06 अप्रैल 2010

कर्मकांड से होती है मन की शुद्धि

हिंदू संस्कृति मूलत: वैदिक संस्कृति है। इसमें वेदों को ही प्रमाण माना गया है। वेदों का तीन खंडों में विभाजन विषय के अनुसार किया गया है- कर्मकांड, उपासना कांड और ज्ञानकांड। जैसा कि नामों से ही प्रकट है, कर्मकांड में कर्म, उपासनाकांड में उपासना व ज्ञानकांड में ज्ञान का विवेचन है।

वेदों का यह संदेश है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य परम सत्य को जानना और उसको प्राप्त करना ही है। परम सत्ता का ज्ञान प्राप्त करने में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है। इस विषयोपभोगमय संसार में हलके-फुल्के ढंग से जीवन व्यतीत कर लेना ही मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं है। परम सत्य को जानने के लिए मन को तैयार करना, उसे शुद्ध करना अपेक्षित है। वेदों के प्रथम विभाग कर्मकांड का यही विषय है-मन को शुद्ध कैसे किया जाए। मन की शुद्धि को कैसे प्राप्त किया जाए।

हम इस संसार में विभिन्न प्रकार की स्थितियों में, अलग-अलग प्रकार से कर्म करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं। यह स्पष्ट है कि हमारे कार्य और प्रतिक्रियाएं केवल वस्तुगत ही नहीं होते हैं। अधिकतर वे हमारे पूर्वग्रहों से, हमारी व्यक्तिगत रुचि-अरुचि से प्रभावित एवं संचालित होते हैं। अनेकानेक जन्मों में सूक्ष्म संस्कार और अंतर्निहित वृत्तियों के रूप में संजोई हुई अनेक प्रकार की वासनाएं हमारे भीतर हैं। हम वासनानुकूल कर्म करते हैं, विवेकसम्मत नहीं। फलस्वरूप हम अपनी उस रुचि-अरुचि को और दृढ बना देते हैं। इस प्रकार हम अपने मन की अशुद्धि को ही बढाते जाते हैं। हम जो भी कार्य करते हैं, जो भी प्रतिक्रिया करते हैं उसमें हमारी वासनाएं ही अभिव्यक्त होती दिखाई देती हैं।

दैनिक अनुशासन

प्रश्न यह है कि हम अपने मन को शुद्ध करें तो कैसे करें? वेदों के कर्मकांड में इसका उत्तर है। इसकी विधि वहां समझाई गई है। वास्तव में कर्मकांड के द्वारा जो मन की शुद्धि होती है, उसका सीधा संबंध उस एकाग्रचित्त स्थिति से है जो वेदों के उपासना कांड के अनुसार अभ्यास करने से अर्जित की जाती है। जब तक मन काम, क्रोध, आसक्ति, राग-द्वेष आदि से भरा होता है, तब तक वह इन संवेगों से उद्वेलित होता रहता है। जिस सीमा तक चित्त शुद्ध हो जाता है, उस सीमा तक वह शांत और एकाग्र होने लगता है। देखना यह है कि मानसिक शुद्धि के इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कर्म किस प्रकार सहायक है।

अधिकतर लोगों का यही अनुमान है कि कर्मकांड में केवल विधि-विधान की बातें होती हैं। होम, हवन, यज्ञ अथवा पूजा को ही कर्मकांड समझा जाता है। इसलिए कर्मकांड शब्द से हम घबराते हैं और ऐसा सोचते हैं कि भला हम इतने यज्ञ आदि करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? लेकिन यह एक भ्रामक सोच है। कर्मकांड में, विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न कर्मो का निर्देश है। इस प्रकार के कर्म शास्त्रविहित कर्म अथवा काम्य कर्म कहलाते हैं। किसी इच्छा के फलस्वरूप किसी विशेष लक्ष्य प्राप्ति के उद्देश्य से ये किए जाते हैं, इसलिए इनमें विकल्प है। जैसे, कुछ यज्ञादि स्वर्ग प्राप्ति के हेतु से किए जाते हैं। जिसे स्वर्गप्राप्ति की कामना हो उसके लिए ज्योतिष्टोम यज्ञ का विधान है। अन्य यज्ञ, धन वैभव प्राप्ति अथवा संतान प्राप्ति के लिए हैं। ये विधि-विधान किसी खास इच्छा की पूर्ति के लिए निर्दिष्ट हैं। इन्हें करने का कोई अर्थ तभी है, जबकि उस काम्य पदार्थ को पाने की इच्छा हो। नहीं तो इस प्रकार के यज्ञ निरर्थक हैं। यदि मुझे स्वर्ग जाने की इच्छा नहीं है, तो फिर मैं उसकी प्राप्ति का उपाय क्यों करूंगा? ठीक वैसे ही जैसे यदि कोई अमेरिका जाना ही नहीं चाहता तो वह अमेरिकी वीजा प्राप्त करने के लिए आवेदन पत्र क्यों भरेगा?

नित्य कर्म

दूसरे प्रकार के कर्म, नित्य कर्म कहलाते हैं। अपनी आयु के, अपनी अवस्था के अनुसार हमारे कर्तव्य निर्धारित हैं, जिन्हें मन के अनुशासन के निमित्त से हमें नित्य करना चाहिए। जैसे ब्रह्मचारी को नित्यप्रति गायत्री का जप करना चाहिए। गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी सबके लिए अलग-अलग प्रकार के नित्य कर्तव्यों का विधान है। गृहस्थी में रहने वाले, आध्यात्मिक उन्नति हेतु सांसारिक जीवन त्याग देने वाले और रात-दिन आत्मचिंतन में लगे रहने वाले के नित्य कर्म, प्रतिदिन के कर्तव्य अलग-अलग प्रकार के होते हैं। ये कर्तव्य इसलिए हैं कि जिससे हमारा जीवन अनुशासित हो सके, क्योंकि हम लोग अपने जीवन में, व्यवहार में बेहद निरंकुश हो गए हैं। अनुशासनविहीन होने का अर्थ है निरंकुश होना। जब हम चाहते हैं तब सोते हैं, जब उठना चाहते हैं, उठते हैं, जब चाहते हैं खाने लगते हैं, भले ही भूख लगी हो या नहीं। चीजों को जहां थोडा सस्ता बिकते देखा, ख्ारीदने लगते हैं, भले ही वे हमारी जरूरत की हों अथवा नहीं। हम तमाम चीजों को केवल इसलिए इकट्ठा कर लेते हैं, क्योंकि आसानी से प्राप्त हो रही हैं और हम उन्हीं में आसक्त रहने लगते हैं।

मुख्य बात यह है कि हमारे जीवन में अनुशासन होना चाहिए। जैसे यदि सुबह नींद खुलते ही हमारी इच्छा हो कि एक प्याली चाय या कॉफी मिले, लेकिन हम यह नियम बना लें कि जब तक एक माला जप नहीं कर लेंगे, चाय-कॉफी नहीं पिएंगे, यही अपने आपमें एक बडी उपलब्धि है। यदि हम इस प्रकार का कोई भी अनुशासन अपना लें तो हमारा मन नियंत्रण में आने लगता है। अनुशासन कोई भी हो, दरअसल इनके माध्यम से हमको अपनी इच्छाओं के वेग को धीरे-धीरे संयमित करना सीखना है। यह महत्वपूर्ण बात है। काम्य कर्म तब संपन्न किए जाते हैं जब कुछ विशेष प्राप्त करना होता है। नित्य कर्म दैनिक अनुशासन वाले कर्तव्य हैं, जो हमारी अवस्था के अनुसार निर्धारित होते हैं, चाहे हम विद्यार्थी हों, गृहस्थ हों, अवकाश प्राप्त वानप्रस्थी हों, या संन्यासी-वैरागी कोई भी हों। शास्त्र का यह आदेश है कि हमें इन कर्तव्यों का अवश्य ही पालन करना है। केवल किसी विशिष्ट परिस्थिति में ही इनमें ढील की गुंजाइश है।

लेकिन हम लोगों के जीवन में हो क्या रहा है, ठीक इसके विपरीत। जैसे अगर हम अधिक थक गए हैं या बीमार हैं तो हमें अधिक सोने की छूट मिल जाती है। लेकिन शायद ही कभी एक ऐसा निश्चय करते हैं कि जरा जल्दी उठ जाएं। जिससे कि कोई खास अच्छा काम कर सकें, या भगवान की पूजा कर सकें। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कि केवल कभी-कभी हम इस प्रकार के नियम के पालन की बात सोचते हैं। जो अपवाद है वह तो बन गया है नियम और जिसे होना चाहिए था नियम, वह बन गया है अपवाद। यही कारण है कि हमारे संकल्प में शक्ति नहीं है और जब हम जीवन में एक भी अनुशासन का पालन नहीं कर सकते तो जब बडी चुनौतियों का सामना करना पडता है तो घबरा जाते हैं और अपने आपको कोसना शुरू कर देते हैं। जब हम किसी नियम का दृढता से पालन करते हैं तो देखते हैं कि हमारा संकल्प बहुत शक्तिशाली हो गया है। हम किसी भी एक नियम का जीवन में दृढता से पालन कर लें, तो तमाम अन्य पक्ष स्वत: नियमित हो जाएंगे और हमारे नियंत्रण में आ जाएंगे। इन नित्य कर्मो के पालन से हम क्रमश: अपने मन को संयमित करने में सफल होते जाते हैं और अपने मन पर हमारा अधिकार हो जाता है।

दूसरों के द्वारा निर्धारित कर्म
तीसरे प्रकार के कर्तव्य कर्म वे हैं जो हमारे लिए दूसरों के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। जैसे माता-पिता, गुरु, शासन या सरकार, कार्यालय या नौकरी के स्थान के द्वारा हमारे लिए कुछ कर्तव्य निर्धारित होते हैं। एक युवक अपने माता-पिता के आदेशों की अवहेलना कर सकता है, लेकिन जब वह बाहर कहीं काम ढूंढने निकलता है, तो जहां भी वह काम करेगा, वहां उसे अपने स्वामी की आज्ञा माननी पडेगी। इस प्रकार एक स्थिति में भले ही हम विद्रोह करें, लेकिन कहीं भी हम जाएंगे, कोई न कोई कर्तव्य करने को हमें वहां बाध्य होना पडेगा। सच बात यह है कि हम किसी की इज्जत तभी करते हैं जब वह अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होता है और ईमानदारी व परिश्रम से उन्हें पूरा करता है।

हम यदि अपना व्यापार आरंभ करें या कोई कारखाना खोलें और उसमें बहुत से लोगों को काम दें, तब हम अपने उन कर्मचारियों से क्या अपेक्षा करते हैं? क्या हम यह नहीं चाहते कि सब हमारा कहना मानें और परिश्रम से काम करें? क्या हम उस कर्मचारी को बर्दाश्त करेंगे जो अयोग्य है, अनुशासनविहीन है, कामचोर है, आलसी है? कुछ लोग समझते हैं कि धन ही सब कुछ है, पर जिनके कारण हम दूसरों की वाकई इज्जत करते हैं, वे हैं जीवन के महान गुण- ईमानदारी, वफादारी, समय की पाबंदी।

समस्या यह है कि हम इन सब गुणों को दूसरों में ही देखना चाहते हैं, दूसरों से ही अपेक्षा करते हैं कि उनमें अच्छी बातें हों। स्वयं में इन गुणों के विकास के लिए प्रयत्नशील नहीं होते। हम धन कमाने के लिए खुद तो कुछ भी भला-बुरा करने को तैयार रहते हैं, लेकिन अपने खजांची में पूरी-पूरी ईमानदारी देखना चाहते हैं। हम अपने कर्मचारियों से वफादारी और ईमानदारी की अपेक्षा करते हैं, भले ही स्वयं वैसे न हों। ये महान गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं, जिनके कारण हम दूसरों का आदर करते हैं।

वही व्यक्ति सफल होता है जिसका जीवन नियमित एवं अनुशासित होता है। बिना अनुशासन के सफलता पाना असंभव है। सारी समस्याएं ही समाप्त हो जाएं यदि केवल प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार सोचने लगे कि ये अच्छे गुण मुझमें विकसित हों। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। मुश्किल यह है कि हम समस्याओं के इतने आदी हो गए हैं कि यदि किसी समय अचानक कोई समस्या शेष न दिखे तो हम घबरा जाएंगे और सोचने लगेंगे कि अब हम करें क्या?

वेद हमें बताते हैं कि हमें अपने कर्तव्य कर्मो को दृढता से संपन्न करना चाहिए, भले ही वे हमारे दैनिक साधारण नियम हों, अथवा हमारे लिए दूसरों के द्वारा निर्धारित किए गए कर्तव्य कर्म हों। कभी यह मत देखो कि दूसरे क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं, केवल अपने कर्तव्य कर्मो के प्रति सावधान रहो।

पानी से इलाज का दावा...

आस्था और अंधविश्वास में हर बार हमने आपके समक्ष आस्था और अंधविश्वास को परिभाषित करने वाली अजीबोगरीब घटनाओं को रखा है। आस्था और अंधविश्वास की कड़ी में इस बार भी हम आपको एक ऐसी हकीकत दिखा रहे हैं, जो कुछ लोगों के लिए आस्था रूपी चमत्कार है, तो कुछ लोगों के लिए अंधविश्वास का ढकोसला। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं दिल्ली में रहने वाली इंदिरा देवी की, जिनका दावा है कि वे अपनी चमत्कारिक शक्तियों से किसी भी प्रकार के रोग का इलाज कर सकती हैं।

चाहे कैंसर हो या ट्यूमर, या फिर हो शुगर या पोलियो, इंदिरा देवी का मानना है कि उन्हें ऐसी चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिससे वे इन सभी बीमारियों का उपचार कर सकती हैं। इंदिरा देवी के उपचार का तरीका भी कुछ निराला है। पहले वे रोगी के शरीर के संक्रमित स्थान पर अपने घर से लाया हुआ जल छिड़कती हैं और फिर वही जल उसे पीने के लिए देती हैं। जल के साथ वे रोगी को फूल और केले प्रसाद स्वरूप देती हैं। जल के साथ-साथ रोगी को शरीर पर फूल भी रगड़ना होते हैं।

हर उम्र और हर प्रकार के रोग से ग्रसित लोग इलाज कराने के लिए इनके दर पर कतारें लगाते हैं। इंदिरा देवी का मानना है कि उन्हें ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हैं जिसके बल पर वे रोगों का उपचार करती हैं। उनका दावा है कि उनके स्पर्श मात्र से लोगों के दु:ख-दर्द दूर हो जाते हैं।

साथ ही इंदिरा देवी यह भी कहती हैं कि वे किसी भी उपचार के लिए रोगी से कोई शुल्क नहीं लेती हैं, पर मंदिर का नजारा कुछ और ही

हकीकत बयाँ करता है। जब हमने साफतौर पर इस विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘श्रद्धालु अपने मन से बीस-पचास जो भी रखकर चला जाए, इसमें हम क्या कर सकते हैं। अगर वह अपनी लाइलाज बीमारी के उपचार के लिए दस-बीस रुपए चढ़ा भी देता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है...।’

वहीं दूसरी ओर, रोगी व उनके परिवारजन भी इंदिरा के देवी के पास ठीक होने की उम्मीदें लेकर कई बार आते हैं। उन्हें उम्मीद है कि देवी भले ही उन्हें कितनी ही बार चरणों में बुलाएँ, मगर इससे उन्हें लाभ जरूर होगा। हालाँकि इंदिरा देवी के चमत्कार में कितना दम है, अभी तक इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है, मगर फिर भी लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं नजर आती है। आप इसे आस्था का चमत्कार मानते हैं या फिर अंधविश्वास का मायाजाल

पीलिया का अनोखा इलाज

असाध्य बीमारियों के इलाज के लिए लोगों का झाड़-फूँक, टोने-टोटके तथा देवी-देवताओं का सहारा लेना एक आम बात है। आज हम आपको आस्था और अंधविश्वास की कड़ी में एक ऐसी जगह ले चलते हैं, जहाँ पीलिया का इलाज करने का एक अनूठा तरीका अपनाया जाता है।

पीलिया से ग्रस्त मरीजों की भीड़ का यह नजारा किसी डॉक्टर के क्लिनिक का नहीं बल्कि एक मंजीत पाल सलूजा की दुकान का है जो अपनी अनूठी विद्या से पीलिया दूर करने का दावा करते हैं। वे मरीजों के कान पर कागज का कोन बनाकर लगाते हैं और मोमबत्ती के सहारे कागज को जलाते हैं और साथ-साथ गुरुवाणी का उच्चारण करते जाते हैं। मंजीत जी इलाज के पहले गणेशजी की पूजा करना नहीं भूलते। जला हुआ कोन जब कान से हटाया जाता है तो कान के आसपास पीले रंग का पदार्थ इकट्‍ठा हो जाता है। मंजीत पाल के अनुसार यह पीलिया है, जो मरीज के शरीर से बाहर निकलता है।

उपचार हेतु पहले दिन आने वाले मरीज को साथ में हार-फूल, अगरबत्ती और नारियल लाना आवश्यक होता है। साथ ही यहाँ आने वाले लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार यहाँ चढ़ावा रखकर जाते हैं। मंजीत का कहना है कि वे मरीजों को नि:शुल्क सेवा प्रदान करते हैं। चढ़ावा तो मरीजों की श्रद्धा का प्रतीक मात्र है।

यहाँ आने वाले मरीजों को भी डॉक्टरी इलाज से ज्यादा इस विद्या पर अधिक विश्वास है। उनका मानना है कि दवा के साथ दुआ के असर से ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है।

गुरुवाणी का उच्चारण करते हुए मरीजों का इलाज करने वाले मंजीत का कहना है कि हमारे परिवार को इस विद्या का ज्ञान भगवान की देन है। उनके पिता व दादाजी भी इस अनूठी विद्या से लोगों के दर्द को दूर किया करते थे। वे यहाँ आने वाले मरीजों को एक विशेष दवा, जो कि आयुर्वेदिक और होम्योपैथी दवा का मिश्रण होती है, के ड्राप्स भी पिलाते हैं। वे रोजाना करीब 80 से 90 लोगों का इलाज करने का दावा करते हैं। उनका यह भी कहना है कि वे मरीज को केवल देखकर ही यह अनुमान लगा लेते हैं कि पीलिया उतरने में कितना समय लगेगा।

मंजीत पाल सलूजा के अनुसार यहाँ डॉक्टरों द्वारा भेजे गए मरीजों के अलावा कई डॉक्टर्स स्वयं यहाँ आकर खुद को व परिजनों का भी इलाज कराते हैं। पीलिया जैसी असाध्य बीमारी के इलाज हेतु इस तरह की विद्या पर विश्वास करना लोगों के अंधविश्वास को प्रकट करता है या इस विद्या के पीछे किसी वैज्ञानिक तरीका होने का अंदाज लगाया जा सकता है। 

राक्षस को पूजने वाला गाँव

क्या यह संभव है कि राक्षस को ही कुल देवता मानकर उसकी पूजा-अर्चना की जाए? आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं एक ऐसे गाँव, जहाँ के लोग एक राक्षस को अपने कुलदेवता के रूप में पूजते हैं।

महाराष्ट्र स्थित अहमदनगर जिले की पाथर्डी तहसील में 'नांदुर निंबादैत्य'

नामक गाँव में भारत का एकमात्र दैत्य मंदिर है। यहाँ के रहवासी निंबादैत्य की ही आराधना करते हैं। और सबसे खास बात यह है कि इस गाँव में हनुमानजी का एक भी मंदिर नहीं है। पूजा तो दूर यहाँ गलती से भी हनुमानजी का नाम नहीं लिया जाता है।

कहा जाता है कि जब वनवास के दौरान भगवान राम अपनी पत्नी सीता को ढूँढ़ रहे थे। तब केदारेश्‍वर में वाल्मीकि ऋषि से भेंट के लिए जाते समय वे इसी गाँव के जंगल में ठहरे थे। इसी जंगल में रहने वाले निंबादैत्य ने भगवान राम की बहुत सेवा और आराधना की। प्रभु राम ने उसे अपने भक्त के रूप में स्वीकार कर वरदान दिया कि इस गाँव में तुम्हारा ही अस्तित्व रहेगा और यहाँ के लोग हनुमान की पूजा न करते हुए तुम्हें ही अपना कुलदेवता मानकर आराधना करेंगे।
हनुमान नाम का यहाँ इतना प्रकोप है कि गाँव के किसी व्यक्ति का नाम हनुमान या मारुति नही रखा जाता। क्योंकि मारुति भी भगवान हनुमान का दूसरा नाम है। यहाँ तक हनुमान के नाम वाले व्यक्ति का नाम बदलकर ही उसे गाँव में प्रवेश दिया जाता है।

शिक्षक एकनाथ जनार्दन पालवे के मुताबिक दो महीने पूर्व ही लातूर जिले से एक मारुति नाम का मजदूर काम करने गाँव में आया था और दो दिन बाद ही वो श्मशान के निकट विचित्र आवाज निकालकर कूदा-फाँदी करने लगा, तब गाँव के रहवासियों ने उसे दैत्य मंदिर ले जाकर उसका नाम परिवर्तित कर उसे लक्ष्मण नाम दिया और वह आश्चर्यजनक रूप से ठीक भी हो गया।

हालात यह हैं कि यहाँ के लोग एक प्रसिद्ध कंपनी की चार पहिया गाड़ी इस्तेमाल करना भी अपशकुन मानते हैं। गाँव के एक डॉक्टर देशमुख द्वारा इस कंपनी की कार खरीदने के बाद ही कुछ ऐसे हालात बने कि उन्हें एक हफ्ते में ही कार बेचना पडी। एक बार खेत में फँसा गन्ने से भरा ट्रक बड़ी मशक्कत के बाद भी बाहर नहीं निकला तो किसी ने केबिन के अंदर रखे हनुमान के चित्र को निकालने की सलाह दी, ऐसा करने पर ट्रक बड़ी आसानी से बाहर निकल गया।

इस गाँव के अधिकांश लोग रोजी-रोटी के लिए बाहर के शहरों में काम करते हैं परंतु निंबादैत्य की यात्रा के समय सभी लोग अपने गाँव जरूर लौटते हैं। पुलिस आरक्षक अविनाश गर्जे के मुताबिक यात्रा के समय विषम परिस्थितियाँ होने के बावजूद भी कोई चमत्कार भक्तों को गाँव तक खींच ही लाता है।

ये मंदिर हेमाडपंथी है और गाँव की एकमात्र दोमंजिला इमारत है। निंबादैत्य के सम्मान में यहाँ के ‍रहवासी दुमंजिला इमारतों का निर्माण नहीं करते हैं। इस मंदिर के सामने करीब 500 वर्ष पुराना बरगद का पेड़ है। दैत्य के प्रति लोगों की आस्था का यह आलम है कि यहाँ के हर मकान, दुकान और वाहनों पर भी 'निंबादैत्य कृपा' लिखा हुआ नजर आता है।

कोई राक्षस किसी का कुलदेवता हो सकता है यह बात आश्चर्यजनक जरूर है मगर है सच्ची... आप इसे मानें या न मानें। यदि आप भी किसी ऐसी ही घटना के बारे में जानते हैं तो हमे अवश्य लिखें।

रामायण पाठ से हुआ कायापलट

आस्था और अंधविश्‍वास की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं एक ऐसे गाँव, जहाँ का हर ग्रामीण रामधुन में डूब गया है। तिवड़िया ग्राम के ग्रामीणों का मानना है कि यह राम नाम और कथा का ही चमत्कार है कि हमारे गाँव का कायापलट हो गया है।

14 वर्ष पूर्व यह गाँव बीमारी, सूखे और अकाल की चपेट में था, लेकिन जबसे सिद्ध भोलेनाथ हनुमान मंदिर में अखंड रामायण पाठ का सिलसिला शुरू किया गया है, तब से गाँव सभी तरह की आपदाओं से मुक्त हो चुका है। यहाँ पर अखंड रामायण पाठ के अलावा घी की अखंड ज्योत भी जलती रहती है।

बच्चों और बूढ़ों ने रेवाशंकर तिवारी के साथ मिलकर शुरू किया था अखंड रामायण पाठ, लेकिन आज गाँव का हर आदमी इससे जुड़ गया है। क्या बच्चे और क्या बूढ़े, गाँव के प्रत्येक व्यक्ति का अब यह दायित्व हो चला है कि रामायण पाठ जारी रहे। ऐसी भी मान्यता है कि यदि यह पाठ रोका गया तो गाँव के बुरे दिन फिर से शुरू हो जाएँगे, इसीलिए गाँव का हर व्यक्ति बारी-बारी से रामायण पाठ के लिए आता है।

रामायण पाठ के आयोजक और मंदिर के पुजारी धर्मेंद्र व्यास ने बताया कि इस अखंड पाठ के आयोजन की प्रेरणा 14 वर्ष पूर्व रेवाशंकर तिवारी ने दी थी। तब से ही यह अखंड पाठ चल रहा है। जबसे यह पाठ शुरू हुआ है गाँव में खुशहाली लौट आई है। पहले इस गाँव का भू-जलस्तर 300 फुट नीचे हुआ करता था, लेकिन अब यहाँ 30 से 40 फुट पर ही पानी निकल आता है। कई जगह तो पाँच फुट पर ही पानी है।

गाँव के ही एक ग्रामीण ने बताया कि जबसे यह रामायण पाठ शुरू हुआ है, ग्रामीणों में चेतना आ गई है। हर कोई अब जागरूक है और सभी ओर खुशहाली है। यहाँ की खास बात यह है कि किसी भी प्रकार की अनहोनी नहीं होती।

व्यास ने ही हमें एक चमत्कारी घटना का जिक्र करते हुए कहा कि नवरात्रि के दौरान एक बार रमेश तिवारी और गोविंद पवार कुछ लोगों के साथ पाठ कर रहे थे तभी अचानक आसमान से सभी के ऊपर बिजली गिर गई और पूरी छत पर करंट फैल गया, लेकिन चमत्कार ही था कि किसी को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं हुई।

धर्मेंद्र व्यास ने ही बताया कि मानसिक संतुलन खो चुके गोरेलाल पवार इस रामायण पाठ की बदौलत ही अब अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं और यहाँ यह भी देखने में आया है कि जो कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ थे, वे भी रामायण पाठ पढ़ने लगे हैं।

कैसे पहुँचें : देवास तहसील में इंदौर से 140 किलोमीटर दूर स्थित खातेगाँव से कुछ ही दूरी पर है ग्राम तिवडि़या। आप सड़क मार्ग से यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।

साँप का जहर उतारें फोन पर

वर्दी वाले बाबा यशवंत भागवत का दावा...
 
न धुआँ, न भभूत, न बड़े-बड़े बोल और न ही भगवा चोला। किस्से-कहानियों और किंवदंतियों को खंगालने की हमारी इस कोशिश में इस बार हम आपको मिलवा रहे हैं एक ऐसी शख्सियत से, जिसका दावा है कि वह साँप-बिच्छू का जहर अपनी मंत्रशक्ति से उतार सकता है, वह भी सिर्फ फोन पर।

यह बात पढ़कर आप चौंक गए न। हम भी इसी तरह चौंके थे। क्या ऐसा हो सकता है? क्या यह सच है? कोरी बकवास लगती है। ऐसे ही कई विचार हमारे दिमाग में भी घुमड़ने लगे थे। फिर क्या था, हमने शुरू किया सफर इस दावे की तह तक पहुँचने का। सफर की शुरुआत हुई इंदौर की रामबाग कॉलोनी से। यहाँ पहुँचकर हमने जहर उतारने वाले बाबा के बारे में जानकारी जानना चाही। जहर उतारने वाले बाबा। यह सुन पंक्चर बनाने वाला मुन्नू हँसने लगा और हमें रास्ता दिखाते हुए पुलिस क्वार्टर्स तक ले गया।

पुलिस क्वार्टर!! और जहर उतारने वाला बाबा, बात कुछ जँची नहीं। हमें लगा कि मुन्नू महाशय हमें 'मामा' बना रहे हैं। हमने पास से गुजरने वाले एक आरक्षक से यही बात पूछी। उन्होंने बताया, जी हाँ, यहीं तो हेड साहब रहते हैं। फिर बातों ही बातों में पता चला कि यशवंत भागवत नामक यह व्यक्ति पुलिस महकमे में हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत हैं और पिछले 25 सालों से फोन पर साँप का जहर उतारते हैं।

 भागवतजी ने बताया पहले वे मरीज से रूबरू होने पर ही उसका जहर उतार सकते थे, लेकिन बाद में मंत्रों में कुछ शब्दों का हेरफेर कर फोन पर ही जहर उतार लेने की विधि ईजाद कर ली। इस बात की जानकारी फैलते ही यशवंत भागवत का फोन लगातार घनघनाने लगा।

अपने हुनर की खासियत बताते हुए श्री भागवत कहते हैं कि वे पीड़ित व्यक्ति से उसका, उसकी माँ का नाम और उसके रहने का पता पूछते हैं। फिर मंत्रोच्चार द्वारा जहर उतारने की अनूठी विद्या शुरू करते हैं। जब उन्हें लगता है कि जहर पूरी तरह से उतर चुका है तो वे मरीज को नारियल फोड़ने के लिए कहते हैं। इसके बाद मरीज को नमक चटाया जाता है। यदि मरीज को नमक का स्वाद खारा लगता है तो जहर उतरा माना जाता है।

इस विद्या के बारे में जानकारी मिलने के बाद हमने तलाशना शुरू किया ऐसे व्यक्ति को, जिसका यशवंतजी ने इलाज किया हो। इस तलाश के दौरान हमारी मुलाकात हुई सरमन गोयल से। पेशे से अध्यापक सरमनजी ने बताया कि मुझे ऐसी बातों पर कतई विश्वास न था। एक सुबह झाड़ू लगाते हुए मुझे साँप ने काट लिया। मैं दौड़ा-दौड़ा भागवतजी के पास गया। उन्होंने मंत्र फूंका और कुछ ही देर में जहर की जलन शांत हो गई। मैं आज भला-चंगा हूँ तो भागवतजी की कृपा से।

सरमनजी अकेले नहीं, ऐसे सैकड़ों पीड़ित लोग हैं, जिनका विश्वास है कि भागवतजी अपनी मंत्र-शक्तियों के जरिए सर्पदंश का इलाज कर देते हैं। यमराज के लेखपाल चित्रगुप्त की तरह भागवतजी ने भी अपने द्वारा इलाज किए लोगों का लेखा-जोखा अपने रजिस्टर में लिख रखा है। इस लेखे-जोखे से तीन रजिस्टर भर चुके हैं। भागवतजी हर काम ऊपर वाले के नाम पर करते हैं, इसलिए वे एक पैसा लेना भी पाप समझते हैं। वे कहते हैं मैं कुछ नहीं करता, करने वाले तो साँई-राम हैं।

यशवंत भागवत से जुड़ा एक किस्सा बताते हैं राजस्थान के जमील साहब। जमीलजी की एसटीडी-पीसीओ की दुकान है। एक बार उन्हें अपने दोस्त से भागवतजी का नंबर मिला। इन्होंने आजमाने के लिए एक सर्पदंश से पीड़ित महिला का इलाज फोन द्वारा भागवतजी से करवाया। यहाँ भागवतजी ने मंत्र पढ़े, वहाँ पीड़िता का दर्द गायब हो गया। नागपंचमी के दिन जन्मे यशवंतजी यूँ तो बवासीर, साइटिका, पीलिया जैसी बीमारियों का इलाज भी करते हैं, लेकिन उनकी पहचान साँप का जहर उतारने वाले के रूप में ज्यादा है।

यशवंतजी की इस अनूठी विद्या को मानने वालों में आम लोगों के साथ-साथ पुलिस महकमा भी शामिल है। पुलिस महकमे में रिजर्व इंस्पेक्टर के पद पर आसीन प्रदीपसिंह चौहान भी अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि मेरे सरकारी आवास और ऑफिस दोनों में ही लगातार साँप दिखाई दिया करते थे। घर, आफिस में लोग खासे भयभीत होने लगे थे। तब किसी ने मुझे भागवतजी के बारे में बताया। उनके अनुष्ठान करने के बाद इनके घर और आफिस में साँप दिखाई देना बंद हो गए हैं।

एक तरफ भागवतजी की विद्या का सम्मान करने वाले बहुत लोग हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस विद्या को पूरी तरह से नकारते हैं। इन्हीं लोगों में शामिल हैं महाराजा यशवंतराव अस्पताल के मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अशोक वाजपेई। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर वाजपेई कहते हैं कि “ हमारे देश में 70 प्रतिशत साँपों में जहर होता ही नहीं है। कई लोगों की मौत की वजह जहर नहीं, बल्कि साँप के काटने का भय होता है। इस किस्से में भी ऐसा ही हो सकता है। हो सकता है कि जिस साँप ने काटा हो, वो जहरीला ही न हो या फिर काँटा चुभने पर भी महसूस हो कि साँप ने काटा है। मेरा मानना है कि साँप काटने के बाद उसका इलाज करवाना चाहिए, न कि इस तरह की झाड़-फूँक।”

जहाँ कई लोग डॉक्टर साहब की हिदायत को मानते हैं, वहीं अनेक ऐसे भी हैं, जो इसे नकारते हैं। इनमें से कुछ का दावा है कि भागवतजी उन्हें मौत से लौटाकर लाए हैं। अब ये वर्दी वाले बाबा तो यही कहते हैं कि 0731-2535534 पर फोन लगाइए और क्या सही है, क्या गलत है, खुद जान जाइए।

साँई बाबा की सवारी

आपने साँई बाबा के अनेकों चमत्कार देखें या सुने होंगे लेकिन क्या कभी ऐसा सुना कि साँई बाबा किसी के शरीर में आकर लोगों के दुख दूर करते हों। नहीं न। अब तक आपने सुना है कि माता या भेरू बाबा ही शरीर में आते हैं, लेकिन यह कम ही सुनने में आया है कि साँई बाबा किसी के शरीर में आकर लोगों की समस्या का समाधान करते हों और वह भी एक महिला के शरीर में।

'आस्था या अंधविश्वास' की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं देवास के साँई मंदिर में, जहाँ एक महिला के शरीर में साँई बाबा की सवारी आती है। यह सच है या नहीं, यह तो हमें नहीं मालूम, लेकिन कई लोग अपनी समस्या के समाधान के लिए बाबा के दरबार में हाजिर होते हैं।

साँई मंदिर की पुजारिन इंदुमति की बहू आशा तुरकणे विगत 15 वर्षों से बाबा के माध्यम से भक्तों की समस्या का समाधान कर रही हैं। प्रत्येक गुरुवार की रात को जब आशाजी के शरीर में साँई बाबा आते हैं तब उनकी आवाज पुरुषों जैसी हो जाती है। इस दौरान वे सिगरेट पीने और पुरुषों जैसा व्यवहार करने लगती हैं। तब भक्त उनकी बात बड़े ध्यान से सुनते हैं।

संगीतमय वातावरण के बीच बड़ी संख्या में यहाँ साँई के भक्तों की भीड़ उमड़ती है। यहाँ आए एक भक्त रघुवीर प्रसाद ने कहा कि मेरा बाबा में अटूट विश्वास है। बाबा की जो जिस रूप में आराधना करता है, बाबा उसके दु:ख दूर करते हैं। मालिक तो सबका एक ही है और जो भी यहाँ भक्तिभाव से आता है, उसकी मन्नत पूरी होती है। बाबा में अनन्य भक्ति होना जरूरी है। मैं 2005 में एक बार साइकिल से बाबा के दरबार में जा चुका हूँ। बाबा का बड़ा चमत्कार है।

एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि यह तो एक प्रकार का सत्य ही है कि लोगों को यहाँ कुछ मिलता होगा, तभी तो इतने लोग आते हैं। बाबा के मंदिर में आने से ही शांति मिलती है। लोगों का इसमें विश्वास है।
वैज्ञानिक युग में जहाँ इस तरह की बातों को अंधविश्वास से अधिक कुछ नहीं माना जाता, वहीं यहाँ आने वाले लोगों का कहना है कि साँई भावना के भूखे हैं। भक्त उन्हें किसी भी रूप में भजे, वे हाजिर हो जाते हैं।

साँई बाबा ने भाईचारा, साम्प्रदायिक सद्भाव और मानव सेवा के लिए महान कार्य कर लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था कि किस तरह श्रद्धा और सबुरी के साथ जीवन के दु:खों से निपटा जा सकता है इसके लिए मालिक पर विश्वास के अलावा किसी और के दर पर जाने की आवश्यकता नहीं लेकिन क्या वाकई किसी के शरीर में कोई देवी-देवता या साँई बाबा आ सकते हैं या यह महज अंधविश्वास है, फैसला आपको करना है...। आप हमें अपनी राय से जरूर अवगत कराएँ।

कैसे पहुँचे : इंदौर से 35 किलोमिटर दूर उत्तर में स्थित है देवास; जहाँ ट्रेन या बस द्वारा जाया जा सकता है।

शर्तिया बेटा ही होगा...

आज के आधुनिक युग में जब लड़कियाँ हर कदम पर खुद को लड़कों से बेहतर साबित कर रही हैं, तब भी अनेक ऐसे परिवार हैं जो लड़के की चाह रखते हैं। घर के चिराग की चाहत में ये लोग कन्या भ्रूण हत्या से लेकर, तथाकथित बाबाओं और फर्जी डॉक्टरों के चक्कर में फँस जाते हैं। आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हमारा मुद्दा भी यही है।

इस कड़ी में हम आपकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करवा रहे हैं जो दावा करता है कि उसकी दवाई का सेवन करने के बाद शर्तिया लड़का ही होगा। जी हाँ, पवन कुमार अजमेरा नामक यह शख्स पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर है और दावा करता है कि यह कोख में ही बच्चे का लिंग निर्धारण कर सकता है।

इंदौर के गाँधीनगर में इस व्यक्ति का क्लिनिक है जहाँ की दीवारों पर शर्तिया लड़का पैदा करवाने के दावे लिखे हुए हैं। शर्तिया लड़का पैदा करवाने का दावा करने वाले इन महाशय का यह भी कहना है कि उनकी दवाई उसी महिला पर असर करेगी जिसकी पहले से एक बेटी हो और उनके पास इलाज के लिए आते समय इस बात का प्रमाण साथ लाना भी बेहद जरूरी है।

बड़े-बड़े दावों के बीच पवन कुमार का यह कहना है कि वे अभी तक तीन सौ महिलाओं की गोद में लड़के डाल चुके हैं। उनके द्वारा दी गई दवाइयों को गाय के दूध के साथ सेवन करने पर महिला को शर्तिया बेटा ही होगा। अब हमारे समाज में जहाँ बेटे को ही घर का चिराग समझा जाता है वहाँ इस तरह के दावों पर विश्वास करने वाले लोगों की कमी नहीं है।

इसलिए इन महाशय का धंधा भी खूब चमक रहा है। क्लिनिक पर चक्कर लगाने वाले लोगों में से कुछ दावा करते हैं कि पवन कुमार की दी गई दवाइयों के सेवन से ही उन्हें लड़का हुआ है। इन्हीं में से एक मोहनी उपाध्याय का कहना है कि मुझे एक बिटिया है, मैं दूसरा बेटा चाहती थी। मुझे इस क्लिनिक का पता चला तो यहाँ आ गई। डॉक्टर साहब की दवाई के बाद ही मुझे बेटा हुआ है।

पवन कुमार जैसे लोग कितने भी दावे कर लें लेकिन असली डॉक्टर इन दावों को सिरे से नकारते हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मुकेश बिड़ला ने वेबदुनिया को बताया कि ऐसे दावे लोगों को मूर्ख बनाने के सिवा और कुछ नहीं। विज्ञान के नजरिए से देखें तो अभी तक कोख में लिंग निर्धारण संभव ही नहीं है।
असली डॉक्टरों के नकारने के बाद भी इन आयुर्वेदाचार्य का धंधा खूब चमक रहा है। बेटे की चाहत में ग्रसित लोग इनके दरवाजे के चक्कर काटते रहते हैं।

लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि पूरे देश में जहाँ लड़कियों की जन्मदर तेजी से गिरती जा रही है और सरकार की तरफ से जन्मपूर्व लिंग परीक्षण को गैरकानूनी करार दिया जा चुका है, वहीं मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी माने जाने वाले इंदौर में शर्तिया लड़के पैदा करवाने का यह गोरखधंधा क्लिनिक के नाम पर बेरोकटोक चल रहा है और प्रशासन आँखें मूँदे बैठा है।

शिवाबाबा का प्रसिद्ध मेला

सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच घने जंगल में हर साल वसंत पंचमी से पूर्णिमा तक लगने वाला शिवाबाबा का मेला वैसे तो दिखने में एक आम ग्रामीण मेले की तरह ही है। कैसेट-सीडी, खेल-खिलौने, मिठाइयाँ, कपड़े, बर्तनों से सजी दुकानें, खरीदारी करते लोग, परंतु इन सबके अलावा भी ऐसा कुछ है यहाँ, जो खास बनाता है इस मेले को इस पूरे क्षेत्र में। जी हाँ, शिवाबाबा के मेले में लोग आते हैं मन्नतें लेकर और जब मन्नत पूरी होती है तो भेंट में चढ़ाते हैं बकरे। कोई एक तो कोई दो तो कोई पाँच-पाँच बकरे अपनी मुराद पूरी होने के बाद शिवाबाबा को चढ़ाते हैं।

शिवाबाबा के बारे में मान्यता है कि वे एक संत थे, जिनके चमत्कारों की प्रसिद्धि इस इलाके के हर एक शख्स की जबान पर है। यहाँ शिवाबाबा को भगवान शिव का अवतार मानकर पूजा की जाती है। मंदिर के पास एक बाबा जोगीनाथ का कहना है कि यह बहुत ही अद्भुत दरबार है। देर की तो बात ही नहीं, बस इधर माँगो और उधर इच्छा पूरी हो जाती है।

मन्नत पूरी होने पर लोग अपने परिजनों और दोस्तों के साथ मेले में पहुँचते हैं और फिर सजे-धजे बकरे की पूजा कर पूरे जोर-शोर से शिवाबाबा के मंदिर की ओर ले जाया जाता है। शिवाबाबा के मंदिर में स्थित देवी की प्रतिमा के सामने पुजारी बकरे पर जल छिड़ककर उसे देवता को अर्पित कर देता है।

यहाँ लाए जाने वाले ज्यादातर बकरों की बलि दी जाती है, जबकि कुछ अन्य को जंगल में छोड़ दिया जाता है। पहले बलि मंदिर के सामने स्थित चहारदीवारी में दी जाती थी, लेकिन अब यहाँ बलि देने की मनाही है अत: अब बकरे की बलि लोग अपने ठहरने के स्थान पर जाकर देते हैं। बलि के बाद बकरे के माँस को शिवाबाबा का प्रसाद मानकर मिल-बाँटकर खाया जाता है। प्रसाद को लोग मेला क्षेत्र से बाहर या अपने घर नहीं ले जा सकते। बचने पर प्रसाद को वहीं गरीबों में बाँट दिया जाता है।

मेले में आए एक कसाई से जब हमने बात की तो उसने बताया कि हर साल सम्पूर्ण मेला अवधि में करीब दो लाख बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। उसने यह भी बताया कि उस दिन सुबह से लेकर दोपहर तीन बजे तक करीब पाँच हजार बकरों की बलि दी जा चुकी है।

कहते हैं कि शिवाबाबा की कृपा से मेले के दौरान इस इलाके में मक्खियाँ और चीटियाँ नहीं होती हैं। हमने इस तथ्य की जाँच-परख की। हमने पूरा मेला क्षेत्र देखा, बकरों के कटने के स्थान देखे, मिठाइयों की दुकानें देखीं परंतु वाकई हमें एक भी मक्खी दिखाई नहीं दी। यह एक बहस के विषय हो सकता है कि क्या बकरे की बलि देने से कोई देवता प्रसन्न हो सकता है?

महाभारत - द्रौपदी स्वयंवर

स्वयंवर सभा में अनेक देशों के राजा-महाराजा एवं राजकुमार पधारे हुये थे। एक ओर श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम तथा गणमान्य यदुवंशियों के साथ विराजमान थे। वहाँ वे ब्राह्मणों की पंक्ति में जा कर बैठ गये। कुछ ही देर में राजकुमारी द्रौपदी हाथ में वरमाला लिये अपने भाई धृष्टद्युम्न के साथ उस सभा में पहुँचीं। धृष्टद्युम्न ने सभा को सम्बोधित करते हुये कहा, "हे विभिन्न देश से पधारे राजा-महाराजाओं एवं अन्य गणमान्य जनों! इस मण्डप में बने स्तम्भ के ऊपर बने हुये उस घूमते हुये यंत्र पर ध्यान दीजिये। उस यन्त्र में एक मछली लटकी हुई है तथा यंत्र के साथ घूम रही है। आपको स्तम्भ के नीचे रखे हुये तैलपात्र में मछली के प्रतिबिम्ब को देखते हुये बाण चला कर मछली की आँख को निशाना बनाना है। मछली की आँख में सफल निशाना लगाने वाले से मेरी बहन द्रौपदी का विवाह होगा।"

एक के बाद एक सभी राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने मछली पर निशाना साधने का प्रयास किया किन्तु सफलता हाथ न लगी और वे कान्तिहीन होकर अपने स्थान में लौट आये। इन असफल लोगों में जरासंघ, शल्य, शिशुपाल तथा दुर्योधन दुःशासन आदि कौरव भी सम्मिलित थे। कौरवों के असफल होने पर दुर्योधन के परम मित्र कर्ण ने मछली को निशाना बनाने के लिये धनुष उठाया किन्तु उन्हें देख कर द्रौपदी बोल उठीं, "यह सूतपुत्र है इसलिये मैं इसका वरण नहीं कर सकती।" द्रौपदी के वचनों को सुन कर कर्ण ने लज्जित हो कर धनुष बाण रख दिया। उसके पश्चात् ब्राह्मणों की पंक्ति से उठ कर अर्जुन ने निशाना लगाने के लिये धनुष उठा लिया। एक ब्राह्मण को राजकुमारी के स्वयंवर के लिये उद्यत देख वहाँ उपस्थित जनों को अत्यन्त आश्चर्य हुआ किन्तु ब्राह्मणों के क्षत्रियों से अधिक श्रेष्ठ होने के कारण से उन्हें कोई रोक न सका। अर्जुन ने तैलपात्र में मछली के प्रतिबिम्ब को देखते हुये एक ही बाण से मछली की आँख को भेद दिया। द्रौपदी ने आगे बढ़ कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल दिया।

एक ब्राह्मण के गले में द्रौपदी को वरमाला डालते देख समस्त क्षत्रिय राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने क्रोधित हो कर अर्जुन पर आक्रमण कर दिया। अर्जुन की सहायता के लिये शेष पाण्डव भी आ गये और पाण्डवों तथा क्षत्रिय राजाओं में घमासान युद्ध होने लगा। श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले ही पहचान लिया था, इसलिये उन्होंने बीच बचाव करके युद्ध को शान्त करा दिया। दुर्योधन ने भी अनुमान लगा लिया कि निशाना लगाने वाला अर्जुन ही रहा होगा और उसका साथ देने वाले शेष पाण्डव रहे होंगे। वारणावत के लाक्षागृह से पाण्डवों के बच निकलने पर उसे अत्यन्त आश्चर्य होने लगा।

पाण्डव द्रौपदी को साथ ले कर वहाँ पहुँचे जहाँ वे अपनी माता कुन्ती के साथ निवास कर रहे थे। द्वार से ही अर्जुन ने पुकार कर अपनी माता से कहा, "माते! आज हम लोग आपके लिये एक अद्भुत् भिक्षा ले कर आये हैं।" उस पर कुन्ती ने भीतर से ही कहा, "पुत्रों! तुम लोग आपस में मिल-बाँट उसका उपभोग कर लो।" बाद में यह ज्ञात होने पर कि भिक्षा वधू के रूप में हैं, कुन्ती को अत्यन्त पश्चाताप हुआ किन्तु माता के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिये कुन्ती ने पाँचों पाण्डवों को पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

रामायण – सुन्दरकाण्ड - जानकी राक्षसी घेरे में

रावण के चले जाने के पश्चात् राक्षसनियों ने सीता को चारों ओर से घेर लिया और वे उन्हें अनेक प्रकार से डराने धमकाने लगीं। एक ने उसकी भर्त्सना करते हुये कहा, "हे मूर्ख अभागिन! तीनों लोकों और चौदह भुवनों को अपने पराक्रम से पराजित करने वाले परम तेजस्वी राक्षसराज की शैया प्रत्येक को नहीं मिलती। बड़ी-बड़ी देवकन्याएँ इसके लिये तरसती हैं। यह तो तुम्हारा परम सौभाग्य है कि स्वयं लंकापति तुम्हें अपनी अंकशायिनी बनाना चाहते हैं। तनिक विचार कर देखो, कहाँ अगाध ऐश्वर्य, स्वर्णपुरी तथा अतुल सम्पत्ति का एकछत्र स्वामी और कहाँ वह राज्य से निकाला हुआ, कंगालों की भाँति वन-वन में भटकने वाला, हतभाग्य साधारण सा मनुष्य! क्या तुम इन दोनों के बीच का महान अन्तर नहीं देखती। सोच-समझ कर निर्णय करो और महाप्रतापी लंकाधिपति रावण को पति के रूप में स्वीकार करो। उसकी अर्द्धांगिनी बनने में ही तुम्हारा कल्याण है। अन्यथा राम के वियोग में तड़प-तड़प कर मरोगी या राक्षसराज के हाथों मारी जाओगी। तुम्हारा यह कोमल शरीर इस प्रकार नष्ट होने के लिये नहीं है। महाराज रावण के साथ विलास भवन में जा कर अठखेलियाँ करो। मद्यपान कर के रमण करो। महाराज तुम्हें इतना विलासमय सुख देंगे जिसकी तुमने उस कंगाल वनवासी के साथ रहते कल्पना भी नहीं की होगी। यदि तुम हमारी बात नहीं मानोगी तो कुत्ते के मौत मारी जाओगी।"

इन कठोर वचनों से दुःखी हो कर सीता नेत्रों में आँसू भर कर बोली, "हे राक्षसनियों! तुम क्यों ऐसे दुर्वचन कह कर मुझ वियोगिनी की पीड़ा को और बढ़ाती हो? तुम नारी हो कर भी यह नहीं समझती कि तुम्हारी बात मानने से इस लोक में निन्दा और परलोक में नृशंस यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। माना कि तुम्हारी और मेरी संस्कृति तथा संस्कार भिन्न हैं, फिर भी नारी की मूल भावनाएँ तो एक जैसी होती हैं। हृदय एक बार जिसका हो जाता है, वह वस्त्रों की भाँति प्रिय पात्र का बार-बार परिवर्तन नहीं करता। फिर मेरी संस्कृति में तो पति ही पत्नी का सर्वस्व होता है। मैंने धर्मात्मा दशरथनन्दन श्री राम को पति के रूप में वरण किया है, मैं उनका परित्याग कैसे कर सकती हूँ? मेरे लिये मेरा कंगाल पति ही मेरा परमेश्वर है। उन्हें छोड़ कर मैं किसी अन्य की नहीं हो सकती, चाहे वह लंका का राजा हो, तीनों लोकों का स्वामी हो या अखिल ब्रह्माण्ड का एकछत्र सम्राट हो। याद रखो, मैं किसी भी दशा में उन्हें छोड़ कर किसी अन्य का चिन्तन नहीं कर सकती।"

सीता के इन वचनों से चिढ़ कर वे राक्षसनियाँ सीता को दुर्वचन कहती हुई अने प्रकार से कष्ट देने लगीं। विदेह नन्दिनी की यह दुर्दशा पवनपुत्र वृक्ष पर बैठे हुये बड़े दुःख के साथ देख रहे थे। और सोच रहे थे कि किस प्रकार जानकी जी से मिल कर उन्हें धैर्य बँधाऊँ। साथ ही वे परमात्मा से प्रार्थना भी करते जाते थे, "हे प्रभो! सीता जी की इन दुष्टों से रक्षा करो।" उधर सीता जब उन दुर्वचनों को न सह सकी तो वह वहाँ से उठ कर इधर उधर भ्रमण करने लगी और भ्रमण करती हुई उसी वृक्ष के नीचे आ कर खड़ी हो गई जिस पर हनुमान बैठे थे। उस वृक्ष की एक शाखा को पकड़ कर उसके सहारे खड़ी हो अश्रुविमोचन करने लगी। फिर सहसा वे उच्च स्वर में मृत्यु का आह्वान करती हुई कहने लगी, "हे भगवान! अब यह विपत्ति नहीं सही जाती। प्रभो! मुझे इस विपत्ति से छुटकारा दिलाओ, या मुझे इस पृथ्वी से उठा लो। बड़े लोगों ने सच कहा है कि समय से पहले मृत्यु भी नहीं आती। आज मेरी कैसी दयनीय दशा हो गई है। कहाँ अयोध्या का वह राजप्रासाद जहाँ मैं अपने परिजनों तथा पति के साथ अलौकिक सुख भोगती थे और कहाँ यह दुर्दिन जब मैं पति से विमुक्त छल द्वारा हरी गई इन राक्षसों के फंदों में फँस कर निरीह हिरणी की भाँति दुःखी हो रही हूँ। आज अपने प्राणेश्वर के बिना मैं जल से निकाली गई मछली की भाँति तड़प रही हूँ। इतनी भायंकर वेदना सह कर भी मेरे प्राण नहीं निकल रहे हैं। आश्चर्य यह है कि मर्मान्तक पीड़ा सह कर भी मेरा हृदय टुकड़े-टुकड़े नहीं हो गया। मुझ जैसी अभागिनी कौन होगी जो अपने प्राणाधिक प्रियतम से बिछुड़ कर भी अपने प्राणों को सँजोये बैठी है। अभी न जाने कौन-कौन से दुःख मेरे भाग्य में लिखे हैं। न जाने वह दुष्ट रावण मेरी कैसी दुर्गति करेगा। चाहे कुछ भी हो, मैं उस महापातकी को अपने बायें पैर से भी स्पर्श न करूँगी, उसके इंगित पर आत्म समर्पण करना तो दूर की बात है। यह मेरा दुर्भाग्य ही है किस एक परमप्रतापी वीर की भार्या हो कर भी दुष्ट रावण के हाथों सताई जा रही हूँ और वे मेरी रक्षा करने के लिये अभी तक यहाँ नहीं पहुँचे। मेरा तो भाग्य ही उल्टा चल रहा है। यदि परोपकारी जटायुराज इस नीच के हाथों न मारे जाते तो वे अवश्य राघव को मेरा पता बता देते और वे आ कर रावण का विनाश करके मुझे इस भयानक यातना से मुक्ति दिलाते। परन्तु मेरा मन कह रहा है दि दुश्चरित्र रावण के पापों का घड़ा भरने वाला है। अब उसका अन्त अधिक दूर नहीं है। वह अवश्य ही मेरे पति के हाथों मारा जायेगा। उनके तीक्ष्ण बाण लंका को लम्पट राक्षसों के आधिपत्य से मुक्त करके अवश्य मेरा उद्धार करेंगे। किन्तु उनकी प्रतीक्षा करते-करते मुझे इतने दिन हो गये और वे अभी तक नहीं आये। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उन्होंने मुझे मरा हुआ समझ लिया हो और इसलिये अब वे मेरी खोज खबर ही न ले रहे हों। यह भी तो हो सकता है कि दुष्ट मायावी रावण ने जिस प्रकार छल से मेरा हरण किया, उसी प्रकार उसने छल से उन दोनों भाइयों का वध कर डाला हो। उस दुष्ट के लिये कोई भी नीच कार्य अकरणीय नहीं है। दोनों दशाओं में मेरे जीवित रहने का प्रयोजन नहीं है। यदि उन्होंने मुझे मरा हुआ समझ लिया है या इस दुष्ट ने उन दोनों का वध कर दिया है तो भी मेरा और उनका मिलन जअब असम्भव हो गया है। जब मैं अपने प्राणेश्वर से नहीं मिल सकती तो मेरा जीवित रहना व्यर्थ है। मैं अभी इसी समय अपने प्राणों का उत्सर्ग करूँगी।"

सीता के इन निराशा भरे वचनों को सुन कर पवनपुत्र हनुमान अपने मन में विचार करने लगे कि अब इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि यह ही जनकनन्दिनी जानकी हैं जो अपने पति के वियोग में व्यकुल हो रही हैं। यही वह समय है, जब इन्हें धैर्य की सबसे अधिक आवश्यकता है।

05 अप्रैल 2010

मुहूर्त : क्या है इसकी उपयोगिता

एक पौराणिक कथा के अनुसार माना जाता है कि पांच पांडवों में सहदेव मुहूर्त शास्त्र के ज्ञाता थे। महाभारत के युद्ध से पहले स्वयं दुर्योधन महाराज धृतराष्ट्र के कहने पर युद्ध में कौरवों की विजय हेतु शुभ मुहूर्त निकलवाने सहदेव के पास गए और सहदेव ने उन्हें शुभ मुहूर्त बताया। इस बात का पता जब भगवान कृष्ण को चला तब उन्होंने इस मुहूर्त को टालने हेतु व पांडवों की विजय के मुहूर्त हेतु अर्जुन को मोह से मुक्त करने के लिए उपदेश दिया था। इन सारे तथ्यों का उल्लेख श्रीमद्भगवत गीता में मिलता है।

अथर्ववेद में शुभ मुहूर्त में कार्य आरंभ करने का निर्देश है ताकि मानव जीवन के सभी पक्षों पर शुभता का अधिकाधिक प्रभाव पड़ सके। आचार्य वराहमिहिर भी इसकी अनुशंसा करते हैं।

मुहूर्त के संदर्भ में रामचरितमानस में एक स्थान पर उल्लेख है कि युद्ध के पश्चात्‌ जब रावण मरणासन्न अवस्था में था तब श्रीराम ने लक्ष्मण को उससे तिथि व मुहूर्त ज्ञान की शिक्षा लेने भेजा था। इस कथा से भी मुहूर्त अर्थात शुभ पल के महत्व का पता चलता है। मुहूर्त का विचार आदि काल से ही होता आया है। हमारे शास्त्रों में भी ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं जिनसे इस तथ्य का पता चलता है। श्रीकृष्ण का कंस के वध हेतु उचित समय की प्रतीक्षा करना आदि इस तथ्य को पुष्ट करते हैं। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी वैज्ञानिक किसी परीक्षण हेतु उचित समय का इंतजार करते हैं। राजनेता चुनाव के समय नामांकन के लिए मुहूर्त निकलवाते हैं। इन सारे तथ्यों से मुहूर्त की उपयोगिता का पता चलता है।

यहां एक तथ्य स्पष्ट कर देना उचित है कि लग्न की शुद्धि अति महत्वपूर्ण और आवश्यक है। इससे कार्य की सफलता की संभावना १००० गुणा बढ़ जाती है।

मुहूर्त विचार में तिथियों, नक्षत्रों, वारों आदि के फलों का मात्रावार विवरण सारणी में प्रस्तुत है।

अक्सर प्रश्न पूछा जाता है कि क्या शुभ मुहर्त में कार्यारंभ कर भाग्य बदला जा सकता है? यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ऐसा संभव नहीं है। हम जानते हैं कि गुरु वशिष्ठ ने भगवान राम के राजतिलक के लिए शुभ मुहूर्त का चयन किया था, किंतु उनका राजतिलक नहीं हो पाया। तात्पर्य यह कि मनुष्य सिर्फ कर्म कर सकता है। सही समय पर कर्म करना या होना भी भाग्य की ही बात है। कार्य आरंभ हेतु मुहूर्त विश्लेषण आवश्यक जरूर है परंतु इसी पर निर्भर रहना गलत है। यदि किसी व्यक्ति को शल्य चिकित्सा करानी पड़े तो वह मुहूर्त का इंतजार नहीं करेगा क्योंकि मुहूर्त से ज्यादा उसे अपनी जान व धन इत्यादि की चिंताएं लगी रहेंगी। परंतु मुहूर्त के अनुसार कार्य करने से हानि की संभावना को तो कम किया ही जा सकता है।

तिथि फल      -      एक गुणा

नक्षत्र फल      -     चार गुणा

वार फल        -     आठ गुणा

करण फल     -     सोलह गुणा

योग फल       -     बत्तीस गुणा

तारा फल       -      एक सौ आठ गुणा

चंद्र फल        -      सौ गुणा

लग्न फल     -     एक हजार गुणा

हाथ खोले सेहत का राज


आज के सुखी संपन्न और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन में उपलब्ध साधनों व सुविधाओं के कारण हर व्यक्ति अपने शरीर की सुंदरता और उसकी सेहत के प्रति जागरूक हो चुका है। युवावर्ग की शारीरिक खेलों के प्रति बढ़ती अभिरुचि इस बात का प्रमाण है। यही कारण है कि आज हर गली जिम ऐरोबिक सेंटर व हेल्थ सेंटर खुल गए हैं। लोग सुबह सैर को जाते हैं, तो योगा और व्यायाम करते हैं, विभिन्न खेलों में हिस्सा लेते हैं। परंतु सभी एक समान सेहतमंद नहीं हो पाते, क्योंकि सेहत भी ईश्वर प्रदत्त एक वरदान ही है, जिसका निर्धारण परमपिता परमेश्वर मनुष्य के पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर करता है। किसी व्यक्ति की सेहत का राज उसके हाथ की लकीरों में छिपा होता है। यहां इन लकीरों, ग्रहों, चिह्नों आदि की स्थितियों का विश्लेषण प्रस्तुत है जिसे पढ़कर पाठकगण अपनी सेहत की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।


यदि हाथ में शुक्र और चंद्र ग्रह उचित स्थिति में हों और सभी रेखाएं साफ सुथरी हों, तो व्यक्ति को कभी भी कोई बड़ा और असाध्य रोग नहीं होता। छोटे-मोटे रोग होते भी हैं, तो उनका इलाज नहीं करवाना पड़ता, वे अपने आप ठीक हो जाते हैं।

यदि भाग्य रेखा जीवन रेखा के पास हो, कटी-फटी हो, उस पर द्वीप हो, तो व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, उसे कोई न कोई रोग हमेशा घेरे रहता है।

यदि जीवन रेखा को मोटी-मोटी रेखाएं काट रही हों, मस्तिष्क रेखा पर द्वीप हो, हाथ सख्त हो, तो व्यक्ति की किसी रोग या दुर्घटना के कारण सर्जरी की संभावना रहती है। साथ ही उसे कोई न कोई रोग जीवन भर लगा रहता है।

यदि शुक्र क्षेत्र पर तिल हो, भाग्य रेखा पर द्वीप हो, तो एड्स या यौन रोग की संभावना रहती है।

मंगल और बुध क्षेत्रों पर कटफट होना त्वचा रोग का सूचक है।

हृदय रेखा जंजीरनुमा हो और उसे मोटी-मोटी रेखाएं काटती हों, तो व्यक्ति को हृदयरोग और उसके कारण सर्जरी का भय रहता है।

जिस व्यक्ति का हाथ नरम व पीला हो, उसकी शारीरिक क्षमता कम होती है।

इस प्रकार उक्त लक्षणों के अतिरिक्त किसी व्यक्ति की सेहत का राज जानने के और भी अनेकानेक लक्षण हो सकते हैं। सेहत के प्रति जागरूक लोगों को हस्तरेखा विशेषज्ञ से उचित परामर्श लेकर सेहत में सुधार के उपाय करने चाहिए।

प्राचीनतम नगरी श्री अयोध्या

श्री अयोध्या सप्त पुरियों में प्रथम है। श्री अयोध्या जी की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। बाल्मीकि रामायण के अनुसार मनु ने सर्वप्रथम इस पुरी को बसाया था। मनुना मानवेंद्रेण सा पुरी निर्मिता स्वयम्‌॥ स्कंद पुराण के अनुसार यह सुदर्शन चक्र पर बसी है। भुतशुद्धि तत्व के अनुसार यह श्री रामचंद्र के धनुषाग्र पर स्थित है- श्री रामधनुषाग्रस्था अयोध्या सा महापुरी॥
अयोध्या मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के भी पूर्ववर्त्ती सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही है। इक्ष्वाकु से श्री रघुनाथ जी तक सभी चक्रवर्ती राजाओं ने अयोध्या के राजसिंहासन को विभूषित किया है। त्रेता युग में ही भगवान के परम धाम जाने के बाद अयोध्या उजड़ गयी। श्री राम के पुत्र कुश ने इसे फिर बसाया।

वर्तमान अयोध्या का जो स्वरूप है, वह महाराज विक्रमादित्य द्वारा बसाया हुआ है। महाराज विक्रमादित्य ने ही योगसिद्ध संतों की कृपा से इस अवध भूमि का ज्ञान प्राप्त किया। उन संतों के निर्देश से ही महाराज ने यहां मंदिर, सरोवर, कूप आदि का निर्माण कराया।

श्री अयोध्या जी का माहात्म्य गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज के अनुसार स्पष्ट है :जहां समस्त अवधवासियों के साथ भगवान साकेत लोक में प्रविष्ट हुए थे, वह पुण्यसलिला सरयू में स्थित गोप्ततार तीर्थ है। वहां जो स्नान करता है, वह निश्चय ही योगी दुर्लभ श्री राम धाम को प्राप्त होता है।

सरयू में जहां भगवान श्री कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी ने स्नान किया था, वहां रुक्मिणी कुंड है। उसके ईशान कोण में क्षीरोदक कुंड है, जहां महाराज दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया था।

अयोध्या सूर्यवंशी नरेशों की प्राचीनतम राजधानी है। अतः जैनों के प्रथम तीर्थंकर अभिनंदननाथ, पांचवे तीर्थंकर सुमतिनाथ और चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ का जन्म भी यहीं हुआ था।

अयोध्या के आसपास के तीर्थों में सोनखर, गुप्तार घाट, जनौरा, नंदि ग्राम प्रमुख हैं।

प्रमुख घाट : अयोध्या जी में सरयू के किनारे कई सुंदर पक्के घाट बने हैं। ऋणमोचन घाट, सहस्र घाट, लक्ष्मण घाट, स्वर्ग द्वार, गंगा महल, शिवाला घाट, अहल्याबाई घाट, रूपकला घाट, नमा घाट, जानकी घाट, राम घाट प्रमुख हैं। इन्हीं घाटों पर तीर्थ यात्री सरयू स्नान भी करते हैं।

स्वर्ग द्वार : लक्ष्मण घाट के पास ही श्री नागेश्वरनाथ महादेव मंदिर है। यह मूर्ति कुश द्वारा स्थापित की हुई है। इसी मंदिर को पा कर महाराज विक्रमादित्य ने अयोध्या का जीर्णोद्धार कराया था। नागेश्वरनाथ के पास ही एक गली में श्री राम जी का मंदिर है। एक ही काले पत्थर में श्री रामपंचायतन की मूर्तियां हैं। स्वर्ग द्वार घाट पर ही यात्री पिंड दान करते हैं।

हनुमानगढ़ी : यह अयोध्या जी का सिद्ध स्थान है। मान्यता है कि श्री हनुमान जी अयोध्या में यहीं वास करते हैं। यह स्थान मध्य नगर में ही है। 60 सीढ़ियां चढ़ने पर ऊपर श्री हनुमान जी का मंदिर है। इस मंदिर में श्री हनुमान जी की बैठी हुई प्रतिमा है। मंदिर में भीड़ रहती है। श्री हनुमानचालीसा का पाठ प्रायः चलता रहता है। मंदिर में साधु-संतों का वास भी रहता है।

कनक भवन : कनक भवन अयोध्या के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह भवन ओड़छा नरेश द्वारा बनवाया हुआ है। इस विशाल तथा भव्य मंदिर को सीता जी का महल कहते हैं। इस भवन में सिंहासन पर जो बड़ी मूर्तियां हैं, उनके आगे श्री सीताराम जी की छोटी मूर्तियां हैं, जो प्राचीन हैं।

श्री राम जन्मभूमि : कनक भवन के आगे ही श्री राम जन्मभूमि है, जो विश्वविख्यात है। यहां के प्राचीन मंदिर को बाबर ने तुड़वा कर मस्जिद बना दिया था। लेकिन वहां फिर भी श्री राम की मूर्ति स्थित है। यहां असंख्य तीर्थ यात्रियों की भीड़ बनी ही रहती है। श्री राम जन्मभूमि मंदिर के पास ही कई मंदिर हैं, जिनमें सीता रसोई, कोप भवन, आनंद भवन, रंग महल, साक्षी गोपाल प्रमुख हैं।

दतून कुंड : मणि पर्वत के पास ही एक दतून कुंड भी है। मान्यता है कि श्री राम जी यहां पर दातुन करते थे। कुछ लोगों की मान्यता है कि जब गौतम बुद्ध अयोध्या में रहते थे, तब उन्होंने एक दिन यहां अपनी दातुन गाड़ दी थी, जो ७ फुट ऊंचा वृक्ष बन गया। वह वृक्ष तो अब नहीं है; केवल उसका स्मारक है।

आवश्यक जानकारियां :

श्री अयोध्या पुरी उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से १२० किलोमीटर की दूरी पर है। यह नगर सरयू (घाघरा) के दक्षिण तट पर बसा है। उत्तर रेलवे पर अयोध्या स्टेशन है। मुगलसराय, बनारस, लखनऊ से यहां सीधी गाड़ियां आती हैं। अयोध्या में तीर्थ यात्रियों के ठहरने के अनेक स्थान हैं। नगर में अनेक धर्मशालाएं हैं। कुछ प्रमुख आश्रम भी हैं, जहां लोग ठहरते हैं।

अध्यात्म

प्रेम के तीन रूप

प्रेम तीन तरह का होता है - जो आकर्षण से पैदा हो, जो घनिष्ठता से उत्पन्न हो और तीसरा, ईश्वर के प्रति प्रेम। आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूं?

आकर्षण से पैदा प्रेम अधिक समय तक नहीं टिकता है क्योंकि यह अनजानेपन और आकर्षण के कारण होता है। पर एक बार पहचान होने पर शीघ्र ही आकर्षण समाप्त हो जाता है और मन ऊबने लगता है, जैसा कि प्रायः प्रेम-विवाह में देखने में आता है। इस प्रकार का प्रेम घटता जाता है और साथ में लाता है भय, शंका, असुरक्षा और दुःख।

घनिष्ठता से उत्पन्न प्रेम बढ़ता है, तुम आत्मीयता महसूस करते हो, जैसे कि एक पुराने घनिष्ठ मित्र के साथ, बजाय किसी नये व्यक्ति के साथ। पर इस प्रेम में कोई रोमांच नहीं, कोई उत्साह या आवेश नहीं।

ईश्वर के प्रति प्रेम इन सब के ऊपर है। ईश्वरीय प्रेम सदा नवीन रहता है। जितना तुम समीप आते हो, उतना अधिक आकर्षण और गहराई पाते हो। इस प्रेम में सुख, उत्साह और आत्मीयता सभी है। इस प्रेम में कभी नीरसता नहीं आती, यह सब को उत्साहित और सजग रखता है।

सांसारिक प्रेम महासागर की तरह हो सकता है, पर महासागर का भी एक तल है।

ईश्वरीय प्रेम आकाश की तरह है- असीम, अनंत।

महासागर के तल से ऊपर उड़ जाओ विशाल नभ तक !

प्रिय बनो
तुम्हें ज्ञान को कायम रखने की चिंता करने की जरूरत नहीं। जब ज्ञान विवेक बनकर तुममें समा जाएगा, वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा। विवेक हृदय में समा जाता है। ईश्वर को अपना वैलेन्टाइन, अपना प्रियतम बना लो। जीवन का यही आखिरी कार्य है और प्रथम भी।

अपने हृदय को एक सुरक्षित स्थान में रखो, यह बहुत ही कोमल है। घटनाएं तथा छोटी-छोटी बातें इस पर गहरा प्रभाव डालती हैं। अपने हृदय को सुरक्षित और मन को स्वस्थ और पवित्र रखने के लिए तुम्हें ईश्वर से बेहतर और कोई स्थान नहीं मिलेगा। जब तुम अपना हृदय ईश्वर को दे दोगे, तो समय और घटनाएं तुम्हें छू नहीं सकती, उनका कोई निशान भी तुम पर नहीं पड़ेगा।

एक मूल्यवान रत्न को सोने या चांदी में जड़ा जाता है ताकि वह गिर न जाए और उसे पहना जा सके; वैसे ही विवेक और ज्ञान हमारे हृदय को ईश्वर में जड़कर रखते हैं।

ईश्वर को अपना पिय्रतम बनाओ।

बस, रहो .... और जानो कि तुम प्रिय हो।

यही है, ÷÷प्रिय तम''।

प्रेम तो तुम्हारा अस्तित्व ही है
मान लो कोई तुम्हारे प्रति बहुत प्रेम दिखाता है। तुम क्या करते हो?

1. तुम्हें समझ में नहीं आता कि उत्तर में कैसा व्यवहार करें।
2. तुम आभार और बंधन महसूस करते हो।
3. तुम संकुचित होते हो या शर्माकर दूर हो जाते हो।
4. तुम मूर्ख और अनाड़ी महसूस करते हो।
5. तुम प्रत्युत्तर देने की चेष्टा करते हो, हालांकि वह सच्चे मन से नहीं होता।
6. उस प्रेम की अभिव्यक्ति पर संदेह करते हो या अपनी योग्यता पर।
7. तुम्हें भय होता है कि तुम सम्मान खो दोगे क्योंकि सम्मान में एक दूरी होती है और प्रेम दूरी रहने नहीं देता।
8. तुम्हारा अहं दृढ़ होता है और वह तुम्हें न तो प्रेम को स्वीकार करने देता है, न ही प्रत्युत्तर देने देता है।
9. और कुछ? .......................(रिक्त स्थान स्वयं भर लो)

प्रेम पाने की योग्यता प्रेम देने की क्षमता से आती है। तुम जितने अधिक केंद्रित हो और, अनुभव से, जानते हो कि तुम ही प्रेम हो, उतना ही अधिक तुम आत्मीयता महसूस करोगे, चाहे जितना भी अधिक प्रेम, किसी भी रूप में, तुम्हारे प्रति दर्शाया जाए। तुम्हारे अंतःकरण में तुम यह जान लोगेः

प्रेम कोई भावना नहीं!
प्रेम तो तुम्हारा अस्तित्व ही है।
इन्हें भी देखें :-

टोने टोटके - कुछ उपाय - 3 ( Tonae Totke - Some Tips - 3 )

परदेश गए व्यक्ति की वापसी हेतु : प्रातः स्नान करने के बाद परदेश गए व्यक्ति का नाम कागज पर लिखकर रख लें। फिर आटे का एक दीपक बनाकर उसमें सरसों का तेल डालकर उसे जलाएं। फिर जमीन पर नमक रखें और उस पर दीपक रखकर उस व्यक्ति का ध्यान कर ग्यारह बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। यह क्रिया 43 दिनों तक नियमित रूप से करें, व्यक्ति वापस आ जाएगा।

दिए गए धन की वापसी हेतु : ऊपर वर्णित विधि की तरह आटे का दीपक जलाएं तथा जिसे पैसे दिए हों, उस व्यक्ति का ध्यान कर ग्यारह बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। यह क्रिया 43 दिन तक लगातार नियमित रूप से करते रहें, दिए हुए पैसे वापस मिल जाएंगे।

कार्य के शीघ्र संपादन के लिए : गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी का दायीं ओर मुड़ी हुई सूंड़ वाला चित्र घर या दुकान पर लगाकर उनकी आराधना करें। उनके आगे लौंग तथा सुपारी रखें और जहां कार्य कराने जाना हो, वहां लौंग और सुपारी जेब में रखकर ÷जै गणेश काटो कलेश' कहते हुए जाएं, कार्य शीघ्र पूरा होगा।

व्यापार में उन्नति के लिए : शनिवार को पीपल के एक पत्ते को गंगाजल से धोकर दुकान में या कार्यस्थल पर जहां बैठते हों, वहां गद्दी के नीचे रख लें। फिर अगले शनिवार को एक पत्ता और लाएं और फिर वही क्रिया करें। यह क्रिया सात शनिवार करें और फिर सातों पत्तों पर जय हनुमान लिखकर उन्हें नदी या नहर में प्रवाहित कर दें, व्यापार में आशातीत उन्नति होगी।

बाधाओं से मुक्ति के लिए : शनिवार को छोड़कर किसी भी दिन पीपल का एक पत्ता लेकर उसे गंगाजल से धो लें। फिर उस पर तीन बार ÷नमो भगवते वासु देवाय' लिखकर अपने पूजा स्थल पर रख लें और नियमित रूप से उसकी आराधना करते रहें। इसी तरह धूप दीप से ईश्वर की आराधना भी करते रहें, बाधाओं से मुक्ति मिलेगी।

शनिवार को कच्ची घानी का सरसों का तेल लेकर उसमें अपना चेहरा देखें। फिर उस तेल में गुड़ के गुलगुले तलकर किसी भिखारी या किसी गरीब को खिलाएं, घर की सब बाधाएं दूर हो जाएंगी।

व्यापार में फंसे हुए धन की वापसी के लिए : व्यापार में धन अन्य लोगों के पास फंस गया हो और वे देने में आनाकानी करते हों, तो यह उपाय करें।

शुक्ल पक्ष की किसी भी अष्टमी को रुई धुनने वाले से थोड़ी सी रुई लेकर उसकी चार बत्तियां बनाकर मंदिर में रख लें। रात को एक चारमुखी दीपक में सरसों का तेल डालकर उसमें चारों बत्तियां लगा दें और जलाकर किसी चौराहे पर रख दें। वापस आने से पहले किसी नुकीली चीज से अपनी उंगली का थोड़ा सा खून निकाल कर दीपक में डाल दें। ऐसा करते समय जिस व्यक्ति से पैसे लेने हों, उसका नाम तीन बार लें। फिर घर वापस आ जाएं। ध्यान रहे, वापस आते समय रास्ते में रुकें नहीं। घर आकर एक रोटी में गुड़ रखकर गाय को खिला दें, रुका हुआ धन मिल जाएगा।

वास्तु बदलें भाग्य बदलेगा

आज भौतिकतावाद के इस युग में आवास की समस्या एक जटिल समस्या हो गई है। सुखमय जीवन की चाह लिए आम आदमी इस मूल आवश्यकता की पूर्ति हेतु जैसे-तैसे पैसे जोड़ भी लेता है, तो यह जरूरी नहीं कि उसे उसके मनोनुकूल वास्तुसम्मत घर मिल ही जाए। सामर्थ्यवान लोग भी समयाभाव के कारण और अज्ञानतावश वास्तुसम्मत भवन नहीं बना पाते। फिर बन चुके बड़े भवनों को तोड़-फोड़ कर दोषमुक्त कराना कठिन होता है। इसलिए वास्तुशास्त्र में बिना तोड़-फोड़ किए वास्तु में परिवर्तन के उपाय दिए गए हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख उपायों का विवरण यहां प्रस्तुत है।
*  ईशान का कोना हमेशा स्वच्छ व खाली रखना चाहिए। ध्यान रहे, यहां शौचालय किसी भी हालत में नहीं हो।

*  घर में अग्नि का स्थान वास्तुसम्मत दिशा में होना चाहिए। अग्नि का स्थान आग्नेय कोण है, अतः रसोईघर यथासंभव घर के दक्षिण-पूर्व दिशा में बनाना चाहिए। चूल्हा उत्तर-पूर्व दिशा में नहीं होना चाहिए। मुख्य द्वार या खिड़की से चूल्हा दिखाई नहीं देना चाहिए अन्यथा परिवार पर संकट आने की संभावना रहती है। पानी का बर्तन रसोई के उत्तर-पूर्व या पूर्व में भरकर रखें।

*  घर में पानी सही स्थान पर और सही दिशा में रखने से परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य अनुकूल रहता है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। पानी का स्थान ईशान कोण है अतः पानी का भण्डारण अथवा भूमिगत टैंक या बोरिंग पूर्व, उत्तर या पूर्वोत्तर दिशा में होनी चाहिए। पानी को ऊपर की टंकी में भेजने वाला पंप भी इसी दिशा में होना चाहिए। दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम अथवा दक्षिण-पश्चिम कोण में कुआं अथवा ट्यूबवेल नहीं होना चाहिए। इसके लिए उत्तर-पूर्व कोण का स्थान उपयुक्त होता है। इससे वास्तु का संतुलन बना रहता है। अन्य दिशा में कुआं या ट्यूबवेल हो, तो उसे भरवा दें, और यदि भरवाना संभव न हो, तो उसका उपयोग न करें।

*  नहाने का कमरा पूर्व दिशा में शुभ होता है। ध्यान रखें, घर के किसी नल से पानी नहीं रिसना चाहिए अन्यथा भुखमरी की स्थिति पैदा हो सकती है।

*  ओवर हेड टैंक उत्तर और वायव्य कोण के बीच होना चाहिए। टैंक का ऊपरी भाग गोल होना चाहिए।
*  मकान बनाते समय हवा एवं धूप का विशेष ध्यान रखना चाहिए। निर्माण इस तरह होना चाहिए कि हवा और धूप सर्दी और गर्मी में आवश्यकता के अनुरूप प्राप्त होती रहें।

*  सोने के कमरे में, और खासकर विवाहित जोड़े के कमरे में, पूजाघर कदापि न बनाएं। यदि स्थानाभाव के कारण ऐसा करना ही पड़े, तो पूजास्थल को हर तरफ से पर्दे में रखें। पूजा-स्थान सदा साफ-सुथरा रखना चाहिए। इसे उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण में होना चाहिए। पूजा-घर में कीमती वस्तुएं, धन आदि छिपाकर न रखें।

*  सोते समय सिरहाना दक्षिण-पश्चिम कोण में दक्षिण की तरफ होना चाहिए। इस प्रकार सोने से नींद गहरी व अच्छी आती है।

*  यदि दक्षिण-पश्चिम दिशा में अधिक द्वार या खिड़कियां हों, तो उन्हें बंद करके उनकी संख्या कम कर देनी चाहिए।

*  मुख्य द्वार या खिड़की के सामने सेटेलाइट या डिश एंटीना का होना प्राणिक ऊर्जा को नष्ट करता है, अतः ये चीजें इस स्थान पर न लगाएं।

*  भवन में खिड़कियां अधिक हों, तो गृहस्वामी का स्वभाव चिड़चिड़ा होता है। इसलिए कुछ खिड़कियां हमेशा बंद रखें और सभी खिड़कियों पर पर्दे लगाएं।

*  मुख्य द्वार बाधा रहित होना चाहिए अर्थात्‌ उसके सामने बिजली के खंभे, ट्रांसफार्मर जैसा कोई अवरोध नहीं होना चाहिए।

*  यदि मकान दक्षिणमुखी हो, तो घर के मुख्य द्वार पर चांदी की थोड़ी पट्टी लगाएं, लाभ होगा।

*  पूर्व-उत्तर दिशा का भाग यदि ऊंचा हो, तो दक्षिण-पश्चिम भाग में कोई निर्माण कार्य करा लें ताकि उत्तर-पूर्व दिशा का भाग नीचा हो जाए।

*  घर की छत पर चारों कोणों में तुलसी के गमले रखें, इससे मकान पर बिजली के गिरने की संभावना कम रहती है।

*  पश्चिम दिशा में बैठकर भोजन करने से संतोष, सुख व शांति मिलती है। अतः भोजन कक्ष पश्चिम में होना चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो डाइनिंग टेबल पश्चिम दिशा में लगाएं।

*  अपनी दुकान या दफ्तर में उत्तर-पूर्व में कुछ स्थान खाली रखें। दफ्तर या दुकान में पश्चिम व दक्षिण दिशा में अधिक सामान, अलमारी, फर्नीचर, रिकार्ड आदि रखें। स्वयं उत्तर-पूर्व की ओर मुंह करके बैठें।

*  अक्सर देखने में आता है कि कार्यालय या घर में कुछ न कुछ अनावश्यक अथवा कम उपयोगी सामान पड़े होते हैं। उन्हें इधर-उधर फेंकना या रखना न केवल भद्दा लगता है, बल्कि हानिप्रद भी होता है। भारी या अनावश्यक सामान को दक्षिण दिशा या नैर्ऋत्य कोण में रखें। यहां किसी देवी-देवता का चित्र न लगाएं। इसे पानी व सीलन से भी बचाएं। अर्थात्‌ स्टोर-रूम को भी साफ व व्यवस्थित रखें।

*  यदि भवन का दक्षिण-पश्चिम भाग नीचा हो, तो दक्षिण-पश्चिम कोण में काफी ऊंचा टी.वी. का एंटीना लगाएं, तत्संबंधी वास्तु दोष दूर हो जाएगा।

*  इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि अलमारियां खिड़की के बाहर से दिखाई न दें। चेक बुक, बैंक और व्यापार के कागजात, नकद, आभूषण आदि अलमारी की तिजोरी में इस प्रकार रखें कि वह दक्षिण या नैर्ऋत्य की ओर न खुले अन्यथा धन की हानि होगी। तिजोरी शयनकक्ष में नहीं रखें। यदि रखनी ही हो, तो दक्षिण भाग में इस तरह रखें कि उसका मुंह उत्तर अर्थात कुबेर की दिशा की ओर खुले, धन लाभ होगा।

*  घर में नौ दिन तक भगवान के अखंड कीर्तन कराएं, दोष से मुक्ति मिलेगी। मुख्य द्वार के ऊपर सिंदूर से नौ अंगुल चौड़ा स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। इसके अतिरिक्त यह चिह्न घर के वास्तु दोष से ग्रस्त सभी स्थलों पर बनाएं।

*  रामायण, महाभारत या युद्ध दर्शाते चित्र, राक्षस, चुड़ैल या बिलखते बच्चों का या विभीषिका दर्शाता कोई चित्र या मूर्ति न लगाएं, और यदि पहले से लगा हो, तो उसे यथाशीघ्र हटा दें। अर्जुन को गीता का ज्ञान देते कृष्ण का चित्र भी न लगाएं। अन्यथा परिवार के सदस्यों में वैमनस्यता हो सकती है। बच्चों के कमरे में सफल व्यक्तियों और महापुरुषों के चित्र लगाएं।

*  परिवार के स्वर्गवासी व्यक्यिों के चित्र दक्षिण-पश्चिम में लगाने चाहिए।

*  घर में गिद्ध, उल्लू, सियार, कौए, सूअर, सांप, बाज आदि के चित्र कदापि न लगाएं।

*  घर के पीछे खाली जगह या बगीचा हो और कोई पहाड़, भवन या आबादी नहीं हो, तो यह शुभ नहीं है। वास्तु की दृष्टि में ऐसा भवन असुरक्षित रहता है।

*  घर की उत्तर और पूर्व दिशाओं में खिड़कियां, द्वार, जाल और बरामदा आदि बनवाएं और खुली जगह रखें। ध्यान रखें, घर का कोई भाग गोलाकार न हो।

*   ध्यान रखें, पड़ोसी की वाशिंग मशीन, सूखते कपड़े आदि आपके घर की खिड़की से दिखाई न दे।

*  घर में चंपा, मनीप्लांट, चंदन, अनार, तुलसी आदि के पौधे लगाएं, वास्तु दोष दूर होंगे। ईशान कोण में पीले रंग के फूल लगाने चाहिए। तुलसी का पौधा वास्तु दोष निवारण के लिए सर्वोत्तम होता है। यह पौधा रामनवमी के दिन आंगन में चबूतरा बनाकर लगाना चाहिए।

*  अध्ययन कक्ष के ईशान कोण में बच्चों के लिए पीने का पानी रखें। यहां अपने इष्टदेव की तस्वीर लगाएं। अध्ययन कक्ष की दीवार पर बड़े दर्पण न लगाएं। अधिक तस्वीरें भी न लगाएं, किंतु भगवान गणेश और मां सरस्वती की तस्वीर अवश्य लगाएं।

*  यदि घर की किसी कन्या का विवाह नहीं हो रहा हो, या उसमें कोई विन-बाधा आ रही हो, तो उसे घर के वायव्य कोण वाले कमरे में सुलाएं। मेहमान घर से जाने का नाम नहीं ले रहे हों, तो उन्हें वायव्य कोण के कमरे में ठहराएं।

*  कर्ज ज्यादा हो, तो भूमि का ढलान ईशान कोण की ओर कर दें। यदि ढलान पहले से ही हो, तो नैर्ऋत्य कोण को थोड़ा ऊंचा कर दें, कर्ज की समस्या सुलझ जाएगी।

*  घर का ईशान कोण दूषित हो, तो परिवार में अनेक समस्याएं आती हैं। इस दोष से मुक्ति हेतु एक घड़ा बरसात के पानी से भरकर उसे मिट्टी के बर्तन से ढक कर ईशान कोण में दबा दें।

*  द्वार खोलते ही सीढ़ियों का दिखाई देना अशुभ होता है। यदि आपके घर की सीढ़ियां इस स्थिति में हों, तो उनके मध्य एक पर्दा लगा दें।

*  यदि शयनकक्ष या पलंग में कांच लगवाया हो, तो रात को सोते समय उस पर पर्दा डालें। पलंग को दीवार से सटाकर न रखें। सोते समय सिर दक्षिण की तरफ रखें और पैर प्रवेश द्वार की ओर न रखें।

*  दीवारों का रंग गहरा हो, तो गृहस्वामी तथा परिवार के अन्य सदस्यों का स्वभाव उग्र होता है और क्रोध पर उनका नियंत्रण नहीं होता। इसलिए अपने घर की दीवारों का रंग अपनी राशि के अनुकूल किंतु हल्का रखें।

*  यदि घर के आग्नेय कोण में वास्तु दोष हो, तो वहां अग्नि का सामान रखें। साथ ही वहां लाल रंग का बल्ब हर पल जलाए रखें।

*  घर के पश्चिमी भाग में दोष होने पर उस भाग में शनि यंत्र की प्राणप्रतिष्ठा कराकर स्थापित करें। साथ ही द्वार पर काले घोड़े की नाल लगाएं।

*  भूखंड वही खरीदें जिसका ढलान पूर्व, उत्तर या ईशान में हो।

*  घर में बिजली के सामान, टी.वी., फ्रीज, म्यूजिक सिस्टम, घड़ियां आदि चालू अवस्था में होने चाहिए। इनका बंद होना परिवार की उन्नति के अवरुद्ध होने का सूचक है।

*  यदि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता या आप स्वयं को फुर्तीला महसूस नहीं करते, तो भोजन करते समय प्लेट या थाली दक्षिण-पूर्व दिशा अर्थात आग्नेय कोण की तरफ रखें और सूर्य की तरफ मुंह करके भोजन करें।

*  टेलीफोन सदा दक्षिण-पूर्व में रखें। इस दिशा में टेलीफोन रखने पर वह जल्दी खराब नहीं होता।

*  धन संबंधी कागजात जैसे चेक बुक, पास बुक, एटीएम कार्ड आदि घर के उत्तरी भाग में रखें। इसके साथ ही श्रीयंत्र या कुबेर यंत्र भी रखें, धन वृद्धि के स्रोत बनेंगे।

*  घर के मुख्य द्वार के सामने देवी-देवताओं के मंदिर नहीं होने चाहिए, न ही घर के पीछे मंदिर की छाया पड़नी चाहिए। मुख्यद्वार की चौड़ाई ऊंचाई की आधी होनी चाहिए।

*  घर का मुख्यद्वार और पिछला द्वार एक सीध में कदापि नहीं होने चाहिए। मुख्यद्वार सदा साफ सुथरा रखें।

*  पीपल, बड़ या बहेड़े की लकड़ी का फर्नीचर घर में न रखें, क्योंकि ये पेड़ प्रेत बाधा और अशांति के कारक होते हैं।

वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय

 
कभी-कभी दोषों का निवारण वास्तुशास्त्रीय ढंग से करना कठिन हो जाता है। ऐसे में दिनचर्या के कुछ सामान्य नियमों का पालन करते हुए निम्नोक्त सरल उपाय कर इनका निवारण किया जा सकता है।

 
*  पूजा घर पूर्व-उत्तर (ईशान कोण) में होना चाहिए तथा पूजा यथासंभव प्रातः 06 से 08 बजे के बीच भूमि पर ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर ही करनी चाहिए।

*  पूजा घर के पास उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में सदैव जल का एक कलश भरकर रखना चाहिए। इससे घर में सपन्नता आती है। मकान के उत्तर पूर्व कोने को हमेशा खाली रखना चाहिए।

*  घर में कहीं भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखना चाहिए। उसे पैर नहीं लगना चाहिए, न ही लांघा जाना चाहिए, अन्यथा घर में बरकत और धनागम के स्रोतों में वृद्धि नहीं होगी।

*  पूजाघर में तीन गणेशों की पूजा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा घर में अशांति उत्पन्न हो सकती है। तीन माताओं तथा दो शंखों का एक साथ पूजन भी वर्जित है। धूप, आरती, दीप, पूजा अग्नि आदि को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं। पूजा कक्ष में, धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड हमेशा दक्षिण पूर्व में रखें।

*  घर में दरवाजे अपने आप खुलने व बंद होने वाले नहीं होने चाहिए। ऐसे दरवाजे अज्ञात भय पैदा करते हैं। दरवाजे खोलते तथा बंद करते समय सावधानी बरतें ताकि कर्कश आवाज नहीं हो। इससे घर में कलह होता है। इससे बचने के लिए दरवाजों पर स्टॉपर लगाएं तथा कब्जों में समय समय पर तेल डालें।

*  खिड़कियां खोलकर रखें, ताकि घर में रोशनी आती रहे।

*  घर के मुख्य द्वार पर गणपति को चढ़ाए गए सिंदूर से दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।

*  महत्वपूर्ण कागजात हमेशा आलमारी में रखें। मुकदमे आदि से संबंधित कागजों को गल्ले, तिजोरी आदि में नहीं रखें, सारा धन मुदमेबाजी में खर्च हो जाएगा।

*  घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखरे हुए या उल्टे पड़े हुए नहीं हों, अन्यथा घर में अशांति होगी।

*  सामान्य स्थिति में संध्या के समय नहीं सोना चाहिए। रात को सोने से पूर्व कुछ समय अपने इष्टदेव का ध्यान जरूर करना चाहिए।

*  घर में पढ़ने वाले बच्चों का मुंह पूर्व तथा पढ़ाने वाले का उत्तर की ओर होना चाहिए।

*  घर के मध्य भाग में जूठे बर्तन साफ करने का स्थान नहीं बनाना चाहिए।

*  उत्तर-पूर्वी कोने को वायु प्रवेश हेतु खुला रखें, इससे मन और शरीर में ऊर्जा का संचार होगा।

*  अचल संपत्ति की सुरक्षा तथा परिवार की समृद्धि के लिए शौचालय, स्नानागार आदि दक्षिण-पश्चिम के कोने में बनाएं।

*  भोजन बनाते समय पहली रोटी अग्निदेव अर्पित करें या गाय खिलाएं, धनागम के स्रोत बढ़ेंगे।

*  पूजा-स्थान (ईशान कोण) में रोज सुबह श्री सूक्त, पुरुष सूक्त एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें, घर में शांति बनी रहेगी।

*  भवन के चारों ओर जल या गंगा जल छिड़कें।

*  घर के अहाते में कंटीले या जहरीले पेड़ जैसे बबूल, खेजड़ी आदि नहीं होने चाहिए, अन्यथा असुरक्षा का भय बना रहेगा।

*  कहीं जाने हेतु घर से रात्रि या दिन के ठीक १२ बजे न निकलें।

*  किसी महत्वपूर्ण काम हेतु दही खाकर या मछली का दर्शन कर घर से निकलें।

*  घर में या घर के बाहर नाली में पानी जमा नहीं रहने दें।

*  घर में मकड़ी का जाल नहीं लगने दें, अन्यथा धन की हानि होगी।

*  शयनकक्ष में कभी जूठे बर्तन नहीं रखें, अन्यथा परिवार में क्लेश और धन की हानि हो सकती है। 

*  भोजन यथासंभव आग्नेय कोण में पूर्व की ओर मुंह करके बनाना तथा पूर्व की ओर ही मुंह करके करना चाहिए।

वास्तु दोष निवारक यंत्र

वास्तुदोष के निवारण के लिए हमारे ऋषि-मनीषियों ने कई यंत्र बताए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख यंत्रों का विवरण यहां प्रस्तुत है।

सिद्ध बीसा यंत्र

यह शक्तिशाली यंत्र है। इसमें माता जगदम्बा के नवार्ण मंत्र की शक्ति समाविष्ट है। इसे दुकान की चौखट या दहलीज के ऊपर लगाने से नजर नहीं लगती। यह किसी के श्राप या बददुआ से दुकान की रक्षा करता है। इसका मूल मंत्र एक प्रकार से दुकान का रक्षा कवच है। शुद्ध धातु से बने सिद्ध बीसा यंत्र को, उसकी प्राण प्रतिष्ठा कर, दुकान में स्थापित करना चाहिए।

इंद्राणी यंत्र

यह वस्तुतः एक सुरक्षा कवच है। किसी व्यवसाय के व्यावसायिक दृष्टिकोण के अनुरूप होने तथा नानाविध यत्न के बावजूद हानि हो रही हो, तो किसी योग्य वास्तुविद् से परामर्श लेकर इंद्राणी यंत्र की स्थापना करनी चाहिए।

मंगल यंत्र

यह एक अति प्रभावशाली यंत्र है। यदि दुकान या कार्यालय में चोरी होती हो, तो किसी योग्य वास्तुविद से परामर्श लेकर इसे पूर्वोत्तर कोण अथवा पूर्व दिशा में फर्श से नीचे दो फुट गहरा गड्ढा खोदकर विधिवत स्थापित करना चाहिए। यह यंत्र अग्नि से भी रक्षा करता है।

यम कीलक यंत्र

यदि व्यावसायिक स्थल सूर्य की क्रांति से वेधित हो अर्थात्‌ स्थापना के समय नीच का सूर्य हो, तो वह कष्ट प्रदान करने वाली होती है। व्यवसायी भी नीच राशि के सूर्य से प्रभावित हो, तो ऐसी स्थिति में लाभ होने पर भी कष्ट बना रहता है।

दुकान का मुख ठीक न हो अथवा असामाजिक तत्व लूटपाट करते हों, तो इस यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। यह यंत्र आगजनी से भी रक्षा करता है।

सर्वविन निवारण सूर्य यंत्र

यदि सरकारी तंत्र द्वारा बार-बार परेशान किया जा रहा हो अथवा किसी अन्य प्रकार से बाधा पहुंचाई जा रही हो, तो सर्वविन निवारण सूर्य यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। यदि व्यवसाय के लाभप्रद होने पर भी अशांति बनी रहे, विवाद होता रहे, कलह कि स्थिति बनी रह,े तो इस स्थिति में भी सर्वविन निवारक सूर्य यंत्र की स्थापना करनी चाहिए।

मारुति यंत्र

यह मारुति नंदन श्री हनुमान जी का यंत्र है। इच्छा के अनुरूप कोई जमीन बिक नहीं रही हो, या उस पर कोई विवाद हो, तो मंगलवार को दोपहर बारह बजे इस यंत्र को उस जमीन में सवा हाथ गड्ढा खोद कर पूर्वाभिमुखी होकर गाड़ दें। फिर इस पर दूध और गंगाजल चढ़ाएं। यह क्रिया गृहस्वामी को स्वयं करनी चाहिए। जमीन शीघ्र बिक जाएगी या विवादमुक्त हो जाएगी। यह यंत्र दोहरी शक्ति से युक्त है। यह वाहन की रक्षा भी करता है।

काली यंत्र

यह यंत्र फैक्ट्री, उद्योग की भट्ठी, बॉयलर, ट्रांसफॉर्मर या जेनरेटर पर स्थापित किया जाता है। ताकि उद्योग में अग्नि का संचार संतुलित रहे।

वरुण यंत्र

यह यंत्र जल संबंधी समस्त दोषों को दूर करता है। यदि जल स्थान, नलकूप या पानी की टंकी आग्नेय में या गलत दिशा में बनी हो, तो इस यंत्र को उस स्थल पर स्थापित करना चाहिए, जल संबंधी सभी दोष दूर होंगे।

दिशा दोष नाशक यंत्र

यह वास्तु दोष शमन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण यंत्र है। यह एक चमत्कारिक यंत्र है। कोई वस्तु गलत दिशा में बन गई हो और उसमें सुधार करना कठिन हो रहा हो, तो इस यंत्र की स्थापना करनी चाहिए।

सर्वमंगल वास्तु यंत्र

यह प्रभावशाली यंत्र है। इसकी स्थापना से वास्तु संबंधी सभी प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं।

दुर्गा यंत्र

इस यंत्र को दुर्गा के निम्नोक्त मंत्र से १०८ बार अभिमंत्रित करके मुख्य प्रवेश द्वार पर लगाएं।

मंत्र : "ओम नमो भगवती वास्तुदेवाये नमः''

श्री यंत्र

अगर व्यवसाय न चलता हो, पार्टनरों के बीच झगड़े होते हों, तो इस यंत्र किसी पंडित के द्वारा प्राण प्रतिष्ठा कराकर स्थापना करनी चाहिए।

बगलामुखी यंत्र

इस यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापना करने से किसी की बुरी नजर या टोटकों से अथवा शत्रु से घर या दुकान की रक्षा होती है।

ऋणमोचक मंगल यंत्र

इस यंत्र को गंगाजल से अभिषिक्त कर किसी शुभ दिन स्थापित करें। फिर उस पर मूंगा रखें और उसके समक्ष मंगल के इक्कीस नामों का उच्चारण करें। इसके बाद मंगल के इक्कीस नामों का उच्चारण नियमित रूप से करते रहें, ऋण से मुक्ति शीघ्र मिल जाएगी।

इस तरह उक्त यंत्र अत्यंत प्रभावशाली हैं। इनकी विधिवत स्थापना और पूजा आराधना से वास्तु दोषों से मुक्ति मिलती है और जीवन सुखमय होता है।

वास्तु एवं वृक्षारोपण

वास्तु निर्माण में वृक्षों एवं लताओं का अपना विशेष स्थान है। किंतु वर्तमान समय में नारद संहिता, यजुर्वेद और कौटिल्य के वास्तु नियमों के अनुरूप वृक्षारोपण के नियमों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। भविष्य पुराण, अग्नि पुराण, पद्म पुराण, नारद पुराण, भगवत्‌ गीता, रामायण, शतपथ ब्राह्मण, तंत्रसार, योगनिघंटु आदि महाग्रंथों में मंत्रमहोदधि वृक्षों एवं लताओं के अनेक स्थानों पर वर्णन आते हैं। पद्म पुराण में उल्लेख है कि कुओं या जलाशयों के पास पीपल का वृक्ष लगाने मात्र से व्यक्ति को सैकड़ों यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है। इसके स्पर्श से चंचला लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इसकी प्रदक्षिणा दीर्घायु बनाती है, इसके दर्शन मात्र से व्यक्ति का चित्त प्रसन्न होता है और उसके पापों का अंत हो जाता है। अशोक का वृक्ष लगाने से शोक से मुक्ति मिलती है जबकि पाकर का वृक्ष यज्ञतुल्य फल प्रदान करता है। जामुन का वृक्ष कन्या रत्न की प्राप्ति और मौलसिरी का वृक्ष कुल की वृद्धि कराता है। चंपा का पौधा सौभाग्यदायी और कटहल का वृक्ष लक्ष्मीप्रदाता माना जाता है। नीम के पेड़ से सूर्यदेव की कृपा के साथ-साथ दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार पीपल, बड़, नीम, नारियल, चंदन, सुपारी, बेल, आम, अशोक, हल्दी, तुलसी, चंपा, बेला, जूही, आंवला, अंगूर, अनार, नागकेसर, मौलसिरी, हरसिंगार, गेंदा, गुलाब आदि पेड़ पौधे अत्यंत शुभ माने जाते हैं। शास्त्रों में पूर्व दिशा में बरगद, पश्चिम में पीपल, उत्तर में कैथ अथवा बेर और दक्षिण दिशा में गूलर लगाना शुभ माना गया है। घर की वाटिका में ईशान में कटहल, आम, तथा आंवला नैर्ऋत्य में जामुन तथा इमली, अग्नि दिशा में अनार तथा वायव्य में बेल का वृक्ष शुभ शुभ होते हैं। घर में कांटेदार पौधे नहीं लगाने चाहिए, क्योंकि कांटेदार फल-फूल तथा वृक्ष शत्रुता के कारक होते हैं। नारद पुराण, नारद संहिता, राज निघंटु, नारयणी संहिता, वृहद ध्रुश्रुत, शारदा तिलक, मंत्र महार्णव, श्रीविद्या पर्व आदि विभिन्न ग्रंथों में व्यक्ति विशेष की राशि तथा नक्षत्र के अनुसार वृक्षारोपण के एक निश्चित क्रम का उल्लेख है।

यदि कोई अपनी सामर्थ्य, स्थान की सुविधा आदि के अनुरूप पूर्वाभिमुख होकर तथा पंचोपचार पूजन विधि द्वारा वृक्षारोपण करे, तो उसे दैहिक, दैविक तथा भौतिक सभी व्याधियों से मुक्ति मिलेगी। यदि किन्हीं अभावों में व्यक्ति वृक्षारोपण का संपूर्ण क्रम संपन्न नहीं कर पाता, तो उसे अपनी राशि अथवा नक्षत्र के अनुसार कम से कम एक वृक्ष अवश्य लगाना चाहिए। इससे न केवल पर्यावरण में सुधार आएगा, अपितु वास्तु दोषों का भी निवारण होगा।

जन्म लग्न के अनुसार वृक्षारोपण

जहां वृक्षारोपण लग्न क्रम में करना हो, वहां पूर्व दिशा में अपने लग्न का वृक्ष लगा ना चाहिए। यहां से घड़ी की विपरीत दिशा में क्रम से अन्य वृक्ष लगाएं। ये आयताकार, वर्गाकार अथवा वृत्ताकार किसी भी क्रम में लगाए जा सकते हैं। जैसे यदि लग्न मेष राशि में उदित हो, तो सबसे पहले खादिर अर्थात कत्थे का वृक्ष लगाएं। फिर क्रमशः २ के स्थान पर गूलर ३ के स्थान पर अपामार्ग आदि। ये किसी भी आकृति में लगाएं।

नव ग्रह वृक्षारोपण विधि

वर्गाकार आकार में ही आकृति के अनुरूप वृक्षारोपण करें। ध्यान रहे, पीपल का वृक्ष उत्तर दिशा में हो।


जन्म नक्षत्र के अनुरूप वृक्षारोपण

जिन्हें अपना जन्म नक्षत्र ज्ञात हो, वे वास्तु के नियमों के अनुरूप उस नक्षत्र से संबंधित वृक्ष कहीं भी लगा सकते हैं।

वास्तु का मौलिक रूप एवं मानव जीवन में इसका महत्व


वास्तु एक प्राचीन विज्ञान है। हमारे ऋषि मनीषियों ने हमारे आसपास की सृष्टि में व्याप्त अनिष्ट शक्तियों से हमारी रक्षा के उद्देश्य से इस विज्ञान का विकास किया। वास्तु का उद्भव स्थापत्य वेद से हुआ है, जो अथर्ववेद का अंग है। इस सृष्टि के साथ-साथ मानव शरीर भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है और वास्तु शास्त्र के अनुसार यही तत्व जीवन तथा जगत को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं।

भवन निर्माण में भूखंड और उसके आसपास के स्थानों का महत्व बहुत अहम होता है। भूखंड की शुभ-अशुभ दशा का अनुमान वास्तुविद् आसपास की चीजों को देखकर ही लगाते हैं। भूखंड की किस दिशा की ओर क्या है और उसका भूखंड पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, इसकी जानकारी वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन विश्लेषण से ही मिल सकती है। इसके सिद्धांतों के अनुरूप निर्मित भवन में रहने वालों के जीवन के सुखमय होने की संभावना प्रबल हो जाती है।

हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसका घर सुंदर और सुखद हो, जहां सकारात्मक ऊर्जा का वास हो, जहां रहने वालों का जीवन सुखमय हो। इसके लिए आवश्यक है कि घर वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप हो और यदि उसमें कोई वास्तु दोष हो, तो उसका वास्तुसम्मत सुधार किया जाए। यदि मकान की दिशाओं में या भूमि में दोष हो तो उस पर कितनी भी लागत लगाकर मकान खड़ा किया जाए, उसमें रहने वालों की जीवन सुखमय नहीं होता। मुगल कालीन भवनों, मिस्र के पिरामिड आदि के निर्माण-कार्य में वास्तुशास्त्र का सहारा लिया गया है। घर के वास्तु का प्रभाव उसमें रहने वाले सभी सदस्यों पर पड़ता है, चाहे वह मकान मालिक हो या किरायेदार।

आजकल के इस महंगाई के दौर में मकान बनाना एक बहुत बड़ी समस्या है। लोग जैसे-तैसे जोड़-तोड़ करके अपने रहने के लिए मकान बनाने हेतु भूखंड खरीद लेते हैं। जल्दबाजी में अथवा सस्ती जमीन के चक्कर में वे बिना किसी शास्त्रीय परीक्षण के भूमि खरीद लेते हैं, और इस तरह खरीदी गई जमीन उनके लिए अशुभ सिद्ध होती है। उस पर बने मकान में रहने वाले पूरे परिवार का जीवन कष्टमय हो जाता है।

आज फ्लैटों का चलन है। ये फ्लैट अनिययिमत आकार के भूखंडों पर बने होते हैं। अब एक छोटे से भूखंड पर भी एक बोरिंग, एक भूमिगत पानी की टंकी व सेप्टिक टैंक बनाए जाते हैं। लेकिन ज्ञानाभाव के कारण मकान के इन अंगों का निर्माण अक्सर गलत स्थानों पर हो जाता है। फलतः संपूर्ण परिवार का जीवन दुखमय हो जाता है।

भौतिकतावाद के इस युग में जहां शारीरिक सुख बढ़े हैं, वहीं लोगों का जीवन तनावग्रस्त भी हुआ है। इस तनाव के वैसे तो कई कारण होते हैं, परंतु वास्तु सिद्धांतों के प्रतिकूल बना भवन भी इसका एक प्रमुख कारण होता है। पुराने समय में सभी घर लगभग आयताकार होते थे। घरों में आम तौर पर बोरिंग, पानी की भूमिगत टंकी, सेप्टिक टैंक इत्यादि नहीं होते थे। जमीन समतल हुआ करती थी। यही कारण था कि तब लोगों का जीवन इस तरह तनावग्रस्त नहीं हुआ करता था।

वास्तु सिद्धांत के अनुरूप निर्मित भवन एवं उसमें वास्तुसम्मत दिशाओं में सही स्थानों पर रखी गई वस्तुओं के फलस्वरूप उसमें रहने वाले लोगो का जीवन शांतिपूर्ण और सुखमय होता है। इसलिए उचित यह है कि भवन का निर्माण किसी वास्तुविद से परामर्श लेकर वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप ही करना चाहिए।

इस तरह, मनुष्य के जीवन में वास्तु का महत्व अहम होता है। इसके अनुरूप भवन निर्माण से उसमें सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। फलस्वरूप उसमें रहने वालों का जीवन सुखमय होता है। वहीं, परिवार के सदस्यों को उनके हर कार्य में सफलता मिलती है।

वास्तुसम्मत कार्यालय के कुछ महत्वपूर्ण उपाय

किसी व्यवसाय, पेशे या उद्योग की सफलता में उसका कार्यालय का अपना विशेष महत्व होता है। यदि कार्यालय का निर्माण और आंतरिक साज सज्जा वास्तु के अनुरूप हो, तो उद्योग या व्यवसाय दिन-व-दिन उन्नति की सीढ़ियां चढ़ता चला जाता है।

व्यावसायिक स्थल में कार्यालय के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा (नैर्ऋत्य कोण) को अति उत्तम माना गया है। कार्यालय के अंदर उद्योगपति की कुर्सी दक्षिण-पश्चिम दिशा में इस प्रकार रखी जाए कि बैठते समय उसका मुख उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। इसका सैद्धांतिक कारण यह है कि नैर्ऋत्य कोण पृथ्वी तत्व का क्षेत्र है। अतः इस स्थान पर बैठने से व्यक्ति की विवेकशक्ति तथा निर्णयक्षमता सुदृढ़ होती है। कुर्सी के पीछे ठोस दीवार होनी चाहिए, किंतु कोई खिड़की या झरोखा नहीं हो। यदि हो, तो उसे स्थायी तौर पर बंद कर देना चाहिए। कुर्सी की पुश्त ऊंची हो ताकि बैठने वाले को ठोस सहारा मिल सके। कुर्सी में हैंडल होना बहुत जरूरी है ताकि काम करने में असुविधा न हो। दीवार पर पर्वत का चित्र लगाना चाहिए, किंतु चित्र में पर्वत का आकार नुकीला न हो बल्कि कछुए की पीठ की भांति ढलवां हो।

अगंतुकों के बैठने की व्यवस्था पूर्व या उत्तर दिशा में करनी चाहिए, जहां छत कोई बीम नहीं हो। अन्यथा व्यक्ति के मानसिक तनाव से ग्रस्त तथा उसकी निर्णयक्षमता के प्रभावित होने का भय रहता है। अगर बीम हटाना संभव न हो तो एक फॉल्स सीलिंग लगाना चाहिए। इससे बीम के दुष्प्रभाव कम हो जाते हैं।

कैश बॉक्स या कीमती सामान की अलमारी दक्षिण की दीवार के साथ इस प्रकार रखी चाहिए कि उसका मुंह उत्तर दिशा की ओर ख्ुाले। इससे आय में वृद्धि होती है।

टेलीफोन और फैक्स उपकरण पूर्व दक्षिण भाग (आग्नेय कोण) या उत्तर-पश्चिम भाग (वायव्य कोण) में रखना चाहिए। जल से संबंधित वस्तुएं जैसे पानी का गिलास, चाय का कप आदि टेलीफोन या फैक्स के पास न रखें। कंप्यूटर को मेज पर हमेशा दायीं ओर रखें।

दीवार घड़ी को उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ दीवार पर लगा सकते हैं। इसके पीछे धारणा यह है कि ग्रहों के राजा सूर्य का उदय इसी दिशा में होता है। भविष्य की परियोजनाओं का विवरण भी इसी दीवार पर लगाना चाहिए ताकि उद्योगपति को उसका उद्देश्य सदा स्मरण रहे।

टेबल के ऊपर पूर्व दिशा में ताजे फूलों का गुलदस्ता रखें। टेबल के ऊपर दक्षिण-पूर्व में छोटा सा हरा-भरा और स्वस्थ पौधा रखें, इससे व्यक्तित्व का विकास होता है और उन्नति के नए मार्ग खुलते हैं। नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में क्रिस्टल बॉल रखना चाहिए, इससे कर्मचारियों से संबंध मधुर बने रहते हैं। अगर कार्यालय में फिश एक्वेरियम रखना चाहें, तो पूर्व, उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में रखें। दरबाजे के खुलने या बंद होने के समय चरमराहट की आवाज नहीं होनी चाहिए। इससे अशुभ ऊर्जा उत्पन्न होती है तथा शक्ति क्षीण होती है। दीवारों पर अधिक गहरे रंगों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, अन्यथा उत्तेजना और तामसिक विचारों के उत्पन्न होने का भय रहता है। कुर्सी के पीछे की दीवार पर व्यवसाय के संस्थापक या पे्ररणास्रोत का चित्र लगाना चाहिए।

इस तरह ऊपरवर्णित उपाय अत्यंत प्रभावशाली हैं। इनके अनुरूप किसी उद्योग या व्यवसाय के कार्यालय को वास्तुसम्मत बनाने से उसकी वांछित उन्नति की प्रबल संभावना रहती है।

वास्तुशास्त्र का उद्गम

मानव शरीर पांच तत्वों से बना है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले इन तत्वों के प्रभाव पर गहन शोध किया और प्रकृति तथा इन तत्वों की लाभप्रद ऊर्जा की प्राप्ति हेतु अनुपम सूत्रों एवं सिद्धांतों की रचना ÷वास्तुशास्त्र' के रूप में की। परंतु, आस्थावान एवं योग्य शिष्यों के अभाव में, गुरु शिष्य परंपरा द्वारा हस्तांतरित होने वाला यह ज्ञान कालांतर में इतिहास के पन्नों में सिमट गया। सौभाग्यवश पिछले कुछ दशकों पूर्व हमारे देश के कतिपय शोधकर्ताओं ने इन विलुप्त स्मृतियों को खोज निकाला और उनका परीक्षण, प्रयोग एवं विश्लेषण पुनः आरंभ किया। परिणाम अद्भुत और विलक्षण मिले, फलतः जनमानस में इस शास्त्र का आशातीत प्रचार-प्रसार हुआ। यह मानव जाति का सौभाग्य है कि भारत वर्ष के महान महर्षियों एवं विद्वानों द्वारा रचित ये सूत्र एवं सिद्धांत आज पुनः उपलब्ध हैं। किंतु, वहीं यह दुर्भाग्य भी है कि आज भवन निर्माण के क्रम में लोग अक्सर प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करते हैं और फलस्वरूप विभिन्न वास्तु दोषों के शिकार हो जाते हैं।

वास्तु दोष क्या है?

किसी भी स्थान के आकार, आकृति या आंतरिक सज्जा के वास्तु नियमों के अनुरूप न होने पर, वहां पंचतत्वों की लाभप्रद ब्रह्मांडीय ऊर्जा का असंतुलन या अभाव हो जाता है। यही वास्तु दोष है। साधारण लगने वाला यह असंतुलन मनुष्य के जीवन में उथल पुथल मचा देता है और इसका निवारण न करने पर उसे जीवनपर्यंत कष्टों, बाधाओं एवं व्याधियों का सामना करना पड़ता है।

कैसे हो वास्तु दोष का निवारण?

किसी भूखंड पर किसी भी तरह का निर्माण करने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि वह वास्तुसम्मत है या नहीं। यदि नहीं हो, तो योग्य वास्तुविद के परामर्श के अनुसार उपयुक्त उपाय अपनाकर उसे वास्तुसम्मत कर लेना चाहिए।

क्या उपयुक्त वास्तु भाग्य बदल सकता है?

एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या वास्तुसम्मत भवन निर्माण से भाग्य को बदला जा सकता है? यह स्वाभाविक भी है। इसके उत्तर में यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन है कि वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप भूमि, भवन एवं वस्तुओं का प्रयोग कर मनुष्य प्राकृतिक ऊर्जा एवं शक्ति को अपने अनुकूल बना सकता है। वास्तुसम्मत निर्माण एवं उसमें परिवर्तन के फलस्वरूप, पंचतत्वों की ऊर्जा का समुचित संचार मनुष्य के मस्तिष्क एवं शरीर में होने लगता है। फलतः उसके निर्णय एवं कर्म भी शुभ और सही होने लगते हैं, जिससे उसके भाग्य के उसके अनुकूल होने की संभावना प्रबल हो जाती है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप भवन निर्माण या उसमें परिवर्तन कर भाग्य को बदला जा सकता है।

वास्तु दोष निवारण एवं परिणाम

साधारणतः लोग वास्तु-दोष सुधार के पश्चात्‌, तुरंत किसी चमत्कार की अपेक्षा करने लगते हैं, जो उचित नहीं है। किसी स्थान पर वास्तु सुधार के पश्चात्‌, वहां व्याप्त दीर्घकालीन नकारात्मक ऊर्जा के उन्मूलन में कुछ समय अवश्य लगता है। नकारात्मक ऊर्जा के उन्मूलनके पश्चात ही सुखद परिणाम प्राप्त होने लगते हैं, जो चिरकालिक होते हैं।

जहां तक व्यावसायिक एवं आर्थिक कठिनाइयों एवं असफलताओं का प्रश्न है, सुधार के तुरंत बाद स्थिति का खराब होना प्रायः रुक जाता है और सूक्ष्म रूप से सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने लगते हैं। फिर धीरे-धीरे प्रगति एवं सफलता का मार्ग प्रशस्त होने लगता है। परंतु देखा गया है कि स्वास्थ्य, अध्ययन, स्वभाव, अदालती मामलों, वैवाहिक जीवन, पारिवारिक परिस्थिति आदि के सुधार में कुछ अधिक समय लगता है।

अक्सर देखने में आता है कि वास्तु विशेषज्ञ एक ही निरीक्षण में संपूर्ण सुधार एक साथ करने का निर्देश देकर चले जाते हैं। ऐसे में दोषों की गंभीरता एवं गृहस्वामी की अनेकशः विवशताओं के कारण, सभी सुझावों का आनन-फानन में कार्यान्वयन संभव नहीं होता। फलतः अधिकांश लोग असमंजस की स्थिति में आवश्यक सुधार भी नहीं करवा पाते और समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रह जाती हैं।

वस्तुतः किसी भवन, फ्लैट, दुकान, कार्यालय या उद्योग में वास्तु दोषों के निवारण से सकारात्मक ऊर्जा का संचार आसानी से होने लगता है, जिसका सीधा असर वहां के लोगों की मानसिकता पर पड़ता है। इसके फलस्वरूप अन्य दोषों का सुधार भी स्वतः होने लगता है। इस तरह पंचतत्वों की पूर्ण समानुपातिक ऊर्जा के स्थायी प्रवाह के परिणामस्वरूप स्थिति सहज और सुखद हो जाती है।

यहां यह स्पष्ट कर देना उचित है कि भूखंड और भवन में व्याप्त वास्तु दोषों का निवारण अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ के परामर्श के अनुसार करना चाहिए। साथ ही किसी विद्वान ज्योतिषी के मार्गदर्शन में शास्त्रोक्त विधि से आस्थापूर्वक ग्रह-शांति का कार्य किसी योग्य व्यक्ति से कराना चाहिए।

कुछ अति प्रभावशाली वास्तु टिप्स

1.  ईशान दिशा को सदैव शुद्ध, स्वच्छ तथा अन्य दिशाओं की अपेक्षा नीचा रखें। इस दिशा में लाल या नारंगी रंग का इस्तेमाल न करें।

2.  उत्तर-पूर्व के दरवाजे और खिड़कियों को प्रातःकाल खोलकर रखें ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा एवं सूर्य की किरणों का प्रवेश हो सके।

3.  दक्षिण-पश्चिम की दिशा को सदैव अन्य दिशाओं की अपेक्षा भारी एवं ऊंचा रखें।

4.  अपराह्न से सूर्यास्त तक दक्षिण-पश्चिम के दरवाजे और खिड़कियों को बंद रखें अथवा उन्हें परदे से ढक दे।

5.  घर या कार्यालय में जंगली पशु-पक्षी, उदास स्त्री, युद्ध एवं समुद्र मंथन के चित्र और शो-पीस कदापि न लगाएं।

6.  नदी, पहाड़, झरने आदि के चित्र भी वास्तुसम्मत स्थान पर ही लगाएं अन्यथा वे अनर्थकारी हो सकते हैं।

7.  अनावश्यक वस्तुओं एवं उपकरणों का जहां-तहां अंबार न लगाएं। ये सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में गतिरोध उत्पन्न करके कठिनाई एवं बाधा
खड़ी करते हैं।

8.  वातावरण में व्याप्त शब्द-प्रदूषण को दूर करने हेतु रोज सुबह वैदिक मंत्रों का जप एवं प्रार्थना अवश्य करें अथवा उनका टेप या सीडी सुनें।

9.  ईशान में पूजागृह की स्थापना को लेकर भ्रमित न हों। पूजागृह उत्तर एवं पूर्व में भी अत्यंत फलदायी होते हैं।

10.  फर्श और सीढ़ियों पर लक्ष्मी जी के चरण, स्वास्तिक तथा क्क के स्टीकर कदापि न लगाएं।

11.  बंद घड़ियां कदापि न रखें, इनका रुका हुआ समय सौभाग्यवृद्धि में रुकावट पैदा करता है।