04 जनवरी 2010

भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – नृसिंह अवतार



श्री शुकदेव मुनि बोले, “हे परीक्षित! हिरण्यकश्यपु ने अजर अमर होने के लिये एक बार घोर तप किया। उसके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उससे वर माँगने के लिये कहा। हिरण्यकश्यपु बोला, “हे प्रभु! आप मुझे यह वर दीजिये कि आपके द्वारा उत्पन्न किये किसी प्राणी से अर्थात् मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, दैत्य, नाग, किन्नर आदि से मेरी मृत्यु न हो सके। न मैं घर के भीतर मर सकूँ न बाहर। न मैं दिन में मर सकूँ न रात्रि में। न पृथ्वी में मर सकूँ न आकाश में” ब्रह्मा जी तथास्तु कह कर अपने लोक को चले गये।
“वर प्राप्त करने के पश्चात् हिरण्यकश्यपु ने अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु का बदला लेने का विचार किया और तीनों लोकों में देवता, असुर, नाग, गन्धर्व, मनुष्य, यक्ष, राक्षस आदि सभी को जीत लिया। वह इन्द्र को हराकर स्वर्ग में वास करने लगा। अमरावती का एकछत्र सम्राट होकर स्वतन्त्रतापूर्वक विहार करने लगा। देवता उसके चरणों की वन्दना करते थे। मतवाली मदिरा में वह मस्त रहता था।
हिरण्यकश्यपु के चार पुत्र थे। उनमें प्रह्लाद सब से छोटे थे। प्रह्लाद ने बचपन में ही भगवद्भक्ति में अनुराग लगा लिया था। भगवान विष्णु के चरणों में उनका अटूट प्रेम था। किन्तु विष्णु से बैर रखने के कारण हिरण्यकश्यपु अपने पुत्र को अपराधी मान कर दण्ड देने पर उतारू हो गया। उसने दैत्यों को बुला कर कहा कि तुम लोग इसे शीघ्र मार डालो। यह विष्णु की पूजा करता है। यह कृतघ्न मेरी आज्ञाओं का पालन नहीं करता है। रोग को उत्पन्न होते ही यदि नष्ट नहीं किया जाता है तो वह बढ़ कर घातक हो जाता है। शरीर के किसी अंग में यदि खराबी आ जाये तो उसे अवश्य काट कर फेंक देना चाहिये। यह पुत्र रूप में मेरा शत्रु है। अपने राजा की आज्ञा सुन कर दैत्यहण त्रिशूल ले ले कर प्रह्लाद पर टूट पड़े। किन्तु प्रह्लाद का चित्त तो मन, वाणी और कर्म से सर्व शक्तिमान परमब्रह्म में लीन था। इसलिये उन दैत्यों के सभी प्रहार व्यर्थ रहे। यह देख कर हिरण्यकश्यपु को अति चिन्ता हुई। उसने प्रह्लाद को मारने के लिये मतवाले हाथियों के नीचे कुचलवाया। विषधर सर्पों से डसवाया। पर्वत से नीचे गिरवाया। विष दिया गया। बर्फ में दाबा गया। दहकती अग्नि में जलाया गया। किन्तु भगवत परायण भक्त प्रह्लाद का बाल भी बाँका नहीं हुआ।
प्रह्लाद अभय होकर असुर बालकों को भगवान विष्णु की भक्ति का उपदेश देने लगा। उसके इस कृत्य से हिरण्यकश्यपु अत्यन्त क्रोधित बोला, “रे नीच! तू स्वयं तो बिगड़ता ही जा रहा है और हमारे कुल के सभी बालकों को भी बिगाड़ना चाहता है। रे मूर्ख! तू किस के बल भरोसे पर निडरता पूर्वक मेरी आज्ञा का उल्लंघन करता है।” प्रह्लाद बोले, “हे पिताजी! मैं सर्व शक्तिमान परमात्मा के बल पर ही भरोसा करता हूँ। वे सर्वज्ञ हैं। वे सर्वत्र हैं। आपको भी अपने आसुरी भाव को छोड़कर उन्हीं परमात्मा के शरण में जाना चाहिये।” हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद के ऐसे वचन सुनकर कहा, “रे नीच! अब तेरे सिर पर काल खेल रहा है। तेरा वह जगदीश्वर यदि सर्वत्र है तो इस खम्भे में क्यों दिखाई नहीं देता? इतना कहकर उसने बड़े जोर से खम्भे पर घूँसा मारा। उसी क्षण खम्भे में से एक बड़ा भयंकर नाद हुआ। मानों ब्रह्रमाण्ड ही फट गय हो। उस खम्भे को फाड़ कर एक विचित्र रूपधारी भगवान प्रकट हो गये। वह स्वरूप न तो पूरा मनुष्य का था और न पूर्ण सिंह का था ब्रह्मा के वचन को सत्य करने के लिये भगवान ने नृसिंह अवतार लिया था। नृसिंह भगवान हिरण्यकश्पु को पकड़ कर द्वार पर ले गये और उसे अपनी जाँघों पर रख कर कहा, “रे असुर! देख न मैं मनुष्य हूँ न पशु हूँ। न तू घर के बाहर है, न भीतर है। न तू पृथ्वी पर है न आकाश में। सूर्यास्त हो चुका है किन्तु रात्रि का पदार्पण नहीं हुआ है, अतः न रात है न दिन है।” इतना कहकर भगवाने नृसिंह ने अपने नखों से हिरण्यकश्यपु के शरीर को फाड़ कर उसका वध कर दिया।