24 मार्च 2010

विश्वासघात


ब्रह्मदत्त जिन दिनों काशी राज्य पर शासन कर रहे थे, उन दिनों बोधिसत्व उनके यहाँ पंडितामात्य के पद पर थे।

एक बार काशी के राजा ब्रह्मदत्त ने किसी कारण से अपने पुत्र पर नाराज़ होकर उसे अपने देश से निकाल दिया। राजकुमार अपनी पत्नी के साथ बहुत दिन इधर-उधर भटकता रहा और काफी कष्ट झेला। उसकी साध्वी पत्नी ने सहनशीलता के साथ सारी यातनाएँ झेलीं।

कुछ साल बाद ब्रह्मदत्त की मौत हो गई । अपने पिता की मौत का समाचार मिलते ही राजकुमार बड़ा खुश हुआ। काशी में पहुँचकर गद्दी पर बैठने के उतावले में वह तेज़ी के साथ यात्रा करने लगा।

पर उस मूर्ख की समझ में यह बात न आई कि उसकी पत्नी उसके बराबर तेज़ी के साथ चल नहीं सकती और उसके कष्टों में पत्नी ने भी समान रूप से भाग लिया है, इसलिए इस व़क्त उसकी तक़लीफ़ों में भी राजकुमार को हिस्सा लेना है! इस कारण राजकुमार ने दिन-रात खाना-पीना व आराम करना इत्यादि का ख़्याल तक किये बिना अपनी पत्नी को भी तेज़ी के साथ चलने को बाध्य किया।

चाहे कितनी भी तीव्र राज्याकांक्षा क्यों न हो, खाना व आराम के बिना आख़िर कोई कितनी दूर चल सकता है! इसलिए उसकी पत्नी के साथ उसे भी ज़ोर की भूख लगी। दोनों आखिर एक गाँव में पहुँचे। वहाँ पर कुछ लोगों ने उनकी यह बुरी हालत देखकर कहा, ‘‘महाशय, लगता है कि आप लोग बड़ी भूख के साथ ही यात्रा कर रहे हैं। हमलोग थोड़ा खाना देते हैं, पोटली बनाकर ले जाइए और कहीं रास्ते में खा लीजिएगा।’’

राजकुमार ने अपनी पत्नी को एक जगह आराम करने को कहा और खाना लाने वह उनके पीछे चल पड़ा। उन लोगों ने पति-पत्नी के भर पेट खाने लायक़ खाना पत्तलों में बांधकर राजकुमार के हाथ दे दिया।

खाना लेकर लौटते व़क्त राजकुमार ने सोचा, ‘‘यह खाना दोनों मिलकर खा लेंगे तो दूसरे जून ही फिर भूख लगेगी। काशी तक पहुँचना उसकी पत्नी के लिए नहीं, उसे अनिवार्य है! इसलिए कोई उपाय करके सारा खाना उसी को खा डालना है!’’

उस नीच ने यों विचार करके पत्नी के पास पहुँचते ही समझाया, ‘‘तुम आगे चलती चलो, मैं कालकृत्यों से निवृत्त होकर जल्दी आता हूँ!’’

वह ज्यों ही आगे बढ़ी, राजकुमार ने सारा खाना खा डाला, पत्तों को ढीला बांधकर जल्दी-जल्दी डग भरते पत्नी से आ मिला।

पत्नी ने आस भरी आँखों से ज्यों ही पोटली की ओर देखा, त्यों ही उसने क्रोध का अभिनय करते कहा, ‘‘देखो, इस गाँव के लोग कैसे दगेबाज हैं। खाली पत्तल की पोटली बनाकर दिये हैं!’’

राजकुमार की पत्नी सच्ची बात जान गई थी, फिर भी वह चुप रह गई। थोड़े दिन की यात्रा करके वे लोग आख़िर काशी पहुँच गये। ब्रह्मदत्त के पुत्र ने अपना राज्याभिषेक सही ढंग से करवा लिया और वह काशी का राजा बन बैठा।

राजा बनने के बाद वह अपनी पत्नी के बारे में सोचने व समझने की आदत तक खो बैठा। कभी उसने इस बात की पूछ-ताछ न की कि उसकी पत्नी सही ढंग से खाना खाती है या नहीं और उसे रानी के योग्य कपड़े मिल जाते हैं या नहीं! इसलिए रानी की तक़लीफ़ें दूर होने के बावजूद वह हमेशा चिंतित रहने लगी।

राजा के यहाँ पंडितामात्य के पद पर रहनेवाले बोधिसत्व ने रानी की चिंता को भांप लिया और एक बार उनसे मिलने गये। रानी ने उनका स्वागत करके आतिथ्य दिया।

बोधिसत्व ने कहा, ‘‘महारानीजी, अपने कष्टों से मुक्त हो राजा बनने के उपलक्ष्य में राजा ने मुझे कई भेंट-उपहार दिये हैं, लेकिन आपने आज तक मुझे एक भी चीज़ नहीं दी।’’

‘‘महानुभाव, मैं नाम के वास्ते रानी हूँ, मगर सच पूछा जाये तो मेरे और अंतःपुर की दासियों के बीच कोई फ़र्क नहीं है। राजा की तक़लीफ़ों को छोड़, सुख-भोगों में जो हिस्सा नहीं रखती, वह आख़िर कैसी रानी कहलायेगी?’’ इन शब्दों के साथ रानी ने वह सारा किस्सा सुनाया, जब काशी लौटने के रास्ते में उसके पति ने कैसे उसके हिस्से का भी खाना खा डाला था!


बोधिसत्व ने रानी को समझाया, ‘‘मैं कल भरी सभा में आप से ये ही सवाल पूछूँगा, आप निर्भय होकर ये ही जवाब दें तो मैं आपकी चिंता को दूर कर सकता हूँ।’’

दूसरे दिन राज सभा में महारानी भी आ पहुँचीं, इस पर बोधिसत्व ने उनसे पूछा-‘‘महारानीजी, आप राज्य ग्रहण के बाद अपने सेवकों की बात सोचती तक नहीं!’’ इस पर रानी ने सभा में सारी बातें बताईं। यह बात प्रकट होते ही कि राजा ने एक बार रानी के हिस्से का भी खाना खा लिया था, राजा ने अपमान का अनुभव किया।

रानी की बातें समाप्त होते ही बोधिसत्व ने समझाया, ‘‘महारानीजी, जब महाराजा आपका ख़्याल तक नहीं रखते, तब आप को भी उनके साथ रहने की कोई ज़रूरत नहीं है।

कहा गया है, चजे चजंतं वन्थं न कइरा, आपेत चित्तेन न संभजेय्य; द्विजो दुमं खीण फलंति इत्वा; अंडं समेक्खेय्य, महाहे लोके।

पजिसने तुम्हें त्याग दिया, उसे त्याग दो, ऐसे आदमी के स्नेह की कामना न करो, जो तुम्हारे प्रति आदर नहीं रखता। तुम्हें उसके प्रति आदर दिखाने की ज़रूरत नहीं है। पक्षी भी आख़िर फल विहीन पेड़ को छोड़ दूसरे वृक्षों में चला जाता है। यह जगत बड़ा ही विशाल है। ब इसलिए आप राजमहल को छोड़ जहाँ आप को आदर मिलता है, वहीं पर आप सुख का जीवन बिताइये।’’ ये शब्द सुनने की देर थी कि राजा सिंहासन से उतर आये, बोधिसत्व के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगे ‘‘पंडितामात्य, आप मेरे अपराध को क्षमा कर दीजिएगा! मेरी इज्ज़त बचाइये, जो बात हो गई, सो हो गई। आइंदा मैं अपनी पत्नी के प्रति धर्मपूर्ण व्यवहार करूँगा।’’

उस दिन से राजा रानी के प्रति आदर दिखाते हुए सुख की ज़िंदगी जीने लगा।

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1 टिप्पणी:

  1. आभार इस कथा को प्रस्तुत करने का.

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    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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