07 अप्रैल 2010

यमराज : धर्मराज

प्राणी की मृत्यु या अंत को लाने वाले देवता यम है । यमलोक के स्वामी होने के कारण ये यमराज कहलाए। चूंकि मृत्यु से सब डरते है, इसलिए यमराज से भी सब डरने लगे। जीवित प्राणी का जब अपना काम पूरा हो जाता है, तब मृत्यु के समय शरीर में से प्राण खींच लिए जाते है, ताकि प्राणी फिर नया शरीर प्राप्त कर नए सिरे से जीवन प्रारंभ कर सके।

यमराज सूर्य के पुत्र है और उनकी माता का नाम संज्ञा है। उनका वाहन भैंसा और संदेशवाहक पक्षी कबूतर, उल्लू और कौवा माना जाता है।

उनका अचूक हथियार गदा है। यमराज अपने हाथ के कालसुत्र या कालपाश की बदौलत जीव के शरीर से प्राण निकाल लेते हैं। यमपुरी यमराज की नगरी है, जिसके दो महाभयंकर चार आंखो वाले कुते पहरेदार है। यमराज अपने सिंहासन पर न्यायमूर्ति की तरह बैठकर विचार भवन कालीची मे मृतात्माओं को एक-एक कर बुलवाते है, जहां चित्रगुप्त सब प्राणियों की बही खोलकर लेखा-जोखा प्रस्तुत करते है। कर्मो को ध्यान मे रखकर यमराज अपना फैसला देते हैं, क्योंकि वे जीवों के शुभाशुभ कर्मो के निर्णायक है।

यमराज की यूं तो कई पत्नियां थी, लेकिन उनमें सुशीला, विजया और हेमनाल अधिक जानी जाती हैं। उनके पुत्रों मे धर्मराज युधिष्ठिर को भी जानते हैं। न्याय के पक्ष मे फैसला देने के गुणो के यमराज और युधिष्ठिर जगत मे धर्मराज के नाम से जाने जाते है। यम दितीया के अकसर पर जिस दिन भाई-बहन का त्योहार भैया-दूज मनाया जाता है। यम और यमुना कर पूजा का विधान बनाया गया है । उल्लेखनीय है कि यमुना नदी को यमराज की बहन माना जाता है।

भौमवारी चतुर्दशी को यमतीर्थ के दर्शन कर सब पापों से छुटकारा मिल जाए, उसके लिए प्राचीन काल मे यमराज ने यमतीर्थ मे कठोर तपस्या करके भक्तों को सिद्धि प्रदान करने वाले यमेश्वर और यमादित्य मंदिरा की स्थापना की थी। यम द्वितीया को सहां मेला लगता है। इन मंदिरा को प्रणाम करने वाले एवं यमतीर्थ मे स्नान करने वाले मनुष्यो को नारकीय यातनाओं को न तो भोगना पड़ता है। इसके अलावा मान्यता तो यहां तक है कि यमतीर्थ मे श्राद्ध करके, यमेश्वर का पूजन करने और यमादित्य को प्रणाम करके व्यक्ति अपने पितृ-ऋण से भी उऋण हो सकता है।

श्राद्ध कृत्या यमे तीर्थे पूजयित्वा यमेश्वरम्‌ ॥
यमादित्यं नमस्कृत्य पितृणामनृणो भवेत्‌ ॥

दीपावली से पूर्व दिन यमदीप देकर तथा दूसरे पर्वो पर यमराज की अराधना करके मनुष्य उनकी कृपा प्राप्त करने के उपाय करता है। पुराणों मे ऐसा उल्लेख मिलता है किसी समय माण्डव ऋषि ने कुपित होकर यमराज को मनुष्य के रूप मे जन्म लेने का शाप दिया। इसके कारण यमराज ने ही दासी पुत्र के रूप में धृतराष्ट तथा पाण्डु के भाई होकर जन्म लिया। यूं तो यमराज परम धार्मिक और भगवद् भक्त है। मनुष्य जन्म लेकर भी वे भगवान्‌ के परम भक्त तथा धर्म-परायण ही बने रहे।

प्राणायाम का लें सहारा

ऋतु बदलने का असर शरीर के प्रत्येक हिस्से पर समान रूप से पड़ता है। बीमारियां और छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याएं तकरीबन हर अंग को प्रभावित करती हैं। ऐसे में नाक, कान और गले से जुड़ी अनगिनत समस्याओं के प्रति भी सावधान रहने की ज़रूरत है।

गर्मी के मौसम में नाक सर्दी, ज़ुकाम और एलर्जी से परेशान होती है, तो गला भी टॉन्सिल और खराश से प्रभावित होता है। जबकि कान कम सुनाई देने और हमिंग की शिकायत करते हैं। इन सबकी शिकायतों को दूर करने और स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए योग का सहारा लीजिए, रोग तुरंत भाग जाएंगे। नाक, कान और गले के विभिन्न समस्याओं, जो इस मौसम में सिर उठाती है, से निपटने के लिए योग मार्गदर्शन प्रस्तुत है।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम

पदमासन या सुखासन में बैठकर आंखें बंद करते हुए सीधा तनकर बैठ जाएं। अब दायां हाथ घुटने पर रखें और बाएं हाथ के अंगूठे को दाईं नासिका पर रखें। तर्जनी उंगली दोनों आंखों के बीच, जहां टीका लगाते है, वहां रखें तथा मध्यमा उंगली को बाईं नासिका पर रखें।

अब बाईं नासिका से श्वास लीजिए (इस दौरान दायां स्वर बंद रहेगा) तत्पश्चात बाईं नासिका बंद कर दाईं नासिका खोलें और श्वास बाहर करें। अब दाईं नासिका से श्वास लें और बाईं नासिका से सांस छोड़े। यह क्रमबद्ध अभ्यास लगभग 30 चक्र तक करें। किसी भी प्रकार की थकान और तनाव महसूस होने पर अभ्यास रोक दें और कुछ देर रुककर फिर शुरू करें। साथ ही श्वास-प्रश्वास में किसी भी तरह के बल का प्रयोग न करें।

लाभ

अनुलोम विलोम प्राणायाम मन को एकाग्र करने में लाभदायक है। इसके अभ्यास से शरीर में अतिरित ऑसीजन की आपूर्ति बढ़ जाती है। आंखों के लिए भी यह लाभदायक है। गले में जलन तथा पुराने जमे हुए कफ को दूर करता है। दमे के मरीजों के लिए यह प्राणायाम अत्यंत प्रभावशाली है।

भ्रामरी प्राणायाम

इस प्राणायाम की क्रिया में भ्रमर के गुंजन जैसी आवाज निकलती है इसलिए इसका नाम भ्रामरी प्राणायाम है। ध्यान के किसी भी आसन में बैठें। सिद्धासन और सिद्धयोगि आसन श्रेयस्कर है। हर स्थिति में मेरूदंड सीधा, आंखें बंद और शरीर सीधा पर शिथिल रखें। दोनों नाक से एक साथ लम्बी सांस भीतर लें।

सांस को भीतर रोककर कुछ क्षण के लिए जालंधर बंध और मूल बंध लगाएं। अब पुन: दोनों बंधों को शिथिल कर सिर सीधा कर लें। दोनों हाथों की तर्जनी उंगली से दोनों कान को अच्छी तरह से बंद कर दें, जिससे बाहर की कोई ध्वनि सुनाई न पड़े।

उंगलियों के नाखून अच्छी तरह कटे हुए हों, यह पूर्व में ही सुनिश्चित कर लें। मुंह बंद रखते हुए ही, लेकिन ऊपर और नीचे के दांतों को अलग रखते हुए मधुमखी की गुंजार जैसी ध्वनि करते हुए श्वास को धीरे-धीरे नाक से तब तक बाहर निकालते जाएं, जब तक सांस पूरी तरह से बाहर न निकल जाए।

लाभ

नाक, कान और गले से जुड़े प्रत्येक रोग में भ्रामरी अत्यंत उपयोगी प्राणायाम है। ग्लैंड्स की शक्ति  बढ़ती है और मस्तिष्क को भी काफी शांति मिलती है।

कैसी है आपकी श्वसन प्रक्रिया

आपकी श्वसन प्रक्रिया सही है या गलत, यह आप खुद जांच सकती हैं। वो भी सिर्फ 1 मिनट में। अपनी श्वसन प्रक्रिया पर 1 मिनट के लिए ध्यान दीजिए। आप कितनी बार सांस लेती और छोड़ती हैं, इसी आधार पर तय हो सकेगा कि आपकी श्वसन प्रक्रिया सही है अथवा गलत देखिए कैसे-

यदि आप 1 मिनट में 8 से 10 बार सांस लेती हैं, तो चिंतामुत हो जाइए योंकि आपकी श्वसन प्रक्रिया बिल्कुल दुरुस्त है। यदि इसी 1 मिनट में आप 12 से 15 बार सांस लेती हैं, तो आपको तत्काल योग या दूसरे व्यायामों का सहारा लेना चाहिए।

लेकिन यदि आप 1 मिनट में 15 से ज्यादा बार सांस लेती हैं, तो आपकी श्वसन प्रक्रिया में अत्यंत सुधार लाने की ज़रूरत है और आपको इस विषय पर तुरंत डॉटरी परामर्श लेने की आवश्यकता है।

स्वस्थ जीवन और प्राणायाम

प्राण अर्थात्‌ जीवनशक्ति और उसका आयाम अर्थात्‌ विस्तार, नियमन मिलकर प्राणायाम शब्द की रचना हुई है। प्राणायाम अष्टांगयोग का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसका शाब्दिक अर्थ है - प्राण का व्यायाम । महर्षि पतंजलि के मतानुसार - तस्मिन्‌ सति श्वास-प्रश्वासयोगतिर्विच्छेदः प्राणायामः अर्थात्‌ श्वासप्रश्वास की गति का विच्छेद करके प्राणवायु को सीने में भरने, भीतर रोककर रखने और उसे बाहर छोड़ने का नियमन करने के कार्य को प्राणायाम कहते है ।

जैसे अग्नि से तपाये हुए स्वर्ण, रजत आदि धातुओ के मल दूर हरे जाते है, वैसे ही प्राणायाम के अनुष्ठान से इंद्रियो मे आ गए दोष, विकार आदि नष्ट हो जाते है और केवल इन्द्रियों के ही नही, बल्कि देह, प्राण, मन के विकार भी नष्ट हो जाते हैं तथा ये सब साधक के वश में हो जाते है ।
योग दर्शन के अनुसार- ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्‌-
प्राणायाम के अभ्यास से विवेक (ज्ञान) रूपी प्रकाश पर पड़ा अज्ञान रूपी आवरण (पर्दा) हट जाता है । योगचूडामणि मे कहा गया है कि प्राणायाम मे पाप जल जाते हैं । यह संसार समुद्र को पार करने के लिए महासेतुरूप है ।
यो तो प्राणायाम का मुरव्य उदेश्य अध्यात्मिक साधना का मार्ग प्रशस्त करना है, फिर भी शारीरिक और मानसिक दृष्टिकोण से भी इसका काफी महत्व माना गया है। इससे शरीर को अतिरिक्त आंतरिक सामर्थ्य, बल एवं उर्जा प्राप्त होती है तथा मानसिक शांति मिलती है । मानसिक रोगो से मुक्ति प्राप्त होकर स्मरण शक्ति बढ़ती है । श्वास-प्रश्वास के नियमन से फेफडे मजबूत होते है, जिससे रक्त शुद्ध होता है और शरीर निरोगी बनकर दीर्घायु प्राप्त होती है । प्राणायाम से जठराग्नि प्रदीप्त होती है, मन की चंचलता पर नियंत्रण होता है, इंद्रियो के विकारो से निवृति होती है, चेहरे की क्रांति बढती है, मोटापा दूर होता है, और भूख-प्यास पर निंयत्रण होता है । इसके उंचे अभ्यास से आयु को बढ़ाना संभव है और इच्छामृत्यु को प्राप्त किया जा सकता है ।

वैज्ञानिक दृष्टि से प्राणायाम से शरीर के विभिन्न हिस्सों और अंगो पर दबाब पड़ता है, जिसके कारण उस क्षेत्र का रक्त संचार बढ जाता है । परिणामस्वरूप उन अंगो की स्वस्थता बढती है । प्राणायाम मे ली गई गहरी सांस से मस्तिष्क से सारा दूषित खून बह जाता है और हदय का शुद्ध रक्त उसे अधिक मात्रा मे मिलता है । योग मे उड्ड़ियान बंध के प्रयोग से इतना अधिक शुद्ध रक्त
उसे अधिक मात्रा में मिलता है । जितना किसी श्वास संबंधी व्यायाम से नही । अतः प्राणायाम स्वास्थय के लिए अत्यंत आवश्यक है । इससे शरीर शुद्धि के अलावा मनोबल बढता है । इसीलिए हमारे महर्षियों ने संध्यावंदन के साथ नित्य प्राणायाम का नियम बनाया है ।

बुरी नजर

संसार के लगभग सभी देशो मे बुरी नजर लगाने के प्रभाव को जाना जाता है। जीवित प्राणियो पर ही नही वरन्‌ निर्जीव पदार्थ पर बुरी नजर लगाने पर विकारग्रस्त हो जाते है। सुन्दर वस्तुएं खो जाती है, नष्ट हो जाती है। यहां तक कि सुन्दर प्रतिमा बुरी नजर के प्रभाव से खंडित होती देखी गई है। बिना किसी पूर्व रोग के एकाएक बच्चा बीमार पड़ जाता है। दुधारू पशु-गाय, भैंस आदि को जब बुरी नजर लग जाती है, तो उसका दूध सूख जाता है।

बुरी नजर लगाने का आशय यह हैं कि जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दुर्भावना या आकर्षण से एकाग्र होकर किसी व्यक्ति या वस्तु को देखता है, तो उसकी बेधक दृष्टि उस वस्तु पर दुष्प्रभाव डालती है। भूखे व्यक्ति की कुदृष्टि आपके भोजन को विषैला बना सकती है। अतः भोजन जहां तक हो सके, अजनबियों के बीच न करें।

आमतौर पर बुरी नजर का प्रभाव कोमल चित वाले, बच्चो, महिलाओं और पालतू जानवरो पर देखा जाता है। इसके अलावा मकान, उद्योग, व्यापार, वाहन, दुकान आदि पर भी बुरी नजर का असर होता है। बच्चो पर बुरी नजर का प्रभाव शैशवावस्था मे अधिक होता है बुरी नजर के प्रभाव से अच्छा भला बच्चा देखते देखते ही बीमार पड़ जाता है। वह दूध पीना छोड़कर अधिक रोता है, चिड़चिड़ा हो जाता है, ज्वर आ जाता है। उसकी आखे चढ़ी हुई सी रहती है। पलको की बरोनियां खड़ी तथा मुहं से खटटी गंध आने लनती है। अपच की शिकायत हो जाती है।

महिलाओं पर बुरी नजर का प्रभाव विवाह के समय, गर्भावस्था में बच्चा होने के बाद के समय में बच्चा होने के बाद के समय में अकसर होता है। वयस्क व्यक्ति को जब बुरी लगती है, तो उसे मानसिक तनाव, बेचैनी अशांति का अनुभव, शरीर की पीड़ा, ज्वर, मंदाग्नि आदि तकलीफें महसूस होती है ।

बुरी नजर लगने के मूल मे वैज्ञानिकों ने मानवीय विद्युत्‌ का अहितकर प्रभाव माना है। किसी-किसी व्यक्ति की दूष्ति दृष्टि इतनी बेधक होती है कि उससे बच्चे की शक्ति खिंचती है और वे उसके झटके को बर्दाश्त न करके बीमार हो जाते है । ऐसा देखा गया है कि अजगर अपनी दृष्टि से आकाश से पक्षियों को अपनी ओर खींच लेता है । भेड़िए की दृष्टि से भेड़ और बिल्ली की दृष्टि से कबूतर इतने अशक्त हो जाते है कि भाग तक नही सकते । इसी को आंखो कीे आकर्षण शक्ति का सम्मोहन कहते है ।

नजर से बचने के लिए काले टीके का या काले धागे के प्रयोग के पीछे मान्यता यह है कि यह विद्युत का सुचालक होता है । आमतौर पर देखने मे आया है कि आकाश की बिजली अकसर काले आदमी, जानवर, सांप या अन्य काली वस्तुओं पर पड़ती है। जाड़े के दिनो मे काले कपड़े अधिक गर्मी सोखते है। इसीलिए बच्चो को कपाल, हाथ-पैरो मे ओर आंखो में काजल लगाया जाता है । पैर, हाथ, गले, कमरे में काला ड़ोरा बांधा जाता है । काली बकरी का दूध पिलाया जाना और काली भस्म चटाना जैसे सभी कार्यों का उदेश्य नजर के दुष्प्रभाव से बचाने की शक्ति ग्रहण करना है । बुरी नजर से बचने के लिए शेर का नाखून, नीलकंठ का पर, मूंज या तांबे का ताबीज गले मे पहना जाता है । दुकानदार नींबू और हरी मिर्चें दुकान मे लटका कर रखते है । ट्रक मालिक ट्रक के पीछे जूता लटकाते है । कारखाने वाले प्रवेश द्वार पर घोडे+ की नाल लगाते है । मकान पर काली हड़िया टांगी जाती है । यह नजर की एकाग्रता भंग करने की दृष्टि से किया जाता है।

मौन व्रत

आध्यात्मिक उन्नति के लिए वाणी का शुद्ध होना परमावश्यक है । मौन से वाणी नियंत्रित एवं शुद्ध होती है । इसीलिए हमारे शास्त्रों में मौन का विधान बनाया गया है । श्रावण मास की समाप्ति के बाद भावप्रद प्रतिपदा से १६ दिनों तक इस व्रत के अनुष्ठान का विधान है । ऐसी मान्यता है कि मौन से सब कामनाएं पूर्ण होती हे । ऐसा साधक शिवलोक को प्राप्त होता है । मौन के साथ श्रेष्ठ चिंतन्‌, ईश्वर स्मरण आवश्यक है । शास्त्रकार ने मौन के साथ की गणना पांच तपों मे की है -

मनः प्रसादः सौभ्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशद्धिरित्येततपो मानसमुच्यते ॥

अर्थात्‌ मन की प्रसन्नता, सौभ्य-स्वभाव, मौन, मनोनिग्रह और शुद्ध विचार ये मन के तप है।
इनमे मौन का स्थान मध्य में है । मन के परिष्कार तथा संयम के लिए मन की प्रसन्नता धारण की जाए, सौभ्यता धारण की जाए तत्पश्यात्‌ मौन का प्रयोग किया जाए । इसके प्रयोग से शुद्ध विचार उत्पन्न होते हैं । मन का परिष्कार होकर चंचलता और व्यर्थ चिंतन से मुक्ति होती है ।
चाणक्य नीति दर्पण मे कहा गया है : जो मनुष्य प्रतिदिन पूरे संवत मौन रहकर भोजन करता है, वह दस हजार कोटि वर्ष तक स्वर्ग में पूजा जाता है।

मौन की महिमा अपार है। मौन से क्रोध का दमन, वाणी का नियंत्रण,शरीर बल एवं आत्मबल में वृद्धि, मन को शांति तथा मस्तिष्क को विश्राम मिलता है, जिससे आंतरिक शक्तियों का विकास होता है और ऊर्जा का क्षरण रूकता है। इसलिए मौन व्रत को व्रत की संज्ञा दी गई है।

मौन के संबंध में महाभारत में एक कथा है। जब महाभारत का अंतिम श्लोक महर्षि वेदव्यास द्वारा बोला गया और गणेश जी द्वारा भोज पत्र पर लिखा जा चुका, तब महर्षि वेदव्यास ने कहा -÷विनेश्वर धन्य है आपकी लेखनी ! महाभारत का सृजन तो वस्तुतः परमात्मा ने किया है, पर एक वस्तु आपकी लेखनी से अधिक विस्मयकारी है- वह है आपका मौन। इस अवधि में मैंने तो १५-२० लाख शब्द बोल डाले, परंतु आपके मुख मे मैंने एक शब्द नहीं सुना।' इस पर गणेश जी ने मौन की व्याख्या करते हुए कहा-÷बादरनारायण, किसी दीपक में अधिक तेल होता है और किसी में कम, तेल का अक्षय भंडार किसी दीपक में नहीं होता। उसी प्रकार देव, मानव और दानव आदि जितने भी तनधारी जीव हैं, सबकी प्राण शक्ति सीमित है, उसका पूर्णतम लाभ वही पा सकता है, जो संयम से इसका उपयोग करता है। संयम का प्रथम सोपान है- वाक्‌ संयम। जो वाणी का संयम नहीं रखता, उसके अनावश्यक शब्द प्राणशक्ति को सोख डालते हैं। वाक्‌संयम से यह समस्त अनर्थपरंपरा दग्धबीज हो जाते है। इसीलिए मैं मौन का उपासक हूं।

छठ पूजा

गन्ने के छत्र के नीचे छठ मैया का चढ़ावा

छठ पूजा के इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो इसका प्रारंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है। प्राचीन काल में इसे बिहार और उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था। लेकिन आज इस प्रान्त के लोग विश्व में जहाँ भी रहते हैं वहाँ इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाते हैं।
छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर में देवकरी ( पूजा-स्थल) व प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के लिए महिलाएँ कई दिनों से तैयारी करती हैं इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहाँ पूजा स्थल होता है वहाँ नहा धो कर ही जाते हैं यही नही तीन दिन तक घर के सभी सदस्य देवकरी के सामने जमीन पर ही सोते हैं।

पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ ( बिहार में इसे खजूर कहते हैं। यह बाजरे के आटे और गुड़ व तिल से बने हुए पुए जैसा होता है), नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/ पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।

छठ पर्व पर दूसरे दिन पूरे दिन व्रत ( उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्ने के रस की बखीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा ( मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बाँटा जाता है।

तीसरे यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत रखा जाता है, सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी कहते हैं, में पूजा का सभी सामान डाल कर देवकरी में रख दिया जाता है। देवकरी में गन्ने के पेड़ से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक, तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है। वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल, पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरूष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर की तरफ रखते हैं। पुरूष, महिलाएँ, बच्चों की टोली एक सैलाब की तरह दिन ढलने से पहले नदी के किनारे सोहर गाते हुए जाते हैं :-

काचि ही बांस कै बहिंगी लचकत जाय
भरिहवा जै होउं कवनरम, भार घाटे पहुँचाय
बाटै जै पूछेले बटोहिया ई भार केकरै घरै जाय
आँख तोरे फूटै रे बटोहिया जंगरा लागै तोरे घूम
छठ मईया बड़ी पुण्यात्मा ई भार छठी घाटे जाय

नदी किनारे जा कर नदी से मिट्टी निकाल कर छठ माता का चौरा बनाते हैं वहीं पर पूजा का सारा सामान रख कर नारियल चढ़ाते हैं और दीप जलाते हैं। उसके बाद टखने भर पानी में जा कर खड़े होते हैं और सूर्य देव की पूजा के लिए सूप में सारा सामान ले कर पानी से अर्घ्य देते हैं और पाँच बार परिक्रमा करते हैं। सूर्यास्त होने के बाद सारा सामान ले कर सोहर गाते हुए घर आ जाते हैं और देवकरी में रख देते हैं। रात को पूजा करते हैं। कृष्ण पक्ष की रात जब कुछ भी दिखाई नहीं देता श्रद्धालु अलस्सुबह सूर्योदय से दो घंटे पहले सारा नया पूजा का सामान ले कर नदी किनारे जाते हैं। पूजा का सामान फिर उसी प्रकार नदी से मिट्टी निकाल कर चौक बना कर उस पर रखा जाता है और पूजन शुरू होता है।

सूर्य देव की प्रतीक्षा में महिलाएँ हाथ में सामान से भरा सूप ले कर सूर्य देव की आराधना व पूजा नदी में खड़े हो कर करती हैं। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है सब लोगों के चेहरे पर एक खुशी दिखाई देती है और महिलाएँ अर्घ्य देना शुरू कर देती हैं। शाम को पानी से अर्घ देते हैं लेकिन सुबह दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस समय सभी नदी में नहाते हैं तथा गीत गाते हुए पूजा का सामान ले कर घर आ जाते हैं। घर पहुँच कर देवकरी में पूजा का सामान रख दिया जाता है और महिलाएँ प्रसाद ले कर अपना व्रत खोलती हैं तथा प्रसाद परिवार व सभी परिजनों में बांटा जाता है।

छठ पूजा में कोशी भरने की मान्यता है अगर कोई अपने किसी अभीष्ट के लिए छठ मां से मनौती करता है तो वह पूरी करने के लिए कोशी भरी जाती है इसके लिए छठ पूजन के साथ -साथ गन्ने के बारह पेड़ से एक समूह बना कर उसके नीचे एक मिट्टी का बड़ा घड़ा जिस पर छ: दिए होते हैं देवकरी में रखे जाते हैं और बाद में इसी प्रक्रिया से नदी किनारे पूजा की जाती है नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है। कोशी की इस अवसर पर काफी मान्यता है उसके बारे में एक गीत गाया जाता है जिसमें बताया गया है कि कि छठ मां को कोशी कितनी प्यारी है।

रात छठिया मईया गवनै अईली
आज छठिया मईया कहवा बिलम्बली
बिलम्बली - बिलम्बली कवन राम के अंगना
जोड़ा कोशियवा भरत रहे जहवां जोड़ा नारियल धईल रहे जहंवा
उंखिया के खम्बवा गड़ल रहे तहवां

छठ पूजा का आयोजन आज बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त देश के हर कोने में किया जाता है दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई चेन्न्ई जैसे महानगरों में भी समुद्र किनारे जन सैलाब दिखाई देता है पिछले कई वर्षों से प्रशासन को इसके आयोजन के लिए विशेष प्रबंध करने पड़ते हैं। इस पर्व की महत्ता इतनी है कि अगर घर का कोई सदस्य बाहर है तो इस दिन घर पहुँचने का पूरा प्रयास करता है। मात्र दिल्ली से इस वर्ष 6 लाख लोग छठ के अवसर पर बिहार की तरफ गए। देश के साथ-साथ अब विदेशों में रहने वाले लोग अपने -अपने स्थान पर इस पर्व को धूम धाम से मनाते हैं। पटना में इस बार कई लोगों ने नए प्रयोग किए जिसमें अपने छत पर छोटे स्वीमिंग पूल में खड़े हो कर यह पूजा की उनका कहना था कि गंगा घाट पर इतनी भीड़ होती है कि आने जाने में कठिनाई होती है और सुचिता का पूरा ध्यान नहीं रखा जा सकता। लोगों का मानना है कि अपने घर में सफाई का ध्यान रख कर इस पर्व को बेहतर तरीके से मनाया जा सकता है। छठ माता का एक लोकप्रिय गीत है--

केरवा जे फरेला गवद से ओह पर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदिक से सुगा देले जुठियाए
उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय
उ जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ ना सहाय

व्रत-उपवास

पुराणों मे इस बात का विस्तार से उल्लेख मिलता है कि हमारे ऋषि-मुनि उपवास के द्वारा ही शरीर, मन एवं आत्मा की शुद्धि करते हुए आलौकिक शक्ति प्राप्त करते थे। वेद मे कहा गया है -

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्‌।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥

अर्थात्‌ मनुष्य को उन्नत जीवन की योग्यता व्रत से प्राप्त होती है, जिसे दीक्षा कहते हैं। दीक्षा से दक्षिणा यानी जो कुछ किया जा रहा है, उसमें सफलता मिलती है। इससे श्रद्धा जागती है और श्रद्धा से सत्य की यानी जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति होती है, जो उसका अंतिम निष्कर्ष है।

आचरण की शुद्धता को कठिन परिस्थितियों में भी न छोड़ना, निष्ठापूर्वक पालन करना ही व्रत कहलाता है। वस्तुतः विशेष संकल्प के साथ लक्ष्य सिद्धि के लिए किए जाने वाले कार्य के नाम व्रत है।

असंयमित जीवन जीने के कारण जो अशुद्धियां और अनियमितताएं आ जाती है, उनके निवारण का सफल उपाय व्रताचरण ही होता है। अन्न की मादकता के कारण शरीर में आलस्य आने लगता है, जिससे पूजा-उपासना से उत्पन्न आध्यात्मिक शक्ति नष्ट होने लगती है। व्रत से हमारा शरीर और मन शुद्ध बनता है।, आत्मविश्वास बढता है और सयंम की वृति का भी विकास होता है।

आत्मविश्वास हमारी शक्तियों को बढाता है। सयंम से शक्तियों का व्यय घटता है। इस प्रकार से आत्मशोधन और शक्ति दोनों लाभ प्राप्त होते हैं।

इंद्रियो, विषय-वासना और मन पर काबू पानें के लिए उपवास एक अचूक साधन माना गया है। गीता में कहा गया है - विष्या विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

चिकित्सकों के मत में भी व्रत और उपवास रखने से अनेक शारीरिक-मानसिक बीमारियों मे लाभ मिलता है। सप्ताह में एक दिन का व्रत करने से हमारे आंतरिक अंगो को विश्राम करने और सफाई करने का मौका मिलता ह।, जिससे शारीरिक-मानसिक शक्ति तथा आयु बढती है। इसके अलावा व्रतानुष्ठान द्वारा आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं आधिदैविक त्रिविध कल्याण प्राप्त होता है।

उपवास का प्रयोजन शरीर का नही, अपितु लक्ष्य पाने का संकल्प जगाना है। महात्मा बुद्ध ने अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए संकल्प किया कि इस आसन पर बैठे-बैठे मेरा शरीर भले ही सूख जाए, चमड़ी, हड़ी और मांस भले ही विनष्ट हो जाए, किंतु दुर्लभ बोधि को प्राप्त किए बिना यह शरीर इस आसन से विचलित नही होगा । इस दृढ़ संकल्प से ही बुद्धत्व को प्राप्त हुए।

माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म

हिंदू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी सेवा माना गया है । शास्त्र-मातृ देवो भव, पित्र देवो भव आदि सम्मानित वचनों से देवताओं के समान पूजनीय मानते हैं । माता का स्थान तो पिता से

अधिक माना गया है- जननी और जन्म-भूमि को तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कहा गया है ।
प्रत्यक्ष में माता और पिता के द्वारा ही संतान के शरीर का निर्माण होता है। अतः शरीर देने वाले सबसे पहले देवता माता-पिता ही है । माता संतान का पालन-पोषण करने के लिए नौ-दस तक कष्ट

सहती है और अपने विचारों से संस्कार-संपन्न संतान को जन्म देती है, इसीलिए माता-पिता संसार में सर्वाधिक पूजनीय है ।

माता-पिता की इस सेवा के लिए ही हिंदू धर्म में पितृ-ऋण की व्यवस्था है। इस ऋण को चुकाए बिना अथवा माता की अनुमति के बिना पुत्र को गृहस्थ जीवन से विमुख होने की आज्ञा नही हैं।
संन्यास ग्रहण करने के लिए भी इस ऋण से मुक्त होना आवश्यक है।

ज्ञान पाने की दृष्टि से यद्यपि गुरू का बडा महत्व है,लेकिन माता को बच्चे की पहली गुरू कहकर सम्मानित किया गया है। मनुस्मृति में स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि-

उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥

अर्थात्‌ उपाध्यायों सें दस गुना श्रेष्ठ आचार्य, आचार्य सें सौ गुना श्रेष्ठ पिता और से हजार गुना श्रेष्ठ माता गौरव से युक्त होती है।

इस श्रेष्ठता का कारण मनु लिखते है-

यं मातापितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम्‌ ।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तु वष्शतैरपि ॥

अर्थात्‌ प्राणियों की उत्पति में माता-पिता को जो क्लेश सहन करना पड़ता है,उस क्लेश से वे (प्राणी) सौ वर्ष में भी निस्तार नही पा सकते । इसलिए मनु ने माता-पिता और गुरू इन तीन को सदा सेवा

से प्रसन्न रखने के निर्देश दिए हैं। यह व्यवस्था जीवन के सत्य और लक्ष्य को पाने के लिए भी आवश्यक है-
प्राणियों की भक्ति से इस लोक का, पिता में भक्ति से मध्य लोक का और गुरू में भक्ति से ब्रह्म लोक का सुख प्राप्त होता है। जिन पर इन तीनों की कृपा होती है, उनको सभी धर्मों का सम्मान मिलता है

और जिन पर माता-पिता तथा गुरू की कृपा नही होती, उन्हें किसी धर्म के पालन सें सम्मान नही मिलता। उनके सभी कर्म निष्फल होते है। अतः जब तक माता-पिता और गुरू जीवित रहे, तब तक

उनकी सेवा ही करें और किसी अनुष्ठान की आवश्यकता नही है। यही कर्तव्य है, यही साक्षात्‌ धर्म है।

माता-पिता की महता का उल्लेख शिवपुराण में यूं मिलता है-

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति च।
तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्‌॥
अपहाय गृहे यो वै पितरोतीर्थमाव्रजेत्‌।
तस्य पापं तथा प्रोफं हनने च तयोर्यथा॥
पुत्रस्य च महतीर्थ पित्रोश्चरणपंकजम्‌।
अन्यतीर्थ तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः॥
इदं संन्निहितं तीर्थ सुलभं धर्मसाधनम्‌।
पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थ गेहे सुशोभनम्‌॥

अर्थात्‌ जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता-पिता को घर पर छोड़कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ है। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते है, परंतु धर्म का साधन भूत यह तीर्थ तो पास मे ही सुलभ है। पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुंदर तीर्थ घर में ही वर्तमान है।
शास्त्रो की इस प्रकार की आज्ञा पालन करने वाले पुत्र के रूप में श्रवण कुमार अमर है। भगवान्‌ श्रीराम माता और पिता की आज्ञा मानकर ही एक आदर्श पुत्र के रूप में चौदह वर्ष तक वनवास में रहे।

अतः शास्त्र और महापुरूषो के चस्त्रि से प्ररेणा लेकर संतान को सदैव माता-पिता की सेवा को ही सबसे उंचा स्थान देना चाहिए ।

महिलाएं गहने जानकारी ले कर ही पहनें

अधिकर महिलाओं को श्रृंगार प्रिय होता है, और अधिकतर महिलाओं में ये भावना होती है कि हम किसी से कम नहीं। श्रृंगार करना बहुत अच्छी बात है, श्रृंगार से तो महिलाएं सुशोभित होती है, परन्तु इस बात को ध्यान में रखतें हुए श्रृंगार करें तो उन्हें बहुत सी मुशीबतों का सामना नहीं करना पडेग़ा जैसे:- पति पत्नी के बीच तनाव ,मानसिक तनाव,चिड़चिड़ा पन ,शारिरिक कष्ट आदि से बचाव हो सकता है। वो बात ये है कि महिलाएं अपने श्रृंगार के लिए उपयोग में लाने वाले गहने अपनी राशि के अनुसार ही पहने । अपनी राशि के अनुसार वे कौन-कौन सा रत्न पहन सकती हैं इस बात की जानकारी लेकर सकती हैं इस बात की जानकारी लेकर पहने, तो अनेकानेक अपनी अपनी एवं अपने परिवार के लिए उत्पन्न समस्याओं से बचाव कर सकती हैं।

इसके बाद बारी आती है कि हम किसी से कम नहीं,यह बहुत अच्छी बात है परन्तु कुछ क्षेत्र में ये घातक भी होती है जैसे किसी के लिए हीरा पहनना मारक की स्तिथि उत्पन्न करता है हीरे पहनने की वजह से स्वास्थ में खराबी आना या अन्य कोई परेशानी उत्पन्न होना,ये तो उसके लिए घातक ही होती है। इस लिए ऐसी महिला को लगातार हीरा नहीं पहनना चाहिये। बहुत शान शौकत का यदि प्रदर्शन ही करना हो तो कार्यक्रम होने तक ही पहन कर तुरंत खोल दे , परन्तु कुछेक प्रतिशत को ये स्थिति भी घातक हो सकती है। अत: ये समझ लें कि हर रत्न उपरत्न में अच्छा या बुरा करने की ताकत होती है। सौंदर्यता के लिए भी धारण किये गये रत्न परामर्श से ही धारण करना उचित होता है।
सिर्फ सोना चांदी ही एक ऐसी धातु (मेटल) है जिसे पहनने पर हजारों में एक व्यक्ति को सूट नहीं करता। इसके अलावा अन्य मेटल से बने गहने अधिकतर लोगो को सूट नहीं करता जिसे धारक अहसास के आभाव में समझ नहीं पाता। अत: अन्य धातुओं से बने गहने भी नुकसान दायक हो सकते है।

श्री पार्वती मां की आरती



आरती

जय पार्वती माता, मैया जय पार्वती माता,
ब्रह्म सनातन देवी, शुभ फल की दाता ।
ॐ जय ……

अरिकुल पद्म विनासनि, जय सेवक त्राता,
जग जीवन जगदंबा, हरिहर गुण गाता ।
ॐ जय ……

सिंह को वाहन साजे, कुण्डल है साथा,
देव वधू जहं गावत, नृत्य करत ता था ।
ॐ जय ……

सतयुग शील सुसुंदर, नाम सति कहलाता,
हेमांचल घर जन्मी, सखियन रंगराता ।
ॐ जय ……

शुंभ निशुंभ विदारे, हेमांचल स्याता,
सहस भुजा तनु धरिके, चक्र लियो हाथा ।
ॐ जय ……

सृष्टि रूप तू ही जननी, शिव संग रंगराता,
नंदी भृंगी बीन लही, सारा मदमाता ।
ॐ जय ……

देवन अरज करत हम, चित को लाता,
गावत दे दे ताली, मन में रंगराता ।
ॐ जय ……

श्री प्रताप आरती मैया की, जो कोई गाता,
सदा सुखी नित रहता, सुख संपति पाता ।
ॐ जय ……

श्री शनि चालीसा



स्तुति

ऊ शत्रो देवीरभिष्ट आहो भवन्तु पीतये।
शं योरभिःस्त्रवन्तु नः॥

दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।???
दीनन के दुख दूर करि,। कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥


जयति जयति शनिदेव दयाला। करत यदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिये माल मुक्तत मणि दमके॥
कर में गदा त्रिशुल कुठारा। पल विच करैं आरिहिं संहारा॥
पिंगल, कृष्णों, छाया, नन्दन। यम कोणस्थ, रौद्र, दुःखभंजन॥
सौरी, मन्द, शनि दशनामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा।
जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं। रकंहुं राव करै क्षण माहीं॥
पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हो। कैकेइहुं की मति हरि लीन्हों॥
बनहूं में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चतुराई॥
लखनहिं शक्ति विकल करि डारा। मचिंगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गति मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डांका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौलाखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चनवायो॥
विनय राग दीपक महं कीन्हों। तब प्रसन्न प्रभु हवै सुख दीन्हों॥
हरिश्रचन्द् नृप नारि बिकानी। आपहु भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूजी मीन कूद गई पानी॥
श्री शंकरहि गहयो जब जाई। पार्वती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ ठडि गयो गौरिसुत सीसा॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥


शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ई॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्ज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नखधारी। सो फल जज्योतिष कहत पुकारी॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवै। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥
गर्दभ हानि करै बहु नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्रण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥
तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चांजी अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै॥
समता ताम्र रजत शुभकारी। र्स्वण सर्व सुख मंगल कारी॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहु न दशा निकृष्ट समावै॥
अदभुत नाथ दिखावैं लीला। करै शत्रु के नशि बलि ढीला॥


जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दे बहु सुख पावत॥
कहत रामसुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाश॥

दोहा

पाठ शनिचर देव को की विमल तैयार।
करत पाठ चालिस दिन हो भवसागर पार॥

ताबीज भी निष्क्रिय करते हैं रत्नों के प्रभाव को

ताबिज भी सोच समक्ष कर विश्वनीय व्यक्ति के परामर्श से धारण करना चाहिए। जनरल लोग सुरक्षा कवच के इरादे से ताबिज धारण कर लेतें हैं और धारण उपरान्त उसकी प्रतिक्रिया पर ध्यान नहीं देते जब धीरे-धीरे कुछ तकलीफ होती है, चाहे वो किसी भी प्रकार की हों, होने लगती है तो वे अपने मन में सोचते हैं कि मैंने ताबिज पहन रखा है मेरी रक्षा अवश्य होगी, जबकि तकलीफ का दाता ताबिज ही रहता है। इसका मतलब ये भी नहीं है कि सभी ताबिज से नुकसान होता है और वे खतरनाक होते हैं। दोनों प्रकार की स्थिति रहती है। कुछ ताबिज तो इतने प्रभावकारी होते हैं, कि व्यक्ति का ग्रहों के कारण उत्पन्न तकलीफ को दूर करने के लिए धारण कराये गये उचित एवं अनुकूल रत्न के प्रभाव को निष्क्रीय करते हैं। इसी स्थिति में ताबिज उतारने के बाद एक ही रात में दुष्प्रभाव समाप्त हो जाता है तथा रत्न का अनुकूल प्रभाव महसूस होने लगता है। ऐसा दिव्य रूद्राक्ष जांच से अनेकों व्यक्ति में देखा जा चुका है।
जैसे दस वर्ष के एक विद्यार्थी का ही उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जांच कराने आया तब लोहे का कड़ा हाथ में,दो ताबिज गले में,एक ताबें का रिंग हाथ में धारण किया था, जिसे रूद्राक्ष जांच में प्रतिकूल पाया गया उसे उतारकर ओनेक्स धारण करने को कहा गया। लड़के की समस्या थी कि उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता था तथा घर वालों पर बहुत गुस्सा करता था।

ओनेक्स धारण करने के बाद बाकी सब उतार दिया था, दो ताबिज में से एक ताबिज को ओनेक्स रिंग के साथ धारण कर लिया था।....... हुआ ये कि उसका क्रोध और बढ़ गया तथा किसी भी स्थिति में सुधार नहीं आया। एक सप्ताह बाद जब वह दुबारा आया तब फिर से जांच की गई और ताबिज उतार दिया गया... तब दूसरे दिन उसके घर से सूचना मिली कि अब ठीक लगने लगा है।
कहने का तात्पर्य है कि ताबिज हो या रत्न कुछ भी धारण करना हो तो विद्ववानों के परामर्श से ही करना चाहिये, अपने मन से या नीम-हकीमों के कहने से नहीं करना चाहिये।

नीम हकीमों से सावधान - रत्न धारण

अक्सर लोग जब तकलीफ के दौर से गुजरते हैं तो किसी भी व्यक्ति के कह देने से या कुछ लोग अपने मन से नाल की अंगूठी या नीलम धारण कर लेते है, क्यों कि अक्सर धारणा यही होती है कि मुझे शनि परेशान कर रहा है जबकि ऐसा कम होता है पर बदनाम शनि जो है। जनसाधारण व्यक्ति इसी धारणा से अंगूठी धारण कर लेते है, अक्सर लोगों की तकलीफें बढ़ जाती है, परन्तु वे ये समझते है कि, मै ये अंगूठी धारण नहीं करता तो पता नही मेरा और क्या बुरा हाल होता और कष्ट मय जीवन व्यतीत करते रहते है। इसलिए रत्नों व धातु का उपयोग बिना विद्वान के परामर्श बिना नहीें करना चाहिये। उक्त जानकारी रूद्राक्ष जांच से स्पष्ट हुई है।

प्रत्येक राशि के सभी कारक ग्रहों के रत्नो को एक साथ धारण करने का परिणाम अक्सर खराब आता है :-
जैसे वृश्चिक राशि के कारक ग्रह सूर्य,चंद्र,मंगल और गुरू है और इनके रत्न माणक ,मोती,मूंगा और पुखराज है तो इन चारों का एक लाकेट या ये चारों की अलग-अलग अंगूठी बना कर एक साथ धारण करने के परिणाम भी रूद्राक्ष जांच में खराब पाये गये है, क्योंकि जिस रत्न की उस समय आवश्यकता नहीं है और धारण किया गया है तो वह अपना दुष्प्रभाव भी दिखा सकता है।

अत: समय-समय पर आवश्यकतानुसार ही रत्न धारण करना चाहिए ऐसे कई धारणकर्ता की रूद्राक्ष द्वारा जांच की गई और ये पाया गया कि सभी कारक ग्रहों के रत्न राशिनुसार एक साथ धारण से कई प्रकार की तकलीफें होती है। अनावश्यक पाया गया रत्न उतरा देने से जातक की तकलीफ दूर होते रेखा गया है। इसी लिए कहते हैं असम अनावश्यक रत्न धारण करना अनुचित होता है।

समान राशि पर समान रत्न धारण अनुचित

एक ही राशि के संसार में जितने भी व्यक्ति हैं, वे बच्चे कुमार,युवा एवं वृद्ध तथा स्त्री या पुरूष ही क्यों न हो सबके ग्रहों की स्थिति एक ही प्रकार की नहीं होती। एक ही राशि के प्रत्येक व्यक्ति की ग्रहों की स्थिति के अनुसार उन व्यक्तियों की स्थिति एवं परिस्थितियों में भिन्नता होती हैं। एक ही राशि के सभी व्यक्तियों के लिए शनि ढइया हो या साड़ेसाती हो, खराब नहीं होती। किसी के लिए खराब होती है, तो किसी के लिए मध्यम खराब होती है, तो किसी के लिए बहुत खराब होती हैं, ठीक इसी प्रकार किसी के लिए थोड़ी ठीक होती है, तो किसी के लिए मध्यम ठीक होती है, तो किसी के लिए बहुत ठीक होती है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को लिया गया है क्योंकि जब किसी पर कष्ट आता है तब उसे ऐसा महसूस होता है कि उसे शनि ही परेशान कर रहा है क्योंकि शनि के प्रति इस प्रकार की धारण आम व्यक्ति के मन में बनी है, जबकि ऐसा नहीं है। शनि ग्रह देने वालों को क्या-क्या नहीं देते दुनिया के सुख ठाट-बाट, राजपाट आदि शान शौहरत व्यवसाय एवं उद्योग आदि सभी देते हैं। इतना सब कुछ देने के बाद भी शनि के प्रति अच्छी धारणा अधिकतर व्यक्तियों के मन में नहीं होती। शनि का नाम बदनाम की श्रेणी में अधिक है,जो कि अनुचित है। शनि के अलावा अन्य कुछ ग्रह और भी हैं जो मनुष्य को अनेकों प्रकार के कष्ट या अनेकों प्रकार की सुख संपदा दे सकते हैं।

जिनकी कुण्डली है उसमें इन सभी की स्थिति भली-भांति देखी जा सकती है जिनकी कण्डली नहीं है उनकी हस्तरेखा से भी ग्रहों की स्थिति देखी जा सकती है और एकदम सहीं स्थिति दिव्य रूद्राक्ष से जांच करके देखी जा सकती है। दिव्य रूद्राक्ष द्वारा जांच दुर्लभ जैसी है।

अत: एक ही राशि के व्यक्ति के लिए की गई आम घोषणा या व्यापारिक विज्ञापन या फलित राशि फल के अनुसार रत्न को धारण करना अनुचित होगा। रत्न धारण के पूर्व विद्ववानों से परामर्श लेकर ही रत्न धारण करना चाहिए। जिस व्यक्ति की कुण्डली नहीं हैं, उन्हें तो विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। हर किसी के कह देने से कोई रत्न धारण नहीं करना चाहिए। हमारा कहना है कि धारक अपनी सुझ-बुझ से ही समझ कर यदि रत्न धारण करें तो ही उचित फल प्राप्त कर सकता है नहीं तो करोड़पति के बजाए रोड़पति भी बन सकता है, एक ही राशि के कई व्यक्तियों की एक ही दिन में या एक सप्ताह में दिव्य रूद्राक्ष द्वारा जांच की गई और उन्हें अलग-अलग रत्न धारण कराये गये और परिणाम स्वरूप सभी के रिजल्ट पाजेटिव प्राप्त हुयें। यह जांच प्रेक्टिकल हैं, कोई मनगढ़त कहानी नहीं है। इस जांच के माध्यम से धारण कराये गये रत्नों का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता यह ९९ प्रतिशत सफल जांच है तथा परिणाम भी सफल है।

कोई भी रत्न आजीवन धारण किये जाने पर हानिकारक हो सकता है।

अधिकतर रत्न धारक रत्न धारण करने के बाद ये समझते रहते हैं कि मैं तो अमुख रत्न धारण कर लिया हूँ, अब मुझे आजीवन कष्ट नहीं हो सकता बल्कि लाभ ही होगा। परन्तु ऐसा नही है वास्तविक जीवन में कोई भी राशि का जीवन रत्न को भी आजीवन धारण नहीं किया जा सकता। ऐसे अनेकों लोगों की रूद्राक्ष द्वारा जांच करके देखा गया है, जातक जीवन रत्न है समझ कर धारण किये थे, परन्तु उन्हें कुछ समय पश्चात् कुछ तकनीफें होने लगी, जांच उपरान्त ये पाया गया कि जो रत्न धारण किया है तकलीफ उसी से है, उसे उतारने पर बिना किसी और रत्न धारण के तकलीफें दूर हो जाती है। रत्न बहुत शक्तिशाली होते हैं इनसे खिलवाड़ नहीं करना चाहिये। इसी लिए कहते है कि असमय अनावश्यक रत्न धारण करना हानिकारक भी हो सकता है।

ग्रह शांति के लिए जड़ी धारण करें

यदि मनुष्य परिस्थितिवश अमूल्य रत्न धारण न कर सकें तो ग्रहों से संबंधित जड़ी धारण करना भी फलकारक होता है। विधि-विधान से धारण की गई जड़ी भी रत्न के समान ही फलकारक होती है।

प्रत्येक ग्रह की जड़ी को रविवार को पुष्य नक्षत्र में धारण करना चाहिए। जड़ी एक दिन पूर्व शनिवार को सायंकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण कर उस वृक्ष का विधिवत पूजन करके कार्य सिद्धि के लिए उससे प्रार्थना करें व दूसरे दिन शुभ समय पर उसकी जड़ ले आए।

जड़ी को ग्रह के रंग के धागे में पिरोकर पुरुषों को दाहिनी भुजा में व स्त्रियों को बांयी भुजा में पहनना चाहिए।

ग्रह जड़ी
1. सूर्य विल्वमूल
2. चंद्र खिरनी मूल
3. मंगल अनंतमूल
4. बुध विधारा की जड़
5. शुक्र सिंहपुछ की जड़
6. शनि बिच्छोल की जड़
7. राहु खेत चंदन की जड़
8. केतु अश्वगंध की जड़
9. गुरु भारंगी/केले की जड़

विशेष : वृक्ष या पौधा न मिलने पर पंसारी से जड़ खरीदकर पूजा आदि के बाद आस्था व विश्वास के साथ धारण करनी चाहिए। इष्ट देव व ग्रह स्वामी का ध्यान करके व ग्रह के मंत्र का जाप करके जड़ी धारण करने से कार्यसिद्धि अवश्य होती है।

गार्नेट रत्न पहनें चिन्ता मिटाएँ

गार्नेट सूर्य का उपरत्न माना गया है। इसे माणिक की जगह पहना जाता है। यह सूर्य का उपरत्न होने के साथ बहुत प्रभावशाली भी है। इसे हिन्दी में याकूब और रक्तमणि के नाम से भी जाना जाता।

यह लाल रंग का कठोर होता है। अक्सर सस्ती घड़ियों में माणिक की जगह इस्तेमाल किया जाता है लेकिन कीमती घड़ियों में इसका इस्तेमाल नहीं होता बल्कि असली माणिक का प्रयोग करते हैं। यह रत्न सस्ता होने के साथ-साथ बहुत आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

इस रत्न को अनामिका अँगुली में ताँबे में बनवाकर शुक्ल पक्ष के रविवार को प्रातः सवा दस बजे पहना जाता है। इसके पहनने से सौभाग्य में वृद्धि, स्वास्थ्य में लाभ, मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। यात्रादि में सफलता दिलाता है, मानसिक चिन्ता दूर होती है। मन में शंका-कुशंका को भी दूर भगाता है। इसके पहनने से डरावने सपने नहीं आते।

कहा जाता है कि लाल रंग का गार्नेट बुखार में फायदा पहुँचाता है व पीले रंग का गार्नेट पीलिया रोग में फायदा पहुँचाता है। इसके पहनने से बिजली गिरने का असर नहीं होता एवं यात्रा में किसी प्रकार की हानि, जोखिम से भी रक्षा करता है, ऐसी प्रचीन मान्यता है।

यह रत्न खतरों को भाँप कर अपना मूल स्वरूप खो देता है। कभी कष्ट आने पर टूट भी जाता है। जिन्हें माणिक नहीं पहनना हो वे इसे अजमाकर देख सकते है। क्योंकि ये जेब पर भारी नहीं पड़ता।

अरण्य संस्कृति का प्रतीक कल्पवास

संगम पर मकर संक्रांति और माघ में कल्पवास की परंपरा अनंत काल से है। यह ऐसी साधना है, जिसके जरिये तीर्थराज प्रयाग में कल्पवासी महीने भर के लए अपने सांसारिक सुख-दुःख, माया-मोह, हानि-लाभ की चिंता छोड़कर सिर्फ परलोक के बारे में सोचता है। वह संयम और साधना के जरिये माया मोह छोड़ने का अभ्यास करता है।
इस अभ्यास में वह अपने स्वरुप को पहचाने की कोशिश करता है।

कल्पवास का अनुशासन : कल्पवास करने वाले गृहस्थ संगम तट पर साधु सन्यासियों के संपर्क में आते हैं। वे भजन, पूजन, कीर्तन, हवन, यज्ञ,धर्म ग्रंथों की याद में समय गुजारते हैं। वे भूमि पर सोते, सिर्फ एक समय अन्न या फल का आहार करते और तीन बार संगम स्नान और संध्या वंदन करते हैं। उनकी जीवन शैली त्याग और वैराग्य की और उन्मुख हो जाती है। वे कडाके की ठण्ड और जाडॆ की वर्षा सहन करते हैं।

कल्पवास का विधान हमारे समाज का नियंत्रण करने वाले ऋषियों और चिंतकों ने बहुत सोच समझ कर किया था। यह हजारों वर्ष पहले उस जमाने की दें है, जब तीर्थराज प्रयाग में कोई शहर नहीं था। गंगा-जमुना के आसपास सिर्फ घना वन था। पुस्तकों में इसे प्रयाग वन कहा गया है। इसमें अनेक ऋषि, महर्षि, दार्शनिक, चिन्तक, भोगी, सन्यासी साधना करते थे। इसके केंद्र में पवित्र अक्षयवट था, जिसे ऋषि और प्रलय का शाक्षी माना जाता है। कल्पवास हमारी वेदकालीन अरण्य संस्कृति की दें है।

गंगाजल, बालू और मिटटी ही प्रसाद: कल्पवा के अवधि और चन्द्र पंचांग से तय की जाती है। कई कल्पवासी मकर संक्रांति से कुम्भ संक्रांति तक संगम क्षेत्र में साधना करते हैं, पर ज्यादातर पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक यहाँ रहते हैं। कल्पवास संपन्न होने हवन, यज्ञ, दान और भोज आयोजित किया जाता है। घर लौटते समय वे अपने साथ सिर्फ गंगाजल, गंगा की बालू और पवित्र मिटटी प्रसाद के रूप में ले जाते हैं।

बदलते दौर के साथ कल्पवास में भी बदलाव आया है। कल्पवासी पहले फूस की झोपड़ियों में रहते थेअब वे खूबसूरत तम्बुओं में रहते हैं। कल्पवास का स्वरुप भले ही बदला हो, लेकिन उसकी आत्मा नहीं बदली है। यह ताप और त्याग के अभ्यास के एक जरिया है। कल्पवास हमारी त्याग मूलक संस्कृति का एक सबक है।

रामायण – सुन्दरकाण्ड - रावण-सीता संवाद (2)

सीता के मुख से ऐसे कठोर एवं अपमानजनक शब्द सुन कर लंकापति रावण के नेत्र क्रोध से लाल हो गये, उसकी भृकुटि चढ़ गई। वह अपने होंठ चबाता हुआ बोला, "हे सीते! मैंने तेरे साथ जितने मधुर शब्दों का प्रयोग करके तुझे समझाने का प्रयत्न किया तूने उतने ही कठोर शब्दों में मेरे हृदय को छलनी करने की चेष्टा की है। मैं तेरे सौन्दर्य, लावण्य एवं यौवन से प्रभावित हो कर जितनी कोमलता दिखा रहा हूँ उतना ही अधिक तू कठोर शब्दों का प्रयोग कर के मेरा अपमान कर रही है। मैं तुझे अभी मृत्यु के घाट उतार देता, परन्तु तेरा सुकुमार यौवन देख कर मुझे तुझ पर दया आ रही है। मैं नहीं चाहता कि तेरी जिस सुन्दर ग्रीवा में अपनी भुजा लपेट कर मैं तुझ से प्रणय-क्रीड़ा करना चाहता हूँ उसी ग्रीवा पर कठोर कृपाण चलाऊँ। इसलिये मैं तुझे दो मास का समय विचार करने के लिये और देता हूँ। यदि इस अवधि में तूने अपने विचारों में परिवर्तन कर के मेरी शैया की शोभा नहीं बढ़ाई तो मेरे रसोइये तेरे टुकड़े-टुकड़े कर के तेरा पका हुआ माँस मेरे प्रातःकाल के भोजन में मेरे सामने परोस देंगे।"

रावण के ये वचन सुन कर जानकी ने छेड़ी हुई नागिन की भाँति फुँफकारते हुये कहा, "अरे दुष्ट! तूने महान तेजस्वी, अद्भुत पराक्रमी रघुनाथ जी की पत्नी के लिये ऐसे पापमय वचन कहे हैं, इसका परिणाम तुझे अवश्य भुगतना पड़ेगा। अब तू उनके हाथों से कदापि नहीं बच सकेगा। संसार में ऐसा व्यक्ति अब तक उत्पन्न नहीं हुआ कि जो किसी रघुवंशी की भार्या को पापमय दृष्टि से देखने के पश्चात् जीवित रह जाय। इसलिये अब तू समझ ले कि तेरी मृत्यु निश्चित है और तेरा पाप का घड़ा भरने वाला है। अरे वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता होने का दम भरने वाले नीच! जिस जिह्वा से तूने चक्रवर्ती राजा दशरथ की पुत्रवधू के लिये ऐसे शब्द कहे हैं, वह गल कर गिर क्यों नहीं गई? यह तेरा सौभाग्य है कि मैं पतिव्रता स्त्री हूँ और पति की आज्ञा के बिना कोई कार्य नहीं करती, अन्यथा मैं तुझे अभी इसी समय अपने तेज से जला कर भस्म कर देती, साथ ही तेरी लंका और तेरे परिवार को भी धूल में मिला देती। क्या करूँ, मेरे पति ने वन में आते समय मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं दी थी। यह भी मैं तुझे बता दूँ कि संसार की कोई शक्ति मुझे राघव से पृथक नहीं कर सकती। तूने मेरा जो अपहरण किया है, वह विधाता का विधान ही है क्योंकि वह इसी प्रकार रामचन्द्र जी के हाथों तेरी मृत्यु कराना चाहता है। तू कितना वीर और पराक्रमी है इसका पता तो मुझे उसी दिन चल गया था, जब तेरे पास इतनी विशाल सेना, बल और तेज होते हुये भी तू मुझे चोरों की भाँति मेरे पति की अनुपस्थिति में चुरा लाया था। क्या इससे तेरी कायरता का पता नहीं चलता। जा, चलाजा मेरे सामने से। कहीं मैं मर्यादा छोड़ कर तुझे भस्म न कर दूँ। जा, मैं अभी तुझे क्षमा करती हूँ।"

सीता के मुख से ऐसे अप्रत्याशित एवं अपमानजनक वचन सुन कर रावण का सम्पूर्ण शरीर क्रोध से थर-थर काँपने लगा। उसके नेत्रों से अंगारे बरसाने लगे। वह दहाड़ता हुआ बोला, "हे निर्बुद्धि मूर्खे! हे अंधविश्वासिनी! तुझे अपने वनवासी राम पर ऐसा विश्वास है। तुझे मालूम नहीं, वह दीन, असहाय की भाँति वन-वन में रोता-बिलखता फिर रहा है। तेरे अपमानजनक शब्दों को मैं अब सहन नहीं कर सकता। मैं इसी खड्ग से अभी तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। अब मेरे हाथों से तिरी मृत्यु निश्चित है। अब तुझे कोई नहीं बचा सकता। परन्तु क्या करूँ, तेरी कोमल किशलय जैसी देह को देख कर मुझे फिर तुझ पर दया आ रही है। प्रणय-क्रीड़ा करने के लिये बने इन अंगों को नष्ट करने के लिये मेरे हाथ नहीं उठ रहे हैं।" फिर वह राक्षसनियों को सम्बोधित करते हुये बोला, "जिस प्रकार भी हो, सीता को मेरे वश में होने के लिये विवश करो। यदि वह प्रेम से न माने तो इसे मनचाहा दण्ड दो ताकि यह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाती तुई मुझसे प्रार्थाना करे और मुझे अपना पति स्वीकार करे।"

इस प्रकार गर्जना करता हुआ रावण उन्हें समझा रहा था कि तभी एक अत्यन्त विकरालरूपा निशाचरी दौड़ती हुई आई और रावण के शरीर से लिपट कर बोली, "हे प्राणवल्लभ! आप इस कुरूप सीता के लिये क्यों इतने व्याकुल होते हैं? भला इसके फीके पतले अधरों, अनाकर्षक कान्ति और छोटे भद्दे आकार में क्या आकर्षण है? आप चल कर मेरे साथ विहार कीजिये। इस अभागी को मरने दीजिये। इसके ऐसे भाग्य कहाँ जो आप जैसे अपूर्व बलिष्ठ, अद्भुत पराक्रमी, तीनों लोकों के विजेता के साथ रमण-सुख प्राप्त कर सके। नाथ! जो स्त्री आपको नहीं चाहती, उसके पीछे उन्मत्त की भाँति दौड़ने से क्या लाभ? इससे तो व्यर्थ ही मन को दुःख होता है।" उस कुरूपा विलासिनी के ये शब्द सुन कर रावण उसके साथ अपने भव्य प्रासाद की ओर चल पड़ा।

06 अप्रैल 2010

कर्मकांड से होती है मन की शुद्धि

हिंदू संस्कृति मूलत: वैदिक संस्कृति है। इसमें वेदों को ही प्रमाण माना गया है। वेदों का तीन खंडों में विभाजन विषय के अनुसार किया गया है- कर्मकांड, उपासना कांड और ज्ञानकांड। जैसा कि नामों से ही प्रकट है, कर्मकांड में कर्म, उपासनाकांड में उपासना व ज्ञानकांड में ज्ञान का विवेचन है।

वेदों का यह संदेश है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य परम सत्य को जानना और उसको प्राप्त करना ही है। परम सत्ता का ज्ञान प्राप्त करने में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है। इस विषयोपभोगमय संसार में हलके-फुल्के ढंग से जीवन व्यतीत कर लेना ही मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं है। परम सत्य को जानने के लिए मन को तैयार करना, उसे शुद्ध करना अपेक्षित है। वेदों के प्रथम विभाग कर्मकांड का यही विषय है-मन को शुद्ध कैसे किया जाए। मन की शुद्धि को कैसे प्राप्त किया जाए।

हम इस संसार में विभिन्न प्रकार की स्थितियों में, अलग-अलग प्रकार से कर्म करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं। यह स्पष्ट है कि हमारे कार्य और प्रतिक्रियाएं केवल वस्तुगत ही नहीं होते हैं। अधिकतर वे हमारे पूर्वग्रहों से, हमारी व्यक्तिगत रुचि-अरुचि से प्रभावित एवं संचालित होते हैं। अनेकानेक जन्मों में सूक्ष्म संस्कार और अंतर्निहित वृत्तियों के रूप में संजोई हुई अनेक प्रकार की वासनाएं हमारे भीतर हैं। हम वासनानुकूल कर्म करते हैं, विवेकसम्मत नहीं। फलस्वरूप हम अपनी उस रुचि-अरुचि को और दृढ बना देते हैं। इस प्रकार हम अपने मन की अशुद्धि को ही बढाते जाते हैं। हम जो भी कार्य करते हैं, जो भी प्रतिक्रिया करते हैं उसमें हमारी वासनाएं ही अभिव्यक्त होती दिखाई देती हैं।

दैनिक अनुशासन

प्रश्न यह है कि हम अपने मन को शुद्ध करें तो कैसे करें? वेदों के कर्मकांड में इसका उत्तर है। इसकी विधि वहां समझाई गई है। वास्तव में कर्मकांड के द्वारा जो मन की शुद्धि होती है, उसका सीधा संबंध उस एकाग्रचित्त स्थिति से है जो वेदों के उपासना कांड के अनुसार अभ्यास करने से अर्जित की जाती है। जब तक मन काम, क्रोध, आसक्ति, राग-द्वेष आदि से भरा होता है, तब तक वह इन संवेगों से उद्वेलित होता रहता है। जिस सीमा तक चित्त शुद्ध हो जाता है, उस सीमा तक वह शांत और एकाग्र होने लगता है। देखना यह है कि मानसिक शुद्धि के इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कर्म किस प्रकार सहायक है।

अधिकतर लोगों का यही अनुमान है कि कर्मकांड में केवल विधि-विधान की बातें होती हैं। होम, हवन, यज्ञ अथवा पूजा को ही कर्मकांड समझा जाता है। इसलिए कर्मकांड शब्द से हम घबराते हैं और ऐसा सोचते हैं कि भला हम इतने यज्ञ आदि करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? लेकिन यह एक भ्रामक सोच है। कर्मकांड में, विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न कर्मो का निर्देश है। इस प्रकार के कर्म शास्त्रविहित कर्म अथवा काम्य कर्म कहलाते हैं। किसी इच्छा के फलस्वरूप किसी विशेष लक्ष्य प्राप्ति के उद्देश्य से ये किए जाते हैं, इसलिए इनमें विकल्प है। जैसे, कुछ यज्ञादि स्वर्ग प्राप्ति के हेतु से किए जाते हैं। जिसे स्वर्गप्राप्ति की कामना हो उसके लिए ज्योतिष्टोम यज्ञ का विधान है। अन्य यज्ञ, धन वैभव प्राप्ति अथवा संतान प्राप्ति के लिए हैं। ये विधि-विधान किसी खास इच्छा की पूर्ति के लिए निर्दिष्ट हैं। इन्हें करने का कोई अर्थ तभी है, जबकि उस काम्य पदार्थ को पाने की इच्छा हो। नहीं तो इस प्रकार के यज्ञ निरर्थक हैं। यदि मुझे स्वर्ग जाने की इच्छा नहीं है, तो फिर मैं उसकी प्राप्ति का उपाय क्यों करूंगा? ठीक वैसे ही जैसे यदि कोई अमेरिका जाना ही नहीं चाहता तो वह अमेरिकी वीजा प्राप्त करने के लिए आवेदन पत्र क्यों भरेगा?

नित्य कर्म

दूसरे प्रकार के कर्म, नित्य कर्म कहलाते हैं। अपनी आयु के, अपनी अवस्था के अनुसार हमारे कर्तव्य निर्धारित हैं, जिन्हें मन के अनुशासन के निमित्त से हमें नित्य करना चाहिए। जैसे ब्रह्मचारी को नित्यप्रति गायत्री का जप करना चाहिए। गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी सबके लिए अलग-अलग प्रकार के नित्य कर्तव्यों का विधान है। गृहस्थी में रहने वाले, आध्यात्मिक उन्नति हेतु सांसारिक जीवन त्याग देने वाले और रात-दिन आत्मचिंतन में लगे रहने वाले के नित्य कर्म, प्रतिदिन के कर्तव्य अलग-अलग प्रकार के होते हैं। ये कर्तव्य इसलिए हैं कि जिससे हमारा जीवन अनुशासित हो सके, क्योंकि हम लोग अपने जीवन में, व्यवहार में बेहद निरंकुश हो गए हैं। अनुशासनविहीन होने का अर्थ है निरंकुश होना। जब हम चाहते हैं तब सोते हैं, जब उठना चाहते हैं, उठते हैं, जब चाहते हैं खाने लगते हैं, भले ही भूख लगी हो या नहीं। चीजों को जहां थोडा सस्ता बिकते देखा, ख्ारीदने लगते हैं, भले ही वे हमारी जरूरत की हों अथवा नहीं। हम तमाम चीजों को केवल इसलिए इकट्ठा कर लेते हैं, क्योंकि आसानी से प्राप्त हो रही हैं और हम उन्हीं में आसक्त रहने लगते हैं।

मुख्य बात यह है कि हमारे जीवन में अनुशासन होना चाहिए। जैसे यदि सुबह नींद खुलते ही हमारी इच्छा हो कि एक प्याली चाय या कॉफी मिले, लेकिन हम यह नियम बना लें कि जब तक एक माला जप नहीं कर लेंगे, चाय-कॉफी नहीं पिएंगे, यही अपने आपमें एक बडी उपलब्धि है। यदि हम इस प्रकार का कोई भी अनुशासन अपना लें तो हमारा मन नियंत्रण में आने लगता है। अनुशासन कोई भी हो, दरअसल इनके माध्यम से हमको अपनी इच्छाओं के वेग को धीरे-धीरे संयमित करना सीखना है। यह महत्वपूर्ण बात है। काम्य कर्म तब संपन्न किए जाते हैं जब कुछ विशेष प्राप्त करना होता है। नित्य कर्म दैनिक अनुशासन वाले कर्तव्य हैं, जो हमारी अवस्था के अनुसार निर्धारित होते हैं, चाहे हम विद्यार्थी हों, गृहस्थ हों, अवकाश प्राप्त वानप्रस्थी हों, या संन्यासी-वैरागी कोई भी हों। शास्त्र का यह आदेश है कि हमें इन कर्तव्यों का अवश्य ही पालन करना है। केवल किसी विशिष्ट परिस्थिति में ही इनमें ढील की गुंजाइश है।

लेकिन हम लोगों के जीवन में हो क्या रहा है, ठीक इसके विपरीत। जैसे अगर हम अधिक थक गए हैं या बीमार हैं तो हमें अधिक सोने की छूट मिल जाती है। लेकिन शायद ही कभी एक ऐसा निश्चय करते हैं कि जरा जल्दी उठ जाएं। जिससे कि कोई खास अच्छा काम कर सकें, या भगवान की पूजा कर सकें। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कि केवल कभी-कभी हम इस प्रकार के नियम के पालन की बात सोचते हैं। जो अपवाद है वह तो बन गया है नियम और जिसे होना चाहिए था नियम, वह बन गया है अपवाद। यही कारण है कि हमारे संकल्प में शक्ति नहीं है और जब हम जीवन में एक भी अनुशासन का पालन नहीं कर सकते तो जब बडी चुनौतियों का सामना करना पडता है तो घबरा जाते हैं और अपने आपको कोसना शुरू कर देते हैं। जब हम किसी नियम का दृढता से पालन करते हैं तो देखते हैं कि हमारा संकल्प बहुत शक्तिशाली हो गया है। हम किसी भी एक नियम का जीवन में दृढता से पालन कर लें, तो तमाम अन्य पक्ष स्वत: नियमित हो जाएंगे और हमारे नियंत्रण में आ जाएंगे। इन नित्य कर्मो के पालन से हम क्रमश: अपने मन को संयमित करने में सफल होते जाते हैं और अपने मन पर हमारा अधिकार हो जाता है।

दूसरों के द्वारा निर्धारित कर्म
तीसरे प्रकार के कर्तव्य कर्म वे हैं जो हमारे लिए दूसरों के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। जैसे माता-पिता, गुरु, शासन या सरकार, कार्यालय या नौकरी के स्थान के द्वारा हमारे लिए कुछ कर्तव्य निर्धारित होते हैं। एक युवक अपने माता-पिता के आदेशों की अवहेलना कर सकता है, लेकिन जब वह बाहर कहीं काम ढूंढने निकलता है, तो जहां भी वह काम करेगा, वहां उसे अपने स्वामी की आज्ञा माननी पडेगी। इस प्रकार एक स्थिति में भले ही हम विद्रोह करें, लेकिन कहीं भी हम जाएंगे, कोई न कोई कर्तव्य करने को हमें वहां बाध्य होना पडेगा। सच बात यह है कि हम किसी की इज्जत तभी करते हैं जब वह अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होता है और ईमानदारी व परिश्रम से उन्हें पूरा करता है।

हम यदि अपना व्यापार आरंभ करें या कोई कारखाना खोलें और उसमें बहुत से लोगों को काम दें, तब हम अपने उन कर्मचारियों से क्या अपेक्षा करते हैं? क्या हम यह नहीं चाहते कि सब हमारा कहना मानें और परिश्रम से काम करें? क्या हम उस कर्मचारी को बर्दाश्त करेंगे जो अयोग्य है, अनुशासनविहीन है, कामचोर है, आलसी है? कुछ लोग समझते हैं कि धन ही सब कुछ है, पर जिनके कारण हम दूसरों की वाकई इज्जत करते हैं, वे हैं जीवन के महान गुण- ईमानदारी, वफादारी, समय की पाबंदी।

समस्या यह है कि हम इन सब गुणों को दूसरों में ही देखना चाहते हैं, दूसरों से ही अपेक्षा करते हैं कि उनमें अच्छी बातें हों। स्वयं में इन गुणों के विकास के लिए प्रयत्नशील नहीं होते। हम धन कमाने के लिए खुद तो कुछ भी भला-बुरा करने को तैयार रहते हैं, लेकिन अपने खजांची में पूरी-पूरी ईमानदारी देखना चाहते हैं। हम अपने कर्मचारियों से वफादारी और ईमानदारी की अपेक्षा करते हैं, भले ही स्वयं वैसे न हों। ये महान गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं, जिनके कारण हम दूसरों का आदर करते हैं।

वही व्यक्ति सफल होता है जिसका जीवन नियमित एवं अनुशासित होता है। बिना अनुशासन के सफलता पाना असंभव है। सारी समस्याएं ही समाप्त हो जाएं यदि केवल प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार सोचने लगे कि ये अच्छे गुण मुझमें विकसित हों। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। मुश्किल यह है कि हम समस्याओं के इतने आदी हो गए हैं कि यदि किसी समय अचानक कोई समस्या शेष न दिखे तो हम घबरा जाएंगे और सोचने लगेंगे कि अब हम करें क्या?

वेद हमें बताते हैं कि हमें अपने कर्तव्य कर्मो को दृढता से संपन्न करना चाहिए, भले ही वे हमारे दैनिक साधारण नियम हों, अथवा हमारे लिए दूसरों के द्वारा निर्धारित किए गए कर्तव्य कर्म हों। कभी यह मत देखो कि दूसरे क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं, केवल अपने कर्तव्य कर्मो के प्रति सावधान रहो।

पानी से इलाज का दावा...

आस्था और अंधविश्वास में हर बार हमने आपके समक्ष आस्था और अंधविश्वास को परिभाषित करने वाली अजीबोगरीब घटनाओं को रखा है। आस्था और अंधविश्वास की कड़ी में इस बार भी हम आपको एक ऐसी हकीकत दिखा रहे हैं, जो कुछ लोगों के लिए आस्था रूपी चमत्कार है, तो कुछ लोगों के लिए अंधविश्वास का ढकोसला। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं दिल्ली में रहने वाली इंदिरा देवी की, जिनका दावा है कि वे अपनी चमत्कारिक शक्तियों से किसी भी प्रकार के रोग का इलाज कर सकती हैं।

चाहे कैंसर हो या ट्यूमर, या फिर हो शुगर या पोलियो, इंदिरा देवी का मानना है कि उन्हें ऐसी चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिससे वे इन सभी बीमारियों का उपचार कर सकती हैं। इंदिरा देवी के उपचार का तरीका भी कुछ निराला है। पहले वे रोगी के शरीर के संक्रमित स्थान पर अपने घर से लाया हुआ जल छिड़कती हैं और फिर वही जल उसे पीने के लिए देती हैं। जल के साथ वे रोगी को फूल और केले प्रसाद स्वरूप देती हैं। जल के साथ-साथ रोगी को शरीर पर फूल भी रगड़ना होते हैं।

हर उम्र और हर प्रकार के रोग से ग्रसित लोग इलाज कराने के लिए इनके दर पर कतारें लगाते हैं। इंदिरा देवी का मानना है कि उन्हें ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हैं जिसके बल पर वे रोगों का उपचार करती हैं। उनका दावा है कि उनके स्पर्श मात्र से लोगों के दु:ख-दर्द दूर हो जाते हैं।

साथ ही इंदिरा देवी यह भी कहती हैं कि वे किसी भी उपचार के लिए रोगी से कोई शुल्क नहीं लेती हैं, पर मंदिर का नजारा कुछ और ही

हकीकत बयाँ करता है। जब हमने साफतौर पर इस विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘श्रद्धालु अपने मन से बीस-पचास जो भी रखकर चला जाए, इसमें हम क्या कर सकते हैं। अगर वह अपनी लाइलाज बीमारी के उपचार के लिए दस-बीस रुपए चढ़ा भी देता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है...।’

वहीं दूसरी ओर, रोगी व उनके परिवारजन भी इंदिरा के देवी के पास ठीक होने की उम्मीदें लेकर कई बार आते हैं। उन्हें उम्मीद है कि देवी भले ही उन्हें कितनी ही बार चरणों में बुलाएँ, मगर इससे उन्हें लाभ जरूर होगा। हालाँकि इंदिरा देवी के चमत्कार में कितना दम है, अभी तक इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है, मगर फिर भी लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं नजर आती है। आप इसे आस्था का चमत्कार मानते हैं या फिर अंधविश्वास का मायाजाल

पीलिया का अनोखा इलाज

असाध्य बीमारियों के इलाज के लिए लोगों का झाड़-फूँक, टोने-टोटके तथा देवी-देवताओं का सहारा लेना एक आम बात है। आज हम आपको आस्था और अंधविश्वास की कड़ी में एक ऐसी जगह ले चलते हैं, जहाँ पीलिया का इलाज करने का एक अनूठा तरीका अपनाया जाता है।

पीलिया से ग्रस्त मरीजों की भीड़ का यह नजारा किसी डॉक्टर के क्लिनिक का नहीं बल्कि एक मंजीत पाल सलूजा की दुकान का है जो अपनी अनूठी विद्या से पीलिया दूर करने का दावा करते हैं। वे मरीजों के कान पर कागज का कोन बनाकर लगाते हैं और मोमबत्ती के सहारे कागज को जलाते हैं और साथ-साथ गुरुवाणी का उच्चारण करते जाते हैं। मंजीत जी इलाज के पहले गणेशजी की पूजा करना नहीं भूलते। जला हुआ कोन जब कान से हटाया जाता है तो कान के आसपास पीले रंग का पदार्थ इकट्‍ठा हो जाता है। मंजीत पाल के अनुसार यह पीलिया है, जो मरीज के शरीर से बाहर निकलता है।

उपचार हेतु पहले दिन आने वाले मरीज को साथ में हार-फूल, अगरबत्ती और नारियल लाना आवश्यक होता है। साथ ही यहाँ आने वाले लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार यहाँ चढ़ावा रखकर जाते हैं। मंजीत का कहना है कि वे मरीजों को नि:शुल्क सेवा प्रदान करते हैं। चढ़ावा तो मरीजों की श्रद्धा का प्रतीक मात्र है।

यहाँ आने वाले मरीजों को भी डॉक्टरी इलाज से ज्यादा इस विद्या पर अधिक विश्वास है। उनका मानना है कि दवा के साथ दुआ के असर से ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है।

गुरुवाणी का उच्चारण करते हुए मरीजों का इलाज करने वाले मंजीत का कहना है कि हमारे परिवार को इस विद्या का ज्ञान भगवान की देन है। उनके पिता व दादाजी भी इस अनूठी विद्या से लोगों के दर्द को दूर किया करते थे। वे यहाँ आने वाले मरीजों को एक विशेष दवा, जो कि आयुर्वेदिक और होम्योपैथी दवा का मिश्रण होती है, के ड्राप्स भी पिलाते हैं। वे रोजाना करीब 80 से 90 लोगों का इलाज करने का दावा करते हैं। उनका यह भी कहना है कि वे मरीज को केवल देखकर ही यह अनुमान लगा लेते हैं कि पीलिया उतरने में कितना समय लगेगा।

मंजीत पाल सलूजा के अनुसार यहाँ डॉक्टरों द्वारा भेजे गए मरीजों के अलावा कई डॉक्टर्स स्वयं यहाँ आकर खुद को व परिजनों का भी इलाज कराते हैं। पीलिया जैसी असाध्य बीमारी के इलाज हेतु इस तरह की विद्या पर विश्वास करना लोगों के अंधविश्वास को प्रकट करता है या इस विद्या के पीछे किसी वैज्ञानिक तरीका होने का अंदाज लगाया जा सकता है। 

राक्षस को पूजने वाला गाँव

क्या यह संभव है कि राक्षस को ही कुल देवता मानकर उसकी पूजा-अर्चना की जाए? आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं एक ऐसे गाँव, जहाँ के लोग एक राक्षस को अपने कुलदेवता के रूप में पूजते हैं।

महाराष्ट्र स्थित अहमदनगर जिले की पाथर्डी तहसील में 'नांदुर निंबादैत्य'

नामक गाँव में भारत का एकमात्र दैत्य मंदिर है। यहाँ के रहवासी निंबादैत्य की ही आराधना करते हैं। और सबसे खास बात यह है कि इस गाँव में हनुमानजी का एक भी मंदिर नहीं है। पूजा तो दूर यहाँ गलती से भी हनुमानजी का नाम नहीं लिया जाता है।

कहा जाता है कि जब वनवास के दौरान भगवान राम अपनी पत्नी सीता को ढूँढ़ रहे थे। तब केदारेश्‍वर में वाल्मीकि ऋषि से भेंट के लिए जाते समय वे इसी गाँव के जंगल में ठहरे थे। इसी जंगल में रहने वाले निंबादैत्य ने भगवान राम की बहुत सेवा और आराधना की। प्रभु राम ने उसे अपने भक्त के रूप में स्वीकार कर वरदान दिया कि इस गाँव में तुम्हारा ही अस्तित्व रहेगा और यहाँ के लोग हनुमान की पूजा न करते हुए तुम्हें ही अपना कुलदेवता मानकर आराधना करेंगे।
हनुमान नाम का यहाँ इतना प्रकोप है कि गाँव के किसी व्यक्ति का नाम हनुमान या मारुति नही रखा जाता। क्योंकि मारुति भी भगवान हनुमान का दूसरा नाम है। यहाँ तक हनुमान के नाम वाले व्यक्ति का नाम बदलकर ही उसे गाँव में प्रवेश दिया जाता है।

शिक्षक एकनाथ जनार्दन पालवे के मुताबिक दो महीने पूर्व ही लातूर जिले से एक मारुति नाम का मजदूर काम करने गाँव में आया था और दो दिन बाद ही वो श्मशान के निकट विचित्र आवाज निकालकर कूदा-फाँदी करने लगा, तब गाँव के रहवासियों ने उसे दैत्य मंदिर ले जाकर उसका नाम परिवर्तित कर उसे लक्ष्मण नाम दिया और वह आश्चर्यजनक रूप से ठीक भी हो गया।

हालात यह हैं कि यहाँ के लोग एक प्रसिद्ध कंपनी की चार पहिया गाड़ी इस्तेमाल करना भी अपशकुन मानते हैं। गाँव के एक डॉक्टर देशमुख द्वारा इस कंपनी की कार खरीदने के बाद ही कुछ ऐसे हालात बने कि उन्हें एक हफ्ते में ही कार बेचना पडी। एक बार खेत में फँसा गन्ने से भरा ट्रक बड़ी मशक्कत के बाद भी बाहर नहीं निकला तो किसी ने केबिन के अंदर रखे हनुमान के चित्र को निकालने की सलाह दी, ऐसा करने पर ट्रक बड़ी आसानी से बाहर निकल गया।

इस गाँव के अधिकांश लोग रोजी-रोटी के लिए बाहर के शहरों में काम करते हैं परंतु निंबादैत्य की यात्रा के समय सभी लोग अपने गाँव जरूर लौटते हैं। पुलिस आरक्षक अविनाश गर्जे के मुताबिक यात्रा के समय विषम परिस्थितियाँ होने के बावजूद भी कोई चमत्कार भक्तों को गाँव तक खींच ही लाता है।

ये मंदिर हेमाडपंथी है और गाँव की एकमात्र दोमंजिला इमारत है। निंबादैत्य के सम्मान में यहाँ के ‍रहवासी दुमंजिला इमारतों का निर्माण नहीं करते हैं। इस मंदिर के सामने करीब 500 वर्ष पुराना बरगद का पेड़ है। दैत्य के प्रति लोगों की आस्था का यह आलम है कि यहाँ के हर मकान, दुकान और वाहनों पर भी 'निंबादैत्य कृपा' लिखा हुआ नजर आता है।

कोई राक्षस किसी का कुलदेवता हो सकता है यह बात आश्चर्यजनक जरूर है मगर है सच्ची... आप इसे मानें या न मानें। यदि आप भी किसी ऐसी ही घटना के बारे में जानते हैं तो हमे अवश्य लिखें।

रामायण पाठ से हुआ कायापलट

आस्था और अंधविश्‍वास की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं एक ऐसे गाँव, जहाँ का हर ग्रामीण रामधुन में डूब गया है। तिवड़िया ग्राम के ग्रामीणों का मानना है कि यह राम नाम और कथा का ही चमत्कार है कि हमारे गाँव का कायापलट हो गया है।

14 वर्ष पूर्व यह गाँव बीमारी, सूखे और अकाल की चपेट में था, लेकिन जबसे सिद्ध भोलेनाथ हनुमान मंदिर में अखंड रामायण पाठ का सिलसिला शुरू किया गया है, तब से गाँव सभी तरह की आपदाओं से मुक्त हो चुका है। यहाँ पर अखंड रामायण पाठ के अलावा घी की अखंड ज्योत भी जलती रहती है।

बच्चों और बूढ़ों ने रेवाशंकर तिवारी के साथ मिलकर शुरू किया था अखंड रामायण पाठ, लेकिन आज गाँव का हर आदमी इससे जुड़ गया है। क्या बच्चे और क्या बूढ़े, गाँव के प्रत्येक व्यक्ति का अब यह दायित्व हो चला है कि रामायण पाठ जारी रहे। ऐसी भी मान्यता है कि यदि यह पाठ रोका गया तो गाँव के बुरे दिन फिर से शुरू हो जाएँगे, इसीलिए गाँव का हर व्यक्ति बारी-बारी से रामायण पाठ के लिए आता है।

रामायण पाठ के आयोजक और मंदिर के पुजारी धर्मेंद्र व्यास ने बताया कि इस अखंड पाठ के आयोजन की प्रेरणा 14 वर्ष पूर्व रेवाशंकर तिवारी ने दी थी। तब से ही यह अखंड पाठ चल रहा है। जबसे यह पाठ शुरू हुआ है गाँव में खुशहाली लौट आई है। पहले इस गाँव का भू-जलस्तर 300 फुट नीचे हुआ करता था, लेकिन अब यहाँ 30 से 40 फुट पर ही पानी निकल आता है। कई जगह तो पाँच फुट पर ही पानी है।

गाँव के ही एक ग्रामीण ने बताया कि जबसे यह रामायण पाठ शुरू हुआ है, ग्रामीणों में चेतना आ गई है। हर कोई अब जागरूक है और सभी ओर खुशहाली है। यहाँ की खास बात यह है कि किसी भी प्रकार की अनहोनी नहीं होती।

व्यास ने ही हमें एक चमत्कारी घटना का जिक्र करते हुए कहा कि नवरात्रि के दौरान एक बार रमेश तिवारी और गोविंद पवार कुछ लोगों के साथ पाठ कर रहे थे तभी अचानक आसमान से सभी के ऊपर बिजली गिर गई और पूरी छत पर करंट फैल गया, लेकिन चमत्कार ही था कि किसी को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं हुई।

धर्मेंद्र व्यास ने ही बताया कि मानसिक संतुलन खो चुके गोरेलाल पवार इस रामायण पाठ की बदौलत ही अब अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं और यहाँ यह भी देखने में आया है कि जो कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ थे, वे भी रामायण पाठ पढ़ने लगे हैं।

कैसे पहुँचें : देवास तहसील में इंदौर से 140 किलोमीटर दूर स्थित खातेगाँव से कुछ ही दूरी पर है ग्राम तिवडि़या। आप सड़क मार्ग से यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।

साँप का जहर उतारें फोन पर

वर्दी वाले बाबा यशवंत भागवत का दावा...
 
न धुआँ, न भभूत, न बड़े-बड़े बोल और न ही भगवा चोला। किस्से-कहानियों और किंवदंतियों को खंगालने की हमारी इस कोशिश में इस बार हम आपको मिलवा रहे हैं एक ऐसी शख्सियत से, जिसका दावा है कि वह साँप-बिच्छू का जहर अपनी मंत्रशक्ति से उतार सकता है, वह भी सिर्फ फोन पर।

यह बात पढ़कर आप चौंक गए न। हम भी इसी तरह चौंके थे। क्या ऐसा हो सकता है? क्या यह सच है? कोरी बकवास लगती है। ऐसे ही कई विचार हमारे दिमाग में भी घुमड़ने लगे थे। फिर क्या था, हमने शुरू किया सफर इस दावे की तह तक पहुँचने का। सफर की शुरुआत हुई इंदौर की रामबाग कॉलोनी से। यहाँ पहुँचकर हमने जहर उतारने वाले बाबा के बारे में जानकारी जानना चाही। जहर उतारने वाले बाबा। यह सुन पंक्चर बनाने वाला मुन्नू हँसने लगा और हमें रास्ता दिखाते हुए पुलिस क्वार्टर्स तक ले गया।

पुलिस क्वार्टर!! और जहर उतारने वाला बाबा, बात कुछ जँची नहीं। हमें लगा कि मुन्नू महाशय हमें 'मामा' बना रहे हैं। हमने पास से गुजरने वाले एक आरक्षक से यही बात पूछी। उन्होंने बताया, जी हाँ, यहीं तो हेड साहब रहते हैं। फिर बातों ही बातों में पता चला कि यशवंत भागवत नामक यह व्यक्ति पुलिस महकमे में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत हैं और पिछले 25 सालों से फोन पर साँप का जहर उतारते हैं।

 भागवतजी ने बताया पहले वे मरीज से रूबरू होने पर ही उसका जहर उतार सकते थे, लेकिन बाद में मंत्रों में कुछ शब्दों का हेरफेर कर फोन पर ही जहर उतार लेने की विधि ईजाद कर ली। इस बात की जानकारी फैलते ही यशवंत भागवत का फोन लगातार घनघनाने लगा।

अपने हुनर की खासियत बताते हुए श्री भागवत कहते हैं कि वे पीड़ित व्यक्ति से उसका, उसकी माँ का नाम और उसके रहने का पता पूछते हैं। फिर मंत्रोच्चार द्वारा जहर उतारने की अनूठी विद्या शुरू करते हैं। जब उन्हें लगता है कि जहर पूरी तरह से उतर चुका है तो वे मरीज को नारियल फोड़ने के लिए कहते हैं। इसके बाद मरीज को नमक चटाया जाता है। यदि मरीज को नमक का स्वाद खारा लगता है तो जहर उतरा माना जाता है।

इस विद्या के बारे में जानकारी मिलने के बाद हमने तलाशना शुरू किया ऐसे व्यक्ति को, जिसका यशवंतजी ने इलाज किया हो। इस तलाश के दौरान हमारी मुलाकात हुई सरमन गोयल से। पेशे से अध्यापक सरमनजी ने बताया कि मुझे ऐसी बातों पर कतई विश्वास न था। एक सुबह झाड़ू लगाते हुए मुझे साँप ने काट लिया। मैं दौड़ा-दौड़ा भागवतजी के पास गया। उन्होंने मंत्र फूंका और कुछ ही देर में जहर की जलन शांत हो गई। मैं आज भला-चंगा हूँ तो भागवतजी की कृपा से।

सरमनजी अकेले नहीं, ऐसे सैकड़ों पीड़ित लोग हैं, जिनका विश्वास है कि भागवतजी अपनी मंत्र-शक्तियों के जरिए सर्पदंश का इलाज कर देते हैं। यमराज के लेखपाल चित्रगुप्त की तरह भागवतजी ने भी अपने द्वारा इलाज किए लोगों का लेखा-जोखा अपने रजिस्टर में लिख रखा है। इस लेखे-जोखे से तीन रजिस्टर भर चुके हैं। भागवतजी हर काम ऊपर वाले के नाम पर करते हैं, इसलिए वे एक पैसा लेना भी पाप समझते हैं। वे कहते हैं मैं कुछ नहीं करता, करने वाले तो साँई-राम हैं।

यशवंत भागवत से जुड़ा एक किस्सा बताते हैं राजस्थान के जमील साहब। जमीलजी की एसटीडी-पीसीओ की दुकान है। एक बार उन्हें अपने दोस्त से भागवतजी का नंबर मिला। इन्होंने आजमाने के लिए एक सर्पदंश से पीड़ित महिला का इलाज फोन द्वारा भागवतजी से करवाया। यहाँ भागवतजी ने मंत्र पढ़े, वहाँ पीड़िता का दर्द गायब हो गया। नागपंचमी के दिन जन्मे यशवंतजी यूँ तो बवासीर, साइटिका, पीलिया जैसी बीमारियों का इलाज भी करते हैं, लेकिन उनकी पहचान साँप का जहर उतारने वाले के रूप में ज्यादा है।

यशवंतजी की इस अनूठी विद्या को मानने वालों में आम लोगों के साथ-साथ पुलिस महकमा भी शामिल है। पुलिस महकमे में रिजर्व इंस्पेक्टर के पद पर आसीन प्रदीपसिंह चौहान भी अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि मेरे सरकारी आवास और ऑफिस दोनों में ही लगातार साँप दिखाई दिया करते थे। घर, आफिस में लोग खासे भयभीत होने लगे थे। तब किसी ने मुझे भागवतजी के बारे में बताया। उनके अनुष्ठान करने के बाद इनके घर और आफिस में साँप दिखाई देना बंद हो गए हैं।

एक तरफ भागवतजी की विद्या का सम्मान करने वाले बहुत लोग हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस विद्या को पूरी तरह से नकारते हैं। इन्हीं लोगों में शामिल हैं महाराजा यशवंतराव अस्पताल के मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अशोक वाजपेई। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर वाजपेई कहते हैं कि “ हमारे देश में 70 प्रतिशत साँपों में जहर होता ही नहीं है। कई लोगों की मौत की वजह जहर नहीं, बल्कि साँप के काटने का भय होता है। इस किस्से में भी ऐसा ही हो सकता है। हो सकता है कि जिस साँप ने काटा हो, वो जहरीला ही न हो या फिर काँटा चुभने पर भी महसूस हो कि साँप ने काटा है। मेरा मानना है कि साँप काटने के बाद उसका इलाज करवाना चाहिए, न कि इस तरह की झाड़-फूँक।”

जहाँ कई लोग डॉक्टर साहब की हिदायत को मानते हैं, वहीं अनेक ऐसे भी हैं, जो इसे नकारते हैं। इनमें से कुछ का दावा है कि भागवतजी उन्हें मौत से लौटाकर लाए हैं। अब ये वर्दी वाले बाबा तो यही कहते हैं कि 0731-2535534 पर फोन लगाइए और क्या सही है, क्या गलत है, खुद जान जाइए।

साँई बाबा की सवारी

आपने साँई बाबा के अनेकों चमत्कार देखें या सुने होंगे लेकिन क्या कभी ऐसा सुना कि साँई बाबा किसी के शरीर में आकर लोगों के दुख दूर करते हों। नहीं न। अब तक आपने सुना है कि माता या भेरू बाबा ही शरीर में आते हैं, लेकिन यह कम ही सुनने में आया है कि साँई बाबा किसी के शरीर में आकर लोगों की समस्या का समाधान करते हों और वह भी एक महिला के शरीर में।

'आस्था या अंधविश्वास' की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं देवास के साँई मंदिर में, जहाँ एक महिला के शरीर में साँई बाबा की सवारी आती है। यह सच है या नहीं, यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन कई लोग अपनी समस्या के समाधान के लिए बाबा के दरबार में हाजिर होते हैं।

साँई मंदिर की पुजारिन इंदुमति की बहू आशा तुरकणे विगत 15 वर्षों से बाबा के माध्यम से भक्तों की समस्या का समाधान कर रही हैं। प्रत्येक गुरुवार की रात को जब आशाजी के शरीर में साँई बाबा आते हैं तब उनकी आवाज पुरुषों जैसी हो जाती है। इस दौरान वे सिगरेट पीने और पुरुषों जैसा व्यवहार करने लगती हैं। तब भक्त उनकी बात बड़े ध्यान से सुनते हैं।

संगीतमय वातावरण के बीच बड़ी संख्या में यहाँ साँई के भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यहाँ आए एक भक्त रघुवीर प्रसाद ने कहा कि मेरा बाबा में अटूट विश्वास है। बाबा की जो जिस रूप में आराधना करता है, बाबा उसके दु:ख दूर करते हैं। मालिक तो सबका एक ही है और जो भी यहाँ भक्तिभाव से आता है, उसकी मन्नत पूरी होती है। बाबा में अनन्य भक्ति होना जरूरी है। मैं 2005 में एक बार साइकिल से बाबा के दरबार में जा चुका हूँ। बाबा का बड़ा चमत्कार है।

एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि यह तो एक प्रकार का सत्य ही है कि लोगों को यहाँ कुछ मिलता होगा, तभी तो इतने लोग आते हैं। बाबा के मंदिर में आने से ही शांति मिलती है। लोगों का इसमें विश्वास है।
वैज्ञानिक युग में जहाँ इस तरह की बातों को अंधविश्वास से अधिक कुछ नहीं माना जाता, वहीं यहाँ आने वाले लोगों का कहना है कि साँई भावना के भूखे हैं। भक्त उन्हें किसी भी रूप में भजे, वे हाजिर हो जाते हैं।

साँई बाबा ने भाईचारा, साम्प्रदायिक सद्भाव और मानव सेवा के लिए महान कार्य कर लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था कि किस तरह श्रद्धा और सबुरी के साथ जीवन के दु:खों से निपटा जा सकता है इसके लिए मालिक पर विश्वास के अलावा किसी और के दर पर जाने की आवश्यकता नहीं लेकिन क्या वाकई किसी के शरीर में कोई देवी-देवता या साँई बाबा आ सकते हैं या यह महज अंधविश्वास है, फैसला आपको करना है...। आप हमें अपनी राय से जरूर अवगत कराएँ।

कैसे पहुँचे : इंदौर से 35 किलोमिटर दूर उत्तर में स्थित है देवास; जहाँ ट्रेन या बस द्वारा जाया जा सकता है।

शर्तिया बेटा ही होगा...

आज के आधुनिक युग में जब लड़कियाँ हर कदम पर खुद को लड़कों से बेहतर साबित कर रही हैं, तब भी अनेक ऐसे परिवार हैं जो लड़के की चाह रखते हैं। घर के चिराग की चाहत में ये लोग कन्या भ्रूण हत्या से लेकर, तथाकथित बाबाओं और फर्जी डॉक्टरों के चक्कर में फँस जाते हैं। आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हमारा मुद्दा भी यही है।

इस कड़ी में हम आपकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करवा रहे हैं जो दावा करता है कि उसकी दवाई का सेवन करने के बाद शर्तिया लड़का ही होगा। जी हाँ, पवन कुमार अजमेरा नामक यह शख्स पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर है और दावा करता है कि यह कोख में ही बच्चे का लिंग निर्धारण कर सकता है।

इंदौर के गाँधीनगर में इस व्यक्ति का क्लिनिक है जहाँ की दीवारों पर शर्तिया लड़का पैदा करवाने के दावे लिखे हुए हैं। शर्तिया लड़का पैदा करवाने का दावा करने वाले इन महाशय का यह भी कहना है कि उनकी दवाई उसी महिला पर असर करेगी जिसकी पहले से एक बेटी हो और उनके पास इलाज के लिए आते समय इस बात का प्रमाण साथ लाना भी बेहद जरूरी है।

बड़े-बड़े दावों के बीच पवन कुमार का यह कहना है कि वे अभी तक तीन सौ महिलाओं की गोद में लड़के डाल चुके हैं। उनके द्वारा दी गई दवाइयों को गाय के दूध के साथ सेवन करने पर महिला को शर्तिया बेटा ही होगा। अब हमारे समाज में जहाँ बेटे को ही घर का चिराग समझा जाता है वहाँ इस तरह के दावों पर विश्वास करने वाले लोगों की कमी नहीं है।

इसलिए इन महाशय का धंधा भी खूब चमक रहा है। क्लिनिक पर चक्कर लगाने वाले लोगों में से कुछ दावा करते हैं कि पवन कुमार की दी गई दवाइयों के सेवन से ही उन्हें लड़का हुआ है। इन्हीं में से एक मोहनी उपाध्याय का कहना है कि मुझे एक बिटिया है, मैं दूसरा बेटा चाहती थी। मुझे इस क्लिनिक का पता चला तो यहाँ आ गई। डॉक्टर साहब की दवाई के बाद ही मुझे बेटा हुआ है।

पवन कुमार जैसे लोग कितने भी दावे कर लें लेकिन असली डॉक्टर इन दावों को सिरे से नकारते हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मुकेश बिड़ला ने वेबदुनिया को बताया कि ऐसे दावे लोगों को मूर्ख बनाने के सिवा और कुछ नहीं। विज्ञान के नजरिए से देखें तो अभी तक कोख में लिंग निर्धारण संभव ही नहीं है।
असली डॉक्टरों के नकारने के बाद भी इन आयुर्वेदाचार्य का धंधा खूब चमक रहा है। बेटे की चाहत में ग्रसित लोग इनके दरवाजे के चक्कर काटते रहते हैं।

लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि पूरे देश में जहाँ लड़कियों की जन्मदर तेजी से गिरती जा रही है और सरकार की तरफ से जन्मपूर्व लिंग परीक्षण को गैरकानूनी करार दिया जा चुका है, वहीं मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी माने जाने वाले इंदौर में शर्तिया लड़के पैदा करवाने का यह गोरखधंधा क्लिनिक के नाम पर बेरोकटोक चल रहा है और प्रशासन आँखें मूँदे बैठा है।

शिवाबाबा का प्रसिद्ध मेला

सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच घने जंगल में हर साल वसंत पंचमी से पूर्णिमा तक लगने वाला शिवाबाबा का मेला वैसे तो दिखने में एक आम ग्रामीण मेले की तरह ही है। कैसेट-सीडी, खेल-खिलौने, मिठाइयाँ, कपड़े, बर्तनों से सजी दुकानें, खरीदारी करते लोग, परंतु इन सबके अलावा भी ऐसा कुछ है यहाँ, जो खास बनाता है इस मेले को इस पूरे क्षेत्र में। जी हाँ, शिवाबाबा के मेले में लोग आते हैं मन्नतें लेकर और जब मन्नत पूरी होती है तो भेंट में चढ़ाते हैं बकरे। कोई एक तो कोई दो तो कोई पाँच-पाँच बकरे अपनी मुराद पूरी होने के बाद शिवाबाबा को चढ़ाते हैं।

शिवाबाबा के बारे में मान्यता है कि वे एक संत थे, जिनके चमत्कारों की प्रसिद्धि इस इलाके के हर एक शख्स की जबान पर है। यहाँ शिवाबाबा को भगवान शिव का अवतार मानकर पूजा की जाती है। मंदिर के पास एक बाबा जोगीनाथ का कहना है कि यह बहुत ही अद्भुत दरबार है। देर की तो बात ही नहीं, बस इधर माँगो और उधर इच्छा पूरी हो जाती है।

मन्नत पूरी होने पर लोग अपने परिजनों और दोस्तों के साथ मेले में पहुँचते हैं और फिर सजे-धजे बकरे की पूजा कर पूरे जोर-शोर से शिवाबाबा के मंदिर की ओर ले जाया जाता है। शिवाबाबा के मंदिर में स्थित देवी की प्रतिमा के सामने पुजारी बकरे पर जल छिड़ककर उसे देवता को अर्पित कर देता है।

यहाँ लाए जाने वाले ज्यादातर बकरों की बलि दी जाती है, जबकि कुछ अन्य को जंगल में छोड़ दिया जाता है। पहले बलि मंदिर के सामने स्थित चहारदीवारी में दी जाती थी, लेकिन अब यहाँ बलि देने की मनाही है अत: अब बकरे की बलि लोग अपने ठहरने के स्थान पर जाकर देते हैं। बलि के बाद बकरे के माँस को शिवाबाबा का प्रसाद मानकर मिल-बाँटकर खाया जाता है। प्रसाद को लोग मेला क्षेत्र से बाहर या अपने घर नहीं ले जा सकते। बचने पर प्रसाद को वहीं गरीबों में बाँट दिया जाता है।

मेले में आए एक कसाई से जब हमने बात की तो उसने बताया कि हर साल सम्पूर्ण मेला अवधि में करीब दो लाख बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। उसने यह भी बताया कि उस दिन सुबह से लेकर दोपहर तीन बजे तक करीब पाँच हजार बकरों की बलि दी जा चुकी है।

कहते हैं कि शिवाबाबा की कृपा से मेले के दौरान इस इलाके में मक्खियाँ और चीटियाँ नहीं होती हैं। हमने इस तथ्य की जाँच-परख की। हमने पूरा मेला क्षेत्र देखा, बकरों के कटने के स्थान देखे, मिठाइयों की दुकानें देखीं परंतु वाकई हमें एक भी मक्खी दिखाई नहीं दी। यह एक बहस के विषय हो सकता है कि क्या बकरे की बलि देने से कोई देवता प्रसन्न हो सकता है?

महाभारत - द्रौपदी स्वयंवर

स्वयंवर सभा में अनेक देशों के राजा-महाराजा एवं राजकुमार पधारे हुये थे। एक ओर श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम तथा गणमान्य यदुवंशियों के साथ विराजमान थे। वहाँ वे ब्राह्मणों की पंक्ति में जा कर बैठ गये। कुछ ही देर में राजकुमारी द्रौपदी हाथ में वरमाला लिये अपने भाई धृष्टद्युम्न के साथ उस सभा में पहुँचीं। धृष्टद्युम्न ने सभा को सम्बोधित करते हुये कहा, "हे विभिन्न देश से पधारे राजा-महाराजाओं एवं अन्य गणमान्य जनों! इस मण्डप में बने स्तम्भ के ऊपर बने हुये उस घूमते हुये यंत्र पर ध्यान दीजिये। उस यन्त्र में एक मछली लटकी हुई है तथा यंत्र के साथ घूम रही है। आपको स्तम्भ के नीचे रखे हुये तैलपात्र में मछली के प्रतिबिम्ब को देखते हुये बाण चला कर मछली की आँख को निशाना बनाना है। मछली की आँख में सफल निशाना लगाने वाले से मेरी बहन द्रौपदी का विवाह होगा।"

एक के बाद एक सभी राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने मछली पर निशाना साधने का प्रयास किया किन्तु सफलता हाथ न लगी और वे कान्तिहीन होकर अपने स्थान में लौट आये। इन असफल लोगों में जरासंघ, शल्य, शिशुपाल तथा दुर्योधन दुःशासन आदि कौरव भी सम्मिलित थे। कौरवों के असफल होने पर दुर्योधन के परम मित्र कर्ण ने मछली को निशाना बनाने के लिये धनुष उठाया किन्तु उन्हें देख कर द्रौपदी बोल उठीं, "यह सूतपुत्र है इसलिये मैं इसका वरण नहीं कर सकती।" द्रौपदी के वचनों को सुन कर कर्ण ने लज्जित हो कर धनुष बाण रख दिया। उसके पश्चात् ब्राह्मणों की पंक्ति से उठ कर अर्जुन ने निशाना लगाने के लिये धनुष उठा लिया। एक ब्राह्मण को राजकुमारी के स्वयंवर के लिये उद्यत देख वहाँ उपस्थित जनों को अत्यन्त आश्चर्य हुआ किन्तु ब्राह्मणों के क्षत्रियों से अधिक श्रेष्ठ होने के कारण से उन्हें कोई रोक न सका। अर्जुन ने तैलपात्र में मछली के प्रतिबिम्ब को देखते हुये एक ही बाण से मछली की आँख को भेद दिया। द्रौपदी ने आगे बढ़ कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल दिया।

एक ब्राह्मण के गले में द्रौपदी को वरमाला डालते देख समस्त क्षत्रिय राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने क्रोधित हो कर अर्जुन पर आक्रमण कर दिया। अर्जुन की सहायता के लिये शेष पाण्डव भी आ गये और पाण्डवों तथा क्षत्रिय राजाओं में घमासान युद्ध होने लगा। श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले ही पहचान लिया था, इसलिये उन्होंने बीच बचाव करके युद्ध को शान्त करा दिया। दुर्योधन ने भी अनुमान लगा लिया कि निशाना लगाने वाला अर्जुन ही रहा होगा और उसका साथ देने वाले शेष पाण्डव रहे होंगे। वारणावत के लाक्षागृह से पाण्डवों के बच निकलने पर उसे अत्यन्त आश्चर्य होने लगा।

पाण्डव द्रौपदी को साथ ले कर वहाँ पहुँचे जहाँ वे अपनी माता कुन्ती के साथ निवास कर रहे थे। द्वार से ही अर्जुन ने पुकार कर अपनी माता से कहा, "माते! आज हम लोग आपके लिये एक अद्भुत् भिक्षा ले कर आये हैं।" उस पर कुन्ती ने भीतर से ही कहा, "पुत्रों! तुम लोग आपस में मिल-बाँट उसका उपभोग कर लो।" बाद में यह ज्ञात होने पर कि भिक्षा वधू के रूप में हैं, कुन्ती को अत्यन्त पश्चाताप हुआ किन्तु माता के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिये कुन्ती ने पाँचों पाण्डवों को पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

रामायण – सुन्दरकाण्ड - जानकी राक्षसी घेरे में

रावण के चले जाने के पश्चात् राक्षसनियों ने सीता को चारों ओर से घेर लिया और वे उन्हें अनेक प्रकार से डराने धमकाने लगीं। एक ने उसकी भर्त्सना करते हुये कहा, "हे मूर्ख अभागिन! तीनों लोकों और चौदह भुवनों को अपने पराक्रम से पराजित करने वाले परम तेजस्वी राक्षसराज की शैया प्रत्येक को नहीं मिलती। बड़ी-बड़ी देवकन्याएँ इसके लिये तरसती हैं। यह तो तुम्हारा परम सौभाग्य है कि स्वयं लंकापति तुम्हें अपनी अंकशायिनी बनाना चाहते हैं। तनिक विचार कर देखो, कहाँ अगाध ऐश्वर्य, स्वर्णपुरी तथा अतुल सम्पत्ति का एकछत्र स्वामी और कहाँ वह राज्य से निकाला हुआ, कंगालों की भाँति वन-वन में भटकने वाला, हतभाग्य साधारण सा मनुष्य! क्या तुम इन दोनों के बीच का महान अन्तर नहीं देखती। सोच-समझ कर निर्णय करो और महाप्रतापी लंकाधिपति रावण को पति के रूप में स्वीकार करो। उसकी अर्द्धांगिनी बनने में ही तुम्हारा कल्याण है। अन्यथा राम के वियोग में तड़प-तड़प कर मरोगी या राक्षसराज के हाथों मारी जाओगी। तुम्हारा यह कोमल शरीर इस प्रकार नष्ट होने के लिये नहीं है। महाराज रावण के साथ विलास भवन में जा कर अठखेलियाँ करो। मद्यपान कर के रमण करो। महाराज तुम्हें इतना विलासमय सुख देंगे जिसकी तुमने उस कंगाल वनवासी के साथ रहते कल्पना भी नहीं की होगी। यदि तुम हमारी बात नहीं मानोगी तो कुत्ते के मौत मारी जाओगी।"

इन कठोर वचनों से दुःखी हो कर सीता नेत्रों में आँसू भर कर बोली, "हे राक्षसनियों! तुम क्यों ऐसे दुर्वचन कह कर मुझ वियोगिनी की पीड़ा को और बढ़ाती हो? तुम नारी हो कर भी यह नहीं समझती कि तुम्हारी बात मानने से इस लोक में निन्दा और परलोक में नृशंस यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। माना कि तुम्हारी और मेरी संस्कृति तथा संस्कार भिन्न हैं, फिर भी नारी की मूल भावनाएँ तो एक जैसी होती हैं। हृदय एक बार जिसका हो जाता है, वह वस्त्रों की भाँति प्रिय पात्र का बार-बार परिवर्तन नहीं करता। फिर मेरी संस्कृति में तो पति ही पत्नी का सर्वस्व होता है। मैंने धर्मात्मा दशरथनन्दन श्री राम को पति के रूप में वरण किया है, मैं उनका परित्याग कैसे कर सकती हूँ? मेरे लिये मेरा कंगाल पति ही मेरा परमेश्वर है। उन्हें छोड़ कर मैं किसी अन्य की नहीं हो सकती, चाहे वह लंका का राजा हो, तीनों लोकों का स्वामी हो या अखिल ब्रह्माण्ड का एकछत्र सम्राट हो। याद रखो, मैं किसी भी दशा में उन्हें छोड़ कर किसी अन्य का चिन्तन नहीं कर सकती।"

सीता के इन वचनों से चिढ़ कर वे राक्षसनियाँ सीता को दुर्वचन कहती हुई अने प्रकार से कष्ट देने लगीं। विदेह नन्दिनी की यह दुर्दशा पवनपुत्र वृक्ष पर बैठे हुये बड़े दुःख के साथ देख रहे थे। और सोच रहे थे कि किस प्रकार जानकी जी से मिल कर उन्हें धैर्य बँधाऊँ। साथ ही वे परमात्मा से प्रार्थना भी करते जाते थे, "हे प्रभो! सीता जी की इन दुष्टों से रक्षा करो।" उधर सीता जब उन दुर्वचनों को न सह सकी तो वह वहाँ से उठ कर इधर उधर भ्रमण करने लगी और भ्रमण करती हुई उसी वृक्ष के नीचे आ कर खड़ी हो गई जिस पर हनुमान बैठे थे। उस वृक्ष की एक शाखा को पकड़ कर उसके सहारे खड़ी हो अश्रुविमोचन करने लगी। फिर सहसा वे उच्च स्वर में मृत्यु का आह्वान करती हुई कहने लगी, "हे भगवान! अब यह विपत्ति नहीं सही जाती। प्रभो! मुझे इस विपत्ति से छुटकारा दिलाओ, या मुझे इस पृथ्वी से उठा लो। बड़े लोगों ने सच कहा है कि समय से पहले मृत्यु भी नहीं आती। आज मेरी कैसी दयनीय दशा हो गई है। कहाँ अयोध्या का वह राजप्रासाद जहाँ मैं अपने परिजनों तथा पति के साथ अलौकिक सुख भोगती थे और कहाँ यह दुर्दिन जब मैं पति से विमुक्त छल द्वारा हरी गई इन राक्षसों के फंदों में फँस कर निरीह हिरणी की भाँति दुःखी हो रही हूँ। आज अपने प्राणेश्वर के बिना मैं जल से निकाली गई मछली की भाँति तड़प रही हूँ। इतनी भायंकर वेदना सह कर भी मेरे प्राण नहीं निकल रहे हैं। आश्चर्य यह है कि मर्मान्तक पीड़ा सह कर भी मेरा हृदय टुकड़े-टुकड़े नहीं हो गया। मुझ जैसी अभागिनी कौन होगी जो अपने प्राणाधिक प्रियतम से बिछुड़ कर भी अपने प्राणों को सँजोये बैठी है। अभी न जाने कौन-कौन से दुःख मेरे भाग्य में लिखे हैं। न जाने वह दुष्ट रावण मेरी कैसी दुर्गति करेगा। चाहे कुछ भी हो, मैं उस महापातकी को अपने बायें पैर से भी स्पर्श न करूँगी, उसके इंगित पर आत्म समर्पण करना तो दूर की बात है। यह मेरा दुर्भाग्य ही है किस एक परमप्रतापी वीर की भार्या हो कर भी दुष्ट रावण के हाथों सताई जा रही हूँ और वे मेरी रक्षा करने के लिये अभी तक यहाँ नहीं पहुँचे। मेरा तो भाग्य ही उल्टा चल रहा है। यदि परोपकारी जटायुराज इस नीच के हाथों न मारे जाते तो वे अवश्य राघव को मेरा पता बता देते और वे आ कर रावण का विनाश करके मुझे इस भयानक यातना से मुक्ति दिलाते। परन्तु मेरा मन कह रहा है दि दुश्चरित्र रावण के पापों का घड़ा भरने वाला है। अब उसका अन्त अधिक दूर नहीं है। वह अवश्य ही मेरे पति के हाथों मारा जायेगा। उनके तीक्ष्ण बाण लंका को लम्पट राक्षसों के आधिपत्य से मुक्त करके अवश्य मेरा उद्धार करेंगे। किन्तु उनकी प्रतीक्षा करते-करते मुझे इतने दिन हो गये और वे अभी तक नहीं आये। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उन्होंने मुझे मरा हुआ समझ लिया हो और इसलिये अब वे मेरी खोज खबर ही न ले रहे हों। यह भी तो हो सकता है कि दुष्ट मायावी रावण ने जिस प्रकार छल से मेरा हरण किया, उसी प्रकार उसने छल से उन दोनों भाइयों का वध कर डाला हो। उस दुष्ट के लिये कोई भी नीच कार्य अकरणीय नहीं है। दोनों दशाओं में मेरे जीवित रहने का प्रयोजन नहीं है। यदि उन्होंने मुझे मरा हुआ समझ लिया है या इस दुष्ट ने उन दोनों का वध कर दिया है तो भी मेरा और उनका मिलन जअब असम्भव हो गया है। जब मैं अपने प्राणेश्वर से नहीं मिल सकती तो मेरा जीवित रहना व्यर्थ है। मैं अभी इसी समय अपने प्राणों का उत्सर्ग करूँगी।"

सीता के इन निराशा भरे वचनों को सुन कर पवनपुत्र हनुमान अपने मन में विचार करने लगे कि अब इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि यह ही जनकनन्दिनी जानकी हैं जो अपने पति के वियोग में व्यकुल हो रही हैं। यही वह समय है, जब इन्हें धैर्य की सबसे अधिक आवश्यकता है।