04 जनवरी 2010
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – चन्द्रमा की चाल
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 11:05:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – नृसिंह अवतार
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 10:49:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – सनातन धर्म के लक्षण
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 10:30:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – समुद्र मंथन
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 10:16:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – अमृत वितरण
(1) ब्राह्मणों के उत्तम वृत्ति चार प्रकार की है – शिलोच्छन्न, शालीन यामाकर तथा वार्ता। आपत्तिकाल में सभी वृत्ति मान्य हैं। आधुनिक काल को क्या आपत्तिकाल माना जा सकता है? क्योंकि दैनिक जीवन में सभी वर्णों के साथ विनिमय अपरिहार्य हो चुका है. इस पर मेरी शंका का समाधान अवश्य करें.
(2) किंतु कल्पद्रुम कौन था-थी? इस पर प्रकाश डालें. धन्वन्तरि जब अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए.. यह अमृत उनके पास क्या पहले से था? यदि हां तो समुद्र मंथन की आवश्यकता क्यों हुई? माता लक्ष्मी क्या समुद्र की बेटी कहलाई? इस पर भी प्रकाश डालें.
(1) दीवान जी, आपत्तिकाल क्या हो सकता है इसे समझने के लिये मैं राजा हरिश्चन्द्र का उदाहरण दे रहा हूँ। राजा हरिश्चन्द्र क्षत्रिय थे किन्तु आपत्तिकाल में उन्होंने डोम का दास बनकर क्षत्रियवृति के स्थान पर चाण्डालवृति (शूद्रवृति) की थी।
आपके प्रश्न का उत्तर देने के पहले हमें वर्ण व्यवस्था को समझना होगा। वर्ण व्यवस्था मनुष्य के कर्मों पर आधारित था। विद्वान, पराक्रमी और व्यापार व्यवसाय की योग्यता रखने वाले क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण में आते थे। जिनमें उपरोक्त किसी भी प्रकार की योग्यता नहीं होती थे वे ही शूद्र वर्ण में आते थे। यदि किसी क्षत्रिय में ब्राह्मण के कर्म करने की योग्यता आ जाती थी तो उसे ब्राह्मण वर्ण में मान्यता प्राप्त हो जाती थी। ऋषि विश्वामित्र क्षत्रिय राजा थे किन्तु बाद में ब्राह्मणत्व प्राप्त किया अर्थात् क्षत्रिय से ब्राह्मण हो गये। इसी प्रकार परशुराम ब्राह्मण थे किन्तु अनेकों युद्ध करके क्षत्रिय वर्ण का कर्म किया। इस प्रकार की व्यवस्था होने के कारण अनेकों बार क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य के किसी सन्तान में किसी प्रकार का गुण न होने पर उसे शूद्र वर्ण में मान्यता दिया जाता था।
कालान्तर में इस वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था में बदल दिया गया जिससे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र जाति बन गये और नई व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की सन्तान ब्राह्मण, क्षत्रिय की सन्तान क्षत्रिय आदि होने लगे। इससे स्पष्ट है कि जाति व्यवस्था में कर्म की प्रधानता नहीं रही और इसके कारण से वृतियों का भी महत्व नहीं रहा। यही जाति व्यवस्था आज तक चली आ रही है।
अतः आधुनिक काल में हमें अपने अपने विवेक के अनुसार उचित-अनुचित का निर्णय लेना अधिक उत्तम होगा।
(2) पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकलने वाली वस्तुओं को रत्न कहा गया है तथा वे चौदह रत्न थे जिनके नाम हैं – (1) हलाहल (विष), (2) कामधेनु, (3) उच्चैःश्रवा घोड़ा, (4) ऐरावत हाथी, (5) कौस्तुभ मणि, (6) कल्पद्रुम, (7) रम्भा, (8) लक्ष्मी, (9) वारुणी (मदिरा), (10) चन्द्रमा, (11) पारिजात वृक्ष, (12) शंख, (13) धन्वन्तरि वैद्य और (14) अमृत। इससे स्पष्ट है कि पहले से न तो धन्वन्तरि थे और न ही अमृत। इसीलिये समुद्र मंथन की आवश्यकता पड़ी।
लक्ष्मी जी समुद्र पुत्री कहलाती हैं तथा उनके पिता भृगु ऋषि हैं।
कल्पद्रुम नाम पूरे सुखसागर में केवल एक बार आया है और इसके विषय में कुछ भी विस्तृत विवरण नहीं है। उसके विषय में आपकी शंका दूर करने के लिये मैं अन्य पौराणिक ग्रन्थों को टटोलूँगा। अतः आपसे अनुरोध है कि मुझे थोड़ा समय दीजिये।
धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को दैत्यों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी कि वे दैत्यों से लड़कर उस अमृत को ले सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये उनका आपस में लड़ना देखते रहे। देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु तत्काल मोहिनी रूप धारण कर आपस में लड़ते दैत्यों के पास जा पहुँचे। उस विश्वमोहिनी रूप को देखकर दैत्य तथा देवताओं की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार देखने लगे। जब दैत्यों ने उस नवयौवना सुन्दरी को अपनी ओर आते हुये देखा तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुन्दरी की ओर कामासक्त होकर एकटक देखने लगे।
वे दैत्य बोले, “हे सुन्दरी! तुम कौन हो? लगता है कि हमारे झगड़े को देखकर उसका निबटारा करने के लिये ही हम पर कृपा कटाक्ष कर रही हो। आओ शुभगे! तुम्हारा स्वागत है। हमें अपने सुन्दर कर कमलों से यह अमृतपान कराओ।” इस पर विश्वमोहिनी रूपी विष्णु ने कहा, “हे देवताओं और दानवों! आप दोनों ही महर्षि कश्यप जी के पुत्र होने के कारण भाई-भाई हो फिर भी परस्पर लड़ते हो। मैं तो स्वेच्छाचारिणी स्त्री हूँ। बुद्धिमान लोग ऐसी स्त्री पर कभी विश्वास नहीं करते, फिर तुम लोग कैसे मुझ पर विश्वास कर रहे हो? अच्छा यही है कि स्वयं सब मिल कर अमृतपान कर लो।”
विश्वमोहिनी के ऐसे नीति कुशल वचन सुन कर उन कामान्ध दैत्यो, दानवों और असुरों को उस पर और भी विश्वास हो गया। वे बोले, “सुन्दरी! हम तुम पर पूर्ण विश्वास है। तुम जिस प्रकार बाँटोगी हम उसी प्रकार अमृतपान कर लेंगे। तुम ये घट ले लो और हम सभी में अमृत वितरण करो।” विश्वमोहिनी ने अमृत घट लेकर देवताओं और दैत्यों को अलग-अलग पंक्तियो में बैठने के लिये कहा। उसके बाद दैत्यों को अपने कटाक्ष से मदहोश करते हुये देवताओं को अमृतपान कराने लगे। दैत्य उनके कटाक्ष से ऐसे मदहोश हुये कि अमृत पीना ही भूल गये।
भगवान की इस चाल को राहू नामक दैत्य समझ गया। वह देवता का रूप बना कर देवताओं में जाकर बैठ गया और प्राप्त अमृत को मुख में डाल लिया। जब अमृत उसके कण्ठ में पहुँच गया तब चन्द्रमा तथा सूर्य ने पुकार कर कहा कि ये राहु दैत्य है। यह सुनकर भगवान विष्णु ने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर गर्दन से अलग कर दिया। अमृत के प्रभाव से उसके सिर और धड़ राहु और केतु नाम के दो ग्रह बन कर अन्तरिक्ष में स्थापित हो गये। वे ही बैर भाव के कारण सूर्य और चन्द्रमा का ग्रहण कराते हैं।
इस तरह देवताओं को अमृत पिलाकर भगवान विष्णु वहाँ से लोप हो गये। उनके लोप होते ही दैत्यों की मदहोशी समाप्त हो गई। वे अत्यंत क्रोधित हो देवताओं पर प्रहार करने लगे। भयंकर देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया जिसमें देवराज इन्द्र ने दैत्यराज बालि को परास्त कर अपना इन्द्रलोक वापस ले लिया।
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 10:14:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – कंस का अत्याचार
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 10:03:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – कृष्णावतार
हे परीक्षित! इस तरह शेष भगवान के अवतार बलराम जी पहले देवकी के गर्भ में आये और फिर उनको योगमाया ने देवकी के गर्भ से निकाल कर रोहिणी के गर्भ में रख दिया। इसीलिये बलराम जी की दो माताएँ हुईं। इसके पश्चात् भगवान विष्णु स्वयं देवकी के गर्भ में आ पहुँचे।
भादों माह की अष्टमी तिथि थी। रोहिणी नक्षत्र था। अर्द्धरात्रि का समय था। बादल गरज रहे थे और घनघोर वर्षा हो रही थी। उसी काल में देवकी के गर्भ से भगवान प्रकट हुये। उनकी चार भुजाएँ थीं जिनमें वे शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये हुये थे। वक्षस्थल पर श्री वत्स का चह्न था। कण्ठ में कौस्तुभ मणि जगमगा रही थी। उनका सुन्दर श्याम शरीर था जिस पर वे पीताम्बर धारण किये हुये थे। कमर में कर्धनी, भुजाओं में बाजूबन्द तथा कलाइयों में कंकण शोभायमान थे। अंग प्रत्यंग से अपूर्व छटा छलक रही थी जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण बन्दीगृह जगमगा उठा। वसुदेव और देवकी विस्मय और हर्ष से ओत-प्रोत होने लगे। यह जान कर कि स्वयं भगवान उनके पुत्र के रूप में पधारे हैं उनके आनन्द की सीमा नहीं रही। बुद्धि को स्थिर कर दोनों ने भगवान को प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगे।
स्तुति करके देवकी बोलीं कि हे प्रभु! आपने अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ कर दिया। अब मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप अपने अलौकिक रूप को त्याग कर सामान्य बालक का रूप धारण कर लीजिये। भगवान ने देवकी से कहा, “हे देवि! अपने पूर्व जन्म में आप दोनों ने घोर तपस्या की थी और ब्रह्मा जी से वरदान में मुझे पुत्र रूप में माँगा था। अतः ब्रह्मा जी के वरदान को सत्य सिद्ध करने के लिये मैंने आप लोगों के पुत्र के रूप में अवतार लिया है।” फिर वे वसुदेव से बोले, “हे तात! मैं अब बालक रूप हो जाता हूँ। आप मुझे गोकुल में नन्द बाबा के यहाँ पहुँचा दीजिये। वहाँ पर मेरी योगमाया ने कन्या के रूप में यशोदा के गर्भ से जन्म लिया है। आप उसे यहाँ ले आइये। इतना कहकर उन्होंने बालक रूप धारण कर लिया।
भगवान की माया से वसुदेव की हथकड़ी-बेड़ी खुल गईं, पहरेदारों को गहन निद्रा व्याप्त गई, और कपाट भी खुल गये। वसुदेव बालक को लेकर गोकुल की ओर चले। बादल धीरे-धीरे गरज रहे थे। जल की फुहारें पड़ रहीं थीं। शेष जी अपना फन फैला कर छतरी बने हुये बालक को ढँके हुये थे। वसुदेव जी यमुना पार करने के लिये निर्भय होकर जल में घुस पड़े। भगवान के चरण को स्पर्श करने के लिये यमुना जी का जल चढ़ने लग गया। ज्यों-ज्यों वसुदेव बालक को ऊपर उठाते, त्यों-त्यों जल और भी ऊपर चढ़ता जाता। इस पर वसुदेव के कष्ट को जान कर भगवान ने अपने चरण बढ़ा कर यमुना जी को उसे छू लेने दिया और जलस्तर नीचे आ गया।
यशोदा जी अचेत होकर अपनी शैया पर सो रहीं थीं उन्हें नवजात कन्या के जन्म का कुछ भी पता नहीं था। वसुदेव ने अपने पुत्र को यशोदा की शैया पर सुला दिया और उनकी कन्या को अपने साथ बन्दीगृह ले आये। कन्या को देवकी की शैया पर सुलाते ही हथकड़ी-बेड़ी अपने आप लग गये, कपाट बन्द हो गये और पहरेदारों को चेत आ गया।
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भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – पूतना वध
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 09:47:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – रुक्मणी हरण
कृष्ण के शील व पराक्रम का वृत्तान्त सुनकदर विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणी उन पर आसक्त हो गईं। विदर्भराज के रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली नामक पाँच पुत्र और एक पुत्री रुक्मणी थी। रुक्मणी सर्वगुण सम्पन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किन्तु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। अतः उसने रुक्मणी का टीका शिशुपाल के यहाँ भिजवा दिया। रुक्मणी कृष्ण पर आसक्त थी इसलिये उसने कृष्ण को एक ब्राह्मण के हाथों संदेशा भेजा। कृष्ण ने संदेश लाने वाले ब्राह्मण से कहा, “हे ब्राह्मण देवता! जैसा रुक्मणी मुझसे प्रेम करती हैं वैसे ही मैं भी उन्हीं से प्रेम करता हूँ। मैं जानता हूँ कि रुक्मणी के माता-पिता रुक्मणी का विवाह मुझसे ही करना चाहते हैं परन्तु उनका बड़ा भाई रुक्म मुझ से शत्रुता रखने के कारण उन्हें ऐसा करने से रोक रहा है। तुम जाकर राजकुमारी रुक्मणी से कह दो कि मैं अवश्य ही उनको ब्याह कर लाउँगा।”
केवल दो दिनों बाद ही रुक्मणी का शिशुपाल से विवाह होने वाला था। अतः कृष्ण ने अपने सारथी दारुक को तत्काल रथ लेकर आने की आज्ञा दी। आज्ञा पाकर दारुक रथ ले कर आ गया। उस रथ में शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहर्षक नाम के द्रुतगामी घोड़े जुते हुये थे। रथ में बैठकर कृष्ण विदर्भ देश के लिये प्रस्थान कर गये। सन्ध्या तक वे विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिलपुर पहुँच गये। वहाँ पर शिशुपाल की बारात पहुँच चुकी थी। बारात में शाल्व, जरासंघ, दन्तवक्र, विदूरथ, पौन्ड्रक आदि सहस्त्रों नरपति सम्मिलित थे और ये सभी श्री कृष्ण तथा बलराम के विरोधी थे। उनको रुक्मणी को हर ले जाने लिये कृष्ण के आने की सूचना भी मिल चुकी थी इसलिये वे कृष्ण को रोकने के लिये अपनी पूरी सेना के साथ तैयार थे। इधर जब कृष्ण के अग्रज बलराम को जब सूचना मिली की रुक्मणी को लाने के लिये कृष्ण अकेले ही प्रस्थान कर चुके हैं और वहाँ विरोधी पक्ष के सारे लोग वहाँ उपस्थित हैं तो वे भी अपनी चतुरंगिणी सेना को लेकर द्रुतगति से चल पड़े और कुण्डिलपुर में पहुँच कर कृष्ण के साथ हो लिये।
रुक्मणी अपनी सहेलियों के साथ गौरी पूजन के लिये मन्दिर जा रही थीं। उनके साथ उनकी रक्षा के लिये शिशुपाल और जरासंघ के नियुक्त किये गये अनेक महाबली दैत्य भी थे। रुक्मणी की उस टोली को देखते ही सारथी दारुक ने रथ को उनकी ओर तीव्र गति से दौड़ा दिया और पलक झपकते ही रथ पहरे के लिये घेरा बना कर चलते हुये दैत्यों को रौंदते हुये रक्मणी के समीप पहुँच गया। कृष्ण ने रुक्मणी को उनका हाथ पकड़ कर रथ के भीतर खींच लिया। रुक्मणी के रथ के भीतर पहुँचते ही दारुक ने रथ को उस ओर दौड़ा दिया जिधर अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ बलराम उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। पहरेदार देखते ही रह गये।
रुक्मणी के हरण का समचार सुनते ही जरासंघ और शिशुपाल अपने समस्त सहायक नरपतियों और उनकी सेनाओं के साथ कृष्ण के पास पहुँच गये। बलराम और उनकी चतुरंगिणी सेना पहले से ही तैयार खड़ी थी। दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी और घोर संग्राम छिड़ गया। बलराम जी ने अपने हल और मूसल से हाथियों की सेना को इस प्रकार छिन्न-भिन्न कर दिया जैसे घनघोर बादलों को वायु छिन्न-भिन्न कर देती है। कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने विरोधियों की सेना में तहलका मचा दिया। किसी के हाथ किसी के पैर तो किसी के सिर कट कट कर गिरने लगे। शिशुपाल की पराजय हो गई।
शिशुपाल की पराजय होने पर रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्म अत्यन्त क्रोधित होकर कृष्ण के सामने आ डटा। उसने प्रतिज्ञा की थी कि यदि मैं कृष्ण को मार कर अपनी बहन को न लौटा सका तो लौट कर नगर में नहीँ आउँगा। उसने कृष्ण पर तीन बाण छोड़े जिन्हें कृष्ण के बाणों ने वायु में ही काट दिया। फिर कृष्ण ने अपनी बाणों से रुक्म के सारथी, रथ, घोड़े, धनुष और ध्वजा को काट डाला। रुक्म एक दूसरे रथ में फिर आया तो कृष्ण ने पुनः दूसरे रथ का भी वैसा ही हाल कर दिया। रुक्म ने गुलू, पट्टिस, परिध, ढाल, तलवार, तोमर तथा शक्ति आदि अनेक अस्त्र शस्त्रों का प्रहार किया पर कृष्ण ने उन समस्त शस्त्रास्त्रों को तत्काल काट डाला। रुक्म क्रोध से उन्मत्त होकर रथ से कूद पड़ा और तलवार लेकर कृष्ण की ओर दौड़ा। कृष्ण ने एक बाण मार कर उसके तलवार को काट डाला और एक लात मार कर उसे नीचे गिरा दिया। फिर उसकी उसकी छाती अपना पैर पर रख दिया और उसे मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण तलवार उठा ली। रुक्मणी व्याकुल होकर कृष्ण के चरणों पर गिर गई और अपने भाई के प्राण दान हेतु प्रार्थना करने लगी। रुक्मणी की प्रार्थना पर कृष्ण ने अपनी तलवार नीचे कर ली और रुक्म को मारने का विचार त्याग दिया। इतना होने पर भी रुक्म कृष्ण का अनिष्ट करने का प्रयत्न कर रहा था। उसके इस कृत्य पर कृष्ण ने उसको उसी के दुपट्टे से बाँध दिया तथा उसके दाढ़ी-मूछ तथा केश तलवार से मूँड़ कर उसको रथ के पीछे बाँध दिया। बलराम ने रुक्म पर तरस खाकर उसे कृष्ण से छुड़वाया। अपनी पराजय पर दुःखी होता हुआ वह अपमानित तथा कान्तिहीन होकर वहाँ से चला गया। उसने अपनी प्रतिज्ञानुसार कुण्डलपुर में प्रवेश न करके भोजपुर नामक नगर बसाया।
इस भाँति भगवान श्री कृष्ण रुक्मणी को लेकर द्वारिकापुरी आये जहाँ पर वसुदेव तथा उग्रसेन ने कुल पुरोहित बुला कर बड़ी धूमधाम के साथ राक्षस विधि से दोनों का पाणिग्रहण संस्कार करवाया।
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 09:39:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – कृष्ण जाम्बवन्त युद्ध
एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस मणि को पहन कर घोड़े पर सवार हो आखेट के लिये गया। वन में प्रसेनजित तथा उसके घोड़े को एक सिंह ने मार डाला और वह मणि छीन ली। उस सिंह को ऋक्षराज जाम्बवन्त ने मारकर वह मणि प्राप्त कर ली और अपनी गुफा में चला गया। जाम्बवन्त ने उस मणि को अपने बालक का खिलौना बना दिया।
जब प्रसेनजित लौट कर नहीं आया तो सत्राजित ने समझा कि मेरे भाई को श्री कृष्ण ने मारकर मणि छीन ली है। श्री कृष्ण जी पर चोरी के सन्देह की बात पूरे द्वारिकापुरी में फैल गई। जब श्री कृष्णचन्द्र ने सुना कि मुझ पर व्यर्थ में चोरी का कलंक लगा है तो वे इस कलंक को धोने के उद्देश्य से नगर के प्रमुख यादवों का साथ ले कर रथ पर सवार हो स्यमन्तक मणि की खोज में निकले। वन में उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि का कहीं अता-पता नहीं था। वहाँ निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे। वे सिंह के पदचिन्हों के सहारे आगे बढ़े तो उन्हें सिंह भी मरा हुआ मिला और वहाँ पर रीछ के पैरों के चिन्ह मिले जो कि एक गुफा तक गये थे। जब वे उस भयंकर गुफा के निकट पहुँचे तब श्री कृष्ण ने यादवों से कहा कि तुम लोग यहीं रुको। मैं इस गुफा में प्रवेश कर मणि ले जाने वाले का पता लगाता हूँ। इतना कहकर वे सभी यादवों को गुफा के मुख पर छोड़ कर उस गुफा के भीतर चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि उस प्रकाशवान मणि को रीछ का एक बालक लिये हुये खेल रहा है। श्री कृष्ण ने उस मणि को वहाँ से उठा लिया। यह देख कर जाम्बवन्त अत्यन्त क्रोधित होकर श्री कृष्ण को मारने के लिये झपटा। जाम्बवन्त और श्री कृष्ण में भयंकर युद्ध होने लगा।
जब श्री कृष्ण जी गुफा से वापस नहीं लौटे तो सारे यादव उन्हें मरा हुआ समझ कर बारह दिन के उपरान्त वहाँ से द्वारिका पुरी वापस आ गये तथा समस्त वत्तान्त वसुदेव और देवकी से कहा। वसुदेव और देवकी व्याकुल होकर महामाया दुर्गा की उपासना करने लगे। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर दुर्गा देवी ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा पुत्र तुम्हें अवश्य मिलेगा।
श्री कृष्ण और जाम्बवन्त दोनों ही पराक्रमी थे। युद्ध करते हुये गुफा में अट्ठाइस दिन व्यतीत हो गये। भगवान श्री कृष्ण की मार से महाबली जाम्बवन्त की नस टूट गई। वह अति व्याकुल हो उठा और अपने स्वामी श्री रामचन्द्र जी का स्मरण करने लगा। जाम्बवन्त के द्वारा श्री राम के स्मरण करते ही भगवान श्री कृष्ण ने श्री रामचन्द्र के रूप में उसे दर्शन दिये। जाम्बवन्त उनके चरणों में गिर गया और बोला, “हे भगवान! अब मैंने जाना कि आपने यदुवंश में अवतार लिया है।” श्री कृष्ण ने कहा, “हे जाम्बवन्त! तुमने मेरे राम अवतार के समय रावण के वध हो जाने के पश्चात् मुझसे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की थी और मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हारी इच्छा अपने अगले अवतार में अवश्य पूरी करूँगा। अपना वचन सत्य सिद्ध करने के लिये ही मैंने तुमसे यह युद्ध किया है।” जाम्बवन्त ने भगवान श्री कृष्ण की अनेक प्रकार से स्तुति की और अपनी कन्या जाम्बवन्ती का विवाह उनसे कर दिया।
श्री कृष्ण जाम्बवन्ती को साथ लेकर द्वारिका पुरी पहुँचे। उनके वापस आने से द्वारिका पुरी में चहुँ ओर प्रसन्नता व्याप्त हो गई। श्री कृष्ण ने सत्राजित को बुलवाकर उसकी मणि उसे वापस कर दी। सत्राजित अपने द्वारा श्री कृष्ण पर लगाये गये झूठे कलंक के कारण अति लज्जित हुआ और पश्चाताप करने लगा। प्रायश्चित के रूप में उसने अपनी कन्या सत्यभामा का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया और वह मणि भी उन्हें दहेज में दे दी। किन्तु शरनागत वत्सल श्री कृष्ण ने उस मणि को स्वीकार न करके पुनः सत्राजित को वापस कर दिया।
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 09:00:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – भौमासुर वध
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 08:44:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – प्रद्युम्न का जन्म
श्री शुकदेव मुनि बोले, “हे परीक्षित! भगवान शंकर के शाप से जब कामदेव भस्म हो गया तो उसकी पत्नी रति अति व्याकुल होकर पति वियोग में उन्मत्त सी हो गई। उसने अपने पति की पुनः प्रापत्ति के लिये देवी पार्वती और भगवान शंकर को तपस्या करके प्रसन्न किया। पार्वती जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तेरा पति यदुकुल में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेगा और तुझे वह शम्बासुर के यहाँ मिलेगा। इसीलिये रति शम्बासुर के घर मायावती के नाम से दासी का कार्य करने लगी।
“इधर कामदेव रुक्मणी के गर्भ में स्थित हो गये। समय आने पर रुक्मणी ने एक अति सुन्दर बालक को जन्म दिया। उस बालक के सौन्दर्य, शील, सद्गुण आदि सभी श्री कृष्ण के ही समान थे। जब शम्बासुर को पता चला कि मेरा शत्रु यदुकुल में जन्म ले चुका है तो वह वेश बदल कर प्रसूतिकागृह से उस दस दिन के शिशु को हर लाया और समुद्र में डाल दिया। समुद्र में उस शिशु को एक मछली निगल गई और उस मछली को एक मगरमच्छ ने निगल लिया। वह मगरमच्छ एक मछुआरे के जाल में आ फँसा जिसे कि मछुआरे ने शम्बासुर की रसोई में भेज दिया। जब उस मगरमच्छ का पेट फाड़ा गया तो उसमें से अति सुन्दर बालक निकला। उसको देख कर शम्बासुर की दासी मायावती के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह उस बालक को पालने लगी। उसी समय देवर्षि नारद मायावती के पास पहुँचे और बोले कि हे मायावती! यह तेरा ही पति कामदेव है। इसने यदुकुल में जन्म लिया है और इसे शम्बासुर समुद्र में डाल आया था। तू इसका यत्न से लालन-पालन कर। इतना कह कर नारद जी वहाँ से चले गये। उस बालक का नाम प्रद्युम्न रखा गया। थोड़े ही काल में प्रद्युम्न यवा हो गया। प्रद्युम्न का रूप लावण्य इतना अद्भुत था कि वे साक्षात् श्री कृष्णचन्द्र ही प्रतीत होते थे। रति उन्हें बड़े भाव और लजीली दृष्टि से देखती थी। तब प्रद्युम्न जी बोले कि तुमने माता जैसा मेरा लालन-पालन किया है फिर तुममें ऐसा परिवर्तन क्यों देख रहा हूँ? तब रति ने कहा -
“पुत्र नहीं तुम पति हो मेरे। मिले कन्त शम्बासुर प्रेरे॥
मारौ नाथ शत्रु यह तुम्हरौ। मेटौ दुःख देवन कौ सिगरौ॥
“इतना कह कर मायावती रति ने उन्हें महा विद्या प्रदान किया तथा धनुष बाण, अस्त्र-शस्त्र आदि सभी विद्याओं में निपुण कर दिया। युद्ध विद्या में प्रवीण हो जाने पर प्रद्युम्न अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर शम्बासुर की सभा में गये। शम्बासुर उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ और सभासदों से कहा कि इस बालक को मैंनें पाल पोष कर बड़ा किया है। इस पर प्रद्युम्न बोले कि अरे दुष्ट! मैं तेरा बालक नहीं वरन् तेरा वही शत्रु हूँ जिसको तूने समुद्र में डाल दिया था। अब तू मुझसे युद्ध कर।
“प्रद्युम्न के इन वचनों को सुनकर शम्बासुर ने अति क्रोधित होकर उन पर अपने बज्र के समान भारी गदे का प्रहार किया। प्रद्युम्न ने उस गदे को अपने गदे से काट दिया। तब वह असुर अनेक प्रकार की माया रच कर युद्ध करने लगा किन्तु प्रद्युम्न ने महा विद्या के प्रयोग से उसकी माया को नष्ट कर दिया और अपने तीक्ष्ण तलवार से शम्बासुर का सिर काट कर पृथ्वी पर डाल दिया। उनके इस पराक्रम को देख कर देवतागणों ने उनकी स्तुति कर आकाश से पुष्प वर्षा की। फिर मायावती रति प्रद्युम्न को आकाश मार्ग से द्वारिकापुरी ले आई। गौरवर्ण पत्नी के साथ साँवले प्रद्यम्न जी की शोभा अवर्णनीय थी।”
वे नव-दम्पति श्री कृष्ण के अन्तःपुर में पहुँचे। रुक्मणी सहित वहाँ की समस्त स्त्रियाँ साक्षात् श्री कृष्ण के प्रतिरूप प्रद्युम्न को देखकर आश्चर्यचकित रह गये। वे सोचने लगीं कि यह नर श्रेष्ठ किसका पुत्र है? न जाने क्यों इसे देख कर मेरा वात्सल्य उमड़ रहा है। मेरा बालक भी बड़ा होकर इसी के समान होता किन्तु उसे तो न जाने कौन प्रसूतिकागृह से ही उठा कर ले गया था। उसी समय श्री कृष्ण भी अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव तथा भाई बलराम के साथ वहाँ आ पहुँचे। श्री कृष्ण तो अन्तर्यामी थे किन्तु उन्हें नर लीला करनी थी इसलिये वे बालक के विषय में अनजान बने रहे। तब देवर्षि नारद ने वहाँ आकर सभी को प्रद्युम्न की आद्योपान्त कथा सुनाई और वहाँ उपस्थित समस्त जनों के हृदय में हर्ष व्याप्त गया।
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 08:40:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – कृष्ण शंकर युद्ध
वाणासुर की उषा नाम की एक कन्या थी। एक बार उषा ने स्वप्न में श्री कृष्ण के पौत्र तथा प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध को देखा और उसपर मोहित हो गई। उसने अपने स्वप्न की बात अपनी सखी चित्रलेखा को बताया। चित्रलेखा ने अपने योगबल से अनिरुद्ध का चित्र बनाया और उषा को दिखाया और पूछा, “क्या तुमने इसी को स्वप्न में देखा था?” इस पर उषा बोली, “हाँ, यही मेरा चितचोर है। अब मैं इनके बिना नहीं रह सकती।” चित्रलेखा ने द्वारिका जाकर सोते हुये अनिरुद्ध को पलंग सहित उषा के महल में पहुँचा दिया। नींद खुलने पर अनिरुद्ध ने स्वयं को एक नये स्थान पर पाया और देखा कि उसके पास एक अनिंद्य सुन्दरी बैठी हुई है। अनिरुद्ध के पूछने पर उषा ने बताया कि वह वाणासुर की पुत्री है और अनिरुद्ध को पति रूप में पाने की कामना रखती है। अनिरुद्ध भी उषा पर मोहित हो गये और वहीं उसके साथ महल में ही रहने लगे।
पहरेदारों को सन्देह हो गया कि उषा के महल में अवश्य कोई बाहरी मनुष्य आ पहुँचा है। उन्होंने जाकर वाणासुर से अपने सन्देह के विषय में बताया। उसी समय वाणासुर ने अपने महल की ध्वजा को गिरी हुई देखा। उसे निश्चय हो गया कि कोई मेरा शत्रु ही उषा के महल में प्रवेश कर गया है। वह अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित होकर उषा के महल में पहुँचा। उसने देखा कि उसकी पुत्री उषा के समीप पीताम्बर वस्त्र पहने बड़े बड़े नेत्रों वाला एक साँवला सलोना पुरुष बैठा हुआ है। वाणासुर ने क्रोधित हो कर अनिरुद्ध को युद्ध के लिये ललकारा। उसकी ललकार सुनकर अनिरुद्ध भी युद्ध के लिये प्रस्तुत हो गये और उन्होंने लोहे के एक भयंकर मुद्गर को उठा कर उसी के द्वारा वाणासुर के समस्त अंगरक्षकों को मार डाला। वाणासुर और अनिरुद्ध में घोर युद्ध होने लगा। जब वाणासुर ने देखा कि अनिरुद्ध किसी भी प्रकार से उसके काबू में नहीं आ रहा है तो उसने नागपाश से उन्हें बाँधकर बन्दी बना लिया।
इधर द्वारिका पुरी में अनिरुद्ध की खोज होने लगी और उनके न मिलने पर वहाँ पर शोक और रंज छा गया। तब देवर्षि नारद ने वहाँ पहुँच कर अनिरुद्ध का सारा वृत्तांत कहा। इस पर श्री कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न, सात्यिकी, गद, साम्ब आदि सभी वीर चतुरंगिणी सेना के साथ लेकर वाणासुर के नगर शोणितपुर पहुँचे और आक्रमण करके वहाँ के उद्यान, परकोटे, बुर्ज आदि को नष्ट कर दिया। आक्रमण का समाचार सुन वाणासुर भी अपनी सेना को साथ लेकर आ गया। वाणासुर की सहायता के लिये भगवान शंकर भी कार्तिकेय तथा भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष राक्षस आदि की सेना को लेकर रणभूमि में आ गये। श्री बलराम जी कुम्भाण्ड तथा कूपकर्ण राक्षसों से जा भिड़े, अनिरुद्ध कार्तिकेय के साथ युद्ध करने लगे और श्री कृष्ण वाणासुर और भगवान शंकर के सामने आ डटे। घनघोर संग्राम होने लगा। चहुँओर बाणों की बौछार हो रही थी। श्री कृष्ण के तीक्ष्ण बाणों से आहत हो भगवान शंकर की सेना भाग निकली। बलराम ने कुम्भाण्ड और कूपकर्ण को मार डाला।
भगवान शंकर के समस्त अस्त्रों को श्री कृष्ण ने ब्रह्मास्त्र से काट डाला इस पर भगवान शंकर ने अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया। श्री कृष्ण ने उनके ब्रह्मा्त्र को वायव्यास्त्र से, पर्वतास्त्र को आग्नेयास्त्र से, परिजन्यास्त्र तथा पशुपत्यास्त्र को नारायणास्त्र से नष्ट कर दिया। श्री कृष्ण ने वाणासुर के सहस्त्र हाथों में से केवल चार हाथों को छोड़कर शेष सभी को काट दिया। अन्ततः भगवान शंकर ने वाणासुर से कहा, “अरे मूढ़! ये ईश्वर के भी ईश्वर हैं। ये मेरे भी ईश्वर हैं। तू इनकी शरण में चला जा।” भगवान शंकर की बात सुनकर वाणासुर श्री कृष्ण के चरणों में गिर पड़ा और उनकी स्तुति कर क्षमाप्रार्थना करने लगा। वाणासुर को अपनी शरण में आया जा शरणागतवत्सल श्री कृष्ण ने उसे अभयदान दे दिया। वाणासुर ने अपनी कन्या उषा का अनिरुद्ध के साथ पाणिग्रहण संस्कार कर दिया।
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 08:30:00 pm 0 comments
भागवत (सुखसागर) की कथाएँ – जरासंघ वध
जरासंघ के इस प्रकार कहने पर श्री कृष्ण बोले, “हे मगजधराज! हम आपसे याचना करने आये हैं। हम यह भली भाँति जानते हैं कि आप याचकों को कभी विमुख नहीं होने देते हैं। राजा हरिश्चन्द्र ने विश्वामित्र जी की याचना करने पर उन्हें सर्वस्व दे डाला था। राजा बलि से याचना करने पर उन्होंने त्रिलोक का राज्य दे दिया था। फिर आपसे यह कभी आशा नहीं की जा सकती कि आप हमें निराश कर देंगे। हम आपसे गौ, धन, रत्नादि की याचना नहीं करते। हम केवल आपसे युद्ध की याचना करते हैं, आप हमे द्वन्द्व युद्ध की भिक्षा दीजिये।”
श्री कृष्ण के इस प्रकार याचना करने पर जरासंघ समझ गया कि छद्मवेष में ये कृष्ण, अर्जुन तथा भीमसेन हैं। उसने क्रोधित होकर कहा, “अरे मूर्खों! यदि तुम युद्ध ही चाहते हो तो मुझे तुम्हारी याचना स्वीकार है। किन्तु कृष्ण! तुम मुझसे पहले ही पराजित होकर रण छोड़ कर भाग चुके हो। नीति कहती है कि भगोड़े तथा पीठ दिखाने वाले के साथ युद्ध नहीं करना चाहिये। अतः मैं तुमसे युद्ध नहीं करूँगा। यह अर्जुन भी दुबला-पतला और कमजोर है तथा यह वृहन्नला के रूप में नपुंसक भी रह चुका है। इसलिये मैं इससे भी युद्ध नहीं करूँगा। हाँ यह भीम मुझ जैसा ही बलवान है, मैं इसके साथ अवश्य युद्ध करूँगा।”
इसके पश्चात् दोनों ही अपना-अपना गदा सँभाल कर युद्ध के मैदान में डट पड़े। दोनों ही महाबली तथा गदायुद्ध के विशेषज्ञ थे। पैंतरे बदल-बदल कर युद्ध करने लगे। कभी भीमसेन का प्रहार जरासंघ को व्याकुल कर देती तो कभी जरासंघ चोट कर जाता। सूर्योदय से सूर्यास्त तक दोनों युद्ध करते और सूर्यास्त के पश्चात् युद्ध विराम होने पर मित्रभाव हो जाते। इस प्रकार सत्ताइस दिन व्यतीत हो गये और दोनों में से कोई भी पराजित न हो सका। अट्ठाइसवें दिन प्रातः भीमसेन कृष्ण से बोले, “हे जनार्दन! यह जरासंघ तो पराजित ही नहीं हो रहा है। अब आप ही इसे पराजित करने का कोई उपाय बताइये।” भीम की बात सुनकर श्री कृष्ण ने कहा, “भीम! यह जरासंघ अपने जन्म के समय दो टुकड़ों में उत्पन्न हुआ था, तब जरा नाम की राक्षसी ने दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया था। इसलिये युद्ध करते समय जब मै तुम्हें संकेत करूँगा तो तुम इसके शरीर को दो टुकड़ों में विभक्त कर देना। बिना इसके शरीर के दो टुकड़े हुये इसका वध नहीं हो सकता।”
जनार्दन की बातों को ध्यान में रख कर भीमसेन जरासंघ से युद्ध करने लगे। युद्ध करते-करते दोनों की गदाओं के टुकड़े-टुकड़े हो गये तब वे मल्ल युद्ध करने लगे। मल्ल युद्ध में ज्योंही भी ने जरासंघ को भूमि पर पटका, श्री कृष्ण ने एक वृक्ष की डाली को बीच से चीरकर भीमसेन को संकेत किया। उनका संकेत समझ कर भीम ने अपने एक पैर से जरासंघ के एक टांग को दबा दिया और उसकी दूसरी टांग को दोनों हाथों से पकड़ कर कंधे से ऊपर तक उठा दिया जिससे जरासंघ के दो टुकड़े हो गये। भीम ने उसके दोनों टुकड़ों को अपने दोनों हाथों में लेकर पूरी शक्ति के साथ विपरीत दिशाओं में फेंक दिया और इस प्रकार महाबली जरासंघ का वध हो गया।
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Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 08:20:00 pm 0 comments
सेहत के लिए नारियल पानी ~~~
नारियल के पानी में दूध से ज्यादा पोषक तत्व होते हैं क्योंकि इसमें कोलेस्ट्रोल और वसा की मात्रा नहीं है। नारियल पानी में बेहद गुण पाए जाते हैं। इसमें बहुत ज्यादा मात्रा में इलेक्ट्रोलाइट और पोटेशियम पाया जाता है, जो ब्लड प्रेशर और दिल की गतिविधियों को दुरुस्त करने में सहयोगी होता है।
इसके इस्तेमाल से रक्त स्राव तेज गति से काम करता है और पाचन क्रिया भी दुरुस्त रहती है। नारियल का पानी न केवल शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है बल्कि शरीर में मौजूद बहुत से वायरसों से भी लड़ाई करता है। अगर आपको किडनी में पथरी की समस्या है तो यह आपके लिए बेहद उपयोगी साबित होगा।
नारियल का पानी लगातार सेवन करने से किडनी में मौजूद पथरी अपने आप खत्म हो जाती है। अगर आपको किडनी से संबंधित अन्य कोई समस्या हो तब भी फौरन एक गिलास नारियल पानी पी लीजिए, मिनटों में निजात मिल जाएगी। नशे को कम करने में भी नारियल पानी बहुत ही प्रभावी है।
Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 07:55:00 pm 0 comments
थकान उतारने के आसान तरीके
Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 07:51:00 pm 0 comments
बच्चों का तुतलाना व हकलाना
बच्चे यदि एक ताज़ा हरा आँवला रोजाना कुछ दिन चबाएँ तो तुतलाना और हकलाना मिटता है। जीभ पतली होती है, और आवाज़ साफ आने लगती है।
या बादाम की गिरी सात, काली मिर्च सात; कुछ बुँदें पानी में घिसकर दोनो की चटनी सी बना लें और इसमें ज़रा-सी मिश्री पिसी हुई मिलाकर चाटें। प्रातः खाली पेट कुछ दिन लें।
या दो काली मिर्च मुँह में रखकर चबायें-चूसें। यह प्रयोग दिन में दो बार लम्बे समय तक करें।
Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 07:48:00 pm 1 comments
Combination of Juices for various remedies...
Carrot + Ginger + Apple - Boost and cleanse our system.
Apple + Cucumber + Celery - Prevent cancer, reduce cholesterol, and improve stomach upset and headache.
Tomato + Carrot + Apple - Improve skin complexion and bad breath.
Bitter gourd + Apple + Milk - Avoid bad breath and reduce internal body heat.
Orange + Ginger + Cucumber - Improve Skin texture and moisture and reduce body heat.
Pineapple + Apple + Watermelon - To dispel excess salts, nourishes the bladder and kidney.
Apple + Cucumber + Kiwi - To improve skin complexion
Pear & Banana - regulates sugar content.
Carrot + Apple + Pear + Mango - Clear body heat, counteracts toxicity, decreased blood pressure and fight oxidization.
Honeydew + Grape + Watermelon + Milk - Rich in vitamin C + Vitamin B2 that increase cell activity and strengthen body immunity.
Papaya + Pineapple + Milk - Rich in vitamin C, E, Iron. Improve skin complexion and metabolism.
Banana + Pineapple + Milk - Rich in vitamin with nutritious and prevent constipation.
Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 07:47:00 pm 0 comments
झुर्रियाँ कुछ उपाय
आधा चम्मच दुध की ठंडी मलाई में नींबु के रस की चार पाँच बूंदें मिलाकर झुर्रियाँ पर सोते समय अच्छी तरह मलें। पहले गुनगुने पानी से चेहरा अच्छी मलें। फिर गुनगुने पानी से चेहरा अच्छी तरह धोएं और बाद में खुरदरे तौलिए से रगड-पौंछकर सुखा लें। इसके बाद मलाई दोनों हथेलियों से तब तक मलते रहें जब तक कि मलाई घुलकर त्वचा में रम न जाए। बीस मिनट या आधा घण्टे बाद स्नान कर लें या पानी से धो डालें परन्तु साबुन का प्रयोग न करें। नित्य १५ - २० दिन तक नियमित प्रयोग से झुर्रियाँ दुर होती हैं तथा चेहरे के काले दाग मिट जाते हैं।
या पके हुए पपीते का एक टुकडा काटकर चेहरे पर घिसें या गूदा मसलकर चेहरे पर लगाएं। कुछ देर बाद स्नान कर लें। कुछ दिन लगातार ऐसा करने से चेहरे की झुर्रियाँ, धब्बे, दूर होते हैं, मैल नष्ट होता है। व मुहाँसे मिटकर चेहरे की रंगत निखरती है।
या 'ई' और 'ओ' बोलते हुए एक बार चेहरे को फैलाएं और फिर सिकोडें। दुसरे शब्दों मे 'ई' के उच्चारण के साथ ऐसी मुद्रा बनाएँ मानों कि आप मुस्कुराने जा रहे है। कुछ क्षण इसी मुद्रा में रहने के बाद होठों को आगे की तरफ बढाते हुए इस प्रकार मुद्रा बनाएँ मानों कि आप सीटी बजाना चाह रहे हैं। इससे गालों का अच्छा व्यायाम होता है जिससे गालों की पुष्टि होती है और झुर्रियाँ से बचाव। यह क्रिया एक बार में १५-२० बार करें और दिन में तीन बार करें।
या मुँह से फूँक मारते हुए गाल फुलाएं व पेट पिचकाएँ फ़िर नाक से सांस खींचें। इस प्रकार १५-२० बार करें और दिन में तीन बार करें। गाल पुष्ट होंगे।
या चेहरे में आँखों के छोर की रेखाएँ (झुर्रियाँ) मिटाने के लिए खीरे को गोलाई में टुकडे काटकर आँखों के नीचे-ऊपर लगा दें। माथे पर कुछ लम्बे टुंकडे लगाकर तनाव-रहित होकर कुछ देर लेटना चाहिए। इस क्रिया को प्रतिदिन एक बार करने से लगभग दो सप्ताह में ये लकीरें मिट जाती है।
या त्वचा की झुर्रियाँ मिटाने के लिए आधा गिलास गाजर का रस नित्य शाम चार बजे दो तीन सप्ताह लें।
या चेहरे पर झुर्रियों हों ही न ऐसा करने के लिए अंकुरित चने व मूंग को सुबह व शाम खाएँ। इनमें विद्यमान विटामिन 'इ' झुर्रियाँ मिटाने और युवा बनाये रखने में विशेष सहायक होता है।
Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 07:17:00 pm 0 comments
सबसे महान कौन?
एक बार देवर्षि नारद के मन में यह जानने की इच्छा हुई कि पूरे ब्रह्मांड में सबसे महान कौन है? वे वैकुंठ लोक गए। उन्होंने वहां प्रभु से प्रश्न किया, हे प्रभु! इस पृथ्वी पर सबसे महान कौन हैं? प्रभु ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, नारदजी! सबसे बडी तो यह पृथ्वी दिखती है। इसलिए हम पृथ्वी को इसकी संज्ञा दे सकते हैं। दूसरी ओर, उसे समुद्र ने घेर रखा है। इस कारण समुद्र उससे भी बडा सिद्ध हुआ। एक बार इस समुद्र को भी अगस्त मुनि ने पी लिया था। इस कारण समुद्र कैसे बडा हो सकता है? ऐसी स्थिति में अगस्त्य मुनि सबसे बडे हुए। लेकिन उनका वास कहां है? अनंत आकाश के एक सीमित भाग में, मात्र बिंदु के समान वे एक जुगनू की तरह चमक रहे हैं। इस प्रकार आकाश उनसे बडा साबित हुआ। वामन अवतार में भगवान विष्णु ने इस आकाश को भी एक पग में ही नाप लिया था। इस तरह विष्णु ही सबसे महान सिद्ध होते हैं। फिर भी नारद विष्णु भी सर्वाधिक महान नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि वे हमेशा आपके हृदय में अंगुठे इतनी जगह में ही विराजते हैं। इसलिए सबसे महान आप सिद्ध हुए।
Posted by Udit bhargava at 1/04/2010 05:29:00 pm 0 comments
02 जनवरी 2010
शिव पुराण
ब्रह्माजी कहते है -- ब्रह्मन सुनो! अब मै वायु पुराण का लक्षण बतलाता हूँ। जिसके श्रवण करने पर परमात्मा शिव का परमधाम प्राप्त होता है। यह पुराण चौबीस हजार श्लोकों का बताया गया है। जिसमें वायुदेव ने श्वेतकल्प के प्रसंगों में धर्मों का उपदेश किया है। उसे वायु पुरण कहते है। यह पूर्व और उत्तर दो भागों से युक्त है। ब्रह्मन! जिसमें सर्ग आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है,जहां भिन्न भिन्न मन्वन्तरों में राजाओं के वंश का वर्णन है और जहां गयासुर के वध की कथा विस्तार के साथ कही गयी है,जिसमें सब मासों का माहात्मय बताकर माघ मास का अधिक फ़ल कहा गया है जहां दान दर्म तथा राजधर्म अधिक विस्तार से कहे गये है,जिसमें पृथ्वी पाताल दिशा और आकाश में विचरने वाले जीवों के और व्रत आदि के सम्बन्ध में निर्णय किया गया है,वह वायुपुराण का पूर्वभाग कहा गया है। मुनीश्वर ! उसके उत्तरभाग में नर्मदा के तीर्थों का वर्णन है,और विस्तार के साथ शिवसंहिता कही गयी है जो भगवान सम्पूर्ण देवताओं के लिये दुर्जेय और सनातन है,वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते है,वही यह नर्मदा का जल ब्रह्मा है,यही विष्णु है,और यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात शिव है। यह नर्मदा जल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है,निश्चय ही भगवान शिवने समस्त लोकों का हित करने के लिये अपने शरीर से इस नर्मदा नदी के रूप में किसी दिव्य शक्ति को ही धरती प्रर उतारा है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर निवास करते है,वे भगवान रुद्र के अनुचर होते है,और जिनका दक्षिण तट पर निवास है,वे भगवान विष्णु के लोकों में जाते है,ऊँकारेश्वर से लेकर पश्चिम समुद्र तट तक नर्मदा नदी में दूसरी नदियों के पैतीस पापनाशक संगम है,उनमे से ग्यारह तो उत्तर तटपर है,और तेईस दक्षिण तट पर। पैंतीसवां तो स्वयं नर्मदा और समुद्र का संगम कहा गया है,नर्मदा के दोनों किनारों पर इन संगमों के साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ है। मुनीश्वर ! इनके सिवाय अन्य साधारण तीर्थ तो नर्मदा के पग पग पर विद्यमान है,जिनकी संख्या साठ करोड साठ हजार है। यह परमात्मा शिव की संहिता परम पुण्यमयी है,जिसमें वायुदेवता ने नर्मदा के चरित्र का वर्णन किया है,जो इस पुराण को सुनता है या पढता है,वह शिवलोक का भागी होता है।
लिङ्ग पुराण
अट्ठारह पुराणों में भगवान महेश्वर की महान महिमा का बखान करनेवाला लिंग पुराण विशिष्ट पुराण कहा गया है। भगवान शिव के ज्योर्ति लिंगों की कथा, ईशान कल्प के वृत्तान्त सर्वविसर्ग आदि दशा लक्षणों सहित वर्णित है भगवान शिव की महिमा का बखान लिंग पुराण में 11000 श्लोकों में किया गया है। यह समस्त पुराणों में श्रेष्ठ है। वेदव्यास कृत इस पुराण में पहले योग फिर कल्प के विषय में बताया गया है।
लिंग शब्द के प्रति आधुनिक समाज में ब़ड़ी भ्रान्ति पाई जाती है। लिंग शब्द चिन्ह का प्रतीक है। भगवान् महेश्वर आदि पुरुष हैं। यह शिवलिंग उन्हीं भगवान शंकर की ज्योतिरूपा चिन्मय शक्ति का चिन्ह है। इसके उद्भव के विषय में सृष्टि के कल्याण के लिए ज्योर्ति लिंग द्वारा प्रकट होकर ब्रह्मा तथा विष्णु जैसों अनादि शक्तियों को भी आश्चर्य में डाल देने वाला घटना का वर्णन, इस पुराण के वर्ण्य विषय का एक प्रधान अंग है। फिर मुक्ति प्रदान करने वाले व्रत-योग शिवार्चन यज्ञ हवनादि का विस्तृत विवेचन प्राप्त है। यह शिव पुराण का पूरक ग्रन्थ है।
आज के आपाधापी भरे युग में वृहद कलेवर के ग्रन्थ पढ़ने का भी समय लोगों में पास नहीं है। लोगों की रुचि की ओर हो चुकी है। अतः ‘‘भुवन वाणी ट्रष्ट’’ के मुख्य न्यासी सभापति श्री विनय कुमार अवस्थी के आग्रह पर ‘श्री लिंग पुराण’ की संक्षिप्त गाथा लिखी गई। अल्प समय में ही पाठक पुराण के सम्यक ज्ञान को आत्मसात् करने से लाभान्वित हो सके तो मैं अपने श्रम को सार्थक समझूँगा। इसी मंगल कामना के साथ यह संक्षिप्त ‘श्री लिंग पुराण’ जनता जनार्धन के कर कमलों में समर्पित करते हुए हर्ष का अनुभव कर रहा हूँ। गुरुदेव की परम कृपा से यह कार्य मेरे द्वारा हो पाया एतदर्थ उनके पावन चरणों में शतशत नमन्।
नैमिष में सूत जी की वार्ता
एक समय शिव के विविध क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए देवर्षि नारद नैमिषारण्य में जा पहुँचे वहाँ पर ऋषियों ने उनका स्वागत अभिनन्दन करने के उपरान्त लिंगपुराण के विषय में जाननेहित जिज्ञासा व्यक्त की। नारद जी ने उन्हें अनेक अद्भुत कथायें सुनायी। उसी समय वहाँ पर सूत जी आ गये। उन्होंने नारद सहित समस्त ऋषियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने भी उनकी पूजा करके उनसे लिंग पुराण के विषय में चर्चा करने की जिज्ञासा की।
उनके विशेष आग्रह पर सूत जी बोले कि शब्द ही ब्रह्म का शरीर है और उसका प्रकाशन भी वही है। एकाध रूप में ओम् ही ब्रह्म का स्थूल, सूक्ष्म व परात्पर स्वरूप है। ऋग साम तथा यर्जुवेद तथा अर्थववेद उनमें क्रमशः मुख जीभ ग्रीवा तथा हृदय हैं। वही सत रज तम के आश्रय में आकर विष्णु, ब्रह्म तथा महेश के रूप में व्यक्त हैं, महेश्वर उसका निर्गुण रूप है। ब्रह्मा जी ने ईशान कल्प में लिंग पुराण की रचना की। मूलतः सौ करोड़ श्लोकों के ग्रन्थ को व्यास जी ने संक्षिप्त कर के चार लाख श्लोकों में कहा। आगे चलकर उसे अट्ठारह पुराणों में बाँटा गया जिसमें लिंग पुराण का ग्यारहवाँ स्थान है। अब मैं आप लोगों के समक्ष वही वर्णन कर रहा हूँ जिसे आप लोग ध्यानपूर्वक श्रवण करें।
सृष्टि की प्राधानिक एवं वैकृतिक रचना
अदृश्य शिव दृष्य प्रपंच (लिंग) का मूल कारण है जिस अव्यक्त पुराण को शिव तथा अव्यक्त प्रकृति को लिंग कहा जाता है वहाँ इस गन्धवर्ण तथा शब्द स्पर्श रूप आदि से रहित रहते हुए भी निर्गुण ध्रुव तथा अक्षय कहा गया है। उसी अलिंग शिव से पंच ज्ञानेद्रियाँ, पंचकर्मेन्द्रियाँ, पंच महाभूत, मन, स्थूल सूक्ष्म जगत उत्पन्न होता है और उसी की माया से व्याप्त रहता है। वह शिव ही त्रिदेव के रूप में सृष्टि का उद्भव पालन तथा संहार करता है वही अलिंग शिव योनी तथा वीज में आत्मा रूप में अवस्थित रहता है। उस शिव की शैवी प्रकृति रचना प्रारम्भ में सतोगुण से संयुक्त रहती है। अव्यक्त से लेकर व्यक्त तक में उसी का स्वरूप कहा गया है। विश्व को धारण करने वाली प्रकृति ही शिव की माया है जो सत- रज- तम तीनों गुणों के योग से सृष्टि का कार्य करती है।
वही परमात्मा सर्जन की इच्छा से अव्यक्त में प्रविष्ट होकर महत् तत्व की रचना करता है। उससे त्रिगुण अहं रजोगुण प्रधान उत्पन्न होता है। अहंकार से शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध यह पाँच तन्मात्रयें उत्पन्न हुईं। सर्व प्रथम शब्द से आकाश, आकाश से स्पर्श, स्पर्श से वायु, वायु से रूप, रूप से अग्नि, अग्नि से रस, रस से गन्ध, गन्ध से पृथ्वी उत्पन्न हुई। आकाश में एक गुण, वायु में दो गुण, अग्नि में तीन गुण, जल में चार गुण, और पृथ्वी में शब्द स्पर्शादि पाँचों गुण मिलते हैं। अतः तन्मात्रा पंच भूतों की जननी हुई। सतोगुणी अहं से ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ तथा उभयात्मक मन इन ग्यारह की उत्पत्ति हुई। महत से पृथ्वी तक सारे तत्वों का अण्ड बना जो दस गुने जल से घिरा है। इस प्रकार जल को दस गुणा वायु ने, वायु को दस गुणा आकाश ने घेर रक्खा है। इसकी आत्मा ब्रह्मा है। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों में कोटि त्रिदेव पृथक-पृथक होते हैं। वहीं शिव विष्णु रूप हैं।
सृष्टि का प्रारम्भ
ब्रह्म का एक दिन और एक रात प्राथमिक रचना का समय है दिन में सृष्टि करता है और रात में प्रलय। दिन में विश्वेदेवा, समस्त प्रजापति, ऋषिगण, स्थिर रहने और रात्रि में सभी प्रलय में समा जाते हैं। प्रातः पुनः उत्पन्न होते हैं। ब्रह्म का एक दिन कल्प है और उसी प्रकार रात्रि भी। हजार वार चर्तुयुग बीतने पर चौदह मनु होते हैं। उत्तरायण सूर्य के रहने पर देवताओं का दिन और दक्षिणायन सूर्य रहने तक उसकी रात होती है।
तीस वर्ष का एक दिव्य वर्ष कहा गया है। देवों के तीन माह मनुष्यों के सौ माह के बराबर होते हैं। इस प्रकार तीन सौ साठ मानव वर्षों का देवताओं का एक वर्ष होता है तीन हजार सौ मानव वर्षों का सप्तर्षियों का एक वर्ष होता है। सतयुग चालीस हजार दिव्य वर्षों का, त्रेता अस्सी हजार दिव्य वर्षों का, द्वापर बीस हजार दिव्य वर्षों का और कलियुग साठ हजार दिव्य वर्षों का कहा गया है। इस प्रकार हजार चतुर्युगों का एककल्प कहा जाता है। कलपान्त में प्रलय के समय मर्हलोक के जन लोक में चले जाते हैं। ब्रह्मा के आठ हजार वर्ष का ब्रह्म युग होता है। सहस्त्र दिन का युग होता है जिसमें देवताओं की उत्पत्ति होती है। अन्त में समस्त विकार कारण में लीन हो जाते हैं। फिर शिव की आज्ञा से समस्त विकारों का संहार होता है। गुणों की समानता में प्रलय तथा विषमता में सृष्टि होती है। शिव एक ही रहता है। ब्रह्मा और विष्णु अनेक उत्पन्न हो जाते हैं। ब्रह्मा के द्वितीय परार्द्ध में दिन में सृष्टि रहती है और रात्रि में प्रलय होती है। भूः भुवः तथा महः ऊपर के लोक हैं। जड़ चेतन के लय होने पर ब्रह्मा नार (जल) में शयन करने के कारण नारायण कहते हैं। प्रातः उठने पर जल ही जल देखकर उस शून्य में सृष्टि की इच्छा करते हैं। वाराह रूप से पृथ्वी का उद्धार करके नदी नद सागर पूर्ववत स्थिर करते हैं। पृथ्वी को सम बनाकर पर्वतों को अवस्थित करते हैं। पुनः भूः आदि लोकों की सृष्टि की इच्छा उनमें जाग्रत होती है।
स्कन्द पुराण
माहेश्वरखण्ड श्रीब्रह्माजी कहते हैं- वत्स ! सुनो, अब मै स्कन्द पुराण का वर्णन करता हूँ,जिसके पद पद में साक्षात महादेवजी स्थित हैं। मैने शतकोटि पुराण में जो शिव की महिमा का वर्णन किया है,उसके सारभूत अर्थ का व्यासजी ने सकन्दपुराण में वर्णन किया है। उसमें सात खण्ड किये गये है,सब पापों का नाश करने वाला स्कन्द पुराण इक्यासी हजार श्लोकों से युक्त है,जो इसका श्रवण अथवा पाठ करत है वह साक्षात शिव ही है,इसमें स्कन्द के द्वारा उन शैव धर्मों का प्रतिपादन किया गया है,जो तत्पुरुष कल्प में प्रचलित थे,वे सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाले इसके पहले खण्ड का नाम माहेश्वर खण्ड है,जि सब पापों का नाश करने वाला इसमें बारह हजार से कुछ कम श्लोक है,यह परम पवित्र तथा विशाल कथाओं से परिपूर्ण है,इसमें सैकडों उत्तम चरित्र है,तथा यह खण्ड स्कन्द स्वामी के माहात्म्य का सूचक है। माहेश्वर खण्ड के भीतर केदार माहात्मय में पुराण आरम्भ हुआ है,उसमें पहले दक्ष यज्ञ की कथा है,इसके बाद शिवलिंग पूजन का फ़ल बताया गया है,इसके बाद समुद्र मन्थन की कथा और देवराज इन्द्र के चरित्र का वर्णन है,फ़िर पार्वती का उपाख्यान और उनके विवाह का प्रसंग है,तत्पश्चात कुमार स्कन्द की उत्पत्ति और तारकासुर के साथ उनके युद्ध का वर्णन है,फ़िर पाशुपत का उपाख्यान और चण्ड की कथा है,फ़िर दूत की नियुक्ति का कथन और नारदजी के साथ समागम का वृतान्त है,इसके बाद कुमार माहात्म्य के प्रसंग में पंचतीर्थ की कथा है,धर्मवर्मा राजा की कथा तथा नदियों और समुद्रों का वर्ण है,तदनन्तर इन्द्रद्युम्न और नाडीजंग की कथा है,फ़िर महीनदी के प्रादुर्भाव और दमन की कथा है,तत्पश्चात मही साकर संगम और कुमारेश का वृतान्त है,इसके बाद नाना प्रकार के उपाख्यानों सहित तारक युद्ध और तारकासुर के वध का वर्णन है,फ़िर पंचलिंग स्थापन की कथा आयी है,तदनन्तर द्वीपों का पुण्यमयी वर्णन ऊपर के लोकों की स्थिति ब्रह्माण्ड की स्थिति और उसका मान तथा वर्करेशकी कथा है,फ़िर वासुदेव का मात्म्य और कोटितीर्थ का वर्णन है। तदनन्तर गुप्तक्षेत्र में नाना तीर्थों का आख्यान कहा गया है,पाण्डवों की पुण्यमयी कथा और बर्बरीक की सहायता से महाविद्या के साधन का प्रसंग है,तत्पश्चात तीर्थयात्रा की समाप्ति है,तदनन्तर अरुणाचल का माहात्मय है,तथा सनक और ब्रह्माजी का संवाद है,गौरी की तपस्या का वर्णन तथा वहां के भिन्न भिन्न तीर्थों का वर्णन है,महिषासुर की कथा और उसके वध का परम अद्भुत प्रसंग कहा गया है,इस प्रकार स्कन्द पुराण में यह अद्भुत माहेश्वर खण्ड में कहा गया है। वैष्णव-खण्ड दूसरा वैष्णवखण्ड है, अब उसके आख्यानों का मुझसे श्रवण करो,पहले भूमि वाराह का संवाद का वर्णन है,जिसमें वेंकटाचल का पापनाशक माहात्म्य बताया गया है,फ़िर कमला की पवित्र कथा और श्रीनिवास की स्थिति का वर्णन है,तदनन्तर कुम्हार की कथा तथा सुवर्णमुखरी नदी के माहात्मय का वर्णन है,फ़िर अनेक उपाख्यानों से युक्त भरद्वाज की अद्भुत कथा है,इसके बाद मतंग और अंजन के पापनाशक संवाद का वर्णन है,फ़िर उत्कल प्रदेश के पुरुषोत्तम क्षेत्र का माहात्मय कहा गया है,तत्पश्चार मार्कण्डेयजी की कथा,राजा अम्बरीष का वृतान्त,इन्द्रद्युम्न का आख्यान और विद्यापति की शुभ कथा का उल्लेख है। ब्रह्मन ! इसके बाद जैमिनि और नारद का आख्यान है,फ़िर नीलकण्ठ और नृसिंह का वर्णन है,तदनन्तर अश्वमेघ यज्ञ की कथा और राजा आ ब्रह्मलोक में गमन कहा गया है,तत्पश्चात रथयात्रा विधि और जप तथा स्नान की विधि कही गयी है। फ़िर दक्षिणामूर्ति का उपाख्यान और गुण्डिचा की कथा है,रथ रक्षा की विधि और भगवान के शयनोत्सव का वर्णन है,इसके बाद राजा श्वेत का उपाख्यान कहा गय अहै विर पृथु उत्सव का निरूपण है,भगवान के दोलोत्सव तथा सांवत्सरिक व्रत का वर्णन है,तदनन्तर उद्दालक के नियोग से भगवान विष्णु की निष्काम पूजा का प्रतिपादन किया गया है,फ़िर मोक्ष साधन बताकर नाना प्रकार के योगों का निरूपण किया गया है,तत्पश्चात दशावतार की कथा अर स्नान आदि का वर्णन है,इसके बाद बदरिकाश्रम तीर्थ का पाप नाशक माहात्मय बताया गया है,उस प्रसंग में अग्नि आदि तीर्थों और गरुण शिला की महिमा है,वहां भगवान के निवास का कारण बताया गया है। फ़िर कपालमोचन तीर्थ पंचधारा तीर्थ और मेरुसंस्थान की कथा है,तदनन्तर कार्तिक मास का माहात्म्य प्रारम्भ होता है,उसमे मदनालस के माहात्मय का वर्णन है,धूम्रकेशका उपाख्यान और कार्तिक मास में प्रत्येक दिन के कृत्य का वर्णन है,अन्त में भीष्म पंचक व्रत का प्रतिपादन किया गया है,जो भोग और मोक्ष देने वाला है। तत्पश्चात मार्गशीर्ष के माहात्म्य में स्नान की विधि बतायी गयी है,फ़िर पुण्ड्रादि कीर्तन और माला धारण का पुण्य कहा गया है,भगवान को पंचामृत से स्नान करवाने तथा घण्टा बजाने आदि का पुण्यफ़ल बताया गया है। नाना प्रकार के फ़ूलों से भगवत्पूजन का फ़ल और तुलसीदल का माहात्म्य बताया गया है,भगवान को नैवैद्य लगाने की महिमा,एकादसी के दिन कीर्तन अखण्ड एकादसी व्रत रहने का पुण्य और एकादशी की रात में जागरण करने का फ़ल बताया गया है। इसके बाद मत्स्योत्सव का विधान और नाममाहात्म्य का कीर्तन है,भगवान के ध्यान आदि का पुण्य तथा मथुरा का माहात्म्य बताया गया है,मथुरा तीर्थ का उत्तम माहात्मय अलग कहा गया है,और वहां के बारह वनों की महिमा वर्णन किया गया है,तत्पश्चात इस पुराण में श्रीमदभागवत के उत्तम माहात्म्य का प्रतिपादन किया गया है इस प्रसंग में बज्रनाभ और शाण्डिल्य के संवाद का उल्लेख किया गया है,जो ब्रज की आन्तरिक लीलाओं का प्रशासक है,तदनन्तर माघ मास में स्नान दान और जप करने का माहात्म्य बताया गया है,जो नाना प्रकार के आख्यानों से युक्त है,माघ माहात्म्य का दस अध्यायों में प्रतिपादन किया गया है,तत्पश्चात बैशाख माहात्म्य में शय्यादान आदि का फ़ल कहा गया है,फ़िर जलदान की विधि कामोपाख्यान शुकदेव चर्त व्याध की अद्भुत कथा और अक्षयतृतीया आदि के पुण्य मा विशेष रूप से वर्णन है,इसके बाद अयोध्या माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमे चक्रतीर्थ ब्रह्मतीर्थ ऋणमोचन तीर्थ पापमोचन तीर्थ सहस्त्रधारातीर्थ स्वर्गद्वारतीर्थ चन्द्रहरितीर्थ धर्महरितीर्थ स्वर्णवृष्टितीर्थ की कथा और तिलोदा-सरयू-संगम का वर्णन है,तदनन्तर सीताकुण्ड गुप्तहरितीर्थ सरयू-घाघरा-संगम गोप्रचारतीर्थ क्षीरोदकतीर्थ और बृहस्पतिकुण्ड आदि पांच तीर्थों की महिमा का प्रतिपादन किया गया है,तत्पश्चात घोषार्क आदि तेरह तीर्थों का वर्णन है। फ़िर गयाकूप के सर्वपापनाशक माहात्म्य का कथन है,तदननतर माण्डव्याश्रम आदि,अजित आदि तथा मानस आदि तीर्थों का वर्णन किया गया है,इस प्रका यह दूसरा वैष्णव खण्ड कहा गया है। ब्रह्मखण्ड इसमे पहले सेतुमाहात्म्य प्रारम्भ करके वहां के स्नान और दर्शन का फ़ल बताया गया है,फ़िर गालव की तपस्या तथा राक्षस की कथा है,तत्पश्चात देवीपत्तन में चक्रतीर्थ आदि की महिमा,वेतालतीर्थ का माहात्म्य और पापनाश आदि का वर्णन है,मंगल आदि तीर्थ का माहात्म्य ब्रह्मकुण्ड आदि का वर्णन हनुमत्कुण्ड की महिमा तथा अगस्त्यातीर्थ के फ़ल का कथन है,रामतीर्थ आदि का वर्णन लक्ष्मीतीर्थ का निरूपण शंखतीर्थ की महिमा साध्यातीर्थ के प्रभावों का वर्णन है,फ़िर रामेश्वर की महिमा तत्वज्ञान का उपदेश तथा सेतु यात्रा विधि का वर्णन है,इसके बाद धनुषकोटि आदि का माहात्म्य क्षीरकुण्ड आदि की महिमा गायत्री आदि तीर्थों का माहात्म्य है। इसके बाद धर्मारण्य का उत्तम माहात्मय बताया गया है जिसमे भगवान शिव ने स्कन्द को तत्व का उपदेश दिया है,फ़िर धर्माण्य का प्रादुर्भाव उसके पुण्य का वर्णन कर्मसिद्धि का उपाख्यान तथा ऋषिवंश का निरूपण किया गया है,इसके बाद वर्णाश्रम धर्म के तत्व का निरूपण है,तदनन्तर देवस्थान-विभाग और बकुलादित्य की शुभ कथा का वर्णन है। वहां छात्रानन्दा शान्ता श्रीमाता मातंगिनी और पुण्यदा ये पांच देवियां सदा स्थित बतायी गयी है। इसके बाद यहां इन्द्रेश्वर आदि की महिमा तथा द्वारका आदि का निरूपण है,लोहासुर की कथा गंगाकूप का वर्णन श्रीरामचन्द्र का चरित्र तथा सत्यमन्दिर का वर्णन है,फ़िर जीर्णोद्धार की महिमा का कथन आसनदान जातिभेद वर्णन तथा स्मृति-धर्म का निरूपण है।इसके बाद अनेक उपाख्यानो से युक्त वैष्णव धर्म का निरूपण है। इसके बाद मुण्यमय चातुरमास्य का माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें पालन करने योग्य सब धर्मों का निरूपण किया गया है,फ़िर दान की प्रसंसा व्रत की महिमा तपस्या और पूजा का माहात्म्य तथा सच्छूद्र का कथन है,इसके बाद प्रकृतियों के भेद का वर्णन शालग्राम के तत्व का निरूपण तारकासुर के वध का उपाय,गरुडपूजन की महिमा,विष्णु का शाप,वृक्षभाव की प्राप्ति, पार्वती का अनुभव,भगवान शिव का ताण्डव नृत्य,रामनाम की महिमा का निरूपण शिवलिंगपतन की कथा,पैजवन शूद्र की कथा, पार्वती के जन्म और चरित्र,तारकासुर का अद्भुत वध,प्रणव के ऐश्वर्य का कथन,तारकासुर के चरित्र का पुनर्वणन, दक्ष-यज्ञ की समाप्ति,द्वादसाक्षरमंत्र का निरूपण ज्ञानयोग का वर्णन,द्वादश सूर्यों की महिमा तथा चातुर्मास्य-माहात्म्य के श्रवण आदि के पुण्य का वर्णन, किया गया है,जो मनुष्यों के लिये कल्याणकारक है। इसके बाद ब्राह्मोत्तर भाग में भगवान शिव की अद्भुत महिमा पंचाक्षरमंत्र के माहात्म्य तथा गोकर्ण की महिमा है,इसके बाद शिवरात्रि की महिमा प्रदोषव्रत का वर्णन है,तथा सोमवारव्रत की महिमा एवं सीमन्तिनी की कथा है। फ़िर भद्रायु की उत्पत्ति का वर्णन सदाचार-निरूपण शिवकवच का उपदेश भद्रायु के विवाह का वर्णन भद्रायु की महिमा भस्म-माहात्म्य-वर्णन,शबर का उपाख्यान उमामहेश्वर व्रत की महिमा रुद्राक्ष का माहात्म्य रुद्राध्याय के पुण्य तथा ब्रह्मखण्ड के श्रवण आदि की महिमा का वर्णन है। काशीखण्ड काशीखण्ड में विंध्यपर्वत और नारदजी का संवाद का वर्णन है,सत्यलोक का प्रभाव,अगस्त्य के आश्रम में देवताओं का आगमन,पतिव्रताचरित्र,तथा तीर्थ यात्रा की प्रसंशा है,इसके बाद सप्तपुरी का वर्णन सयंमिनी का निरूपण शिवशर्मा को सूर्य इन्द्र और अग्नि लोक की प्राप्ति का उल्लेख है। अग्नि का प्रादुर्भाव निऋति तथा वरुण की उत्पत्ति,गन्धवती अलकापुरी अर ईशानपुरी के उद्भव का वर्णन,चन्द्र सूर्य बुध मंगल तथा बृहस्पति के लोक ब्रह्मलोक विष्णुलोक ध्रुवलोक और तपोलोक का वर्णन है। इसके बाद ध्रुवलोक की पुण्यमयी कथा,सत्यलोक का निरीक्षण,स्कन्द अगस्त्य संवाद,मणिकर्णिका की उत्पत्ति,गंगाजी का प्राकट्य,गंगासहस्त्रनाम,काशीपुरी की प्रशंसा,भैरव का आविर्भाव,दण्डपाणि तथा ज्ञानवापी का उद्भव,कलावती की कथा,सदाचार निरूपण ब्रह्मचारी का आख्यान स्त्री के लक्षण,कर्तव्याकर्तव्य का निर्देश,अविमुक्तेश्वर का वर्णन,गृहस्थ योगी के धर्म,कालज्ञान,दिवोदास की पुण्यमयी कथा,काशी का वर्णन,भूतल पर माया गणपति का प्रादुर्भाव,विष्णुमाया का प्रपंच,दिवोदास का मोक्ष,पंचनद तीर्थ की उत्पत्ति,विन्दुमाधव का प्राकट्य,काशी का वैष्णव तीर्थ का दर्जा,शूलधारी शिवजी का काशी में आगमन,जोगीषव्य के साथ संवाद,महेश्वर का ज्येष्ठेश्वर नाम होना,क्षेत्राख्यान कन्दुकेश्वर और व्याघ्रेश्वर का प्रादुर्भाव,शैलेश्वर रत्नेश्वर तथ कृत्तिवाशेश्वर का प्राकट्य,देवताओं का अधिष्ठान,दुर्गासुर का पराक्रम,दुर्गाजी की विजय,ऊँकारेश्वर का वर्णन,पुन: ऊँकारेश्वर का माहात्म्य,त्रिलोचन का प्रादुर्भाव केदारेश्वर का आख्यान,धर्मेश्वर की कथा,विष्णुभुजा का प्राकट्य,वीरेश्वर का आख्यान,गंगामाहात्म्यकीर्तन,विश्वकर्मेश्वर की महिमा,दक्षयज्ञोद्भव,सतीश और अमृतेश आदि का माहात्म्य पराशरनन्दन व्यासजी की भुजाओं का स्तम्भन,क्षेत्र के तीर्थों का समुदाय,मुक्तिमण्डप की कथा विश्वनाथजी का वैभव,तदनन्तर काशी की यात्रा और परिक्रमा का वर्णन काशीखण्ड के अन्दर है। अवन्तीखण्ड इसमे महाकालवन का आख्यान,ब्रह्माजी के मस्तक का छेदन,प्रायश्चित विधि अग्नि की उत्पत्ति देवताओं का आगमन देवदीक्षा नाना प्रकार के पातकों का नाश करने वाला शिवस्तोत्र कपालमोचन की कथा,महाकालवन की स्थिति,ककलेश्वर का महापापनाशक तीर्थ अप्सराकुण्ड,पुण्यदायक रुद्रसरोवर,कुटुम्बेश विध्याधरेश्वर तथा मर्कटेश्वर तीर्थ का वर्णन है,तत्पश्चात स्वर्गद्वार चतु:सिन्धुतीर्थ,शंकरवापिका,शंकरादित्य,पापनाशक गन्धवतीर्थ,दशाश्वमेघादि तीर्थ,अनंशतीर्थ हरिसिद्धिप्रदतीर्थ पिशाचादियात्रा,हनुमदीश्वर कवचेश्वर महाकलेश्वरयात्रा,वल्मीकेश्वर तीर्थ,शुक्रेश्वर और नक्षत्रेश्वर तीर्थ का उपाख्यान,कुशस्थली की परिक्रमा अक्रूर तीर्थ एकपादतीर्थ चन्द्रार्कवैभवतीर्थ,करभेषतीर्थ,लडुकेशतीर्थ,मार्कण्डेश्वरतीर्थ,यज्ञवापीतीर्थ,सोमेशवरतीर्थ,नरकान्तकतीर्थ,केदारेश्वर रामेश्वर सौभागेश्वर,तथा नरादित्य तीर्थ,केशवादित्य तीर्थ,शक्तिभेदतीर्थ स्वर्णसारमुख तीर्थ,ऊँकारेश्वरतीर्थ,अन्धकासुर के द्वारा स्तुति कीर्तन कालवन में शिव लिंगों की संख्या तथा स्वर्णश्रंगेश्वर तीर्थ का वर्णन है। कुशस्थली अवन्ती एवं उज्ज्यनीपुरी के पद्मावती कुमुद्वती अमरावती विशाला तथा प्रतिकल्पा इन नामों का उल्लेख है,इनका उच्चारण ज्वर की शान्ति करने वाला है,तत्पश्चत शिप्रा में स्नान आदि का फ़ल नागों द्वारा की हुई भगवान शिवकी स्तुति हिरण्याक्ष वध की कथा सुन्दरकुण्डतीर्थ नीलगंगा पुष्करतीर्थ विन्ध्यवासनतीर्थ पुरुषोत्तमतीर्थ अघनाशनतीर्थ गोमतीतीर्थ वामनकुण्डतीर्थ विष्णुसहस्त्रनाम कीर्तन वीरेश्वरतीर्थ कालभैरवतीर्थ नागपंचमी की महिआ नृसिंहजयन्ती कुटुम्बेश्वरयात्रा देवसाधककीर्तन,कर्कराजतीर्थ,विघ्नेशादितीर्थ,सुरोहनतीर्थ, का वर्णन किया गया है। रुद्रकुण्ड आदि में अनेक तीर्थों का निरूपण किया गया है,तदनन्तर आठ तीर्थों की पुण्यमयी तीर्थयात्रा का विवरण है। इसके बाद नर्मदा नदी का माहात्मय बताया गया है,जिसमें युधिष्ठर के वैराग्य तथा मार्कण्डेयजी के साथ उनके समागम का वर्णन है। इसके बाद पहले प्रलयकालीन समय का अनुभव का वर्णन अमृतकीर्तन कल्प कल्प में नर्मदा के अलग अलग नामों का वर्णन नर्मदाजी का आर्षस्तोत्र कालरात्रि की कथा,महादेवजी की स्तुति अलग अलग कल्प की अद्भुत कथा,विशल्या की कथा,जालेश्वर की कथा,गौरीव्रत का विवरण,त्रिपुरदाह की कथा,देहपातविधि,कावेरी संगम,दारूतीर्थ,ब्रह्मवर्त ईश्वरकथा,अग्नितीर्थ सूर्यतीर्थ मेघनादादि तीर्थ दारूकतीर्थ देवतीर्थ नर्मदेशतीर्थ कपिलातीर्थ करंजकतीर्थ कुण्डलेशतीर्थ पिप्प्लादितीर्थ विमलेश्वरतीर्थ,शूलभेदनतीर्थ,अलग अलग दानधर्म दीर्घतपा की कथा,ऋष्यश्रंग का उपाख्यान,चित्रसेन की पुण्यमयी कथा,काशिराज का मोक्ष,देवशिला की कथा,शबरीतीर्थ,पवित्र व्याधोपाख्यान,पुष्कणीतीर्थ अर्कतीर्थ आदित्येश्वरतीर्थ,शक्रतीर्थ,करोटितीर्थ,कुमारेश्वरतीर्थ अगस्तेश्वरतीर्थ आनन्देश्वरतीर्थ मातृतीर्थ लोकेश्वर,धनेश्वर मंगलेश्वर तथा कामजतीर्थ नागेश्वरतीर्थ वरणेश्वरतीर्थ दधिस्कन्दादितीर्थ हनुमदीश्वरतीर्थ रामेश्वरतीर्थ सोमेश्वरतीर्थ पिंगलेश्वरतीर्थ ऋणमोक्षेश्वर कपिलेश्वर पूतिकेश्वर,जलेशय,चण्डार्क यमतीर्थ काल्होडीश्वर नन्दिकेश्वर नारायणेश्वर कोटीश्वर व्यासतीर्थ प्रभासतीर्थ संकर्षणतीर्थ प्रश्रेश्वरतीर्थ एरण्डीतीर्थ सुवर्णशिलातीर्थ,करंजतीर्थ,कामरतीर्थ,भाण्डीरतीर्थ, रोहिणीभवतीर्थ चक्रतीर्थ धौतपापतीर्थ आंगिरसतीर्थ कोटितीर्थ अन्योन्यतीर्थ अंगारतीर्थ त्रिलोचनतीर्थ इन्द्रेशतीर्थ कम्बुकेशतीर्थ,सोमतेशतीर्थ,कोहलेशतीर्थ,नर्मदातीर्थ,अर्कतीर्थ,आग्नेयतीर्थ,उत्तमभार्गवेश्वरतीर्थ,ब्राह्मतीर्थ,दैवतीर्थ,मार्गेशतीर्थ,आदिवाराहेश्वर,रामेश्वरतीर्थ,सिद्धेश्वरतीर्थ,अहल्यातीर्थ,कंकटेश्वरतीर्थ,शक्रतीर्थ,सोमतीर्थ,नादेशतीर्थ,कोयेशतीर्थ,रुक्मिणी आदि तीर्थों का विवेचन है।इसके साथ ही नागर खण्ड में भी तीर्थों का वर्णन है प्रभासखण्ड में विभिन्न नामॊं से शिवजी के स्थानों का विवेचन है।
अग्निपुराण
अग्निपुराण पुराण साहित्य में अपनी व्यापक दृष्टि तथा विशाल ज्ञान भंडार के कारण विशिष्ट स्थान रखता है। साधारण रीति से पुराण को पंचलक्षण कहते हैं, क्योंकि इसमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (संहार), वंश, मन्वंतर तथा वंशानुचरित का वर्णन अवश्यमेव रहता है, चाहे परिमाण में थोड़ा न्यून ही क्यों न हो। परंतु अग्निपुराम इसका अपवाद है।
वर्ण्य विषय
प्राचीन भारत की परा और अपरा विद्याओं का तथा नाना भौतिकशास्त्रों का इतना व्यवस्थित वर्णन यहाँ किया गया है कि इसे वर्तमान दृष्टि से हम एक विशाल विश्वकोश कह सकते हैं। आनंदाश्रम से प्रकाशित अग्निपुराण में 383 अध्याय तथा 11,475 श्लोक हैं परंतु नारदपुराण के अनुसार इसमें 15 हजार श्लोकों तथा मत्स्यपुराण के अनुसार, 16 हजार श्लोकों का संग्रह बतलाया गया है। बल्लाल सेन द्वारा दानसागर में इस पुराण के दिए गए उद्धरण प्रकाशित प्रति में उपलब्ध नहीं है। इस कारण इसके कुछ अंशों के लुप्त और अप्राप्त होने की बात अनुमानतः सिद्ध मानी जा सकती है।
अग्निपुराण में वर्ण्य विषयों पर सामान्य दृष्टि डालने पर भी उनकी विशालता और विविधता पर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। आरंभ में दशावतार (अ. 1-16) तथा सृष्टि की उत्पत्ति (अ. 17-20) के अनंतर मंत्रशास्तर तथा वास्तु शास्त्र का सूक्ष्म विवेचन है (अ. 21-106) जिसमें मंदिर के निर्माण से लेकर देवता की प्रतिष्ठा तथा उपासना का पुखानुपुंख विवेचन है। भूगोल (अ. 107-120), ज्योतिः शास्त्र तथा वैद्यक (अ. 121-149) के विवरण के बाद राजनीति का विस्तृत वर्णन किया गया है जिसमें अभिषेक, साहाय्य, संपत्ति, सेवक, दुर्ग, राजधर्म आदि आवश्यक विषय निर्णीत है (अ. 219-245)। धनुर्वेद का विवरण बड़ा ही ज्ञानवर्धक है जिसमें प्राचीन अस्त-शस्त्रों तथा सैनिक शिक्षा पद्धति का विवेचन विशेष उपादेय तथा प्रामाणिक है (अ. 249-258)। अंतिम भाग में आयुर्वेद का विशिष्ट वर्णन अनेक अध्यायों में मिलता है (अ। 279-305)। छंदःशास्त्र, अलंकार शास्त्र, व्याकरण तथा कोश विषयक विवरणों के लिए अध्याय लिखे गए हैं।
अग्नि पुराण की संक्षिप्त जानकारी
ब्रह्माजी बोले-- अब मैं अग्नि पुराण का कथन करता हूँ। इसमें अग्निदेव ने ईशान कल्प का बखान महर्षि वशिष्ठ से किया है। इसमे पन्द्रह हजार श्लोक है,इसके अन्दर पहले पुराण विषय के प्रश्न है फ़िर अवतारों की कथा कही गयी है,फ़िर सृष्टि का विवरण और विष्णुपूजा का वृतांत है। इसके बाद अग्निकार्य,मन्त्र,मुद्रादि लक्षण,सर्वदीक्षा विधान,और अभिषेक निरूपण है। इसके बाद मंडल का लक्षण,कुशामापार्जन,पवित्रारोपण विधि,देवालय विधि,शालग्राम की पूजा,और मूर्तियों का अलग अलग विवरण है। फ़िर न्यास आदि का विधान प्रतिष्ठा पूर्तकर्म,विनायक आदि का पूजन,नाना प्रकार की दीक्षाओं की विधि,सर्वदेव प्रतिष्ठा,ब्रहमाण्ड का वर्णन,गंगादि तीर्थों का माहात्म्य,द्वीप और वर्ष का वर्णन,ऊपर और नीचे के लोकों की रचना,ज्योतिश्चक्र का निरूपण,ज्योतिष शास्त्र,युद्धजयार्णव,षटकर्म मंत्र,यन्त्र,औषधि समूह,कुब्जिका आदि की पूजा,छ: प्रकार की न्यास विधि,कोटि होम विधि,मनवन्तर निरूपण ब्रह्माचर्यादि आश्रमों के धर्म,श्राद्धकल्प विधि,ग्रह यज्ञ,श्रौतस्मार्त कर्म,प्रायश्चित वर्णन,तिथि व्रत आदि का वर्णन,वार व्रत का कथन,नक्षत्र व्रत विधि का प्रतिपादन,मासिक व्रत का निर्देश,उत्तम दीपदान विधि,नवव्यूहपूजन,नरक निरूपण,व्रतों और दानों की विधि,नाडी चक्र का संक्षिप्त विवरण,संध्या की उत्तम विधि,गायत्री के अर्थ का निर्देश,लिंगस्तोत्र,राज्याभिषेक के मंत्र,राजाओं के धार्मिक कृत्य,स्वप्न सम्बन्धी विचार का अध्याय,शकुन आदि का निरूपण,मंडल आदि का निर्देश,रत्न दीक्षा विधि,रामोक्त नीति का वर्णन,रत्नों के लक्षण,धनुर्विद्या,व्यवहार दर्शन,देवासुर संग्राम की कथा,आयुर्वेद निरूपण,गज आदि की चिकित्सा,उनके रोगों की शान्ति,गो चिकित्सा,मनुष्यादि की चिकित्सा,नाना प्रकार की पूजा पद्धति,विविध प्रकार की शान्ति,छन्द शास्त्र,साहित्य,एकाक्षर, आदि कोष,प्रलय का लक्षण,शारीरिक वेदान्त का निरूपण,नरक वर्णन,योगशास्त्र,ब्रह्मज्ञान तथा पुराण श्रवण का फ़ल ही अग्निपुराण के अंग बताये गये है।
मत्स्य पुराण
इस पुराण में सात कल्पों का कथन है,नृसिंह वर्णन से शुरु होकर यह चौदह हजार श्लोकों का पुराण है। मनु और मत्स्य के संवाद से शुरु होकर ब्रह्माण्ड का वर्णन ब्रह्मा देवता और असुरों का पैदा होना,मरुद्गणों का प्रादुर्भाव इसके बाद राजा पृथु के राज्य का वर्णन वैवस्त मनु की उत्पत्ति व्रत और उपवासों के साथ मार्तण्डशयन व्रत द्वीप और लोकों का वर्णन देव मन्दिर निर्माण प्रासाद निर्माण आदि का वर्णन है।
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Posted by Udit bhargava at 1/02/2010 12:41:00 am 1 comments
लाभकारी नुस्खे
* बड़ की जटा का चूर्ण दूध की लस्सी के साथ पीने से नकसीर रोग ठीक होता है।
* बहेड़े और शक्कर बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से आँखों की रोशनी में बढ़ोतरी होती है।
* चूने में दूब बराबर मात्रा में पानी में पीस लें। इस मिश्रण का लेप मस्तक पर करने से मस्तक की पीड़ा दूर होती है।
* इलायची का छिलका दाँतों के रोग, सिरदर्द और मुँह की सूजन में लाभ पहुँचाता है।
* ईसबगोल और मिश्री बराबर-बराबर मात्रा में मिला लें। दूध से इस मिश्रण को एक-एक चम्मच लेने से स्वप्नदोष रोग नहीं सताता है। मिश्रण को दूध से सोने से एक घंटा पूर्व ले लेना चाहिए।
Posted by Udit bhargava at 1/02/2010 12:37:00 am 0 comments
हरी सब्जियों से घरेलू उपचार
सेहत व सौन्दर्य प्रदान करती हैं सब्जियाँ
आहार में हरी सब्जियों की बड़ी भूमिका होती है। हमारे शरीर के लिए सभी आवश्यक तत्व हरी सब्जियों से मिल जाते हैं, ये सेहत व सौन्दर्य प्रदान करती हैं।हरी सब्जियों से प्राप्त तत्व शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास करते हैं। इनके सेवन से पाचन शीघ्र होता है, बिगड़ा हुआ पाचन सुधरता है, शरीर को पौष्टिकता प्राप्त होती है और सबसे बड़ी बात सौन्दर्य में वृद्धि होती है। संसारभर के पुरुष व महिलाएँ स्वास्थ्य तथा सौंदर्य चाहते हैं, किन्तु कोई भी प्राकृतिक आहार-विहार, दिनचर्या अपनाना नहीं चाहता। डिब्बाबंद आहार का चलन बहुत बढ़ा है। रेडीमेड खाद्य पदार्थ, हॉटडॉग इस आपाधापी के जीवन में ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है।
प्राकृतिक चिकित्सा वास्तव में चिकित्सा कम जीने की कला, आत्मसाक्षात्कार का विज्ञान अधिक है। यह चिकित्सात्मक की अपेक्षा रक्षात्मक अधिक है। यदि हम अपना खान-पान बदल लें तो जीवन पद्धति बदल जाएगी। शक्ति ऊर्जा अर्जित होने लगेगी। जहा शक्ति है, वहीं स्वास्थ्य है, वहीं सौन्दर्य है।
अन्न कम खाएँ, सब्जियों का प्रयोग ज्यादा करें, वह भी रसेदार बनाकर। इससे शरीर के भीतर के अंग पुष्ट होते हैं, शरीर सुचारु रूप से कार्य करता है। व्यक्तित्व में स्वतः निखार आने लगता है। भीतर की उष्मा जब बाहर झलकती है तो वही स्वास्थ्य कहलाता है, वही सौंदर्य बनकर दमकता है।
कुछ सब्जियाँ तो बहुत उपयोगी हैं, जैसे करेला पेट के कृमि नष्ट करता है। रक्त शोधन कर, अग्नाशय को सक्रिय करता है।
* टमाटर रक्त बढ़ाता है एवं त्वचा निखारता है।
* नीबू शरीर के पाचक रसों को बढ़ाता है।
* पालक हड्डियों को कैल्शियम से सुदृढ़ करता है। पत्तेदार सब्जी लौह तत्व से भरपूर होती है अतः इन सबका उचित रूप से सलाद में प्रयोग करें।
* भिंडी वीर्य में गाढ़ापन लाती है, शुक्राणु बढ़ाती है।
* लौकी शीघ्र पाचक, रक्तवर्द्धक है, शीतलता प्रदान करती है।
* खीरा रक्तकणों का शोधन करता है व इसका प्रवाह बढ़ाता है।
* लहसुन खून का थक्का जमने नहीं देता अतः हृदय रोग में लाभकारी है।
* परवल शरीर को ऊर्जा देती है।
* गोभी, आलू, बीन्स आदि शरीर के विविध भागों, तत्वों, मात्राओं को प्रभावित करते हैं। इनको बनाते समय सावधानी की जरूरत है।
सब्जी को काटने से पूर्व अच्छी तरह धो लिया जाए, काटने के बाद धोने से सब्जी के तत्व नष्ट होते हैं। पकाते समय अधिक तेल डालने व ज्यादा देर तक आग पर रखकर स्वाद के लालच में कहीं सब्जियों की पौष्टिकता नष्ट हो जाती है। अधिक मिर्च-मसाले से भी सब्जी का स्वाद कम हो जाता है।ताजी सब्जियाँ, ताजा बनाकर सेवन करना ही हितकर होता है। बासी, फ्रिज में रखी, बार-बार गरम करके परोसी गई सब्जी में पौष्टिक तत्व खत्म हो चुके होते हैं।
दैनिक जीवन में सब्जियों का सेवन बढ़ाकर देखें, हाजमा ठीक रहेगा, गैस, एसिडिटी नहीं होगी एवं उत्साह बढ़ेगा। इससे आपका व्यक्तित्व निखरेगा। आप आयु से सदैव कम दिखाई देंगे।
बुजुर्ग कहा करते थे कि तिजोरी में धन होता है तो चेहरे पर चमक झलकती है अर्थात यदि लक्ष्मी (रुपया-पैसा) हमारी तिजोरी में हो तो चेहरा स्वतः खिला-खिला रहता है। अमीरी छिपाए नहीं छिपती। ठीक उसी प्रकार हमारा शरीर यदि भीतर से संपन्न, स्वस्थ है तो बाहरी तौर पर भी सुंदर दिखेगा।
Posted by Udit bhargava at 1/02/2010 12:29:00 am 0 comments
















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