17 मार्च 2010

आंख मिचौली

मनीष अपनी नयी मारूति कार चला रहा है। 23-24 वर्र्ष का सुंदर, स्वस्थ युवक। गेहुंआ रंग, घने काले बाल, बड़ी-बड़ी आंखें। चेहरे पर शालीनता, विद्वता की स्पष्ट झलक। सामने की सड़क पर निगाह जमाये हुये वह ड्राइविंग कर रहा है उसकी बगल में लगभग तीस साल की एक स्त्री बैठी हुयी है। चेहरे पर प्रौढ़ता, उदासी और गंभीरता। वह चुपचाप सामने की सरकती हुयी सड़क देख रही है। थोडी देर बाद मनीष ने उस प्रौढ़ स्त्री से कहा, 'दीदी, अब पहाड़ी घाटी शुरु होनेवाली है। वहां के दृश्य देखना। तुम प्रसन्न हो जाओगी।'

दीदी, सुजाता ने लेकिन कुछ भी नहीं कहा। वह उसी तरह बुझे-बुझे मन से सामने देखती रही। मनीष भी चुपचाप ड्राइविंग करता रहा, लेकिन थोड़ी देर बाद उससे अपनी बड़ी बहन की उदासी देखी नहीं गई। उसने पुन: कहा, 'दीदी, देखो तो, सब कहीं कितने सुंदर दृश्य दिखाई दे रहे हैं! तुम इस सुहाने सफर का आनंद क्यों नहीं उठा रही हो?' जवाब में सुजाता के मुंह से केवल लंबी, ठंडी सांस निकली।

मनीष भी चुप रह गया। थोड़ी देर बाद उसने एक्सीलेटर- पैडल पर का दबाव कुछ कम कर दिया। कार की रफ्तार धीमी हो गयी। वैसे भी, पहाड़ी घाटी का सफर शुरु होते ही उसने कार को टॉप गियर में से थर्ड गियर में डाल दिया था, जिससे उसकी रफ्तार पहले ही कम हो गयी थी। अब वह औैर धीमी हो गई। तारकोल की चिकनी, सापिन की तह बलखाती हुई सड़क पर कार घूम-घूम कर चढ़ने लगी। मनीष की कलाइयां स्टीअरिंग को बड़ी सफाई से घुमा रही थी। उसके चेहरे पर उस कठिन ड्राइविंग का तनिक भी तनाव नहीं था। वह बड़ी कुशलता से कार चला रहा था।

कार की पिछली सीट पर मनीष की सुंदर युवा पत्नी रमा अपने पांच वर्ष के लड़के नगेंद्र के साथ बैठी हुयी थी। सड़क की बांयी ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ थे और दाहिनी ओर घाटियां। कार जैसे-जैसे ऊपर चढ़ रही थी, घाटियां और गहरी होती जा रही थीं। घाटियां तरह-तरह के हरे-भरे पेड़ों, लताओं से भरी हुई। कई तरह के पंछी चहचहाते हुये उड़ रहे थे। सूरज अभी-अभी उगा था। उसकी हल्की धूप पहाड़ों के शिखरों पर छाई हुई थी, घाटियों में अभी नहीं पहुंची थी, फिर भी घाटियां दिखाई तो दे ही रही थी।

दिसंबर अभी शुरु ही हुआ था। हवा में सुखद ठंडक थी। कार का ए ।सी. चलाने की जरूरत नहीं थी। खुली हुई खिड़कियों से प्रकृति के मनोरम दृश्य दिखाई दे रहे थे। बायीं ओर के पर्वत आकार, उंचाई इत्यादि में अलग-अलग दिखाई दे रहे थे। कुछ हरे-भरे वृक्षों से सजे हुये, कुछ हरी-हरी घास की रजाइयों में लिपटे हुये, कुछ केवल पथरीली चट्टानों वाले। कभी-कभी पहाड़ों पर से बहते हुये सफेद, निर्मल पानी के झरने भी दिखाई देते थे। घाटियों के बीच खुली जगह में छोटे-मोटे झोपड़ों, खपरैले मकानों की छोटी-छोटी बस्तियां दिखाई पड़ती थी। वे नन्हे-नन्हे घर ऊंचाई पर से खिलौनों की तरह दिखाई देते थे। कहीं-कहीं कुहरे के बादल भी घाटियों में उतरे हुये दिखाई देते थे।

पिछली सीट पर बैठे हुये मां, बेटे-दोनों प्रकृति की यह मनमोहक सुंदरता देख-देख कर मुग्ध, चकित हो रहे हैं। नगेंद्र तो बहुत ही खुश है। वह चारों ओर देखता हुआ उछल रहा है, तालियां बजा रहा है। अपनी मम्मी से वह बार-बार- 'यह क्या है, वह क्या है?' इस तरह के सवाल पूछ रहा है और रमा हंस-हंस कर उन सवालों के जवाब दे रही है। घाटियों मेें छाये हुये कुहरे को देखकर नगेंद्र कहता, 'मम्मी, वो देखो, बादल नीचे हैं, हम ऊपर!' रमा कह देती, 'हां बेटे, हम बादलों के ऊपर उड़ रहे हैं।'

प्रकृति की यह सुंदरता देख तो मनीष भी रहा है, लेकिन अलिप्तता से। उसके लिए यह सुंदरता नई नहीं है। इस हिल-स्टेशन पर वह कई बार आ चुका है। उसके एक मित्र और आफिस के सहयोगी यशराज का इस हिल-स्टेशन पर अपना निजी बंगला है और यशराज अक्सर छुट्टियां यहीं, अपने बंगले में मित्राें के साथ बिताता है। कई बार वह मनीष को भी यहां ले आया है। यही नहीं, मनीष का जब विवाह हुआ था, तो यशराज के आग्रह पर अपनी पत्नी के साथ हनीमून के लिए वह इसी हिल-स्टेशन पर आया था। यशराज ने अपने एक भरोसे के नौकर को इस बंगले में केयर-टेकर के रूप में रख दिया है। उसका नाम है गोविंद- लगभग अठारह वर्ष का स्वस्थ, सुंदर लड़का। दसवीं तक पढ़ा है। मनीष औैर उसके परिवार के आने की सूचना यशराज ने फोन द्वारा गोविंद को दे दी थी, इसलिए गोविंद ने बंगले की विशेष साफ-सफाई कर रखी थी और वह मनीष के परिवार का स्वागत करने के लिए तैयार खडा था। थोड़ी देर बाद कार 'शैल-कुटीर' नाम के छोटे-से, लेकिन सुंदर बंगले के पोर्च में रूकी। गोविंद दौड़ता हुआ कार के पास पहुंचा। सभी लोग कार से बाहर आये। पोर्च की सीढ़ियां चढ़कर बंगले में पहुंचे।

बंगला सचमुच ही दर्शनीय था। सभी सुविधाओं से परिपूर्ण। तीन सजे हुये बेडरूम थे। टॉयलेट, बाथअटैच्ड। बीच में बड़ा सा हाल, पूरे बंगले का फर्श मार्बल का था। हाल और तीनों शयनकक्ष में सुंदर फर्नीचर। दीवारों पर इनी-गिनी ही, ंकिंतु सुंदर पेंटिंग टंगी हुयी थी। बंगला एकमंजिला ही था, लेकिन उसकी छत सीमेंटेड-स्लैब की थी। छत पर चढ़ने के लिए पत्थरों का जीना था जो बंगले के बाहर था। छत पर तीन फीट ऊंची पैरेपेट वाल थी। पूरा बंगला पत्थर की मजबूत चार दीवारी से घिरा हुआ था। सामने फाटक था। बंगले के आहते में कई प्रकार के पेड़ लगे हुये थे। फाटक के बाहर सीमेंट की पक्की सड़क थी जो क्रमश: ऊंची चढ़ती हुई किसी सुंदर पर्वतीय-पॉइंट की ओर चली गयी थी। सड़क के उस पार मैदान था और मैदान के पार पर्वतों की सुंदर श्रृंखला। बंगले के पीछे, चहार-दीवारी से लगभग सट कर गहरी, बहुत गहरी घाटी थी जो हमेशा हरे-भरे पेड़-पौधों से सजी रहती थी।

मनीष के लिए तो यह सब जाना-पहचाना ही था, फिर भी वह प्रफुल्लित हो उठा। रमा भी चकित, आनंदित हो उठी। नगेंद्र तो खुशी के मारे उछलने-कूदने लगा। तालियां बजाने लगा। सुजाता की उदासी और गंभीरता लेकिन वैसी ही बनी रही। गोविंद ने सारा प्रबंध पहले ही कर रखा था। सभी लोग स्नानादि से निपट कर फ्रेश हुये। मुसाफिरी के कपड़े उतार कर हल्के-फुल्के कपड़े पहन लिए। गोविंद ने सबको ताजा नाश्ता परोसा, गरमागरम चाय पिलाई। तब सैर करने का प्रोग्राम बना। मनीष, रमा चलने को तैयार हो गये। नगेंद्र तो सैर के लिए पहले से ही मचल रहा था। हां, सुजाता नहीं उठी। वह सोफे पर चुपचाप बैठी रही। तब मनीष ने कहा, 'दीदी, तुम भी चलो।'
'नहीं मनीष,' सुजाता ने कहा, 'मैं कहीं नहीं जाऊंगी। यहीं बैठी रहूंगी।'
'यहीं बैठी रहोगी? .... अरे, तुम्हारा मन बहलाने के लिए, तुम्हारी उदासी दूर करने के लिए ही तो हम आये हैं यहां।' मनीष ने कहा, 'चलो, देखो तो सही कितने सुंदर-सुंदर प्ॅवाइंट्स हैं यहां! प्रकृति ने कितनी सुंदरता सजा रखी है।'
'नहीं मनीष, मेरा मूड, घूमने-फिरने का नहीं है।' सुजाता ने कहा।
रमा ने भी आग्रह किया, 'दीदी, उठिये। आपके बगैर हमारे घूमने-फिरने में कोई तुक नहीं है, यहां अकेली बैठी रहोगी तो आप और भी उदास, बेचैन हा जाओगी।'सुजाता फिर भी नहीं उठी।
तब नगेंद्र ने उसका हाथ पकड़कर खींचते हुये कहा, 'चलो न बुआ! तुम नहीं चलोगी तो हम भी नहीं जायेंगे।'
सुजाता के चेहरे पर अब हल्की सी, फीकी सी मुस्कुराहट प्रगट हो गयी। बोली, 'बड़ा, शैतान है तू!॥ चलो चलती हूं।'
सभी लोग चल पडे।
गोविंद ने बंगला बंद किया और वह भी साथ चल पड़ा। सूरज अब तक काफी ऊंचे चढ़ आया था। सुनहली धूप फैली हुई थी, लेकिन पर्वत की ऊंचाई के कारण और दिसंबर के सर्द मौसम के कारण वह गुनगुनी धूप अच्छी लग रही थी। नगेंद्र बहुत उत्साहित था। वह उछल-उछल कर तेज चल रहा था। उसके साथ रहने के लिए रमा औैर मनीष को भी तेज चलना पड़ रहा था। लेकिन सुजाता की चाल धीमी थी, वह तनिक पीछे रह जाती थी। उसके साथ रहने के लिए गोविंद को भी अपनी चाल धीमी करनी पड़ी।
गोविंद बातूनी था, उत्साहित भी था। वह चलते-चलते उस हिल-स्टेशन के सौंदर्य-स्थल दिखा रहा था। 'मैडम, ये देखिए, वो देखिए। वो जो दूर दिखाई दे रहा है, वो सनसेट-प्वॉइंट है औैर इस तरफ सन राइज प्वॉइंट है। वो देखिए, वहां ेकेबल-कार चल रही है न, वो सनराइज प्वाइंट तक जाती है। कल तड़के हम उस केबल-कार से चलेंगे वहां तक। बहुत सुंदर दिखाई देता है वहां सूरज का निकलना।'
सुजाता उसकी बातों के जवाब में केवल 'हां, हूं' कह रही थी। वह सब कुछ देखती हुयी भी जैसे कुछ भी नहीं देख रही थी। वह जैसे यहां, इस हिल-स्टेशन पर थी ही नहीं। अपने दुर्भाग्य-पूर्ण अतीत में खो गयी थी वह....!
सुजाता और मनीष मध्य-वित्तीय मां-बाप की संतानें थी। सुजाता के जन्म के पांच वर्र्ष बाद मनीष का जन्म हुआ था और इस दूसरे प्रसव के तुरंत बाद ही मां की मृत्यु हो गयी थी। पिता ने अपनी दोनों संतानों को पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया। सुजाता ने एम। ए. कर लिया तब पिता ने उसका विवाह एक बैंक-मैनेजर, शिवनाथ के साथ कर दिया। उस समय मनीष बी.कॉम के आखिरी वर्ष में पढ़ रहा था।
पति शिवनाथ के साथ सुजाता एक अच्छे फ्लैट में सुख का जीवन जीने लगी थी, लेकिन वह सुख अल्पकालीन ही सिद्ध हुआ। उसके विवाह को अभी चार महीने भी नहीं बीते थे कि शिवनाथ की बैंक में दिन-दहाड़े डाका पड़ा। डाकू पिस्तौल, बंदूक की धाक पर लाखों रुपये लूट ले गये। पुलिस ने जांच-पड़ताल शुरू की, दो लुटेरे पकड़े गये, लेकिन जांच में पता चला कि लूट की साजिश में बैंक मैनेजर अप्रत्यक्ष रुप से शामिल थे। शिवनाथ गिरफ्तार हुये, मुकदमा चला और उन्हें सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई। सारी अपीलें भी खारिज हो गयी।
सुजाता पर जैसे गाज गिर पड़ी। इस आघात से उसे मनीष ने संभाला। वह उसे अपने घर ले आया। अब तक उसने बी।कॉम भी कर लिया था और उसे एक बड़ी कंपनी में ऊंची नौकरी मिल गयी थी। उसका विवाह भी हो गया था। अपनी दीदी को वह शुरु से ही बहुत चाहता था। सुजाता उसके घर में रहने लगी। अपने अपराधी पति के प्रति उसके मन में तीव्र तिरस्कार उत्पन्न हो गया था। उसने डिवोर्स का दावा दाखिल किया। उसे डिवोर्स मिल भी गया।
एक दिन सुजाता ने मनीष से कहा, 'मैं घर में बैठे-बैठे बोर हो जाती हूं सोचती हूं कहीं नौकरी कर लूं।'
मनीष ने कहा, 'दीदी तुम्हें नौकरी की क्या जरूरत है? मेरी तनख्वाह अच्छी है। तुम्हें जब भी पैसों की, किसी भी चीज की जरूरत हो तो मुझे बता दो।'
सुजाता ने कहा, 'मुझे पैसों की जरूरत नहीं है। यह भी जानती हूं कि तुम दोनों मुझे बहुत चाहते हो, मुझे घर पर बोझ भी तुम नहीं समझते। लेकिन मैं अपना समय बिताने के लिए अपनी कुंठा, पुरानी बातें भूलने के लिए नौकरी करना चाहती हूं।'
मनीष ने यह बात मान ली। उसे विद्यार्थियों के एक कोचिंग क्लास में नौकरी दिलवा दी। कोचिंग क्लास के मालिक सुंदरलाल से मनीष की थोड़ी सी पहचान थी, इसलिए सुजाता को नौकरी मिल गयी। वेतन भी अच्छा मिलने लगा। सुंदरलाल लगभग पैंतालिस वर्र्ष के स्वस्थ, प्रभावशाली व्यक्ति थे। अच्छी खासी आमदनी थी। उनके चेहरे पर अहंता स्पष्ट दिखाई देती थी। क्लास के छात्रों पर और अध्यापकों-अध्यापिकाओं पर उनका रोब बना रहता था। वे कीमती सफारी-सूट पहनते थे। अध्यापकों-अध्यापिकाओं से बहुत कम आवश्यक होने पर ही, बोलते थे।
सुजाता से लेकिन वे जरूरी-गैरजरूरी बातें भी करने लगे थे। ऐसी बातों के समय उनका रोबीला चेहरा कोमल बन जाता था। वे उसकी अध्यापन-शैली से खुश रहने लगे थे। उनकी आवाज में मिठास, चेहरे पर विनम्रता और प्रसन्नता झलकने लगती थी। सुजाता को भी उनका व्यक्तित्व अच्छा लगने लगा था। मालिक और नौकर की सीमा लांघ कर दोनों के बीच अपनत्व पनपने लगा था। सुजाता को पता चल गया कि सुंदरलाल एकाकी, विधुर है। दो साल पहले उनकी पत्नी मर चुकी है और संतान भी कोई नहीं है।
एक दिन सुंदरलाल ने सुजाता को अपने केबिन में बुलवाया और बड़े ही विनम्र शब्दों में उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। सुजाता को इस प्रस्ताव की अपेक्षा तो थी, लेकिन उसने तुरंत हामी नहीं भरी। सोचने के लिए समय मांग लिया। घर लौट कर उसने अपने भाई को यह बात बता दी। मनीष कुछ क्षणों तक सोचता रहा। फिर बोला, 'दीदी, ठीक ही है। एकाकी जिंदगी जीने के बजाय फिर से ब्याह कर लेना अच्छा ही है।'
वैसे, उम्र उनकी कुछ ज्यादा ही है, लेकिन तीन की उम्र तो तुम भी पार कर चुकी हो। उनकी आमदनी भी काफी हैं, फिर भी कहावत है न कि दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है। है न?
'हां।'
'तो मैं मिलूंगा सुंदरलाल से। सभी जांच-पड़ताल कर लूंगा।'
यह जांच-पड़ताल मनीष ने अच्छी तरह की। सुंदरलाल से मिला, कोचिंग क्लास के स्टाफ से भी पूछताछ की। सभी ने अपने बॉस को सुशील, शालीन बताया। सभी लोगों को मालूम हो गया कि यह पूछताछ सुंदरलाल और सुजाता के विवाह के लिए हो रही है।
कोचिंग क्लास के एक पुराने अध्यापक ने लेकिन चुपचाप मनीष को चौंकाने वाली बात बताई। सुंदरलाल विवाहित थे, पत्नी जीवित थी। उनका एक लड़का भी था। दोनों शहर से कुछ दूर एक कस्बे में रह रहे थे। मनीष उस कस्बे में भी गया। वहां पूछताछ की। बात सच निकली। मनीष सुंदरलाल की पत्नी और लड़के से भी मिला.....
इस दूसरे आघात से सुजाता बहुत विचलित हो गयी। उसके मन में एक शून्य-सा समा गया। उसने सोच लिया कि उसके भाग्य में वैवाहिक सुख है ही नहीं। उसका यौवन अब ढलान की सीमा पर पहुंच गया था। प्रणय की और वात्सल्य की इच्छाएं उसे कुंठित करने लगीं। उसकी निराशा और हताशा ने उसे और अधिक प्रौढ़ बना दिया। उसने कोचिंग-क्लास की नौकरी छोड़ दी। घर में ही कुछ चुने हुये लड़कों की टयूशन करने लगी। उसके मुख की प्रसन्नता, मुस्कुराहट जाने कहां विदा हो गयी। वह अब मौन भी रहने लगी। जब बोलना जरूरी होता, तभी बोलती और वह भी कम से कम शब्दों में।
मनीष अपनी दीदी की इस मन:स्थिति से व्यथित रहने लगा। उसे खुश, प्रसन्न करने का भरसक प्रयास करने लगा। एक बार तो उसने पूछ ही लिया, 'दीदी, तुम कहो तो मैं तुम्हारे लिए कोई अच्छा वर ढूंढू।' परंतु सुजाता ने साफ-साफ मना कर दिया। अब तिबारा अपने दुर्भाग्य की परीक्षा वह नहीं लेना चाहती थी। अपना जीवन किसी न किसी तरह वह बिता ही लेगी।
अपने भाई से कहने के लिए तो सुजाता ने कह दिया, लेकिन मन ही मन वह तरसती रही, तड़पती रही। इतनी सारी स्त्रियों के विवाह होते हैं, होते रहते हैं, सभी के बाल-बच्चे होते हैं, गृहस्थी का, वैवाहिक जीवन का सुख मिलता है, फिर विधाता ने मुझे ही इस सुख से क्यों वंचित कर रखा है? न सही मैं अप्सरा-सी मोहक, लेकिन आम औरतों जैसी सुंदरता तो हैं ही मुझमें। इस तीस साल की आयु में भी मेरा आकर्षण बना हुआ है, फिर क्यों?...क्यों?।?...क्यों???... अपने भाई-भाभी के सुखी दाम्पत्य जीवन से उसकी चाहत और अधिक बढ़ जाती थी, लेकिन वह चुपचाप इस चाहत को दबा देती थी।
मनीष अपनी दीदी की यह व्यथा समझता है औैर प्रयत्नशील रहता है कि दीदी अपनी यह व्यथा भूली रहें। उसके मन-बहलाव का, उसे किसी-न-किसी काम में लगाये रखने का भरसक प्रयत्न वह किया करता है। सुजाता अपने भाई का यह प्रेम समझती है और उसकी हर बात मान लेती है। इसीलिए, इच्छा न होते हुये भी वह भाई के आग्रह के कारण इस हिल-स्टेशन पर आ गई है और अब घूमने निकल पड़ी है...
अनमनी, उदास, गंभीर।गोविंद उसकी इस उदासीनता, गंभीरता से अनजान था। वह बातूनी था, उत्साही था। चलते-चलते वह सुजाता को आसपास बिखरी हुई सृष्टि की सुंदरता दिखाने लगा। 'वो देखिए, कितना बढ़िया झरना बह रहा है। बरसात तीन महीने पहले बीत चुकी है, लेकिन यह झरना अभी भी बह रहा है। और उधर देखिए, उस पहाड़ के माथे को सफेद, भूरे बादलों ने ढक लिया है। कितना सुंदर दिखाई दे रहा है यह सब। है न?'
उसकी बातों के जवाब में सुजाता केवल 'हां, हूं' जैसी हुंकारी भर रही थी। मन तो उसका कहीं अलग ही था और इसीलिए एक संकरी पगडंडी पर चलते समय उसका एक पैर डगमगाया, शरीर का संतुलन बिगड़ा और वह बगल की एक गहरी घाटी की ओर झुक गयी।
गोविंद ने यह देख लिया। लपक कर उसने सुजाता का हाथ पकड़ा और अपनी ओर खींच लिया। सुजाता लगभग उसके शरीर पर गिर पड़ी।
उस तरूण, सशक्त शरीर के स्पर्श से सुजाता का शरीर सहसा रोमांचित हो उठा। उसकी सुप्त चाहत जाग उठी। कई क्षणों तक वह उसके शरीर से सटी रही, फिर अचानक शरमाकर अलग हो गयी। हां, उसकी ओर एकटक देखती जरूर रही।
उससे अलग हो जाने के बाद भी अपनी कलाई पर उसकी मजबूत हथेली का स्पर्श भी वह मन ही मन महसूस करती रही। वह यह भी भूल गयी कि उसकी और इस लड़के की आयु में लगभग दुगना अंतर है और यह विवाह सभी दृष्टियों से अनुचित है। वह तो बस सम्मोहित सी गोविंद की ओर देखती ही रही-देखती ही रही।
गोविंद भी उसकी ओर देखने लगा एकटक! अपलक! उसके चेहरे पर प्रसन्नता स्पष्ट झलक उठी।
तब सुजाता ने पूछा, 'इस तरह मेरी ओर क्यों देख रहे हो गोविंद? '
'आपकी सुंदरता देख रहा हूं मैंडम!' गोविंद ने कहा 'आप बहुत सुंदर हैं!'
इस शब्दों ने सुजाता के तन-मन को जैसे गुदगुदा दिया। फिर भी गोविंद का मन टटोलने के लिए उसने कहा,'अरे, मैं अब कहां सुंदर रह गयी हूं? मेरी उम्र की ढलान तो बस, अब शुरु ही होनेवाली है!'
गोविंद ने कहा, 'मैडम मेरी मां जब मरी थी तो उनकी भी उम्र इतनी ही थी! आपको देखकर मेरी मां ही मुझे याद आती है।'
'मां?'
'हां, मैडम! आप में मैं अपनी मां ही देख रहा हूं! वही उम्र, वही चेहरा.... आपसे बहुत कुछ मिलता हुआ!'
सुजाता जैसे आकाश से अचानक धरती पर गिर पड़ी। वह कुछ नहीं बोली। बुझी हुई आँखों से वह गोविंद की ओर देखने लगी। तीसरी बार पल्लवित होनेवाली उसकी आश-लता पर कठोर तुषारापात हो गया! ओह! उसकी नियति उसके साथ कैसी आंख मिचौली खेल रही है और वह भी कितनी क्रूर!!....

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