15 जुलाई 2010

धर्माचरण ( Dhermacharan )

प्राचीन काल में काशी राज्य पर ब्रह्मदत्त शासन करते थे। उसी काल में बोधिसत्व ने धनंजय के नाम से कुरु राजा के रूप में इन्द्रप्रस्थ में जन्म लिया। उनके राज्य में अकाल कभी पड़ता न था। प्रजा सुखी थी। सारे जंबू द्वीप में ख़बर फैल गयी कि धर्माचरण और दान करने में इंद्रप्रस्थ के राजा धनंजय की बराबरी करने वाला कोई नहीं हैं।

उन्हीं दिनों दंतपुर को अपनी राजधानी बनाकर कलिंग देश पर कालिंग नामक राजा राज्य करते थे। उस राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। जनता भूखों मरने लगी। कई बच्चे अपनी माताओं की गोद में ही मर गये। जनता में हाहाकार मच गया। देश की उस बुरी हालत देख राजा कालिंग का दिल पसीज उठा। उन्होंने अपने मंत्रियों को बुलाकर पूछा, ‘‘इस वर्ष हमारे देश में ऐसे भयंकर अकाल पड़ने का कारण क्या है? इस बुरे हाल से बचने का उपाय क्या है?’’
मंत्रियों ने जवाब दिया, ‘‘महाराज, देश में जब धर्म की हानि होती है, तभी ऐसी आपदाएं आती हैं। इंद्रप्रस्थ के राजा धनंजय अपने धर्म का पालन करते हैं! इसीलिए उस देश में कभी अकाल नहीं पड़ता। जनता सुखी है और देश समृद्ध है।’’

‘‘तब तो तुम लोग एक काम करो। आज ही इन्द्रप्रस्थ जाकर राजा धनंजय के दर्शन करो। उनके द्वारा सोने के पत्रों पर धर्म-सूत्र लिखवा कर ले आओ। हम भी उन सूत्रों पर अमल करके अपने देश को सुखी और संपन्न बना लेंगे।’’ राजा कालिंग ने समझाया। कलिंग देश के मंत्री स्वर्ण पत्र लेकर इंद्रप्रस्थ पहुँचे। राजा धनंजय के दर्शन करके बोले, ‘‘महाराज, हम कलिंग देश के निवासी हैं। हमारे देश की प्रजा भयंकर अकाल का शिकार हो गई है। आप तो धर्मात्मा हैं, धर्माचरण करते हुए प्रजा पर शासन करते हैं। इसीलिए आपकी प्रजा सुखी और संपन्न है। हमारे राजा को जिन धर्मसूत्रों का पालन करना चाहिए, उन्हें आप इन सोने के पत्रों पर लिख दीजिए। हमारे राजा उन धर्म-सूत्रों का पालन करके अकाल से प्रजा को मुक्त करेंगे।’’ इन शब्दों के साथ कलिंग देश के मंत्रियों ने सोने के पत्रों को धनंजय के सामने रखा।

धनंजय ने प्रणाम करके कहा, ‘‘महामंत्रियो ! क्षमा कीजिए। इन पत्रों पर धर्म-सूत्र लिखने की योग्यता मैं नहीं रखता, क्योंकि एक बार मेरे द्वारा धर्म का उल्लंघन हुआ है। हमारे देश में तीन सालों में एक बार कार्तिक उत्सव होता है। उस व़क्त राजा को एक तालाब के किनारे यज्ञ करके चारों तरफ़ चार बाण छोड़ने पड़ते हैं। एक बार मैंने जो चार बाण छोड़ दिये, उन में से तीन तो हाथ लगे, मगर चौथा बाण तालाब में गिर गया। उसके आघात से मछलियाँ और मेंढक मर गये होंगे।’’

ये बातें सुन मंत्री आश्चर्य में आ गये। इसके बाद वे राजमाता मायादेवी के पास पहुँचे। सारी बातें उन्हें सुनाकर बोले, ‘‘माताजी, आप कृपया हमारे वास्ते धर्म-सूत्र लिख दीजिए।’’ ‘‘बेटे, मैंने भी धर्म का अतिक्रमण किया है। एक बार मेरे बड़े बेटे ने मुझे सोने की एक माला भेंट की। मैंने अपनी बड़ी बहू को संपन्न परिवार की समझ कर वह माला छोटी बहू को दे दी। लेकिन दूसरे ही पल मेरे भीतर का पक्षपात मुझे मालूम हुआ और इस बात का मुझे बड़ा दुख हुआ। इसलिए दूसरों को धर्म-सूत्र लिख कर देने की योग्यता मैं नहीं रखती। आप लोग कृपया किसी योग्य व्यक्ति के पास जाइये।’’

इसके बाद कलिंग देश के मंत्री राजा के भाई नंद के पास पहुँचे। उन्होंने भी एक बार धर्म का अतिक्रमण करने की बात बताई, ‘‘मैं रोज शाम को अपने रथ पर अंतःपुर में जाता हूँ। अगर मैं अपना चाबुक रथ पर छोड़ जाता हूँ तो मैं रात को अंतःपुर में नहीं टिकता। ऐसी हालत में रथ का सारथी मेरे इन्तज़ार में बैठा रहता है। यदि मैं चाबुक अपने साथ ले जाता हूँ तो सारथी रथ हांक ले जाता है, और दूसरे दिन सवेरे रथ ले आता है। एक दिन मैं चाबुक को रथ पर छोड़ कर अंतःपुर में चला गया। उस दिन अंतःपुर से लौटने का मेरा विचार था। लेकिन एक दिन जब रथ में चाबुक छोड़ कर गया तो ज़ोर से पानी बरसा। राजा ने, जो मेरे बड़े भाई हैं, मुझे लौटने नहीं दिया; इस कारण मैं रात को अंतःपुर में ही रह गया। पानी में भीगते मेरा सारथी रात भर रथ पर बैठा ही रह गया। उसे इस प्रकार तक़लीफ़ पहुँचा कर मैंने धर्म का अतिक्रमण किया है।’’

इसके बाद कलिंग के मंत्री राजपुरोहित के पास पहुँचे । लेकिन उन्होंने भी धर्म का अतिक्रमण करने की घटना बताई, ‘‘एक दिन मैं राजमहल को जा रहा था। रास्ते में मुझे एक रथ दिखाई दिया। उस पर सोने का मुलम्मा चढ़ाया गया था। उसे देखते ही मेरे मन में लालच पैदा हो गया। मैं जब राजा के पास पहुँचा, तब वे मुझे देखकर बोले, ‘‘पुरोहितजी, यह रथ मैं आपको भेंट करता हूँ।’’ उसी व़क्त मुझे अपने लालच की याद हो आई और पछताते हुए मैंने उस रथ को लेने से इनकार किया। इसलिए मैं आपको धर्म-सूत्र लिखकर नहीं दे सकता।’’

कलिंग देश के मंत्रियों की समझ में कुछ नहीं आया। आख़िर वे इंद्रप्रस्थ के महामंत्री के पास पहुँचे। वे बोले, ‘‘मैं एक दिन एक किसान के खेत का माप लेने गया। माप के मुताबिक़ जहाँ मुझे लकड़ी गाड़नी थी, वहाँ पर एक बिल था। मेरे मन में शंका पैदा हो गई कि उस बिल में किसी प्राणी का निवास हो सकता है। लेकिन अगर थोड़ा हटकर लकड़ी गाड़ दूँ तो किसान का नुकसान होगा! उसके थोड़ा आगे गाड़ने पर राजा का नुकसान हो सकता है! इसलिए मैंने उस बिल में ही लकड़ी गाड़ने की आज्ञा दी। उसी व़क्त बिल में से एक केकड़ा बाहर निकलते हुए लकड़ी के आघात से मर गया। इसलिए मैंने भी धर्म का अतिक्रमण किया है। ऐसी हालत में मैं आप लोगों को धर्म-सूत्र लिखकर कैसे दे सकता हूँ?’’

इस पर के मंत्रियों के मन में एक उपाय सूझा। उन लोगों ने जो कहानियाँ सुनी थीं उन्हें सोने के पत्रों पर लिख कर राजा को सुनाया। राजा कालिंग ने समझ लिया कि धर्म के प्रति ईमानदार रहना ही सबसे उत्तम धर्म है। इस प्रकार आत्म विमर्श करके उन्होंने शासन करना शुरू किया। कुछ ही दिनों में पानी बरसा और राज्य भर में अकाल दूर हो गया। कलिंग देश की प्रजा सुख पूर्वक अपनी जिंदगी बिताने लगी।

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