15 जुलाई 2010

नवकोटि नारायण ( Navkoti Narayan )

किसी जमाने में ब्रह्मदत्त काशी पर राज्य करते थे। उनके शासन-काल में काशी में एक बड़ा धनी व्यक्ति रहता था। उसने नौ करोड़ रुपये कमाये। इसलिए, इस बीच जब उसके एक पुत्र पैदा हुआ तो अमीर ने उसका नामकरण नवकोटि नारायण किया।

अमीर आदमी अपने बेटे नारायण की हर इच्छा की पूर्ति करता था। इसका नतीजा यह हुआ कि बालक नारायण नटखट और उद्दण्ड हो गया । नारायण जब जवान हुआ, तब अमीर ने एक सुंदर कन्या के साथ उसकी शादी कर दी। लेकिन इसके थोड़े ही दिन बाद अमीर का देहांत हो गया।

बचपन से नारायण पानी की तरह धन ख़र्च करता गया। आख़िर उसके पिता की मौत के समय तक सारी संपति स्वाहा हो गई। उल्टे क़र्ज का बोझ उसके सर पर आ पड़ा। कर्ज़दारों ने आकर क़र्ज चुकाने के लिए उस पर दबाव डालना शुरू किया। उस हालत में नारायण को अपनी ज़िंदगी के प्रति विरक्ति पैदा हो गई। उसने सोचा कि इस अपमान को सहने के बदले कहीं मर जाना अच्छा है! आख़िर उन से बचने के ख़्याल से बोला, ‘‘महाशयो, मैं गंगा के किनारे अमुक पीपल के पेड़ के पास जा रहा हूँ। वहाँ पर मेरे पुरखों द्वारा गाड़ा हुआ ख़जाना है! आप लोग ऋण-पत्र लेकर कृपया वहाँ पर आ जाइयेगा।''

क़र्जदार नारायण की बातों पर यक़ीन करके गंगा के किनारे पहुँचे। नारायण ने ख़जाने को ढूँढ़ने का अभिनय किया। क़रीब आधी रात तक इधर-उधर खोजता रहा। आख़िर कर्जदारों को बेखबर पाकर नारायण, ‘‘जय परमेश्वर की'' चिल्ला कर गंगा में कूद पड़ा। गंगा की धारा उसे दूर बहा ले गई।

उस जमाने में बोधिसत्व एक हिरन का जन्म धारण कर अन्य हिरनों से दूर गंगा के किनारे एक आम के बगीचे में रहने लगा था। उस हिरन की अपनी एक अनोखी विशेषता थी। उसकी देह सोने की कांति से चमक रही थी। लाख जैसे लाल खुर, चाँदी के सींग, हीरों की कणियों के समान चमकनेवाली आँखें, उसकी आकृति की विशेषताएँ थीं। आधी रात के व़क्त उस हिरन को एक मनुष्य की करुण पुकार सुनाई दी। हिरन यह सोचते हुए कि यह कैसा आर्तनाद है, नदी में कूदकर उस आवाज़ की दिशा में तैरते हुए नारायण के पास पहुँचा।

‘‘बेटा, तुम डरो मत, मेरे साथ चलो।'' यों उसे हिम्मत बँधा कर हिरन ने नारायण को अपनी पीठ पर चढ़ाया और उसको अपने निवास तक ले गया। नारायण के होश संभालने तक हिरन जंगल से फल ले आया और उसकी भूख मिटाई।

एक दिन हिरन ने नारायण को समझाया, ‘‘बेटा, मैं तुम्हें जंगल पार कराकर तुम्हारे राज्य का रास्ता बता देता हूँ। तुम अपने गाँव चले जाओ। लेकिन मेरी एक शर्त है, राजा या कोई और व्यक्ति भले ही तुम पर दबाब डाले, या लोभ दिखावे, तुम यह प्रकट न करना कि अमुक जगह सोने का हिरन है।''

नारायण ने हिरन की बात मान ली। उसकी बातों पर विश्वास करके हिरन ने नारायण को अपनी पीठ पर बिठाया, और जंगल पार करा कर उसे काशी जानेवाले रास्ते पर छोड़ दिया।

नारायण जिस दिन काशी नगर में पहुँचा, उस दिन वहाँ पर एक अद्भुत घटना हुई। वह यह कि रानी को सपने में एक सोने के हिरन ने दर्शन देकर उसे धर्मोपदेश किया था।

रानी ने राजा को अपने सपने का समाचार सुनाकर कहा, ‘‘अगर दुनिया में ऐसा हिरन न होता तो मुझे कैसे दिखाई देता? चाहे वह कहीं भी क्यों न हो, उसे पकड़ लाने पर मेरे प्राण बच सकते हैं, वरना नहीं।''

रानी के वास्ते हिरन मँगवाने के लिए राजा ने एक उपाय किया। उन्होंने एक हाथी के हौदे पर एक सोने का बक्स रखवा दिया और उसमें एक हज़ार सोने के सिक्के भरवा दिये। तब निश्चय किया कि उसका जुलूस निकाला जाये और जो आदमी सब से पहले सोने के हिरन का समाचार देगा, उसको बक्स के भीतर के सोने के सिक्के उपहार के रूप में दिये जायेंगे। इस आशय का ढिंढोरा सब जगह पिटवाया गया। उसी व़क्त नारायण काशी नगर में पहुँचा।

उसने सेनापति के पास पहुँच कर निवेदन किया, ‘‘महाशय, मैं उस सोने के हिरन का सारा समाचार जानता हूँ। आप मुझे राजा के पास ले जाइये।''

इसके बाद नारायण ने राजा और उनके परिवार को साथ ले हिरन का निवास दिखाया। वह थोड़ी दूर जा खड़ा हुआ।

राजा के परिवार ने कोलाहल करना शुरू किया। हिरन के रूप में रहनेवाले बोधिसत्व ने उनकी आवाज़ सुनी।

‘शायद कोई महान अतिथि आया होगा। उनका स्वागत करना चाहिए।' यों सोचकर वह उठ खड़ा हुआ और सब लोगों से बचकर वह सीधे राजा के पास पहुँचने के लिए दौड़ा।

हिरन की तेज गति को देख राजा आश्चर्य में आ गये। धनुष और बाण लेकर हिरन पर निशाना लगाया। इस पर हिरन ने पूछा, ‘‘महाराज, रुक जाइये! आपको किसने मेरे निवास का पता बताया है?''
राजा के कानों में ये शब्द बड़े ही मधुर मालूम हुए। स्वतः ही उनके हाथों से धनुष और बाण नीचे गिर गये।

बोधिसत्व ने मीठे स्वर में फिर राजा से पूछा, ‘‘महाराज, आपको किसने मेरे निवास का पता बताया है?''

राजा ने नारायण की ओर उंगली का इशारा किया।

इस पर बोधिसत्व ने यों तत्वोपदेश किया, ‘‘शास्त्रों में वर्णित ये बातें बिलकुल सही हैं कि इस दुनिया में मनुष्य से बढ़कर कोई भी प्राणी कृतघ्न नहीं है। जानवर और चिड़ियों की भाषा भी समझी जा सकती है, लेकिन मनुष्य की बातों को समझना ब्रह्मा के लिए भी संभव नहीं है।'' इन शब्दों के साथ बोधिसत्व ने वह सारा वृत्तांत राजा को सुनाया कि उसने नारायण की रक्षा करके कैसे उससे वचन लिया था। राजा ने क्रोध में आकर कहा, ‘‘ओह, यह बात है! ऐसे कृतघ्न दुनिया के लिए भी बोझीले हैं। यह महान पापी है। मैं अभी इसका वध करता हूँ।'' यों कहकर राजा ने अपने तरकस से तीर निकाला।

बोधिसत्व ने राजा को रोकते हुए कहा, ‘‘महाराज, इसके प्राण न लीजिये। अगर यह ज़िंदा रहेगा तो कभी-न-कभी अपनी भूल समझकर यह अपनी ज़िंदगी को सुधार लेगा। आप कृपया अपने वचन के मुताबिक़ उसे जो पुरस्कार मिलना चाहिए, उसको दे दीजिए। यही बात न्याय संगत है।''

राजा ने बोधिसत्व के उपदेश का पालन किया।

बोधिसत्व की उदारता, क्षमा आदि महान गुणों को राजा ने समझ लिया। उनको एक महात्मा मानकर अपने राज्य के सलाहकार के रूप में नियुक्त किया।

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