण एकादशी के दिन इसी प्रकार आह्वान करें तदस्तु से उन्हें प्रतिष्ठित करें अतो देवा इस मंत्र से विष्णु भगवान तथा आवाहितदेवताओं को नाम मन्त्र से सोलह उपचारों से पूजें।आसन, पाद्य, अ‌र्घ्यआचमनीय, स्नान, वस्त्र, उपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप दीप, नैवेद्य, आरती और प्रदक्षिणा दें।

21 फ़रवरी 2011

हाईटेक गृहवाटिका प्रबंध

गृहवाटिका की रूपरेखा अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरह से बनाई जाती है घनी आबादी वाले शहरों में, जहाँ पूरे परिवार के लिये एक या 2 कमरों का फ़्लैट सुलभ होता है, वहां गमलों में ही सब्जियां व फूल उगाए जा सकते हैं जिन घरों या फ्लैटों में कम जगह है वहां गृह-वाटिकाओ में सब्जियों के साथ फलदार पौधे, हरियाली और फूल वाले पौधों को शामिल किया जा सकता है

जिस तरह ताल और लय के मेल से संगीत का प्रभाव बढ़ जाता है उसी प्रकार फलों, फूलों, सब्जियों और औषधीय पौधों के रंग व गंध की एक अच्छी योजना घरेलू बगिया की शोभा में चार चाँद लगा देती है जब कोई अतिथि या मकान मालिक इस छोटी सी बगिया में प्रवेश करता है तो फूलों, पत्तियों का रंगबिरंगा रूप उसे बरबस अपनी ओर खींच लेता है उन की मोहक भीनी गंध से वह ताजगी का अनुभव करता है चांदनी, मधुकामिनी, दिन का राजा, रात की रानी, विभिन्न रंगों वाले फूलों से अच्छादित बेगनवेलिया, गुलमोहर, अमलतास आदि के फूलों की अपनी ही शोभा है इन सभी के संयोजक हेतु निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है:
  • गृहवाटिका में सुनियोजित हरियाली अपनी अनोखी छटा दिखाती है. लॉन के चारों ओर मौसमी फलों की क्यारियाँ बनानी चाहिए जिन में मौसम के मुताबिक़ उन्नत एवं आकर्षक किस्म के पौधों को उगाना चाहिए। 
  • घर की बगिया में गुलाब की क्यारी का स्थान अवश्य होना चाहिए जिस में विभिन्न किस्मों एवं रंगों के गुलाब लगाने चाहिए
  • बगिया को आकर्षक एवं सुन्दर रखने के लिये रास्ते का होना जरूरी है. इस में रंगीन बजरी का प्रयोग करना चाहिए
  • रास्ते के दोनों तरफ पतली ईटों अथवा रंगीन पत्थरों का भी प्रयोग किया जा सकता है
  • वाटिका में इस्तेमाल किये गए गमलों में अलग-अलग रंग के फूलों वाले पौधे भी उगाए जाने चाहिए. इस से वाटिका कि खूबसूरती और अधिक बढ़ती है
  • घरेलू बगिया के प्रवेशद्वार को सुन्दर बनाने के लिये गहरे रंग के फूलों वाली लताओं का प्रयोग करना चाहिए
  • झरने को स्थान दे कर उस के आसपास का स्थान सुशोभित गमलों व विभिन्न आकारप्रकार व रंगों वाले पत्थरों से आकर्षक बनाया जा सकता है
  • गृहवाटिका में फौआरा अथवा ड्रिप (बूँदबूँद) भी लगाया जा सकता है. इस से पौधों को पानी उचित मात्रा में मिलेगा तथा पानी की काफी बचत होगी
  • लटकने वाली टोकरियों में भी अलग-अलग फूलों वाले पौधे उगाए जा सकते हैं
  • लौन अथवा हरियाली वाले क्षेत्र में सुन्दर मूर्तियाँ लगाने से गृहवाटिका की शोभा बढ़ती है

वाटिका नर्सरी प्रबंध
गृहवाटिका में नर्सरी का काफी महत्व है नर्सरी वह स्थान है जहाँ नियंत्रित और आदर्श दशाओं के तहत बीज बो कर पौधे तैयार किए जाते हैं मौसमी फूलों और सब्जियों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन की पौध सही समय पर तैयार कर ली गई हो तथा स्वस्थ हो

नर्सरी के लिए आदर्श स्थान का चयन
नर्सरी बनाने के लिये ऐसे स्थान का चयन करना चाहिए जो सभी तरह से आदर्श हो. स्थान के चुनाव के लिये निम्न बातों पर ध्यान देना जरूरी है :
  • नर्सरी का स्थान घर के पास ही होना चाहिए ताकि समय पर पौधों की उचित देखभाल की जा सके। 
  • स्थान खुला, धूपदार और बड़े पेड़ों की छाया से मुक्त होना चाहिए
  • सिंचाई के लिये पानी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पेडपौधों को सही मात्रा में पानी मिल सके
  • नर्सरी की मिट्टी का दोमट या बलुई दोमट होना अच्छा रहता है
  • तेज गर्मी व जाड़े में पौध सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए

पोषक तत्वों का उपयोग
पौधों को संतुलित मात्रा में पोषक तत्व जब नहीं मिल पाते हैं तो वे अपनी उचित वृद्धि कार पाने में असमर्थ हो जाते हैं पौधे कमजोर और पीले पड़ जात हैं इस प्रकार के लक्षण दिखाई देने पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश व पोषण मिश्रण के किसी घोल का पौध पर छिडकाव करना लाभदायक होगा जरूरत के मुताबिक़ सूक्ष्म तत्वों का भी छिडकाव कर देना चाहिए

वाटिका प्रबंध
घरेलू बगिया से च्छे एवं स्वस्थ फल, फूल, सब्जियां आदि प्राप्त करने के लिये हमेशा यह ध्यान रखना होगा कि उस का प्रबंध अच्छा हो इस से उत्पादन पर भी काफी असर पड़ता है. बगिया हमेशा साफ़ एवं सुन्दर हो, जो सब को आकर्षित करे
कुछ सब्जियों को सीचे बीज बो कर उचित दूरी पर लगाया जाता है इन के नाम हैं : मटर, गाजर, मूली, शलजम, पालक, मेथी, अदरक, बाकला, आलू आदि दूसरी ओर कुछ सब्जियों की पौध लगाई जाती है जैसे टमाटर, मिर्च, बैगन, फूलगोभी, बंदगोभी, ब्रोकली, प्याज, शिमला मिर्च आदि कुछ फूलों जैसे स्वीट पी, हालीहौक  को निर्धारित समय व दूरी पर बीज बो कर उगाया जाता है फलदार वृक्षों में भी पहले बीज या कलम/बडिंग से पौधे तैयार कर के वाटिका के उचित स्थान पर लगाते हैं
क्यारियों अथवा पेडपौधों के आसपास से समयसमय पर खरपतवार निकालते रहना आवश्यक है समय से निराईगुडाई करते रहना चाहिए, इस से पौधों को अच्छी वृद्धि तथा पैदावार अधिक मिलेगी
गृहवाटिकाओं में लगे बहुवर्षीय पौधों शोभाकारी झाड़ियों, फलवृक्षों (अंगूर, नीबू, आडू, सेब, आलूबुखारा आदि) की समयसमय पर काटछांट करनी पड़ती है बेतरतीब पनपी सभी शाखाओं और रोगग्रस्त टहनियों को काट देना चाहिए टहनियों को काटने के लिये सिकेटियर या आरी का इस्तेमाल करना चाहिए
कुछ पौधे वाटिका में ऐसे भी होते हैं जिन्हें सहारे की जरूरत होती है बेल वाली फसलों जैसे अंगूर, स्वीट पी, लौकी, खीरा, करेला, तोरई आदि में यदि सहारा दे कर पौधों की वृद्धि कराई जाए तो पौधों की बढ़वार अच्छी होती है तथा फल अच्छे व साफ़ मिलते हैं
गृहवाटिका संतुलित और सुन्दर तभी बन सकती है जब वह पूरी तरह से सुरक्षित हो यदि मकान के चारों ओर पक्की दीवार नहीं है तो कंटीले तार का प्रयोग कर वाटिका को घेर कर इतना सुरक्षित कर देना चाहिए कि आदमी व पशुओं की पहुँच से दूर हो

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