21 अप्रैल 2010

कलचुरि कालीन संस्कृतिक इतिहास



 नोहटा की भौगोलिक स्थिति- 23 40 उत्तरी अक्षांश तथा 79 30 पूर्वी देशांतर पर व्यारमा नदी की सहायक गोरया तथा व्यारमा के संगम पर है। दमोह से दक्षिण पूर्व की ओर नोहटा-जबलपुर मार्ग पर दमोह से 23 किलोमीटर की दूरी पर नोहटा नामक कस्बा है। कस्बे से एक कि.मी. जबलपुर मार्ग के बांई ओर कलचुरि शिखर का शिव मंदिर अवस्थित है। स्थानीय निवासे इसे "मढा" कहते हैं।

त्रिपुरी के कलचुरि-नरेश युधराज देव प्रथम के शासनकाल में उसकी धर्मात्मा पत्नी महारानी नोहला देवी द्वारा शैवाचार्यों के निर्देशन में यहां नोहलेश्वर शिव मन्दिर की स्थापना कराई गई। इसका निर्माण काल ईस्वी माना गया है। कलचुरियों के शासनकाल में त्रिपुरी, मडाघाट, बिलहारी, कारीतलाई, नोहटा, गुबरा, दोनी, कोडल, सोहागपुर, अमरकंटक, गुर्गी, चंद्रेहे आदि उल्लेखनीय कला केन्द्र थे। संस्कृत के सुप्रसिद्ध लेखक महाराज राजशेखर तथा अनेक विद्वानों और शैवाचार्यों ने कलचुरि-नरेशों के संरक्षण में कला तथा साहित्य के सृजन में महान योगदान दिया था।

कलचुरि शासन काल में इस भूभाग का चहुंमुखी विकास हुआ। काल विशेष में धर्म, साहित्य एवं कला-संस्कृति अपने चर्मोत्कर्ष पर थी, फ़लस्वरूप नोहलेश्वर मन्दिर का संस्कृतिक समरसता के सौहार्द्र में अभूतपूर्व योगदान रहा। ग्राम्य जीवन के संस्कृतिक पहलू को जानने के लिये स्मारक उपयोगी रहे हैं। कतिपय नोहटा ग्रामवासियों के मकानों की भित्तियों, अन्य कई स्थलों पर चतुर्भुजी देवी, नवग्रह, युगल प्रतिमाएं, चतुर्भुजी कंकाली, दण्डधर शिव, गजासुर संहारक शिव, पार्वती, गणेश आदि की प्रतिमाओं के अतिरिक्त वास्तुकला के अवशेष विघमान हैं। मन्दिर परिसर में 20 प्रतिमाएं संरक्षित हैं जो विविध देवी-देवताओं की हैं।

वर्तमान पुरातत्व शास्त्रियों के पुरातत्वीय अध्ययन के फ़लस्वरूप दमोह जिले के इतिहास को जानने में नोहलेश्वर मन्दिर के महत्व को नहीं भुलाय जा सकता है। तत्कालीन समय में शैव सम्प्रदाय उपासना, धर्मिक सद्भावना, सहिष्णुता, संस्कृतिक मेल-जोल की भावना को उजागर करता है।

क्षेत्र विशेष के अन्तर्गत जिले के ऐतिहासिक स्थलों पर नजर डालें तो कुण्डलपुर, नोहटा, कोडल, सकोर, बव्यिगढ, रनेह, हिण्डोरिया, सगोरिया, चौपडापट्टी, गुबारा, दोनी, मोहड, डूमर, बडगवां, छितराखेडा, फ़तेहपुर आदि स्थानों से क्षेत्र विशेष का परवर्ती इतिहास ज्ञात होता है।

क्षेत्र विशेष से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि दसवीं सदीं से लेकर 13वीं सदीं तक दमोह क्षेत्र के अंतर्गत कलचुरी कालीन काल का चहुंमुखी विकास हुआ। कलचुरी काल में विवेच्य क्षेत्र की समर्धि हुई। कल्च्चुरी शासक युवराज देव प्रथम गांगेयदेव लक्ष्मी कर्ण के समय में इस क्षेत्र में मंदिरों तथा मूर्तियों का व्यापक निर्माण करवाया गया। कलचुरी कालीन आरंभिक मूर्तिकला उच्चकोटि की थी। उसमें सुव्यवस्थित अंग-विन्यास के साथ-साथ भाव-प्रदशन का अत्यंत रोचक समन्वय मिलता है। कलचुरी शासकों ने साहित्यकारों तथा कुशल कलाकारों को राजाश्रय प्रदान किया।

युवराज देव प्रथम ईसवी सन 915 से 1945  तक कलचुरी शासक थे। वे अप्रतिम वीर, नीतिज्ञ तथा उदार शासक थे। युवराज देव के उतराधिकारी एवं अन्य सामयिक राजवंशों के लेखों में इस रजा के सम्बन्ध में पर्याप्त विवरण उपलब्ध है। राजशेखर कृत संस्कृत रचना विद्वशालभंजिका में भी इस राजा के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। युवराज देव का अन्य नाम कपूर्वर्ष अथवा कपूर्वर्ष प्राप्त होता है। इसके पुत्र द्वितीय लक्ष्मण राज के कारीतालाई शिलालेख में उसके विविध सैन्य अभियानों का विवरण है। बिल्हारी अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने गौड़(बंगाल), कर्णाट(कर्नाटक), गुजरात(लाट), कलिंग(उडीसा) तथा कश्मीर पर आक्रमण किया और उन प्रदेशों की रमणियों से विवाह किया। चन्देल रजा यशोवर्मा के अभिलेख में युव्राज देव के प्रताप का वर्णन निम्न पद ’विख्यात क्षितिपाल मौलीरचना विनय स्तपादाम्बुज’ (जिसने अपना पद-कमल प्रख्यात नरेशों के सिर पर स्थापित किया), में किया गया है। उसने सम्राट पड़ की सूचक पदवियां-परमेश्वर, चक्रवर्ती तथा त्रिकलिंगाधिपति धारण कर राखी थीं। राजशेखर कृत विद्वशाळाभंजिका नाटक के चतुर्थ अंक में युवराज देव द्वारा विभिन्न प्रदेशों पर विजय की चर्चा अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से की गयी है। द्वितय लक्ष्मण राज के कारीतालाई अभिलेख के अनुसार युवराज देव ने गुर्जर प्रतिहार नरेश महिपाल पर विजय प्राप्त की थी उसने गौदाधिपति, मालवनृपति और इसी तरह दक्षिण कौशालाधिपति को पराजित किया था। राष्ट्रकूट नृपति इन्द्र ने किसी कलचुरी राजकन्या से विवाह किया था। उसकी कन्नौज की चढ़ाई के समय युवराज देव ने उसे मदद पहुंचाई थी। राष्ट्रकूट और कलचुरि की सामूहिक शक्ति के समक्ष प्रतिहार नरेश महिपाल न टिक सका और उसे भी अपनी राजधानी छोड़कर भागना पडा और तभी से प्रतिहारों के साम्राज्य का ह्वास होने लगा। सुप्रसिद्ध संस्कृत कवी राजशेखर कन्नौज में प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल और महिपाल के आश्रय में थे। इस आक्रमण के बाद वे त्रिपुरी आये। वहां उन्हों "विद्वशालभंजिका" नामक नाटिका और संस्कृत साहित्य पर काव्य मीमांसा नामक एक बहुमूल्य ग्रन्थ की रचना की थी। माना जाता है कि चंदेल वंशीय त्रैलोक्यवर्मन ने 1211 ई. के लगभग त्रिपुरी के विजय सिंह को पराजित करके उसकी साम्राज्य सत्ता अपनी हाथों में ले ली थी। त्रैलोक्यमल्ल को चंदेलवंश का त्रैलोक्यवर्मन माना गया और यह निष्कर्ष निकाला गया कि उसने कलचुरी विजय सिंह से यह प्रदेश छीन लिया था।

माण्डला जिले के झूलपुर ग्राम से प्राप्त ताम्रपत्र द्वारा जानकारी मिलती है कि कलचुरी राजा विजय सिंह का पुत्र त्रैलोक्यममल्ल था। उसका जन्म 1197 ई. में हुआ था| चूंकि चंदेल त्रैलोक्यवर्मन की मृत्यु 1245 में हो चुकी थी, इसलिये 1250 ई. में राज्य करने वाला त्रिकलिंगाधिपति त्रैलोक्यवर्मन देव वास्तव में विजय सिंह का पुत्र कलचुरी राजा त्रैलोक्यमल्ल था। कलचुरी नरेश त्रैलोक्यमल्ल 1250 ई. तक राज्य करता रहा, लेकिन उसके बाद त्रिपुरी के कलचुरी वंश के इतिहास का अध्याय समाप्त होता है।

20 अप्रैल 2010

वास्तु शास्त्र


वास्तु शास्त्र में गणपति

जब भी हम कोई शुभ कार्य आरंभ करते हैं, तो कहा जाता है कि कार्य का श्री गणेश हो गया। इसी से भगवान श्री गणेश की महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है। जीवन के हर क्षेत्र में गणपति विराजमान हैं। पूजा-पाठ, विधि-विधान, हर मांगलिक-वैदिक कार्यों को प्रारंभ करते समय सर्वप्रथम गणपति का 'सुमरन' करते हैं।हिन्दू धर्म में भगवान श्री गणेश का अद्वितीय महत्व है। यह बुद्धि के अधिदेवता विघ्ननाशक है। 'गणेश' शब्द का अर्थ है- गणों का स्वामी। हमारे शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा चार अंतःकरण हैं तथा इनके पीछे जो शक्तियाँ हैं, उन्हीं को चौदह देवता कहते हैं।देवताओं के मूल प्रेरक भगवान गणेश हैं। गणपति सब देवताओं में अग्रणी हैं। भगवान श्री गणेश के अलग-अलग नाम व अलग-अलग स्वरूप हैं, लेकिन वास्तु के हिसाब से गणपति के महत्व को रेखांकित करना आवश्यक है। वास्तु शास्त्र में गणपति की मूर्ति एक, दो, तीन, चार और पाँच सिरोंवाली पाई जाती है। इसी तरह गणपति के तीन दाँत पाए जाते हैं। सामान्यतः दो आँखें पाई जाती हैं। किन्तु तंत्र मार्ग संबंधी मूर्तियों में तीसरा नेत्र भी देखा गया है। भगवान गणेश की मूर्तियाँ दो, चार, आठ और 16 भुजाओं वाली भी पाई जाती हैं। चौदह प्रकार की महाविद्याओं के आधार पर चौदह प्रकार की गणपति प्रतिमाओं के निर्माण से वास्तु जगत में तहलका मच गया है।यहाँ इन्हीं चौदह गणपति प्रतिमाओं के वास्तु शास्त्र के आलोक में एक नजर डालते हैं तथा उनके महत्व को दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं।संतान गणपतिः भगवान गणपति के 1008 नामों में से संतान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए, जिनके घर में संतान नहीं हो रही हो। वे लोग संतान गणपति की विशिष्ट मंत्र पूरित प्रतिमा (यथा संतान गणपतये नमः, गर्भ दोष घने नमः, पुत्र पौत्रायाम नमः आदि मंत्र युक्त) द्वार पर लगाएँ, जिसका प्रतिफल सकारात्मक होता है।पति-पत्नी प्रतिमा के आगे संतान गणपति स्रोत का पाठ नियमित रूप से करें, तो शीघ्र ही उनके घर में संतान प्राप्ति होगी। साथ ही परिवार अन्य व्यवधानों से मुक्ति पाएगा। मात्र इतना कर देने से अन्य दूसरे धार्मिक अनुष्ठान पर किए जाने वाले खर्च से मुक्ति पा लेंगे।विघ्नहर्ता गणपतिः 'निर्हन्याय नमः', अविनाय नमः जैसे मंत्रों से युक्त विघ्नहर्ता भगवान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए, जिस घर में कलह, विघ्न, अशांति, क्लेश, तनाव, मानसिक संताप आदि दुर्गुण होते हैं। पति-पत्नी में मन-मुटाव, बच्चों में अशांति का दोष पाया जाता है। ऐसे घर में प्रवेश द्वार पर मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। शीघ्र चमत्कार होगा।


इन्हें भी देखें :-

भवन-निर्माण में वास्तु का महत्व
लियुली वैल्थ पांट
घर में लाएं सकारात्मक ऊर्जा और सुख समृद्धि
फेंगशुई के कुछ टिप्स
फेंगशुई: डबल ड्रैगन
वास्तुशास्त्र संबंधी सामान्य नियम
वास्तुदोष भी प्रभवित करते हैं जीवन को
अविवाहित किस दिशा में सोएँ
ऑरा चिकित्सा
आँगन : मकान का केन्द्रीय स्थल
शनि ग्रह और वास्तु
आग्नेय में स्थापित करें रसोईघर
वास्तु बदलें भाग्य बदलेगा
वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय
वास्तु दोष निवारक यन्त्र
वास्तु एवं वृक्षारोपण
वास्तु का मौलिक रूप एवं मानव जीवन में इसका महत्व
वास्तुसम्मत कार्यालय के कुछ महत्वपूर्ण उपाय
वास्तुशास्त्र का उद्रम
व्यापार केंद्र के वास्तु सूत्र
अपनी प्रोपर्टी के आप स्वयं बनें वास्तुकार
लाभकारी वास्तु टोटकें
वास्तुदोष निवारण के आसान उपाय

चॉकलेट मेकिंगः नया स्वाद - कॅरियर का

चॉकलेट बनाने का काम करने वालों को चॉकलेटियर कहते हैं। ये कुलिनरी ज्ञान में दक्ष तो होते ही हैं, लेकिन चॉकलेट को ज्यादा आकर्षक बनाने व दिखाने का कलात्मक पुट भी इनमें मौजूद होता है। चॉकलेट निर्माण को महज एक कला नहीं कहा जा सकता। इनके काम में चॉकलेट बनाने की केमिस्ट्री जानना भी शामिल है। इस कॅरियर में पढ़ाई के साथ ही काम का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

कार्य का स्वरूप
चॉकलेटियर बनने के लिए बहुत धर्य और दृढ़ता की आवश्यकता होती है। साथ ही अपने द्वारा तैयार की हुई चॉकलेट को थोड़े-थोड़े समय बाद नवरूप देने की कलात्मक योग्यता की भी दरकार होती है। रोजमर्रा के कार्य में चॉकलेट बनाने वाले यंत्रों की कार्यप्रणाली, सफाई व रखरखाव, निर्माण कार्य की शिडच्यूलिंग, ऑर्डर लेना, सामग्री तैयार करना और अंत में तैयार उत्पाद को गुणवत्ता के आधार पर जांचना शामिल है। व्यापार के विस्तार के अनुरूप इनके काम में बदलाव संभव हैं।

व्यावहारिक समझ
चॉकलेट के इतिहास, फ्लेवर और गुणों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि चॉकलेट से विभिन्न तरह के डेजर्ट, कैंडीज और स्कल्पचर तैयार कर सकें। बाजार में उपलब्ध कई तरह की चॉकलेट्स और उनके सही उपयोग के बारे में पता होना चाहिए। तीन तरह की चॉकलेट (सफेद, मिल्क व डार्क) की खूबी व इसे सबसे अच्छे आकार में सामने लाने का ज्ञान भी इनके लिए आवश्यक है।

योग्यता
द कुलिनरी इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका के अनुसार चॉकलेटियर के पास कलात्मक सोच के साथ ही सफल व्यापार संचालन के लिए जरूरी बातें होना आवश्यक हैं। हालांकि कुछ चॉकलेटियर्स ने औपचारिक शिक्षा लिए बगैर भी सफलता पाई है और नाम कमाया है, लेकिन कुलिनरी स्कूल से तकनीकी व व्यावहारिक शिक्षा लेने के बाद ही इसमें प्रवेश करना बेहतर रहता है। अब तो इस विधा से जुड़े ऑनलाइन कार्यक्रम भी शुरू हो चुके हैं, लिहाजा यह आपको तय करना है कि कक्षागत पढ़ाई को प्राथमिकता देंगे या ऑनलाइन को।

अनुभव
प्रशिक्षु को किसी स्थापित चॉकलेटियर का हाथ बंटाते हुए कार्य की बारीकियां सीखना चाहिए। इसमें इंटर्नशिप और हर स्तर पर कार्य करते हुए सीखने के प्रशिक्षण को कुछ समय तक जारी रखा जा सकता है। इस तरह शिक्षण के बाद व्यावहारिक शिक्षा का भी ज्ञान हो जाता है। इस तरह से अपना कार्य शुरू करने से पहले व्यवसाय की बारीकियां भी जान लेते हैं। अनुभवी चॉकलेटियर शानदार और कलात्मक चॉकलेट पीस भी तैयार करते हैं।

संभावनाएं
आवश्यक शिक्षण-प्रशिक्षण लेने और किसी स्थापित ब्रांड के साथ कार्यगत अनुभव लेने के बाद आप अपना काम शुरू कर सकते हैं। अपना काम शुरू करने में मेहनत, धर्य और सजगता की आवश्यकता होती है। फिर भी ज्यादातर लोग किसी दूसरे के साथ जुड़कर कार्य करने से ज्यादा प्राथमिकता अपना काम शुरू करने को देते हैं। वेबसाइट ह्यद्बद्वश्चद्य4द्धद्बrद्गस्र.ष्oद्व के अनुसार बीते कुछ वर्षो में इस व्यवसाय में 52 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है। इस वेबसाइट के अनुसार वेतन या आपकी कमाई अनुभव, कार्यरत या स्वयं संचालित कंपनी की तरक्की व ब्रांड वेल्यू के अनुसार बढ़ती है। इस इंडस्ट्री से जुड़ने का एक और विकल्प चॉकलेट टेस्टर बनने का भी है। इसके अलावा रिसर्च व डेवलपमेंट का कार्य संभालते हुए नई-नई रेसिपी भी ईजाद कर सकते हैं।

कोर्स
भारत में इस संबंध में कम ही कोर्स मौजूद हैं। दिल्ली स्थित चॉकलेट क्लासेज एंड मटेरियल इंस्टीट्यूट में प्रोफेशनल चॉकलेट मेकिंग, चॉकलेट डेकोरेशन, चॉकलेट पैकेजिंग और सेमी प्रोफेशनल चॉकलेट मेकिंग का कोर्स

करवाया जा रहा है। मुंबई बैरी कैलेबॉट चॉकलेट एकेडमी भी देश का एक प्रतिष्ठित संस्थान है। यहां एक और दो दिन के स्पेशल कोर्स भी हैं जो क्रमश: 3500-7000 रुपए में हो सकते हैं। ऑनलाइन कोर्सेज की बात करें तो वैंकुवर, कनाडा स्थित इकोल चॉकलेट संस्थान इस बाबत ऑनलाइन कोर्स करवाता है।

मिथक
ज्यादातार लोग इस पेशे से इसलिए जुड़ते हैं, क्योंकि उन्हें चॉकलेट खाने का शौक होता है। यह बात कुछ हद तक तो जायज है लेकिन जब बात कलात्मक नजरिये, व्यापारिक सोच और संप्रेषण की शानदार कला की आती है तो कई लोग पिछड़ जाते हैं। ऐसे में यह ध्यान रखना जरूरी है कि आप सिर्फ शौक के तहत इस उद्योग से जुड़ रहे हैं या वास्तव में चॉकलेट निर्माण से जुड़ने की धुन है।

वेतन
चॉकलेट टेस्टर के तौर पर आप किसी कंपनी में शुरुआत से ही अच्छा वेतन पा सकते हैं। ट्रेनिंग के क्षेत्र से जुड़कर आप एक सत्र में एक-दो हजार रुपए तक कमा सकते हैं। चॉकलेटियर्स की सबसे ज्यादा खपत हॉस्पिटेलिटी इंडस्ट्री में है, जहां इनका शुरुआती वेतन 8-10 हजार रुपए होता है।

टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग

टेलीकम्युनिकेशन का क्षेत्र दुनिया में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह क्षेत्र हमारे रोजमर्रा के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी मदद से ही हम दूर बैठे लोगों के संपर्क में रह पाते हैं। इस तकनीक की मदद से ही हम उन्हें देख और बातचीत कर पाने में सक्षम हो पाए हैं। सूचना व संचार के इस दौर में संप्रेषण के बेहतर डिजिटल माध्यम जैसे मोबाइल, इंटरनेट और सैटेलाइट सेवाएं और विस्तृत हो रही हैं। नतीजतन इस तकनीक में पेशेवर और दक्ष लोगों की मांग भी बढ़ रही है, जो टेलीकॉम इंडस्ट्री को महत्वपूर्ण बना रहे हैं।

कार्य का स्वरूप
डिजिटल और वायरलेस प्रसारण के दौर में माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सिग्नल प्रोसेसिंग, डाटा नेटवर्किग, कोडिंग, एनक्रिप्शन और ट्रांसमिशन में रुचि रखने वाले इस क्षेत्र में कॅरियर बना सकते हैं। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर लाइन, वायरलेस और रेडियो संचार से डील करते हैं। इनके द्वारा किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यो में ग्राहक की मांग के अनुरूप टेलीकम्युनिकेशन के उपकरणों का निर्माण, रखरखाव, इंस्टॉलेशन और समस्या का निवारण शामिल है। नेटवर्क के रखरखाव, उत्पाद की गुणवत्ता और टेलीकॉम उद्योग के लिए नए सॉफ्टवेयर विकसित करने की जिम्मेदारी इन्हीं की है। इन्हें फाइबर ऑप्टिक्स, सेलुलर तकनीक और लेजर तकनीक का भी अच्छा ज्ञान होना चाहिए।

विस्तृत विषय
विशेषज्ञता की दरकार रखने वाले इस क्षेत्र में योग्यता और प्रशिक्षण दोनों की आवश्यकता होती है। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग मंे अध्ययन व विकास, निर्माण, मरम्मत, सेल्स, मार्केटिंग और शिक्षण मुख्य हैं। इन विषयों से स्नातक विशेषज्ञ डेवलपमेंट, प्रोडक्शन, क्वालिटी एश्योरेंस, सेल्स, सर्विसिंग या सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन सकते हैं।

शैक्षणिक योग्यता
फिजिक्स, केमिस्ट्री व मैथ्स पर अच्छी पकड़ रखने वाले छात्र इसे कॅरियर के विकल्प के तौर पर अपनाकर स्नातक या स्नातकोत्तर कर सकते हैं। टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर बनने के लिए स्नातक (बीई/बीटेक), स्नातकोत्तर (एमई/एमटेक) या डिप्लोमा होना आवश्यक है। रोजगार के बेहतर विकल्प के लिए इसमें एमबीए भी किया जा सकता है।

कोर्स
चार वर्ष के बीई/बीटेक, दो वर्ष के एमई/एमटेक के अलावा इस विषय में दो वर्ष का एमबीए और एक वर्ष का डिप्लोमा कोर्स भी मौजूद है। इसके अलावा तीन माह के सर्टिफिकेट कोर्स भी कुछ संस्थान करवा रहे हैं। डिप्लोमा कोर्स में छात्रों को टेलीकम्युनिकेशन के विभिन्न उपकरण जैसे मोबाइल फोन, केबल टीवी, सैटेलाइट, कंप्यूटर नेटवर्किग, राडार, नेविगेशन वगैरह की जानकारी दी जाती है। इसके अलावा मोबाइल टेलीफोनी, जीएसएम आर्किटेक्चर, इंटरनेट प्रोटोकॉल मीडिया सिस्टम, सीडीएमए, जीपीआरएस नेटवर्क और ऑप्टिकल नेटवर्क पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

व्यक्तिगत कौशल
टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर बनने के लिए व्यक्तिगत योग्यताओं में संप्रेषण की कला, संगठनात्मक योग्यता, स्थिति का आकलन कर त्वरित फैसले लेने और समस्याओं को सुलझाने की समझ होनी चाहिए। टीम के साथ मिलकर कार्य करना, कंप्यूटर हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर की पूरी जानकारी होना भी आवश्यक है।

रोजगार के अवसर
इस उद्योग में आए बूम से देश-विदेश में टेलीकॉम इंजीनियर के लिए रोजगार के विकल्प बढ़ रहे हैं। टेलीकॉम इंजीनियर टेलीफोन, टेलीग्राफ, राडार, रेडियो, टेली प्रिंटर को सूचना माध्यमों के लिए और बेहतर व विकसित करने के लिए कार्य करते हैं। इस विधा में दक्ष लोगों के लिए टेलीकॉम इंडस्ट्री में कई मौके हैं, डिजाइन, निर्माण, रखरखाव, इंस्टॉलेशन और समस्या के निवारण में विशेषज्ञता रखने वालों के लिए एमटीएनएल, बीएसएनएल, रिलायंस, वोडाफोन, एयरटेल और नोकिया जैसी कंपनियों में काफी विकल्प मौजूद हैं। बीएसएफ, सीआरपीएफ और सेना में भी कम्युनिकेशन विशेषज्ञों की जरूरत होती है।

टेलीकम्युनिकेशन में दो-तीन वर्ष का अनुभव प्राप्त करके शिक्षण की तरफ भी जाया जा सकता है। इस विषय में एमबीए करने के बाद मैनेजेरियल जॉब भी एक विकल्प है। अगर रिसर्च व विकास में भागीदारी करना चाहते हैं तो इस दिशा में भी कदम बढ़ाए जा सकते हैं। इस क्षेत्र में नित नए अनुसंधान हो रहे हैं ताकि बदलते दौर के साथ कदमताल मिलाई जा सके। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें आपके लिए विदेशों में भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

पारिश्रमिक
टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर का पारिश्रमिक उसके अनुभव, शैक्षणिक योग्यता और व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर करता है। यहां सरकारी संस्थाओं के मुकाबले निजी संस्थानों में बेहतर वेतन मिलता है। संस्थानों के अनुरूप स्नातकों के लिए 10 हजार रुपए से शुरुआत हो सकती है। कुछ वष्रो का अनुभव के बाद 20 हजार रुपए से अधिक वेतन हासिल किया जा सकता है।

कोर्स करवाने वाले संस्थान
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) के सभी केंद्र।
राजस्थान विधापीठ यूनिवर्सिटी, उदयपुर
किंग्सटन पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट, परगनास, पश्चिम बंगाल
महाकौशल इंस्टीट्यूट ऑफ इंजी. एंड टेक्नोलॉजी, बिलासपुर

एक्सपोर्ट मैनेजमेंट में भविष्य का प्रबंधन

विदेश व्यापार में इजाफा होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुचि लेने वालों के लिए रोजगार के नए द्वार खुल रहे हैं। अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण ने भी आयात-निर्यात के क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाए हैं। इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा उन लोगों की मांग है जो आयात-निर्यात के तरीकों, विदेश नीति, एक्सिम पॉलिसी, एक्सपोर्ट डॉक्यूमेंटेशन और इससे जुड़े दूसरे विषयों के पेशेवर हैं। इन लोगों की सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट हाउस, ट्रेडिंग कंपनियों, वेयरहाउस, सुपर स्टार ट्रेडिंग हाउस, निर्यात से जुड़ी इकाइयों और निर्यात को बढ़ावा देने वाली समितियों में जरूरत होती है।

इसके अलावा आयात विशेषज्ञों को नियुक्त करने वालों में कार्गो क्लीयरिंग, मरीन इंश्योरेंस कंपनियां और पैकेज उद्योग प्रमुख हैं। फॉरेन ट्रेड डेवलपमंेट सेंटर, दिल्ली के निर्देशक केएल भाटिया के अनुसार, ‘अंतरराष्ट्रीय व्यापार तेज गति से विकास कर रहा है और रोजगार के नए मौके सामने आ रहे हैं। कई ट्रेडिंग और सुपर ट्रेडिंग हाउस अपने विदेशी दफ्तरों में इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की नियुक्ति को तत्पर हैं।’

कार्य का प्रारूप
एक्सपोर्ट मैनेजमेंट प्रोफेशनल का काम बहुत जिम्मेदारी का होता है, क्योंकि आपकी जरा सी भी गलती कंपनी को लाखों की चपत लगा सकती है। इस काम में कंपनी द्वारा निर्मित निर्यात होने वाले उत्पादों की मार्केटिंग, विदेशी व्यापार से जुड़ी कागजी कार्रवाई व जानकारी के अलावा पोत-परिवहन और पैकेजिंग की जानकारी होना जरूरी है। बड़ी कंपनियों में उच्च स्तर पर ऐसे पेशेवरों को नियुक्त किया जाता है जो कंपनी के सभी विदेशी कारोबार व लेन-देन की व्यवस्था बना पाएं।

योग्यता
एक्सपोर्ट मैनेजर विदेशों में कंपनी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके द्वारा निभाई जाने वाली अन्य जिम्मेदारियों में ग्राहक से जुड़े मसले सुलझाना, परिवहन, लाइसेंस, व्यापार समझौते और शीघ्र भुगतान करवाना शामिल है। इसके लिए न्यूनतम स्तर पर एक्सपोर्ट मैनेजमेंट व अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्नातक का कोर्स करना अनिवार्य है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एमबीए करने के लिए छात्रों को संयुक्त प्रवेश परीक्षा से गुजरना पड़ता है। कुछ निजी शिक्षण संस्थान जैसे फॉरेन ट्रेड डेवलपमेंट सेंटर इसमें पीजी डिप्लोमा भी करवाते हैं। यह अपनी प्रवेश परीक्षा के जरिए ही प्रवेश देते हैं। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्नीकल एजुकेशन के तहत आने वाले कई संस्थान इसके कोर्स करवा रहे हैं। शैक्षणिक योग्यता के अलावा, व्यापार की तरफ रुझान, संप्रेषण की कला में निपुणता और आत्मविश्वास आवश्यक गुणों में शामिल है।

पेशेवरों का पारिश्रमिक
एक्सपोर्ट मैनेजमेंट में डिग्री लेने के बाद पेशेवरों को शुरुआत में 60-95 हजार सालाना वेतन मिल सकता है। अच्छे संस्थान से डिग्रीधारी, एक या ज्यादा विदेशी भाष के जानकार और अनुभवियों को दूसरों से ज्यादा अच्छा मेहनताना मिलता है।

बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में बनाएं कॅरियर

बायोमेडिकल इंजीनियरिंग (बीएमई) यांत्रिकी की एक उभरती हुई और रोमांचक शाखा है। इसमें अध्ययन, विकास और रोजगार के लिए काफी संभावनाएं हैं।

कार्य का स्वरूप
इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को चिकित्सा संबंधी समस्याओं को इंजीनियरिंग की शब्दावली में परिभाषित करना आना चाहिए। ये ऐसे उपकरणों का डिजाइन और निर्माण करते हैं जो यांत्रिकी और क्लीनिकल लिहाज से उपयोगी हों, जिसमें कार्डिएक मॉनिटर्स, क्लिनिकल कंप्यूटर्स, कृत्रिम हृदय, कॉन्टैक्ट लैंस, व्हील चेयर तक शामिल हैं। मशीनरी को दुरुस्त रखने और इनके व्यवस्थापन के लिए भी इनकी महती आवश्यकता पड़ती है।

शैक्षणिक योग्यता
बायोमेडिकल इंजीनियर बनने के लिए बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करना आवश्यक है। यह चार वर्षीय कोर्स कई विश्वविद्यालयों से करवाया जा रहा है। इसके लिए संबंधित विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा देनी पड़ती है। इसके बाद बीएमई में स्नातकोत्तर भी किया जा सकता है।

व्यक्तिगत योग्यता
बायोमेडिकल प्रोफेशनल का अच्छा इंजीनियर होना और लाइफ साइंस प्रणाली व तकनीक की तरफ झुकाव होना चाहिए। इंजीनियरिंग की बढ़िया जानकारी, लिखने व बात करने की संप्रेषण कला और बायोलॉजी में रुचि होना चाहिए। टीम के सदस्य बनकर कार्य करने, विश्लेषणात्मक सोच व्यक्तिगत योग्यताओं में शुमार की जाती हैं।

बीएमई की शाखाएं
बायोमेडिकल इंजीनियर कुशल वैज्ञानिक भी होते हैं। इस विस्तृत क्षेत्र की कई शाखाएं हैं।
बायोइंस्ट्रूमेंटेशन- यह उपकरणों का निर्माण करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और नापतौल की तकनीक का उपयोग करते हैं, जिससे बीमारियों की पहचान और उपचार बेहतर तकनीक से किया जा सके।
बायोमटेरियल्स- विज्ञान की यह शाखा प्राकृतिक मटेरियल का उपयोग कर मेडिकल तकनीक के विकास के लिए करती है।

सेलुलर, टिश्यू, क्लीनिकल इंजीनियरिंग- यह ऐसी तकनीक है जो कृत्रिम रक्त वाहिकाओं, अंग, त्वचा व हड्डियों की प्रतिस्थापना के लिए उपयोगी है। क्लीनिकल इंजीनियरिंग की उपयोगिता अस्पतालों में मेडिकल उपकरण व औजारों का सही रिकॉर्ड रखने में भी पड़ती है।
ऑर्थोपेडिक बायोइंजीनियरिंग- यह ऐसा विज्ञान है जिससे हड्डियों, मांसपेशियों और जोड़ों की कार्यप्रणाली को समझने में मदद मिलती है। यह आर्टीफिशियल ज्वाइंड रिप्लेसमेंट को डिजाइन व डेवलप करने में मददगार है।

रोजगार के अवसर
बायोमेडिकल इंजीनियरों के लिए आर एंड डी के क्षेत्र में काम करने के व्यापक अवसर हैं। इसके अलावा प्रयोगशालाओं में पर्यवेक्षण करने व मशीनों के व्यवस्थापन में बीएमई काम आते हैं। इस क्षेत्र मंे दूसरे वरिष्ठ शोधकर्ताओं के साथ जुड़कर भी कार्य किया जा सकता है। बीपीएल, लार्सन एंड टूब्रो, विप्रो मेडिकल और सीमंस जैसी कंपनियां इन्हें योग्यता व प्राथमिकता के आधार पर अपने आर एंड डी, सेल्स व मार्केटिंग विभाग में जगह देती हैं। क्लीनिकल व रीहेबिलिटेशन इंजीनियर्स की तो विदेशों मंे भी भारी मांग है।

और भी हैं राहें
हेल्थकेयर व मेडिसिन के साथ ही इंजीनियरिंग का ज्ञान रखने वालों के लिए बॉयोमेडिकल इंजीनियरिंग उचित कॅरियर विकल्प बन सकता है। यह बायोलॉजी व इंजीनियरिंग के सिद्धांतों को एक साथ उपयोग में लाने की विधा है।

शालीनता से जीतें सबका मन

ऑफिस में काम करते हुए हमारे समक्ष कई बार ऐसे वाकये पेश आते हैं, जहां हमें मुश्किलों से पार पाने के लिए वाकचातुर्य और शालीन प्रस्तुति का सहारा लेना पड़ता है। सामने वाले के साथ सलीके से पेश आना आज की बड़ी जरूरत बन चुकी है। यह विरोधियों को साधने की भी अचूक कला है। वैश्वीकरण के इस दौर में खुद को सलीके से पेश करना बेहद जरूरी हो गया है।

आखिरकार बात हमारे अलावा कंपनी की भी प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है। वैसे तो हर कार्यस्थल के एटीकेट्स होते हैं, लेकिन सेवा कार्यो से जुड़े क्षेत्रों में इन्हें सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। यही नहीं व्यक्ति के शालीन व्यवहार के आधार पर संस्थान विशेष का मूल्यांकन भी किया जाता है। काम करने के स्थान के माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए पेश हैं कुछ टिप्स..

नए कर्मी को खुले दिल से स्वीकारें
ऑफिस में समस्त जूनियर व सीनियर कर्मचारियों को नए आने वाले कर्मचारी का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए।

नए सहयोगी के ज्वॉइन करते ही उसे कार्य की प्रकृति और कंपनी के तौर-तरीके व मूल्यों की जानकारी दे दी जाए, ताकि बाद में किसी तरह की संशय की स्थिति न रहे।

ऑफिस के नए सहयोगी का शीर्ष पद पर बैठे सीईओ से लेकर निचले क्रम में प्यून तक सभी कर्मचारियों से परिचय करवाएं। इससे वह सभी लोगों के साथ अच्छी तरह पेश आ सकेगा।

नए सहयोगी से सार्वजनिक स्थलों पर निजी प्रश्न मसलन शैक्षणिक व वैवाहिक स्थिति तथा वेतन के बारे में पूछना ठीक नहीं माना जाता।

नए सहयोगी के नाम का गलत उच्चारण करने से परहेज करें। यदि अनजाने में ऐसी भूल हो जाए, तो क्षमा मांगने में नहीं हिचकें।

किसी सहयोगी को उसके शुरुआती नाम से संबोधित करने का आशय यह है कि आप उससे वरिष्ठ या उसके समकक्ष हैं। बेहतर यही होगा कि अपने से वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए सम्मानसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उनके सरनेम से संबोधित करें।

आत्मीयता बढ़ाने के गुर
अपने साथी कर्मचारी को छोटी से छोटी सफलता पर भी गर्मजोशी से बधाई दें।
कई बार आपकी मुस्कान अलग ही असर दिखाती है। किसी काम में दिए गए सहयोग के लिए रिसेप्शनिस्ट और ऑफिस बॉय को भी सहर्ष धन्यवाद देना न भूलें।

अच्छे बॉस, कर्मचारी और सहयोगी हमेशा सलीके से बात करते हैं। बोलचाल में ‘प्लीज’ और ‘थैंक्स’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल जरूर करें।

यह ध्यान रखें कि ऑफिस में सहयोगियों से सिर्फ काम के सिलसिले में ही बात न हो। समय-समय पर उनके व उनके परिजनों के हाल-चाल पूछते रहें। इससे संस्थान में दोस्ताना माहौल बनाए रखने में मदद मिलती है।

सेल्फ-हेल्प
ऑफिस में अलग-अलग प्रकृति के लोग काम करते हैं। इनमें से कुछ आपके विरोधी हो सकते हैं तो कुछ सहयोगी भी। हमें इन सभी के साथ मिलकर चलने की जरूरत होती है।

आर्किटेक्चर-सुदृढ़ भविष्य का आधार

आर्किटेक्चर बेहद चुनौतीपूर्ण और बहुआयामी पेशा है, जिसमें एक साथ कई काम शामिल होते हैं। यह डिजाइनिंग के साथ-साथ इंजीनियरिंग प्रोग्राम का भी क्षेत्र है।

क्या कोई आलीशान इमारत, मॉल या इसकी डिजाइन आपकी आखों में बस गई है? क्या आपको लगता है कि आप भी इस तरह के मॉल्स, इमारतों, आवास कालोनियों, बांध-पुल इत्यादि को डिजाइन कर सकते हैं? यदि हां, तो फिर आर्किटेक्चर का क्षेत्र आपके लिए सर्वथा उपयुक्त है।
यह क्षेत्र व्यक्ति को अपना सृजनात्मक कौशल दिखाने का मंच प्रदान करता है। यह अध्ययन का ऐसा क्षेत्र है जो इमारतों व अन्य ढांचों के बीच के स्पेस को ध्यान में रखते हुए इसकी समुचित जाइनिंग व प्लानिंग से जुड़ा है। आर्किटेक्चर बेहद चुनौतीपूर्ण और बहुआयामी पेशा है, जिसमें एक साथ कई काम शामिल होते हैं।
आर्किटेक्ट्स के लिए प्राइवेट व पब्लिक सेक्टर में रोजगार पाने की काफी संभावनाएं हैं। यदि आप चाहें तो इंजीनियरिंग व आर्किटेक्चर कॉलेजों में अध्यापन का विकल्प भी अपना सकते हैं।
आज देश में ज्यादातर अधोसंरचना संबंधी प्रोजेक्ट्स पर काम आर्किटेक्ट से सलाह के बाद ही शुरू होता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं।

उभरता क्षेत्र
देश में पिछले कुछ समय से रीयल सेक्टर में उछाल देखा जा रहा है। पूरे देश में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की बड़ी-बड़ी परियोजनाएं इस समय चल रही हैं। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल्स के लिए रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। किसी भी भौतिक ढांचे के निर्माण में आर्किटेक्ट्स उपलब्ध जगह का प्रभावी इस्तेमाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह डिजाइनिंग के साथ-साथ इंजीनियरिंग प्रोग्राम का भी क्षेत्र है। आज ज्यादातर इमारतें, बांध और कोई भी अधोसंरचना संबंधी परियोजना पर निर्माण कार्य आर्किटेक्ट से सलाह के बाद ही शुरू होता है।

कौन-कौन से कोर्स
इस क्षेत्र में कॅरियर बनाने के इच्छुक छात्र दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर सकते हैं। देश के अलग-अलग राज्यों में स्थित पॉलीटेक्निक संस्थान, नई दिल्ली स्थित कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल समेत ऐसे और भी कई संस्थान हैं जो सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कोर्स करवाते हैं।

डिप्लोमाधारी युवा पब्लिक व प्राइवेट सेक्टर में जूनियर इंजीनियर की जॉब के लिए आवेदन कर सकते हैं। आर्किटेक्चरल डिजाइनिंग में अन्य लोकप्रिय कोर्स हैं, बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर (बीआर्क), एम आर्क तथा सिविल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक डिग्री। बीआर्क में दाखिले के लिए अभ्यर्थी का किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से साइंस (फिजिक्स, केमिस्ट्री व मैथ्स) विषय में न्यूनतम 50 फीसदी अंकों के साथ बारहवीं या इसके समकक्ष परीक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है।

इसमें चयन अमूमन आईआईटीजेईई, एआईईईई जैसी प्रवेश परीक्षाओं के माध्यम से होता है। हालांकि प्रत्येक राज्य अपने यहां शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए अलग से प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते हैं, वहीं निजी इंजीनियरिंग कॉलेज भी अपने स्तर पर एंट्रेस टेस्ट आयोजित करते हैं अथवा आईआईटीजेईई या एआईईईई स्कोर्स को दाखिला देते हैं।

पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर छात्र चाहें तो एमई या एमटेक कर सकते हैं। देश के कई इंजीनियरिंग कॉलेज व विश्वविद्यालयों में यह कोर्स उपलब्ध हैं। स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में छात्र आर्किटेक्चर के बैचलर, मास्टर या डॉक्टोरल कोर्स को कर सकते हैं।

इसके अलावा इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स की एसोसिएट मेंबरशिप के लिए एएमआईई नामक एक एग्जाम भी होता है, जो कामकाजी प्रोफेशनल्स या डिप्लोमाधारी को दूरस्थ शिक्षा के लिए इंजीनियरिंग की बैचलर डिग्री हासिल करने की सुविधा देता है। छात्र चाहें तो खास तरह के ढांचों या इमारतों मसलन अस्पताल, शॉपिंग मॉल, आवासीय कॉलोनी, स्कूल, कॉलेज, होटल आदि की डिजाइनिंग में विशेषज्ञता भी हासिल कर सकते हैं।

व्यक्तिगत योग्यता
सफल आर्किटेक्ट बनने के लिए आपमें डिजाइनिंग की प्रतिभा होनी चाहिए। साथ ही आपको इसकी तकनीकी व व्यावसायिक पहलुओं का भी ज्ञान होना आवश्यक है। इस क्षेत्र में कॅरियर बनाने के इच्छुक युवाओं में बेहतर संप्रेषण कौशल, गहन अवलोकन, सृजनात्मकता और विचारों को मूर्तरूप देने की क्षमता होनी चाहिए। इसके अलावा 2-डी व 3-डी खाका तैयार करने तथा वित्तीय प्रबंधन का ज्ञान होना भी आवश्यक है।

संभावनाएं
आर्किटेक्ट्स के लिए प्राइवेट व पब्लिक सेक्टर में रोजगार पाने की काफी संभावनाएं हैं। पब्लिक सेक्टर की बात करें तो लोक निर्माण, सिंचाई, स्वास्थ्य जैसे विभागों में आर्किटेक्ट की मांग लगातार बनी हुई है। यदि कोई आर्किटेक्ट को पेशे के तौर पर नहीं अपनाना चाहता, तो वह इंजीनियरिंग व आर्किटेक्चर कॉलेजों में अध्यापन का विकल्प भी अपना सकता है।

हालांकि इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के लिए सरकारी सेक्टर के मुकाबले प्राइवेट सेक्टर में रोजगार की बेहतर संभावनाएं हैं। आप चाहें तो बतौर आर्किटेक्ट अपनी सलाहकार फर्म स्थापित कर सकते हैं या कांट्रेक्टर के तौर पर भी काम कर सकते हैं।

इस क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल्स जो स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहते हैं या सरकारी नौकरी करना चाहते हैं, उन्हें काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर (सीओए) में अपना रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। सीओए एक सरकारी निकाय है। विदेशों में भी इस क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए बेहतर संभावनाएं हैं।

पारिश्रमिक
इस क्षेत्र में एक फ्रेशर का शुरुआती वेतन 12,000 से 15,000 रुपए प्रतिमाह तक हो सकता है। अनुभव के साथ-साथ इसमें इजाफा संभव है। एक अनुभवी आर्किटेक्ट का मासिक पैकेज ५क्,क्क्क् रुपए से लेकर 100,000 रुपए से ज्यादा तक हो सकता है। अपनी सलाहकार फर्म खोलकर भी आप अच्छी कमाई कर सकते हैं।

प्रमुख संस्थान
वास्तुकला अकादमी, स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर एंड इंटीरियर डिजाइनिंग, नई दिल्ली।
सर जेजे कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, मुंबई।
स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, दिल्ली व हैदराबाद।
स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर सेंटर फॉर एन्वायरमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीईपीटी), अहमदाबाद।
बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस।

19 अप्रैल 2010

ऊपरी बाधाएं योग और उपाय

हम जहां रहते हैं वहां कई ऐसी शक्तियां होती हैं, जो हमें दिखाई नहीं देतीं किंतु बहुधा हम पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं जिससे हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो उठता है और हम दिशाहीन हो जाते हैं। इन अदृश्य शक्तियों को ही आम जन ऊपरी बाधाओं की संज्ञा देते हैं। भारतीय ज्योतिष में ऐसे कतिपय योगों का उल्लेख है जिनके घटित होने की स्थिति में ये शक्तियां शक्रिय हो उठती हैं और उन योगों के जातकों के जीवन पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डाल देती हैं। यहां ऊपरी बाधाओं के कुछ ऐसे ही प्रमुख योगों तथा उनसे बचाव के उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है।

* लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत प्रदत्त पीड़ा होती है।
* चंद्र पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो भूत से पीड़ा होती है।
* शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को भूत सताता है।
* लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत योग होता है।
* यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और संबंधित भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो उस स्थिति में भी प्रेत योग होता है।
* उक्त योगों के जातकों के आचरण और व्यवहार में बदलाव आने लगता है। ऐसे में उन योगों के दुष्प्रभावों से मुक्ति हेतु निम्नलिखित उपाय करने चाहिए।
* संकट निवारण हेतु पान, पुष्प, फल, हल्दी, पायस एवं इलाइची के हवन से दुर्गासप्तशती के बारहवें अध्याय के तेरहवें श्लोक सर्वाबाधा........न संशयः मंत्र से संपुटित नवचंडी प्रयोग कराएं।
* दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय के चौबीसवें श्लोक का पाठ करते हुए पलाश की समिधा से घृत और सीलाभिष की आहुति दें, कष्टों से रक्षा होगी।
* शक्ति तथा सफलता की प्राप्ति हेतु ग्यारहवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक सृष्टि स्थिति विनाशानां......का उच्चारण करते हुए घी की आहुतियां दें।
* शत्रु शमन हेतु सरसों, काली मिर्च, दालचीनी तथा जायफल की हवि देकर अध्याय के उनचालीसवें श्लोक का संपुटित प्रयोग तथा हवन कराएं।
कुछ अन्य उपाय
* महामृत्युंजय मंत्र का विधिवत्‌ अनुष्ठान कराएं। जप के पश्चात्‌ हवन अवश्य कराएं।
* महाकाली या भद्रकाली माता के मंत्रानुष्ठान कराएं और कार्यस्थल या घर पर हवन कराएं।
* गुग्गुल का धूप देते हुए हनुमान चालीस तथा बजरंग बाण का पाठ करें।
* उग्र देवी या देवता के मंदिर में नियमित श्रमदान करें, सेवाएं दें तथा साफ सफाई करें।
* यदि घर के छोटे बच्चे पीड़ित हों, तो मोर पंख को पूरा जलाकर उसकी राख बना लें और उस राख से बच्चे को नियमित रूप से तिलक लगाएं तथा थोड़ी-सी राख चटा दें।
घर की महिलाएं यदि किसी समस्या या बाधा से पीड़ित हों, तो निम्नलिखित प्रयोग करें।

सवा पाव मेहंदी के तीन पैकेट (लगभग सौ ग्राम प्रति पैकेट) बनाएं और तीनों पैकेट लेकर काली मंदिर या शस्त्र धारण किए हुए किसी देवी की मूर्ति वाले मंदिर में जाएं। वहां दक्षिणा, पत्र, पुष्प, फल, मिठाई, सिंदूर तथा वस्त्र के साथ मेहंदी के उक्त तीनों पैकेट चढ़ा दें। फिर भगवती से कष्ट निवारण की प्रार्थना करें और एक फल तथा मेहंदी के दो पैकेट वापस लेकर कुछ धन के साथ किसी भिखारिन या अपने घर के आसपास सफाई करने वाली को दें। फिर उससे मेहंदी का एक पैकेट वापस ले लें और उसे घोलकर पीड़ित महिला के हाथों एवं पैरों में लगा दें। पीड़िता की पीड़ा मेहंदी के रंग उतरने के साथ-साथ धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।
व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो, तो वहां श्वेतार्क गणपति तथा एकाक्षी श्रीफल की स्थापना करें। फिर नियमित रूप से धूप, दीप आदि से पूजा करें तथा सप्ताह में एक बार मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को बांटें। भोग नित्य प्रति भी लगा सकते हैं।

कामण प्रयोगों से होने वाले दुष्प्रभावों से बचने के लिए दक्षिणावर्ती शंखों के जोड़े की स्थापना करें तथा इनमें जल भर कर सर्वत्र छिड़कते रहें।

हानि से बचाव तथा लाभ एवं बरकत के लिए गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिंदूर, कपूर, घी, चीनी और शहद के मिश्रण से अष्टगंध बनाकर उसकी स्याही से नीचे चित्रित पंचदशी यंत्र बनाएं तथा देवी के 108 नामों को लिखकर पाठ करें।

बाधा मुक्ति के लिए : किसी भी प्रकार की बाधा से मुक्ति के लिए मत्स्य यंत्र से युक्त बाधामुक्ति यंत्र की स्थापना कर उसका नियमित रूप से पूजन-दर्शन करें।

अकारण परेशान करने वाले व्यक्ति से शीघ्र छुटकारा पाने के लिए : यदि कोई व्यक्ति बगैर किसी कारण के परेशान कर रहा हो, तो शौच क्रिया काल में शौचालय में बैठे-

बैठे वहीं के पानी से उस व्यक्ति का नाम लिखें और बाहर निकलने से पूर्व जहां पानी से नाम लिखा था, उस स्थान पर अपने बाएं पैर से तीन बार ठोकर मारें। ध्यान रहे, यह प्रयोग स्वार्थवश न करें, अन्यथा हानि हो सकती है।

रुद्राक्ष या स्फटिक की माला के प्रयोगों से प्रतिकूल परिस्थितियों का शमन होता है। इसके अतिरिक्त स्फटिक की माला पहनने से तनाव दूर होता है।

नजर दोष निवारक मंत्र व यंत्र

वायुमंडल में व्याप्त अदृश्य शक्तियों के दुष्प्रभाव से ग्रस्त लोगों का जीवन दूभर हो जाता है। प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न देने के फलस्वरूप किसी चिकित्सकीय उपाय से इनसे मुक्ति संभव नहीं होती। ऐसे में भारतीय ज्योतिष तथा अन्य धर्म ग्रंथों में वर्णित मंत्रों एवं यंत्रों के प्रयोग सहायक सिद्ध हो सकते हैं। यहां कुछ ऐसे ही प्रमुख एवं अति प्रभावशाली मंत्रों तथा यंत्रों के प्रयोगों के फल और विधि का विवरण प्रस्तुत है। ये प्रयोग सहज और सरल हैं, जिन्हें अपना कर सामान्य जन भी उन अदृश्य शक्तियों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
गायत्री मंत्र : गायत्री मंत्र वेदोक्त महामंत्र है, जिसके निष्ठापूर्वक जप और प्रयोग से प्रेत तथा ऊपरी बाधाओं, नजर दोषों आदि से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करने वालों को ये शक्तियां कभी नहीं सताती। उन्हें कभी डरावने सपने भी नहीं आते।
गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित जल से अभिषेक करने से अथवा गायत्री मंत्र से किए गए हवन की भस्म धारण करने से पीड़ित व्यक्ति को प्रेत बाधाओं, ऊपरी हवाओं, नजर दोषों आदि से मुक्ति मिल जाती है। इस महामंत्र का अखंड प्रयोग कभी निष्फल नहीं होता।

मंत्र : ओम भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्‌।

प्रयोग विधि
गायत्री मंत्र का सवा लाख जप कर पीपल, पाकर, गूलर या वट की लकड़ी से उसका दशांश हवन करें, ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिलेगी।
सोने, चांदी या तांबे के कलश को सूत्र से वेष्टित करें और रेतयुक्त स्थान पर रखकर उसे गायत्री मंत्र पढ़ते हुए जल से पूरित करें। फिर उसमें मंत्रों का जप करते हुए सभी तीर्थों का आवाहन करके इलायची, चंदन, कपूर, जायफल, गुलाब, मालती के पुष्प, बिल्वपत्र, विष्णुकांता, सहदेवी, वनौषधियां, धान, जौ, तिल, सरसों तथा पीपल, गूलर, पाकर व वट आदि वृक्षों के पल्लव और २७ कुश डाल दें। इसके बाद उस कलश में भरे हुए जल को गायत्री मंत्र से एक हजार बार अभिमंत्रित करें। इस अभिमंत्रित जल को भूता बाधा, नजर दोष आदि से पीड़ित व्यक्ति के ऊपर छिड़कर उसे खिलाएं, वह शीघ्र स्वस्थ हो जाएगा। इस प्रयोग से पैशाचिक उपद्रव भी शांत हो जाते हैं।

जो घर ऊपरी बाधाओं और नजर दोषों से प्रभावित हो, उसमें गायत्री मंत्र का सवा लाख जप करके तिल, घृत आदि से उसका दशांश हवन करें। फिर उस हवन स्थल पर एक चतुष्कोणी मंडल बनाएं और एक त्रिशूल को गायत्री मंत्र से एक हजार बार अभिमंत्रित करके उपद्रवों और उपद्रवकारी शक्तियों के शमन की कामना करते हुए उसके बीच गाड़ दें।

किसी शुभ मुहूर्त में अनार की कलम और अष्टगंध की स्याही से भोजपत्र पर नीचे चित्रांकित यंत्र की रचना करें।

फिर इसे गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर गुग्गुल की धूप दें और विधिवत पूजन कर ऊपरी बाधा या नजरदोष से पीड़ित व्यक्ति के गले में बांध दें, वह दोषमुक्त हो जाएगा।

जिन व्यक्तियों ने गायत्री मंत्र का पुरश्चरण नहीं किया हो, उन्हें यह प्रयोग करने से पहले इस मंत्र का एक बार विधिवत पुरश्चरण अवश्य कर लेना चाहिए।

अमोघ हनुमत-मंत्र : ऊपरी बाधाओं और नजर दोष के शमन के लिए निम्नोक्त हनुमान मंत्र का जप करना चाहिए।

ओम ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रीं ओम नमो

भगवतेमहाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत-पिशाच-शाकिनी डाकिनी- यक्षिणी-पूतना मारी महामारी यक्ष-राक्षस भैरव-वेताल ग्रह राक्षसादिकम क्षणेन हन हन भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट स्वाहा।

इस मंत्र को दीपावली की रात्रि, नवरात्र अथवा किसी अन्य शुभ मुहूर्त में या ग्रहण के समय हनुमान जी के किसी पुराने सिद्ध मंदिर में ब्रह्मचर्य पूर्वक रुद्राक्ष की माला पर दस हजार बार जप कर उसका दशांश हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिए ताकि कभी भी अवसर पड़ने पर इसका प्रयोग किया जा सके।
सिद्ध मंत्र से अभिमंत्रित जल प्रेत बाधा या नजर दोष से ग्रस्त व्यक्ति को पिलाने तथा इससे अभिमंत्रित भस्म उसके मस्तक पर लगाने से वह इन दोषों से मुक्त हो जाता है।

उक्त सिद्ध मंत्र से एक कील को 1008 बार अभिमंत्रित कर उसे भूत-प्रेतों के प्रकोप तथा नजर दोषों से पीड़ित मकान में गाड़ देने से वह मकान कीलित हो जाता है तथा वहां फिर कभी किसी प्रकार का पैशाचिक अथवा नजर दोषजन्य उपद्रव नहीं होता।

पंचांग क्या है?

सभी विषय या वस्तु के प्रमुख पाँच अंग को पंचांग कहते हैं। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के पाँच अंगों की दैनिक जानकारी पंचांग में दी जाती है। ये अंग तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण हैं। सूर्य एवं चंद्र के अंतर से तिथि का निर्माण होता है। पूर्णिमा को सूर्य-चंद्र एक-दूसरे के सामने एवं अमावस्या को एक साथ रहते हैं। पूर्ण ग्रह सात होने के कारण सप्तवारों की रचना की गई है।

यह सूर्योदय से दूसरे दिन के सूर्योदय पूर्व तक रहता है। जिस दिन चंद्रमा जिस स्थान पर होता है उस दिन वही नक्षत्र रहता है। सूर्य-चंद्र के 13 अंश 20 कला साथ चलने से एक योग होता है। ये कुल 27 हैं। तिथि के अर्द्ध भाग को करण कहते हैं। इनकी संख्या ग्यारह है। स्थिर करण 7 एवं चर करण 4 होते हैं।

ज्योतिष की चर्चा में राशि का स्थान प्रमुख रूप से होता है। इसी से सभी ग्रह की स्थिति जानी जाती है। ये बारह होती हैं। इनका क्रम भी निश्चित है। अर्थात मेष राशि के पश्चात वृषभ राशि तथा पूर्व में मीन राशि आती है। राशियों का प्रारंभ मेष राशि से होकर अंत मीन राशि पर होता है। इस राशि के समूह को राशि चक्र या भाग चक्र कहते हैं।

यह ग्रहों के मार्ग के हिस्सों में रहता है। यह मार्ग 360 अंश का है। इसके सम बारह हिस्से अर्थात 30-30 अंश की जगह खगोल में एक-एक राशि के हैं। अर्थात प्रत्येक राशि 30 अंश की है। इनके नाम उस स्थान की भौगोलिक आकृति पर ऋषियों ने अथवा आदि ज्योतिषियों ने दिए हैं। अर्थात प्रथम शून्य से लेकर 30 अंश तक की भौगोलिक स्थिति भाग चक्र में मेष के (भेड़ के) आकार की होने के कारण उसे मेष नाम दिया गया है।

सरल शब्दों में कहें तो ग्रह पथ पर राशियाँ स्थान का नाम है। इनका क्रम है- मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन।

जन्माक्षर कैसे निकलता है। राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। इस प्रकार बारह राशियों में सत्ताईस नक्षत्र होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र के चार हिस्से होते हैं, जिन्हें उनके चरण कहा जाता है। प्रत्येक चरण का एक अक्षर होता है। जिस दिन एवं समय जातक का जन्म होता है, उस समय जिस नक्षत्र में चंद्रमा गमन कर रहे होते हैं, उस नक्षत्र के पूरे काल को ज्ञात करके उसके चार हिस्से करते हैं। जिस हिस्से में जातक का समय आता है, उस हिस्से (चरण) के अक्षर से ही प्रथमाक्षर जान सकते हैं। प्रत्येक समय सिर्फ एक अक्षर होता है। यह अक्षर वर्तनी (मात्रा) युक्त या रहित दोनों हो सकता है। अक्षर की मात्रा के अनुसार ही उसका नक्षत्र या राशि होती है। जैसे 'च' अक्षर को लें, लो, च, चा, ची अक्षर मीन राशि के रेवती नक्षत्र के हैं, जबकि चू, चे, चो मेष राशि के अश्विनी नक्षत्र के हैं। अर्थात अक्षर की मात्रा के अनुसार उसके नक्षत्र व राशि बदल जाते हैं।

मूलादि नक्षत्र क्या हैं?
किसी बालक का जन्म होता है तो सामान्यतः यह पूछा जाता है कि बालक को मूल तो नहीं है। इसके उत्तर के लिए जन्मकाल के नक्षत्र को देखें, यदि यह इन 6 में से एक नक्षत्र है तो बालक मूल में हुआ है। अश्वनी, ज्येष्ठा, अश्लेषा, मूल, मघा, रेवती जन्म लिए बालक प्रारंभ में परिजनों के लिए कष्टकारक होते हैं, लेकिन बड़े होकर ये बहुत भाग्यशाली होते हैं। कर्मकांड के अंतर्गत मूल नक्षत्र की शांति भी होती है, जो कि आगे वही नक्षत्र आने पर इसकी शांति करते हैं। वही नक्षत्र लगभग सत्ताईस दिन बाद आता है।

भारतीय पंचाग की कहानी
आइए भारतीय पंचांग यानी भारतीय कलैंडर के बारे में जानते हैं। हमारे देश में लगभग 5,000 वर्ष पहले वैदिक काल में समय की गणना का काम शुरू हो गया था। उन दिनों इस बात का ज्ञान हो चुका था कि चांद्र-वर्ष में 360 से कुछ कम दिन होते हैं क्योंकि एक चंद्र-मास में ठीक 30 दिन नहीं होते। सूर्योदय से सूर्योदय तक के काल को ‘सावन-दिन’ माना गया। तब सावन-मास और चांद्र मास का भी ज्ञान प्राप्त हो चुका था। बाद में नक्षत्र और फिर ‘तिथि’ का ज्ञान हुआ। अनुमान है कि शक संवत् से लगभग 1400 वर्ष पूर्व तक तिथि और नक्षत्र, समय के इन दो अंगों का ही ज्ञान था। उसके बाद करण, योग और वार का ज्ञान प्राप्त हुआ। इस तरह तिथि, नक्षत्र, वार, करण और योग, समय के इन पांच अंगों से ‘पंचांग’ यानी कलैंडर का विकास हुआ।

क्षेत्रीय आवश्यकताओं और धार्मिक तिथियों की गणना के लिए देश के विभिन्न प्रांतों में कई प्रकार के पंचांग बनाए गए जिनमें से अनेक पंचांग आज भी प्रचलित हैं। लेकिन, प्रशासनिक तथा नागरिक उद्देश्य के लिए संशोधित और मानक भारतीय राष्ट्रीय कलैंडर का प्रयोग किया जाता है।
हमारा राष्ट्रीय कलैंडर प्रोफेसर मेघनाद साहा जैसे समर्पित वैज्ञानिक के सतत प्रयासों का फल है। कलैंडर सुधार का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विश्वासों पर सीधा प्रभाव पड़ने का खतरा मोल लेते हुए भी उन्होंने कलैंडर में वैज्ञानिक सुधार का बीड़ा उठाया और हमारे कलैंडर को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।

प्रोफेसर मेघनाद साहा ने भारतीय पंचांगों और कलैंडर सुधार की आवश्यकता पर ‘जर्नल ऑफ रॉयल एस्ट्रोनामिकल सोसाइटी’, ‘जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसाइटी’ और ‘साइंस एंड कल्चर’ जैसी प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिकाओं में लेख लिख कर इस विषय की ओर सरकार और आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया। कलैंडर से संबंधित उनके कुछ लेख इस प्रकार थेः ‘कलैंडर (पंचांग) सुधार की आवश्यकता’, ‘कालांतर में संशोधित कलैंडर तथा ग्रेगोरीय कलैंडर’, ‘भारतीय कलैंडर का सुधार’, ‘विश्व कलैंडर योजना’। ये सभी लेख ‘साइंस एंड कल्चर में प्रकाशित हुए। ‘प्राचीन एवं मध्ययुगीन भारत में काल निर्धारण की विभिन्न विधियां तथा शक संवत् की उत्पत्ति’ जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसाइटी में छपा। उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी में ‘शक संवत् की शुरुआत’ पर व्याख्यान दिया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप 1952 में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् ने एक कलैंडर सुधार समिति गठित की। समिति को देश के विभिन्न प्रांतों में प्रचलित पंचांगों का अध्ययन करके सरकार को सटीक वैज्ञानिक सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई ताकि पूरे देश में एक समान नागरिक कलैंडर लागू किया जा सके। प्रो. मेघनाद साहा इस कलैंडर सुधार समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। समिति के सदस्य थेः ए.सी.बनर्जी, के.के.दफ्तरी, जे.एस.करंडीकर, गोरख प्रसाद, आर.वी.वैद्य तथा एन.सी. लाहिड़ी।

पंचांगों में सबसे प्रमुख त्रुटि थी वर्ष की लंबाई। पंचांग प्राचीन ‘सूर्य सिद्धांत’ पर आधारित होने के कारण वर्ष की लंबाई 365.258756 दिन की होती है। वर्ष की यह लंबाई वैज्ञानिक गणना पर आधारित सौर वर्ष से .01656 दिन अधिक है। प्राचीन सिद्धांत अपनाने के कारण ईस्वी सन् 500 से वर्ष 23.2 दिन आगे बढ़ चुका है। भारतीय सौर वर्ष ‘वसंत विषुव’ औसतन 21 मार्च के अगले दिन मतलब 22 मार्च से शुरु होने के बजाय 13 या 14 अप्रैल से शुरु होता है। दूसरी ओर, जैसे कि पहले बताया गया है, यूरोप में जूलियस सीजर द्वारा शुरू किए गए ‘जुलियन कलैंडर’ में भी वर्ष की लंबाई 365.25 दिन निर्धारित की गई थी जिसके कारण 1582 ईस्वी आते-आते 10 दिन की त्रुटि हो चुकी थी। तब पोप ग्रेगरी तेरहवें ने कलैंडर सुधार के लिए आदेश दे दिया कि उस वर्ष 5 अक्टूबर को 15 अक्टूबर घोषित कर दिया जाए। लीप वर्ष भी स्वीकार कर लिया गया। लेकिन, भारत में सदियों से पंचांग यानी कलैंडर में इस प्रकार का कोई संशोधन नहीं हुआ था।

उन्होंने विश्व कलैंडर योजना का भी सुझाव दिया और 1954 में जेनेवा में आयोजित यूनेस्को के 18वें अधिवेशन में ‘विश्व कलैंडर’ सुधार के लिए प्रस्ताव भेजा। कलैंडर सुधार समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की। समिति ने प्रशासनिक तथा नागरिक कलैंडर के लिए महत्वपूर्ण संस्तुतियां कीं। इन संस्तुतियों के अनुसार राष्ट्रीय कलैंडर में शक संवत् का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसकी गणनाएं शक संवत् से की जाती हैं। शक संवत् की प्रथम तिथि ईस्वी सन् 79 के वसंत विषुव से प्रारंभ होती है। हमारे राष्ट्रीय कलैंडर में शक संवत् 1879 (अठारह सौ उनासी) के चैत्र मास की प्रथम तिथि को आधार माना गया है जो ग्रेगोरीय कलैंडर की गणना के अनुसार 22 मार्च ईस्वी सन् 1957 है। यानी, हमारा संशोधित राष्ट्रीय कलैंडर 22 मार्च 1957 से शुरू होता है।

मिति ने सुझाव दिया कि वर्ष में 365 दिन तथा लीप वर्ष में 366 दिन होंगे। लीप वर्ष की परिभाषा देते हुए सुझाव दिया गया कि शक संवत् में 78 जोड़ने पर जो संख्या मिले वह अगर 4 से विभाजित हो जाए तो वह लीप वर्ष होगा। लेकिन, अगर वर्ष 100 का गुणज तो है लेकिन 400 का गुणज नहीं है तो वह लीप वर्ष नहीं माना जाएगा। राष्ट्रीय परंपरागत भारतीय मास 12 हैं : चैत्र, वैसाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्र, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन। समिति ने यह भी संस्तुति की कि वर्ष का प्रारंभ वसंत विषुव के अगले दिन से होना चाहिए। कलैंडर में चैत्र मास वर्ष का प्रथम मास होगा। चैत्र से भाद्र तक प्रत्येक मास में 31 दिन और आश्विन से फाल्गुन तक प्रत्येक मास में 30 दिन होंगे। लीप वर्ष में, चैत्र मास में 31 दिन होंगे अन्यथा सामान्य वर्षों में 30 दिन ही रहेंगे। लीप वर्ष में चैत्र मास की प्रथम तिथि 22 मार्च के बजाय 21 मार्च होगी। समिति ने कहा कि जो उत्सव और अन्य महत्वपूर्ण तिथियां 1400 वर्ष पहले जिन ऋतुओं में मनाई जाती थीं, वे 23 दिन पीछे हट चुकी हैं। फिर भी धार्मिक उत्सवों की तिथियां परंपरागत पंचांगों से ही तय की जा सकती हैं। समिति ने धार्मिक पंचांगों के लिए भी दिशा निर्देश दिए। ये पंचांग सूर्य और चंद्रमा की गतियों की गणनाओं के आधार पर तैयार किए जाते हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग प्रति वर्ष भारतीय खगोल पंचांग प्रकाशित करता है। छुट्टियों की तिथियों की गणना इसी के आधार पर की जाती है।

हमारे राष्ट्रीय कलैंडर के लीप वर्ष विश्व भर में प्रचलित ग्रेगोरी कलैंडर के समान हैं। ग्रेगोरीय कलैंडर में 21 मार्च की तिथि वसंत विषुव यानी वर्नल इक्विनॉक्स मानी गई है।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कलैंडर सुधार समिति की रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा था, “हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है। यह वांछनीय होगा कि हमारे नागरिक सामाजिक और अन्य कार्यों में काम आने वाले कलैंडर में कुछ समानता हो और इस समस्या को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिया जाना चाहिए।”

ज्योतिष : क्या और क्यों?

आकाश की तरफ नजर डालते ही दिमाग में सवाल पैदा होता है कि ग्रह-नक्षत्र क्या होते हैं? इनमें से कुछ दिन में और कुछ रात में क्यों छुप जाते हैं? सारे ग्रह एक साथ डूब क्यों नहीं जाते? सूरज, प्रतिदिन पूर्व दिशा से ही क्यों उगता है?

इन्हीं सवालों की वजह से आदमी ने आकाश के ग्रह-तारों को देखना-परखना-समझना शुरू किया। धीरे-धीरे ग्रहों-नक्षत्रों की चाल आदमी की समझ में आने लगी। वह अपने आस-पास की घटनाओं को ग्रहों-नक्षत्रों की गतिविधियों से जोड़ने लगा और इस तरह एक शास्त्र ही बन गया, जिसे आज हम ज्योतिष कहते हैं। ज्योतिष शास्त्र की प्रामाणिक परिभाषा वेदो में है।

'ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्र्‌म' इसका मतलब यह हुआ कि ग्रह (ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि) और समय का ज्ञान कराने वाले विज्ञान को ज्योतिष अर्थात ज्योति प्रदान करने वाला विज्ञान कहते हैं। एक तरह से यह रास्ता बतलाने वाला शास्त्र है। जिस शास्त्र से संसार का ज्ञान, जीवन-मरण का रहस्य और जीवन के सुख-दुःख के संबंध में ज्योति दिखाई दे वही ज्योतिष शास्त्र है। इस अर्थ में वह खगोल से ज्यादा अध्यात्म और दर्शनशास्त्र के करीब बैठता है।

ऐसा माना जाता है कि ज्योतिष का उदय भारत में हुआ, क्योंकि भारतीय ज्योतिष शास्त्र की पृष्ठभूमि 8000 वर्षों से अधिक पुरानी है। भारतीय ज्योतिष के प्रमुख ज्योतिर्विद और उनके द्वारा लिखे गए खास-खास ग्रंथ-
1. पाराशर मुनि वृहद पाराशर, होरा शास्त्र
2. वराह मिहिर वृहद संहिता, वृहत्जातक, लघुजातक
3. भास्कराचार्य सिद्धांत शिरोमणि
4. श्रीधर जातक तिलक

ज्योतिष शास्त्र के कुछ और जाने-माने ग्रंथ इस प्रकार है -
1. सूर्य सिद्धांत
2. लघु पाराशरी
3. फल दीपिका
4. जातक पारिजात
5. मान सागरी
6. भावप्रकाश
7. भावकुतूहल
8. भावार्थ रत्नकारा
9. मुहूर्त चिन्तामणि

भारतीय ज्योतिष की अवधारणा मूल रूप से नौ ग्रहों पर टिकी हुई है। इसमें सात ग्रह मुख्य माने जाते हैं और दो को छाया ग्रह कहते हैं। सूर्य राजा है, चंद्रमा मंत्री, बुध मुंशी, बृहस्पति गुरु, शुक्र पुरोहित, शनि राजपुत्र और छाया ग्रह राहु, चांडाल केतु अछूत है।

जीवन का मुख्य आधार प्रकाश जिस दिन इस धरती पर नहीं होगा, शायद जीवन भी संभव नहीं होगा, इसलिए ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रहों का राजा कहलाता है और उसको आधार मानकर समय की गणना की जाती है।

'एते ग्रहा बलिष्ठाः प्रसूति काले नृणां स्वमूर्तिसमम्‌। कुर्युनेंह नियतं वहवश्च समागता मिश्रम्‌॥'
ऊपर दिए गए श्लोक से जाहिर है कि सभी ग्रहों का प्रकाश और नक्षत्रों का प्रभाव धरती पर रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं और चीजों पर पड़ता है। अलग-अलग जगहों पर ग्रहों की रोशनी का कोण अलग-अलग होने की वजह से प्रकाश की तीव्रता में फर्क आ जाता है। समय के साथ इसका असर भी बदलता जाता है। जिस माहौल में जीव रहता है, उसी के अनुरूप उसमें संबंधित तत्व भारी या हल्के होते जाते हैं। हरेक की अपनी विशेषता होती है। जैसे, किसी स्थान विशेष में पैदा होने वाला मनुष्य उस स्थान पर पड़ने वाली ग्रह रश्मियों की विशेषताओं के कारण अन्य स्थान पर उसी समय जन्मे व्यक्ति की अपेक्षा अलग स्वभाव और आकार-प्रकार का होता है।

इस तरह ज्योतिष कोई जादू-टोना या चमत्कार नहीं, बल्कि विज्ञान की ही एक शाखा जैसा है। मोटे तौर पर विज्ञान के अध्ययन को दो भागों में बाँटा जाता है :-
1. भौतिक विज्ञान
2. व्यावहारिक विज्ञान

भौतिक विज्ञान के तहत वैज्ञानिक किसी भी घटना के कारण और उसके परिणामों का अध्ययन कर एक अभिकल्पना बनाते हैं। इसके बाद वे समीकरण पेश करते हैं, जिसकी पुष्टि भौतिक प्रयोग के परिणामों और तथ्यों के जरिए की जाती है। व्यावहारिक विज्ञान में हम कारण और उनके प्रभावों का अध्ययन कर अभिकल्पना बनाते हैं कि कौन से कारण क्या प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं? जैसे, नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. अमर्त्य सेन ने अर्थशास्त्र को नया सिद्धांत दिया। इसमें आर्थिक विकास को साक्षरता की दर से जोड़ा गया है। उनका यह सिद्धांत जनगणना से प्राप्त आँकड़ों पर आधारित है। इसी तरह ज्योतिषी भी मनुष्य पर सौरमण्डल के प्रभावों का व्यवस्थित अध्ययन करके एवं इकठ्ठा किए गए आँकड़ों का विश्लेषण करके फलादेश करते हैं।

इस प्रकार ज्योतिष, विज्ञान जैसा ही है, जिसमें मानव जीवन पर ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव का तर्कसम्मत एवं गणितीय आधार पर अध्ययन किया जाता है और उपलब्ध आँकड़ों एवं सूचनाओं के आधार पर मानव विशेष के वर्तमान, भूत एवं भविष्य की जानकारी दी जाती है। यदि ज्योतिष को चमत्कार या अंधविश्वास न मानकर उसे अपने जीवन में सही ढंग से प्रयोग में लाया जाए तो वह बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

ज्योतिष का विज्ञान

ज्योतिष भी अन्य विज्ञानों की तरह एक विज्ञान है और उसका मूल उद्‍गम सृष्टि के गर्भ में छिपे तथ्यों को जानने की उत्सुकता में निहित है। आकाश-मंडल, निर्बाध गति से चलने वाले रात-दिन, और जन्म-मरण के चक्र और सूर्य, चन्द्र तथा तारागणों के प्रति मानव का कौतूहल अनादिकाल से रहता आया है।

इसी के परिणाम स्वरूप ज्योतिष की विद्या का प्रादुर्भाव हुआ और उसके शास्त्र को विभिन्न ग्रहों और काल का बोध कराने वाले शास्त्र के रूप में स्थापित किया गया। ज्योतिषशास्त्र को वेदों में भी समुचित प्रतिष्ठा प्रदान की गई थी। और यह तथ्य कतिपय व्यक्तियों की इस धारणा को सर्वथा निर्मूल सिद्ध करता है कि यह विज्ञान भारत में विदेशों से आयातित हुआ था।

ज्योतिष का विज्ञान वस्तुतः अपने आप में इतना सशक्त और भरपूर है कि उसके प्रबल विरोधी भी उसके वैज्ञानिक पहलुओं की अवहेलना नहीं कर सकते। ज्योतिष विज्ञान के अन्तर्गत आने वाले ग्रह स्वयं किसी को सुख अथवा दुःख प्रदान नहीं करते। हाँ, उनका प्रभाव सृष्टि के अणु-परमाणुओं पर निरंतर पड़ता रहता है और उससे यहाँ का प्राणी जगत भी प्रभावित होता है। उदाहरण स्वरूप कमल का पुष्प सूर्य की प्रथम किरण पाते ही खिल उठता है और फिर सूर्यास्त होने के साथ ही उसकी पंखुड़ियाँ बंद हो जाती हैं। इसे सूर्य की अपनी विशेषता नहीं कहा जाएगा, बल्कि उन दोनों के मिलन के फलस्वरूप ही इस प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है।

कोई भी विज्ञान अपने आप में संपूर्ण नहीं होता। उसकी कुछ विशेषताएँ होती हैं और कुछ खामियाँ। इसी तरह ज्योतिष विज्ञान को भी सर्वथा पूर्ण और निष्कलंक कहना कठिन है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस विज्ञान के गणित को अनादिकाल से हमारे पूर्वजों ने गोपनीय बनाए रखने की चेष्टा की और तत्संबंध में जो ज्ञान जिसके पास था वह उसके जीवन के साथ ही समाप्त होता चला गया।

आज भी इस विज्ञान को फलने-फूलने के लिए न उस तरह का परिवेश मिल रहा है जो उसके विकास और विस्तार के लिए अपेक्षित है, और न वह वातावरण जिसके सहारे वह अपने को पुष्पित-पल्लवित करने में समर्थ हो सके। अपनी तमाम कमियों के बावजूद मनुष्य के जीवन में ज्योतिष-विज्ञान का सर्वोपरि स्थान है। यह बात भी असंदिग्ध है कि समग्र विश्व इस विज्ञान की सहायता से अपनी विभिन्न समस्याओं के निराकरण में असामान्य रूप से सफल हो सकता है।

ज्योतिष-विज्ञान वह विज्ञान है जो मनुष्य को उसके कार्यक्षेत्र से परिचित कराता है और जिस तरह रोग-निवारण में औषधि का प्रयोग सहायक सिद्ध होता है। उसी प्रकार इस विज्ञान में जीवन की बाधाओं के प्रति मानव को सचेत करते हुए उसके समुचित निवारण को निर्दिष्ट करने की अद्‍भुत क्षमता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए तो ज्योतिष विज्ञान एक अमूल्य वरदान है। उसके आधार पर वर्षा, भूकम्प, बाढ़ और तूफान जैसे प्राकृतिक क्रियाकलापों से अवगत होकर संभावित प्रकोपों के प्रति पहले से सावधान हुआ जा सकता है।

ज्योतिष के माध्यम से प्राप्त जानकारी विश्वसनीय सिद्ध होती रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी ज्योतिष विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। यह विज्ञान अपना अध्ययन क्षेत्र चुनने में विद्यार्थियों का पथ प्रदर्शन करने में भी पूरी तरह समर्थ है। उद्योग के क्षेत्र में भी इस विज्ञान के माध्यम से बहुत सहायता प्राप्त की जा सकती है।

इसी प्रकार चिकित्सा और मनोविज्ञान की विधाओं में भी ज्योतिष-शास्त्र बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक जहाँ मात्र बाह्य निरीक्षणों के आधार पर रोग का निर्धारण करते हैं वहीं ज्योतिष विज्ञान जन्मकालीन ग्रह और नक्षत्रों की स्थितियों के आधार पर आंतरिक वास्तविकता का ज्ञान कराने में समर्थ है। राजनीति के क्षेत्र में भी ज्योतिष विज्ञान का विशेष महत्व है।
इस तरह कहा जा सकता है कि आज के युग में भी ज्योतिष विज्ञान मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वरदान सिद्ध होने की असाधारण क्षमता रखता है। ज्योतिष विज्ञान वस्तु का स्वरूप तो सहज ही बता सकता है, लेकिन उसमें किसी तरह का परिवर्तन लाना उसके लिए संभव नहीं है। हाँ, वह किसी आदमी को उसके व्यक्तित्व की कमियों और खूबियों का अहसास कराते हुए तदनुसार अपना विकास करने के लिए उसे अवश्य प्रेरित कर सकता है।

मनुष्य के अतिरिक्त राष्ट्र की अनेक समस्याएँ भी ज्योतिष की सहायता से बखूबी हल की जा सकती हैं। उसके गणितपक्ष के आधार पर ग्रहों की गति और स्थिति का ज्ञान अर्जित कर कालगणना, नक्षत्रों के परिवर्तन, ग्रहों के संयोग और सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण जैसे विभिन्न क्रियाकलापों का आकलन आसानी से किया जा सकता है।

ज्योतिष मात्र विज्ञान ही नहीं, एक कला भी है, लेकिन उसकी सफलता पूरी तरह ज्योतिषी की कार्यक्षमता और दूरदर्शिता पर निर्भर है। इस तरह ज्योतिष शास्त्र एक प्रयोगात्मक विज्ञान है और वह कुछ निश्चित नियमों और सिद्धांतों पर आधारित है।

दु:ख की बात यह है कि इस विज्ञान को वैज्ञानिक गंभीरता के साथ लेने का कोई सार्थक प्रयत्न अब तक नहीं किया गया है। आज मौसम विज्ञान के शोध और परिमार्जन हेतु लाखों रुपयों का व्यय किया जा रहा है लेकिन ज्योतिष विज्ञान पहले की तरह उपेक्षित है। यद्यपि ज्योतिष विज्ञान के आधार पर जो भविष्यवाणियाँ की जाती रही हैं, उनमें हमेशा अधिक सार रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी ज्योतिष विज्ञान पूरी तरह उपेक्षित रहा है। उसके विस्तृत और व्यापक अध्ययन के लिए किसी भी विश्वविद्यालय में कोई विशेष सुविधा सुलभ नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार के अतिरिक्त देश के शिक्षाविद् भी इस संबंध में ध्यान आकृष्ट करें जिससे इस विद्या के माध्यम से उपलब्ध होने वाले लाभ उपेक्षित न रह सकें।

ज्योतिष-व्यवसाय से संबद्ध लोगों से यह अपेक्षित है कि मात्र अपनी रोजी-रोटी तक वे उस विद्या को सीमित न रखते हुए वास्तविक और वैज्ञानिक रूप से उसे पुष्पित और पल्लवित करने की चेष्टा करें जिससे जनसामान्य के सम्मुख अपने निखरे रूप में उपस्थित होना उसके लिए संभव हो सके।

इसमें संदेह नहीं है कि ज्योतिष-विज्ञान मानवीय क्रियाकलापों को नवीनता प्रदान करने का एक अद्‍भुत सूत्र बन सकता है। बशर्ते उसे पूर्ण रूप से विकसित होने योग्य वातावरण मिल सके और उसके माध्यम से पुरातन के आधार पर नवीनीकरण की सृष्टि करने का प्रयत्न किया जाए।

इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी समस्याओं की तार्किक दृष्टि से व्याख्या करें, बगैर किसी पूर्वाग्रह उनका मंथन करें और फिर उनका हल निकालने के लिए प्रयत्नशील हों।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो इस विज्ञान की उन्नति को अवरुद्ध होने से कोई नहीं बचा सकता। क्योंकि किसी भी विज्ञान का विकास विभिन्न प्रयोगों, उनके गंभीर अध्ययन, सूक्ष्म निरीक्षण, गणित के ठोस आधार और उसके द्वारा प्रतिपादित फलों पर निर्भर करता है।

अनेक लोगों की धारणा है कि ज्योतिषियों द्वारा बताए गए अधिकांश फलादेश फलीभूत नहीं होते, उनकी इस बात पर आपत्ति नहीं की जा सकती। लेकिन अनेक बार तो चिकित्सा शास्त्री भी किसी रोग का समुचित निदान करने में पूरी तरह विफल हो जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि चिकित्सा शास्त्र को हम विज्ञान की परिधि से निकालकर उसका उपहास करना शुरू कर दें? ज्योतिष शास्त्र के साथ आज ऐसा ही हो रहा है। हाँ, यह अवश्य है कि ज्योतिष विज्ञान की सफलता ज्योतिषी की योग्यता, उसकी दूरदर्शिता और कार्यक्षमता पर ही निर्भर है, लेकिन यह बात तो प्रायः हर विज्ञान के साथ लागू होती है।

ज्योतिषशास्त्र मानव के साथ-साथ देश और राष्ट्र के लिए भी एक अमूल्य वैज्ञानिक निधि है और उसकी सहायता से न केवल भविष्य की रूपरेखा से अवगत हुआ जा सकता है बल्कि संभावित विघ्न-बाधाओं से बचने की चेष्टा भी की जा सकती है। वर्तमान कालखंड के उस संघर्षपूर्ण वातावरण में जिसमें आदमी सत्य, अहिंसा और शांति के पावन लक्ष्यों से पूरी तरह भटक चुका है, ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन बहुत आवश्यक है।

ज्योतिष का अध्ययन क्षेत्र में भी इतना विस्तृत, साथ ही आकर्षक और रोचक है कि उसका अध्ययनकर्ता अगर उसमें पूरी तरह रम हो जाए तो किसी अन्य विधा की ओर दृष्टि उठाने का भी उसे समय नहीं मिल पाएगा। ज्योतिष का विज्ञान हमारी समस्त हलचल, समस्त गतिविधियों की आधारशिला है, और उसकी संभावनाओं की कोई सीमा नहीं।

ज्योतिष शास्त्र और राशियाँ

जिस प्रकार भूमि को अनेक भागों में विभक्त कर भूगोल की शिक्षा सुगमता से दी जाती है, उसी प्रकार खगोल को भी 360 कल्पित अंशों में विभाजित किया गया है। राशि वास्तव में आकाशस्थ ग्रहों की नक्षत्रावली की एक विशेष आकृति व उपस्थिति का नाम है। आकाश में न तो कोई बिच्छू है और न कोई शेर, पहचानने की सुविधा के लिए तारा समूहों की आकृति की समता को ध्यान में रखकर महर्षियों ने परिचित वस्तुओं के आधार पर राशियों का नामकरण किया है। इस राश्यावली को ठीक से पहचानने के लिए समस्त आकाश मण्डल की दूरी को 27 भागों में विभक्त किया गया तथा प्रत्येक भाग का नाम एक-एक नक्षत्र रखा गया।

सूक्ष्मता से समझने के लिए प्रत्येक नक्षत्र के चार भाग किए गए, जो चरण कहलाते हैं। चन्द्रमा प्रत्येक राशि में तथा दो दिन संचरण करता है। उसके बाद वह अलग राशि में पहुँच जाता है। भारतीय मत से इसी राशि को प्रधानता दी जाती है।

सूर्य राशि किसे कहते हैं ?
वर्तमान समय में राशिफल से संबंधित अधिकांश पुस्तकें पाश्चात्य ज्योतिष के आधार पर सूर्य, राशि को प्रधानता देते हुए प्रकाशित की जाती हैं, जिस प्रकार भारतीय ज्योतिषी चन्द्र राशि को ही जातक की जन्म राशि मानते हैं और उसे महत्व देते हैं, उसी प्रकार पाश्चात्य ज्योतिर्विद जातक की सूर्य राशि को अधिक महत्व देते हैं।

जन्म राशि देखने का तरीका या नाम राशि
ज्योतिष प्रेमियों के साथ दूसरी बड़ी समस्या यह है कि वे जन्म राशि देखें या नाम राशि? वैसे व्यक्ति विशेष के जीवन का पूरा विवरण एवं जानकारी तो उसकी जन्मपत्रिका के द्वारा ही संभव है परन्तु मोटे तौर पर जन्मकालीन चन्द्रमा का पता लगाने पर ही किसी व्यक्ति के चरित्र, गुण व गतिविधि के बारे में बहुत कुछ बताया जा सकता है।

कई व्यक्ति इस चक्कर में रहते हैं कि राशि कौन-सी प्रधान मानें जन्म राशि अथवा चालू नाम राशि। इसके लिऐ ज्योतिष शास्त्र निर्देश देता है कि विद्यारम्भ, विवाह, यज्ञोपवीत इत्यादि मूल संस्कारित कार्यों में जन्म राशि की प्रधानता होती है। नाम राशि पर विचार न करें परन्तु घर को आने-जाने पर, गांव प्रस्थान व यात्रादि पर, लाटा-खेत-फर्म, फैक्ट्री इत्यादि के उद्घाटन व समापन पर तथा यज्ञ, पार्टी व व्यापार कर्मों तथा दैनिक कार्यों में नाम राशि प्रधान है जन्म राशि नहीं।

राशियों का स्वरूप व आकृति
मेष : मेष राशि की आकृति मेंढे के समान है।
वृषभ : वृषभ राशि बैल की आकृति वाली है।
मिथुन : मिथुन राशि स्त्री-पुरुष का जोड़ा है।
कर्क : कर्क राशि केकड़े के समान है।
सिंह : सिंह राशि मृगराज शेर के समान आकृति लिए हुए है।
कन्या : नौका में बैठी हुई स्त्री हाथ में धान व अग्नि लिए हुए है।
तुला : तराजू हाथ में लिए हुए पुरुष के तुल्य है।
वृश्चिक : वृश्चिक राशि आकाश में डंकदार बिच्छू की आकृति बनाती है।
धनु : धनुष हाथ में लिए हुए, कमर ऊपर मनुष्य एवं कमर के नीचे जंघा घोड़े के समान है।
मकर : हिरण से सदृश मुख वाले मगरमच्छ के समान है।
कुंभ : कन्धे पर कलश लिए हुए पुरुष के सदृश्य है।
मीन : दो मछलियों के एवं मुख पर दूसरी पूंछ लगाकर गोल बनी हुई है।

ज्योतिष शास्त्र - एक परिचय

ज्योतिष शास्त्र एक बहुत ही वृहद ज्ञान है। इसे सीखना आसान नहीं है। ज्योतिष शास्त्र को सीखने से पहले इस शास्त्र को समझना आवश्यक है। सामान्य भाषा में कहें तो ज्योतिष माने वह विद्या या शास्त्र जिसके द्वारा आकाश स्थित ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति, परिमाप, दूरी इत्या‍दि का निश्चय किया जाता है।

ज्योतिष शास्त्र की व्युत्पत्ति 'ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्‌' की गई है। हमें यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ज्योतिष भाग्य या किस्मत बताने का कोई खेल-तमाशा नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है। ज्योतिष शास्त्र वेद का अंग है। ज्योतिष शब्द की उत्पत्ति 'द्युत दीप्तों' धातु से हुई है। इसका अर्थ, अग्नि, प्रकाश व नक्षत्र होता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ज्योतिर्मय सूर्यादि ग्रहों की गति, ग्रहण इत्यादि को लेकर लिखे गए वेदांग शास्त्र का नाम ही ज्योतिष है।

छः प्रकार के वेदांगों में ज्योतिष मयूर की शिखा व नाग की मणि के समान सर्वोपरी महत्व को धारण करते हुए मूर्धन्य स्थान को प्राप्त होता है। सायणाचार्य ने ऋग्वेद भाष्य भूमिका में लिखा है कि ज्योतिष का मुख्य प्रयोजन अनुष्ठेय यज्ञ के उचित काल का संशोधन करना है। यदि ज्योतिष न हो तो मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, ऋतु, अयन आदि सब विषय उलट-पुलट हो जाएँ।

ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य आकाशीय-चमत्कारों से परिचित होता है। फलतः वह जनसाधारण को सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, ग्रह युद्ध, चन्द्र श्रृगान्नति, ऋतु परिवर्तन, अयन एवं मौसम के बारे में सही-सही व महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। इसलिए ज्योतिष विद्या का बड़ा महत्व है।

महर्षि वशिष्ठ का कहना है कि प्रत्येक ब्राह्मण को निष्कारण पुण्यदायी इस रहस्यमय विद्या का भली-भाँति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि इसके ज्ञान से धर्म-अर्थ-मोक्ष और अग्रगण्य यश की प्राप्ति होती है। एक अन्य ऋषि के अनुसार ज्योतिष के दुर्गम्य भाग्यचक्र को पहचान पाना बहुत कठिन है परन्तु जो जान लेते हैं, वे इस लोक से सुख-सम्पन्नता व प्रसिद्धि को प्राप्त करते हैं तथा मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग-लोक को शोभित करते हैं।

ज्योतिष वास्तव में संभावनाओं का शास्त्र है। सारावली के अनुसार इस शास्त्र का सही ज्ञान मनुष्य के धन अर्जित करने में बड़ा सहायक होता है क्योंकि ज्योतिष जब शुभ समय बताता है तो किसी भी कार्य में हाथ डालने पर सफलता की प्राप्ति होती है इसके विपरीत स्थिति होने पर व्यक्ति उस कार्य में हाथ नहीं डालता।

ज्योतिष ऐसा दिलचस्प विज्ञान है, जो जीवन की अनजान राहों में मित्रों और शुभचिन्तकों की श्रृंखला खड़ी कर देता है। इतना ही नहीं इसके अध्ययन से व्यक्ति को धन, यश व प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। इस शास्त्र के अध्ययन से शूद्र व्यक्ति भी परम पूजनीय पद को प्राप्त कर जाता है। वृहदसंहिता में वराहमिहिर ने तो यहां तक कहा है कि यदि व्यक्ति अपवित्र, शूद्र या मलेच्छ हो अथवा यवन भी हो, तो इस शास्त्र के विधिवत अध्ययन से ऋषि के समान पूज्य, आदर व श्रद्धा का पात्र बन जाता है।

ज्योतिष सूचना व संभावनाओं का शास्त्र है। ज्योतिष गणना के अनुसार अष्टमी व पूर्णिमा को समुद्र में ज्वार-भाटे का समय निश्चित किया जाता है। वैज्ञानिक चन्द्र तिथियों व नक्षत्रों का प्रयोग अब कृषि में करने लगे हैं। ज्योतिष शास्त्र भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं व कठिनाइयों के प्रति मनुष्य को सावधान कर देता है। रोग निदान में भी ज्योतिष का बड़ा योगदान है।

दैनिक जीवन में हम देखते हैं कि जहां बड़े-बड़े चिकित्सक असफल हो जाते हैं, डॉक्टर थककर बीमारी व मरीज से निराश हो जाते हैं वही मन्त्र-आशीर्वाद, प्रार्थनाएँ, टोटके व अनुष्ठान काम कर जाते हैं।

नौ ग्रह सत्ताईस नक्षत्र

पूर्व में हमने बारह भावों से किन-किन बातों के बारे में जाना जाता है, बताया था। अब हम यहाँ पर नौ ग्रहों और सत्ताईस नक्षत्रों के बारे में बताएँगे।

नौ ग्रह क्रमशः सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु व केतु को कहते हैं। वैसे आजकल नेप्चून, हर्षल व प्लूटो को भी ग्रहों में मान्यता दी गई है लेकिन हमारे पूर्व मनीषियों ने इनको ज्यादा महत्व नहीं दिया है। इन नौ ही ग्रहों में से राहु, केतु को छोड़कर शेष 7 ग्रह आकाश मंडल में दिखाई देते हैं व राहु-केतु सिर्फ छाया ग्रह ही होते हैं।

नेप्चून, हर्षल, प्लूटो का प्रभाव नगण्य रहता है बाकि सभी ग्रह प्रभावी होते हैं।

सत्ताईस नक्षत्र भारतीय ज्योतिष में माने गए हैं, कहीं अभिजीत को लेकर 28 मानते हैं, इस प्रकार प्राचीनकाल से ही 27 और 28 नक्षत्रों को माना गया है।

सत्ताईस नक्षत्र इस प्रकार हैं :
1) अश्विनी, 2) भरणी, 3) कृतिका, 4) रोहिणी, 5) मृगशिरा, 6) आर्द्रा, 7) पुनर्वसु, 8) पुष्य, 9) आश्लेषा, 10) मघा, 11) पूर्वा फाल्गुनी, 12) उत्तरा फाल्गुनी, 13) हस्त, 14) चित्रा, 15) स्वाति, 16) विशाखा, 17) अनुराधा, 18) ज्येष्ठा, 19) मूल, 20) पूर्वाषाढ़ा, 21) उत्तराषाढ़ा, 22) श्रवण, 23) घनिष्ठा, 24) शतभिषा, 25) पूर्वा भाद्रपद, 26) उत्तरा भाद्रपद, 27) रेवती।

उपरोक्त 27 नक्षत्र हुए। अभिजीत नक्षत्र का क्षेत्र इन्हीं के मध्य उत्तराषाढ़ा के चतुर्थ चरण और श्रवण के आरंभ के 1/15 भाग को मिलाकर है। इसका कुल क्षेत्र 4 अंश 13 कला 20 विकला है।

प्रत्येक नक्षत्र का क्षेत्र 13 अंश 20 कला है। इस प्रकार 27 नक्षत्र में 360 अंश पूरे होते हैं। 1 अंश बराबर 1 घंटा, 1 कला बराबर 1 मिनट और 1 विकला बराबर 1 सेकंड होते हैं। इस प्रकार एक नक्षत्र 13 घंटे 20 मिनट का होता है।

ज्योतिषी और उनके लक्षण

ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने वाले व्यक्ति को ज्योतिषी, ज्योतिर्विद, कालज्ञ, त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ आदि शब्दों से संबोधित किया जाता है। सांवत्सर, गुणक देवज्ञ, ज्योतिषिक, ज्योतिषी, मोहूर्तिक, सांवत्सरिक आदि शब्द भी ज्योतिषी के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं।

ज्योतिष व ज्योतिषी के संबंध में सभी परिभाषाओं का सुन्दर समाहार हमें वराहमिहिर की वृहद संहिता से प्राप्त होता है। वराहमिहिर लिखते हैं ग्रह गणित (सिद्धांत) विभाग में स्थित पौलिश, रोमक, वरिष्ट सौर, पितामह इन पाँच सिद्धांतों में प्रतिपादित युग, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, अहोरात्र, प्रहर, मुहूर्त, घटी, पल, प्राण, त्रुटि आदि के क्षेत्र का सौर, सावन, नक्षत्र, चन्द्र इन चारों मानों को तथा अधिक मास, क्षय मास, इनके उत्पत्ति कारणों के सूर्य आदि ग्रहों को शीघ्र तुन्द दक्षिणा उत्तर, नीच और उच्च गतियों के कारणों को सूर्य-चन्द्र ग्रहण में स्पर्श, मोक्ष इनके दिग्ज्ञान, स्थिति, विभेद वर्ग को बताने में दक्ष, पृथ्वी, नक्षत्रों के भ्रमण, संस्थान अक्षांश, चरखण्ड, राश्योदय, छाया, नाड़ी, करण आदि को जानने वाला, ज्योतिष विषयक समस्त प्रकार की शंकाओं व प्रश्न भेदों को जानने वाला तथा परीक्षा की काल की कसौटी में, आग और शरण से परीक्षित शुद्ध स्वर्ण की तरह स्वच्छ, साररूप वाणी बोलने वाला, निश्चयात्मक ज्ञान से सम्पन्न व्यक्ति ज्योतिषी कहलाता है। इस प्रकार से शास्त्र ज्ञान से सम्पन्न ज्योतिषी को होरा शास्त्र में भी अच्छी तरह से निष्णात होना चाहिए, तभी गुण सम्पन्न ज्योतिषी की वाणी कभी भी खाली नहीं जाती।

ज्योतिषी के लक्षण
एक ज्योतिषी के लक्षण बताते हुए आचार्य वराहमिहिर कहते हैं कि ज्योतिषी को देखने में प्रिय, वाणी में संयत, सत्यवादी, व्यवहार में विनम्र होना चाहिए। इसके अतिरिक्त वह दुर्व्यसनों से दूर, पवित्र अन्तःकरण वाला, चतुर, सभा में आत्मविश्वास के साथ बोलने वाला, प्रतिभाशाली, देशकाल व परिस्थिति को जानने वाला, निर्मल हृदय वाला, ग्रह शान्ति के उपायों को जानने वाला, मन्त्रपाठ में दक्ष, पौष्टिक कर्म को जानने वाला, अभिचार मोहन विद्या को जानने वाला, देवपूजन, व्रत-उपवासों को निरंतर, प्राकृतिक शुभाशुभों के संकेतों को समझाने वाला, ग्रहों की गणित, सिद्धांत संहिता व होरा तीनों में निपुण ग्रंथी के अर्थ को जानने वाला व मृदुभाषी होना चाहिए।

सामुद्रिक शास्त्र में ज्योतिषी के लिए हिदायत दी गई है कि सूर्योदय के पहले, सूर्यास्त के बाद, मार्ग में चलते हुए, जहाँ हँसी-मनोविनोद होता हो, उस स्थान में एवं अज्ञानी लोगों की सभा में भविष्यवाणी न करें।

ज्योतिषी को अधिकतम अपने स्थान पर बैठकर जिज्ञासु व्यक्ति की दक्षिणा का फल, पुष्प व पुण्य भाव को प्राप्त करने के पश्चात अपने ईष्ट को ध्यान करके ही हस्तरेखाओं एवं कुण्डलियों पर फलादेश करना चाहिए क्योंकि ईश्वर, ज्योतिषी व राजा के पास खाली हाथ आया व्यक्ति खाली ही जाता है।

जन्म पत्रिका क्या कहती है?

जन्म पत्रिका बनाना सीखने से पहले हमें जान लेना होगा कि जन्म पत्रिका क्या कहती है व इससे क्या जाना जा सकता है? जन्म पत्रिका वह है, जिसमें जन्म के समय किन ग्रहों की स्थिति किस प्रकार थी व कौन-सी लग्न जन्म के समय थी। जन्म पत्रिका में बारह खाने होते हैं, जो इस प्रकार हैं-

उपरोक्त कुंडली में प्रथम भाव लिया है, उसमें जो भी नंबर हो उसे जन्म लग्न कहते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि उस भाव में 1 नंबर है तो मेष लग्न होगा, उसी प्रकार 2 नंबर को वृषभ, 3 नंबर को मिथुन, 4 को कर्क, 5 को सिंह, 6 को कन्या, 7 को तुला, 8 को वृश्चिक, 9 को धनु, 10 को मकर, 11 को कुंभ व 12 नंबर को मीन लग्न कहेंगे। इसी प्रकार पहले घर को प्रथम भाव कहा जाएगा, इसे लग्न भी कहते हैं।

जन्म पत्रिका के अलग-अलग भावों से हमें अलग-अलग जानकारी मिलती है, इसे हम निम्न प्रकार जानेंगे-

प्रथम भाव से हमें शारीरिक आकृति, स्वभाव, वर्ण चिन्ह, व्यक्तित्व, चरित्र, मुख, गुण व अवगुण, प्रारंभिक जीवन विचार, यश, सुख-दुख, नेतृत्व शक्ति, व्यक्तित्व, मुख का ऊपरी भाग, जीवन के संबंध में जानकारी मिलती है। इस भाव से जनस्वास्थ्य, मंत्रिमंडल की परिस्थितियों पर भी विचार जाना जा सकता है।

द्वितीय भाव से हमें कुटुंब के लोगों के बारे में, वाणी विचार, धन की बचत, सौभाग्य, लाभ-हानि, आभूषण, दृष्टि, दाहिनी आँख, स्मरण शक्ति, नाक, ठुड्डी, दाँत, स्त्री की मृत्यु, कला, सुख, गला, कान, मृत्यु का कारण एवं राष्ट्रीय विचार में राजस्व, जनसाधारण की आर्थिक दशा, आयात एवं वाणिज्य-व्यवसाय आदि के बारे में जाना जा सकता है। इस भाव से कैद यानी राजदंड भी देखा जाता है।

तृतीय भाव से भाई, पराक्रम, साहस, मित्रों से संबंध, साझेदारी, संचार-माध्यम, स्वर, संगीत, लेखन कार्य, वक्ष स्थल, फेफड़े, भुजाएँ, बंधु-बांधव। राष्ट्रीय ज्योतिष के लिए रेल, वायुयान, पत्र-पत्रिकाएँ, पत्र व्यवहार, निकटतम देशों की हलचल आदि के बारे में जाना जाता है।

चतुर्थ भाव में माता, स्वयं का मकान, पारिवारिक स्थिति, भूमि, वाहन सुख, पैतृक संपत्ति, मातृभूमि, जनता से संबंधित कार्य, कुर्सी, कुआँ, दूध, तालाब, गुप्त कोष, उदर, छाती, राष्ट्रीय ज्योतिष हेतु शिक्षण संस्थाएँ, कॉलेज, स्कूल, कृषि, जमीन, सर्वसाधारण की प्रसन्नता एवं जनता से संबंधित कार्य एवं स्थानीय राजनीति, जनता के बीच पहचान- यह सब देखा जाता है।

पंचम भाव में विद्या, विवेक, लेखन, मनोरंजन, संतान, मंत्र-तंत्र, प्रेम, सट्टा, लॉटरी, अकस्मात धन लाभ, पूर्वजन्म, गर्भाशय, मूत्राशय, पीठ, प्रशासकीय क्षमता, आय भी जानी जाती है क्योंकि यहाँ से कोई भी ग्रह सप्तम दृष्टि से आय भाव को देखता है।

षष्ठ भाव इस भाव से शत्रु, रोग, ऋण, विघ्न-बाधा, भोजन, चाचा-चाची, अपयश, चोट, घाव, विश्वासघात, असफलता, पालतू जानवर, नौकर, वाद-विवाद, कोर्ट से संबंधित कार्य, आँत, पेट, सीमा विवाद, आक्रमण, जल-थल सैन्य के बारे में जाना जा सकता है।

सप्तम भाव स्त्री से संबंधित, विवाह, सेक्स, पति-पत्नी, वाणिज्य, क्रय-विक्रय, व्यवहार, साझेदारी, मूत्राशय, सार्वजनिक, गुप्त रोग, राष्ट्रीय नैतिकता, वैदेशिक संबंध, युद्ध का विचार भी किया जाता है। इसे मारक भाव भी कहते हैं।

अष्टम भाव से मृत्यु, आयु, मृत्यु का कारण, स्त्री धन, गुप्त धन, उत्तराधिकारी, स्वयं द्वारा अर्जित मकान, जातक की स्थिति, वियोग, दुर्घटना, सजा, लांछन आदि इस भाव से विचार किया जाता है।

नवम भाव से धर्म, भाग्य, तीर्थयात्रा, संतान का भाग्य, साला-साली, आध्यात्मिक स्थिति, वैराग्य, आयात-निर्यात, यश, ख्याति, सार्वजनिक जीवन, भाग्योदय, पुनर्जन्म, मंदिर-धर्मशाला आदि का निर्माण कराना, योजना, विकास कार्य, न्यायालय से संबंधित कार्य जाने जाते हैं।

दशम भाव से पिता, राज्य, व्यापार, नौकरी, प्रशासनिक स्तर, मान-सम्मान, सफलता, सार्वजनिक जीवन, घुटने, संसद, विदेश व्यापार, आयात-निर्यात, विद्रोह आदि के बारे में जाना जाता है। इस भाव से पदोन्नति, उत्तरदायित्व, स्थायित्व, उच्च पद, राजनीतिक संबंध, जाँघें एवं शासकीय सम्मान आदि के बारे में जाना जाता है।

एकादश भाव से मित्र, समाज, आकांक्षाएँ, इच्छापूर्ति, आय, व्यवसाय में उन्नति, ज्येष्ठ भाई, रोग से मुक्ति, टखना, द्वितीय पत्नी, कान, वाणिज्य-व्यापार, परराष्ट्रों से लाभ, अंतरराष्ट्रीय संबंध आदि जाना जाता है।

द्वादश भाव से व्यय, हानि, दंड, गुप्त शत्रु, विदेश यात्रा, त्याग, असफलता, नेत्र पीड़ा, षड्यंत्र, कुटुंब में तनाव, दुर्भाग्य, जेल, अस्पताल में भर्ती होना, बदनामी, भोग-विलास, बायाँ कान, बाईं आँख, ऋण आदि के बारे में जाना जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के भेद

सिद्धांत ज्योतिष
संहिता ज्योतिष
होरा शास्त्र

इन तीन स्कन्धों वाला उत्तम ज्योतिष शास्त्र ही वेदों का पवित्र नेत्र कहा गया है।

सिद्धांत ज्योतिष
काल गणना की एक विशेष सूक्ष्म माप त्रुटि से लेकर प्रलय के अन्त तक कालों का आकलन, उनका मान, उनका भेद, उनका चार (चलन), आकाश में उनकी गति आदि क्रम से द्विविध प्रकार की गणित से उनके प्रश्न तथा उत्तर जिसमें निहित है। पृथ्वी और आकाश के मध्य स्थित ग्रहों का जिसमें कथन और उनको जानने, वैध करने का यन्त्र आदि वस्तुओं का जिसमें गणित निहित हो, उस प्रबन्ध को विद्वानों ने सिद्धान्त रूप से अभिहित किया है।

सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम
सिद्धान्त ग्रन्थों में सूर्य सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्धान्त, ब्रह्म सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त, पौलिश सिद्धान्त, ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, पितामह सिद्धान्त आदि प्रसिद्ध सिद्धान्त ग्रन्थ हैं।

सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम
जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को चलाया ऐसे ज्योतिष शास्त्र के 18 प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं। ये हैं- ब्रह्मा, आचार्य, वशिष्ठ, अत्रि, मनु, पौलस्य, रोमक, मरीचि, अंगिरा, व्यास, नारद, शौनक, भृगु, च्यवन, यवन, गर्ग, कश्यप और पाराशर।

संहिता ज्योतिष
ग्रहों की चाल, वर्ष के लक्षण, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, कण, मुहूर्त, ग्रह-गोचर भ्रमण, चन्द्र ताराबल, सभी प्रकार के लग्नों का निदान, कर्णच्छेद, यज्ञोपवीत, विवाह इत्यादि संस्कारों का निर्णय तथा पशु-पक्षी चेष्टा ज्ञान, शकुन विचार, रत्न विद्या, अंग विद्या, आकार लक्षण, पक्षी व मनुष्य की असामान्य चेष्टाओं का चिन्तन संहिता विभाग का विषय है।

संहिता ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम
संहिता ग्रन्थों में वृहत्संहिता, कालक संहिता, नारद संहिता, गर्ग संहिता, भृगु संहिता, अरुण संहिता, रावण संहिता, लिंग संहिता, वाराही संहिता, मुहूर्त चिन्तामण इत्यादि प्रमुख संहिता ग्रन्थ हैं।

संहिता ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम
मुहूर्त गणपति, विवाह मार्तण्ड, वर्ष प्रबोध, शीघ्रबोध, गंगाचार्य, नारद, महर्षि भृगु, रावण, वराहमिहिराचार्य सत्य-संहिताकार रहे हैं।

होरा शास्त्र
राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, चलित, द्वादशभाव, षोडश वर्ग, ग्रहों के दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, ग्रहों के धातु, द्रव्य, कारकत्व, योगायोग, अष्टवर्ग, दृष्टिबल, आयु योग, विवाह योग, नाम संयोग, अनिष्ट योग, स्त्रियों के जन्मफल, उनकी मृत्यु नष्टगर्भ का लक्षण प्रश्न एवं ज्योतिष के फलित विषय पर जहाँ विकसित नियम स्थापित किए जाते हैं, वह होरा शास्त्र कहलाता है।

होरा शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों के नाम
सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ वृहद पाराशर होरा शास्त्र मानसागरी, सारावली, वृहत्जातक, जातकाभरण, चमत्कार चिन्तामणि, ज्योतिष कल्पद्रुम, जातकालंकार, जातकतत्व होरा शास्त्र इत्यादि हैं।

होरा शास्त्र के प्रमुख आचार्यों के नाम
पुराने आचार्यों में पाराशर, मानसागर, कल्याणवर्मा, दुष्टिराज, रामदैवज्ञ, गणेश, नीपति आदि हैं।

18 अप्रैल 2010

उन्हें आगे, पीछे और चारों ओर से प्रणाम

प्रणाम करने के भी कई तरीके या प्रकार हैं। हाथ जोड़कर, झुककर, पैर छूकर या साष्टांग दण्डवत होकर। प्रणाम करने की यह क्रिया, सम्मान करने और पाने वाले पर निर्भर करती है। किसी के प्रति सम्मान व्यक्त करने का कार्य हृदय से होता है न कि दिमाग से। जिसके प्रति हमारे हृदय में सच्चा सम्मान होता है तो प्रणाम करने की क्रिया अनायास ही हो जाती है। यदि प्रणाम करने से पूर्व हमारा दिमाग सक्रिय हो तो समझना चाहिये कि सम्मान सच्चा नहीं महज दिखावा है।

माता-पिता और गुरु के प्रति हमारे मन में ऐसा ही सच्चा प्रेम होता है। इनमें भी जो प्रेम गुरु के प्रति होता है वह अधिक आदर्श माना गया है। क्योंकि गुरु और शिष्य का रिश्ता ही सर्वाधिक लम्बा और स्थाई होता है। माता-पिता, पति-पत्नी तथा संतान आदि के प्रति जो प्रेम संबंध होता है, वह सांसारिकता और मोह से जन्मा होता है। जबकि गुरु के प्रति जो प्रेम संबंध होता है वह आध्यात्मिक और निस्वार्थ होता है। एक मात्र गुरु ही है जो हमारे दु:ख को स्थाई रूप से दूर कर सकता है। कहा जाता है कि इंसान अकेले ही आता है और अकेले ही जाता है। यह बात सांसारिक रिश्तों पर ही लागू होती है क्योंकि गुरु मरने के बाद भी जन्मों तक साथ निभाने की क्षमता रखता है। इसीलिये सच्चे गुरु और माता-पिता को किया गया प्रणाम ही सार्थक एवं फलदाई होता है।

भोग करो मगर खुली आंख से

वैसे तो भोग-विलास को धर्म अध्यात्म के क्षेत्र में त्याज्य यानि कि त्याग देने योग्य कार्य माना गया है। किन्तु यह नियम या मर्यादा उस साधक के लिये है जो साधना के क्षेत्र में पर्याप्त उन्नति एवं प्रगति कर चुका हो।किसी नए एवं कच्चे साधक को यदि पूर्ण त्याग या पूर्ण वैराग्य की सीख दी जाए तो उसके लिये इसका पालन करना प्राय: कठिन ही होता है। यदि हिम्मत करके कोई साधक अपनी समस्त वृत्तियों पर एक ही साथ पूर्ण बंदिश लगा भी देता है तो इस बात की पूरी संभावना रहती है कि मौका मिलते ही नियंत्रण का बांध एक ही झटके में चरमरा के गिर जाता है।

अत: बार-बार की ठोकर खाने से अच्छा है कि हर कदम फूंक-फूंक कर ही रखा जाए। मन को किसी कार्य से एक साथ रोकने की बजाय अनुभव से सीखने दिया जाए। अध्यात्म के तत्व ज्ञान में भी यही बात कुछ इस तरह से कही गई है - ' तेन त्यक्तेन भूंजीथा Ó

कहने का मतलब यह है कि भोग करो मगर त्याग के साथ। त्याग के साथ भोग करने का मतलब है खुली आंखों से भोग करना। यानि जब भी किसी इन्द्रिय सुख का भोग करो उसका पूरे ध्यान से निरीक्षण भी करो। पूरे साक्षी भाव से किया गया निरीक्षण आपको उस दिव्य ज्ञान से रूबरू करवा देगा जिसे पाकर आप समझ जाएंगे कि हर इंद्रिय सुख का अन्तिम परिणाम दु:ख ही है। जबकि हर त्याग का परिणाम अन्तत: सुखद ही होता है।

स्वर्ग जाएं या नर्क मरजी आपकी

कर्म को समस्त धर्मों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। हिंदू धर्म एवं दर्शन में तो कर्म को ईश्वर प्राप्ति का एक प्रामाणिक मार्ग कहा गया है। बोलचाल की भाषा में कर्म शब्द अत्यंत सहज एवं सामान्य प्रतीत होता है किंतु कर्म का मर्म (गहराई) बहुत गूढ़ एवं गंभीर है। इंसान अपने ही कर्मों से स्वर्ग या नर्क की रचना करता है।कर्म ही मनुष्य को प्रतिष्ठित करता है और कर्म से ही मनुष्य पतन के गड्ढे में गिरता है। कर्म से ही मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है और कर्म से ही उसे नर्क की प्राप्ति होती है। स्वर्ग का अर्थ उस वातावरण और उन परिस्थितियों से है जो मनुष्य को दिव्य शांति, दिव्य आनंद एवं दिव्य जीवन की अनुभूति कराते हैं। दूसरी तरफ नरक उस वातावरण को कहते हैं जहां घोर अशांति, दु:ख, क्लेश, भय, शोषण, आदि हिंसा दुगुर्णों का निवास होता है। धर्म अध्यात्म में कर्म को योग की श्रेणी में रखा गया है। तथा कर्मयोग कहकर कर्म की महिमा व्यक्त की गई हैं। बाहर से देखने में कोई भी कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता । एक मोची द्वारा जूते बनाना और कलेक्टर द्वारा प्रशासनिक कार्य करना बिल्कुल एक समान है। यहां तक कि उस मोची का काम उस भ्रष्ट कलेक्टर से अधिक श्रेष्ठ है जो अपना काम पूरी ईमानदारी और मेहनत से करता है।

मानसिक शांति चाहिए, क्रोध को दूर भगाइए

कोई मन की बात पूरी नहीं होती या कोई हमारी बात नहीं मानता तब क्या होता है? आवेश, क्रोध, गुस्सा स्वत: हम पर हावी हो जाता है और हम अपना विवेक खो बैठते हैं। क्रोध वैसे तो एक सामान्य मनोभाव है परंतु अधिकांशत: इसके परिणाम काफी बुरे ही होते हैं। क्रोध हमारे दिमाग की सोचने और समझने की क्षमता का हरण कर लेता है और वो कर बैठते हैं जिसके लिए बाद में पछताना पड़ता है।अच्छा यही है कि हम अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें वैसे यह अत्यंत मुश्किल कार्य हैं हर किसी के बस में नहीं होता क्रोध पर काबू पाना। और जो अपने क्रोध पर काबू पा लेता है उसकी जीवन नितनए आयाम तक पहुंचता है, मान-सम्मान, इज्जत, खुशी और मानसिक शांति सहज उसे प्राप्त हो जाती है।श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्रोध के संबंध में कहा था कि क्रोध अविवेक और मोह का जन्मदाता है। मोह और अविवेक से हमारी सोचने-समझने की क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। परिणामस्वरूप हमें मान-सम्मान और यश की हानि उठानी पड़ती है। अत: युद्ध में विजय के लिए क्रोध पर विजय करना अति महत्वपूर्ण है। श्रीकृष्ण की यह बात आज हमारे जीवन पर भी सटिक बैठती है। हमारी जिंदगी में क्रोध इतनी सरलता से हम पर हावी हो जाता है कि हम समझ भी नहीं पाते और गड़बड़ कर बैठते हैं।

कैसे करे क्रोध पर नियंत्रण
- क्रोध आने पर अपना ध्यान कहीं ओर लगाने का प्रयत्न करें।
- ठंडा पानी पीएं या जो ठंडी चीज उपलब्ध हो खाएं।
- कुछ देर लंबी-लंबी सांसे लें।
- कुछ देर के लिए मौन धारण कर लें।
- ऐसे समय किसी भी प्रकार की बहस से बचें।

क्रोध पर नियंत्रण करें फिर देखिए जिंदगी कितनी सरल और शांति देने वाली हो जाएगी। विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि क्रोध हमारे शरीर के लिए भी हानिकारक है। अत: क्रोध से बचें।

दुःख से घबराना नहीं, सामना करों

दुख एक आग की तरह होता है जो व्यक्ति को जलाता है, तपाता है। सामान्यत: दुखी व्यक्ति के मन में यही ख्याल होता है कि भगवान भी उसका दुश्मन हो गया है परंतु ऐसा नहीं है।

जिस तरह सोना आग में तपने के पहले भी सोना ही होता है परंतु उसका मूल्य और उसकी सुंदरता किसी को लुभाने वाली नहीं होती। वही सोना आग में तपने के बाद चमकीला और बहुमूल्य हो जाता है। उसी तरह यदि कोई दुखों से घिरा हुआ है तो इसका मतलब यही है भगवान उसे दुखों की आग में तपा कर सोने के समान चमकीला और बहुमूल्य बनाना चाहता है।
दुख को एक और उदाहरण से समझा जा सकता है हार्स रेस में जॉकी घोड़े को पीटता है, मारता है ताकि वह तेज दौड़े। घोड़ा के मन में भी यही होता है कि ये दर्द, ये मार उसे क्यूं झेलना पड़ रही है। परंतु इसी दर्द की वजह वह रेस जीत जाता है। उसी तरह हमारे दुख-दर्द के समय यही सोचना चाहिए कि भगवान भी चाहता है यह जीवन की रेस जीत जाए।

अत: दुख से घबराना नहीं चाहिए और उसका हंसते हुए सामना करने से ही दुख से निपटा जा सकता है।