21 मार्च 2010

Hindi Novel- ELove CH-31 उसकी मेल

शामका वक्त था. अतूल सुबहसे अबतक उसके रुममें कॉम्प्यूटरपर बैठा हूवा था. अलेक्स उसके बगलमें आकर खडा हो गया और उसका क्या चल रहा है यह देखने लगा. अलेक्सकी आहट होतेही अतूल कीबोर्डकी कुछ बटन्स दबाता हूवा बोला,

'' देख यह है हमने निकाली हूई तस्वीरे ... कैसी लग रही है ?''

कॉम्प्यूटरके मॉनिटरपर अंजली और विवेककी हॉट फोटोज किसी स्लाईड शो की तरह एकके पिछे एक ऐसी आगे आगे खिसकने लगी.

'' वा वा .. एकदम परफेक्ट... जस्ट लाईक अ प्रोफेशनल फोटोग्राफर...'' अलेक्स अतूलकी सराहना करते हूए बोला.

'' लेकिन सिर्फ यह फोटोग्राफ्स देखकर क्या होनेवाला है ... हमें आगे भी कुछ करना पडेगा ... सिर्फ सुबहसे शामतक कॉम्प्यूटरपर बैठकर क्या होनेवाला है? '' अलेक्स उसे ताना मारते हूए बोला.

'' अरे ... अब आगेका काम यह कॉम्प्यूटरही करनेवाला है ... पहले मै अंजलीके मेलबॉक्ससे विवेकको एक मेल भेजता हूं ... फिर उसके बाद तुम्हारा काम शुरु होनेवाला है '' अतूलने कहा.

'' तूम मेरे कामके बारेमें एकदम बिनदास रहो ... सिर्फ पहले तुम्हारा काम होनेके बाद मुझे बता देना .. '' अलेक्सने कहा.

अतूलने काफी मेहनत करके हासिल किया हूवा पासवर्ड देकर अंजलीका मेलबॉक्स खोला और वह मेल टाईप करने लगा -

'' विवेक... सबसे पहले तुम्हे लिखू या ना लिखू ऐसा सोचा .... लेकिन बादमे तय किया की लिखनाही ठिक रहेगा ... हम मुंबईको मिलनेके बाद मै वापस गई और इधर एक प्रॉब्लेम होगया ... वैसे उसको प्रॉब्लेम नही बोल सकते ... लेकिन तुम्हारे लिए उसे प्रॉब्लेमही कहना पडेगा ... इधर मेरे रिश्तेदारोंको क्या लगा क्या मालूम लेकिन उन्होने तुरंत मेरी शादी तय की है ... पहले मुझे बहुत बुरा लगा ... लेकिन बादमै मैने उसके बारेमें बहुत सोचा और मै इस नतिजेपर पहूंची हू की मेरे रिश्तेदार जो भी कर रहे है वह मेरे भलेके लिए ही है .. लडका अच्छा है, अमेरीकामें पढा हूवा है ....इंडस्ट्रीयल फॅमिली है और हमारे बराबरीकी है ... अब मुझे धीरे धीरे समझने लगा है की अबतक जो भी हमारे बिच हूवा वह एक अपरीपक्वताका नतिजा था.... इसलिए तुम्हारे और मेरे लिए यही अच्छा रहेगा की कुछ हुवाही नही इस तरह सब भूल जाएं ... हम मुंबईको मिले थे यह शायद मेरे रिश्तेदारोंको पता चल चुका है ... तुमने मुझसे मिलनेकी या मुझसे संपर्क बनानेकी कोशीशभी की तो वे लोग तुम्हे कुछभी कर सकते है ... इसलिए तुम इस मेलका रिप्लायभी मत भेजना ... मेरा मेलबॉक्सभी शायद मॉनिटर किया जा रहा है ... अपना खयाल रखना ...इतनाही मै तुम्हे कह सकती हूं ... अंजली''


अतूलने मेल मानो अंजलीनेही टाईप कर विवेकको भेजी हो इस तरहसे टाईप की. मेल पुरी तरह लिखनेके बाद उसने एक बार फिरसे उसे पढकर देखा. उसके चेहरेपर एक वहशी मुस्कुराहट छुपाए नही छुपाई जा रही थी. उस मेलमें कुछभी त्रूटी बची नही है इसकी तसल्ली होतेही उसने वह मेल विवेकको भेज दी और अंजलीका मेलबॉक्स बंद किया.


इधर विवेक सायबर कॅफेमें बैठा था. उसे आशंका ... नही यकिन था की अंजलीकी कोई तो मेल उसे आई होगी. उसने अपना मेलबॉक्स खोला और उसे मेलबॉक्समें अंजलीकी आई हूई मेल दिखाई दी. उसने तुरंत, मानो उसके बदनमें बिजली दौड गई हो, वह मेल खोली. मेल पढते हूए उसका खिला चेहरा एकदमसे मायूस हो गया. मेल पुरी पढनेके बादभी वह जैसे शुन्यमें देख रहा हो ऐसे मॉनिटरकी तरफ देखता रहा.

यह ऐसे कैसे हूवा ?...

वह अपना मजाक तो नही कर रही है ?...

उसे एक पलके लिए लगा.

तभी सायबर कॅफेमें एक आदमी आ गया. वह आए बराबर सिधा विवेकके पास गया. धीरेसे उसके पास झुककर उसने उसके कानमें कुछ कहा, -

'' विवेक... आपही है ना ?''

'' हां '' विवेक आश्चर्यसे उस आदमीकी तरफ देखते हूए बोला.

क्योंकी वह उस आदमी को पहचानता नही था.

'' अंजलीजी घरसे भागकर आई है ... बाहर गाडीमें आपकी राह देख रही है ...'' वह आदमी फिरसे उसके कानमें बोला.

विवेकने झटसे कॉम्प्यूटरके मॉनिटरपर खुले हूए थे वह सब वेब पेजेस बंद कर दिए. और उस आदमीके पिछे पिछे सायबर कॅफेसे बाहर निकल गया.

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