27 फ़रवरी 2010

होली के मौसम में












रत्न चिकित्सा

रत्न सौंदर्य में इजाफा करने के साथ उपचार का काम भी करते हैं।
रत्न मानव मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं यही कारण है कि इनका उपयोग जन्म पत्री में दुर्बल ग्रहों को धीरे-धीरे मजबूत करने तथा रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।
सबसे मूल्यवान रत्नों में हीरे का नाम ऊपर आता है। हीरे से भी कई गुणा ज्यादा मूल्यवान अलेक्स नामक रत्न होता है। सूर्य के प्रकाश में इसका रंग हल्का हरा दिखाई पड़ता है, लेकिन टार्च या बल्ब की रोशनी में यह रंग बदलकर लाल हो जाता है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी यह रत्न अन्य रत्नों की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी होता है। आम मरीजों के बीच रत्न चिकित्सा पद्धति [स्टोन थैरेपी] के नाम से मशहूर इस विधि द्वारा कैंसर, दमा, एलर्जी, गैस्ट्रिक, मधुमेह, चर्मरोग, वात, गठिया, जाण्डिस आदि असाघ्य रोगों का सफल उपचार किया गया है। प्राकृतिक चिकित्सा की एक पद्धति क्रोमोपैथी का भी कहना है कि विभिन्न प्रकार के रोगों में व्यक्ति को निरोग करने के लिए रंगों में असाधारण शक्ति होती है।
सुप्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री डॉ। इडैगर मैसी का कहना है कि चिकित्सा का भविष्य विभिन्न रंगों की प्रकाश किरणों और घ्वनि-तरंगों पर निर्भर करता है। शोध एवं चिकित्सा ग्रंथों के आधार पर रत्नों के रोग निदान के लिए प्रयोग का संक्षिप्त विवरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है-

माणिक्य
भावप्रकाश में माणिक्य को कषाय और मधुर रस प्रधान बताया गया है। शास्त्रों में माणिक्य दीपनं तृष्यं कफवातक्षयातिनुत् कहकर शरीर में उत्पन्न उष्णता, जल, कफ, वात तथा क्षय रोग का नाशक माणिक्य को कहा गया है। घबराहट, बेचैनी, धड़कन, भय, भ्रम, वक्षपीड़ा, श्वास वेग, याददाश्त की कमी, ह्वदय रोग, रक्तचाप, दुर्बलता, पेटदर्द एवं आंखों की बीमारियों में इसे काफी लाभकारी बताया गया है।

नीलम
यह रत्न विषम ज्वर, मिरगी, मस्तिष्क की कमजोरी, पागलपन, हिचकी, गठिया, सन्धिवात, पेटदर्द, बेहोशी, पक्षाघात, बवासीर, हर्निया आदि रोगों पर उपयोग किया जाता है।

लहसुनिया
इनका उपयोग मूलत: पित्तजनक रोगों के लिए किया जाता है। कफ, खांसी, बवासीर, पित्तदोष, वीर्यदोष, अण्डकोश के रोग, खून की कमी, चेचक, नेत्ररोगहारक, बलबुद्धि एवं वीर्य वर्द्धन में भी लहसुनिया का प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त अम्बर का प्रयोग सन्निपात रोग में पुखराज का मुख की दर्गन्ध में किया जाता है।

गोमेद
यह वायु शूल, चर्मरोग, कृमि रोग, बवासीर, फाइलेरिया, गर्मी, हैजा आदि में विशेष लाभप्रद है। इसके अतिरिक्त गोमेद को बलवर्द्धक, बुद्धिवर्द्धक, कफननाशक तथा मस्तिष्क की दुर्बलता को दूर करने में उपयोगी बताया जाता है।

हीरा
वीर्यदोष, धातुरोग, शीघ्रपतन, प्रमेह, नपुसंकता, गर्भक्षय, मधुमेह, टीबी, एनीमिया, अन्धापन, मोतियाबिंद, हिस्टीरिया आदि विभिन्न रोगों पर रामबाण के समान हीरा काम करता है।
विशेष सावधानी हीरा को खाने से मृत्यु तक हो जाती है, अत: कोई भी औषधि बिना चिकित्सक के परामर्श के न ली जाए।

पन्ना
आयुर्वेद के ग्रंथ रत्न समुच्चय [रस रत्न समुच्चय] में पन्ना को श्रेष्ठ विषनाशक बताया गया है। श्वास, दमा, खांसी, अल्सर, रक्तचाप, टांसिल, अनिद्रा, सन्निपात, प्रमेह, मिचली आदि को नष्ट कर बुद्धि एवं वीर्यवर्द्धन की अचूक शक्ति को रखता है।

पुखराज
यह स्वयं में एक महौषधि होते हुए मुख संबंधी रोग, गुर्दा, मूत्राशय, यकृत, तिल्ली, रक्तचाप, कंठरोग, गुप्तेन्द्रिय रोग, आंत्रशोथ, प्रदर, कैंसर, हडि्डयों के रोग, सिरदर्द आदि नष्ट करने वाला होता है।

मोती
मोती कैल्शियम की सर्वोत्तम भरपाई करने वाला रत्न है। आयुर्वेद के भावप्रकाश में मौक्तिक शीतल तुष्यं चक्षुव्यं बल पुष्टिदम् कहकर इसे शीतल, वीर्यवर्द्धक एवं आंखों के लिए उपयोगी तथा बलकारक बताया गया है। अवचेतना, मूर्छा, हिस्टीरिया, कैंसर, एलर्जी, क्रोध, अनिद्रा, मानसिक विकास, मूत्ररोग, दन्तरोग, भय, भ्रम, दिमागी बीमारियों के साथ ही वायु विकार, खूनी बवासीर, मस्तिष्क ज्वर तथा श्वेत प्रदर एवं रक्त प्रदर आदि में भी योग लाभदायक है।

रामायण – उत्तरकाण्ड - पुरवासियों में अशुभ चर्चा

जब अयोध्या में शासन करते हुये काफी समय बीत गया तब एक दिन रामचन्द्रजी सीता के गर्भवती होने का समाचार पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुये। वे सीता से बोले, "विदेहनन्दिनी! अब तुम शीघ्र इक्ष्वाकुवंश को पुत्ररत्न प्रदान करोगी। इस समय तुम्हारी क्या इच्छा है? मैं तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूरा करूँगा। तुम निःसंकोच होकर अपने मन की बात कहो।"

पति के मृदु वचन सुनकर सीताजी मुस्कुराकर बोलीं, "स्वामी! मेरी इच्छा एक बार उन पवित्र तपोवनों को देखने की हो रही है। मैं कुछ समय उन महर्षि तपस्वियों के पास रहना चाहती हूँ जो कन्द-मूल-फल खाकर गंगा के तट पर तपस्या करते हैं। कम से कम एक रात्रि वहाँ विनास करके मैं उन्हें उग्र तपस्या करते देखना चाहती हूँ। इस समय यही मेरी अभिलाषा है।"

प्राणप्रिया पत्‍नी की अभिलाषा जानकर रघुनन्दन बोले, "सीते! तुम्हारी अभिलाषा मैं अवश्य पूरी करूँगा। तुम निश्‍चिंत रहो। कल प्रातःकाल ही मैं तुम्हें गंगातट वासी ऋषियों के आश्रम की ओर भेजने की व्यवस्था करा दूँगा।" सीता को आश्‍वासन देकर श्रीराम राजदरबार में चले गये। राजदरबार से निवृत हो वे अपने मित्रों में बैठकर हास्यविनोद की वार्ता करने लगे। मित्रमण्डली में उनके बालसखा विजय, मधुवत्त, काश्यप, मंगल, कुल, सुराजि, कालिय, भद्र, दन्तवक्त्र और सुभागध थे। बातो ही बातों में रामचन्द्र ने पूछा, "भद्र! आजकल नगर में किस बात की चर्चा विशेषरूप से होती है? नगर और जनपद के लोग मेरे, सीता, भरत-लक्ष्मण आदि भाइयों और माता कैकेयी के विषय में क्या-क्या बातें करते हैं? प्रायः देखा जाता है कि राजा यदि आचार-विचार से हीन हो तो सर्वत्र उसकी निन्दा होती है।"

भद्र ने उत्तर दिया, "सौम्य! सर्वत्र आपके विषय में अच्छी ही चर्चा सुनने को मिलती है। दशग्रीव पर जो आपने विजय प्राप्त की है, उसको लेकर सब लोग आपकी खूब प्रशंसा करते हैं और आपकी वीरता के कहानी अपने बच्चों को बड़े उत्साह से सुनाते हैं।"

रघुनाथ बोले, "भद्र! ऐसा नहीं हो सकता कि सब लोग मेरे विषय में सब अच्छी ही बातें कहें। कुछ ऐसी भी बातें हो सकती हैं जो उन्हें अच्छी न लगती हों। संसार में सभी प्रवृति के लोग होते हैं। इसलिये तुमने जो कुछ भी सुना हो निश्‍चिंत होकर बेखटके कहो। यदि उन्हें मुझमें कोई दोष दिखाई देता होगा तो मैं उसे दूर करने की चेष्ट करूँगा।"

यह सुनकर भद्र बोला, "वे कहते हैं कि श्रीराम ने समुद्र पर पुल बाँध कर ऐसा दुष्कर कार्य किया है जिसे देवता भी नहीं कर सकते। रावण को मारकर वानरों को भी वश में कर लिया परन्तु एक बात खटकती है। रावण को मारकर उस सीता को घर ले आये जो इतने दिनों तक रावण के पास रही। फिर सीता से घृणा करने के बजाय उन्होंने उसे कैसे अपने पास रख लिया? भला सीता का चरित्र क्या वहाँ पवित्र रहा होगा? अब प्रजाजन भी ऐसी स्त्रियों को अपने घरों में रखने लगेंगे क्योंकि जैसा राजा करता है, प्रजा भी वैसा ही करती है। इस प्रकार सारे नगर निवासी भिन्न-भिन्न प्रकार की बातें करते हैं।"

भद्र की बात का अन्य साथियों ने भी यह कहकर समर्थन किया कि 'हमने भी ऐसी बातें लोगों के मुख से सुनी हैं।' सबकी बात सुनकर राजा राम ने उन्हें विदा किया और इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे। फिर उन्होंने द्वारपाल को आज्ञा देकर अपने तीनों भाइयों को बुलाया। भाइयों ने आकर उन्हें सादर प्रणाम किया और देखा, श्रीराम बहुत उदास हैं तथा उनके नेत्रों में आँसू डबडबा रहे हैं। श्रीराम ने बड़े आदर से अपने भाइयों को अपने पास बिठाकर कहा, "बन्धुओं! मैंने तुम्हें इसलिये बुलाया है कि मैं तुम्हें उस चर्चा की जानकारी दे दूँ जो पुरवासियों में मेरे और सीता के विषय में चल रही है। उनमें सीता के चरित्र के विषय में घोर अपवाद फैला हुआ है और मेरे विषय में भी उनके मन में घृणा के भाव हैं। लक्ष्मण! यह तो तुम जानते ही हो कि सीता ने अपने चरित्र की पवित्रता सिद्ध करने के लिये सबके सामने अग्नि में प्रवेश किया था और उस समय स्वयं अग्निदेव ने उन्हें निर्दोष बताया था। इस प्रकार विशुद्ध आचार वाली सीता को स्वयं देवराज इन्द्र ने मेरे हाथों में सौंपा था। फिर भी अयोध्या में यह अपवाद फैल रहा है और लोग मेरी निन्दा कर रहे हैं। मैं लोक निन्दा के भय से अपने प्राणों को और तुम्हें भी त्याग सकता हूँ, फिर सीता का परित्याग करना तो मेरे लिये तनिक भी कठिन नहीं होगा। इसलिये लक्ष्मण! कल प्रातः तुम सारथी सुमन्त के साथ सीता को ले जाकर राज्य की सीमा से बाहर छोड़ आओ। गंगा के उस पार तमसा के तट पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है। उसके निकट उन्हें छोड़कर लौट आना। मैं तुम लोगों को अपने चरणों और जीवन की शपथ देता हूँ, मेरे निर्णय के विरुद्ध कोई कुछ मत कहना। सीता ने गंगातट पर ऋषियों के आश्रम देखने की इच्छा प्रकट की थी, वह भी पूरी हो जायेगी।" फिर गहरी साँस भरकर नेत्रों में आये आँसू पोंछकर वे मौन हो गये।

श्री शनिदेवजी की आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥
जय जय श्री शनिदेव...

श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी ।
नीलांबर धार नाथ गज की असवारी ॥
जय जय श्री शनिदेव...

किरीट मुकुट शीश सहज दिपत है लिलारी ।
मुक्तन की माल गले शोभित बलिहारी ॥
जय जय श्री शनिदेव...

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी ।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥
जय जय श्री शनिदेव...

देव दनुज ॠषि मुनि सुरत नर नारी ।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥
जय जय श्री शनिदेव...

26 फ़रवरी 2010

माता गुजरीजी की कुर्बानी {MOTHER OF GURU GOBIND SINGH JI}

नारी शक्ति की प्रतीक, वात्सल्य, सेवा, परोपकार, त्याग, उत्सर्ग की शक्तिस्वरूपा माता गुजरीजी का जन्म करतारपुर (जालंधर) निवासी लालचंद व बिशन कौरजी के घर सन् 1627 में हुआ था।

8 वर्ष की आयु में उनका विवाह करतारपुर में श्री तेगबहादुर साहब के साथ हुआ।

विवाह के कुछ समय पश्चात गुजरीजी ने करतारपुर में मुगल सेना के साथ युद्ध को अपनी आँखों से मकान की छत पर चढ़कर देखा। उन्होंने गुरु तेगबहादुरजी को लड़ते देखा और बड़ी दिलेरी से उनकी हौसला अफजाई कर अपनी हिम्मत एवं धैर्य का परिचय दिया। सन 1666 में पटना साहिब में उन्होंने दसवें गुरु गोबिंदसिंहजी को जन्म दिया।

अपने पति गुरु तेगबहादुरजी को हिम्मत एवं दिलेरी के साथ कश्मीर के पंडितों की पुकार सुन धर्मरक्षा हेतु शहीदी देने के लिए भेजने की जो हिम्मत माताजी ने दिखाई, वह विश्व इतिहास में अद्वितीय है।

सन 1675 में पति की शहीदी के पश्चात उनके कटे पावन शीश, जो भाई जीताजी लेकर आए थे, के आगे माताजी ने अपना सिर झुकाकर कहा, 'आपकी तो निभ गई, यही शक्ति देना कि मेरी भी निभ जाए।'

सन् 1704 में आनंदपुर पर हमले के पश्चात आनंदपुर छोड़ते समय सरसा नदी पार करते हुए गुरु गोबिंदसिंहजी का पूरा परिवार बिछुड़ गया। माताजी और दो छोटे पोतें , गुरु गोबिंदसिंहजी एवं उनके दो बड़े भाईयों से अलग-अलग हो गए। सरसा नदी पार करते ही गुरु गोबिंदसिंहजी पर दुश्मनों की सेना ने हमला बोल दिया।

चमकौर साहब की गढ़ी के इस भयानक युद्ध में गुरुजी के दो बड़े साहबजादों ने शहादतें प्राप्त कीं। साहबजादा अजीतसिंह को 17 वर्ष एवं साहबजादा जुझारसिंह को 14 वर्ष की आयु में गुरुजी ने अपने हाथों से शस्त्र सजाकर मृत्यु का वरण करने के लिए धर्मयुद्ध भूमि में भेजा था।

सरसा नदी पर बिछुड़े माता गुजरीजी एवं छोटे साहिबजादे जोरावरसिंहजी 7 वर्ष एवं साहबजादा फतहसिंहजी 5 वर्ष की आयु में गिरफ्तार कर लिए गए।

उन्हें सरहंद के नवाब वजीर खाँ के समक्ष पेश कर ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया गया और फिर कई दिन तक नवाब, काजी तथा अन्य अहलकार उन्हें अदालत में बुलाकर धर्म परिवर्तन के लिए कई प्रकार के लालच एवं धमकियाँ देते रहे।

दोनों साहबजादे गरजकर जवाब देते, 'हमारी लड़ाई अन्याय, अधर्म एवं जोर-जुल्म तथा जबर्दस्ती के खिलाफ है। हम तुम्हारे इस जुल्म के खिलाफ प्राण दे देंगे लेकिन झुकेंगे नहीं।' अततः 26 दिसंबर 1704 को वजीर खाँ ने उन्हें जिंदा चुनवा दिया।

साहिबजादों की शहीदी के पश्चात बड़े धैर्य के साथ ईश्वर का शुक्राना करते हुए माता गुजरीजी ने अरदास की एवं 26 दिसंबर 1704 को प्राण त्याग दिए।

रामायण – उत्तरकाण्ड - सीता का निर्वासन

प्रातःकाल बड़े उदास मन से लक्ष्मण ने सुमन्त से सुन्दर घोड़ों से युक्‍त रथ लाने के लिये कहा। उसमें सीता जी के लिये एक सुरम्य आसन लगाने का भी आदेश दिया। सुमन्त के पूछने पर बताया कि उन्हें जानकी के साथ महर्षियों के आश्रम पर जाना है। रथ आ जाने पर लक्ष्मण सीता जी के पास जाकर बोले, "देवि! आपने महाराज से मुनियों के आश्रमों में जाने की अभिलाषा प्रकट की थी। अतएव मैं महाराज की आज्ञा से तैयार होकर आ गया हूँ ताकि आपको गंगा तट पर ऋषियों के सुन्दर आश्रमों तक पहुँचा सकूँ।

लक्ष्मण के वचन सुनकर सीता जी प्रन्नतापूर्व उनके साथ चलने को तैयार हो गईं। मुनिपत्‍नियों को देने के लिये उन्होंने अपने साथ बहुत से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकार के रत्‍न ले लिये। उन दोनों को रथ पर सवार कराकर सुमन्त द्रुतगति से रथ को वन की ओर ले चला। मार्ग में सीता लक्ष्मण से कहने लगी, "वीरवर! मुझे बहत से अपशकुन दिखाई दे रहे हैं। मेरी दायीं आँख फड़क रही है, शरीर काँप रहा है, हृदय अस्वस्थ सा प्रतीत हो रहा है। तुम्हारे भाई कुशल से तो हैं? मेरी सब सासुएँ सानन्द तो हैं?" सीता की अधीर वाणी सुनकर लक्ष्मण ने अपने मन की उदासी दबाकर उन्हें धैर्य बँधाया। गोमती के तट पर पहुँचकर एक आश्रम में उन्होंने रात व्यतीत की। दूसरे दिन प्रातःकाल वे आगे चले और दोपहर तक गंगा के किनारे पर जा पहुँचे। गंगा की जलधारा को देखते ही लक्ष्मण के नेत्रों से जलधारा बह चली और वे फूट-फूट कर रोने लगे। सीता ने चिन्तित होकर उनसे रोने का कारण पूछा। लक्ष्मण ने उनके प्रश्‍न का कोई उत्तर नहीं दिया और रथ से उतर नौका पर सवार हो सीता सहित गंगा के दूसरे तट पर जा पहुँचे।

गंगा के उस तट पर नौका से उतर लक्ष्मण सीता से हाथ जोड़कर बोले, "देवि! आज मुझे बड़े भैया ने वह काम सौंपा है जिससे सारे लोक में मेरी भारी निन्दा होगी। मुझे यह बताते हुये भारी पीड़ा हो रही है कि अयोध्या में आपके लंका प्रवास की बात को लेकर भारी अपवाद फैल गया है। इससे अत्यन्त दुःखी होकर महाराज राम ने आपका परित्याग कर दिया है और मुझे आपको यहाँ गंगा तट पर छोड़ जाने का आदेश दिया है। वैसे यह स्थान सर्वथा निरापद है क्योंकि यहाँ महायशस्वी ब्रह्मर्षि वाल्मीकि जी का आश्रम है। आप यहाँ उपवास परायण आदि करती हुईं धार्मिक जीवन व्यतीत करें।"

लक्ष्मण के ये कठोर वचन सुनकर जनकनन्दिनी को ऐसा आघात लगा कि वे मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। फिर चेतना आने पर बोलीं, "लक्ष्मण! क्या विधाता ने मुझे जीवन भर दुःख भोगने के लिये ही उत्पन्न किया है? पहले मुझे राघव से अलग होकर लंका में रहना पड़ा और अब उन्होंने मुझे सदा के लिये त्याग दिया। लक्ष्मण! मेरी समझ में यह नहीं आता कि यदि मुनिजन मुझसे यह पूछेंगे कि तुम्हें श्रीराम ने किस अपराध के कारण त्यागा है तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगी? मेरी सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि मैं गंगाजी में डूब कर अपने प्राण भी विसर्जन नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करने से मेरे पति का राजवंश नष्ट हो जायेगा। तुम दुःखी क्यों होते हो? तुम तो महाराज की आज्ञा का ही पालन कर रहे हो, जो तुम्हारा कर्तव्य है। जाओ, तुम लौट जाओ और सबसे मेरा सादर प्रणाम कहना।"

सीता से आज्ञा लेकर अत्यन्त दुःखी मन से लक्ष्मण मृतप्राय शरीर को ढोते हुये रथ पर बैठे और बैठते ही मूर्छित हो गये। मूर्छा दूर होने पर वे फिर आँसू बहाने लगे।

उधर सीता विलाप करती हुई चीत्कार करने लगी। दो मुनिकुमारों ने सीता को इस प्रकार विलाप करते देखा तो उन्होंने ब्रह्मर्षि वाल्मीकि के पास जाकर इसका वर्णन किया। यह समाचार सुनकर वाल्मीकि जी सीता जी के पास पहुँचे और बोले, "पतिव्रते! मैंने अपने योगबल से जान लिया है कि तुम राजा दशरथ की पुत्रवधू और मिथिलेश की पुत्री हो। मुझे तुम्हारे परित्याग की बात भी मालूम हो चुकी है। इसलिये तुम मेरे आश्रम में चलकर अन्य तपस्विनी नारियों के साथ निश्‍चिंत होकर निवास करो। वे तुम्हारी यथोचित देखभाल करेंगीं।" मुनि के वचन सुनकर सीता ने उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और महर्षि के आश्रम में आकर रहने लगी।

तुलसी एक दिव्य पौधा है।

तुलसी की २१ से ३५ पत्तियाँ स्वच्छ खरल या सिलबट्टे (जिस पर मसाला न पीसा गया हो) पर चटनी की भांति पीस लें और १० से ३० ग्राम मीठी दही में मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट तीन मास तक खायें। ध्यान रहे दही खट्टा न हो और यदि दही माफिक न आये तो एक-दो चम्मच शहद मिलाकर लें। छोटे बच्चों को आधा ग्राम दवा शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भुलकर भी न दें। औषधि प्रातः खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं। दवा दिनभर में एक बार ही लें परन्तु कैंसर जैसे असह्य दर्द और कष्टप्रद रोगो में २-३ बार भी ले सकते हैं।

इसके तीन महीने तक सेवन करने से खांसी, सर्दी, ताजा जुकाम या जुकाम की प्रवृत्ति, जन्मजात जुकाम, श्वास रोग, स्मरण शक्ति का अभाव, पुराना से पुराना सिरदर्द, नेत्र-पीड़ा, उच्च अथवा निम्न रक्तचाप, ह्रदय रोग, शरीर का मोटापा, अम्लता, पेचिश, मन्दाग्नि, कब्ज, गैस, गुर्दे का ठीक से काम न करना, गुर्दे की पथरी तथा अन्य बीमारियां, गठिया का दर्द, वृद्धावस्था की कमजोरी, विटामिन ए और सी की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग, सफेद दाग, कुष्ठ तथा चर्म रोग, शरीर की झुर्रियां, पुरानी बिवाइयां, महिलाओं की बहुत सारी बीमारियां, बुखार, खसरा आदि रोग दूर होते हैं।

यह प्रयोग कैंसर में भी बहुत लाभप्रद है।

25 फ़रवरी 2010

वि‍वाह को नया रूप देते हैं वेडिंग प्‍लानर

भारतीय संस्‍कृति‍ में यह कहावत है कि‍ जोड़ियाँ ऊपर ही बनती हैं। हो सकता है यह बात सच भी हो, लेकिन इन दिनों जोड़ियों को सजाने और बिना किसी झंझट और बेहतर ढंग से शादी कराने का काम वेडिंग प्लानर बखूबी कर रहे हैं। शादी समारोह जैसे प्रमुख आयोजन में शादी का हॉल बुक करने से लेकर बारात आने तक की तैयारी करना कोई आसान काम नहीं, यही कारण है कि इसके बहुत ही प्रोफेशनल वेडिंग प्लानर की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
ऐसे समय में शादी के तमाम कामों और रस्मों को पूरा करने के लिए वेडिंग प्लानर बेहतर मदद करते हैं। यही कारण है कि इवेंट मैनेजमेंट के अंतर्गत आने वाले वेडिंग प्लानर का स्कोप लगातार बढ़ता जा रहा है। इसलिए जो स्टूडेंट्स चैलेंजिंग कोर्स करना चाहते हैं, उनके लिए वेडिंग प्लानर का करियर एक बेहतर ऑप्शन हो सकता है। आज अच्छे वेडिंग प्लानर की डिमांड चारों ओर है।
"विवाह समारोह अब स्टेटस सिंबल बन गए हैं लिहाजा इनमें भव्यता और चमक-दमक बढ़ गई है। ये ज्यादा बेहतर ढंग से आयोजित होने लगे हैं। ऐसी स्थिति में विवाह समारोह में "वेडिंग प्लानर" की जरूरत व भूमिका समय के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।"
प्लानर बनाते हैं हर रस्म को यादगार
वर्तमान में लोगों के पास समय की भारी कमी है, लेकिन शादी जैसे आयोजनों में महत्वाकाक्षाएँ कहीं ज्यादा होती हैं। आज हर कोई बिना तनाव के बेहतरीन व्यवस्था करना चाहता है और इसके लिए व्यावसायिक लोगों की सेवाएंँ लेना पसंद करता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि वेडिंग प्लानर न सिर्फ विवाह समारोह के आयोजन की पूरी योजना बनाता है बल्कि शादी की हर रस्म अदायगी को भी यादगार बनाता है जिसमें सगाई समारोह, महिला संगीत, बारात, स्वागत, वरमाला, प्रीतिभोज, बिदाई आदि रीति-रिवाजों के साथ अनेक छोटे-बड़े कार्यक्रमों की व्यवस्थाएँ वेडिंग प्लानर को करना होती है। शादी-समारोह को हर तरह के बजट और मूड के मुताबिक मैनेज करने की पूरी जिम्मेदारी वेडिंग प्लानर पर ही होती है।
सफल वेडिंग प्लानर बनने के गुर
वेडिंग प्लानर राखी जैन कहती हैं कि अच्छे वेडिंग प्लानर को सभी समुदायों की वेडिंग प्लानिंग के बारे में जानकारी होना चाहिए। शादी में रस्मों में किस तरह की साम्रगी चाहिए, इसकी पूरी लिस्ट प्लानर के टिप्स पर होना चाहिए। कार्यक्रम की तैयारी की बीच-बीच में जानकारी अपनी टीम से लेना चाहिए। फोटोग्राफ, वीडियो शूटिंग, कोरियोग्राफी का सही प्रबंधन करना आना चाहिए। खास शाही शादियों में किए गए नए-नए प्रयोगों को देखना चाहिए। हर बार नया प्रेजेटेंशन ही वेडिंग प्लानर को इस क्षेत्र में सफल बनाने के लिए महत्वपूर्ण होता है।

चैलेंजिंग और नया करियर है वेडिंग प्लानिंग
भारत में इस इंडस्ट्री को शुरुआती अवस्था में ही माना जा सकता है, लेकिन इसका आकार इन दिनों तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में विदेश में रहने वाले एनआरआई और विदेशी लोगों को अब भारतीय संस्कृति और रीति-रिवाज, शादियाँ खूब लुभा रहे हैं। इसलिए इस तरह के समारोह की तैयारी करने के लिए वेडिंग प्लानर्स की जरूरत कुछ ज्यादा ही होने लगी है। कई बड़ी इवेंट कंपनियों में इस तरह के प्रोफेशनल की माँग भी बढ़ने लगी है।
वेडिंग प्लानर की ट्रेनिंग भी
12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद इवेंट मैनेजमेंट के डिप्लोमा कोर्स में किया जा सकता है। पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स में एडमिशन के लिए बैचलर डिग्री आवश्यक है। देश के प्रमुख संस्थानों में इवेंट मैनेजमेंट संबंधित प्रमुख कोर्स जैसे डिप्लोमा इन इवेंट मैनेजमेंट, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन इवेंट मैनेजमेंट व इवेंट मैनेजमेंट में सर्टिफिकेट कोर्स होते हैं। इवेंट मैनेजमेंट से जुड़े लोग प्लानिंग से लेकर अंत तक सभी चीजों को मैनेज करते हैं। इसलिए इस कोर्स के अंतर्गत इवेंट प्लानिंग, बजट, रिस्क कवरेज, पब्लिक रिलेशन, कम्युनिकेशन स्किल आदि के बारे में पढ़ाया जाता है। सेकंड सेमेस्टर में प्रैक्टिकल नॉलेज पर अधिक फोकस करते हैं। इसलिए इंस्टीट्यूट स्टूडेंट्स को इवेंट मैनेजमेंट में एक्सपीरियंस और एक्सपोजर देने के लिए कंपनियों में ट्रेनिंग लिए भेजते हैं।
वेडिंग प्लानर बनने के कुछ टिप्स
इंटरनेशनल व पारंपरिक फैशन ट्रेंड की जानकारी।
हर धर्म के रीति-रिवाजों से अवगत होना जरूरी।
किसी भी परिस्थिति में सही बातचीत का हुनर हो।
इनोवेटिव और हर समय कुछ नया करने की इच्छा हो।
समाज के हर वर्ग के साथ अच्छे संबंध हों।
हर काम को समय पर पूरा करने का प्रबंधन।
देश के साथ प्रदेश का भी पूरा नॉलेज हो।
प्रमुख संस्थान
इवेंट मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, मुंबई
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इवेंट मैनेजमेंट, मुंबई
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इवेंट मैनेजमेंट, दिल्ली
यूनिवर्सिटी ऑफ पुणे, पुणे
नेशनल स्कूल ऑफ इवेंट, इंदौर

रामायण – उत्तरकाण्ड - लक्ष्मण की वापसी

रथ में मूर्छा भंग होने पर जब लक्ष्मण फिर विलाप करने लगे तो सुमन्त ने उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा, "वीरवर! आपको सीता के विषय में संताप नहीं करना चाहिये। यह बात तो दुर्वासा मुनि ने स्वर्गीय राजा दशरथ जी को पहले ही बता दी थी कि श्रीराम सदैव दुःख उठायेंगे। उन्हें प्रियजनों का वियोग उठाना पड़ेगा। मुनि के कथनानुसार दीर्घकाल व्यतीत होने पर वे आपको तथा भरत और शत्रुघ्न को भी त्याग देंगे। यह बात उन्होंने मेरे सामने कही थी, परन्तु स्वर्गीय महाराज ने मुझे आदेश दिया था कि यह बात मैं किसी से न कहूँ। अब उचित अवसर जानकर आपसे कह रहा हूँ। आपसे अनुरोध है कि आप यह बात भरत और शत्रुघ्न के सम्मुख कदापि न कहें।"

सुमन्त की बात सुनकर जब लक्ष्मण ने किसी से न कहने का आश्‍वासन देकर पूरी बात बताने का आग्रह किया तो सुमन्त ने कहा, "एक समय की बात है, दुर्वासा मुनि महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में रहकर चातुर्मास बिता रहे थे। उसी समय महाराज दशरथ वशिष्ठ जी के दर्शनों के लिये पहुँचे। बातों-बातों में महाराज ने दुर्वासा मुनि से पूछा कि भगवन्! मेरा वंश कितने समय तक चलेगा? मेरे सब पुत्रों की आयु कितनी होगी? कृपा करके मेरे वंश की स्थिति मुझे बताइये। इस पर उन्होंने महाराज को कथा सुनाई कि देवासुर संग्राम में पीड़ित हुये दैत्यों ने महर्षि भृगु की पत्‍नी की शरण ली थी। भृगु की पत्‍नी द्वारा दैत्यों को शरण दिये जाने पर कुपित होकर भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उसका सिर काट डाला। अपनी पत्‍नी के मरने पर भृगु ने क्रुद्ध होकर विष्णु को शाप दिया कि आपने मेरी पत्‍नी की हत्या की है, इसलिये आपको मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ेगा और वहाँ दीर्घकाल तक पत्‍नी का वियोग सहना पड़ेगा। शाप की बात बताकर महर्षि दुर्वासा ने रघुवंश के भविष्य सम्बंधी बहुत सी बातें बताईं। उसमें आप लोगों को त्यागने की बात भी बताई गई थी। उन्होंने यह भी कहा था कि रघुनाथजी सीता के दो पुत्रों का अभिषेक अयोध्या के बाहर करेंगे, अयोध्या में नहीं। इसलिये विधाता का विधान जानकर आपको शोक नहीं करना चाहिये।" ये बातें सुनकर लक्ष्मण का संताप कुछ कम हुआ।

केशिनी के तट पर रात्रि बिताकर दूसरे दिन दोपहर को लक्ष्मण अयोध्या पहुँचे। उन्होंने अत्यन्त दुःखी मन से श्रीराम के पास पहुँचकर सीता के परित्याग का सम्पूर्ण वृतान्त जा सुनाया। राम ने संयमपूर्वक सारी बातें सुनीं और अपने मन पर नियन्त्रण रखते हुये राजकाज में मन लगाया।

24 फ़रवरी 2010

रामायण – उत्तरकाण्ड - राजा नृग की कथा

एक दिन लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा, "महाराज! आप राजकाज में इतने व्यस्त रहते हैं कि अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखते" यह सुनकर रामचन्द्रजी बोले, "लक्ष्मण! राजा को राजकाज में पूर्णतया लीन रहना ही चाहिये। तनिक सी असावधानी हो जाने पर उसे राजा नृग की भाँति भयंकर यातना भोगनी पड़ती है।"

लक्ष्मण के जिज्ञासा करने पर उन्होंने राजा नृग की कथा सुनाते हुये कहा, "पहले इस पृथ्वी पर महायशस्वी राजा नृग राज्य करते थे। वे बड़े धर्मात्मा और सत्यवादी थे। एक बार उन्होंने तीर्थराज पुष्कर में जाकर स्वर्ण विभूषित बछड़ों युक्‍त एक करोड़ गौओं का दान किया। उसी समय उन गौओं के साथ एक दरिद्र ब्राह्मण की गाय बछड़े सहित आकर मिल गई और राजा नृग ने संकल्पपूर्वक उसे किसी ब्राह्मण को दान कर दिया। उधर वह दरिद्र ब्राह्मण वर्षों तक स्थान-स्थान पर अपनी गाय को ढूँढता रहा। अन्त में उसने कनखल में एक ब्राह्मण के यहाँ अपने गाय को पहचान लिया। गाय का नाम 'शवला' था। जब उसने गाय को नाम लेकर पुकारा तो वह गाय उस दरिद्र ब्राह्मण के पीछे हो ली। इस पर दोनों ब्राह्मणों में विवाद हो गया। एक कहता था, गाय मेरी है और दूसरा कहता कि मुझे यह राजा ने दान में दी है। दोनों झगड़ते हुये राजा नृग के यहाँ पहुँचे। राजकाज में व्यस्त रहने के कारण जब कई दिन तक नृग ने उनसे भेंट नहीं की तो उन्होंने शाप दे दिया कि विवाद का निर्णय कराने की इच्छा से आये प्रार्थियों को तुमने कई दिन तक दर्शन नहीं दिये, इसलिये तुम प्राणियों से छिपकर रहने वाले गिरगिट हो जाओगे और सहस्त्रों वर्ष तक गड्ढे में पड़े रहोगे। भगवान विष्णु जब कृष्ण के रूप में अवतार लेंगे तब वे ही तुम्हारा उद्धार करेंगे। इस प्रकार राजा नृग आज भी अपनी उस भूल का दण्ड भुगत रहे हैं। अतषव जब भी कोई कार्यार्थी द्वार पर आये, उसे सदा मेरे सामने तत्काल उपस्थित किया करो।"

राम का आदेश सुनकर लक्ष्मण बोले, "राघव! ब्राह्मणों का शाप सुनकर राजा नृग ने क्या किया?"

इस प्रश्‍न के उत्तर में श्रीराम ने बताया, "जब दोनों ब्राह्मण शाप देकर चले गये तो राजा ने अपने मन्त्री को भेजकर उन्हें वापिस बुलाया और उनसे क्षमायाचना की। फिर एक सुन्दर सा गड्ढा बनवाकर और अपने राजकुमार वसु को अपना राज्य सौंपकर उस गड्ढे में निवास करने लगे। ब्राह्मण के शाप का भारी प्रभाव होता है।"

23 फ़रवरी 2010

यहाँ सच होते हैं, हैल्दी कैरियर के सपने

Hospital Industry बदलाव के युग से गुजर रही है। समूची चिकित्सा प्रणाली आधुनिक होती जा रही है। प्रतिस्पर्धा के युग में सभी अस्पताल अच्छी सुविधायें देना चाहते हैं, यही वजह है कि चिकित्सा व्यवस्ता की देख - रेख का काम अब Management Professionals को दिया जाने लगा है। गुलाबी शहर के नाम से मशहूर जयपुर में Industry of Health Management Research इसी दिशा में स्टुडेंट्स को ट्रेनिंग देने का काम कर रहा है। इसकी स्थापना 1984 में हुई थी। इसे Department of Science and Technology aur Finance Ministry से मान्यता प्राप्त है। यहाँ Health Managment के क्षेत्र में एजुकेशन, रिसर्च और ट्रेनिंग एक साथ दी जाती है। इस प्रोग्राम का उद्देश मेडिकल से जुडी सारी गतिविधियों के लिये ऐसे प्रोफेशनल्स तैयार करना है, जो प्लानिंग और मैनेजमेंट तकनीक को अच्छी तरह से हैंडल कर सकें। यह संस्था रिसर्च, ट्रेनिंग और कंसल्टेंसी से जुडी अग्रणी के कंपनियों जैसे यूनेप, यूनिसेफ, दब्लुएचौओ, केयर, वर्ल्ड बैंक और Ministry of Health and Welfare, Planning Commission, Indian Councelling of Medical Research और विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करती है।

कोर्स: IIHRM में Hospital Management, Health Management aur Pharmaceuticals Management में दो साल पीजी प्रोग्राम करवाया जाता है, जो कि AICTE और Ministry of Human Resource Development से भी मान्यता प्राप्त डिग्री MBA के समतुल्य है। CNN-IBN और Out-Look के द्वारा किये गए 2008-09 सर्वे में इसे Health Management के क्षेत्र में पहला स्थान प्राप्त हुआ है।

प्रवेश प्रक्रिया
यहाँ 120 सीट हैं, जिसमें Hospital Management Stream के लिये 60 सीट है, Health Management के लिये 35 सीट और Pharmaceuticals Management के लिये 25 सीट होते हैं। इस संस्थान में प्रवेश पाने के लिये अभ्यर्थी को किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से स्नातक होना चाहिए। Working Executive भी इसके लिये आवेदन कर सकते हैं। हांलाकि दोनों के प्रवेश पक्रिया में अंतर होता है। परेश ग्रादुअते को कसी भी स्ट्रें में 50% अंक के साथ MAT Qualify करना जरुरी होता है। फाइनल इयर स्टुडेंटस भी प्रवेश परीक्षा दे सकते हैं। Working Executive के लिये 50% नम्बर के साथ सम्बंधित फील्ड में दो साल का अनुभव होना चाहिए। इनके लिये MAT Qualify करना जरुरी नहीं होता। चयन मृत के आधार पर होता है। MAT के स्कोर के अलावा चयन Group Discussion और Personal Interview में पर्वार्मेंस के आधार पर होता है।

प्लेसमेंट
IIHMR के Passouts के लिये Rainbexy, Health Care, Sipla, Infosys aur Medical Research Centre और बहुत सारे मालती फैसिलिटी हास्पिटल के द्वार खुले हैं। इन संस्थानों के यहाँ के स्टुडेंट्स के लिये रिसर्च सुविधा होने के साथ अंतिम वर्ष तक प्लेसमेंट भी हो जाती है। यहाँ से कोर्स करने के बाद छात्र विभिन्न Corporate Hospital, Pharmaceuticals Companies और अंतरास्ट्रीय व रास्ट्रीय स्टार पर कार्यरत स्वास्थ संस्थानों से भी जुड़ सकते हैं।

आवेदन की तिथि
आवेदन फ़ार्म भरने की अंतिम तिथि 31 मई होती है और Qualify करने के बाद जून के पहले सप्ताह में Interview होता है। नया सेशन जुलाई से शुरू होता है। आवेदन के लिये 500 रूपए के डिमांड ड्राफ्ट के साथ Institute of Health Management, Jaipur से संपर्क किया जा सकता है। आप चाहें तो संस्थान कि साईट से भी फ़ार्म Download कर उसे 500 रूपए के डिमांड ड्राफ्ट के साथ भेज सकते हैं।

हर बीमारी की जड़ है तनाव

तनाव के बुरे प्रभावों को हम सभी जान चुके हैं, लेकिन अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार मसूड़ों की सड़न से लेकर खांसी और बुखार जैसी बीमारियों के लिए भी यह जिम्मेदार है।

'एसोसिएशन आफ साइकोलाजिकल साइंस' की मासिक पत्रिका 'आबजर्वर' द्वारा प्रकाशित इस अध्ययन में मनोविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, स्नायु विज्ञान और अनुवांशिकी के क्षेत्र में किए गए अध्ययन के अनुसार तनाव लगभग सभी बीमारियों की जड़ है।

अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार तनाव विपरीत परिस्थितियों के अनुसार ढलने की इंसान की क्षमता को प्रभावित करता है। तनाव की परिस्थिति में 'एड्रनलीन' और 'कार्टीजोल' जैसे हारमोन निकलते हैं जिनके चलते धड़कन तेज होने और सांस की गति बढ़ने के अलावा रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है।

अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि तनाव के चलते मस्तिष्क में होने वाले बदलाव पेट व आंतों की गड़बड़ियों सहित मसूड़ों में खराबी, मधुमेह यहां तक की कैंसर का भी कारण बन सकते हैं। साथ ही इसके चलते कैंसर जैसी बीमारी और एचआईवी जैसे वायरसों से लड़ने की क्षमता भी प्रभावित होती है।

क्रोध शांत करने के कुछ उपाय

दो पके मीठे सेब बिना छीले प्रातः खाली पेट चबा-चबाकर खाने से गुस्सा शान्त होता है। पन्द्रह दिन लगातार खायें। थाली बर्तन फैंकने वाला और पत्नि और बच्चों को मारने पीटने वाला क्रोधी भी क्रोध से मुक्ति पा सकेगा।

जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क दुर्बल हो गये हो और जिन विद्यार्थियों को पाठ याद नहीं रहता हो तो इसके सेवन से थोड़े ही दिनों में दिमाग की कमजोरी दूर होती है और स्मरण शक्ति बढ़ जाती है। साथ ही दुर्बल मस्तिष्क के कारण सर्दी-जुकाम बना रहता हो, वह भी मिट जाता है।

कहावत है - "एक सेब रोज खाइए, वैद्य डाक्टर से छुटकारा पाइए।"

या आंवले का मुरब्बा एक नग प्रतिदिन प्रातः काल खायें और शाम को गुलकंद एक चम्मच खाकर ऊपर से दुध पी लें। बहुत क्रोध आना बन्द होगा।

रामायण – उत्तरकाण्ड - राजा निमि की कथा

श्रीरामचन्द्रजी बोले, "हे लक्ष्मण! अब मैं तुम्हें शाप से सम्बंधित एक अन्य कथा सुनाता हूँ। अपने ही पूर्वजों में निमि नामक एक प्रतापी राजा थे। वे महात्मा इक्ष्वाकु के बारहवें पुत्र थे। उन्होंने वैजयन्त नामक एक नगर बसाया था। इस नगर को बसाकर उन्होंने एक भारी यज्ञ का अनुष्ठान किया। पहले महर्षि वधिष्ठ को और फिर अत्रि, अंगिर, तथा भृगु को आमन्त्रित किया। परन्तु वशिष्ठ का एक यज्ञ के लिये देवराज इन्द्र ने पहले ही वरण कर लिया था, इसलिये वे निमि से प्रतीक्षा करने के लिये कहकर इन्द्र का यज्ञ कराने चले गये।

"वशिष्ठ के जाने पर महर्षि गौतम ने यज्ञ को पूरा कराया। वशिष्ठ ने लौटकर जब देखा कि गौतम यज्ञ को पूरा कर रहे हैं तो उन्होंने क्रद्ध होकर निमि से मिलने की इच्छा प्रकट की। जब दो घड़ी प्रतीक्षा करने पर भी निमि से भेंट न हो सकी तो उन्होंने शाप दिया कि राजा निमे! तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरे पुरोहित को वरण किया है, इसलिये तुम्हारा शरीर अचेतन होकर गिर जायेगा।। जब राजा निमि को इस शाप की बात मालूम हुई तो उन्होंने भी वशिष्ठ जी को शाप दिया कि आपने मुझे अकारण ही शअप दिया है अतएव आपका शरीर भी अचेतन होकर गिर जायेगा। इस प्रकार शापों के कारण दोनों ही विदेह हो गये।"

यह सुनकर लक्ष्मण बोले, "रघुकुलभूषण! फिर इन दोनों को नया शरीर कैसे मिला?"

लक्ष्मण का प्रश्‍न सुनकर राघव बोले, "पहले तो वे दोनों वायुरूप हो गये। वशिष्ठ ने ब्रह्माजी से देह दिलाने की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि तुम मित्र और वरुण के छोड़े हुये वीर्य में प्रविष्ट हो जाओ। इससे तुम अयोनिज रूप से उत्पन्न होकर मेरे पुत्र बन जाओगे। इस प्रकार वशिष्ठ फिर से शरीर धारण करके प्रजापति बने। अब राजा निमि का वृतान्त सुनो। राजा निमि का शरीर नष्ट हो जाने पर ऋषियों ने स्वयं ही यज्ञ को पूरा किया और राजा को तेल के कड़ाह आदि में सुरक्षित रखा। यज्ञ कार्यों से निवृत होकर महर्षि भृगु ने राजा नुमि की आत्मा से पूछा कि तुम्हारे जीव चैतन्य को कहाँ स्थापित किया जाय? इस पर निमि ने कहा कि मैं समस्त प्राणियों के नेत्रों में निवास करना चाहता हूँ। राजा की यह अभिलाषा पूर्ण हुई। तब से निमि का निवास वायुरूप होकर समस्त प्राणियों के नेत्रों में हो गया। उन्हीं राजा के प्रम पुत्र मिथिलापति जनक हुये और विदेह कहलाये।

22 फ़रवरी 2010

रामायण – उत्तरकाण्ड - राजा ययाति की कथा

इस आश्‍चर्यजनक कथा को सुनकर सुमित्रानन्दन बोले, "हे प्रभो! ऐसे ही शाप की कोई और कथा हो तो सुनाइये।"
लक्ष्मण के जिज्ञासा देखकर कौशल्यनन्दन बोले, "नहुष के पुत्र राजा ययाति के दो पत्‍नियाँ थीं - एक शर्मिष्ठा और दूसरी देवयानी। शर्मिष्ठा दैत्यकुल के वृषपर्वा की कन्या थी और देवयानी शुक्राचार्य की। राजा को शर्मिष्ठा से विशेष स्नेह था। शर्मिष्ठा ने पुरु को और देवयानी ने यदु को जन्म दिया। दोनों ही बालक बड़े तेजस्वी थे। देवयानी को उचित सम्मान न पाते देख यदु ने उससे कहा कि माता! इस असम्मानजनक जीवन से क्या यह अधिक उचित न होगा कि हम अग्नि में प्रवेश करके यह जीवन समाप्त कर दें? यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगी तो भी मैं यह जीवन धारण नहीं करूँगा।

पुत्र की यह बात सुनकर देवयानी ने सारी बातें अपने पिता भृगुनन्दन शुक्राचार्य को बता दी और स्वयं भी जल मरने को तैयार हो गई। उसने कहा कि ययाति मेरा ही नहीं आपका भी अनादर करते हैं। इससे क्रोधित होकर शुक्राचार्य ने ययाति को लक्ष्य करके शाप दिया कि दुरात्मने! तुम्हारी अवस्था जराजीर्ण वृद्ध जैसी हो जाये। तुम बिल्कुल शिथिल हो जाओ। इस प्रकार शाप देकर वे मौन हो गये।"

लक्ष्मण ने पूछा, "इसके बाद क्या हुआ प्रभो! राजा ययाति ने फिर क्या किया?"

श्रीराम बोले, "इस शाप के फलस्वरूप राजा ययाति को ऐसी वृद्धावस्था ने आ घेरा जो दूसरे की युवावस्था से बदली जा सकती थी। ययाति ने यदु से अनुरोध किया कि तुम मुझे अपना यौवन देकर मेरी वृद्धावस्था ले लो। कुछ समय पश्‍चात् मैं तुम्हारा यौवन तुम्हें लौटा दूँगा। यह सुनकर यदु ने कहा यह सौदा आप अपने लाडले पुरु से करें। जब उन्होंने पुरु से यह बात कही तो पुरु ने राजा का अनुरोध सुनकर तत्काल वृद्धावस्था के बदले में अपना यौवन दे दिया। सहस्त्रों वर्षों तक यज्ञ आदि का अनुष्ठान करके उन्होंने पुरु को फिर उनका यौवन लौटा दिया और यदु को शाप दिया कि तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिये तुम्हारी सन्तान राजा नहीं होगी। हे सौमित्र! यह सब प्राचीन आख्यान मैंने तुम्हें सुना दिया। अब हमें उसी प्रकार करना चाहिये जिससे हमें किसी प्रकार का कोई दोष न लगे।" ये कथाएँ सुनाते-सुनाते रात्रि व्यतीत हो चली और ब्राह्म-मुहूर्त का समय हो गया।

महाभारत - द्रुपद से द्रोण का प्रतिशोध

जब पाण्डव तथा कौरव राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई तो उन्होंने द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा देना चाहा। द्रोणाचार्य को द्रुपद के द्वारा किये गये अपने अपमान का स्मरण हो आया और उन्होंने राजकुमारों से कहा, "राजकुमारों! यदि तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो पाञ्चाल नरेश द्रुपद को बन्दी बना कर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो। यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी।" गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर समस्त राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र ले कर पाञ्चाल देश की ओर चले।

पाञ्चाल पहुँचने पर अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा, "गुरुदेव! आप पहले कौरवों को राजा द्रुपद से युद्ध करने की आज्ञा दीजिये। यदि वे द्रुपद को बन्दी बनाने में असफल रहे तो हम पाण्डव युद्ध करेंगे।" गुरु की आज्ञा मिलने पर दुर्योधन के नेतृत्व में कौरवों ने पाञ्चाल पर आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों के मध्य भयंकर युद्ध होने लगा किन्तु अन्त में कौरव परास्त हो कर भाग निकले। कौरवों को पलायन करते देख पाण्डवों ने आक्रमण आरम्भ कर दिया। भीमसेन तथा अर्जुन के पराक्रम के समक्ष पाञ्चाल नरेश की सेना हार गई। अर्जुन ने आगे बढ़ कर द्रुपद को बन्दी बना लिया और गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष ले आये।

द्रुपद को बन्दी के रूप में देख कर द्रोणाचार्य ने कहा, "हे द्रुपद! अब तुम्हारे राज्य का स्वामी मैं हो गया हूँ। मैं तो तुम्हें अपना मित्र समझ कर तुम्हारे पास आया था किन्तु तुमने मुझे अपना मित्र स्वीकार नहीं किया था। अब बताओ क्या तुम मेरी मित्रता स्वीकार करते हो?" द्रुपद ने लज्जा से सिर झुका लिया और अपनी भूल के लिये क्षमायाचना करते हुये बोले, "हे द्रोण! आपको अपना मित्र न मानना मेरी भूल थी और उसके लिये अब मेरे हृदय में पश्चाताप है। मैं तथा मेरा राज्य दोनों ही अब आपके आधीन हैं, अब आपकी जो इच्छा हो करें।" द्रोणाचार्य ने कहा, "तुमने कहा था कि मित्रता समान वर्ग के लोगों में होती है। अतः मैं तुमसे बराबरी का मित्र भाव रखने के लिये तुम्हें तुम्हारा आधा राज्य लौटा रहा हूँ।" इतना कह कर द्रोणाचार्य ने गंगा नदी के दक्षिणी तट का राज्य द्रुपद को सौंप दिया और शेष को स्वयं रख लिया।

कालान्तर में पाण्वों ने बहुत सी अन्य विद्याओं का अध्ययन किया। भीमसेन ने बलराम को गुरू मान कर खम्भ-गदा आदि की शिक्षा प्राप्त की। इस समय तक युधिष्ठिर के गुणों कि प्रशंसा देश-देशान्तर में होने लगी। समय आने पर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को युवराज के पद पर आसीन कर दिया।

यूं बनता है देश का बजट

देश की आर्थिक दिशा तय करने और आय-व्यय का ब्योरा पेश करने के लिए देश की सरकार हर वर्ष संसद में बजट पेश करती है। पर इससे पहले काफी विस्तार से बजट पर चर्चा भी की जाती है। ताकि कोई चूक न हो जाए।
हर साल देश की आय-व्यय की विस्तृत जानकारी देने के लिए सरकार संसद में एक दस्तावेज प्रस्तुत करती है, जिसमें चालू वित्त वर्ष के दौरान हुई प्राप्तियों और खर्चों का ब्योरा दर्ज होता है। भारतीय संसद के दोनों सदनों में रखे जाने वाले एक वित्त वर्ष के इसी 'वित्तीय विवरण ’ को केंद्रीय बजट कहा जाता है। बजट के दो मुख्य पहलू होते हैं, रेवेन्यू यानी आमद और दूसरा एक्सपेंडिचर यानी खर्च। देश के आम बजट को फरवरी माह में संसद पटल पर प्रस्तुत किया जाता है। आइए जानते हैं बजट निर्माण की चरणबद्ध प्रक्रिया :

बजट डिविजन की स्थापना
सितंबर माह में वित्त मंत्री बजट डिविजन का गठन करते हैं, जो बजट की संपूर्ण तैयारी करने के लिए उत्तरदायी है। वित्त सचिव की अध्यक्षता में गठित बजट डिविजन में व्यय सचिव, राजस्व सचिव एवं केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के चेयरमैन के साथ-साथ मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी शामिल होते हैं। बजट डिविजन राजस्व प्राप्ति और अनुदान मांगों को दस्तावेजों के रूप में तैयार करता है।

राजस्व आकलन
सितंबर के उत्तरार्ध में राजस्व का आकलन किया जाता है। केंद्र सरकार विभिन्न करों और सार्वजनिक इकाइयों (पीएसयू) से प्राप्त राजस्व का आकलन करती है। इसमें वल्र्ड बैंक और एडीबी द्वारा प्राप्त आमद शामिल है। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके आधार परखर्च का खाका तैयार होता है। केंद्रीय टैक्स की आमद का आकलन राजस्व विभाग द्वारा किया जाता है, जबकि पीएसयू की आमद के आकलन के लिए विभिन्न कंपनियों के सीएमडी और वित्त निदेशक बुलाए जाते हैं। राजस्व विभाग और पीएसयू से प्राप्त राजस्व की जानकारी वित्त सचिव को भेजी जाती है, जो इसे 'डिपार्टमेंट ऑफ एक्सपेंडिचर ’(व्यय विभाग) के सचिव को सौंपते हैं। यह विभाग कुल राजस्व आमद का आकलन करके आंकड़े बजट डिविजन को भेजते हैं, जिसका उल्लेख बजट दस्तावेजों में किया जाता है।

विचार-विमर्श
अक्तूबर से दिसंबर तक सरकारी विचार-विमर्श और समानांतर बैठकें होती हैं। बजट डिविजन के सदस्य सभी मंत्रालयों और विभागों के वित्त सचिवों के साथ बैठक करते हैं। दूसरी ओर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि भी बजट डिविजन के साथ बैठक करते हैं। बजट डिविजन इन सभी से बजट प्रस्ताव प्राप्त कर सकल बजटीय सहायता के निर्धारण के लिए योजना आयोग को देता है। जीबीएस में मंत्रालयों के संचालन खर्च के अलावा नई और पुरानी योजनाओं (क्षेत्रीय, सामाजिक विकास संबंधी) के लिए धन की मांग शामिल होती है। इसके तुरंत बाद बजट डिविजन उद्योग जगत, निजी और गैर-सरकारी कंपनियों, अर्थशास्त्रियों, ट्रेड यूनियनों, कृषि संगठनों और कॉरपोरेट जगत के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करता है। इसी दौरान विभिन्न क्षेत्रों से वित्त मंत्री को बजट सुझाव मिलते हैं। खर्चो और योजनाओं से संबंधित सुझाव व्यय विभाग को, जबकि करों से जुड़े सुझाव वित्त मंत्रालय की टैक्स रिसर्च यूनिट को भेज दिए जाते हैं। संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी की अध्यक्षता में दोनों यूनिट बजट सुझावों और प्र्रस्तावों का आकलन कर अपनी अनुशंसा बजट डिविजन को भेजती हैं। सभी क्षेत्रों से सलाह-मशवरे के बाद बजट डिविजन वित्त मंत्री और वित्त मंत्री आरबीआई के गवर्नर के साथ भी विमर्श करते हैं, ताकि देश की मौद्रिक स्थिति का पता चले।

व्यय की रूपरेखा
जनवरी में वित्त मंत्री बजट डिविजन और योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ मिलकर योजनागत व्यय का खाका तैयार करते हैं। बैठक में केंद्रीय करों व अन्य स्रोतों से आमद और आगामी वित्त वर्ष में प्रस्तावित खर्च के बीच तालमेल बिठाया जाता है। राजस्व और खर्च के जोड़-घटाव के साथ ही वित्त मंत्री को यह ध्यान रखना होता है कि राजकोषीय घाटा कम हो। इसके लिए रकम उगाही के लिए कुछ नए कर लगाने या करों का दायरा बढ़ाने पर भी विचार होता है। बैठक में आर्थिक प्राथमिकताएं और ब्याज दरों के साथ-साथ मूल्य व्यवस्था संबंधी दिशा-निर्देश तय किए जाते हैं। बैठक में बजट की संपूर्ण रूपरेखा तय होने के बाद उसे दस्तावेजों का रूप देने के लिए बजट डिविजन को सौंप दिया जाता है।

- बजट की सबसे पहली अवधारणा का श्रेय फ्रांस के वित्त अधिकारी विलियम लाउंडेस (1675) को जाता है। उनके प्रयासों से ही फ्रांस मेंं दुनिया का पहला बजट पेश किया गया।

- भारत में आजादी के बाद पहला बजट 26 नवंबर 1947 को वित्त मंत्री आर के षणमुखन चेट्टी ने पेश किया था।

21 फ़रवरी 2010

फायदेमंद है अमरूद का सेवन

अमरूद बच्चों को खूब रास आता है। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग होता है। इसमें शरीर खासकर जांघ और पैर में चकत्ते पड जाते हैं। रोग बढने पर दांत गिरने लगते हैं। इसके अलावा, अमरूद डायरिया (दस्त), पेचिश, कब्जियत, सर्दी-जुकाम, त्वचा की सुरक्षा, उच्च रक्तचाप और वजन घटाने में कारगर है।
और भी हैं फायदे॥
अमरूद में एस्ट्रिन्जेंट नामक तत्व पाया जाता है जो त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। यह त्वचा का ढीलापन और झुर्रियां हटाने में भी मददगार होता है। -इसमें विटामिन ए, बी, सी के अलावा पोटेशियम पाया जाता है।

अमरूद में पाया जाने वाला कैरोटिनायड (लाइकोपीन) कैंसर की रोकथाम में कारगर है। इसमें फाइबर (रेशे) की पर्याप्त मात्रा होती है जो पाचन दुरुस्त रखती है। अमरूद की हाइपोग्लाइसीमिक प्रकृति कोलेस्ट्राल और रक्तचाप नियंत्रित रखती है।में एस्ट्रिन्जेंट नामक तत्व पाया जाता है जो त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। यह त्वचा का ढीलापन और झुर्रियां हटाने में भी मददगार होता है। -इसमें विटामिन ए, बी, सी के अलावा पोटेशियम पाया जाता है।

अमरूद में पाया जाने वाला कैरोटिनायड (लाइकोपीन) कैंसर की रोकथाम में कारगर है। इसमें फाइबर (रेशे) की पर्याप्त मात्रा होती है जो पाचन दुरुस्त रखती है। अमरूद की हाइपोग्लाइसीमिक प्रकृति कोलेस्ट्राल और रक्तचाप नियंत्रित रखती है। में एस्ट्रिन्जेंट नामक तत्व पाया जाता है जो त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। यह त्वचा का ढीलापन और झुर्रियां हटाने में भी मददगार होता है। -इसमें विटामिन ए, बी, सी के अलावा पोटेशियम पाया जाता है।

में पाया जाने वाला कैरोटिनायड (लाइकोपीन) कैंसर की रोकथाम में कारगर है। इसमें फाइबर (रेशे) की पर्याप्त मात्रा होती है जो पाचन दुरुस्त रखती है। अमरूद की हाइपोग्लाइसीमिक प्रकृति कोलेस्ट्राल और रक्तचाप नियंत्रित रखती है।
में एस्ट्रिन्जेंट नामक तत्व पाया जाता है जो त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। यह त्वचा का ढीलापन और झुर्रियां हटाने में भी मददगार होता है। -इसमें विटामिन ए, बी, सी के अलावा पोटेशियम पाया जाता है।

अमरूद में पाया जाने वाला कैरोटिनायड (लाइकोपीन) कैंसर की रोकथाम में कारगर है। इसमें फाइबर (रेशे) की पर्याप्त मात्रा होती है जो पाचन दुरुस्त रखती है। अमरूद की हाइपोग्लाइसीमिक प्रकृति कोलेस्ट्राल और रक्तचाप नियंत्रित रखती है।

विपदा में साथ रहते है ईश्वर: गोपालदास

बाला जी मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए महंत गोपालदास ने कहा कि ईश्वर माता-पिता, बंधु तथा सखा है। वह दयालु है। सब की सहायता करता है। वेदों में कहा है कि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि अर्थात हे ईश्वर मै तुम्हें प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा क्योंकि तू सर्वव्यापक है और नित्य प्राप्त है।

उन्होंने कहा कि दुख विपदा के समय सब साथ छोड देते हैं लेकिन ईश्वर हमारे साथ रहता है। प्रभु में सच्चे मन ध्यान लगाने से वह हर जन्म में साथ निभाता है। जैसे आत्मा-परमात्मा के बिना नहीं रह सकती वैसे ही भगवान भक्त के बिना नहीं रह सकता।

उन्होंने कहा कि मनुष्य की त्रासदी यह है कि वह अपने जीवन के अधिकतर समय में उसको भुलाए रहता है और जिनका संबंध सांसारिक, अस्थाई और स्वार्थ से परिपूर्ण रहता है उनके साथ लिप्त अहंकार, ईश्वर के पति अश्रद्धा और मानसिकता का भाव जन्म ले लेता है जो उसके विनाश का कारण बनता है।
साथ ही उन्होंने पंच यज्ञों के बारे में बताते हुए कहा कि यज्ञ में पंच महा यज्ञों को करने से पारिवारिक उन्नति होती है और मोक्ष का मार्ग खुलता है।
उन्होंने कहा कि जगत कल्याण व आत्मिक शांति के लिए पंच महायज्ञ करना श्रेष्ठ उपाय है। पंच यज्ञों में प्रथम यज्ञ यानी ब्रह्म यज्ञ के करने से मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति होती है। द्वितीय यज्ञ में श्रद्धा पूर्वक देव यज्ञ करने से चेतन आत्माओं का आशीर्वाद मिलता है और जड-देवता अर्थात वायु , अग्नि आदि देवता हमारे अनुकूल रहते हैं। बलि वैश्य देव यज्ञ करने से सभी प्राणियों को हार्दिक शांति की अनुभूति होती है और सभी को आपसी प्रेम प्राप्त होता है। जिससे वैर भाव व वैमनस्य का खात्मा होता है। पितृ यज्ञ करने से मनुष्य को माता-पिता व बुजुर्गो जो कि हमारे पितृ बन चुके है, का स्नेह व आशीर्वाद मिलता है। अंतिम यज्ञ के बारे में बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि अतिथि यज्ञ करना मनुष्य के लिए अति हितकारी व जरूरी होता है क्योंकि यह यज्ञ करने से मनुष्य को अतिथि की सेवा करने का अवसर उपलब्ध होता है।

योग मार्ग में निहित है बंधनों से मुक्ति

शिव मंदिर में पंडित जयभगवानकसारियाने प्रवचनों में कहा कि उस परम रचनाकार की प्रत्येक रचना होम्योपैथिक औषधि की भांति सांसारिक विकारों के निराकरण में सहायक सिद्ध होती है पर इस रहस्य का कुशल उपयोग सद्गुरु चिकित्सक ही जानता है, जो परमात्मा का साकार रूप होता है। इसीलिए चिकित्सक को धरती का भगवान कहा गया है।

पंडित जी ने उदाहरण देते हुए कहा कि होम्योपैथिक दवाओं का आकार, रूप, रंग सब देखने में एक सा होता है। दवाओं के पृथक-पृथक नाम हैं। उनमें मौजूद रोग को दूर करने की क्षमता का ज्ञान केवल दवा के निर्माता को होता है या चिकित्सक को होता है। दवा की शीशी पर लेबल लगाकर दवा निर्माता प्रत्येक की पृथकताका बोध तो करा देता है पर दवा का उपयोग सार्थक तरीके से रोगी पर कैसे हो, इसका ज्ञान केवल योग्य चिकित्सक को ही होता है। जिसे वह सतत साधना और अनुभव से अर्जित करता है। इसी प्रकार शरीर रूपी शीशी में बंद आत्मा का रूप, रंग एक है, उस पर जलचर, नभचर के लेबल परमात्मा ने लगाकर संसार में भेजा है। उस परम रचनाकार की प्रत्येक रचना होम्योपैथिक औषधि की भांति सांसारिक विकारों के निराकरण में सहायक सिद्ध होती है पर इस रहस्य का कुशल उपयोग सद्गुरु चिकित्सक ही जानता है, जो परमात्मा का साकार रूप होता है। चिकित्सक को धरती का भगवान इसीलिए कहा गया है।

विकास शरीर में होते हैं, विकास रहित आठमा,दवा की भांति शरीर रूपी शीशी में असंग रहता है। संसार के प्रत्येक पदार्थ में छुपे गुणदोष का ज्ञान प्राप्त कर, प्रकृति को उसी की शक्ति के माध्यम से मनुष्य के अधीन कर, उसके लिए ही प्रयोग करने वाला वैज्ञानिक भी साधक है और सिद्ध भी किन्तु वह परमात्मा की माया प्रकृति के आसपास ही शोधरतरहकर प्रकृति पर विजय पाने का गर्व जीता रहता है। इसलिए वह सिद्धियों का स्वामी तो हो जाता है पर मुक्तात्मानहीं हो पाता।

परमात्मा औषधीय पदार्थो का सृष्टाहै पर औषधि का निर्माता वैज्ञानिक होता है और उसका कुशल प्रयोगकर्ता पदार्थ के चामत्कारिक प्रयोग से मानव को चमत्कृत कर उसके एक बडे वर्ग का अपना भक्त बना लेता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए औषधि योगी का मार्ग दर्शन अनिवार्य है और अदृश्य प्राकृतिक शक्तियों को मानव के अनुकूल करने के लिए योगी का सहयोग अपेक्षित है। किन्तु पूर्ण मानवीय चेतना के उत्थान के लिए परम आवश्यकता है अध्यात्म योगी की।

उन्होंने कहा कि वेदान्त और भक्ति मार्ग अर्थात विज्ञान की अपेक्षा इनमें एकांगी और अतिवादी दृष्टिकोण की गंध समाहित है। इन दोनों अतिवादी स्थितियों का समन्वय सेतु है योगदर्शन। औषधि शरीर को रोग से मुक्ति दिलाती है और योग मार्ग शरीर के रहते हुए भी बंधन मुक्त आकाश विचरण की साम‌र्थ्य प्रदान करता है।

फोरेंसिक साइंस में रोजगार के अवसर

क्रिमिनोलॉजी एवं फोरेंसिक साइंस पाठ्यक्रम करने के बाद रोजगार के क्या अवसर हैं?

फोरेंसिक साइंस की सभी शाखाओं में इसके विशेषज्ञों की हमेशा माँग रहती है। केंद्रीय व राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे 24 फोरेंसिक लैब में विशेषज्ञों की भर्ती संघ लोक सेवा आयोग द्वारा की जाती है। इसके अलावा सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों में आपके लिए उजली संभावनाएँ हैं। फोरेंसिक मेडिसीन के विशेषज्ञों को सभी मेडिकल कॉलेजों, शोध संस्थानों में मौका दिया जाता है। अपराध अनुसंधान से संबंधित सभी लैबों में फोरेंसिक विज्ञान की शाखाओं के लिए अलग-अलग विभाग होते हैं, जिनमें विशेषज्ञों की माँग हमेशा बनी रहती है। क्रिमिनोलॉजी विशेषज्ञों के लिए सीबीआई, आईबी के साथ-साथ समाजसेवा से जुड़े संस्थानों, जेलों में भी नौकरी के पर्याप्त अवसर हैं।

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