17 मार्च 2012

जेल भी बन सकती है कमाई का जरिया

आखिर हमें किराए पर क्या-क्या मिल सकता है? पुराने दिनों में हमें माकन, साइकिल या अन्य वाहन किरय पर मिल सकते थे। इसके बाद कपडे, शादी के परिधान, हवाई जहाज (क्रू सेवाओं समेत या बगैर क्रू) और यहाँ तक की भूर्ण को गर्भ में रखने के लिए कोख भी करिये पर उपलब्ध होने लगी। अब एक देश द्वारा अन्य देशों को जेल भी किराए पर देने की नई अवधारणा सामने आई है।
  हालाकि, अपने यहाँ अतिरिक्त पड़े किसी सामान को किराए पर देकर आय कमाना कदाचित ही श्रेष्ठ अवधारणा मानी जाए, लेकिन नीदरलैंड्स ने किराए जैसे शब्द को पुनर्परिभाषित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। इसके आधिकारिक तौर पर बेल्जियम जैसे देश को अपनी कौल्कोथारिया किराए पर देने का फैसला किया है, जो अपने यहाँ अपराधियों को कैद में रखें के लिए जगह की कमी से जूझ रहा है। अपने यहाँ बड़ी मात्रा में अतिरिक्त कालकोठरियों को देखते हुए नीदरलैंड्स ने दक्षिणी इलाके में स्थित डच सिटी आँफ टिलबर्ग की जेल में 500 बेल्जियम कैदियों को रखने पर सहमती जताई है। इसके बदले में बेल्जियम उसे तीन साल के अनुबंध के तहत सालाना 30 मिलियम यूरो की राशि देगा।
  हम इससे क्या सीख ले सकते हैं? यदि हम कुछ सीखें नहीं, तो भी कम से कम इस विचार को कांपी कर ही सकते हैं। देश में ऐसे सैकड़ों गाँव और छोटे कसबे हैं जहाँ बड़ी मात्रा में खाली जमीन है। बिल्डर लंबी सिर्फ बड़े-बड़े आकार की कालोनियां बनाती है। आखिर अंतरराष्ट्रीय स्टार के जेल बनाकर इन्हें मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता की जेल अथांरिटीज को किराए पर क्यों नहीं दिया जा सकता? देखा जाए तो सम्बंधित राज्य सरकारें अपने यहाँ अंदरूनी इलाकों में इस तरह के बड़ी जेलें बना सकती हैं और विभिन्न केन्द्रीय कारागारों की और से कब्जे में राखी गयी जमीनों को इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए मुक्त किया जा सकता है। इसके लिए गाँवों में व्यापक भूमि आधार चाहिए, जो हमारे देश में कोई समस्या नहीं है। एक सुदृढ़ दीर्घकालीन बिजनेस प्लान और राजनीतिक इच्छाशक्ति के जरिये ऐसा हो सकता है। फिलहाल जेल की कम से कम नब्बे प्रतिशत जगह ऐसे लोगों से भरी रहती है, जिनके बारे में तमाम कोर्ट फैसला सुना चुके हैं और जो सिर्फ अपनी सजा काट रहे हैं। सिर्फ दस प्रतिशत विचारधीन कैदियों की सुनवाई बड़े शहरों की अदालतों में होती है। यदि इन नब्बे प्रतिशत कैदियों को कोर्ट के आदेश के बाद स्थानांतरित कर दिया जाए तो इन भीडभाड भरे शहरों में काफी जगह निकल सकती है और इससे ग्रामें जनता के लिए भी बड़ी मात्रा में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

15 मार्च 2012

ग्राहक की भावनाओं का करें सम्मान

आपको फिल्म 'सारांश' में अनुपम खेर का मर्मस्पर्शी अभिनय याद ही होगा, जिसमें उन्होंने युवा बेटे के असामयिक निधन से टूट चुके पिता की भूमिका निभाई थी। फिल्म में अनुपम का किरदार मुख्यमंत्री के सामने दुखी होते हुए कहता है की वह कोई वीडियो या रेफ्रिजरेटर नहीं मांग रहा है, बल्कि अपने मृत बेटे की अस्थियाँ पाना चाहता है।
   मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में रहने वाले सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी एम.एस. श्रीवास्तव का भी कुछ ऐसा ही हाल है। वह अपने बच्चों के सोनी इरिक्सन मोबाइल T -100 की बैटरी बदलवाना चाहते थे, जिसे सात साल पहले खरीदा गया था। उनके लिए यह उपकरण अपने प्रिय बच्चों की आख़िरी निशानी है, जिनकी एक दुखद दुर्घटना में अकाल मौत हो गयी। एम.एस. श्रीवास्तव की दो बेटियाँ और एक बेटा था। जून 2003 में उनकी बेटी ने अपने भाई के लिए एक सोनी मोबाइल हैंडसेट खरीदा। श्रीवास्तव की बड़ी बेटी, जो शादी के बाद सूरत में सैटल हो चुकी थी, ने जुलाई 2004 में उन्हें अपने घर बुलाया। श्रीवास्तव के भाई का लड़का भी उनके साथ वहां गया।
  श्रीवास्तव के दामाद के साथ चारों बच्चे सूरत के निकट सुवाई बीच पर पिकनिक मनाने के लिए गए। सुर्भाग्य से नियती को कुछ और ही मंजूर था। श्रीवास्तव खानदान के चारों बच्चों की डूबने से मौत हो गई, जबकि उनके दामाद को हेलीकाप्टर की मदद से बचा लिया गया। बच्चों की मौत से पूरी तरह टूट चुके श्रीवास्तव इस मोबाइल के साथ घर लौटे, जो बच्चों और उनके माता-पिता के बीच साझा कड़ी था। जब यह फोन बजता, श्रीवास्तव को यूं महसूस होता मानों उनके बच्चे उन्हें पुकार कर रहे हैं।
   श्रीवास्तव ने मोबाइल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। हालांकि पिछले कुछ महीनों से इसकी बैटरी दागा देने लगी थी। उन्होंने बाजार में जगह-जगह इसकी नई बैटरी तलाशी। कंपनी का यह मोबाइल सेट चलन से बाहर हो चुका था, लिहाजा कहीं भी इसकी बैटरी उपलब्ध नहीं थी।
  लेकिन श्रीवास्तव भावनात्मक कारणों की वजह से इसे खुद से अलग नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कंपनी के सर्वित सेंटर से कई बार संपर्क किया, इसके बावजूद उन्हें बैटरी नहीं मिल सकी। आखिरकार उन्होंने फर्म के अध्यक्ष बर्ट नोर्डबर्ग को अमेरिका में एक इमेल भेजा। इस इमेल में उन्होंने अपने मरहूम बच्चों के साथ अपने 'पाक रिश्ते' का मर्मस्पर्शी अंदाज में जिक्र किया था। ईमेल भेजने के कुछ ही दिन बाद इस कंपनी को भारतीय इकाई के मुखिया और कस्टमर रिलेशन डिपार्टमेंट द्वारा उन्हें सूचित किया गया की बैटरी की वैश्विक स्तर पर खोज की जा रही है और वे जल्द ही इसकी उपलब्धता के बारे में उन्हें जानकारी देंगें। एक हफ्ते बाद उन्हें बताया गया की सिंगापुर में इसकी बैटरी मिल गई है और इसे दिल्ली लाया जा रहा है।
  दो दिन बाद उन्हें सूचित किया गया की बैटरी दिल्ली पहुँच चुकी है और अगले तीन दिनों में इसे उज्जैन में उनके पते पर कोरियर कर दिया गया। ईमेल भेजने से लेकर रिल्प्लेस्मेंट बैटरी के उन तक पहुँचने तक यह पूरा मामला 22 दिनों में निपट गया। हालांकि उन्हें अपने इस अथक प्रयास के लिए एक भी पैसा नहीं चुकाना पडा।

13 मार्च 2012

पारदर्शिता बहुत जरूरी

हमारा सामाजिक जीवन जो आरम्भ होता है, जन्म लेते हैं हम, समाज में रहते हैं। कुछ सिखाया जाता है समाज में कैसे रहना, पारदर्शिता बहुत जरूरी है। आपका व्यक्तित्व ऐसा हो, जैसे लाइब्रेरी की टेबल पर पडा हुआ अखबार। कोई भी पढ़ ले कोई शक की गुंजाइश न रहे। महाभारत में जितने भी पात्र आए, उनके जीवन की पारदर्शिता खंडित हो चुकी थी। पिता पुत्र से रहस्य बनाया हुआ था। माँ-बाप बच्चों को जानकारी नहीं दे रहे थे। भाई, भाई से छुपा रहा था। मित्र, मित्र से षड़यंत्र कर रहा था। पारदर्शिता नहीं थी तो कितनी बड़ी कीमत चुकाना पडी। भागवत में भी चर्चा आती है की दुर्योधन, दुर्योधन क्यों बन गया। इसलिय बन गया क्योंकि जब पैदा हुआ तो उसके मन में जितने प्रश्न थे उसके उत्तर उनको दिए ही नहीं गए। जब उसने होश सम्भाला तो सबसे पहले उसने ये पूछा की मेरी माँ इस तरह से अंधी क्यों है? कोई समझ में आता है की प्रकृति ने किसी को अंधा कर दिया पर इसकी आँखों पर पट्टी क्यों बांधी। मुझको जवाब चाहिए और उसको राजमहल में कोई जवाब नहीं देता था, क्योंकि सब जानते थे की गांधारी ने अपने श्वसुर भीष्म के कारण पट्टी बांधी थी। क्योंकि भीष्म को चिंता थी की राजगद्दी कौन संभालेगा और ध्रतराष्ट्र अंधा था तो उन्होंने आदेश दिया था गांधारी के पिता को की आपकी पुत्री से मेरे इस पुत्र का विवाह करना होगा। विवाह दबाव में कराया गया और दबाव में दाम्पत्य आरम्भ होता हो तो फिर, जब गांधारी आई और पता लगा की भीष्म की आज्ञा से यह हुआ। गांधारी उस समय की सबसे योग्य युवती थी। भीष्म ने सोचा, योग्य युवती अंधे के साथ बांधेंगे तो गृहस्थी, राज, सिंहासन अच्छा चलेगा। जैसे ही गांधारी को पता लगा की मेरा पति अंधा है, तो उसने संकल्प लिया की वह आजीवन स्वैच्छिक अन्धत्त्व स्वीकार करेगी, उसने आँख पर पट्टी बाँध ली। अब आप बताइये, जिस घर में पिता पहले से अंधा हो और माँ आए और वो भी अंधी हो जाए तो फिर उस घर में कौरवों का जन्म होता है, जहाँ माँ-बाप दोनों पट्टी बाँध लें मोहांध की बच्चों के लालन-पालन के प्रति तो उस घर में कौरव पैदा हो जाएंगे। होना तो यह था की इनके पास नेत्र नहीं हैं तो मैं देखती रहूँ। ये प्रश्न हमेशा दुर्योधन के मन में खडा होता था की मेरी माँ ने ये मूर्खता क्यों की। चुनौती देनी थी तो खुलकर देते और गांधारी की चुनौती दुर्योधन में उतर गयी और दुर्योधन ने बगावत कर दी भीष्म के खिलाफ।

12 मार्च 2012

कौन?

कौन नशीले नैनों को
मधुशाला कहता होगा,
कौन छलकते होठों को
हालाप्याला कहता होगा?

कौन गुलाबी गालों को
गुंचा गुलाब कहता होगा,
कौन तुम्हारे मुखड़े को
जन्नत का ख्वाब कहता होगा?

किस को स्याह घटाओं में
एक आफताब दीखता होगा,
ए माहताब! हो कर बेताब
फिर लाजवाब कहता होगा।

                                       - सुनीति रावत       

निष्काम कर्मयोग को जानें

निष्काम कर्मयोग क्या है? कौन से काम करने लायक हैं और कौन से करने लायक नहीं हैं? जिन लोगों ने उचित काम किए, उनको क्या परिणाम मिला और जो अनुचित मार्ग से गए उनको क्या परिणाम मिला।
  तीसरी बात इसमें जीवन का व्यवहार है जो बहुत आवश्यक है। आज जिन प्रसंगों में हम प्रवेश कर रहे हैं, इनमें  जीवन के व्यवहार के अनेक पक्ष आएँगे। हम जिस तरह का जीवन जीते हैं, इसमें चार तरह के व्यवहार होना हैं। हमारा पहला जीवन होता है सामाजिक, दूसरा व्यावसायिक व्यावहारिक जीवन कह लें प्रोफेशन, तीसरी बात हमारा पारिवारिक जीवन और चौथी हमारा निजी जीवन। हमारा सामाजिक जीवन जो होता है वह पारदर्शिता पर टिका है। व्यावसायिक जीवन परिश्रम पर टिका है। पारिवारिक जीवन प्रेम पर टिका है और निजी जीवन पवित्रता पर टिका है। ये चार बातें ध्यान रखियेगा। हमारे जीवन के ये चार हिस्से भागवत के प्रसंगों में बार-बार झलकते मिलेंगे। परिवार में, समाज में, निजी जीवन में, व्यवसाय में कैसे रहें, अनेक प्रसंग इसमें आने वाले हैं। पहली बात हमारा महत्वपूर्ण जीवन जो भागवत के प्रसंग से अब हम जानने का प्रयास करेंगे। हमारे व्यावसायिक जीवन में परिश्रम हो, लेकिन परिश्रम के अर्थ समझिएगा। परिश्रम नशा न बन जाए। परिश्रम बीमारी न बन जाए कितना परिश्रम करते हैं लोग आज? पर परिश्रम होना चाहिये तन का और विश्राम मिलना चाहिये मन को। होता उलटा है। जितना परिश्रम हम तन से करते हैं, उससे तिगुना परिश्रम मन करने लगता है। इससे आदमी या तो थक जाता है, चिडचिडा हो जाता है, बैचेन हो जाता है, बीमार हो जाता है। परिश्रम का अर्थ समझिये। आज के परिश्रम ने इतना दौड़ा दिया है आदमी को बाहर से और भीतर से की उसकी जितनी भी प्रतिभा थी वह सब प्रचंडता में बदल गई। उसकी योग्यता थी वह छीना-झपटी में बदल गई और आदमी आक्रामक हो गया, जिसको निवेदक होना था। विनम्रता ढूंढें नहीं मिलाती। तो इस परिश्रम को समझिये। देह खूब परिश्रम करे, देह के तीव्रता होनी चाहिये। लेकिन मन उसी क्षण बहुत विश्राम में रहे तब आप इस परिश्रम का आनंद उठा पायेंगे। इसी परिश्रम को पूजा कहा गया है।

                                                                                                    - पं. विजय शंकर मेहता 

11 मार्च 2012

जीवन के लिए जरूरी पवित्र स्वभाव

मित्र के बीच का अपनापन कहाँ चला गया, काका-भतीजे के एक साथ नहीं बैठे, मित्र-मित्र एक-दूसरे पर संदेह करते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है की पति-पत्नी के बीच का प्रेम अनुराग समाप्त हो गया। ये परिवार ठीक नहीं हैं। ये सब करने के लिए प्रयास करना पड रहा है। जो स्वयं होना चाहिए आदमी को प्रयास करना पड रहा है की मैं उससे प्रेम करूं, मैंने उससे विवाह किया है तो मेरे जीवनसाथी के प्रति स्नेह प्रदर्शित करूं। वह तो स्वभाव का विषय है और आदमी के व्यवहार में उतर गया। बार-बार भागवत चेतावनी दे रहा है। मैं आपको फिर आगाह कर रहा हूँ, भागवत स्वभाव का विषय है। इसे केवल व्यवहार से न सुन लीजिये। जब आप बैठे, भागवत सुनें तो अपने भीतर स्थापित करीए और स्वयं भी स्थापित होइए।
  अंतिम बात, आपका निजी जीवन पवित्रता पर टिकेगा। हर एक का निजी जीवन होता है। कितने ही सार्वजनिक, कितने सामाजिक और पारिवारिक हो जाएं, पर आपका जो निजीपन है, निजी जीवन है, आप ही जानते हैं और निजी जीवन में पवित्रता बनाए रखियेगा। पवित्रता परमात्मा की पहली पसंद है। परमात्मा हमारे जीवन में तभी उतरेंगे जब हमारा निजी जीवन पवित्र होगा और बड़े अफसोस की बात है की आज बड़े-बड़े लोगों का एकांत दुर्गन्ध मार रहा है, हम लोग समाज में रहते हैं, बहुत सुशील, सभी आचरणशील और बहुत ही भद्र नजर आते हैं। पर अपने कलेजे पर हाथ रख कर देखिये। जैसे ही हम एकांत में होते हैं, अपने चिंतन में, अपने आचरण में पशु से भी अधिक पतित हो जाते हैं।

                                                                                                 - पं. विजय शंकर मेहता

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