26 जुलाई 2011

प्रार्थना का सही अवसर

सुख में सुमिरन न किया, दुःख में किया याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।।              - संत कबीर

सुख में तो कभी याद किया नहीं और दुःख में याद करने लगे, कबीरदास कहते हैं की उस दास की प्रार्थना कौन सुने।

विमर्श - हमारे अन्दर प्रार्थना सदैव सुखी परिस्थितियों में ही उत्पन्न होती है, सुख के समय तो हमें इश्वर की याद ही नहीं आती। समस्या यह है की दुःख का स्वभाव परमात्मा के स्वभाव से बिलकुल मेल नहीं खाता  क्योंकि दुःख तो उससे ठीक विपरीत दशा है, फिर दुःख में इश्वर को इसलिए याद किया जाता है ताकि दुःख हट जाए यानी वह परमात्मा की याद नहीं है, सुख की याद है, सुख की आकांशा है। जब हम दुःख में इश्वर को पुकारते हैं तब उसे नहीं सुख को पुकारते हैं इसलिए जब सुख मिल जाता है तो इश्वर विस्मृत हो जाता है क्योंकि अब उसकी क्या जरूरत रही। सुख की आकांशा से प्रार्थना का कोई सम्बन्ध नहीं होता बल्कि सुख में की गयी प्रार्थना में ही परमात्मा की आकांशा होती है  और जब हम उसी के लिए प्रार्थना करते हैं तभी प्रार्थना सुनी जाती है, अन्यथा नहीं। कवि रहीम ने कहा है- 'बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न चून ' परमात्मा के द्वार पर जो बिना मांगे खडा हो जाता है उसे सब मिल जाता है, मोती बरस जाते हैं और जो भिखारी की तरह खडा होता है उसे कुछ नहीं मिलता। कहने का तात्पर्य यह है की प्रार्थना में मांग नहीं होना चाहिए क्योंकि मांग रहित धन्यवाद रूपी प्रार्थना ही इश्वर तक पहुँचती है।  दुखी व्यक्ति बिना मांगे प्रार्थना कर नहीं सकता और फिर दुखी अवस्था में हम सिकुड़ जाते हैं और परमात्मा है विस्तार, जो फैला हुआ है सब ओर इसलिए दुखी व्यक्ति और परमात्मा के बीच कोई तालमेल नहीं बैठता। हिन्दू संस्कृति में परमात्मा के लिए 'ब्रह्म' शब्द को चुना गया है  जिसका अर्थ होता है विस्तीर्ण; जो फैलता ही चला जाता है। सिर्फ सुखी अवस्था ही ऐसी होती है जिसमें हम थोड़ा फैलते हैं यानी बहुत ही छोटे अर्थों में हम परमात्मा जैसे हो जाते हैं। यही यह अवसर है जब प्रार्थना की जा सकती है या की जानी चाहिए क्योंकि इस संसार में सुख झलक है परमात्मा की और जब उसकी झलक मिले तभी पुकारना उचित है क्योंकि वह कहीं आसपास ही है। जब भी इस झलक से हम भरें यानी सुख और आनंद का अनुभव हो वही अवसर प्रार्थना करने का सही अवसर होता है।

तनुश्री तरूणसागरजी महाराज के अमृत वचन

*  वस्तुए तुम्हें छोड़ दें तो मौत है। तुम वस्तुओं को छोड़ दो तो मोक्ष है। जो बार बार आये वह मौत है। जो एक बार आए वह मोक्ष है। मौत भोगी को आती है। मोक्ष योगी को होता है। भोगी को मौत छोड़ती नहीं है, योगी को मौत छेड़ती नहीं है। पुराने वस्त्र(शरीर) उतार कर नए वस्त्र धारण करना मौत है। पुराने वस्त्र उतार फेंकना और फिर नए धारण न करना मोक्ष है। मौत को मौत आ जाना ही मोक्ष है। मोह का क्षय ही मौत है।

*  कई तरह के दान में एक रक्तदान भी है। रक्तदान एक पुण्य कार्य है। खून देने से कम नहीं होता, फिर बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही जैसे हम बाल काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं, हम नाखून काटते हैं और फिर बढ़ जाते हैं। कुए से पाने निकालते हैं और फिर बढ़ जाता । खून देने से तुम्हारा को कुछ घटता नहीं है हाँ, किसी मरते हुए को नई जिन्दगी जरूर मिल जाती है। और फिर यह भी सच है की जो देह में अनुरक्त है वह रक्त कैसे दे सकता है? रक्त पानी बने, इससे पहले उससे किसी की जिन्दगी बना दो। नदी का पानी सागर में जाकर खारा हो- इससे पहले इसे खेतों में पहुंचा दो। याद रखें जीते जी रक्तदान, जाते जाते देहदान, जाने के बाद नेत्रदान।

*  मेरा मानना है की सही मायने में देश के दो ही दुश्मन हैं; एक तो कामचोर और दूसरा रिश्वत खोर। अब राजनीति में शरीफ लोगों के लिए जगह घटती जा रही हैं। जो शरीफ होता है, वह नेता नहीं बन पाता और गलती से बन जाता है तो टिक नहीं पता। टिक भी जाता है तो केवल धृतराष्ट्र- की भूमिका निभा पाता है। अच्छे और सच्चे लोग एकांत वासी होते जा रहे हैं इसलिए बुरे और अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग सत्ता पर काबिज हो गए हैं।

*  संत और सैनिक को सोने मत देना। अगर ये सो गए तो समाज और देश का भाग्य सो जाएगा। पापी इंसान और भ्रष्ट नेता को जागने मत देना क्योंकि ये जाग गए तो समाज व देश का अमन चैन खो जाएगा। जिस देश का संत व सिपाही जागरूक और ईमानदार होगा वह देश कभी भी नष्ट-भ्रष्ट नहीं हो सकता। जागरूक संत और ईमानदार सिपाही ही देश को अमन चैन दे सकता है। संत सो जाए और सैनिक बेईमान हो जाए तो समाज व राष्ट्र - की शांति का भंग होना तय है।

* आँख बड़ी नालायक है। अनर्थों की जड़ मनुष्य की आँख ही है। काम आँख में पहले आता है, मन में बाद में। मन को पवित्र रखना है तो आँखों को संभालकर रखिये। आँख बिगडती है तो मन बिगड़ता है, मन बिगड़ता है तो वाणी बिगडती है। वाणी बिगडती है तो व्यवहार बिगड़ता है, व्यवहार बिगड़ता है तो पूरा जीवन बिगड़ जाता है। सीता को देख कर रावण की आँख बिगड़ी तो उसका मन बिगाड़ा गया। फिर वाणी बिगड़ी, फिर व्यवहार बिगड़ा, फिर रावण का जीवन ही बिगड़ गया। और तो क्या कहें रावण का नाम भी बिगड़ गया। हजारों साल गुजर गए पर किसी बाप ने अपने बेटे का नाम 'रावण' नहीं रखा।

धर्म परम्परा नहीं, परम है। धर्म आवरण नहीं, आचरण है। धर्म बला नहीं, जीने की कला है। धर्म क्रूरता नहीं, करूणा है। आज धर्म के नाम पर संसार में जो हत्याएं और युद्ध हो रहे हैं, वह धर्म नहीं, धर्म की लाश है और जब तक इस लाश को घर से बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक देश और दुनिया में शांति नहीं होगी। हिन्दुस्तान में 20 लाख देवी-देवता हैं जिनकी सभी लोग पूजा करते हैं। देवी-देवता सिर्फ पूजा के लिए नहीं है, वरन उनसे प्रेरणा भी लेनी चाहिए।

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