20 मार्च 2010

नाहरशाह वली बाबा की दरगाह

औरंगजेब भी नमाज अदा कर चुके हैं यहाँ


इंदौर के खजराना स्थित हजरत नाहरशाह वली बाबा की यह दरगाह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक मानी जाती है। यहाँ दोनों ही प्रमुख संप्रदाय के लोग एक साथ जियारत करते हैं। हर गुरुवार और शुक्रवार को तो सांप्रदायिक एकता का नजारा देखने लायक रहता है।

बुजुर्गों का कहना है कि यहाँ पर बादशाह औरंगजेब भी नमाज अदा कर चुके हैं। किसी समय यहाँ एक पहुँचे हुए फकीर बिलकुल एकांत में इबादत किया करते थे। वे अक्सर यही कहा करते कि मेरी मौत के बाद मय्यत को तहाज्जुद की नमाज के बाद दफनाना।

तहाज्जुद की नमाज उस व्यक्ति द्वारा पढ़ी जाए जिसने 12 वर्ष तक लगातार नमाज पढ़ी हो। एक दफा पीर के सेवकों को पता चला कि बादशाह औरंगजेब का लश्कर दिल्ली से दक्षिण की ओर जा रहा है।

इंदौर के खजराना स्थित हजरत नाहरशाह वली बाबा की यह दरगाह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक मानी जाती है। यहाँ दोनों ही प्रमुख संप्रदाय के लोग एक साथ जियारत करते हैं। हर गुरुवार और शुक्रवार को तो सांप्रदायिक एकता का नजारा देखने लायक रहता है।

सेवकों ने सारी बात बादशाह को बताई। इस पर बादशाह ने कहा कि वे तहाज्जुद की नमाज पढ़ने के काबिल हैं। इस प्रकार वे नमाज पढ़ने को तैयार हो गए। नमाज पढ़ने के बाद लाश दफन की गई। वहाँ एक छोटी-सी मजार बनाई गई। बुजुर्गों का कहना है कि यहाँ सच्चे खुदापरस्त बाबा नूरुद्दीन साहब की दरगाह है।

कैसे पड़ा 'नाहरशाह' नाम...

बुजुर्गों की मानें तो किसी जमाने में दरगाह के आसपास शेर टहला करते थे। और तो और अपनी पूँछ से वे पूरे आँगन की साफ-सफाई भी करते थे। शेरों को चूँकि 'नाहर' भी कहा जाता है। इसलिए यह दरगाह आज भी नाहरशाह के नाम से जानी जाती है।

बताते हैं कि यह दरगाह करीब सात सौ वर्ष पुरानी है। कहा जाता है कि यहाँ माँगने वालों की हर मुराद पूरी होती है।

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