24 मार्च 2010

स्वावलंबन



एक गाँव में रामशर्मा तथा सोमगुप्त नामक दो मित्र रहा करते थे। दोनों गरीब थे। एक दिन दोनों ने यह निर्णय किया कि धन अर्जन करने के लिए अपना गाँव छोड़कर कहीं चले जायें ! दूसरे दिन प्रातःकाल दोनों चल पड़े। बड़ी दूर तक यात्रा के बाद जब दोनों काफी थक गये, तब वे एक मुनि के आश्रम के पास लुढ़क पड़े। मुनि ने उन दोनों का सारा हाल जानकर समझाया :

‘‘बेटे! मैंने बड़े ही प्रयास के साथ अनेक विद्याएँ प्राप्त की हैं। तुम में से एक ब्राह्मण है। ब्राह्मण को धन के प्रति मोह रखना उचित नहीं, उसका जन्म तभी सार्थक होगा, जब वह ज्ञान अर्जन कर लोगों में उसे बांट दें और यश प्राप्त करे। दूसरा तो वैश्य है। वह मेरे यहाँ व्यापार के रहस्यों को जान कर धन अर्जन कर सकता है। सच्चा वैश्य धनार्जन के लिए ही नहीं बल्कि जनता की सेवा करने के लिए उपयोगी होता है।''

मुनि की सलाह के अनुसार दोनों मित्रों ने तीन वर्ष तक विद्याभ्यास किया । रामशर्मा ने अनेक शास्त्रों में पांडित्य प्राप्त किया। सोमगुप्त ने व्यापार के रहस्यों को जान लिया। अपने ज्ञान के बल पर रामशर्मा राजा के यहाँ दरबारी पंडित बना। सोमगुप्त ने व्यापार में ख़ूब उन्नति की। चार-पॉंच वर्षों में दोनों संपन्न बन गये।

अनेक वर्ष बीत गये। रामशर्मा के एक लड़का हुआ जिसका नामकरण कृष्णशर्मा किया गया। मगर रामशर्मा अपने पुत्र को लेकर चिंता में पड़ गया। वह अव्वल दर्जे का नटखट निकला। पढ़ने में उसकी ज़रा भी रुचि न थी। वह ख़ेल-कूद में सारा समय बरबाद करता था। रामशर्मा ने बड़ी कोशिश की कि उसका पुत्र भी उसके जैसा योग्य बने। पर उसका प्रयत्न बेक़ार गया।

उन्हीं दिनों एक विचित्र घटना हुई। रामशर्मा एक दिन विद्यार्थियों को कुछ श्लोक पढ़ा रहा था। वे श्लोक कठिन थे, इसलिए कई बार समझाने पर भी विद्यार्थी उन्हें समझ नहीं पा रहे थे। आखिर थक कर विश्राम के लिए रामशर्मा घर के भीतर चला गया।


अपने पिता को विद्यार्थियों को पढ़ाने में श्रम उठाते कृष्णशर्मा ने देखा। कृष्णशर्मा अपने पिता के घर के भीतर जाते ही रामशर्मा के आसन पर बैठकर स्वयं उन्हें पढ़ाने लगा। आश्चर्य की बात थी कि रामशर्मा के समझाने पर जो श्लोक विद्यार्थियों की समझ में नहीं आये, वे कृष्णशर्मा के समझाने पर आसानी से समझ में आ गये।

भीतर से रामशर्मा उस दृश्य को देख चकित रह गया। उसने सोचा कि उसका पुत्र मूर्ख नहीं है। उसे स्मरण शक्ति भी प्राप्त है। विद्याभ्यास करने पर वह बड़े-बड़े शास्त्रों का ज्ञान सरलता पूर्वक प्राप्त कर सकता है। रामशर्मा ने जब यह बात कृष्णशर्मा से कही, तब उसने पूछा, ‘‘विद्याभ्यास किसलिए करना है?''

‘‘लोगों के द्वारा पूजा प्राप्त करने, धन कमाने के लिए भी विद्या की नितांत आवश्यकता है!'' रामशर्मा ने समझाया।

‘‘लोग मेरा आदर इस समय भी इसलिए करते हैं कि मैं एक महा पंडित का पुत्र हूँ। मैं ब्राह्मण हूँ, इसलिए मेरी पूजा करते हैं। साथ ही एक धनवान का पुत्र हूँ। इसलिए मुझे अब कमाना क्या है?'' कृष्णशर्मा ने उल्टा सवाल किया।

वह इस बात पर विचार कर ही रहा था कि अपने पुत्र के मन को कैसे बदले, इतने में ही सोमगुप्त उसके घर आया। दोनों की बातचीत में यह बात प्रकट हो गई कि सोमगुप्त का पुत्र वसुगुप्त भी इसी प्रकार लापरवाह है और जब भी उसके पिता ने उसको सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न किया वह यही जवाब दे रहा है कि ‘‘मैं धनी का पुत्र हूँ। मुझे धन कमाने की क्या आवश्यकता है?''

दोनों मित्रों ने विचार करके एक योजना बनाई। उस योजना के अनुसार सोमगुप्त अपने पुत्र वसुगुप्त को रामशर्मा के घर पर छोड़ अपनी पत्नी के साथ व्यापार के काम पर नगर छोड़कर चला गया। जाते व़क्त अपने पुत्र की सेवा करने के लिए दो नौकरों को भी छोड़ गया।

कृष्णशर्मा और वसुगुप्त के बीच धीरे धीरे गहरी मित्रता हो गई।

दो मास बीत गये। रामशर्मा ने एक दिन वसुगुप्त को बुलाकर कहा, ‘‘तुम्हारे पिता ने धन की माँग करते ख़बर भेजी है। तुम अपना मकान बेचकर उन्हें धन भिजवा दो।'' पर वसुगुप्त ने कोई ध्यान न दिया।

एक महीना और बीत गया। एक दिन रामशर्मा के यहाँ एक व्यक्ति ने आकर समाचार दिया, ‘‘सोमगुप्त का जहाज़ डूब गया है। उसके साथ सोमगुप्त, उनकी पत्नी और उनकी सारी संपत्ति भी डूब गई है। मैं उन्हें बड़ी मुश्किल से किनारे पर ले आया और अपने घर पहुँचा दिया, मगर दुर्भाग्य से वे जीवित नहीं रह सके।''

यह समाचार सुनते ही वसुगुप्त रो पड़ा। रामशर्मा ने उसे सांत्वना दी। मगर उसने एक बात स्पष्ट कह दी, ‘‘मैं तुम्हारे पिता की तरह कोई बड़ा व्यापारी नहीं हूँ। तुम्हारा भार उठाना मेरे लिए संभव नहीं है। इसलिए तुम अपनी जिम्मेदारी आप ही संभाल लो।''

वसुगुप्त रोष में रामशर्मा के घर से चल पड़ा। मगर उसे ठहरने के लिए कहीं जगह न मिली। किसी ने खाना तक नहीं खिलाया। इसलिए वह अपने स्वाभिमान को तिलांजलि देकर रामशर्मा के घर लौट आया और खाना खिलाने की प्रार्थना की। रामशर्मा ने वसुगुप्त को खाना खिलाया, साथ ही यह भी बताया कि यह क्रम ज़्यादा दिन तक नहीं चलने का।

यह बात सुनने पर कृष्णशर्मा को बड़ा क्रोध आया। उसने अपने पिता से पूछा, ‘‘क्या आप अपने मित्र के पुत्र की इतनी भी सहायता नहीं कर सकेंगे?'' इसके उत्तर में रामशर्मा ने यों कहा, ‘‘सोमगुप्त मेरे मित्र हैं। अगर वे कठिनाइयों में होते तो मैं अवश्य उनकी मदद करता। लेकिन वसुगुप्त के साथ मेरा कोई संबंध नहीं है।''

‘‘वसुगुप्त आप के लिए कुछ नहीं हो सकता, मगर वह मेरा मित्र है। क्या मेरे मित्र को इस घर में आदर नहीं मिल सकता?'' कृष्णशर्मा ने पूछा।

‘‘तुम्हारा बड़प्पन क्या है?'' रामशर्मा ने लापरवाही से पूछा।

‘‘भगवान की अर्चना करने मात्र से पुजारी का भगवान के समान लोग आदर देते हैं। मैं महापंडित रामशर्मा का पुत्र हूँ। क्या यह मेरे लिए बड़प्पन की बात नहीं हो सकती?'' कृष्णशर्मा ने फिर पूछा।


रामशर्मा ने पल भर सोचकर कहा, ‘‘मैं तुम्हारे सवाल का ज़वाब ज़रूर दूँगा, लेकिन इसके पहले तुम्हें एक काम करना होगा। तुम्हारी तथा वसुगुप्त की सेवा करनेवाले नौकरों को बुलवा कर उनके द्वारा दो दिन तक वसुगुप्त की सेवा करवा दो। फिर मुझ से मिलो।''

कृष्णशर्मा अत्यंत उत्साह पूर्वक वहाँ से चला गया। इसके पूर्व वे लोग पैसे की मांग किये बिना समस्त प्रकार की सेवाएँ करते थे। लेकिन अब वसुगुप्त के प्रति उलाहना भरी बातें कहीं और यहाँ तक बताया कि ऐसे दरिद्र की सेवा हम आइंदा नहीं करेंगे।

उनका उत्तर सुनकर कृष्णशर्मा चकित रह गया और अपने पिता के पास लौटकर सारा वृत्तांत उसे सुनाया।

रामशर्मा ने मंदहास करते हुए कहा, ‘‘नौकरों ने सही उत्तर दिया है। वसुगुप्त का अपना कोई व्यक्तित्व नहीं है। जब तक वह अपने पिता के साये में पला, तब तक उसके पिता का धन उसका रक्षक था। उस धन के समाप्त होते ही वह भी एक साधारण व्यक्ति बन गया है। तुम मेरे पांडित्य के द्वारा आदर प्राप्त कर रहे हो। मेरी संपत्ति केवल पांडित्य है। वह संपत्ति अगर तुम्हें प्राप्त न हुई, तो तुम्हारी भी यही हालत होगी। स्वावलंबन के द्वारा जो कुछ अर्जित किया जाता है, वही उसकी अपनी सम्पत्ति होती है।''

‘‘स्वावलंबन आवश्यक है। इसलिए आप अपने मित्र की जो सहायता कर सकते हैं, वह मैं अपने मित्र की सहायता नहीं कर पाता हूँ।'' कृष्णशर्मा ने कहा।

‘‘तुम और तुम्हारे मित्र मेरे बताये स्थान पर जाकर कुछ वर्ष विद्याभ्यास करो।'' यों समझाकर रामशर्मा ने अपने विद्याभ्यास का विवरण देकर उस मुनि के आश्रम का परिचय दिया।

कृष्णशर्मा तथा वसुगुप्त दो वर्ष तक मुनि के आश्रम में विद्याभ्यास करके लौट आये। वसुगुप्त का पिता न केवल जीवित था, बल्कि उसने अपनी जायदाद दुगुनी कर ली थी। आख़िर उन दोनों ने जान लिया कि रामशर्मा तथा सोमगुप्त ने मिलकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने के लिए यह नाटक रचा है।

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