17 अप्रैल 2010

प्रार्थना में होती है, बड़ी शक्ति

कहते हैं प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है, इससे व्यक्ति अपने उन कार्यों को भी सिद्ध कर लेता है, जो उनको असंभव दिखाई देते हैं। कुछ यही मानना है आज की युवतियों का। जो पढ़ाई-लिखाई में कई व्यस्तताओं के बावजूद भी रोज शाम को मंदिरों में दीयाबत्ती करने के लिए जाती हैं। कोई इसे हिंदू समाज की परंपरा बता रहा है तो कोई प्रतिकूल ग्रहों की शांति के लिए आवश्यक उपाय। मंदिरों में अक्सर सूर्यास्त के बाद गोरज मुहूर्त में पीपल के वृक्ष व भगवान की मूरत के आगे युवतियों को दीप जलाते देखा जा सकता है।

श्रद्धास्वरूप जलाती हैं दीपक
:- ग्रहों की शांति के लिए केले व बरगद के वृक्ष तले दीप जलाने से जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है। कुछ यही मानना है बीएससी की छात्रा विमलेश का। वे बताती हैं कि भले ही पूरा दिन कॉलेज में निकल जाता है और शाम को आकर घर का काम भी करना प़ड़ता है, लेकिन इतनी व्यस्तताओं के बावजूद भी अपने जीवन को शांत व सुखमय करने के लिए ईश्वर पर एक श्रद्धा होती है। यही श्रद्धास्वरूप दीपक हम प्रतिदिन शाम को मंदिर में लगाने जाते हैं। और परीक्षा के दिनों में एक हौंसला रहता है।

परमात्मा को पाने का माध्यम :- अपने जीवन में खुशहाली व ग्रहों की शांति के लिए लगातार प्रयास किए जाते हैं कि उनसे बचाव हो। इसके लिए हम कभी पीपल के पे़ड़ के नीचे दीपक जलाते हैं तो कभी साँझ होते ही मंदिर में दियाबत्ती करते हैं। क्योंकि जीवन में सफलता के लिए भगवान का साथ होना जरूरी है। उस परमात्मा का साथ पाने के लिए व उसे मनाने के लिए दीप जलाना एक माध्यम होता है, तभी तो हम दीप जलाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अर्जी लगाकर ईश्वर को प्रसन्न करते हैं। यह कहना है इंटीरियर डिजाइनर सरगम का।

शुभ होता है दीपक जलाना :- जब परीक्षा का समय आता है तो याद आता है भगवान, जिससे हम मन्नते माँगते हैं कि भगवान हमें परीक्षा में पास करा दो। पाँच सोमवार आपके दर पर दीपक जलाएँगे। कुछ इसी आस्था के साथ शुरू हो जाता है मंदिर में दीप जलाने का सिलसिला। जो धीरे-धीरे हमारी दैनिक दिनचर्या में शामिल हो जाता है। ग्रहों से होने वाले अनिष्ट के निवारण के लिए घी या तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है।

परंपरा का निर्वहन :- दीपक जलाने की महत्वता बताते हुए प्रीति ने कहा कि ये परंपरा हिंदू समाज में वर्षों से चली आई है। हम तो बस इसका निर्वहन कर रहे हैं। चूंकि हमारे समाज में स्त्री द्वारा पीपल के पे़ड़ पर या भगवान के मंदिर में दीपक जलाना शुभ माना जाता है, इसलिए प़ढ़ाई-लिखाई में चाहे जितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, हम मंदिर में दीपक जलाना नहीं भूलते। चूंकि यह तो हमारे परिवार द्वारा दिए गए संस्कार व हमारे भारतवर्ष की संस्कृति है।

ग्रहों की शांति के लिए जरूरी :- राशियों पर ग्रहों का प्रभाव चलता ही रहता है, जिसमें शनि को अनिष्टकारी ग्रह माना गया है। इस ग्रह से प्रभावित राशि वाले लोगों का परेशानियों से चोली-दामन का साथ रहता है। अन्य ग्रह भी कभी-कभी अपना प्रभाव राशियों पर दिखाते हैं, लेकिन ग्रहों की शांति व उनमें अनुकूलता बनाए रखने के लिए प्रभावित लोगों को मंदिर या पीपल के वृक्ष के नीचे घी या तेल का दीपक अवश्य जलाना चाहिए।

नागेश्वर हरते हैं संकट और पीडा

भगवान शिव का यह ज्योतिर्लिङ्ग गुजरात राज्य में जामनगर जिले के नागेश्वर गांव में है। इस ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन व पूजन का अपना धार्मिक महत्व है। मंदिर में प्राय: बड़ी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं। इस ज्योतिर्लिंङ्ग के संबंध में भी मत-मतांतर हैं। कुछ लोगों का मानना है महाराष्ट्र राज्य के हिंगोली जिले में स्थित औढ़ नागनाथ का ज्योतिर्लिंङ्ग सही है। इसके अलावा कुछ लोगों का विश्वास है कि उत्तरांचल राज्य के अल्मोड़ा जिले का जागेश्वर ज्योतिर्लिंङ्ग ही बारह ज्योतिर्लिंङ्ग में से एक है। कथा-नागेश ज्योतिर्लिंङ्ग की भी दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं एक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में सुप्रिय नाम का एक वैश्य था। वह भगवान शिव का भक्त था। एक बार वह नाव में सवार होकर जा रहा था। तब दारुक नामक राक्षस ने नाव में सवार सभी लोगों को बंदी बनाकर एक कारागार में डाल दिया। सुप्रिय कारागार में भी शिव भक्ति करता रहा। कहते हैं कि शिव प्रसन्न होकर उस कारागार में ही एक ऊंचे स्थान पर ज्योतिर्लिंङ्ग रूप में प्रकट हुए और सुप्रिय को पशुपातास्त्र प्रदान किया। इस अस्त्र से दारुक व अन्य राक्षसों को उसने मार डाला। शिव तभी से यहां नागेश ज्योतिर्लिंङ्ग के रूप में स्थापित हुए। दूसरी कथा यह है कि दारुक नामक एक राक्षसी थी। वह माता पार्वती की सेवा करती थी। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर पार्वती ने उसे अपना निवास स्थान इच्छानुसार कहीं भी ले जाने का वर दिया। इसके बाद वह लोगों को सताने लगी। एक दिन शिव भक्त वैश्व को दारुक ने मारना चाहा। तभी शिव वहां प्रकट हुए और दारुक का अंत कर दिया। कहते हैं कि अपने भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए शिव ज्योतिर्लिंङ्ग के रूप में विराजमान हुए। भगवान का दशम अवतार नागेश्वर नाम से प्रसिद्ध है, जो अपने भक्तजनों को अर्थ और दुष्टजनों को दंड देने के लिए ही प्रकट हुए थे। इस अवतार में शिव ने दारुक दैत्य का वध कर सुप्रिय नाम वाले अपने परम भक्त एक वैश्य की रक्षा की थी।महत्वकहते हैं कि नागेश ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन व पूजन से तीनों लोकों की कामनाएं पूरी होती हैं। इसका उल्लेख शिवपुराण में भी है। दर्शनार्थियों के सभी दु:ख दूर होते हैं और उसे सुख-समृद्धि मिलती है। केवल दर्शन मात्र से ही पापों से छुटकारा मिल जाता है।कब जाएं -जामनगर स्थित ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन व पूजन करने के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय अनुकूल रहता है।पहुंच के संसाधन -नागेश्वर मंदिर तक आप मुख्य रूप से सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं।बस सेवा- मंदिर तक पहुंचने के लिए बस सुविधा आसानी से उपलब्ध है।रेल सेवा- मंदिर से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन द्वारका है जहां से मंदिर की दूरी करीब २० किमी है। बस या कार से आप वहां पहुंच सकते हैं।वायु सेवा- जामनगर तक आपको वायु सेवा मिल सकती है। यहां हवाई अड्डा है जो द्वारका से लगभग १४५ किमी की दूरी पर है। यह मुंबई व अहमदाबाद से जुड़ा है।अन्य दर्शनीय स्थल- यहां स्थित अन्य दर्शनीय स्थानों में गोमती द्वारका, भेंट द्वारका, रणछोरजी का मंदिर, गोपी तालाब, श्रीकृष्ण महल, शारदा मठ आदि प्रमुख है । औढ़ा नागनाथ यदि तीर्थयात्री औढ़ा नागनाथ ज्योतिर्लिंङ्ग के दर्शन करना चाहते हैं तो अक्टूबर से मार्च माह के बीच जाएं। यह समय मौसम के मान से अच्छा रहता है।

मंगल ने बढ़ाया हनुमान का बल

रामभक्त बजरंग बली (हनुमान) का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। वैसे तो हनुमान का जन्मदिवस वर्ष में दो बार मनाया जाता है, उत्तर भारत में कार्तिक चतुर्दर्शी व दक्षिण भारत में चैत्र पूर्णिमा को। आपकी जन्मकुण्डली का विवरण कहीं नहीं मिलता है, लेकिन भारत के महान ज्योतिषी स्व. पं. सूर्यनारायण व्यास की कुण्डली संग्रह से कल्पना द्वारा बनाई गई से उद्घृत है।
आपने तुला का सूर्य बताया है सो यह कार्तिक में ही आता है। और हनुमान की राशि कर्क बताई है लेकिन चतुर्दशी के दिन चन्द्रमा कन्या में ही रहता है, कर्क में किसी भी सूरत में नहीं होगा। हनुमान पवन पुत्र हनुमान के नाम से विख्यात, सो आपकी कन्या राशि बनती है क्योंकि अमावस्या के दिन सूर्य-चन्द्र साथ होते हैं इस हिसाब से चन्द्र कन्या में ही होना चाहिए।

आइ जानें हनुमान किन ग्रहों से प्रभावित है :- बजरंग बली के लग्न में मेष का मंगल जो कि अष्टमेश भी है, ऐसे जातक अत्यंत शूरवीर, पराक्रमी और साहस से भरपूर होते है। अतः आप महापराक्रमी, बलशाली और अजर-अमर हैं। मंगल की नीच दृष्टि चतुर्थ भाव पर पड़ने से आपको पारिवारिक सुख नहीं है। अतः रावण की लंका जलाने के बाद जब समुद्र से जा रहे थे उस समय आपके पसीने की समुद्र में गिरी एक बूँद को एक मछली ने पी लिया, जिसके परिणामस्वरूप उस मछली को मकरध्वज नाम का पुत्र हुआ था। कन्या राशि होने और मीन राशि पर सप्तम दृष्टि पड़ने से ही मीन यानी मछली को पुत्र हुआ। हनुमान भगवान शिव के अंश माने जाते है। सप्तम पत्नी भाव का स्वामी शुक्र नीच का होकर षष्ट भाव में होने से व सप्तम में नीच का सूर्य भी दाम्पत्य जीवन में अवरोध का कारण रहा और इसी कारण ये आजीवन ब्रह्मचारी रहे। पिता भाव दशम में शनि स्वराशि का होने से इनके पिता यानी भगवान शिवजी अजर-अमर है। ज्ञानवान, धर्मज्ञ, सेवाभावी और वचन के पक्के होना यह सब भाग्येश गुरु की ही देन है। और यही कारण है कि द्वापर युग में महापराक्रमी भीम को वचन दिया था कि मैं तुम्हारी विजय पताका पर सुमेरु पर्वत के साथ विराजमान होऊँगा। गुरु का पंचम में होना और भाग्य धर्म भाव पर स्वदृष्टि तथा कन्या राशि के साथ राम की नाम राशि तुला का स्वामी बुध के साथ है, जो षष्ट भाव में है यही कारण भी शत्रुओं के नाश का कारण बनता है। इसी वजह से भगवान राम के अनन्य भक्त होने का श्रेय भी हनुमान को जाता है। चूँकि शुक्र-बुध के साथ राहु भी है जो प्रबल रूप से षष्ट भाव में होने से शत्रुहंता बनता है। अत: बजरंग बली का नाम ही शत्रुओं का काल है। भूत-पिशाच भी इनके नाम स्मरण से निकट नहीं आते। जो भी भक्त हनुमान चालीसा का पाठ करता है, उसके सारे कष्ट मिट जाते हैं। हनुमान जयंती के दिन बजरंग बली को सिंदूर लगाया जाता है व चोला चढ़ाया जाता है। साथ ही व्रत भी रख सकते हैं। रामचरित मानस का पाठ, हनुमान चालीसा एवं हनुमान मंत्रों का प्रयोग विशेष फलदायी है।

कुछ कहती है हथेली की रेखाए

जी हाँ, हमारी हथेली में हृदय रेखा का अपना विशिष्ट स्थान है, जिससे हृदय रेखा को देखा-जाना जा सकता है। यह रेखा अधिकांश विवाह रेखा यानि सबसे छोटी अँगुली के लगभग एक इंच नीचे से निकल कर किसी क्षेत्र पर जा सकती है व किन्हीं भी रेखाओं से इनका संबंध हो सकता है। इसकी समाप्ति स्थान मुख्यतः गुरु पर्वत यानि तर्जनी अंगुली के नीचे होता है, लेकिन कभी-कभी इसका अंत शनि पर्वत या सूर्य पर्वत पर ही हो जाता है। किसी-किसी के हाथ में ये रेखा होती ही नहीं और किसी- किसी की हथेली में इस रेखा का मिलन मस्तिष्क रेखा पर होता है। तो आइए जाने क्या कहती है हमारी हृदय रेखा-

* हृदय रेखा अपने उद्गम स्थान से निकल कर गुरु पर्वत तक जा पहुँचे तो ऐसा जातक धार्मिक, न्यायाधीश, प्रोफेसर, धर्म का ज्ञाता, पुजारी, राजनेता होकर सदैव प्रसन्न रहने वाला होगा। हाँ यह स्पष्ट व कहीं से भी कटी या जंजीरदार नहीं होना चाहिए।

* यदि हृदय रेखा का कहीं से कटा होना, फिर आगे बढ़ना उस जातक को हृदय से संबंधित विकार या अन्य कष्ट जैसे प्रेम में आघात लगना, झेलनेपड़ते हैं।

* हृदय रेखा यदि शनि पर्वत पर मुड़ जाए तो ऐसा जातक या तो बहुत निर्दयी होगा या बहुत ही दयावान-परोपकारी हो सकता है, क्योंकि शनि मोक्ष का भी कारक है।

* हृदय रेखा का मिलाप यदि मस्तक रेखा से हो जाए तो ऐसा व्यक्ति सिर्फ अपने मन की ही करता है, दूसरों की बातों पर ध्यान नहीं देता।

* हृदय रेखा का न होना उस जातक को कठोर बना देता है। उसके मन में दया का भाव ही नहीं होता।

* हृदय रेखा जंजीर के समान हो तो वह व्यक्ति कपटी होता है, मन की बात किसी को भी नहीं बताता।

* हृदय रेखा पर काला तिल होना उस जातक के लिए अनिष्ठकारी होता है। ऐसा जातक निश्चित ही कलंकित होता है।

* हृदय रेखा पर द्वीप का चिह्न होना ही उसे बार-बार धोखे दिलाता है।

* हृदय रेखा पर वृत्त का चिह्न हो तो उसका मन अत्याधित कमजोर होगा।

* हृदय रेखा के मध्य गुच्छा जैसे कोई चिह्न दिखाई दे तो वह जातक घमंडी होता है।

* गुरु पर्वत के नीच पहुँचकर कई शाखाएँ हो तो वह जातक शक्ति संपन्न व भाग्यशाली होगा।

* बहुत पतली हृदय रेखा या बहुत गहरी लाल रंग की हो तो वह जातक दुर्भाग्यशाली व कठोर होगा।

* सामान्य से अधिक चौड़ी रेखा हो तो वायु विकार से ग्रस्त रहता है व उच्च रक्तचाप भी होता है।

* शुक्र पर्वत से निकल कर कोई रेखा हृदय रेखा से जा मिले तो वह जातक अत्यधिक भोगी होगा।

* चंद्र पर्वत से निकल कर हृदय रेखा पर जा पहुँचे तो उस जातक को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ होता है।

किस दिशा में भाग्य चमकेगा ( In which way fortune shine )

कई बार व्यक्ति जिस स्थान पर जन्म लेता है वहाँ उसकी प्रोग्रेस नहीं हो पाती मगर उस प्लेस से दूर जाते ही उसकी प्रोग्रेस होने लगती है, असेट्‍स भी बनने लगते हैं। इसे जानने के लिए हॉरोस्कोप देखना जरूरी है। यदि धन का आगमन देखना हो तो 'इलेवन्थ हाउस' में जो राशि होती है, उसके अनुसार लाभ व प्रोग्रेस की दिशा तय की जाती है। यदि प्रोग्रेस, जॉब ‍आदि के लिए माइग्रेट करना हो तो नवम-दशम हाउस देखे जाते हैं।

* राशियों के अनुसार देखें तो मेष, सिंह, धनु पूर्व दिशा को दर्शाते हैं।

* वृषभ, कन्या, मकर ये ‍दक्षिण दिशा को दिखाते हैं।

* मिथुन, तुला, कुंभ पश्चिम को दिखाते हैं।

* कर्क, वृश्चिक, मीन की दिशा उत्तर होती है।

ग्रहों की दिशाएँ :-

* ग्रहों में सूर्य ईस्ट का, चंद्र नॉर्थ-वेस्ट (वायव्य) का, मंगल साउथ का, बुध नॉर्थ का, गुरु नॉर्थ-ईस्ट का, शुक्र साउथ ईस्ट का, शनि वेस्ट का, राहु-केतु साउथ-वेस्ट का स्वामी है। हॉरोस्कोप में रूलिंग प्लेनेट की (मनुष्य ग्रह) की दिशा के अनुसार भी भाग्योदय या धनलाभ की दिशा को जाना जा सकता है।

काला तिल का होना शुभ ( Black sesame auspicious )

मुखड़े पर काला-काला तिल चेहरे की सुंदरता बढ़ा देता है। आइए, जानते हैं कि चेहरे पर या शरीर के किसी भी भाग पर तिल का क्या अर्थ है। तिल के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग परिणाम होते हैं। तिल काला व कत्थई रंग का होता है, काले तिल का गाल पर होना या ऊपरी अधर पर होना जहाँ सुंदरता में चार चाँद लगा देता है, वहीं यह कामुकता का प्रतीक भी बन जाता है। ऊपरी अधर पर तिल व्यक्ति को कामुक बनाने वाला होता है, उसी प्रकार निचले होंठ पर तिल दरिद्रता का सूचक होता है।

- दोनों भौंहों के मध्य तिल हो तो एसा जातक परोपकारी और उदार होगा।

- सिर के राइट साइड में पाया जाने वाल तिल समाज में मान-प्रतिष्ठा दिलाने वाला होगा।

- मस्तक पर बीच में पाया जाने वाला तिल उस जातक की फाइनेंशियल कंडीशन को मजबूत बनाता है।
- गले पर दिखाई पड़ने वाला तिल उस जातक को तेज दिमाग का, पैसा कमाने में सफल व सेल्फ मेड बनाता है।

- ठोड़ी पर पाया जाने वाला तिल व्यक्ति को स्वार्थी व समाज से कटा हुआ बनाता है।

- राइट गाल पर तिल उन्नतिशील और मेघावी होने की सूचना देता है।

- लेफ्ट गाल पर तिल शुभ नहीं माना जाता है, ऐसा तिल गृहस्थ जीवन में धन का अभाव बताता है।

- नाक के सीधे भाग पर तिल सुखी, धन संपन्न और नाक के लेफ्ट हिस्से पर तिल परिश्रमी, कठिनाई से सफलता का सूचक होता है।

- नाक के मध्य तिल हो तो ऐसा जातक स्थिर न रहकर इधर-उधर भटकता रहने वाला होता है।

- दाएँ हाथ पर तिल शुभ व बाएँ हाथ की हथेली में तिल अति व्यय का सूचक होता है।

इस प्रकार तिल भी शुभ-अशुभता के संकेत देते हैं। महिलाओं में लेफ्ट साइड पर तिल शुभ होता है जबकि पुरुषों में राइट साइड पर तिल शुभ होता है।

जीवन प्रबंधन के गुर सांई बाबा ( Life management tricks Sai Baba )

शिर्डी के सांई बाबा के भक्त दुनियाभर में फैले हैं। उनके फकीर स्वभाव और चमत्कारों की कई कथाएं है। सांई बाबा के सारे चमत्कारों का रहस्य उनके सिद्धांतों में मिलता है, उन्होंने कुछ ऐसे सूत्र दिए हैं जिन्हें जीवन में उतारकर सफल हुआ जा सकता है। हमें उन सूत्रों को केवल गहराई से समझना होगा। सांई बाबा के जीवन पर एक नजर डाली जाए तो समझ में आता है कि उनका पूरा जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित था। खुद शक्ति सम्पन्न होते हुए भी उन्होंने कभी अपने लिए शक्ति का उपयोग नहीं किया। सभी साधनों को जुटाने की क्षमता होते हुए भी वे हमेशा सादा जीवन जीते रहे और यही शिक्षा उन्होंने संसार को भी दी। सांई बाबा शिर्डी में एक सामान्य इंसान की भांति रहते थे। यूं तो उनका पूरा जीवन ही हमें हमारे लिए आदर्श है, उनकी शिक्षाएं हमें एक ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा देती है जिससे समाज में एकरूपता और शांति प्राप्त हो सकती है।

सबका मालिक एक..
.सांई बाबा ने हमेशा ही कहा है सबका मालिक है। भगवान हर धर्म, जाति और संप्रदाय के लिए एक ही है। हमने नाम अलग-अलग कर दिए हैं। इसी मूल मंत्र से समाज में एकरूपता का भाव बनेगा और लोग जात-पात, ऊंच-नीच के मतभेद को भूलकर एकसाथ रह सकते हैं। यहीं से भेदभाव खत्म होंगे और समाज में शांति की स्थापना होगी।

श्रद्धा और सबुरी...
हमारा जीवन समस्याओं से घिरा है या यूं कहें समस्याओं का दूसरा नाम ही जीवन है। ऐसे में अपने आराध्य के प्रति सच्ची श्रद्धा रखें। समस्याओं से डरे नहीं और इस बात की सबुरी रखें कि अच्छा समय भी आएगा। जब भी कोई मुसीबत आती है हम सबसे पहले अपना धैर्य खोते हैं और फिर परमात्मा में विश्वास। अगर मुसीबत में भी भगवान पर विश्वास रखा जाए और धैर्य से काम लें तो सारे अशुभ, शुभ में बदल सकते हैं।

निस्वार्थ भाव से सबकी मदद...
अपने माता-पिता और परिवारजनों का आदर, मान-सम्मान और ध्यान रखना हमारा परम कर्तव्य है। परंतु साथ ही साथ हमें अन्य बुजुर्गों, गरीब, निशक्त और निसहाय लोगों की भी मदद खुले दिल से करना चाहिए।जब ईश्वर ने मनुष्य में कोई भेदभाव नहीं रखा, वह सभी को समान रूप से सूर्य की किरणें पहुंचाता है, सभी के लिए जल उपलब्ध कराता है, हवा सभी के लिए समान रूप से प्रवाहित होती है। ऐसे में हमें भी सारे ऊंच-नीच और भेदभाव भुलाकर समानरूप से रहना चाहिए।

ईश्वरवाद की शुरुआत वेद से ( From the beginning of Eswaarvad Veda )

भारत में अनीश्वरवाद की शुरुआत जैन और चार्वाक मत से मानी गई है और ईश्वरवाद की शुरुआत वेद से। योरोप में अनीश्वरवादी दर्शन की शुरुआत सोफिस्ट समुदाय और सुकरात से मानी जा सकती है। स्टोइक दर्शन भी अनीश्वरवाद को फैलाने में कामयाब रहा। हालाँकि यह बहस बहुत ही प्राचीन रही है, लेकिन हर काल में यह नए रूप में सामने आती है। इस बहस का कोई अंत नहीं। यह हमारे संदेह को जितना पुख्ता करती है उतना ही हमारे विश्वास को भी। आस्तिकता और नास्तिकता को कुछ लोग अब एक ही सिक्के के दो पहलू मानने लगे हैं। कार्ल मार्क्स, फ्रेड्रिक नीत्शे, इमानुएल कांट, हेगेल, जे. कृष्णमूर्ति, ओशो के अलावा ऐसे बहुत से प्रसिद्ध लोग हैं जिन्हें ईश्वर के होने पर संदेह रहा है या जिन्होंने ईश्वर के होने को नकार दिया है या यह मान लिया गया कि जीवन में ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं, चाहे वह हो या नहीं हो, जीवन ही है महत्वपूर्ण। अभी खबरों में ही कहीं पढ़ने में आया था कि मदर टेरेसा भी इस मामले में संदेह से भरी थी। जो लोग वेद, कुरान, बाइबिल और गुरुग्रंथ साहिब को परम प्रमाण नहीं मानते उन्हें नास्तिक या अनीश्वरवादी कहा जाता है। भारत में न्याय और वेदांत दर्शनों को छोड़कर चार्वाक, सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध और जैन को नास्तिक या अनीश्वरवादी मत का माना जाता है, क्योंकि इनमें ईश्वर को रचयिता, पालक और विनाशक नहीं माना गया है। जिसने सभी तरह के धर्म, विज्ञान, धर्मशास्त्र और समाजशास्त्र का अध्ययन किया है या जिसमें थोड़ी-बहुत तार्किक बुद्धि का विकास हो गया है वह प्रत्येक मामले में 'शायद' शब्द का इस्तेमाल करेगा और ईश्वर के मामले में या तो संशयपूर्ण स्थिति में रहेगा या पूर्णत: कहेगा कि ईश्वर का होना एक भ्रम है, छलावा है। इस छल के आधार पर ही दुनिया के तमाम संगठित धर्म को अब तक जिंदा बनाए रखा है, जो एक-दूसरे के खिलाफ है। हाल ही के एक सर्वे से यह खुलासा हुआ कि 93 फीसदी ब्रितानी क्रिसमस पर चर्च जाने से बचते हैं। ओपिनियन मेटर्स द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक केवल 11 फीसदी लोग क्रिसमस की प्रार्थना में भाग लेते हैं। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ ही चर्च में जाती है। वैसे महिलाओं में भी यह प्रवृत्ति अब कम होती जा रही है। 2008 में लंदन में बहुत-सी बसों पर ईश्वर के नहीं होने का प्रचार किया गया था जिसे नास्तिकों की बस कहा जाता था। दूसरी ओर इस बस के खिलाफ ईश्‍वरवादियों ने ईश्वर के होने का भी प्रचार जोर-शोर से किया। कहते हैं कि संकट के समय लोगों को भगवान ही याद आते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका में आर्थिक संकट शुरू होने के बाद गिरजाघरों में श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ गई थी। पश्चिमी देशों में आर्थिक मंदी के दौर में नौकरियाँ बचाने के लिए लोग प्रत्येक वह उपक्रम कर रहे थे जिसके लिए शायद वे तैयार नहीं थे। जैसे कि बॉस या भगवान की चापलूसी करना, ज्योतिष से सलाह लेना या फिर खुद का कोई व्यापार शुरू करने के बारे में सोचना। उपरोक्त सर्वे इस्लाम को छोड़कर सभी धर्म के लोगों पर लागू किया जा सकता है, क्योंकि मस्जिद में महिलाएँ नहीं जाती। हालाँकि मस्जिदों में नमाज के लिए बढ़ती तादाद से लगता है कि मुस्लिम जनता पहले की अपेक्षा इस्लाम के ज्यादा नजदीक हो चली है। इस्लाम में नास्तिक लोगों को काफीर कहा जाता है। हालाँकि मंदिर या मस्जिदों में बढ़ती तादाद को धार्मिकता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। लोग संकट के चलते, कट्टरता के चलते या सामाजिक दबाव के चलते धार्मिक स्थल, उत्सव या आयोजनों में जाने लगे हैं दूसरी ओर चूँकि धर्म भी आज के युग में व्यापार का बहुत बड़ा जरिया है इस कारण भी लोग उससे जुड़े हुए हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि धर्म पूर्णत: निजी मामला है। प्रार्थना में माँग है तो फिर धर्म उसमें कहाँ रहा।

आधुनिक माइंड :- वैज्ञानिक और बौद्धिक युग में तो नास्तिक या अनीश्वरवादियों की संख्या कुछ कम नहीं है। अनीश्वरवादी लोग सभी देशों और कालों में पाए जाते हैं। कार्ल मार्क्स के बाद अनीश्वरवादियों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है, लेकिन अनीश्वरवाद के मायने सभी जगह अलग-अलग रहे हैं। एक दौर था जबकि लोग या तो ईश्वर को मानते या नहीं मानते थे, लेकिन आधुनिक मनुष्य को समझ में नहीं आ रहा है कि ईश्वर है या नहीं। सारे तर्क, सारे तथ्य और विज्ञान की बातें तो ईश्‍वर के नहीं होने की सूचना देते हैं, लेकिन जीवन के दुख और संताप से बचना है तो ईश्वर को मानने में कोई बुराई नहीं है। यदि हमने कहा कि ईश्वर नहीं है तो फिर समाज, धर्म और शायद राष्ट्र से भी हमें बहिष्कृत कर दिया जाए। तो चुप रहो। जैन और बौद्ध धर्म को नास्तिकों का धर्म माना जाता है। कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग भी नास्तिक माने जाते हैं। विज्ञान ने अभी तय नहीं किया है कि ईश्वर है या नहीं है। विज्ञान का मानना है कि ईश्वर को जानने से कहीं ज्यादा जरूरी है ब्रह्मांड के रहस्य को जानना। ब्रह्मांड का परम तत्व कौन-सा है उसे जानना। वेद ने जिसे ब्रह्माणु कहा है विज्ञान ने अभी उसकी खोज जारी रखी हुई है।

तार्किक युद्ध :

अनीश्वरवादियों का तर्क :- यदि आप यह कहते हैं कि ईश्वर, अल्लाह या गॉड ने संसार को छह दिन में बनाकर सातवें दिन विश्राम किया तो फिर तर्क करने वाले कहेंगे कि ईश्वर को किसने बनाया और क्या ईश्वर को भी आराम करने की आवश्यकता होती है। सृष्टी बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या आत्मा भी बनाई गई है? यदि बनाई है तो कौन से तत्व से बनाई। क्या ईश्वर को भी शैतान से डर लगता है। दुनिया में लोगों के साथ इतना अन्याय होता है न्याय तो होता कहीं दिखता ही नहीं। देर भी है और अंधेर भी। अनीश्वरवादी लोग मानते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व का कोई सबूत नहीं है। ब्रह्मांड या प्रकृति के सारे नियमों को विज्ञान से समझा जा सकता है। जगत और जीवन की उत्पत्ति, पालन और विनाश के नियम को भी विज्ञान समझा सकता है। धर्मग्रंथों में जो भी लिखा है वह कपोलकल्पित और मानव को भ्रमित करने वाला है।उनकी परीकथाएँ मनुष्य के दिमाग में इस कदर घुस गई है कि अब वे उसे किसी भी तरह से असत्य मानने को तैयार नहीं है, जबकि उनके कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। स्वर्ग और नर्क की कल्पनाएँ, प्रलय या कयामत के दिन के फैसले की बातें या फिर भयभीत करने वाला ईश्वर। ईश्वर भी ऐसा कि दूसरे धर्म के ईश्‍वर से श्रेष्ठ और लड़ाने वाला ईश्वर। पाप और पुण्य का डर बिठाने वाला ईश्‍वर। धर्मग्रंथों की बकवास और झूठी बातों ने एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग कर उनमें नफरत के बीज बो दिए हैं।

ईश्‍वर का तर्क :- इस ब्रह्मांड को सृजित करने वाला कोई तो होगा। मनुष्य की ताकत नहीं है कि वह ब्रह्मांड रच दे या मनुष्य बना दें। नास्तिक या अनीश्वरवादी लोग देखी, सुनी, महसूस की हुई या तार्किक बातों को ही सत्य मानते हैं जबकि सत्य को जानना इतना आसान नहीं। ईश्वर रहस्यपूर्ण और अनंत है उसे तर्क या विज्ञान के द्वारा नहीं जाना जा सकता। कोई तो है ‍जो हम सभी को जिंदा और इस ब्रह्मांड को चलायमान रखे हुए है। ईश्‍वर के कारण ही हम नियमों से बंधे रहकर सत्य और न्याय की राह पर चलते हैं। न्याय का राज्य ईश्वर से ही कायम रहता है। हम इस ब्रह्मांड में रेत के एक कण पर खड़े हैं। विशालकाय ब्रह्मांड का और हमारा होना ही उसके होने की सूचना देता है। इससे बड़ा और दूसरा कोई सबूत नहीं।

'हनुमानजी' से सीखें फंडे ( Learn tips from Hanuman ji )

राम भक्त हनुमान एक कुशल प्रबंधक भी थे। वे मानव संसाधन का बेहतर उपयोग करना जानते थे। मैनेजमेंट गुरुओं के मुताबिक, संपूर्ण रामचरित मानस में ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे साबित होता है कि महाबली हनुमान में मैनेजमेंट की जबर्दस्त क्षमता थी। समुद्र को पार किया श्रीराम के परम भक्त हनुमान के मैनेजमेंट से भगवान ने रावण पर विजय प्राप्त की। हनुमानजी ने सेना से लेकर समुद्र को पार करने तक जो कार्य कुशलता व बुद्धि के साथ किया वह उनके विशिष्ट मैनेजमेंट को दर्शाता है। हर काम में निपुण भगवान राम से परिचय के बाद से हनुमानजी को जो भी कार्य सौंपा वह उन्होंने पूर्ण कुशलता के साथ संपन्न किए। इस प्रकार हनुमानजी को प्रबंधन के क्षेत्र में एक कुशल स्तंभ माना जा सकता है।

सही प्लानिंग :- श्री हनुमानजी ऊर्जा प्रदान करने वाले शक्ति और समर्पण के पुंज हैं। आज के युवा मैनेजरों को अंजनी पुत्र हनुमानजी से कई प्रकार की प्रेरणा मिलती है। बुद्धि के साथ सही प्लानिंग करने की उनमें गजब की क्षमता है।

वैल्यूज और कमिटमेंट :- हनुमानजी का प्रबंधन क्षेत्र बड़े ही विस्तृत, विलक्षण और योजना के प्रमुख योजनाकार के रूप में जाना जाता है। हनुमानजी के आदर्श बताते हैं कि डेडिकेशन, कमिटमेंट, और डिवोशन से हर बाधा पार की जा सकती है। लाइफ में इन वैल्यूज का महत्व कभी कम नहीं होता।

दूरदर्शिता :- हनुमान जी ने सहज और सरल वार्तालाप के अपने गुण से कपिराज सुग्रीव से श्रीराम की मैत्री कराई। उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि सुग्रीव रामजी के सहयोगी बने। हनुमान जी की कुशलता एवं चतुरता आगे चल कर सही दिखाई पड़ती है जब सुग्रीव श्रीराम के काम आते हैं और रामजी की मदद से सुग्रीव को अपना राज्य मिलता है।

नीति कुशल :- राजकोष व पराई नारी प्राप्त कर सुग्रीव मैत्रीधर्म भुला देते हैं तो हनुमानजी उसे चारों विधियों साम, दाम, दण्ड, भेद नीति का प्रयोग कर श्रीराम के कार्यों की याद दिलाते हैं। यहाँ उनकी स्मरण शक्ति, सजगता, सतर्कता तथा लक्ष्य की दिशा में तत्परता श्रीराम को प्रभावित करती है। हनुमानजी मैनेजमेंट की यह सीख देते हैं कि अगर लक्ष्य महान हो और उसे पाना सभी के हित में हो तो हर प्रकार की नीति अपनाई जा सकती है, और यह भी कि कोई अपने कर्तव्यों और अहसानों को भूल रहा है तो उसे सही राह पर लाने के लिए भी हर तरह की नीति लागू की जा सकती है।

लीडर हो तो हनुमान जैसा :- उनकी सहज विनम्रता, लीडरशिप और सब को साथ लेकर चलने की क्षमता श्रीराम पहचान लेते हैं। कठिनाइयों में जो निर्भयता और साहसपूर्वक साथियों का सहायक और मार्गदर्शक बन सके लक्ष्य प्राप्ति हेतु जिसमें उत्साह और जोश, धैर्य और लगन हो, कठिनाइयों पर विजय पाने, परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर लेने का संकल्प और क्षमता हो वही तो नेतृत्व कर सकता है।

सबकी सलाह सुनने का गुण :- हनुमानजी का राम-काज हेतु उत्साह और वह जामवंत से मार्गदर्शन चाहना भी प्रबंधन का तत्व है। सबको सम्मानित करना, सक्रिय और ऊर्जा संपन्न होकर कार्य में निरंतरता बनाए रखने की क्षमता भी कार्यसिद्धि का गुरुमंत्र है। ह्यूमन नेचर की स्टडी और पहचान, मैनेजमेंट का खास एलिमेंट है। यह एलिमेंट हनुमानजी में पूरी राम-कथा के दौरान मिलता है।

दुश्मन पर नजर :- विरोधी के असावधान रहते ही उसके रहस्य को जान लेना दुश्मनों के बीच दोस्त खोज लेने की दक्षता विभीषण प्रसंग में दिखाई देती है। हनुमानजी उससे भ्राता का संबंध जोड़कर अपना और उसका भी कार्य सिद्ध करने में सफल होते हैं। उनके हर कार्य में थिंक और एक्ट का अद्भुत कॉम्बिनेशन है।

नैतिक साहस :- परिस्थितियों से विचलित हुए बिना दृढ़ इच्छाशक्ति को बनाए रखना प्रबंधन कला का महान गुण है। रावण को सीख देने में उनकी निर्भीकता, दृढ़ता, स्पष्टता और निश्चिंतता अप्रतिम है। उनमें न कहीं दिखावा है, न छल कपट। व्यवहार में पारदर्शिता है, कुटिलता नहीं। उनमें अपनी बात को कहने का नैतिक साहस हैं। हनुमानजी की शीलता और निर्भयता की प्रशंसा रावण भी करता है।

हर हाल में मस्त :- रावण को हनुमानजी 'रामचरन पंकज उर धरहू लंका अचल राज तुम्ह करहू' का मंत्र देते हैं। लेकिन वह अभिमानवश उनकी सलाह की उपेक्षा करता है परंतु विनम्र विभीषण उसी को मानकर लंका के राजा बनते है। इन सबके साथ ही उनमें आज की सबसे अनिवार्य मैनेजमेंट क्वॉलिटी है कि वे अपना विनोदी स्वभाव हर सिचुएशन में बनाए रखते हैं। हर हाल में मस्त रहना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

भारत भ्रमण में ईसा मसीह ( Messiah in Tours )

ईसा मसीह ने 13 साल से 29 साल तक क्या किया, यह रहस्य की बात है। बाइबल में उनके इन वर्षों के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं मिलता है। अपनी इस उम्र के बीच ईसा मसीह भारत में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। 30 वर्ष की उम्र में येरुशलम लौटकर उन्होंने यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। दीक्षा के बाद वे लोगों को शिक्षा देने लगे। ज्यादातर विद्वानों के अनुसार सन् 29 ई. को प्रभु ईसा गधे पर चढ़कर येरुशलम पहुँचे। वहीं उनको दंडित करने का षड्यंत्र रचा गया। अंतत: उन्हें विरोधियों ने पकड़कर क्रूस पर लटका दिया। उस वक्त उनकी उम्र थी लगभग 33 वर्ष। रविवार को यीशु ने येरुशलम में प्रवेश किया था। इस दिन को 'पाम संडे' कहते हैं। शुक्रवार को उन्हें सूली दी गई थी इसलिए इसे 'गुड फ्रायडे' कहते हैं और रविवार के दिन सिर्फ एक स्त्री (मेरी मेग्दलेन) ने उन्हें उनकी कब्र के पास जीवित देखा। जीवित देखे जाने की इस घटना को 'ईस्टर' के रूप में मनाया जाता है। उसके बाद यीशु कभी भी यहूदी राज्य में नजर नहीं आए। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि उसके बाद ईसा मसीह पुन: भारत लौट आए थे। इस दौरान भी उन्होंने भारत भ्रमण कर कश्मीर के बौद्ध और नाथ सम्प्रदाय के मठों में गहन तपस्या की। जिस बौद्ध मठ में उन्होंने 13 से 29 वर्ष की उम्र में शिक्षा ग्रहण की थी उसी मठ में पुन: लौटकर अपना संपूर्ण जीवन वहीं बिताया। कश्मीर में उनकी समाधि को लेकर हाल ही में बीबीसी पर एक रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट अनुसार श्रीनगर के पुराने शहर की एक इमारत को 'रौजाबल' के नाम से जाना जाता है। यह रौजा एक गली के नुक्कड़ पर है और पत्थर की बनी एक साधारण इमारत है जिसमें एक मकबरा है, जहाँ ईसा मसीह का शव रखा हुआ है। श्रीनगर के खानयार इलाके में एक तंग गली में स्थिति है रौजाबल। आधिकारिक तौर पर यह मजार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूजा आसफ का मकबरा है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि यह नजारेथ के यीशु यानी ईसा मसीह का मकबरा या मजार है। लोगों का यह भी मानना है कि सन् 80 ई. में हुए प्रसिद्ध बौद्ध सम्मेलन में ईसा मसीह ने भाग लिया था। श्रीनगर के उत्तर में पहाड़ों पर एक बौद्ध विहार का खंडहर हैं जहाँ यह सम्मेलन हुआ था। पहलगाव था पहला पड़ाव : पहलगाम का अर्थ होता है गडेरियों का गाँव। जबलपुर के पास एक गाँव है गाडरवारा, उसका अर्थ भी यही है और दोनों ही जगह से ईसा मसीह का संबंध रहा है। ईसा मसीह खुद एक गडेरिए थे। ईसा मसीह का पहला पड़ाव पहलगाम था। पहलगाम को खानाबदोशों के गाँव के रूप में जाना जाता है। बाहर से आने वाले लोग अक्सर यहीं रुकते थे। उनका पहला पड़ाव यही होता था। अनंतनाग जिले में बसा पहलगाम, श्रीनगर से लगभग 96 कि.मी. दूर है। पहलगाम चारों तरफ पहाड़ों से घिरा है। यहाँ की सुंदरता और प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। यहाँ के पहाड़ों के दर्रों से पाक अधिकृत कश्मीर या तिब्बत के रास्ते जाया जा सकता है। इसके आसपास बर्फीले इलाके की श्रृंखलाबद्ध पहाड़ियाँ है। यही से बाबा अमरनाथ की गुफा की यात्रा शुरू होती है। मान्यता है कि ईसा मसीह ने यही पर प्राण त्यागे थे और ओशो की एक किताब 'गोल्डन चाइल्ड हुड' अनुसार मूसा यानी यहूदी धर्म के पैंगबर (मोज़ेज) ने भी यहीं पर प्राण त्यागे थे। दोनों की असली कब्र यहीं पर है। 'पहलगाम एक छोटा-सा गाँव है, जहाँ पर कुछ एक झोपड़ियाँ हैं। इसके सौंदर्य के कारण जीसस ने इसको चुना होगा। जीसस ने जिस स्‍थान को चुना वह मुझे भी बहुत प्रिय है। मैंने जीसस की कब्र को कश्‍मीर में देखा है। इसराइल से बाहर कश्‍मीर ही एक ऐसा स्‍थान था जहाँ पर वे शांति से रह सकते थे। क्‍योंकि वह एक छोटा इसराइल था। यहाँ पर केवल जीसस ही नहीं मोजेज भी दफनाए गए थे। मैंने उनकी कब्र को भी देखा है। कश्मीर आते समय दूसरे यहूदी मोजेज से यह बार-बार पूछ रहे थे कि हमारा खोया हुआ कबिला कहाँ है (यहूदियों के 10 कबिलों में से एक कबिला कश्मीर में बस गया था)। यह बहुत अच्‍छा हुआ कि जीसस और मोजेज दोनों की मृत्यु भारत में ही हुई। भारत न तो ईसाई है और न ही यहूदी। परंतु जो आदमी या जो परिवार इन कब्रों की देखभाल करते हैं वह यहूदी हैं। दोनों कब्रें भी यहूदी ढंग से बनी है। हिंदू कब्र नहीं बनाते। मुसलमान बनाते हैं किन्‍तु दूसरे ढंग की। मुसलमान की कब्र का सिर मक्‍का की ओर होता है। केवल वे दोनों कब्रें ही कश्‍मीर में ऐसी है जो मुसलमान नियमों के अनुसार नहीं बनाई गई।'-

ओशो निकोलस नोतोविच का शोध :- एक रूसी अन्वेषक निकोलस नोतोविच ने भारत में कुछ वर्ष रहकर प्राचीन हेमिस बौद्घ आश्रम में रखी पुस्तक 'द लाइफ ऑफ संत ईसा' पर आधारित फ्रेंच भाषा में 'द अननोन लाइफ ऑफ जीजस क्राइस्ट' नामक पुस्तक लिखी है। हेमिस बौद्घ आश्रम लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थि‍त है। किताब अनुसार ईसा मसीह सिल्क रूट से भारत आए थे और यह आश्रम इसी तरह के सिल्क रूट पर था। उन्होंने 13 से 29 वर्ष की उम्र तक यहाँ रहकर बौद्घ धर्म की शिक्षा ली और निर्वाण के महत्व को समझा। यहाँ से शिक्षा लेकर वे जेरूसलम पहुँचे और वहाँ वे धर्मगुरु तथा इसराइल के मसीहा या रक्षक बन गए।

ईसा का नामकरण :- यीशु पर लिखी किताब के लेखक स्वामी परमहंस योगानंद ने दावा किया गया है कि यीशु के जन्म के बाद उन्हें देखने बेथलेहेम पहुँचे तीन विद्वान भारतीय ही थे, जो बौद्ध थे। भारत से पहुँचे इन्हीं तीन विद्वानों ने यीशु का नाम 'ईसा' रखा था। जिसका संस्कृत में अर्थ 'भगवान' होता है। एक दूसरी मान्यता अनुसार बौद्ध मठ में उन्हें 'ईशा' नाम मिला जिसका अर्थ है, मालिक या स्वामी। हालाँकि ईशा शब्द ईश्वर के लिए उपयोग में लाया जाता है। वेदों के एक उपनिषद का नाम 'ईश उपनिषद' है। 'ईश' या 'ईशान' शब्द का इस्तेमाल भगवान शंकर के लिए भी किया जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं कि ईसा इब्रानी शब्द येशुआ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है होता है मुक्तिदाता। और मसीह शब्द को हिंदी शब्दकोश के अनुसार अभिषिक्त मानते हैं, अर्थात यूनानी भाषा में खीस्तोस। इसीलिए पश्चिम में उन्हें यीशु ख्रीस्त कहा जाता है। कुछ विद्वानों अनुसार संस्कृत शब्द 'ईशस्' ही जीसस हो गया। यहूदी इसी को इशाक कहते हैं।

पहली बार हुआ विवाद :- सिंगापुर स्पाइस एयरजेट की एक पत्रिका में इसी बात की चर्चा की गई थी कि यीशु को जब क्रूस पर चढ़ाने के लिए लाया जा रहा था तब वे क्रूस से बचकर भाग निकले और कश्मीर पहुँचे और बाद में वहाँ उनकी मृत्यु हो गई। उनका मकबरा कश्मीर के रौजाबल नामक स्थान में है। कैथोलिक सेकुलर फोरम नामक एक संस्था ने इस खबर का कड़ा विरोध किया। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में इस पत्रिका के खिलाफ प्रदर्शन भी हुआ। विरोध के बाद स्पाइस एयरजेट के डायरेक्टर अजय सिंह ने माफी माँगी और कहा कि पत्रिका की करीब 20 हजार प्रतियों का वितरण तुरंत बन्द कर दिया गया है।

द सेकंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट :- स्वामी परमहंस योगानंद की किताब 'द सेकंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट: द रिसरेक्शन ऑफ क्राइस्ट विदिन यू' में यह दावा किया गया है कि प्रभु यीशु ने भारत में कई वर्ष बिताएँ और यहाँ योग तथा ध्यान साधना की। इस पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि 13 से 30 वर्ष की अपनी उम्र के बीच ईसा मसीह ने भारतीय ज्ञान दर्शन और योग का गहन अध्ययन व अभ्यास किया। उक्त सभी शोध को लेकर 'लॉस एंजिल्स टाइम्स' में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित हो चुकी है। 'द गार्जियन' में भी स्वामी जी की पुस्तक के संबंध में छप चुका है।

अँगूठे से जानिए पर्सनेलिटी का राज ( Learn the Secrets of Personality with thumb )

अँगूठा मानवीय चरित्र का सरलतम प्रतीक है। अँगूठा एक वह धुरी है जिस पर संपूर्ण जीवन चक्र घूमता रहता है। सफलता दिलवाने वाला अँगूठा सुडौल, सुंदर और संतुलित होना चाहिए। अँगूठे को मस्तिष्क का सेंटर प्वॉइंट बताया गया है। अँगूठे में पहला पोर दृढ़ इच्छाशक्ति का सूचक है, दूसरा पोर तर्क और कारण का तथा तीसरा जो शुक्र पर्वत को घेरता है, वह मनोविकार को प्रकट करता है। यदि पूर्ण भरा हुआ तो मानव मनोविकारों के अधीन होगा। यदि दूसरा पोर कमजोर हुआ तथा मनोविकार का पुष्ट हुआ तो व्यक्ति पथभ्रष्ट हो जाता है। यदि इच्छाशक्ति कमजोर है तथा अंतिम दोनों पेरुवे सुगठित हैं तो ऐसा मानव लम्पट होगा या दुर्गुणों में फँस जाएगा। हाथ में अँगूठे की अपनी एक अनूठी विशेषता है। हाथ में इसका सुदृढ़ होना जीवन का संतुलित होना है। सुदृढ़ अँगूठे वाला व्यक्ति अपनी बात का धनी होता है, विचारों व सिद्धांतों का पक्का होता है। ऐसा व्यक्ति सोचे हुए काम को करता है तथा समय का पाबंद होते हुए जिद्दी भी होता है। सतर्कता के साथ-साथ वह अपना भेद किसी को नहीं देता। वह स्वयं अनुशासित होता है। इच्छाशक्ति और तर्क शक्ति के बीच में यदि यव (द्वीप) हो तो वह व्यक्ति अपने घर में रहने वाला मिष्ठान्न प्रेमी, सुखी, विद्वान व कीर्ति वाला होता है। अँगूठे की जड़ में यदि सीधी रेखाएँ हों तो उनकी संख्या के अनुसार उतने ही उसके पुत्र/संतानें होंगी, स्त्री के हाथ में यदि दूसरी संधि पर कोई तारे का चिह्न हो तो वह लड़की अत्यधिक धनवाली होती है। अँगूठे की जड़ में से कोई एक रेखा शुक्र के ऊपर से होकर आयु रेखा में मिल जाए तो यह रेखा बहुत बड़ी संपत्ति दिलाती है। यदि ऐसी दो रेखाएँ हों तो बड़ी जायदाद और कुटुम्ब दोनों ही होते हैं। पहला पेरुवा मोटा, भारी और छोटा हो तो ऐसा व्यक्ति अचानक गुस्से में आकर किसी को कुछ भी हानि पहुँचा सकता है। अँगूठे का दूसरा पोर बड़ा रहने से तर्क, विवेक और कारण शक्ति से काम को सोच-समझकर करने की सूझबूझ उस व्यक्ति में रहती है। इसके साथ ही बुध पर्वत सुंदर हो या मस्तक रेखा गोलाईयुक्त लंबी हो तो तर्क, वाक्‌चातुर्य से वह व्यक्ति हर काम को सफल कर लेगा। अधिक छोटे अँगूठे वाला व्यक्ति आत्म नियंत्रण नहीं रख पाता। अँगूठे का छोटा होना शुभ नहीं है। छोटे अँगूठे में काम विकृति भी पैदा हो सकती है बशर्ते कि मंगल का पर्वत उभरा हुआ हो, शुक्र मुद्रिका हो और क्यालेस्विया की स्थिति मजबूत हो, यदि प्रथम पोर लचीला हो तो व्यक्ति समाज में मिलनसार होगा, परिस्थिति के अनुसार झुक जाएगा वैवाहिक जीवन ठीक रहेगा,कभी-कभी वह बाहरी दिखावा करेगा और यदि गुरु पर्वत तथा मस्तिष्क व हृदय रेखा समांतर पर है तो मित्रता करने में निपुण होगा। लंबी हथेली में यदि छोटा अँगूठा हो तो वह व्यक्ति स्वयं के स्थान व क्षेत्र में अच्छा होता है।

अमृत पर्व कुंभ का महत्व ( Importance of Amrit Kumbh festival )

प्रकृति के मनोहारी छटाओं से पूर्ण भारतीय भूमि के पराक्रमी सपूतों ने धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हेतु विश्व ही नहीं, बल्कि देव लोक में भी अपने सतत पुरूषार्थ द्वारा सफलता का परचम लहरा दिया। घोर तपस्या के द्वारा प्राचीन समय में भागीरथ ने अपने पुरखों व संसार के मोक्ष के लिए अमृतमयी गंगा की जलधारा को पृथ्वी पर अवतरित किया। जिसके पवित्र जल के स्पर्श, स्नान व दर्शन मात्र से मानव युग-युगान्तरों से सुख, संतोष, आरोग्यता व मोक्ष प्राप्त करता चला आ रहा है। माँ गंगा का जल सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त कर धरा पर जीवन अस्तित्व को बनाए रखने में परम सहायक है, इसे देव नदी भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देव व दैत्य अति भयानक युद्ध करने लगते। जो मत्स्यपुराण के अध्याय 249 के इस श्लोक संख्या 4 से स्पष्ट है-

पुरा देवासुरे युद्धे हताष्च शतषः सुरैः।

पुनः संजीवनीं विद्यां प्रयोज्य भृगुनन्दनः॥

तब देवताओं ने अमृत प्राप्त के उद्देश्य से दैत्यों को समुद्र मन्थन के लिए राजी कर लिया। वासुकी नाग रूपी रस्सी तथा विशाल मन्दराचल पर्वत की मथानी बनाकर समुद्र मन्थन आरम्भ हुआ जिसमें कालकूल विष, कामुधेन गाय, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी सहित अनेक दुर्लभ रत्नों के बाद अमृत कलश का प्रार्दुभाव हुआ। अमृत कुंभ को राक्षसों से बचाने के लिए इन्द्र पुत्र जयंत इसे लेकर तीव्रता से दौड़ने लगे। देव और दैत्यों में अमृत प्राप्ति के लिए बारह दिव्य दिनों जो मानव के बारह वर्षों के बराबर होते हैं, अति घोर युद्ध हुआ। प्रयाग, उज्जैन, हरिद्वार, नासिक उपरोक्त स्थानों पर अमृत-कलश से अमृत बूँद गिरे। यही वजह है कि कुंभ पर्व बारह वर्षों के क्रम में उपरोक्त स्थानों में मनाया जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सूर्य, चंद्र और बृहस्पति ग्रहों के विशेष राशि योग में ही कुंभ महापर्व आता है। इन ग्रहों ने ही इस अमृत कलश को विशेष सुरक्षा प्रदान की थी। बृहस्पति के कुंभ राशि से होते हुए सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से हरिद्वार में कुंभ महापर्व का योग बनता है। हमारे तत्वज्ञ ऋषियों ने जल को पंच तत्त्वों में प्रमुख तत्व माना है। उन्होंने अमृततुल्य गंगाजल को खोज निकाला और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा वेद-पुराणों ने भी की। यह आरोग्यता व आयु को बढ़ाने वाला है। भारत के ऐसे पवित्रतम जल स्थलों को देवताओं ने भी कलश में सुरक्षित रखने योग्य माना और उसमें अमृत की बूँदें घोल उसे और भी गुणकारी बना दिया। आज इन पवित्र अमूल्य जलस्रोतों के विलुप्त हो जाने का गम्भीर खतरा मँडरा रहा है। कुंभ महापर्व में गंगा-स्नान से पाप मिट जाते हैं और मोक्ष प्राप्ति के रास्ते प्रशस्त होते हैं।

15 अप्रैल 2010

मानवीय मूल्यों के पोषक रामकृष्ण परमहंस ( Human values of nutrient Ramakrishna )

मानवीय मूल्यों के पोषक संत रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18फरवरी,1836 को बंगाल प्रांत स्थित ग्राम कामारपुकुरमें हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर था। इनकी बालसुलभ सरलता और मंत्रमुग्ध मुस्कान से हर कोई सम्मोहित हो जाता था। सात वर्ष की अल्पायु में ही गदाधर के सर से पिता का साया उठ गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में पूरे परिवार का भरण-पोषण कठिन होता चला गया। आर्थिक कठिनाइयां आईं। बालक गदाधर का साहस कम नहीं हुआ। इनके बडे भाई रामकुमार चट्टोपाध्यायकलकत्ता(कोलकाता) में एक पाठशाला के संचालक थे। वे गदाधर को अपने साथ कोलकाताले गए। रामकृष्ण का अन्तर्मन अत्यंत निश्छल, सहज और विनयशील था। संकीर्णताओं से वह बहुत दूर थे। अपने कार्यो मेंलगे रहते थे। सतत प्रयास के बावजूद रामकृष्ण का मन अध्ययन-अध्यापन में नहीं लग पाया। कलकत्ता के पास दक्षिणेश्वरस्थित काली माता के मन्दिर में अग्रज रामकुमार ने पुरोहित का दायित्व प्रदान किया, रामकृष्ण इसमें नहीं रम पाए। कालान्तर में बडे भाई भी चल बसे। अन्दर से मन के न रहते हुए भी रामकृष्ण मंदिर की पूजा एवं अर्चना करने लगे। रामकृष्ण मां काली के आराधकहो गए। बीस वर्ष की अवस्था में अनवरत साधना करते-करते माता की कृपा से इन्हें परम दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। इनके प्रिय शिष्य विवेकानन्द ने एक बार इनसे पूछा-महाशय! क्या आपने ईश्वर को देखा है? महान साधक रामकृष्ण ने उत्तर दिया-हां देखा है, जिस प्रकार तुम्हें देख रहा हूं, ठीक उसी प्रकार, बल्कि उससे कहीं अधिक स्पष्टता से। वे स्वयं की अनुभूति से ईश्वर के अस्तित्व का विश्वास दिलाते थे आध्यात्मिक सत्य, ज्ञान के प्रखर तेज से भक्ति ज्ञान के रामकृष्ण पथ-प्रदर्शक थे। काली की भक्ति में अवगाहन करके वे भक्तों को मानवता का पाठ पढाते थे। रामकृष्ण के शिष्य नाग महाशय ने गंगातटपर जब दो लोगों को रामकृष्ण को गाली देते सुना तो क्रोधित हुए किंतु प्रभु से प्रार्थना की कि उनके मन में श्रद्धा जगाकर रामकृष्ण के भक्त बना दें। सच्ची भक्ति के कारण दोनों शाम को रामकृष्ण के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे। रामकृष्ण ने उन्हें क्षमा कर दिया। एक दिन परमहंस ने आंवला मांगा। आंवले का मौसम नहीं था। नाग महाशय ढूंढते-ढूंढते जंगल में एक वृक्ष के नीचे ताजा आंवला रखा पा गये, रामकृष्ण को दिया। रामकृष्ण बोले-मुझे पता था-तू ही लेकर आएगा। तेरा विश्वास सच्चा है। रामकृष्ण परमहंस जीवन के अंतिम दिनों में समाधि की स्थिति में रहने लगे। अत:तन से शिथिल होने लगे। शिष्यों द्वारा स्वास्थ्य पर ध्यान देने की प्रार्थना पर अज्ञानता जानकर हंस देते थे। इनके शिष्य इन्हें ठाकुर नाम दिए थे। रामकृष्ण के परमप्रिय शिष्य विवेकानन्द कुछ समय हिमालय के किसी एकान्त स्थान पर तपस्या करना चाहते थे। यही आज्ञा लेने जब वे गुरु के पास गये तो रामकृष्ण ने कहा-वत्स हमारे आसपास के क्षेत्र के लोग भूख से तडप रहे हैं। चारों ओर अज्ञान का अंधेरा छाया है। यहां लोग रोते-चिल्लाते रहें और तुम हिमालय की किसी गुफामें समाधि के आनन्द में निमग्न रहो क्या तुम्हारी आत्मा स्वीकारेगी। इससे विवेकानन्द दरिद्र नारायण की सेवा में लग गये। रामकृष्ण महान योगी, उच्चकोटि के साधक व विचारक थे। सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकतामें एकता का दर्शन करते थे। सेवा से समाज की सुरक्षा चाहते थे। गले में सूजन को जब डाक्टरों ने कैंसर बताकर समाधि लेने और वार्तालाप से मना किया तब भी वे मुस्कराये। चिकित्सा कराने से रोकने पर भी विवेकानन्द इलाज कराते रहे। विवेकानन्द ने कहा काली मां से रोग मुक्ति के लिए आप कह दें। परमहंस ने कहा इस तन पर मां का अधिकार है, मैं क्या कहूं, जो वह करेगी मेरे लिए अच्छा ही करेगी। मानवता का उन्होंने मंत्र लुटाया। उनकी भौतिक काया 15अगस्त 1886को पंचतत्व में मिल गई।

भारत में परिवार ( Family in India )

परिवार
मानव समाज में परिवार एक बुनियादी तथा सार्वभौमिक इकाई है। यह सामाजिक जीवन की निरंतरता, एकता एवं विकास के लिए आवश्यक प्रकार्य करता है। अधिकांश पारंपरिक समाजों में परिवार सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनैतिक गतिविधियों एवं संगठनों की इकाई रही है। आधुनिक औद्योगिक समाज में परिवार प्राथमिक रूप से संतानोंत्पत्ति, सामाजीकरण एवं भावनात्मक संतोष की व्यवस्था से संबंधित प्रकार्य करता है।

समाजशास्त्री दो अर्थों में परिवार की चर्चा करते हैं -
(क) एक खास प्रकार के वस्तुगत तथ्य (सामाजिक यथार्थ) के रूप में तथा
(ख) एक विश्लेषणात्मक अवधारणा के रूप में।
वस्तुगत तथ्य के रूप में अलग-अलग समुदायों तथा अलग-अलग क्षेत्रों में परिवार की संरचना बदलती रहती है। विश्लेषणात्मक अवधारणा के रूप में परिवार एक सार्वभौमिक संस्था है। यह माता-पिता एवं उनके बच्चों के समूह का प्रतीक है। यदि माता-पिता अपने अव्यस्क (आर्थिक एवं भावनात्मक रूप से परतंत्रा, सामान्यत: अविवाहित) बच्चों के साथ रहते हैं तो इसे नाभिकीय या प्राथमिक परिवार कहते हैं। यदि माता-पिता अपने व्यस्क बच्चों और उनके जीवन-साथियों के साथ रहते हैं तो उसे संयुक्त परिवार कहते हैं। एक विश्लेषणात्मक अवधारणा के रूप में परिवार प्राथमिक रूप से सभी मानव समुदायों में वैध यौन संबंध तथा स्वीकृत तरीके से संतनोत्पत्ति से संबंधित होता है। आधुनिक औद्योगिक तथा नगरीय समाजों में परिवार नातेदारी-समूह के निर्माण का प्रमुख सिध्दांत तय करता है परन्तु पारंपरिक समाजों में परिवार नातेदारी संगठन के सिध्दांतों एवं रक्त तथा पुत्रत्व (फिलिएशन) के सिध्दांतों द्वारा अनुशासित होता है।

वैवाहिक संबंध को केन्द्र में रखकर विकसित समूह में दंपत्ति और उनके ऊपर निर्भर बच्चों की सदस्यता होती है। इसे नाभिकीय या दंपत्ति परिवार कहा जाता है। इस प्राथमिक परिवार के संगठन का आधार दाम्पत्य संबंध होता है। जबकि संयुक्त परिवार के संगठन का आधार प्राथमिक रूप से परिवार में संबंधों के आपसी विश्वास पर निर्भर करता है।

समाजशास्त्री पितृवंशीय एवं मातृवंशीय परिवारों की भी चर्चा करते हैं। एक पितृवंशीय परिवार पिता और उसके बच्चों से मिलकर बनता है तथा बच्चे पिता के नाम से जाने जाते हैं। विवाह के बाद बेटी अपने पति के साथ रहने जाती है तथा बेटे की पत्नी सास-ससुर और पति के साथ रहने आती है। पारिवारिक संपत्ति का हस्तांतरण पिता से पुत्रों के हाथ में होता है। दूसरी और, मातृवंशीय परिवार की संरचना 'माँ' और उसके बच्चों के मिलने से होती है और बच्चे अपनी मां के नाम से जाने जाते हैं। विवाह के बाद पति या तो अपनी पत्नी और उसके परिवार के साथ रहने जाता है या कुछ समाजों में अपनी बहन के साथ रहता है। पारिवारिक संपत्ति का हस्तांतरण् मां से बेटी के हाथ में होता है पर सामान्यत: यह मामा की देख-रेख (प्रंबंध) में होता है। प्रबंधन का अधिकार मामा से भांजे को हस्तांतरित होता है। पितृवंशीय परिवार नाभिकीय या संयुक्त दोनों में से कोई भी हो सकता है, परन्तु मातृवंशीय परिवार अधिकांशत: संयुक्त होता है।

भारत में परिवार
परिवार के रूप में परिवार की अवधारणा अब भी भारतीय अवधारणा नहीं है। एक आम भारतीय के लिए परिवार का मतलब वही है जो अंग्रजी भाषा में संयुक्त परिवार का होता है। इसी तरह, ए.एम शाह जैसे समाजशास्त्रियों ने एक सांस्कृतिक मूल्य के रूप में संयुक्त परिवार एवं एक निवास स्थान या घराना के रूप में संयुक्त परिवार की अवधारणा में अंतर स्पष्ट किया है। पारंपरिक भारत में नाभिकीय घरों का अस्तित्व तो रहा है परंतु नाभिकीय परिवार कभी भी एक सांस्कृतिक मूल्य नहीं रहा। अधिकांश भारतीयों के लिए संयुक्त परिवार ही पारिवारिक जीवन का आदर्श प्रतिमान रहा है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में समकालीन समाजशास्त्रियों ने यह पाया है कि नाभिकीय परिवार या घर संयुक्त परिवार के चक्रिय विकास की एक अवस्था भर है। यह सब पुरानी पीढ़ी की मृत्यु एवं नई पीढ़ी के जन्म की स्वभाविक (प्राकृतिक) प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। यह चक्र करीब-करीब 30 वर्षों में पूरा हो जाता है एवं उसके बाद एक नया चक्र शुरु होता है।

इरावती कर्वे ने भारत में संयुक्त परिवार की परिभाषा देते हुए कहा है कि संयुक्त परिवार लोगों का ऐसा समूह है जो एक छत के नीचे रहते है, एक रसोई का बना हुआ खाना खाते हैं, एक तिजोरी में संपत्ति रखते हैं, पारिवारिक पूजा में सामूहिक रूप से भाग लेते हैं तथा एक-दूसरे से एक विशेष प्रकार के नातेदारी संबंध से जुड़े होते हैं।

दूसरी ओर, संयुक्त परिवार के लिए संयुक्त निवास स्थान या संयुक्त रसोई का होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना की उनके अत: पारिवारिक संबंध। देसाई ने भारत में पारिवारिक जीवन के पांच प्रकारों की चर्चा की है :-

(क) नाभिकीय परिवार - सबसे छोटा परिवार जिसमें पति, पत्नी एवं उनके अविवाहित बच्चे रहते हैं।
(ख) प्रकार्यात्मक संयुक्त परिवार - जब रक्त संबंधों वाले दो परिवार अलग-अलग रहते हैं परंतु एक संयुक्त अधिकारी (कर्ता) के तहत प्रकार्य करते हैं तो इसे प्रर्कायात्मक संयुक्त परिवार कहा जाता है।
(ग) प्रकार्यात्मक एवं वास्तविक संयुक्त परिवार - जब एक प्रकार्यात्मक संयुक्त परिवार संपत्ति की दृष्टि से भी संयुक्त होता है, तो इसे प्रकार्यात्मक एवं वास्तविक संयुक्त परिवार कहा जाता है।
(घ) सीमांत संयुक्त परिवार - जब दो पीढ़ियों के परिवारिक सदस्य प्रकार्यात्मक एवं वास्तविक रूप से साथ रहते हैं तो इसे सीमांत संयुक्त परिवार कहा जाता है।
(ङ) पारंपरिक संयुक्त परिवार - जब तीन या तीन पीढ़ियों के लोग एक निवास स्थान में रहते है, सम्मिलित रूप से संपत्ति के स्वामी होते हैं एवं पारिवारिक अनुष्ठानों में सामूहिक रूप से भाग लेते हैं तो इसे पारंपरिक संयुक्त परिवार कहते हैं।

भारत वर्ष में संयुक्त और नाभिकीय घराना तथा संयुक्त परिवार के सांस्कृतिक प्रतिमान साथ-साथ स्थित रहें हैं, अब परिवार की संरचना तथा संयुक्तता की भावना की मात्रा में परिवर्तन आ रहा है।

महाभारत - अर्जुन का निष्कासन ( Mahabharat - Arjun's expulsion )

इन्द्रप्रस्थ के निर्माण के पश्चात् युधिष्ठिर सुखपूर्वक राज्य करने लगे। अकस्मात् एक दिन पाण्डवों के घर देवर्षि नारद पधारे। पाण्डवों ने उनका यथोचित आदर-सत्कार करके बैठने के लिये उच्चासन प्रदान किया। नारद जी पाण्डवों से बोले, "हे पाण्डवगण! तुम पाँच भाइयों के बीच एक पत्नी है, इसलिये तुम्हें कुछ ऐसा नियम बना लेना चाहिये जिससे परस्पर कलह न हो। कलह शत्रुता का मूल होता है। इस संदर्भ में मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। प्राचीन काल में सुन्द और उपसुन्द नाम के दो महाबली दैत्य थे। उनमें आपस में बहुत प्रेम था। उन्होंने पूरे त्रिलोक में विजय प्राप्त कर लिया और इन्द्रादि देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। इससे दुःखी होकर इन्द्र सहित समस्त देवतागण ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और उनसे रक्षा पाने का उपाय पूछने लगे। ब्रह्मा जी ने कहा कि जब तक उन दोनों दैत्यों में परस्पर कलह नहीं होगा, स्वयं भगवान भी उन्हें परास्त नहीं कर सकेंगे। मैं सवयं उनमें कलह कराने का उपाय सोच रहा हूँ। इतना कह कर उन्होंने एक अत्यन्त रूपमती एवं लावण्यमयी स्री की सृष्टि की। उस स्त्री का तिल-तिल सुन्दर होने के कारण उसका नाम तिलोत्तमा रखा गया। उसे देख कर समस्त दैत्य-दानव मोहित हो गये। ब्रह्मा जी ने तिलोत्तमा को सुन्द तथा उपसुन्द के पास जाकर उनमें कलह कराने का आदेश दिया। ब्रह्मा जी का आदेश पाकर तिलोत्तमा सुन्द-उपसुन्द के पास पहुँची। उसे देखते ही दोनों दैत्य कामान्ध हो उठे और उसे प्राप्त करने के लिये परस्पर लड़ने लगे। इस प्रकार भयंकर युद्ध करते हुये दोनों ही मृत्यु को प्राप्त हो गये।"

नारद जी के वचनों को सुन कर युधिष्ठिर ने कहा, "हे देवर्षि! हम सब भाई आपके कथनानुसार ही कार्य करेंगे।" नारद जी के प्रस्थान कर जाने के बाद पाँचों भाइयों ने नियम बना लिया कि प्रत्येक भाई द्रौपदी के साथ एक निश्चित काल तक रहेगा और उस काल में कोई भी दूसरा भाई उनके पास नहीं जायेगा। जो भी इस नियम की अवहेलना करेगा उसे बारह वर्षों तक अपने नगरी से निष्कासित होना पड़ेगा। इस प्रकार सभी पाण्डव अपने बनाये हुये नियम का पालन करते हुये सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।

इसी बीच एक दिन एक ब्राह्मण के गौ को कुछ लुटेरे उठा ले गये। उस ब्राह्मण ने अर्जुन के पास आकर लुटेरों के विषय में बताया और अपनी गौ वापस दिलाने की प्रार्थना किया। अर्जुन ने उसे शीघ्रातिशीघ्र न्याय देने का आश्वासन दे दिया। उस समय अर्जुन के अस्त्र-शस्त्र उस महल में रखे थे जहाँ पर युधिष्ठिर एवं द्रौपदी विहार कर रहे थे। ब्राह्मण को न्याय दिलाने तथा लुटेरों को दण्ड देने को अति आवश्यक समझ कर अर्जुन उस महल में जाकर अपना अस्त्र-शस्त्र उठा लाये और ब्राह्मण की गौ को लुटेरों से वापस दिलाया तथा लुटेरों को दण्ड भी दे दिया। इसके पश्चात् नियम का पालन करने के लिये अर्जुन बारह वर्षों के लिये निष्कासित जीवन व्यतीत करने के लिये प्रस्तुत हो गये। यह देख कर युधिष्ठिर बोले, "हे अर्जुन! आपत्तिकाल में मर्यादा का ध्यान नहीं किया जाता। ब्राह्मण को न्याय देने के कारण तुम्हारा अपराध क्षम्य हो गया है।" किन्तु अर्जुन ने उत्तर दिया, " भैया! आपके बनाये नियम की अवहेलना करके मैं पाप का भागी नहीं बनना चाहता, अतः आप मुझे बारह वर्षों तक निष्कासित जीवन व्यतीत करने की आज्ञा दीजिये।" अर्जुन के तर्कपूर्ण वचनों को सुन कर युधिष्ठिर ने उसे बारह वर्षों के लिये निष्कासित कर दिया।

13 अप्रैल 2010

शिष्टाचार क़ी बातें

हर देश की संस्कृति में शिष्टाचार का समावेश रहता है। शिष्टाचार का मतलब में आपस में सद्व्यवहार करना। अभिवादन करना भी शिष्टाचार में शामिल है। हम जब किसी से भें करते हैं तो उसे अभिवादन करना हमारा पहला काम होता है, सामने वाला उसका जवाब अभिवादन करके ही देता है। कहीं सिर झुककर अभिवादन करना शिष्टाचार माना जाता है तो कहीं एक दुसरे की जीभ छूकर, कहीं हाथ मिलाकर तो कहीं हाथ जोड़कर। ऐसा भी देखा जाता है क़ी एक आचार एक समाज में असभ्यता माना जाता हो और वहीँ आचार दुसरे समाज में शिष्टआचार हो। आचारों में समय के अनुसार बदलाव भी होते रहते हैं। वैसे यह बात पूरी तरह सही है क़ी जहाँ जो आचार व्यव्हार प्रचलन में हो उनका पालन हर एक को करना ही चाहिए। मानव धर्म यही सिखाता है।


मेहमान के शिष्टाचार
बरसात क़ी यह प्रकृति होती है क वह बिना पूर्व सन्देश के प्राय : आती है और कुछ देर बाद स्वतः चली जाती है, मेहमान के सम्बन्ध में भी ऐसा ही है, मह (यानी वर्षा) की तरह आना-जाना। मेहमान के एक नाम है अतिथि यानी बिना तिथि (या सुचना) के आते वाला।
आजकल तो नगरों में अपने परिवारजनों के सोने-बैठने में तकलीफ उठानी पड़ती है, ऐसे में मेहमान के आ जाने पर दिक्कत बढ़ना स्वाभाविक है। अतः मेहमान को मेजवान क़ी स्थिति देखते-समझते हुए ज्यादा दिन नहीं रुकना चाहिए।

  • मेजवान के समय और व्यस्तता को ध्यान में रखते हुए ही मेहमान को मेजवान के यहाँ जाना चाहिए।
  • जैसा क़ी ऊपर बताया, आजकल घरों में ज्यादा जगह प्राय: नहीं होती, लिहाजा मेहमान को कम से कम सामान मेजवान के यहाँ ले जाना चाहिए।
  • यदी साथ में बच्चे भी हैं तो मेहमान को यह हिदायत बच्चों को अवश्य दे देनी चाहिए क़ी वे मेजवान के यहाँ उधम न करें।
  • मेजवान के आत्मा सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली कोई बात न कहें- न करें।
  • घूमने-फिरने, खरीददारी में अपनी इच्चा न तो मेजवान पर थोपें और न उसकी जेब हलकी करें बल्कि खर्चे में अपनी भी भागीदारी रखें।
  • मेजवान के टेलीफोन का बिल न बढायें।
  • मेजवान की व्यवस्था में कमी रह जाने पर भी उस पर ध्यान न दें।
  • मेजवान के सामने अपने पड़, धन-सम्पदा का का बखान न करें।
  • मेजवान की घरेलु व्यवस्था में हस्तक्षेप न करें।
  • संभव हो तो मेजवान के कार्य एवं व्यवस्था में हाथ बताएं।
  • मेजवान के बच्चों को उपहार दें।
  • विदा लेते समय आथित्य के लिये शुक्रिया अदा करते हुए अपने यहाँ आने का निमंत्रण दें।
  • पहले दिन अतिथि, दुसरे दिन बोझ और तीसरे दिन कंटक है।
  • जन्म से मनुष्य शुद्र ही पैदा होता है, किन्तु संस्कार होने से द्विज कहलाता है।
  • जैसे कुम्हार द्वारा मिटटी के बर्तन में खींची गयी रेखाएं फिर कभी नहीं छूटती, उसी प्रकार माता-पिता द्वारा डाले गए संस्कार बच्चों के मन से कभी नहीं छूटते।
  • सभ्यता शरीर है, संस्कृति आत्मा, सभ्यता जानकारी और भिन्न क्षेत्रों में महान एवं दुखदायी खोज का परिणाम है; संस्कृति ज्ञान का परिणाम है।

ज्ञान क़ी बातें - आपसी विशवास जरुरी है पति-पत्नी में

  • आपस में तालमेल भी रखना सीखें।
  • आज का गुस्सा कल पर टालें।
  • जब भी तनाव हो ठंडा पानी पीयें।
  • कल जरूर फैसला करो अपनी गलती भी पहचानो।
  • दान भी जरूर दें, जिसको जरुरत हो सुपात्र को ही।
  • सरल जीवन बिताना चाहिए।
  • बिमारी में धैर्य रखें, छिपायें नहीं, उससे बिमारी बढ़ जाती है।
  • माँ अपने बेटे का हक़ नहीं छोडती उसने जन्म दिया होता है।
  • ज्यादा चीजें न रखो।
  • अच्छी सादी क्वालिटी वाली चीजें खरीदें।
  • बच्चों के आगे जूठ न बोलेन।
  • व्यवसन बिलकूल न करें।
  • चार देख कर पैर पसारें।
  • सही डिमांड ही पूरी करनी चाहिए, चाहिए बच्चों की हो, चाहे पत्नी-पति क़ी।
  • सफाई का ध्यान रखें, सफाई की ईश्वर से मित्रता है।
  • सच्चाई का सहारा लें, जूद्थ बोलना पड़े तो चुप रहे।
  • जवानी में ही पैसा बुढापे के लिये भी बचा कर रखें।
  • लोगों के बहकावे में न आवें।
  • मायके से प्यार करें मोह नहीं।
  • मकान पर ज्यादा पैसा खर्च न करें।
  • दिखावें में न फसें।
  • संसार में गरीब बन कर रहो, ज्यादा पैसा हो तो दान कारो।
  • सेहत अच्छी रखो, सादा खाओ, चबाकर खाओ।
  • मोटापे से बचें।
  • घर की बात अच्छी-बुरी घर तक सीमित रखें।
  • दुनिया तमाशा देखती है, दुनिया को निंदा में स्वाद आता है।
  • बच्चों को खरी-खोटी सब की जानकारी दो।
  • कुदरत से सलाह लो, इंसान को छोड़कर कल के लिये किसी के पास कुछ नहीं।
  • एक दुसरे की बात काटनी नहीं चाहिए।
  • संसारे रिश्तों के अलावा भी रिश्ते हैं- हवा, पानी, समाज, सूर्य, चन्द्रमा।
  • मौसम के मुताबिक़ फल सब्जी ही खाएं। महंगा जीवन न बनाएं।
  • काम करते रहना चाहिए ताकि शरीर ठीक रहे।
  • दवाई से ज्यादा जरुरी है परहेज करें।
  • औरत घर की लक्ष्मी होती है।
  • जल्दी न करें काम को नोट करें, घर का बजट बनाएं।
  • शंका का समाधान करें।
  • कम बोलें-सोचकर बोलें।
  • गलत कमाई से परहेज करें।
  • पड़ोस से बना कर रखो।
  • शिष्टाचार बनाए रखें।
  • आलसी मत बनो आलस इंसान का सबसे बड़ा शत्रु है।

चमत्कारी चिकित्सक देववैध - अश्विनीकुमार

स्वर्ग लोक के वैध, देवगुणों में श्रेष्ठ सूर्य पुत्र अश्विनी कुमारों ने सर्प्रथम दक्षप्रजापति से आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की, फिर चिकित्सकों की ज्ञानव्रीही के लिये 'अश्विनीकुमार संहिता' के रचना की, जिसमें आयुर्वेदके सभी अंगों-उपांगों को समाहित किया। देवताओं ने इन दयालु अश्विनी कुमारों को चिकित्सा का पूरा भार सौंप दिया - 'अथ भूतदयां प्रति' आयुर्वेद का यः सिधांत उनके जीवन में स्वभाव बनकर समाया हुआ था। वे हर रोगग्रस्त प्राणी को खोज-खोज कर उसका शारीरिक और मानसिक उपचार किया करते थे। कुशल चिकित्सक और शल्यक्रिया विशेषज्ञ के रूप में इनके विषय में अनेक कथाएँ प्रचलित है।

एक बार भैरव जी ने क्रोधित होकर ब्रह्माजी का सिर काट दिया। देव लोक में शोक चा गया, तब देवताओं ने अश्विनी कुमारों को बुलाया। उन्होंने शल्यक्रिया करके ब्रह्माजी का सिर फिर से जोड़ दिया- इसी कारन उस दिन से दोनों अश्विनी कुमार यज्ञ में भाग पाने के अधिकारी बन गए।

एतैश्चान्यैग्च बहुभि: कर्मभिभिर्षजां वरौ।
बभूवतुभृर्शं पूज्याविन्द्रादीनां दिवौकसाम्॥


"सुर्यपुत्र अशिविनी कुमार आयुर्वेद के सभी अंगों में निपूर्ण थे। जब भी कोई देव, गंधर्व अथवा मानव शारीरिक अस्वस्थता, दुर्बलता और वृद्धावस्था के कारण कष्ट महसूस करता तो वह अश्विनी कुमार को ही स्मरण करता, वे कभी किसी को निराश नहीं करते, ऐसे थे अश्विनी कुमार। "

दीर्घतमा नामक एक सूक्तद्रष्टा ऋषि थे। वे जन्म से अंधे थे। जब वे जर्जर-वृद्ध हो गए तो नौकर-चाकर भी उनकी सेवा करते-करते ऊब गए। इसलिये उनसे छुटकारा पाने के लिये नौकरों ने उन्हें आग में झोंक दिया। ऋषि दीर्घतमा ने अश्विनी कुमारों का स्मरण किया। उन दोनों ने पहुंचकर ऋषि को बचा लिया। फिर नौकरों ने उद्विग्र होकर तलवार से उनका सिर ही काट डाला। लेकिन अश्विनी कुमारों ने वहां भी पहुँचार दूर पड़े दीर्घतमा के सिर को जोड़ दिया और उन्हें फिर भला-चंगा बना दिया।

अंधों को आँख
एक बार उपमन्यु ऋषि ने अनजाने में आग (मदार) के पत्ते खा लिये। इससे उनके पेट में आग की ज्याला उत्पन्न हो गयी जिससे उनके आँखों की रौशनी नस्त हो गयी। बेचारे अंधे हो गए। अंधा होने के कारन वे कुएं में गिर पड़े। शाम हो गयी, उनके गुरु आयोद धौम्य उपमन्यु के आने का इंतज़ार करते रहे। काफी रात गुजर जाने के बाद भी उपमन्यु नहीं आये तो गुरु उनको खोजने के लिये जंगले में निकल गए और उपमन्यु को बुलाने लगे।

उपमन्य ने कुँए में से ही आवाज लगाईं- 'गुरूजी मैं कुएं में गिर पडा हूँ। निकल नहीं सकता,' जब गुरूजी को यह मालूम हुआ कि आक के पत्ते खाने से उसकी आँखें खराब हो गयी हैं तो उन्होंने कहा कि तुम देववैध अश्विनी कुमार की स्तुति करो, वे तुम्हारी आँखें ठीक कर देंगे, उपमन्यु ने मंरों द्वार अश्विनी कुमारों की स्तुति की, दयालु अश्विनी कुमार स्तुति सुनकर तुरंत वहां आ गए और उपमन्यु की आँखें ठीक करा दीं।

इसी प्रकार ऋजाश्व के दोनों नेत्रों की ज्योति जब ख़त्म हो गयी थी, तब अश्विनी कुमारों ने ही चिकित्सा करके ऋजाश्व की आँखें ठीक की थी। जब असुरों ने कण्व ऋषि की आँखों को आग से झुलसा दिया था तब अश्विनी कुमारों ने ही उनकी आँखों को ठीक किया था।

यौवन देने वाले अश्विनी कुमार
महर्षि भृगु के पुत्र च्यवन ऋषि जब अत्यधिक वृद्ध हो गए, उनका उठना-बैठना, चलना-फिरना बंद हो गया। युवा पत्नी सुकन्या उनकी सेवा में दिन-रात लगी रहती थी। उसका धर्म एक माता पति सेवा था। उन्हीं दिनों रोगी मानवों की खोज में दोनों अश्विनी कुमार पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे। वे च्यवन ऋषि की दयनीय दशा देखकर द्रवित हो गयी। वे च्यवन ऋषि को तरुण अवस्था और मनोवांछित रूप प्रदान किया।

वंदन ऋषि अश्विनीकुमार के उपासक थे। वे प्रतिदिन उनकी स्तुति किया करते थे। जब बुढापे का लक्षण इनके अंग-प्रत्यंग पर लक्षित होने लगा तो उन्होंने अश्विनी कुमारों से प्रार्थना की कि वे इनके बुढापे को हटा दें। परम दयालु अश्विनी कुमारों ने उनकी प्रार्थना सुनकर शीघ्र ही उनके पास पहुंचे। फिर उन्होंने वंदन ऋषि के शरीर के शिथिल अंगों को वैसे ही नया बना दिया जैसे कोई शिल्पी पुराने रथ को उसके आव्यवों को इधर-उधर घटा-बढा कर नया बना देता है। उन्होंने ऋषि को नवयौवन तो प्रदान किया ही, साथ ही उनकी आयु भी बढ़ा दी।

इसी तरह कुष्ठ रोग से ग्रसित कुक्षिवान ऋषि की कन्या घोषा को कुष्ठ से छुटकारा दिलाकर उसे रूप-यौवन प्रदान किया। अश्विनी कुमारों ने श्याव ऋषि के कुष्ठ को भी चिकित्सा कर के दूर किया तथा उनकी त्वचा को सुन्दर बनाया, ऐसे थे परम दयालु रोगियों के हितैषी देववैध अश्विनी कुमार। किसी भी रोगी की दीनता और कष्ट को देखकर वे तुरंत उसका निवारण करते थे।

कुशल चिकित्सक अश्विनी कुमार
जब देवता और दैत्यूं का युद्ध हुआ, तब उसमें जिन देवताओं को दैत्यों ने घावत कर दिया था, उन सब को इन्हीं अश्विनी कुमारों ने तत्क्षण चिकित्सा करके घाव से रहित अर्था चंगा किया था, उस समय उन दोनों का वह चिकित्सा कार्य अत्यंत-चमत्कारी प्रतीत हुआ था।

जब इन्द्र की भुजा का स्तंभन (जकड गयी थी) हो आया था, तब उसकी भी चिकित्सा इन्हीं अश्विनी कुमारों ने की थी और जब चन्द्रमा सोम लोग से गिर पड़े थे, तब इन्हीं दोनों ने चिकित्सा करके उन्हें ठीक किया था।

जब पूषा नामक सूर्य के दांत टूट गए और भाग नामक सूर्य के नेत्र फूट गए थी तब अश्विनी कुमारों ने ही उनकी शल्य चिकित्सा की थी। जब चंद्रमा को राजयक्ष्मा (क्षय) रोग हो गया था तब उसकी चिकित्सा अश्विनी कुमारों ने ही की।

इन्हीं सब महत्वपूर्ण कार्यों के करने के कारण वैधों में श्रेष्ठ ये दोनों अश्विनी कुमार इन्द्रादि देवताओं के अत्यंत पूज्य हुए।

12 अप्रैल 2010

पुरातात्विक उत्खनन, बेसनगर ( विदिशा)

बेसनगर के पुरावेश विदिशा रेलवे स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। यह स्थल प्राचीन काल में महत्वपूर्ण राजनीतिक, धार्मिक तथा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। यहाँ से कई राजमार्ग पाटलिपुत्र से उज्जैन तथा श्रावस्ती से प्रतिष्ठान की और जाते थे। ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में यह उज्जयनी महाजनपद का समृद्धशाली नगर था। विदिशा, धसान नदी ( प्राचीन दशार्ण नदी) क्षेत्र में स्थित था और दशां प्रदेश की राजधानी रहा। दाशान प्रदेश की तलवार तथा यहाँ के लौह हतियार प्रसिद्ध थे। ब्रह्मण, बौध, जैन साहित्य तथा अभिलेख एवं मुद्राओं में इस क्षेत्र का वर्णन पाया जाता है। बेसनगर के प्राचीन नाम बेस्स्नगर, स्वामिपुर, वैश्यानगर, विश्वनगर, विदिशा, वेदसा, भैलसा, भिल्लर थे। ऐसा मन जाता है क़ी वनवास के समय श्रीराम यहाँ आये थे तथा यह स्थल चारण तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है क़ी राम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न ने अपने पुत्र को विदिशा का राज्य दिया था। प्राचीन भारतीय शब्दकोष में आधुनिक बेसनगर का नाम विश्वनगर बताया जाता है। ऐसा मन जाता है क़ी इस नगर को सूर्यवंशी राजा रुक्मांगद ने बसाया था। विष्णु का विमान यहीं रुका था। सम्राट बन्ने से पूर्व अशोक विध्षा तथा उज्जैन के राज्यपाल थे। उसने विदिशा के सेठ की पुत्री देवी से विवाह किया था। उसके पुत्र महेंद्र तथा संघमित्रा साँची से बौध धर्म का प्रचार करने सर्वप्रथम श्रीलंका गए थे। अशोक ने अपनी पत्नी देवी के आग्रह पर वेदिस्गिरी (साँची) पर स्तूप का निर्माण करवाया था।

प्राचीन समय में साँची भी बेसनगर का महत्वपूर्ण अंग था। प्राचीन समय में साँची भी बेसनगर का महत्वपूर्ण अंग था। बेसनगर स्थित हिलियोडोरस स्तम्भ (खाम्बबा) से वैष्णव धर्म के विषय में जानकारी प्राप्त होती है तथा ऐसा भी ज्ञात होता है क़ी विदिशा में भागभद्र के दरबार में तक्षिला से यावंदूत हिलियोडोरस और उसने वैष्णव धर्म की अच्छाइयों को देखकर भागवत धर्म स्वीकार कर विष्णु मन्दिर का निर्माण करवाया तथा गरुड़ स्तम्भ की स्थापना की थी। मगध के शासक पुष्यमित्र शंगु के समय विदिशा पश्चिम क्षेत्र की राजधानी मानी जाती थी। शंगुकाल में साँची के स्तूप का विकास हुआ था। विदिशा (बेसनगर) में हाती दांत का कार्य अधिक होता था। साँची स्तूप की चारों दिशाओं में तोरण द्वार निर्मित किये गए जो हीनयान कला के महत्वपूर्ण उदहारण मानेज जाते हैं। कालिदास रचित मेघदूत तथा मालविकाग्निमित्रम में इस क्षेत्र की भौगोलिक तथा तत्कालीन घटनाओं का वर्णन किया गया है। उन्होंने वेत्रवती (बेतवा) का बहुत सुंदर वर्णन किया है।

बेसनगर का क्षेत्र सातवाहन, कुषाण, पद्मावती (पवाया) के भारशिव नागवंशी शाशकों के अंतर्गत रहकर बहुत ही विकसित हुआ। गुप्तकाल में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वित्य की मालवा विजय के उपलक्ष्य में विदिशा के निकट उदयगिरी में गुफाओं का निर्माण हुआ जिनके अभिलेख गुफाओं में देखने को मिलते हैं। बेसनगर के दुर्जनपुर से प्राप्त रामगुप्त के समय की तीन जैन प्रतिमाओं की पादपीठ पर उत्कीर्ण लेख से गुप्त सम्राट रामगुप्त के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। विदिशा के भैसला नाम से यह निष्कर्ष निकाला गया क़ी बेतवा के तट पर भिल्ल्स्वामी (सूर्य) का विशाल मन्दिर था, परन्तु यह मन्दिर कहाँ था, ज्ञात नहीं हो सका है।

दसवीं-ग्यारवीं शताब्दी के पश्चात विदिशा बेसनगर से हटकर वर्तमान विदिशा क्षेत्र में बस गया, जिसका विकसित स्वरुप आज विधमान है। प्रतिहार, परमार तथा मालवा के सुल्तानों के पश्चात विदिशा का यह क्षेत्र ग्वालियर के मराठा शासकों (सिंधिया) के अंतर्गत आकर बहुत विकसित हुआ। नया विदिशा बसने का एक प्रमुख कारण यह भी माना जाता है कि बेस तथा में निरंतर बाढ़ आती रही। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस क्षेत्र में कई स्थानों पर किये गए पुरातात्विक उत्खनन से ये तथ्य उजागर हुए हैं। साथ ही मिटटी की विभिन्न परतों में जले हुए अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। इन उत्खननों से प्राचीन इतिहास के विषय में ठोस प्रमाण मिले, जिनसे विभिन्न युगों क़ी सभ्यताएं प्रकाश में आई हैं।

आजादी से पूर्व ग्वालियर राज्य के पुरातत्व विभाग द्वार किया गए उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष ग्वालियर, विदिशा तथा अन्य संग्राहलयों में देखे जा सकते हैं। इस क्षेत्र की विश्व प्रसिद्ध प्रतिमाएं भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में भी देखी जा सकती हैं। इनमें प्रमुख शंगुकल कल्पवृक्ष तथा यक्षी प्रतिमा है। शैली के आधार पर ये प्रतिमाएं लगभग बाईस सौ बर्ष प्राचीन मानी जाती हैं।

बेसनगर क्षेत्र में समय-समय पर किये गए पुरातात्विक सर्वेक्षण के आधार पर यह तो निश्चित हो गया है क़ी पाषाणकालीन संस्कृति के अवशेषों से लेकर मध्यकालीन संस्कृति तक के अवशेष लगातार क्रमबद्ध प्रकाश में आये। शिलाश्रयों तथा उनके आसपास पूर्व, मध्य तथा उत्तर पुरापाषाण्कालीन उपकरण प्रचुर मात्रा में पाए गए हैं।

मध्यप्रदेश में विशेष रूप से बेसनगर क्षेत्र के अंतर्गत ताम्राश्मकालीन अवशेषों में आहाड सभ्यता के अवशेषों एवं उस समय के मृदभाण्डों का मिलना महत्वपूर्ण माना गया है, परन्तु बेसनगर से महाभारतकालीन चित्रित धूसर मृदभाण्डों का मिलना भी महत्वपूर्ण है। पलवल, दिल्ली, मथुरा, कुरुक्षेत्र, अहिछ्त्र, हस्तिनापुर, रुपड, कोटला निहंग, मुरैना जिले में कोटवार, गिलुलीखेडा इत्यादि स्थलों पर चित्रित धूसर मृदभाण्ड उत्खनन से एवं ऊपरी सतह पर पर्याप्त मात्र में मिलते हैं। उज्जैन के आस-पास वैश्य टेकरी क्षेत्र में तथा संदीपनी आश्रम के आसपास भी ऊपरी सतह पर इस प्रकार के मृदभाण्ड सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त हुए हैं। ये मृदभाण्ड लौह युग अथवा महाभारतकालीन संस्कृति के विकास के सूचक हैं। परन्तु बेसनगर में चित्रित धूसर मृदभाण्डों उत्खनन में मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हरियाण, पंजाब में हडप्पाकालीन मृदभाण्डों के साथ चित्रित धूसर मृदभाण्ड मिलना आश्चर्यजनक होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण भी हैं। बेसनगर में तम्राश्मयुगीन संस्कृति के मृदभाण्डों के साथ चित्रित धूसर मृदभाण्डों का मिलना भी उतना ही आश्चर्यजनक है, जो ताम्राश्मयुग की समाप्ति के साथ साथ लौह युग अथवा महाभारतकालीन संस्कृति का प्रारंभ दर्शाता है।

इसके साथ ही पुरातात्विक सर्वेक्षण के अंतर्गत मुरैना जिले में एक ओर कायथा मृदभाण्ड मिले हैं वहीँ दूसरी ओर इस मुरैना जिले में चित्रित धूसर मृदभाण्ड भी प्राप्त हुए हैं। वाकणकर कायथ को हड़प्पा से पहले हा मानते थी। यदि हम विचार करें तो बेसनगर उत्खनन से स्पष्ट हो गया है कि यहां ताम्राश्मयुगीन मृदभाण्डों के साथ चित्रित धूसर मृदभाण्ड भी प्रप्त होते हैं। एक ओर बेतवा तट पर स्थित रंगई स्थल से आहाड, मालवा, नवाश्मयुगीन "सेल्ट" मिला है, वहीँ दूसरी ओर बेतवा तट पर ताम्राश्मयुगीन संस्कृति के मृदभाण्ड, नवाश्मयुगीन "सेल्ट" तथा चित्रित धूसर मृदभाण्ड मिले हैं। यह हो सकता है क़ी ताम्राश्मयुगीन संस्कृति के अंतिम चारण के साथ ही चित्रित धूसर मृदभाण्डों का प्रयोग प्रारम्भ हो गया हो। बेसनगर के पश्चिम में शुंगकालीन सुरक्षा दीवार के नीचे स्तर पर जो मौर्यकाल तथा उसके पहले का स्तर है, उसके भी नीचे केवल चित्रित धूसर मृदभाण्डों के तुकडे, जो उत्तम श्रेणी के थे, प्राप्त हुए। रंगी उत्खनन में वाकणकर बेसनगर आये थे। उनका कहना था क़ी यहाँ कायथा मृदभाण्ड मिलना चाहिए, परन्तु न मिलने पर उन्होंने बताया क़ी भविष्य में उत्खनन किया जाए तो कायथा मृदभाण्ड अवश्य मिल सकते हैं।

बेसनगर से एक महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है, क़ी उत्तरी काले ओपदार मृदभाण्ड मौर्यकाल तथा कुछ बाद तक इनका निर्माण होना बंद हो गया था। इनके टूट जाने पर इन्हें ताम्बे क़ी रिबित तथा पत्ती से जोड़ा जाता था। उत्खनन में इन मृदभाण्डों की भग्न पत्ती भी प्राप्त हुई, जिससे बह जोड़े गए थे। बेसनगर कई बार बाढ़ तथा अग्निकां से उजड़ा तथा पुनः बसा, जिसका प्रमाण यहाँ युगयुगीन टीले हैं। यहाँ के निवासी बहादुर थे, फिर भी बाढ़, अग्निकां तथा युद्ध की बार-बार परेशानी के पश्चात वर्तमान विदिशा में विशाल दुर्ग का परकोटा निर्मित पर बस गए थे, जिसके प्रमाण प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। इसके बावजूद भी खाम्बाबा क्षेत्र में बसावट निरंतर वर्तमान युग तक चलती रही।

11 अप्रैल 2010

तू कौन?- मैं शेखचिल्ली

अनेक कपोल- कल्पित हास्य-कथाओं के नायक शेखचिल्ली वस्तुतः जाति से शेख मुसलमान थे। इनका जन्म बलूचिस्तान के एक खानाबदोश कबीले में हुआ था।

निरंतर घुमक्कड़ी का जीवन जीने के कारण शेखचिल्ली पढ़ न सके। हाँ, आये दिन की परेशानियों और अभावों ने इनको आवश्यकता से अधिक हवाई किलेबाजी अता फरमा दी।

बचपन ही से शेखचिल्ली चमत्कारों की तलाश में पीर-फकीरों के दीवाने रहे। घुमक्कड़ी का जीवन इन्हें रास नहीं आया। रात-दिन ऐशो-आराम के साधन पा लेने के सपने और तुनकमिजाज अधिकारियों और सामंतों की तरह अपने को पेश करने के हवाई पुल बांधना इनकी नियति बनती गई।

वह जमाना ही अंधविश्वासों, झाड-फूंक और गंडे-तावीजों का था। फिर जिस कबीलियाई परिवेश में शेखचिल्ली गोदी से उतर धरती पर चलने लायक बने, उसमें तो अंधविश्वासों की जडें दिमाग के हर कोने में जमी थीं। अभावों में पलता भावुक बाल शेखचिल्ली इन्हीं अंधविश्वासों की परिणति में काल्पनिक चमत्कारों के रंग भरना सीख गया।

एक किवदंती के अनुसार शेखचिल्ली क़ी इन बे-सिर-पैर की हरकतों से तंग आकर एक रात उसके कबीले वाले किसी 'सूखे करेजे' (सूखी झाड़ियों का झुण्ड) के पास इन्हें सोता छोड़कर आगे निकल गए। शेखचिल्ली के जीवन का यह एक नया मोड़ था। अब वह नितांत अकेला रह गया था।

अकेलेपन की इस भावना ने उसकी कल्पना में पंख लगा दिए। जो उससे दूर था, अप्राप्य था, उसके पास होने के सुखद सपने और भटकना ही उसका जीवन बन गया। मनचाहा पा लेने की इच्छा से उसने फकीरों, ओझाओं और टोने-टोटके करने वाले नाजूमियों के दामन पकड़ने चाहे। न जाने क्यों, जैसकि ऐसी सूरतों में अक्सर होता है, उसमें कुंठा के या कमतरी के भाव नहीं हुए। हो जाते तो आज न शेखचिल्ली होता, न उसकी कहानियां।

शेखचिल्ली क्वेटा की बंजर धरती से कुरुक्षेत्र के हरियल इलाके में कैसे और कब आये, कोई नहीं जानता। केवल यह सोचा ही जा सकता है क़ी वह उन दिनों सीमा पार से आने वाले किसी जन-प्रवाह में बहकर कुरुक्षेत्र आ पहुंचे।

कुरुक्षेत्र उन दिनों हिन्दू साधू-संतों के साथ-साथ मुस्लिम फकीरों और पीरों की शरण-स्थली बन चूका था। शेखचिल्ली भी चमत्कारों की चाह में वहां के किसी पीर के मुरीद बन गए।

उन दिनों झज्जर एक छोटी-सी रियासत थी। पंजाब के अधिकाँश भाग से मराठों का शासन समाप्त हो चुका था और मुस्लिम शासकों की हर जगह तूती बोलनी शुरू हो गयी थी। शेखचिल्ली को कुरुक्षेत्र में नयी जिंदगी तो मिल गयी, मगर उसकी कल्पनाशीलता कम होने की उपेक्षा और अधिक निखरती गयी।

उन्हीं दिनों नारनौल के रईस हाफिज नूरानी से उनकी मुलाक़ात हुई। हाफिज नूरानी शेखचिल्ली क़ी न जाने किस अदा पर फ़िदा हुए क़ी उन्हें साथ इ आये। झज्जर के नवाबी घराने से हाफिज नूरानी क़ी खाई जान-पहचान थी। उन्होंने शेखचिल्ली को नवाब के दरबार में नौकरी दिलवा दी। शादी भी करा दी क़ी शेखचिल्ली के भटकावों में थोडा ठहराव आ जाए।

झज्जर एक छोटी-सी रियासत थी। जितनी आमदनी थी, लगभग उतने ही खर्चे थे। इसलिये शेखचिल्ली को उस नौकरी से इतना तो कभी नहीं मिल सका क़ी नवाब के दुसरे मुलाजिमों के तरह मजे से खा-पी सकें। हाँ, नवाब का मुलाजिम होने के कारण लाख खामियां होने के बावजूद भी, रियासत में उनकी इज्जत थी।

कहा जाता है क़ी स1800 के आसपास शेखचिल्ली झज्जर रियासत छोड़कर फिर कुरुक्षेत्र वापस चले गए। फ़कीर बन गए। उस समय तक उनकी आयु अस्सी के आस पास हो चली थी। उनके दोष हाफिज नूरानी भी अल्लाह को प्यारे हो गए थे और शेखचिल्ली की बेगम भी चल बसी थीं। रियासत पर भी दुर्भाग्य के बादल उड़ने शुरू हो गए थे और अंग्रेजों ने अवध को हड़पने की तैयारियों के साथ-साथ पंजाब की और हाथ बढाने शुरू कर दिए थे।

आजादी की पहली लड़ाई से लगभग पचास वर्ष पूर्व ही कुरुक्षेत्र में शेखचिल्ली की मृत्यु हो गयी। उस समय तक उनको मानने वालों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी थी। कुरुक्षेत्र में स्थित शेखचिल्ली का मकबरा आज भी इस बात के गवाही देता है क़ी शेखचिल्ली अपने समय की उन शक्सियतों में से थे, जिनकी मौत पर गम मनाने वालून के कमी नहीं होती और जिन्हें इतिहास के पन्नों में ज़िंदा रखने की जरूरत महसूस की जाती है।

शेखचिल्ली को अक्सर हवाई किलेवाजी में दक्ष एक कामचोर मूर्ख की तरह चित्रित किया जाता है। हवाई किलेबाजी वह बेशक थे, किन्तु यदी गंभीरता से मनन किया जाए, तो शेखचिल्ली की हवाई किलेबाजी में अनेक सामाजिक असमानताओं और अहं के बंधनों को तोड़ डालने की चत्पताहत सहज ही महसूस की जा सकती है। शेखचिल्ली का व्यक्तित्व समाज के शोषण और तिरस्कार का प्रतिबिम्ब है। वह सबकुछ पा लेने की अदम्य इच्छा है, जिसमें सचमुच पा लेने की क्षमता को समाज ने पंगु बना डाला हो। फिर भी उनके किरदार में दया, परोपकार, और संतोष के झलक पूरी परिलक्षित होती है।

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बेगम के पैर
तेंदुए का शिकार
सिर पर टोकरा
आसमानी चूहा
नीम पर गायब
घोड़े क़ी छलांग

शेखचिल्ली की चल गई

शेखचिल्ली बाजार में यह कहता हुआ भागने लगा, “चल गई, चल गई!” बात क्या थी?

एक दिन शेखचिल्ली बाजार में यह कहता हुआ भागने लगा, “चल गई, चल गई!” उन दिनों शहर में शिया-सुन्नियों में तनाव था और झगड़े की आशंका थी।

उसे ‘चल गई, चल गई’ चिल्लाते हुए भागते देखकर लोगों ने समझा कि लड़ाई हो गई है। लोग अपनी-अपनी दूकानें बंद कर भागने लगे। थोड़ी ही देर में बाजार बंद हो गया।

कुछ समझदार लोगों ने शेखचिल्ली के साथ भागते हुए पूछा, “अरे यह तो बताओ, कहां पर चली है? कुछ जानें भी गई हैं क्या?”

शेखचिल्ली थोड़ा ठहरा और हैरान होकर पूछा, “क्या मतलब?”

“भाई, तुम्हीं सबसे पहले इस खबर को लेकर आए हो। यह बताओ लड़ाई किस मुहल्ले में चल रही है।”

“कैसी लड़ाई?” शेखचिल्ली ने पूछा।

“अरे तुम्हीं तो चिल्ला रहे थे कि चल गई चल गई।”

“हां-हां”, शेखचिल्ली ने कहा “वो तो मैं इसलिए चिल्ला रहा था कि बहुत समय से जेब में पड़ी एक खोटी दुअन्नी, आज एक लाला की दुकान पर चल गई है।”

शेखचिल्ली का कफन

एक जगह कुछ लोग इकट्ठे बैठे थे। शेखचिल्ली भी वहीं बैठा था। कस्बे के कुछ समझदार लोग और हकीम जी दुर्घटनाओं से बचने के उपाय पर विचार-विमर्श कर रहे थे। किस दुर्घटना पर कौन-सी प्राथमिक चिकित्सा होनी चाहिए, इस पर भी विचार किया जा रहा था।

थोड़ी देर में हकीम जी ने वहां बैठे सभी लोगों से पूछा, “किसी के डूब जाने पर पेट में पानी भर जाए और सांस रुक जाए तो तुम क्या करोगे?” सब चुप थे।

हकीम जी के अन्य साथी बोले, “तुम बोलो शेखचिल्ली, किसी के डूबने पर उसकी सांस रुक जाए तो सबसे पहले तुम क्या करोगे?”

“उसके लिए सबसे पहले कफन लाऊंगा। फिर कब्र खोदने वाले को बुलाऊंगा”, शेखचिल्ली ने जवाब दिया।

सड़क यहीं रहती है

एक दिन शेखचिल्ली कुछ लड़कों के साथ, अपने कस्बे के बाहर एक पुलिया पर बैठा था। तभी एक सज्जन शहर से आए और लड़कों से पूछने लगे, ‘क्यों भाई, शेख साहब के घर को कौन-सी सड़क गई है?’ शेखचिल्ली के पिता को सब ‘शेख साहब’ कहते थे। उस गाँव में वैसे तो बहुत से शेख थे, परंतु ‘शेख साहब’ चिल्ली के अब्बाजान ही कहलाते थे। वह व्यक्ति उन्हीं के बारे में पूछ रहा था। वह शेख साहब के घर जाना चाहता था।

परन्तु उसने पूछा था कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है। शेखचिल्ली को मजाक सूझा। उसने कहा, ‘क्या आप यह पूछ रहे हैं कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘हाँ-हाँ, बिल्कुल!’ उस व्यक्ति ने जवाब दिया।

इससे पहले कि कोई लड़का बोले, शेखचिल्ली बोल पड़ा, ‘इन तीनों में से कोई भी रास्ता नहीं जाता।’ ‘तो कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘कोई नहीं।’‘क्या कहते हो बेटे?’ शेख साहब का यही गाँव है न? वह इसी गाँव में रहते हैं न?’ ‘हाँ, रहते तो इसी गाँव में हैं।’ ‘मैं यही तो पूछ रहा हूँ कि कौन-सा रास्ता उनके घर तक जाएगा।’

‘साहब, घर तक तो आप जाएँगे।’ शेखचिल्ली ने उत्तर दिया, ‘यह सड़क और रास्ते यहीं रहते हैं और यहीं पड़े रहेंगे। ये कहीं नहीं जाते। ये बेचारे तो चल ही नहीं सकते। इसीलिए मैंने कहा था कि ये रास्ते, ये सड़कें कहीं नहीं जाती। यहीं पर रहती हैं। मैं शेख साहब का बेटा चिल्ली हूँ। मैं वह रास्ता बताता हूँ, जिस पर चलकर आप घर तक पहुँच जाएँगे।’

‘अरे बेटा चिल्ली!’, वह आदमी प्रसन्न होकर बोला, ‘तू तो वाकई बड़ा समझदार और बुद्धिमान हो गया है। तू छोटा-सा था जब मैं गाँव आया था। मैंने गोद में खिलाया है तुझे। चल बेटा, घर चल मेरे साथ। तेरे अब्बा शेख साहब मेरे लंगोटिया यार हैं। और मैं तेरे रिश्ते की बात करने आया हूँ। मेरी बेटी तेरे लायक़ है। तुम दोनों की जोड़ी अच्छी रहेगी। अब तो मैं तुम दोनों की सगाई करके ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली उस सज्जन के साथ हो लिया और अपने घर ले गया। आगे चलकर वह सज्जन शेखचिल्ली के ससुर बन गए।

शेखचिल्ली का नुकसान

एक दिन शेखचिल्ली की अम्मी ने उससे कहा, ‘बेटे, अब तुम जवान हो गए हो। अब तुम्हें कुछ काम-काज करना चाहिए।’ ‘क्या काम करूँ?’ शेखचिल्ली ने पूछा। ‘कोई भी काम करो।’

‘मेरी तो समझ में नहीं आता, अम्मी कि मैं क्या काम करूँ? मैं तो किसी तरह की दस्तकारी भी नहीं जानता।’ ‘बेटे, तुम्हारे अब्बाजान अब बूढ़े हो गए हैं। तुम्हें कोई-न-कोई काम-धंधा जरूर करना चाहिए।’ ‘तुम ऐसा कहती हो तो ठीक है। मैं काम की तलाश में जाता हूँ।’ ‘जाओ।’ अम्मी ने कहा।

‘जा रहा हूँ। पर मुझे बढ़िया- सा खाना खिलाओ। मैं खा-पीकर ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली बोला।

‘अभी बनाए देती हूँ।’ अम्मी ने उत्तर दिया। शेखचिल्ली की माँ ने उसके लिए बढ़िया-बढ़िया पकवान बनाए और उन्हें खिला-पिलाकर उसे नौकरी की तलाश में भेज दिया। शेखचिल्ली मस्ती में झूमता हुआ घर से निकल पड़ा। उसके दिमाग में नौकरी या मजदूरी के सिवा कोई बात नहीं थी।

वह घर से बहुत दूर निकल गया। एक जगह रास्ते में उसे एक सेठ मिला। वह घी का हंडा सिर पर लिए जा रहा था। बोझ के कारण सेठ के कदम लड़खड़ा रहे थे। सेठ ने उसे देखते ही कहा, ‘ए भाई! मजदूरी करोगे?’ ‘बिलकुल करूँगा। बंदा तो मजदूरी की तलाश में है ही।’ ‘तो मेरा यह हंडा ले चलो। इसमें घी है। घी बिखर न जाए! तुम इसे मेरे घर तक पहुँचा दोगे तो मैं तुम्हें एक अधन्ना दूँगा।’

‘सिर्फ एक अधन्ना!’ चिल्ली ने पूछा। ‘हाँ,’ सेठ ने उत्तर दिया। ‘लाओ सेठजी, मैं ही लिए चलता हूँ। पहली बार मजदूरी कर रहा हूँ, दो पैसे कम ही सही।’ शेखचिल्ली ने कहा। और उसने सेठ का घी से भरा हुआ वह बड़ा बर्तन अपने सिर पर रख लिया। सिर पर घी का बर्तन रखकर शेखचिल्ली उस सेठ के साथ चल दिया।

चलते-चलते शेखचिल्ली सोचने लगा, यह सेठ मुझे दो पैसे देगा। दो पैसे यानी आधा आना। आधा आना यानी कि दो पैसे।

उनमें एक मुर्गी और एक मुर्गे का चूज़ा खरीदा जा सकता है। वे चूज़े बड़े होंगे। एक बड़ी मुर्गी और मुर्गा। मुर्गी अंडे देगी। वह रोज अंडे देगी। खूब चूज़े बनेंगे। कुछ दिनों में बहुत-सी मुर्गियाँ हो जाएँगी। ढेरों मुर्गियाँ हो जाएँगी तो वे और अंडे दिया करेंगी। अंडे बेचने से मुझे बहुत आमदनी होगी।

फिर तो पैसों की कमी ही नहीं रहेगी। अपने लिए एक शानदार घर बनाऊँगा। बहुत-सी जमीन खरीदूँगा। भैंसे खरीदकर डेरी बनाऊँगा। दूध बेचूँगा। दूध और अंडों का थोक व्यापारी बन जाऊँगा तो पूरे इलाके में मेरी धाक जम जाएगी। सब लोग मेरा माल पसंद करेंगे और खरीदेंगे। व्यापार चल निकलेगा।

शेखचिल्ली के कारनामे

शेखचिल्ली ससुराल में

शेखचिल्ली नाम का एक लड़का रहता था। उसकी माँ बहुत गरीब थी। शेखचिल्ली का पिता मर चूका था। उसकी माँ बेचारी किसी तरह शेखचिल्ली को पालती-पोसती थी।

शेखचिल्ली स्वभाव से नटखट तो था ही, साथ ही वह बेवक़ूफ़ भी था। उसकी बेवकूफी के कारण उसकी माँ को बहुत से उलाहने सुनने पड़ते थे।

अंत में एक दिन ऊबकर उसने शेखचिल्ली को घर से निकाल दिया। शेखचिल्ली घर से निकल कर पड़ोस के एक दूसरे गाँव में चला गया। वहां उसने एक झोंपड़ी बनायी और रहने लगा। उसका स्वभाव बहुत ही खुशदिल था इसलिये गाँव के लोग उसके मित्र हो गए। उन्होंने उसकी बड़ी मदद दी और उसका रोटी-पानी का खर्च चलने लगा।

उसकी जिन्दादिली गाँव के मुखिया की लड़की रजिया उस पर आशिक हो गई। गाँव के कुछ नौजवान भी शेखचिल्ली के हिमायती थे। उन्होंने एक दिन दवाव डालकर मुखिया क़ी लड़की रजिया से उसकी शादी करा दी। शेखचिल्ली को शादी में दान-दहेज़ में बहुत कुछ रूपये तथा जेवरात भी मिले। शेखचिल्ली अपनी औरत तथा शादी में मिले हुए रूपये और जेवरात लेकर अपने गाँव वापिस लौट आया।

गाँव में लौटकर शेखचिल्ली अपनी माँ से मिला तथा बोला-माँ देख। मैंने मुखिया की लड़की से शादी कर ली है।

शेखचिल्ली की माँ ने देखा क़ी बेटा बगल के गाँव बाले मुखिया की लड़की से शादी कर लाया है। उसकी माँ ने यः भी देखा क़ी शेखचिल्ली दहेज़ में बहुत-सी दौलत तथा समान इत्यादि ले आया है, तो वह मन ही मन बहुत खुश हो गई।

परन्तु वह जानती थी कि शेखचिल्ली एक बिलकुल बेकार लड़का है। इस्कू पैसा कमाने का कोई भी हुनर मालुम नहीं। इसलिये वह कहने लगी-बेटा तू महालानतो आदमी है। तेरे किये कुछ भी होने का नहीं।

यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा-"माँ! मैंने इतना बड़ा काम किया है। क्या यह कम है?"

उसकी माँ ने कहा-बेटा ! यह बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया है। तू अगर अपने मन से जान-बूझकर कोई काम करे और उसमें कोई तरक्की करके चार पैसे कमाकर ला सके तो मैं जानू। तू मुझे बुढापे में सुख नहीं दे सकता।

यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा-माँ तू ऐसा मत बोल मैं वक़्त आने पर तेरे लिये कुछ कर सकता हूं।

इसी तरह कुछ और वक़्त बीत गया। उसकी औरत नैहर चली गयी और एक साल बीत गया। एक दिन उसने ससुराल जाने की ठान ली। मान से पुचा-अम्मीजान मेरी ससुराल कहाँ है? मुझे उसका पता बताओ, ताकि मैं वहां एक बार हो आऊं मैं भूल गया हूँ।

इस पर उसकी माँ ने कहा-बेटा तुझमे अक्ल तो है ही नहीं। इसलिये अगर मैंने पता बताया तो तू भूल जाएगा। इसलिये मेरी बात का ख़याल रखे तो सीता अपने ससुराल पहुँच जाएगा। यह कहकर उसने कहा-बेटा तू सीधा अपनी नाक की सीध में चले जाना, कहीं से इधर-उधर मुड़ना नहीं, बस सीधे अपनी ससुराल पहुँच जाएगा।

यह सुनकर शेखचिल्ली सीधन ससुराल को चल दिया। चलते चलते उसकी माँ ने कहा बेटा! जो साग सत्तू घर में था मैंने बाँध दिया है। यह पोटली लेता जा और बूख लगने पर यही साग-सत्तू खा लेना।

शेखचिल्ली अपने घर से चलकर सीधा अपने नाक की सीध में रवाना हुआ। वह जब अपने घर से सीधा मैदान में दो तीन कोस निकल आया, तो सामने एक दरख्त पडा। उसने सोचा-माँ ने नाक की सीध में चलने को कहा था। यह सोचकर वह पेड़ पर चढ़ गया और फिर दूसरी तरफ से उतर फिर नाक की सीच में रवाना हुआ।

आगे चलने पर उसे एक नदी मिली। उसने उस नदी को बड़ी मुश्किल से पार किया और आगे चल पड़ा। इसी प्रकार चलता हुआ वह आखिरकार अपनी ससुराल आ पहुंचा।

ससुराल पहुँचने पर उसकी भली-भाँती खातिरदारी की जाने लगी। परन्तु उसने साग-सत्तू छोड़कर कुछ भी खाना स्वीकार न किया, क्योंकि उसकी माँ ने ऐसा ही कहा था।

रात को बचा-खुचा साग-सत्तू खाकर सो रहा। रात्रि को उसे भूक सताने लगी। अब वह क्या करे? आखिर भूक से ऊबकर वह बहार निकल आया और मैदान में एक दरख्त के नीचे लेट गया।

उस पेड़ पर मधुमखियों का एक बहुत बड़ा छत्ता था। छत्ता मधु से इतना ज्यादा भरा हुआ था क़ी उसमें से रात को मधु टपकता था। शेखचिल्ली जब उस वृक्ष के नीचे लेटा। तो ऊपर से उसके बदन पर मधु टपकने लगा। मधु की कुछ बूंदे उसके मूंह में टपकीं तो बह उसे चाटने लगा और बड़ा खुश हुआ। कुछ बूंदे उसके बदन पर भी टपकती रहीं और वह परेशान होकर इधर-उधर करवटें बदलता रहा।

शेखचिल्ली बेवक़ूफ़ तो था ही। उसे इस बात का पता नहीं लग सका क़ी आधिर पेड़ पर से क्या चीज उसके बदन पर टपकती है। निदान लाचार होकर वह वहां से उठा और घर के भीतर घुसकर एक कोठरी में जाकर सो रहा। उस कोठरी के अंदर घुनी हुई रूई राखी हुई थी। शेखचिल्ली को नर्म-नर्म रूई मिली तो उसी में आराम के साथ जाकर सो रहा। उसके बदन के चारों और शहद तो लिप्त हुआ था ही, अब धुनी हुए रुई उसी के साथ बदन भर में चारों और चिपक गयी और उसका बदन और उसकी शक्ल अजीब किस्म की हो गयी।

सुबह हुई तो शेखचिल्ली की औरत कुछ रुई निकालने उस कोठरी में घुशी। तब तक शेखचिल्ली जाग उठा था। उसको ऐसे रूप में देखकर उसकी औरत चीख उठी उसने हिम्मत बांधकर पुछा तुम कौन हो? शेखचिल्ली ने जोर से डांट कर कहा-'चुप'

वह बहार भागी और अपनी माँ से जाकर कहा-अम्मा! उस रूई वाली कोठरी में 'चुप' घुस आया है। उसकी शक्ल बहुत भयानक है।

यह सुनकर उसकी माँ ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया। कई लोग उस कोठरी में घुसे। शेखचिल्ली को देखकर सबने पुछा- तुम कौन हो?

'शेखचिल्ली ने फिर चिल्लाकर कहा-चुप'
अब तो उसका ऐसा रूप देखकर सबकी सिट्टी-पिट्टी गम हो गयी। सब समझे चुप नाम क़ी कोई भयानक बला घर में घुस आई है। उसे निकालने के लिये किसी सयाने को बुलाना चाहिए।

कई एक ओझा मौलवी बुलाए गए। सबने कितने ही मंत्र-जंत्र किए मगर वह चुप नाम की बला नहीं मिकली। आखिर हार कर मौलवियों ने सलाह दी कि आप लोग यह मकान खाली करके किसी दूसरे में चले जाइए, वरना वह बला आप लोगों का सत्यानाश कर देगी।

शेखचिल्ली के ससुराल वालों ने यह मकान खाली कर दिया और दूसरे मकान में चले गए। शेखचिल्ली को अवसर मिल गया और वह रात्री के समय उस कोठरी से निकल कर बाहर की ओर भागा।

रास्ते में कुछ चोर दिखाई पड़े। आगे एक किसान के बहुत से भेड़ वगैरह बंधे थे। शेखचिल्ली चोरों के दर के मरे उन्हीं भेड़ बकरियों के बीच जा घुसकर बैठ गया। उधर वे चोर भी उसी तरफ आ पहुंचे।

चोरों ने केई एक भेड़ों को चुरा लिया। उन्हीं में शेखचिल्ली ने को भी रूई से लिपटा हुआ देख कोई दुम्बा भेड़ समझकर साथ लेकर भाग चले। भागते-भागते वे नदी के किनारे आ पहुंचे। इतने में सुबह होने लगी। उन्होंने सब भेड़ों को जमीन पर पटक दिया। यह देखकर शेखचिल्ली ने कहा- मुझे थोड़ा धीरे से पटकना।

उसकी आवाज सुनकर चोरों की नानी मर गई। उन्होंने समझा कि यह कोई भेड़ के रूप में भयानक बला है जो कि इस तरह बोलती है। उन्होंने शेखचिल्ली को पानी में फ़ेंक दिया और भाग चले।

उधर पानी में शहद घुल जाने के कारण शेखचिल्ली के बदन पर चिपकी हुई रूई साफ़ हो गई उसने बदन मल मल कर स्नान किया और सुबह होते ही ससुराल आया। दूसरे मकान में जाकर अपने ससुर को मिला और पूछा- आपने मकान क्यों छोड़ दिया।

ससुर ने कहा- मेरे मकान में कोई 'चुप' नाम की बला घुस गई है।

शेखचिल्ली ने झूठ-मूठ जाकर कोई मंत्र पढ़ दिया और फिर कहा-वह बाला चली गई।

आखिर सब लोग उसी मकान में चले आए।

शेखचिल्ली की बड़ी खातिरदारी हुई। वह सस्रुआल में ही रहने लगा।

एक दिन उसने ससुर से कहा- मैं कोई कारोबार करना चाहता हूँ। मुझे एक गाडी बनवा दीजिये। दिन में लकडियाँ काटूंगा और गाडी में लाद कर बाजार में बेचूंगा। ससुर ने एक बैलगाड़ी बनवा दी। शेक्चिल्ली ने जंगल से लकडियाँ लाने के लिये बैलगाड़ी जोती, बैलगाड़ी लेकर वह चला तो कुछ आगे जाकर गाडी जंगल में चर्र चूं चर्र चूं की आवाज करने लगी। शेख्चिली ने सोचा-यह मेरे कारोबार का पहला दिन है और यह गाडी साली अपशकुन कर रही है। आरे की मदद से गाडी को काटकर टुकडे-टुकडे कर दिया तथा उसे वहीं फैंक-फांक कर आगे लकड़ी काटने चल दिया।

शेखचिल्ली एक मोटा पेड़ देखकर उसी पर चढ़ गया। एक बहुए ही मोती डाल पर जा बैठा और कुल्हाड़ी से काटकर जब थक गया तो आरा हाथ में उठाकर उसी से उसने उस डाल को काटना शुरू किया।

इतने में एक आदमी नीचे गुजरा। उसने जब शेखचिल्ली को डाल काटते देखा तो ठहर गया। गौर से देखने पर उसको मालूम हुआ कि शेख्चिल्ले उसी डाल को डाट रहा था जिस पर कि वह बैठा हुआ है।

उसने कहा-अरे मूर्ख! तू जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है। इस तरह तू डाल के साथ-साथ खुद भी नीचे गिर जाएगा।

शेखचिल्ली ने कहा-अरे जा जा! मैं भला जमीन पर कैसे गिर सकता हूँ।

वह आदमी वहीं तहर गया। थोड़ी देर में डाल कट गई और डाल के साथ-साथ शेखचिल्ली भी नीचे आ गिरा।

तब शेखचिल्ली उसको कहने लगा-आप तो बहुत बड़े आदमी मालूम होते हैं। मुझे यह तो बताइये कि मैं कब मरूँगा?

इस पर उस आदमी ने कहा-मैं यह सब नहीं जानता मगर शेखचिल्ली कहाँ छोड़ने वाला था। उसने उसका पीछा पकड़ लिया तो उसने छुड़ाने के लिये कहा-तू आज शाम को मर जाएगा।

यह कहकर वह आदमी तो चला गया। अब शेखचिल्ली ने सोचा कि मुझे आज शाम को मर ही जाना है तो अच्छा है कि पहले से ही कब्र के अंदर लेट जाऊं ताकि मेरे मरने के बाद मेरे रिश्तेदारों को कब्र खोदनी न पड़े।

ऐसा सोचकर वह उसी जंगल में एक गड्ढा खोदकर उसमें लेट रहा।

उसी तरफ से एक आदमी जा रहा था। उसके पास एक मटका था। वह आवाज लगाता जा रहा था कि अगर कोई इस मटके को मेरे घर तक पहुंचा दे तो मैं उसे दो पैसे दूंगा।

यह सुनकर शेखचिल्ली झटपट कब्र के अंदर से उठकर खडा हुआ और कहने लगा-लाओ! मैं तुम्हारा मटका ले चलता हूँ।

यह सुनकर उस आदमी ने वह मटका शेखचिल्ली के हवाले किया। शेखचिल्ली उसे लेकर चल पडा। रास्ते में यह सोचता जा रहा था कि मुझे उसकी मजदूरी के दो पैसे मिलेंगे। दो पैसे का एक अंडा खरीदूंगा उसे अंडे से मुर्गी पैदा होगी। उस एक मुर्गी से बहुत सी मुर्गियां पैदा होंगी। उन मुर्गियों को बेचकर एक बकरी खरीद लूंगा। बकरी से बहुत सी बकरियां होंगी उन बकरियों को बेचकर एक गाय खरीदूंगा। उस गाय से बहुत सी गायें पैदा होंगी। उन्हें बेचकर घोडी से बहुत सी घोड़ियाँ पैदा होंगी। उन सबको बेचकर बहुत से रूपये मिलेंगे। तब मैं अपना मकान बनाऊंगा। फिर एक घोड़े पर बैठकर बाजार में सैर करने निकालूँगा। फिर कारोबार करके बहुत सी दौलत पैदा करूंगा। फिर घर में ठाठ से शाम को बैठक में हुक्का गुद्गुदौंगा, औरत बच्चों को मेरे पास खाना खाने के लिये भेजेगी।

उस वक्त मैं हुक्का गुडगुडाते हुए जोरों से सिर हिलाकर कहूंगा-अभी खाना नहीं खाउंगा।

शेखचिल्ली ने ज्योंही अपने ख्यालों में जोरों से सिर हिलाया कि वह मटका सिर पर से गिरकर फूट गया और अंदर का सारा सामान मिट्टी में गिरकर खराब हो गया।

इस अपर उस आदमी ने शेखचिल्ली की अच्छी खासी मरम्मत की। शेखचिल्ली का सपना टूट गया।


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