25 मार्च 2010

विक्रम/वेताल - गुणगान की आकांक्षा



धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास गया, पेड़ पर से शव को उतारा और अपने कंधे पर डाल लिया। फिर यथावत्‌ श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, "राजन्‌, मेरी समझ में नहीं आया कि किन अद्‌भुत शक्तियों को पाने के लिए आधी रात को यों कठोर परिश्रम किये जा रहे हो। परंतु हाँ, कुछ ऐसे व्यक्ति विशेष हैं, जो साहस से भरे अद्‌भुत कार्य करते हैं और अद्‌भुत शक्तियॉं प्राप्त करते हैं। पर सही समय पर वे अपनी शक्तियाँ खो बैठते हैं। प्राण भीति के वश में आकर अस्तव्यस्त विचारों के कारण भी कुछ लोगों में ऐसे परिवर्तन होते रहते हैं। वितंग नामक एक साहसी युवक भी ऐसे अस्तव्यस्त विचारों के वशीभूत हो गया और अकस्मात्‌ उसमें परिवर्तन आ गया। उसकी कहानी थकावट दूर करते हुए मुझसे सुनो।'' फिर वेताल यों कहने लगाः

विक्रम, विलोप देश का राजा था। उसके शासन काल में एक बार राक्षस उसके राज्य पर टूट पड़े। राक्षस पाताल से अकस्मात्‌ भूमि पर आकर मानवों को खाने लगे। विक्रम की समझ में नहीं आ रहा था कि राक्षसों से प्रजा को कैसे बचाया जाए। तब उस समय उससे मिलने विरुपाक्ष नामक एक मुनि आये। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया और अपनी समस्या बतायी।

तपोसंप विरुपाक्ष के पास एक महिमावान दर्पण था। वे पाताल लोक के राक्षस राजा महाबलि को उसमें ले आये और विक्रम की समस्या उससे बतायी।

महाबलि ने सविनय कहा, "मुनिवर, बाघ का आहार हिरण है तो राक्षस का आहार है, मानव। इसे दैव निर्णय न मानिये और आप ही इस समस्या का न्यायपूर्ण परिष्कार मार्ग सुझाइये।''

विरुपाक्ष ने कहा, "आगे से राक्षस पापी मनुष्यों को ही खाएँ और पुण्यवानों को छोड़ दें। जो राक्षस इस नियम का भंग करेंगे, वे दांतों के असहनीय दर्द के शिकार होंगे। यही उनका दंड होगा। साहसी मानव उस राक्षस के मुँह में प्रवेश करेगा और अभायरण्य की जड़ी-बूटियों से दंत धावन करेगा, तभी दांतों का दर्द कम होगा।''

महाबलि ने इस शर्त को मान लिया और दर्पण से ग़ायब हो गया। फिर मुनि ने वह महिमावान दर्पण राजा विक्रम को दे दिया और कहा, "तुम्हें किसी तक़लीफ़ का सामना करना पड़े तो मुझे याद करो। मैं इस दर्पण में तुम्हें दिखायी दूँगा और परिष्कार का मार्ग सुझाऊँगा।'' यों कहकर वे चले गये।

इसके बाद राक्षसों द्वारा खाये जानेवाले मानवों की संख्या में कमी होती गयी। विक्रम और महाबलि के बीच में जो समझौता हुआ, उसका प्रचार देश भर में हुआ, जिस वजह से सब विश्वास करने लगे कि जो मानव राक्षसों से मारे जा रहे हैं, वे सब पापी हैं। यों देश के नागरिकों में पाप भीति भी बढ़ती गयी।

उस काल में अभयारण्य के निकट ही स्थित विकासपुर नामक गवाँ में श्री तंग नामक एक भूस्वामी रहा करता था। वह हर किसी की सहायता करता था। लोग उसे बहुत मानते भी थे। वितंग उस भूस्वामी का एकलौता बेटा था। बड़े ही लाड़-प्यार से उसकी परवरिश हुई। शायद इसी वजह से वह बड़ा ही स्वार्थी बन गया। घर में सबके सब उसकी तारीफ़ करते थे। वह चाहता था कि बाहर के सबके सब बालक भी उसकी तारीफ़ करते रहें। जो उसकी तारीफ़ नहीं करते थे, उन्हें वह गालियाँ देता था । इस वजह से बच्चे उससे दूर रहते थे। इस विषय को लेकर उसने दादा से शिकायत की तो उन्होंने कहा, "यदि तुम चाहते हो कि सब तुम्हारी प्रशंसा करें तो उनके साथ तुम्हारा व्यवहार अच्छा होना चाहिये। इसके सिवा कोई दूसरा मार्ग नहीं है।''

"जो काम मुझे पसंद हैं, वे ही करूँगा। उन्हें जो पसंद हैं, वे काम मैं किसी भी हालत में नहीं करूँगा। जो भी हो, उन्हें मेरी तारीफ़ करनी ही होगी।'' वितंग ने दृढ़ स्वर में कहा।

दादा समझ गये कि अब भी वितंग की बुद्धि का विकास नहीं हुआ। उन्होंने उसे उस गाँव के महापंडित विद्यानाथ के पास विद्याभ्यास के लिए भेजा। सबकी प्रशंसा पाने के उद्देश्य से वितंग ने बड़ी मेहनत करके पढ़ाई की। एक ही साल के अंदर उसने अपने को सबसे श्रेष्ठ साबित कर दिया। पर, उन विद्यार्थियों से इस बात पर हमेशा झगड़ा करता रहता था, जो उसकी प्रशंसा नहीं करते थे। वे तंग आ गये और उन्होंने गुरु से इसकी शिकायत की। गुरु ने उससे कैफ़ियत माँगी।

"मैं आपके सब शिष्यों में से श्रेष्ठ शिष्य हूँ। आपको तो मेरी अक्लमंदी की तारीफ़ करनी चाहिये, परंतु आप तो उनकी तरफ़दारी करते हुए मुझसे कैफ़ियत माँग रहे हैं। यह तो बड़ी अजीब बात है,'' वितंग ने कहा। "मानता हूँ कि तुम सबसे अधिक अ़क्लमंद हो। पर साथी शिष्य तुम्हें पसंद नहीं करते, इसलिए तुम्हारी अक्लमंदी तुम्हारे ही उपयोग में नहीं आ रही है। धन हो या अक्लमंदी, उपयोग में आने पर ही उसका मूल्य है। अगर वह उनके काम नहीं आया तो बड़ों की भी कोई तारीफ़ नहीं करता। तुम चाहते हो कि सब, तुम्हारी प्रशंसा करें तो ऐसे काम भी करो, जो सबके लिए लाभदायक हों,'' विद्यानाथ ने उसे समझाया।

वितंग को आचार्य की बात पसंद नहीं आयी और अपने को उसने नहीं बदला। यों कुछ साल गुज़र गये। विद्यानाथ ने एक दिन सवेरे अपने शिष्यों को अभयारण्य जाकर जड़ी-बूटियाँ ले आने को कहा। सबके सब गये, पर वितंग विद्यालय में ही रह गया।

विद्यानाथ के शिष्यों ने जब अभयारण्य में प्रवेश किया तब महासुर नामक राक्षस ने भी वहाँ क़दम रखा। कुछ दिन पहले उसने एक पुण्यवान को खा लिया था। इस वजह से वह दांतों के असहनीय दर्द से पीड़ित रहने लगा। वह एक साहसी मानव की खोज में अभयारण्य आया। विद्यानाथ के शिष्यों को देखकर उसने उनसे कहा, "मेरे मुंह में प्रवेश करो और इन जड़ी-बूटियों से मेरा दंत धावन करो।'' उसे देखते ही शिष्य भयभीत हो गये और उसकी बातें सुनकर बेहोश हो गये।

जब शिष्य बहुत समय तक नहीं लौटे तब विद्यानाथ ने उन्हें ढूँढ़ने के लिए वितंग को भेजा। उसने जंगल में महासुर को देखा। महासुर ने तुरंत उसे अपनी हथेली में लिया और अपनी इच्छा प्रकट की। वितंग ने बिना भय के कहा, "तुम्हारे मुंह में प्रवेश करके जड़ी-बूटियों से तुम्हारा दंत धावन करूँगा तो तुम्हारा दर्द कम हो जायेगा, पर इससे मुझे क्या लाभ होगा?''

"तुम अगर मेरे दर्द को दूर करोगे तो मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा।'' महासुर ने कहा।

"जो काम मुझे पसंद हैं, वे ही काम मैं करता हूँ। फिर भी, सबको मेरी प्रशंसा करनी होगी। यही मेरी इच्छा है। क्या यह काम तुम कर सकते हो?'' वितंग ने पूछा।

"मेरे पास स्तुतींद्र नामक अद्‌भुत शक्ति है। मेरे दांत का दर्द दूर करोगे तो मैं तुम्हें वह दे दूँगा। तब सभी तुम्हारी प्रशंसा करेंगे।'' कहते हुए महासुर ने उसे अपनी गोद में डाला।

राक्षस की गोद में बेहोश पड़े साथी शिष्यों से उसने जड़ी-बूटियाँ लीं। महासुर ने उसे अपने मुँह में डाल लिया तो उसने निधड़क उसके सब दांतों का धावन किया, जिससे उसका दर्द दूर हो गया। महासुर ने उसे मुंह से बाहर निकाला और कहा, "अब स्तुतींद्र तुम्हारे वश में हो गया। जब तक तुम चाहोगे, वह शक्ति तुम्हारे पास रहेगी।

तुम बुरा करो या अच्छा, सब तुम्हारी प्रशंसा करेंगे और तुम नाम कमाओगे।'' यों कहकर महासुर वहाँ से चला गया। तब से सब शिष्य उसकी तारीफ़ के पुल बांधने लगे। उसके धैर्य की तारीफ़ करने लगे। गुरु ने भी कह दिया, "अब तुम सब विद्याओं में पारंगत हो गये।'' एक दिन ग्रामाधिकारी ने उससे मिलकर कहा, "मैं अब से तुम्हारा अनुचर बनकर रहूँगा और तुम्हारी हर बात को मानूँगा।''

विकासपुर में वितंग की बात का विरोध करनेवाला कोई नहीं रहा। स्तुतींद्र की महिमा के कारण सब उसकी भरपूर प्रशंसा करने लगे। इसलिए वह खुल्लमखुल्ला अन्याय करने लगा। गाँव में कोई अच्छा काम हुआ तो लोग कहने लगे कि यह सब वितंग के कारण ही हो रहा है। कष्ट झेलने पड़े तो वे समझने लगे कि यह सब विधि लीला है। स्तुतींद्र की महिमा के कारण वितंग की ख्याति देश भर में फैल गयी। सब ग्रामाधिकारी वितंग के अनुयायी और दुराचारी बन गये। क्रमशः राजा को भी उसके बारे में मालूम हुआ। राजा विक्रम ने गुप्तचरों को भेजकर विषय की जानकारी पायी। अब राजा को लगने लगा कि वितंग का प्रभाव जारी रहा तो सर्वनाश होकर रहेगा। वह घबरा गया और उसने महिमामयी दर्पण का आश्रय लिया।

विरुपाक्ष उस दर्पण में प्रत्यक्ष हुए और संपूर्ण विषय की जानकारी पाने के बाद उन्होंने कहा, "मैं शीघ्र ही महाबलि से मिलूँगा और एक साल के बाद तुम्हारे देश में जो-जो दुराचारी और अनैतिक लोग हैं, उन्हें एकसाथ निगल डालने के लिए राक्षसों को भेजने का प्रबंध करूँगा। जब लोगों को यह मालूम हो जायेगा, तब एक ही साल के अंदर तुम्हारे देश के सभी अनैतिक लोगों में परिवर्तन आ जायेगा। जिनमें परिवर्तन नहीं आयेगा, वे राक्षसों का आहार बनेंगे।''

"आपका बताया उपाय सही है, परंतु समस्या तो वितंग से जुड़ी है। वह लोगों को सता रहा है, उनके साथ अन्याय कर रहा है, पर स्तुतींद्र की शक्ति के प्रभाव से सब उसकी प्रशंसा में लगे हुए हैं। समस्या तो यह है कि उसे कैसे नियंत्रण में रखें,'' विक्रम ने दुख-भरे स्वर में कहा।


"दुखी मत होना। वितंग की प्रशंसा करते हुए शिला-लेख लिखवाना। साथ ही घोषणा करवा देना कि दुराचारी व अनैतिक मानवों का किस-किस प्रकार की यातनाएँ सहनी होंगी। तुम्हारी समस्या का हल हो जायेगा।'' विरुपाक्ष यों कहकर ग़ायब हो गये।

विरुपाक्ष के कहे अनुसार, विक्रम ने किया। साल ही के अंदर बहुत लोगों के साथ-साथ वितंग में भी परिवर्तन हुआ। अब उसने स्तुतींद्र का उपयोग छोड़ दिया और अच्छे काम करने लगा। विलोम देश धर्मात्माओं के स्थल में बदल गया।

वेताल ने यह कहानी सुनायी और फिर विक्रम से कहा, "राजन्‌, वितंग बुरे काम करता रहा, पर चाहता रहा कि लोग उसकी प्रशंसा करें। पर अकस्मात ही उसमें परिवर्तन आया। इसका क्या कारण है? प्राण भीति के कारण मनुष्यों के विचारों में आमूल परिवर्तन होते हैं। वितंग में आये परिवर्तन की वजह क्या यह नहीं है? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी चुप रहोगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।''

विक्रमार्क ने उसके संदेहों को दूर करते हुए कहा, "मानता हूँ कि निस्संदेह भीतियों में से सबसे भयंकर भीति है, प्राण भीति।

"परंतु, वितंग में जो परिवर्तन हुआ, इसका यह कारण नहीं है। कुछ लोगों में प्राण भीति से बढ़कर गुणगान की इच्छा प्रबल होती है। वितंग में यह स्वभाव था कि लोग उसकी प्रशंसा करें।

"अंत तक उसका यह स्वभाव बना रहा। परंतु तदनंतर वह समझ गया कि प्रजा यह विश्वास करेगी कि राक्षस का आहार जो बनेंगे वे बुरे लोग हैं। अगर ऐसा नहीं होना हो तो एक ही मार्ग है, अच्छा बनकर रहना। गुणगान की आकांक्षा रखनेवाले अच्छे काम ही नहीं करते, बल्कि बुरे काम करना भी छोड़ देते हैं। वितंग ने यही काम किया। स्तुतींद्र की वजह से जो प्रशंसाएँ प्राप्त हुईं, उनसे बढ़कर राजा के शिला लेखों से उसे संतृप्ति प्राप्त हुई, इसीलिए उसने स्तुतींद्र को त्याग दिया। यह स्पष्ट है कि वितंग में जो परिवर्तन हुआ उसका कारण था प्राण भीति नहीं, बल्कि उसके गुणगान की आकांक्षा।'' राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित गायब हो गया और पेड़ पर पुनः चढ़ बैठा।

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