20 मार्च 2010

नमाज का बयान

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है ऐ मेरे प्यारे मेहबूब तुम कह दो ईमान वालों से निगेहबानी करो सब नमाजों की (यानी पाँच वक्त की फर्ज नमाज़ों को उनके वक्तों पर अरकानें शरायत के साथ अदा करते रहो) और बीच के नमाज़ की (हज़रत इमामे आज़म अबुहनीफा और जमहूर सहाबा रदियल्लाहोत आला अनहु का मजहब यह है कि इससे नमाज़े अस्र मुराद है) (कंज़ुल ईमाम तर्जुमा क़ुरान पारा 2 रुकु 15 सफ़ा 92)।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया के इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर है-

इस बात की शहादत देना की अल्लाह तआला के सिवा कोई मअबूद नहीं और (हजरत) मोहम्मद मुस्तफा (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) उसके ख़ास बंदे और रसूल हैं।

* नमाज़ क़ायम रखना।
* जक़ात देना।
* हज करना।
* माहे रमजान के रोजे रखना।
(बुख़ारी शरीफ जिल्दे अव्वल सफ़ा 6)

प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने इरशाद फरमाया अगर किसी के घर के सामने नहर हो वह रोज़ (5) मर्तबा ग़ुस्ल करे तो क्या उसके बदन पर मैल रहेगा। सहाबा ने अर्ज़ की नहीं फ़रमाया यही मिसाल पाँच ऩमाज़ो की है। अल्लाह तआला नमाज़ों के सबब से सब खताओं को मिटा देता है और बंदा जब नमाज़ के लिए खड़ा होता है तो उसके लिए जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। उसके लिए अल्लाह तआला के बीच के परदे हटा दिए जाते हैं और हूरें उसका इस्तक़बाल करती हैं।

जब इन्सान सजदा करता है तो शैतान रोता हुआ भागता है और कहता है अफसोस कि इन्सान को सजदे का हुक्म हुआ उसने सजदा कर लिया उसको जन्नत मिली। मुझे सजदे का हुक्म हुआ मैंने इनकार किया और मुझे जहन्नुम मिली। और जब तुम्हारे बच्चे सात बरस के हो जाएँ तो उन्हें नमाज़ का हुक्म दो और जब दस (10) बरस के हो जाएँ तो मार के नमाज़ पढ़ाओ। (तिर्मिज़ी शरीफ जिल्दे 1 सफा 54 व इब्ने माजा शरीफ़ सफ़ा 58)

हज़रत अबु ज़र गफ्फारी फ़रमाते हैं रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम सर्दियों के मौसम में बाहर तशरीफ ले गए। पतझड़ का मौसम था आप ने एक दरख्त की दो शाख पकड़कर कर उन्हें हिलाया पत्ते उनसे झड़ने लगे। आप ने फरमाया ऐ अबुजर मैंने अर्ज किया हाजिर हूँ। फ़रमाया जब मुसलमान बंदा नमाज़ पढ़ता है और अल्लाह तआला की रज़ामंदी का इजहार करता है तो उसके गुनाह इस तरह गिरते हैं जैसे इस दरख्त के पत्ते झड़ते हैं। (मिशकात शरीफ़ जिल्द अव्वल सफ़ा 58)।

रसूलुुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया कि नमाज़ में मेरी आँखों की ठंडक रखी गई है और जन्नत की कुंजी नमाज़ है और नमाज़ की कुंजी तहारत है जिसने क़सदन (यानी बगैर किसी उज़र शरई के नमाज़ छोड़ दी) तो जहन्नुम के दरवाजे पर उसका नाम लिख दिया जाता है और उसका कोई दीन नहीं

नमाज़ दीन का सुतून है। क़यामत के दिन सबसे पहले बंदे से नमाज़ के बारे में पूछा जाएगा अगर उसकी नमाज़ें मुकम्मल हुईं तो उसके सारे आमाल क़ुबूल कर लिए जाएँगे और अगर नमाज़ मुकम्मल नहीं हुई तो उसके तमाम आमाल रद्द कर दिए जाएँगे। सबसे बुरा आदमी नमाज़ का चोर है। (मुकाशफ़ातुल कुलूब शरीफ स. 153)।

हज़रत अबु बक़र सिद्दीक़ रदिअल्लाहो तआला अन्हु नमाज़ के वक्त फरमाते हैं ऐ लोगों अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो आग लगाई है उठो और उसे नमाज़ के लिए बुझा दो। हज़रत अनस ने फ़रमाया शबे मैराज में सरकारे मदीना सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम के उम्मतियों पर पचास वक्त की नमाज़ें फ़र्ज की गईं, फ़िर कम की गईं। यहाँ तक की पाँच रह गईं। आवाज़ दी गई ऐ मेरे मेहबूब इन पाँच के अन्दर ही पचास का सवाब है (बुख़ारी शरीफ़ जिल्दे अव्वल स.50)।

मसअला- हर आकिल, बालिग़ पर नमाज़ फ़र्ज है। उसकी फ़रज़ीयत का मुनकिर काफ़िर है और जान-बूझकर छोड़ दे अगर चे एक वक्त की हो वह फ़ासिक़ है। जो नमाज़ न पढ़ता हो उसे क़ैद में रखा जाए जब वह तोबा करके नमाज़ पढ़ने लगे तब रिहा किया जाए। इमाम मालिक, इमाम शाफई, इमाम अहमद के नजदीक सुलताने इस्लाम उसके क़त्ल का हुक्म दें।

मसअला- किसी से नमाज़ पढ़ने को कहा उसने जवाब दिया नमाज़ तो पढ़ता हूँ पर उसका कुछ नतीजा नहीं या कहा तुमने नमाज़ पढ़ी क्या फायदा हुआ या कहा नमाज़ पढ़कर क्या करूँ किसके लिए पढ़ूँ माँ-बाप तो मर गए हैं या कहा बहुत पढ़ ली अब दिल घबरा गया है या कहा पढ़ना न पढ़ना दोनों बराबर है। गर्ज़ की इस क़िस्म की बातें करना जिससे फ़रज़ियत पर इनकार करना समझा जाता हो या नमाज़ की तौहीन हो यह कुफ्र है और ऐसा कहने वाला काफिर है। हिज़रत से पहले मेराज की रात में नमाज फर्ज हुई और जकात और जिहाद व रोज़ा 2 हिजरी में फ़र्ज़ हुए। (तफ़सीर नईमी जि. 5 स. 264)।

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