12 जुलाई 2010

सांची में अंकित हैं भगवान बुद्ध के पूर्वभव ( Sanchi is reflected in Buddha's Puarvha )

समय चक्र का प्रवाह अनवरत चलता रहता है। समय के कारण प्रत्येक द्रव्य में परिवर्तन होता है। क्षण-क्षण बदलते पर्यायों के स्वरूप को इस विश्व में भगवान बुद्ध ने जितना अधिक बल देकर व्याख्यायित किया, उतना अन्य कोई नहीं कर सका। उनका मानना था कि सभी वस्तुएं परिवर्तनशील हैं। जीव भी परिवर्तनशील है। जैनदर्शन भी परिवर्तन को मानता है किंतु वह नित्यता को भी स्वीकार करता है। शरीर या पर्याय बदलता है, किंतु आत्मा नित्य है, अजर-अमर है। प्रतीत्यसमुत्पाद के कारण बुद्ध परिवर्तनशील दृष्ट धर्मो के अतिरिक्त किसी अदृष्ट स्थायी द्रव्य को नहीं मानते थे। अत: उन्होंने आत्मा को नहीं माना, यही अनात्मवाद बौद्ध धर्म का बहुत बडा सिद्धान्त बन गया। पुनर्जन्म का सिद्धान्त भारतीय दर्शन की एक प्रमुख विशेषता है। आत्मा की नित्यता स्वीकार किए बिना पुनर्जन्म को सिद्ध करना कठिन हो जाता है।  स्थिर आत्मा का अस्तित्व अस्वीकार करते हुए भी भगवान बुद्ध यह स्वीकार करते थे कि जीवन विभिन्न क्रमबद्ध और अव्यवस्थित अवस्थाओं का प्रवाह या संतान है। विभिन्न अवस्थाओं की संतति को ही जीवन कहते हैं। इस संतति के अंदर किसी अवस्था की उत्पत्ति उसकी पूर्ववर्ती अवस्था से होती है। इसी तरह वर्तमान अवस्था आगामी अवस्था को उत्पन्न करती है। अनित्यता में भी निरन्तरता की स्वीकृति का यह अलग अंदाज था। शायद यही कारण था कि जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के ही पूर्वजन्मों के बहुत रोमांचक वृत्तान्त लिखे हैं। सांचीके स्तूपों में जातक कथाओं के माध्यम से अद्भुत शिल्प सौन्दर्य द्वारा भगवान बुद्ध के पूर्वजन्मों के वृत्तान्तों को बखूबी दर्शाया गया है। सांचीमध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बेतवा और बेसनदी के तट पर, विदिशानगरी से लगभग दस कि।मी की दूरी पर स्थित है। सांचीस्थित पहाडी को पुरातन काल में बेदिसगिरी, चेतियागिरी, काकनायआदि नामों से पुकारा जाता था। सांची के इन मनोरम स्तूपों का निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था। सांची में स्थित स्तूप, स्तंभ, विहारों, मंदिरों तथा चैत्यालयों का निर्माण तीसरी शती से बारहवीं शती तक हुआ। सम्राट अशोक ने विदिशा के एक व्यापारी की कन्या के साथ विवाह किया था। हृदय परिवर्तन के बाद उसने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और धर्म का भरपूर प्रचार-प्रसार किया। सम्राट अशोक ने विदिशा निवासी पत्‍‌नी के कहने पर ही सांची को बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार का केंद्र बनाया। उनका मानना था कि धर्म की शिक्षा के लिए एकान्त स्थल जरूरी है। विश्व में बौद्ध धर्म का सबसे पहले प्रचार सांची से ही शुरू हुआ। अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा सांची से ही बोधिवृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गए थे। वे मां के साथ सांची में निर्मित विहार में ठहरे भी थे। ऐसी मान्यता है कि यहां के स्तूपों में भगवान बुद्ध की अस्थियां रखी हैं। जिन दिनों बौद्ध धर्म में मूर्ति पूजा निषेध थी उन दिनों ये स्तूप बौद्ध धर्मानुयायियों के लिए आस्था के प्रतीक थे और आज भी हैं।

ज्ञातव्य है कि बौद्ध स्मारक उन्हीं स्थलों पर निर्मित हुए जो भगवान बुद्ध के जीवन की घटना से संबंध रखते हैं। जैसे- लुम्बिनी, यहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ। बोधगया यहां उन्हें सम्यक् बोधि प्राप्त हुई। सारनाथ, यहां उनका प्रथमोपदेश हुआ। श्रावस्ती, यहां उन्होंने चमत्कार दिखाया। कुशीनगर, यहां उनका परिनिर्वाण हुआ। इसके अलावा राजगृह संकाश्य तथा वैशाली इत्यादि स्थान इस कारण श्रद्धा के केंद्र हैं, क्योंकि यहां भगवान बुद्ध का कई बार आगमन हुआ। सांचीके प्रथम स्तूप की चारों दिशाओं के तोरणद्वारों पर छद्दन्त, महाकपि, वेस्सन्तर, अलम्बुस  और साम जातक कथाएं उत्कीर्ण हैं, ये सभी बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित हैं।

विकास के लिए अभ्यास जरूरी: गोपालदास ( Practise Required for development: Gopaldas discourse )

बाला जी मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए महंत गोपालदास ने कहा कि मानव शरीर अनगढ है और वृत्तियांअसंयमित। इन्हें सुगढ एवं सुसंयमित करना ही अभ्यास का लक्ष्य है। अनगढ काया एवं मन अभ्यस्त होने के कारण सामान्यता किसी भी नए कार्य को करने के लिए तैयार नहीं होते। उल्टे अवरोध खडा करते है उन्हें व्यवस्थित करने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पडती है।

उन्होंने कहा कि लगातार अभ्यास द्वारा शरीर एवं मन को इच्छानुवर्ती अर्थात इच्छा अनुसार कार्य करने लायक बनाया जा सकता है। साथ ही उन अंगों को असामान्य कार्यो के कर सकने के लिए भी सहमत किया जा सकता है। परोक्ष रूप से अभ्यास की यह प्रक्रिया ही व्यक्तित्व का निर्माण करती है। प्रतिभा योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है सर्व समर्थ नहीं। बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न करे, पहलवान व्यायाम छोड दे, संगीतज्ञ, क्रिकेटर अभ्यास करना छोड दें, चित्रकार तूलिका का प्रयोग न करे, कवि भाव संवेदनाओं को संजोना छोड बैठे, तो उसे प्राप्त क्षमता भी क्षीण होती जाएगी। जबकि बुद्धि की दृष्टि से कर्म पर सतत अभ्यास में मनोयोग पूर्वक लगे, व्यक्ति अपने अंदर असामान्य क्षमताएं विकसित कर लेते है। निश्चित समय एवं निर्धारित क्रम में किया गया प्रयास मनुष्य को किसी भी प्रतिभा का स्वामी बना सकता है। जबकि अभ्यास के अभाव में प्रतिभाएं कुंठित हो जाती है, उनमें व्यक्ति अथवा समाज को कोई लाभ नहीं मिल पाता। अभ्यास से ही आदतें बनती है और अंतत: संस्कार का रूप लेती है। कितने ही व्यक्ति किसी भी कार्य को करने में अपने को असमर्थ मानते है, उन्हें असंभव जानकर प्रयास नहीं करते है। फलस्वरूप कुछ विशेष कार्य नहीं कर पाते। जबकि किसी भी कार्य को करने का संकल्प कर लेने एवं आत्मविश्वास जुटा लेने वाले व्यक्ति उसमें अवश्य सफल होते है। आत्मविश्वास की कमी एवं प्रयास का अभाव ही मनुष्य को आगे बढने से रोकता तथा महत्वपूर्ण सफलताओं को पाने से वंचित रहता है। मानवीय काया परमात्मा का विलक्षण संरचना है। उसे जैसा चाहे बनाया जा सकता है। सामान्यता लोग कुछ दिनों तक तो बडे उत्साह के साथ किसी भी कार्य को करने का प्रयास करते है पर अभीष्ट सफलता तुरन्त न मिलने पर प्रयत्न छोड देते है। जबकि धैर्य एवं मनोयोग पूर्वक सतत अभ्यास में लगे व्यक्ति असामान्य क्षमताएं तक विकसित कर लेते हैं।

उन्होंने कहा कि अभ्यास की प्रक्रिया द्वारा शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का विकास ही नहीं रोगों का निवारण भी किया जा सकता है। मानवीय काया एवं मन में शक्ति भंडारे छिपे पडे है। विकास की असीम संभावनाएं है। निर्धारित लक्ष्य की ओर प्रयास चल पडे और उसमें धैर्य एवं क्रम-बद्धता का समावेश हो जाए तो असंभव समझे जाने वाले कार्य भी संभव हो सकते हैं।

हिमाचल प्रदेश की ग्ददी जनजाति ( Gaddi Tribes of Himachal Pradesh )


हिमाचल प्रदेश मे गद्दी एक विशिष्ट जनजाति है जो शारीरिक सरंचना, संस्कृतनिष्ठ भाषा, विशिष्ट वेशभूषा के कारण अपना अलग अस्तित्व रखती है। इस जनजाति का मूल क्या रहा होगा, यह निश्चित तौर से नहीं कहा जा सकता।

गद्दी अपने को मैदानों से आया हुआ बताते हैं। ’ए ग्लोरी आंफ़ द ट्राईब्स एण्ड कास्टस’ में उल्लेख है कि राजा अजय वर्मन के समय में कुछ चौहान राजपूत गद्दी ब्राह्मण, मैदानों से पलायन कर यहां आए। कुछ राजपूत और खत्री औरंगजेब के समय मैदानों से यहां आए। अजय वर्मन का समय सन 850-70 माना गया है जो सही प्रतीत नहीं होता। ’हिस्ट्री आंफ़ पंजाब हिल्ज स्टेट’ में अजय वर्मन का कार्यकाल सन 760 दिया गया है, जो सही प्रतीत होता है, जिसमें गद्दी ब्राह्मणों तथा राजपूतों के दिल्ली आने का उल्लेख है।

यह मान्यता कि भरमौर (पुरातन ब्रह्मपुर) गद्दियों की वास्तविक भूमि थी, इतिहास से मेल नही खाती। ब्रह्मपुर एक सम्पन्न राज्य था जो यहां के मंदिरों, वास्तुकला, मूर्तिकला को देखकर प्रमाणित होता है। ब्रह्मपुर का इतिहास आदित्य वर्मन (सन 620 ) तक और उसके भी पहले मारू तक जाता है।

ब्रह्मपुर का पुरातन राज्य राजा साहिल वर्मन (सन 920 ) के समय राजधानी चम्बा स्थानांतरित होने से उपेक्षित हो गया था। बाद में गद्दियों की प्रवासी प्रकृति के कारण सूना-सूना रहने लगा। सम्भवत: तभी गजेटियर में (1904) भरमौर की जनसँख्या 1901 की जनगणना के अनुसार मात्रा 4,343 बताई गयी है। हो सकता है कि जनगणना सर्दियों के मौसम में हुई हो और अधिकाँश गद्दी अपनी भेड़-बकरियों के साथ कांगड़ा या मैदानों में चले गए हों। घरों में बूढ़े लोग ही बचे होंगे। अन्या स्त्रोंतों के अनुसार वास्तविक जनसँख्या 33,907 थी।

क्या गद्दी लोग पहले से ही प्रवासी थे और भेड़-बकरी पालन के कारण मात्रा गर्मियों में ही भरमौर आते थे? इनके व्यवसाय, रहन सहन तथा परम्पराओं और देवी देवताओं के अस्तित्व से ऐसा ही प्रतीत होता है। गर्मियों में अपनी भेड़-बकरियों 'धण' के साथ कुछ धौलाधार से कांगड़ा की ओर आते हैं, तो कुछ 'साच' दर्रे, 'कुगति' दर्रे या अन्य मार्गों से पांगी तथा लाहौल की ओर से। अतः गद्दियों का पंगावालों और विशेषकर लाहुलों से सम्बन्ध रहा है।

गद्दी लोग आज भी आग जलाने के लिये चमकदार पत्थर का इतेमाल करते हैं। कुल्लू, किन्नौर तथा लाहौल के लोगों की भांति बलि देते हैं और कई प्रकार के विश्वासों (या अंधविश्वासों) मान्यताओं से ग्रसित हैं। उनकी अपनी अलग वेशभूषा और भाषा है। अतः यह जनजाति भी यहाँ की मूल जानाति है। यदि ये दिल्ली या मैदानों से आए होते तो इनमें इतना कुछ अलग नहीं होता। अलबत्ता बाद में बहुत से लोग मुस्लिम काल में धौलाधार की ओर पलायन करते रहे, जो चंबा या आसपास के लोगों में घुल-मिल गए।

गद्दियों में प्रमुख चार जातियां है- ब्रह्मण, खत्री, ठाकुर या राठी तथा अन्य। ब्रह्मण तथा खत्री राजपूत यज्ञोपवीत धारण करते हैं। ठाकुर या राठी यज्ञोपवीत नहीं पहनते। अन्य जातियों में कोली, रिहाडे, लोहार, बाढी, सिप्पी तथा हाली आते हैं, जिन्हें गद्दी लोग अपनी तरह गद्दी नहीं मानते।

हर वर्ग कई गोत्रों में विभक्त है। ब्रह्मण, खत्री आपस में विवाह सम्बन्ध कर लेते हैं। विवाह के लिये यज्ञोपवीत धारण करने वाली या न करने वाले भी कोई शर्त नहीं है।

अन्य जातियां या तो खेती करती हैं या वे शिल्पी हैं। कोली तथा सिप्पी को एक ही समझा जाता है। कपडे बुनना इनका कार्य है। रिहाड़े पीतल के बर्तन या जेवर बनाते हैं, लोहार लोहे का काम करते हैं, बाढी लकड़ी का, हाली हल जोतते हैं। ये जातियां सम्भवतः इस ओर बाद में आईं, अतः अछूत मानी जाने लगीं। गद्दी वर्ग में इन्हें अपना हिस्सा नहीं माना।

ब्रह्मण, खत्री, ठाकुर या राठी ब्राह्मणों के समान अपने गोत्र रखते हैं। कुछ स्थानों के नाम तथा शारीरिक विकलांगता के नामों पर भी गोत्र बने जैसे बतियाल के ब्रह्मण भाट  हुए, एक हाथ वाला डण्डू हुआ। घुलने अर्थात पहलवाने करने से कोई घुलेटू हुआ तो लूण या नमक का काम करने वाला लूणेसर।

ब्रह्मण, राजपूत, राठी ये उच्च बने क्योंकि ये लोग यहाँ पहले से रह रहे थे। हल जोतने वाले या शिल्पी जो बहार से आए, निम्न हो गए। हल जोतने वालों पर राजपूतों या राजाओं का अधिकार रहा, इसलिए निम्न कोटि के, कामगार किस्म के कहलाये।

भरमौर में या कांगड़ा के ऊपरी भाग, पालमपुर की धौलाधार के नीचे रहने वाले सभी व्यक्तियों को गद्दी ही कहा जाता है। वे चाहे ब्रह्मण हों, राजपूत या राठी हों या खत्री। खत्री और महाजन अब एक व्यापारी जाती है, जो दुकानदारी करते हैं, पुरातन खत्री राजपूत बने। यह सम्भवतः खत्री की क्षत्रिय से व्युत्पति के कारण रहा होगा। गद्दी खत्री, मैदानों से आए खत्री महाजनों से, जो व्यापारी हैं, भिन्न हो सकते हैं।

ब्राह्मणों में विशिष्ठ, गौतम, अत्री, भार्द्वाद आदि, खत्रियों में रतनपाल, अत्री, भारद्वाज आदि जातियां हैं। किन्तु गोत्रों में 'अलों' से वर्गीकरण हुआ और इन्हीं को वे अपनी जातियां समझ बैठे। जैसे जारी 'जुक', चुप रहने वाले 'चुपेटु ', नाक में बोलने वाले 'गुत्रा', अफीमची 'अमलेतु', काले रंग वाले 'कपूर', मुक्केबाज 'मकरातु' कहलाए।

जालंधर खण्ड में किन्नौर, स्पिति  दोनों लाहुल, पांगी और धेरन के लोगों को उनके निवास स्थान और जातीय-विशेषता के कारण हम  सीमांती या जनयुगीन जातियां कह सकते हैं। इनमें से कुछ के बारे में विशेष रूप से राहुल जी ने लिखा है: गद्दी वस्तुतः एक जाती का नहीं, बल्कि एक इलाके के रहने वाले ब्राह्मणों, राजपूतों, क्षत्रियों, ठाकुरों और राठियों का नाम है, जिनमें सबसे अधिक संख्या खत्रियों की है। पंजाब में भी खत्री शब्द क्षत्रिय से वैसे ही बिगड़कर बना है, जैसे नेपाल में खत्री। इसलिये गधेरन के क्षत्रियों के उद्गम के लिये हमें पंजाबी खत्रियों की ओर निगाह डालने की जरूरत नहीं। बाहर के लोगों ने गद्दी का जो अर्थ लगा रखा है अर्थात एक भेड़ चुराने वाली हीन जाती, उसके कारण गधेरन के लोग अपने को गद्दी न कहकर ब्रह्मण, राजपूत, खत्री आदि कहते हैं और जनगणना में उसी तरह लिखवाते हैं। ये गद्दी मुख्यतः चंबा जिले के ब्रह्मौर वजारत (तहसील) में मिलते हैं, लेकिन, उनमें से कितने ही अपनी दक्षिणी सीमा धौलाधार के घाटों को पार कर कांगड़ा जिले के गाइरों बुकियालों) के लिये उधर भी चले गए हैं। गधेरन (चंबा) के रहने वाली जातियों के गोत्र फकरू, घोरू (राजवंशी), घलेटू (पहलवान), भजरेटू (भारवाहक), गाहरी (चरवाहें), अदापी, लुनेसर (नमक-रोजगारी), काहनघेरू (कंघी रोजगारी), पालनू आदि होते हैं। गद्दी लोग शरीर से बहुत स्वस्थ, रंग में बहुत गोरे और स्वभाव में सीधे-सादे आत्मसम्मान के पुतले होते हैं। वे उत्सवप्रिय होते हैं, गाना-नाचना उन्हें पसंद है।

भेड़ों को लेकर वे धौलाधार, पांगीधार या जांस्करधार की ऊंची चरागाहों (गाहरों) में साल के बहुत-से महीने बिताते हैं। उनकी आजीविका का साधन खेती और भेड़-बकरी पालना दोनों हैं। जाड़ों के दिनों में वे अपनी भेड़-बकरियों को लेकर नीचे की ओर चले जाते हैं। घर के पुरुष बारी-बारी से भेड़-बकरियों के साथ बाहर रहते हैं, बाकी लोग गाँव में रहकर खेती और ढोरों को देखते हैं। गद्दी धौलाधार के दोनों तरफ बसे हुए हैं, इसलिए उनके खेत भी चंबा और कांगडे दोनों जिलों में है। कांगड़ा में जाड़े की फसल काटकर ब्रह्मौर (गदेरन) जाकर अपनी गर्मियों की फसल काटते हैं। वे अक्टूबर-नवम्बर में कांगड़ा की ओर जाते हैं और अप्रैल-मई में ब्रह्मौर लौटते हैं। गद्दियों की ईमानदारी के लिये कहावत मशहूर है 'गद्दी मित्तर भोला, दिन्दा टोप तो मंगदा चोला।'

भरमौर में कन्या के जन्म पर पांचवे दिन और पुत्र के जन्म पर दसवें दिन शुद्धि की जाती है जिसे गंतूर या गोंत्राला कहा जाता है। इस अवसर पर माता के कपड़ों को धोने के साथ-साथ पूरे घर की सफाई की जाती है। पूरे घर तथा कपड़ों की शुद्धि के लिये गौमूत्र, दूध तथा गंगाजल का छिडकाव किया जाता है। घर के सभी छोटे-बड़े सदस्य इस का पान भी करते हैं। पुरोहित के पास जाकर शिशु के भविष्य के बारे में पूछा जाता है। यदि शिशु का जन्म शुभ मूहर्त या नक्षत्र में हुआ हो या अपने या दूसरों के लिये कष्ट्कारी हो तो पुरोहित के बताए अनुसार अष्टधातु, रत्ती आदि के साथ कंगन बांधा जाता है। दूसरे उपाय भी किये जाते हैं। सामान्यतः बालक की जन्मपत्री नहीं बनवाई जाती। कुछ खाते-पीते घर के लोग ही जन्मपत्री बनवाते हैं।

गंतूर या गोंत्राला होने तक जिस कमरे में शिशु का जन्म हुआ हो, वहां किसी व्यक्ति द्वारा अन्न ग्रहण नहीं किया जाता। शुद्धिकरण तक शिशु की माँ को नहलाया भी नहीं जाता। छः महीने का होने पर नामकरण किया जाता है। कुछ लोग स्वयं ही नाम रख देते हैं तो कुछ पुरोहित से पूछकर नाम रखते हैं। नामकरण के समय गुड बांटा जाता है।

बालक को पहली बार अन्न खिलाने के समय भी कुछ संस्कार किये जाते हैं। बालक को जमीन पर बैठाया जाता है और उसके सामने दाराट, कुदाल, कागज़, खीर, रखी जाती है। यदि वह खीर को पहले छुए तो पेटू होगा, कागज़ छुए तो विद्वान्, दराट-कुदाल छुए तो अच्छा कृषक या पुहाल होगा। इस अवसर पर पुरोहित तथा कन्याओं को खीर खिलाई जाती है।

शिशु के जन्म के कपड़ों के संभाल कर रखा जाता है। विवाह के समय माँ द्वार ये कपडे उसे दिखाए जाते हैं और यह एहसास करवाया जाता है कि वह युवक इतना-सा था। पुराने समय में वर माँ को इसके लिये एक से चार रूपए तक देता था।

बालक की मृत्यु हो जाने की स्थिति में जहां बालक दफनाया गया हो वहां उसे नहलाया जाता है। इसे 'घाट न्हौण' कहते हैं। कई बार तीर्थ या शमशान न्हौण भी करवाया जाता है। इस अवसर पर चेले को कपडे तथा पैसे दिए जाते हैं। गर्भ ठहरने के बाद महिला गर्भपात के देवता कैठू के नाम अपना हार तथा चार चकलियां (पुराने ताम्बे के रूपए) रखती थी। शिशु जन्म के तीन चार महीने बाद पुरोहित तथा महिला इस देवता की पूजा अखरोट या कैंथ के पेड़ के नीचे करते हैं। एक सफ़ेद बकरा या काले सिर वाला सफ़ेद बकरा प्रस्तुत कर उसके दाएं कान में काति से काट एक कपडे के ऊपर खून गिराया जाता है। देवता को चार चकलियां तथा रोटी दी जाती है। महिला द्वारा गुड खाने के बाद कपडे में रख लिया जाता है। यह कपड़ा तब तक रखा जाता है जब तक फटे नहीं।

गद्दी समाज में विवाह संस्कार एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। हर्षोल्लास के इस अवसर पर सभी सम्बंधित मिलकर खाते-पीते हैं। सुरा पी जाती है, बकरे कटते हैं, डंडारस नाच किया जाता है, दूसरा विवाह पहली पत्नी की मृत्यु होने पर या नि-संतान होने पर पहली पत्नी की अनुमति से किया जाता है।

वर-वधु के माता पिता की आपसी रजामंदी से विधिवत किया गया विवाह 'धर्म पुत्र' कहलाता है। सगाई पक्की होने पर वर पक्ष के कुछ लोग एक सेर शुद्ध घी लेकर वधू पक्ष के यहाँ जाते हैं। यहाँ पुरोहित दोनों पक्षों की सुविधानुसार तिथि निश्चित करता है। पुरोहित पूरा कार्यक्रम बनाकर देता है। जिसे 'लखणोतरी' कहा जाता है।

विवाह की सभी रस्में लगभग कांगड़ा की रस्मों की भांति हैं। यद्यपि स्थानीय परम्परा के अनुसार कुछ अतिरिक्त संस्कार भी जुड़े हैं।

विवाह का आरम्भ समूहत से होता है जिनमें वर को बूटणा (उबटन) लगा कर आँगन में नहलाया जाता है। क्योंकि यज्ञोपवीत पहले नहीं होता। अतः इसी दिन मंजुमाला, म्रगछाला, मुद्रा पहना कर ब्रह्मचारी बनाने के साथ याग्योपवीत पहनाया जाता है। पुरोहित वर से पूछता है वह 'जतेरा जीवन' (सांसारिक जीवन) जीएगा या मतेरा जीवन (सन्यासी जीवन) ? वर जतेरा जीवन जीने के लिये कहता है।

तेल संस्कार मामा द्वारा एक कटोरी में तेल डाल कर वर के सिर पर रख हरी डूब से हिलाने के साथ होता है। डूब से तेल का छिडकाव किया जाता है। सभी संबंधी भी ऐसा करते हैं। मामा द्वारा दिया सेहरा वर द्वारा पहना जाता है। मामी आँखों में सुरमा डालती है। माँ वर को तमोल लगाती है। वर को पालकी में बिठा अन्य लोगों के साथ वधु पक्ष के यहाँ ले जाया जाता है। बरात को 'जनेत' कहा जाता है। बरात बाजे-गाजे के साथ जाती है। वर की पालकी हाली उठाते हैं।

बरात को ठहरने के लिये अलग मकान दिया जाता है। वर के पिता, मामा तथा पुरोहित लुचियों का टोकरा लेकर जाते हैं। वे रात में तथा अगले दिनों होने वाले संस्कारों पर बातचीत करते हैं।

बरात को भोजन के लिये निमंत्रण दिया जाता है। वर की ओर से कन्या को 'बरासूही' दी जाती है जो एक पिटारी या ट्रंक में होती है। इसमें वधु के लिये कपडे, श्रृंगार की सामग्री, गुड, नारियल, बादाम, लड्डू, केसर, न्हाणी (सुगंधित जडी) आदि होते हैं।

बरात के भोजन के बाद मूहर्त के अनुसार पुरोहित वर को कन्या के घर ले जाता है हां सास आरती उतारती है। ससुर वर के पैर धुलाता है। कन्या को बाहर लाया जाता है। वर तथा वधु के सिर तीन बार एक दूसरे से लगाए जाते हैं। चीरी संस्कार में मालती की लकड़ी के सात टुकडे कन्या वर को देती है जिसे वह पाँव के नीचे रख कर तोड़ता है।

कन्यादान तथा लग्न संस्कार कांगड़ा की भांति किये जाते हैं। कन्या का भाई कन्या का दुपट्टा फैलाता है जिस पर वर केसर के छींटे फेंकता है। कन्या भी वर के पटके पर केसर छिडकती है। पुरोहित कन्या के हातों में फल, फूल तथा कुछ पैसे रखता है। वर अपने हाथ कन्या के हातों पर रखता है। पिता भी हाथ लगाकर पुरोहित द्वारा मन्त्रोच्चारण के साथ कन्या दान करता है। कन्यादान के बाद कन्या को घर के भीतर ले जाते हैं। वर कुछ संस्कार अकेला पूरे करता है जिन्हें मनिहार कहते हैं। फिर वर को भीतर ले जाते हैं जहां कामदेव की प्रतिमा बनी होती है। कन्या को वहां लाकर उसके बाल सँवारे जाते हैं।

'खिलां खलाणी' संस्कार में एक छाज में जौ की खीलें राखी जाती हैं। वर ये खीलें तीन दिशाओं में रखता है, कन्या की बहनें इन्हें पुनः जल्दी से छाज में डालती हैं। यह बार-बार किया जाता है।

वर-वधु द्वारा अग्नि के फेरे लिये जाते हैं जो चार या सात हो सकते हैं। गोत्राचार में वर कन्या को अपने गोत्र में सम्मलित करता है।

बरात वापित आने पर दुल्हा-दुल्हन की आरती उतारी जाती है। सास बहु को कुछ भेंट देती है। वर-वधु से गणपति पूजन करवाया जाता है। दो परिवारों के पुरुष तथा महिला वर-वधु का कंगणा खोलते हैं। पुरुष वर का तथा महिला वधु का कंगणा खोल कर कंगण भाई या बहन बनते हैं। महिलाएं वधु का मुंह देखकर कुछ भेंट देती हैं।

एक विवाह में कम से कम चार धामें (भोज) दी जाती हैं। पहली समूहत के दिन, दूसरी बरात जाने के समय, तीसरी बरात वापसी पर तथा एक अगले दिन। धाम में बकरे कटने के साथ सुरा पान भी आवश्यक है।

गद्दी जनजाति में बाल-विवाह की प्रथा थी। जब बच्चे अभी गोद में ही होते थे तो उनका रिश्ता तय कर दिया जाता था। खेलने के दिनों में विवाह हो जाता था। यदि बचपन में विवाह हो जाए तो कन्या के युवा होने पर वर अपने सम्बन्धियों सहित वधु को लेने आता था। यह 'सदनोज' कहलाता है। यह कन्या के युवा होने पर होता है। इस बरात को वधु के घर तीन भोज दिए जाते हैं। यदि ये लोग शाम को आएं तो अगले दिन दोपहर का खाना खा कर जाते हैं। खाने में बकरे कटना आवश्यक है, सुरा भी पी जाती है। वर पक्ष की ओर भी धाम दी जाती है।

पुराने समय में कन्या की विदाई के समय बीस सेर आटे के बबरू, दो चोलू, दो लुआंचडियां, दस-पन्द्रह चुंडू, एक चादर तथा चार सेर गेहूं दिए जाते थे। दहेज में चांदी के आभूषण, भांडे-बरतन दिए जाते थ।

'बट्टा- सट्टा' एक लोकप्रिय विवाह पद्वति है। वर किसी कन्या से विवाह करने के बदले अपनी सगी बहन, ममेरी, फुफेरी या ताऊ चाचा की लड़की को अपनी भावी पत्नी के भाई को प्रस्तावित करता है। अतः एक परिवार की कन्या या पुत्र का विवाह दूसरे परिवार के पुत्र या कन्या से होता है। इस प्रकार से विवाह भी सुगम रहता है और सम्बन्ध भी प्रगाढ़ होते हैं।

'झांझराडा' पद्वति को गुदानी या चोली डोरी भी कहते हैं। पति की मृत्यु के बाद विधवा अपने पति के भाई से विवाह करती थी। किन्हीं स्थानों में विधवा किसी भी पुरुष से विवाह कर सकती है। विधवा स्त्री तथा पुरुष को कुम्भ तथा दीपक से पास बिठा दिया जाता है। स्त्री के बाल बनाई जाते हैं। पुरुष की ओर से स्त्री को नथ पहनने के लिये दी जाती है। विवाह के बाद भोज दिया जाता है। ऐसे विवाह में पुरोहित का होना आवश्यक नहीं है। कोई भी पुरुष किसी विधवा स्त्री से झांझराडा कर सकता है।

'घर जवांतरी' विवाह या घर जंवाई विवाह की प्रथा भी गद्दियों में कुछ अनोखे ढंग से प्रचलित है। वर को विवाह की खातिर अपने होने वाली ससुराल में सात से दस वर्ष तक रहना पड़ता है। वह नौकर की भांति काम करता है। उसे लगातार वहीँ रहना पड़ता है। यदि बीच में वह कही चला जाए तो रहने की अवधि बढ़ा दी जाती है। उसे अपने ससुर का हर कार्य करना पड़ता है। ससुर के प्रसन्न होने पर विवाह होता है। अवधि पूरी होने पर जब दूल्हा अपने घर वापस जाता है तो विवाह कर दिया जाता है।

'रीत' की भांति खेवत विवाह गद्दी जनजाति में प्रचलित है। यदि कोई पुरुष स्त्री के पहले पति को विवाह का पूरा खर्चा हर्जाने सहित अदा कर दे तो वह उस पुरुष से विवाह कर सकती है। प्रथम पुरुष यदि मान जाए तो स्त्री द्वारा ऐसा दूसरा विवाह किया जाना सम्भव है। किन्नौर की ओर से 'इज्जत' कहते हैं। यह विवाह स्त्री को पति गृह में मान-सम्मान न मिलने, पति का किसी अन्य स्त्री से प्रेम सम्बन्ध होने आदि के कारण होता है।

इस विवाह पद्वति में कन्या का पिता, वर या वर के माता-पिता से कन्या के बदले रूपए लेता है। यह राशि पांच सौ रूपये से लेकर हजार तक हो सकती है। राशि के भुगतान पर कन्या का विवाह कर दिया जाता है।

यदि माता-पिता कन्या का मनचाहे युवक से विवाह न करें तो वह अपने प्रेमी युवक के साथ भाग जाती है। दोनों झिंड अर्थात झाड़ियाँ जलाकर अग्नि के फेरे लेकर विवाह कर लेते हैं। बाद में इस विवाह को मान्यता तो मिल जाती है किन्तु कन्या का घर से भागना एक ग्लानी उत्पन्न कर जाता है। यदि कभी विवाह से पूर्व लड़की मिल जाए तो उसे जबरदस्ती घर भी वापिस लाया जाता है।

गद्दी जनजाति में विवाह एक पवित्र बंधन माना जाता है अतः सामान्यता विवाह-विच्छेद की नौबत नहीं आती। यदि कोई झगड़ा हो जाए तो पंचायत के हस्तक्षेप से दहेज़ की वस्तुएँ या नकदी पति को वापिस देनी पड़ती हैं। विच्छेद होने पर बच्चे पिता के घर रहते हैं। यदि गर्भ में शिशु हो तो वह भी जन्म के बाद पिता हो सौंप दिया जाता है। स्त्री अकेली दूसरे पति के घर चली जाती है।

10 जुलाई 2010

धर्मग्रंथों के सौंदर्य नुस्खे - बेवकूफी की हद ( Beauty Tips of the Scriptures - the limits of stupidity )

सौंदर्य की महिमा अपरम्पार है। सौंदर्य हर किसी को लुभाता है, पागल कर देता है। सौंदर्य वरदान है तो अभिशाप भी। सौंदर्य किसी के लिये गर्व है तो किसी के लिये ईर्ष्या, जलन और डाह भी है। सौंदर्य रस है और अमृत है तो जहर भी है। सुन्दरता प्रक्रतिप्रदत्त तो है ही, कृत्रिम तौर तरीकों द्वारा भी हासिल की जाती रही है। सौंदर्य ने स्त्रियों के लिये सारे काम आसान कर दिए हैं। यह पुरुषों को रिझाने के लिये वरदान है, तो फांसने के लिये फंदा है।

स्त्रियों को खूबसूरत दिखने का लोभ हमेशा लुभाता रहा है। उन में सदियों से सुन्दरता की चाह रही है। इसे स्त्रियों का प्राक्रतिक स्वभाव कहा जाता है। बहुत पहले से सुन्दर बनने व दिखने के लिये तरह-तरह के नुस्खे आजमाए जाते रहे हैं। प्राचीन समय में शरीर की सुन्दरता के लिये उबटन, जड़ी-बूटियाँ इस्तेमाल की जाती थीं तो आजकल पुराने नुस्खों के साथ-साथ नए-नए सौंदर्य प्रसाधन तथा आधुनिक मशीनी उपकरणों से लेकर कास्मेटिक सर्जरी जैसे तरीके अपनाए जाते हैं।

पुराने समय में अप्सराओं, ऋषि-मुनियों और राजाओं की पत्नियों या उन की कन्याओं तक के अनुपम सौंदर्य की बेशुमार गाथाएं हैं। किस अप्सरा ने किस ऋषि पर अपनी खूबसूरती के डोरे डाले, किस ऋषि ने किस मुनि की पत्नी या कन्या की सुन्दरता पर रीझ कर उसे पाने की कोशिश की और कौन किस की पत्नी या पुत्री को भगा ले गया, इस तरह के बहुत से किस्से सुनने को मिलते हैं।

सौंदर्य के बल पर सुंदरियों द्वार साधु-संतों, तपस्वियों की तपस्या भंग होने की बेशुमार कथाएँ भरी पडी हैं। पुराने जमाने में अप्सराएं, ऋषि-मुनी, देवों की पत्नियों, पुत्रियों और आम औरतें सुन्दरता के लिये कौन सा साबुन, क्रीम, लोशन का इस्तेमाल किया करती थीं, वह आज की हीरोइनों, मॉडलों के सौंदर्य प्रचार की तरह खुलेआम सब को पता नहीं होता था।

यह तो ठीक है कि तेल, उबटन, क्रीम, लोशन जैसे सौंदर्य प्रसाधनों और आधुनिक मशीनी तरीकों से कुछ हद तक औरतों की सुन्दरता में निखर आ सकता है, लेकिन हमारे धर्मग्रंथों में सौंदर्य बढाने वाले ऐसे-ऐसे नुस्खे बताए बाये हैं जिन्हें 'चुटकुलों' के तरह पढ़ कर हँसते-हँसते लोटपोट हुआ जा सकता है। ग्रंथों में स्त्रियों को सुन्दर बनाने के अजीबो-गरीब नुस्खे, चमत्कारिक तरीके दिए गए हैं।

कुरूप दिखने वाले स्त्री ने नदी में स्नान किया और बस, अनुपम सौंदर्य धारण कर बहार निकली। किसी ने मंत्र पडा, हवन-पूजा की तो सौंदर्य से खिल उठा, ब्रह्मण को दान दिया तो औरत खूबसूरत हो गयी, विशेष व्रत किया तो रूपसी बन गई, किसी पुरुष के साथ हमबिस्तर हुई तो रूपवती हो गई। आइए, जानते हैं धर्मग्रंथों में लिखे कुछ ऐसे ही बेसिरपैर के अजीबो-गरीब सौंदर्य नुस्खे :

ब्रह्मपुराण में लिखा है, महर्षि भरद्वाज की बहन रेवती बहुत कुरूप थी। वह काठ नामक मुनि को ब्याह गई थी। वह एक बार गोदावरी में स्नान करने के लिये गयी और नदी से बाहर आई तो रूपवती हो कर निकली। जिस जगह रेवती ने स्नान कर सुन्दर रूप पाया था, वहां रेवती तीर्थ हो गया।

अब सुन्दर होना है तो हिन्दू धर्म के अनुसार किसी नदी में सही जगह ढूँढिये। सब संकट दूर। पता न हो तो ब्रह्मण से पूछिए। वह दान-दक्षिणा ले कर बता देगा।

महाभारत के आदिपर्व और विष्णु के अनुसार सत्यवती नाम की मछुआरे की कन्या में मछली  की गंध आती थी। इस कारण उसे मत्स्यागंधा भी कहते थे। महर्षि पराशर उस पर मुग्ध हो गए और मन्त्रों द्वारा उस की गंध दूर कर रूपवती योजनगंधा बना दिया। फिर उस के साथ समागम किया पर बाद में सत्यवती का विवाह शांतनु नामक राजा से हुआ। यदि शरीर की बदबू से परेशान हैं तो अपने धर्म की आन रखने के लिये किसी महर्षि के साथ सोइए, चाहे विवाह न किया हो और गंध गायब। क्या सौंदर्य उपचार है, क्या नैतिकता है हमारी पुरातनपंथी की।

महाभारत (शांतिपर्व) के मुताबिक सुलभा नमक एक ब्रह्मवादिनी स्त्री, जो वैदिककाल की कही जाती थी, वह सन्यासी कुमारी थी और योगधर्म के द्वारा इस पृथ्वी पर अकेली ही विचरण करती थी। उस ने योगशक्ति से अपना पहला शरीर त्याग कर दूसरा परम सुन्दर रूप धारण कर लिया। शायद इसीलिए हर योगी के चारोंओर बीसियों सुंदरियां दिख जाती हैं, पहले वे जरूर कुरूप रही होंगी और इच्छाधारी योगी जैसे के साथ योग शिक्षा लेने पर ही सुन्दर हुई होंगी।

मूर्खतापूर्ण नुस्खों की हद
यजुर्वेद में स्त्री के रूप सौंदर्या के लिये मन्त्रों को बताया गया है। 14वें  अध्याय में श्लोक है, 'हे सुखदायिनी स्त्री, तेरी विद्वान् प्रशंसा करें। तू सुन्दर रूप, संपत्ति और विद्याधन को प्राप्त करें'।
  (यजुर्वेद- चतुर्दश अध्याय-2)
आगे और मंन्त्र, 'हे स्त्री, स्तुतियों को जानने की इच्छुक, तू सुन्दर रूप एवं विपुल पदार्थ से युक्त हो। अश्विनी कुमार तुझे गृहस्थाश्रम में सुस्थापित करे।' (4)
इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तर पुराण में ब्रह्मवाक्य है : आरोग्यव्रत का अनुष्ठान भाद्रपद शुक्ल पक्ष के पश्चात आशिवन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से ले कर शरद पूर्णिमा तक होता है। इस के लिये दिन में कमल तथा विभिन्न किस्मों के पुष्पों से अनिरुद्ध की पूजा, हवन आदि करें। व्रत की समाप्ति से पूर्ण 3 दिन का उपवास है। इस से स्वस्थ्य, सौंदर्य तथा समृद्धी की उपलब्धि होती है।
हर मंत्र के लिये किसी ब्रह्मण की तो आवश्यकता होगी ही न। उस को दान देने पर हिचकिचाएं न, क्योंकि ब्यूटीपार्लर जाने से कम है यह खर्च।

सप्तसुन्दर नाम के व्रत का जिक्र भी है। कहा गया है कि इस व्रत में पार्वती का 7 नामों से पूजन करना चाहिए, वे नाम हैं - कुमुदा, माधवी, गौरी, भवानी, पार्वती, उमा तथा अम्बिका। 7 दिन बाद 7 कन्याओं को भोजन कराना चाहिए। प्रतिदिन 7 नामों में से एक नाम उच्चारण करते हुए प्रार्थना की जाए, जैसे 'कुमुदा देवि प्रसीद।' उसी प्रकार क्रमश: अन्य नामों का 7 दिन तक प्रयोग किया जाना चाहिए, 7वें दिन समस्त नामों का उच्चारण कर के पार्वती का पूजनादि के लिये गंध, अक्षत आदि के साथ ताम्बूल, सिन्दूर तथा नारियल अर्पित किया जाए, पूजन के उपरान्त प्रत्येक कन्या को एक दर्पण प्रदान किया जाए, इस व्रत के आचरण से सौंदर्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। (विष्णु धर्मशास्त्र)

दान देने से सौंदर्य
सौभाग्यशयन व्रत नाम के व्रत में चैत्र शुक्ल तृतीया को गौरी तथा शिव का पंचगव्य तथा सुगन्धित जल से स्नान करा कर पूजन करना चाहिए। 3 दिन पश्चात स्वर्ण प्रतिमाओं का दान दिया जाए, व्रत के अंत में सज्जा की सामग्री, सुवर्ण का गौ तथा वृषभ का दान करना चाहिए। इस से सौंदर्य तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है। चलें सुनार के यहाँ सोने की 100 गायें बनवाने।
सौन्दर्य प्राप्ति का एक और अजूबा चमत्कार महाभारत में कुब्जा की कथा में बताया गया है। मथुरापति कंस की दासी का नाम कुब्जा था। वह कुबड़ी थी। वह कंस के लिये चन्दन, सुगंध, अनुलेपन आदि लाने ले जाने का काम करती थी। धनुषयज्ञ में आते समय कृष्ण ने उसे देखा और मांगने पर उस ने उन्हें बड़ी प्रसन्नता से अनुलेपन आदि दिए, जिस से प्रसन्न हो कर श्रीकृष्ण ने 3 जगह से टेढ़ी कुब्जा को सीधी करने का विचार किया।
भगवान ने अपने चरणों से कुब्जा के पैर के दोनों पंजे दबाए और हाथ ऊंचा कर के 2 उंगलियाँ उस की ठोड़ी  पर लगाई तथा उस के शरीर को तनिक उचका दिया। उचकाते ही उस के सारे अंग सीधे और सुन्दर हो गए, प्रेम और भक्ति के दाता भगवान् के स्पर्श से वह तत्काल विशाल नितम्ब तथा पीनपयोधरों से युक्त एक खूबसूरत युवती बन गई। उसी क्षण कुब्जा रूप, गुण से संपन्न हो गई।

भगवत पुराण में ही सुदामा और उन की पत्नी की सम्पन्नता की कथा है। कथा के अनुसार गरीब सुदामा पत्नी के कहने पर अपने बालसखा श्रीकृष्ण से मिलने चावल की पोटली ले कर गए, श्रीकृष्ण से मिलकर लौटे तो उन की टूटीफूटी झोपडी की जगह भव्य महल खडा था और कुरूप दिखने वाली पत्नी कीमती वस्त्राभूषण धारण किये अत्यंत रूपवती नजर आने लगी थी।

अष्टांग संग्रह में सौंदर्य सामग्री का बेवकूफी भरा वर्णन भी है। आँखों में डालने वाले अंजन के बारे में लिखा है, मधुर अंजन के लिये स्वर्ण का, अम्ल के लिये चाँदी  का, लवण के लिये भेड़ के सींग का बना, तिक्त अंजन के लिये कांसी का, कटु अंजन के लिये बिल्लौर या पत्थर का बना पत्र, कषाय अंजन के लिये ताम्बे या लोहे का पात्र बनाना चाहिए। नडसर, कमल, स्फटिक, शंख आदि के बने पात्र में शीतल अंजन रखना चाहिए। इस प्रकार के पात्रों में अंजन निर्दोष गुण वाला रहता है। बर्ती में घिसने के लिये शिला अति चिकनी, बीच में नीची, घिसने पर जो घिसे नहीं, 5 उंगल लम्बी और 3 उंगल चौड़ी होनी चाहिए। अंजन ले लिये शलाका 5 प्रकार की होती है। (अष्टांग संग्रह : सूत्रस्थानाम - अध्याय  - 32)
इसी शास्त्र में सौंदर्य का एक और नुस्खा लिखा है, विधारे के फल का एक कर्ष, मधु और घृत भी एक कर्ष में ले कर पियें, ऊपर से गाय या भैंस का दूध पियें, फिर इच्छानुसार भोजन करें। 7 दिन सेवन करने से त्वचा रोगमुक्त हो कर सुन्दर होती है तथा रूप व बुद्धि बढ़ती है।

महाभारत में ब्रह्मण की पूजा करने से स्त्री को तप, बल, रूप व यश मिलने की बात लिखी है।
दीवाली से एक दिन पहले रूप चतुर्दर्शी के दिन महिलाएं शरीर में उबटन आदि लगा कर स्नान करती हैं। कहा जाता है कि इस दिन ऐसा करने से महिलाएं रूपवती हो जाती हैं।

सुन्दरता बढाने के लिये इस तरह के अनेक अंधविश्वासी नुस्खे प्रचलित हैं। धर्मग्रंथों के ये नुस्खे बेवकूफी की हद हैं। सवाल है कि क्या इस तरह व्रत, पूजा, अनुष्ठान, मन्त्रों से स्त्रियाँ अपना रूप संवार सकती हैं? क्या औरतों को सुन्दरता के लिये पूजापाठ, मन्त्रों में ही लीन हो जाना चाहिए? क्योंकि टेढ़े-मेढे अंगों को भगवन आ कर सीधा बना ही देंगे।

दरअसल, उस तरह के तरीके स्त्रियों में सुन्दर बनने व दिखने की इच्छा को भुनाने की कोशिशें हैं। सुन्दर नजर आना स्त्रियों की सदा से कमजोरी रही है। इसलिए आज भी सारे योगी व महंत सुन्दर स्त्रियों को अपने चारों ओर बनाए रखते हैं और वे सादगीपूर्ण नहीं चमचमाती नजर आती हैं।

असल बात तो यह है कि सौंदर्य बढाने के नाम पर धर्म के धंधेबाजों की यह चाल है ताकि औरतें रूपवती बनने के चक्कर में उन के शिकंजें में फंसी रहें। धर्मग्रंथों में सौंदर्य के नुस्खे सुन्दरता बढाने के लिये नहीं, औरतों के पर्स से पैसे निकलवाने के चालाकी भरे तौर-तरीके हैं।

गंगा तेरा पानी अमृत ( Ganga tera pani Amrit )

पवित्र गंगा का उद्गम स्थल है - गंगोत्री धाम। यह भारत के उत्तराखंड राज्य के उत्तर-काशी में स्थित है। यह हिन्दू धर्म के उत्तर दिशा में स्थित चार धामों में से एक है। गंगोत्री में प्रकृति का वैभवशाली सौंदर्य देखकर आनंद प्राप्त होता है। इस पुण्य भूमि में गंगा का महत्व है। वास्तव में यहां से लगभग १९ किलोमीटर आगे की ओर गंगोत्री ग्लेशियर पर गौमुख नामक स्थान से गंगा निकलती है। इस तीर्थ में गंगा को भागीरथी नाम से जानी जाती है। यहां से निकलकर गंगा जब अलंकनंदा से मिलती है, तो वह गंगा कहलाती है।

मूलत: गौमुख ही गंगा का उद्गम स्थल है। किंतु संभवत: गंगोत्री धाम की स्थापना के समय गंगोत्री से गोमुख तक का पूरा क्षेत्र बर्फ से ढका रहता होगा और गंगा इसी गंगोत्री धाम पर निकलती होगी। कालान्तर में बर्फ पिघलने से आज गंगा गौमुख से निकलती दिखाई देती है। वैज्ञानिक भी हिमालय क्षेत्र में बर्फ पिघलने की पुष्टि करते हैं। गंगोत्री का शाब्दिक अर्थ - वह स्थान जहां गंगा उतरी भी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं में गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने का उल्लेख है।

गंगोत्री मंदिर -

गंगोत्री में गंगाजी का भव्य और पवित्र मंदिर है। उत्तराखंड के इस तीर्थ के प्रति हर सनातन धर्म को मानने वाली की अपार श्रद्धा है। गंगाजी का यह मन्दिर गोरखा जनरल अमरसिंह थापा ने १९वी सदी की शुरुआत में बनवाया था। इस मंदिर का बाद में जीर्णोद्वार हुआ। वर्तमान मंदिर जयपुर के राजाओं द्वारा निर्मित माना जाता है। इसके आस-पास छोटा-सा नगर बसा है। मंदिर में गंगा और शंकराचार्य की मूर्तियां है। समीप ही एक शिला है जिसके बारे में माना जाता है कि इसी पर बैठकर भगीरथ ने गंगा को भू-लोक में लाने के लिए तप किया था। कुछ मान्यताओं के अनुसार पाण्डवों ने इस स्थान पर देव यज्ञ किया था।

गंगोत्री में साक्षात् बहने वाली गंगा मैया की और किनारे पर स्थित गंगा माता की मूर्ति की पूजा होती है। गंगा की मूर्ति पूजा के पीछे यही भाव है कि गंगा साक्षात् नदी तो है, किंतु गंगा की छबि भक्तों के हृदय में मां की तरह है। अत: मां और मूर्ति की साकार रुप में पूजा की जाती है।

अन्य दर्शनीय स्थल -

गंगोत्री में एक जल में डूबी शिवलिंग रुप में एक शिला है। जिसके पीछे मान्यता है कि यहां भगवान शिव ने स्वर्ग से उतरी गंगा को अपनी जटा में स्थान दिया था। गंगोत्री से ६ किलोमीटर दूर प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध नन्दनवन तपोवन भी है। प्राय: पर्वतारोहण करने वाले इसे अपना पड़ाव स्थल बनाते हैं। यहां से लगभग १९ किलोमीटर दूरी पर गोमुख के आकार की गुफा से गंगा निकलती है, जहां जाने के लिए पैदल यात्रा करनी होती है। गौरीकुण्ड और देवघाट भी यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थानों में एक है।

यहां प्राकृतिक दृश्यों में देवदार के ऊंचे वृक्ष, गंगा के प्रवाह का स्वर, शीतल बर्फीली हवाओं के झोंके और विशाल और ऊंचे पर्वत मन को मोहित करते हैं। यहां गंगा में असंख्य श्रद्धालु स्नान कर मन व तन को पवित्र करते हैं। गंगा को मोक्षदायिनी शक्ति के रुप में पूजा जाता है। गंगा में स्नान और दर्शन कर हर व्यक्ति मन ही मन स्वयं को बड़ा धन्य और सौभाग्यशाली मानता है। हर धर्म में पवित्र भावनाओं के साथ मौन प्रार्थना से कुछ पाने की चाह मान्य है। हिन्दू धर्म का तो सार ही इसी में समाया है।

परंपराएं -

गंगोत्री में मनाए जाने वाला सबसे मुख्य पर्व गंगा का प्राकट्य उत्सव होता है। यह ज्येष्ठ माह की दशमी को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है इसी दिन गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ। गंगोत्री के कपाट अक्षय तृतीया के दिन खुलते हैं। यह तिथि अप्रैल के अंतिम या मई के पहले सप्ताह में आती है। वहीं कपाट बंद होने का समय नवम्बर में दिपावली का शुभ दिन होता है। इसलिए यह दिन यहां उत्सव और समारोह के होते हैं। कपाट बंद होने के बाद प्रतिमा को समीप ही मुखवा गांव में ले जाया जाता है। यहां गंगा मां की पूजा अगले ६ माह तक की जाताी है और कपाट खुलने के समय उसी प्रतिमा को लाकर पुन: प्रतिष्ठित किया जाता है।

पहुंच के संसाधन -

गंगोत्री जाने के लिए वायु मार्ग, रेलमार्ग और सड़क मार्ग की सुविधा उपलब्ध है-

वायु मार्ग - गंगोत्री पहुंचने के लिए देहरादून और नई दिल्ली सबसे निकटतम हवाई अड्डे हैं। जहां पहुंचने के बाद रेल मार्ग या सड़क मार्ग से गंगोत्री पहुंचा जा सकता है।

रेल मार्ग - गंगोत्री जाने के लिए सबसे प्रमुख रेल्वे स्टेशन हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून है।

सड़क मार्ग - सड़क मार्ग से गंगोत्री हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून पहुंचा जा सकता है। हरिद्वार से गंगोत्री की दूरी २०० किमी, ऋषिकेश से १७७ किमी तथा देहरादून से २१२ किमी है।

08 जुलाई 2010

आपकी दोस्ती कहीं प्यार तो नहीं ( Not much love your friendship )



कब दो अजनबी दोस्ती की राह पर चलते-चलते प्यार के मोड़ तक पहुँच जाते हैं यह उन्हें खुद भी पता नहीं चलता। सच तो यह है कि हम यह भी नहीं समझ पाते कि जिसे हम सहज अपना दोस्त कह रहें हैं कहीं वह हमारा प्यार तो नहीं? हमें तो बस इतना पता होता है कि हमें उसका साथ, उसकी मौजूदगी अच्छी लगती है।
इसलिये आपकी दोस्ती कहीं प्यार तो नहीं?

जानिये के प्रश्नावली से हर सवाल का जवाब 'हाँ' या 'ना' में ही दें। हर 'हाँ' के लिये खुद को एक अंक दें और अंत में सबको जोड़ लें।

1.      क्या आपको खुद से ज्यादा अपने दोस्त की चिंता रहती है?

2.      क्या आप दोस्त से मिलने के लिये समय से पहले पहुँच जाते हैं?

3.      दोस्त से मिलने जाने से पहले आप खुद तय नहीं कर पाते कि क्या पहनना है क्या नहीं?

4.      मिलने पर किन विषयों पर बात करनी है तथा किन प्रशनों आदि का जिक्र करना है, इन सबको पहले से सोच लेते हैं?

5.      क्या बातें करते समय आप सिर्फ दोस्त के पूछने पर ही जवाब देते हैं?

6.      हर अगली मुलाक़ात के लिये आप तत्पर तथा बेचैन रहते हैं?

7.      आप अपने दिल की बात अपने दोस्त से किसी तीसरे के जरिये व बहाना बनाकर करते हैं?

8.      फोन के पास बैठकर आप अपने दोस्त के काँल का इंतज़ार करते हैं?

9.      किसी से अपने दोस्त का जिक्र व नाम सुनकर आपके चेहरे पर रंगत छा जाती है?

10.      सार्वजनिक स्थानों से निकलकर क्या आपकी, अपने दोस्त से कहीं तन्हाई में मिलने की इच्छा होती है?

11.      मुलाक़ात के समय आपको समय का पता ही नहीं चलता तथा आपको यह महसूस होता है कि आप घर जल्दी जा रहे हैं?

12.      बहुत कुछ कह कर भी ऐसा लगता है जैसे आपने कुछ भी कहा ही नहीं?

13.      क्या आपको त्योंहारों से ज्यादा दोस्त के जन्मदिन के आने का इंतज़ार रहता है?

14.      जब भी आप शाँपिंग पर जाते हैं तो दोस्त के लिये कुछ सरप्राइज गिफ्ट जरूर लेते हैं?

15.      आपको अपने बीच तीसरे का जिक्र या मौजूदगी आफत लगती है?

5 वायदें जो अक्सर टूट जाते हैं ( 5 Promises which often breaks )


अक्सर देखा गया है कि इंसान जब प्यार में पड़ता है तो पूरी तरह से बदल जाता है और अपने को परफेक्ट बनाने के चक्कर में अपनी खराब आदत को बदल लेने का निर्णय कर लेता है पर कुछ समय बाद ताश के पत्तों की तरह वायदें धराशायी हो जाते हैं।

समय पर पहुंचेंगे
इस तरह का वायदा हर लड़का व लड़की एक दूसरे से कई बार करते हैं, पर हर बार तोड़ते हैं। इस समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार से करें।
समाधान : अगर आपने अपने साथी से मिलने का वादा किया है तो समय पर पहुंचें। अगर किसी कारणवश आप टाइम से नहीं पहुँच सकते तो इसकी सूचना पार्टनर को जरूर दें। झूठे बहाने बनाकर उन्हें मनाने की कोशिश भूलकर भी न करें, क्योंकि एक न एक दिन इस झूठ का राज तो जरूर खुलेगा।

लड़ाई-झगडा नहीं करेंगे
अक्सर देखा जाता है कि प्रेमी-प्रेमिका के बीच लड़ाई ज्यादा होती है, प्यार कम। लड़ाई का कोई मतलब नहीं होता, पर फिर भी छोटी-छोटी बातें कब बड़ा रूप ले लेती हैं पता नहीं चलता। जब झगडा ज्यादा बढ़ जाता है तो दोनों एक-दूसरे से वायदा करते हैं कि आगे ऐसा दोबारा नहीं होगा। पर कुछ दिनों बाद फिर लड़ाईयां शुरू हो जाती हैं।
समाधान : एक बात का ख़ास ध्यान रखें कि जब भी मिलें तो एक-दूसरे से कोई भी ऐसी बात न करें, जिससे झगड़ा हो। अगर आपको लगे कि किसी बात से पार्टनर नाराज है तो उसकी नाराजगी दूर करें। छोटी-मोटी नोंक-झोंक से बचें।

कोई बात नहीं छुपाएंगे
प्यार में पार्टनर एक-दूसरे से कुछ न छुपाने की कसम खाते हैं, पर ली गयी कसम कब चूल्हे में भस्म हो जाती है, उन्हें भी नहीं पता चलता और जब पता चलता है तो फिर दोबार वायदे किये जाते हैं, पर थोड़े दिन में विफल हो जाते हैं।
समाधान : अगर आपने वायदा किया है तो उसे पूरी तरह से निभाएं। कोशिश यहीं करें कि छोटी-छोटी बात उनसे शेयर करें। अगर वो छोटी-छोटी बातों को नहीं सुनती तो उन्हें समझाएं कि आपकी बातों को वो गंभीरता से लें, ताकि आप उनसे कुछ न छुपा पायें। अगर कुछ बातों को सुनकर वो नाराज होती हैं तो मौक़ा देखकर बोलें।

जिन्दगी भर साथ निभाएंगे
साथ निभाने का वादा करके प्यार के परवाने कब अलग होने का फैसला कर लेते हैं उन्हें भी पता नहीं होता। आज कई लोग सिर्फ टाइमपास के लिए प्यार करते हैं। साथ न निभाने का वायदा लड़के ही ज्यादा तोड़ते हैं, क्योंकि वो भावनात्मक रूप से सीरियस नहीं होते हैं, जिसके कारण रिश्ता बीच मझधार में अटक जाता है।
समाधान : जिंदगी में प्यार बहुत कम लोगों को मिलता है और जिनको मिलता है वो बहुत भाग्यशाली होते हैं, इसलिये इससे दूर होने के बजाये अपनाने की कोशिश करें। प्यार इंसान को कहाँ से कहाँ पहुंचा देता है, सिर्फ सच्चा प्यार ही जानता है। इसलिये अपने पार्टनर को इस तरह धोखा न दें। आप दोनों को अगर लगे कि रिश्ते में दूरियां बढ़ रही हैं, तो उसे दूर करने की कोशिश करें। रिश्ते को किसी तीसरे के कारण न बिखरने  दें, बल्कि सहेज कर रखने का प्रयास करें।

मिलकर करेंगे बचत
अक्सर यही होता है कि बचत करने का वायदा करते हैं, पर बचत नहीं हो पाती। शादी से पहले एक-दूसरे को सरप्राइज गिफ्ट, घुमाने-फिराने में बजट बिगड़ जाता था, पर शादी के बाद भी वही हाल रहता है।
समाधान : सबसे पहले प्लान बनाकर चलने कि हमें कितना खर्च करना है। अगर आप डेटिंग पर जा रहे हैं तो ऐसी जगह चुनें जो ज्यादा महँगा न हो। बेमतलब में एक-दूसरे को उपहार न दें। दोनों लोग मिलजुल कर खर्चा करें।

भारत का अनमोल रतन ( India's Anmol Ratan )

रतन टाटा, एक ऐसी शख्सियत हैं, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि अगर आपमें प्रतिभा है, तो आप देश में रहकर भी ऐसे शिखर पर पहुँच सकते हैं, जहाँ हर भारतीय आप पर नाज करे। रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को मुंबई में हुआ था। कैपियन स्कूल से शुरूआती पढाई करने के बाद रतन टाटा ने कार्निल यूनिवर्सिटी, लंदन से आर्किटेक्चर एंड स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और फ़िर हार्वड विश्वविघालय से एडवांस मैनेजमेंट प्रोग्राम कोर्स किया। उन्हें प्रतिष्टित कंपनी आईबीएम से नौकरी का बढिया प्रस्ताव मिला, लेकिन रतन ने उस प्रस्ताव को ठुकराकर अपने पुश्तैनी बिजनेस को ही आगे बढाने की ठानी।

उन्होंने अपने कैरियर के शुरूआती दिनों में नेल्को और सेंट्रल इंडिया टेक्सटाइल जैसी घाटी की कंपनियों को संभाला और उन्हें प्रांफ़िटेबल यूनिट में बदल कर अपनी विलक्षण प्रतिभा को सबके सामने पेश किया। फ़िर साल दर साल उन्होंने अनेक क्षेत्रों में टाटा का विस्तार किया और सफ़लता पाई।

देश की पहली कार जिसकी डिजाइन से लेकर निर्माण तक का कार्य भारत की कंपनी ने किया हो, उस टाटा इंडिका प्रोजेक्ट का श्रेय भी रतन टाटा के खाते में ही जाता है। इंडिका के कारण विश्व मोटर कार बाजार के मानचित्र पर उभरा है।

1991 में वह टाटा संस के अध्यक्ष बने और उनके नेतृत्व में टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर, टाटा टी, टाटा केमिकल्स और इंडियन होटल्स ने भी काफ़ी प्रगति की। टाटा ग्रुप की टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) आज भारत की सबसे बडी सूचना तकनीकी कंपनी है। वह फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन के बोर्ड आंफ़ ट्रस्टीज के भी सदस्य हैं।
कंपनी के नियमानुसार 65 वर्ष की उम्र पार कर लेने के बाद वह पद से तो रिटायर हो गए, पर काम करने का जुनून अभी भी उन पर हावी है और उनकी अगुवाई में टाटा के कंपनियां नए आयामों को छू रही हैं।

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएल) और टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों को बुलंदी पर पहुंचाकर अब रतन देश के मध्यम्वर्गी लोगों के लिए सस्ती कार के ख्वाब को पूरा करने में लगे हैं। रतन टाटा बाजार में एक लाख रूपय कीमत की कार लांन्च करने की तैयारी कर रहे हैं, जो कार खरीदने का सपना रखने वाले आम भारतीयों के लिए उनका तोहफ़ा होगी। वर्सेटाएल पर्सेनैलिटी रतन को देश के साथ ही विदेशों में भी सशक्त उघोगपति माना जाता है। उन्हें मित्सुबिशी कांरपोरेशन, अमेरिकन इंटरनेशनल ग्रुप, जेपी मांर्गन चेज, बूज एलन हैमिल्टन इंक जैसी विदेशी कंपनियों में भी रतन टाटा को जगह मिली, साथ ही साथ इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट काउंसिल, न्यूयांर्क स्टांक एक्सचेंच के निदेशक मंडल की एशिया पैसिफ़िक एडवाइजरी कमेटी, बिल एण्ड मिलिंडा गेटस फ़ाउंडेशन, रैंडस सेंटर फ़ांर एशिया पैसिफ़िक पांलिसी आदि से भी रतन टाटा से गहरा जुडाव रहा है।

भारतीय रिजर्व बैंक के सैंट्रल बोर्ड और व्यापार-उघोग से संबंधित काउंसिल में भी रतन टाटा ने अहम भूमिका निभाई है। देश में निवेश बढाने के लिए गठित कमेटी के वह अध्यक्ष भी रहे हैं। उनकी इन सेवाओं के कारण 2000 में उन्हें पदम्भूषण से सम्मानित किया गया है।


इन्हें भी देखें :-
एक सपना जो सच हो गया
दिल में हो जज्बा, तो दुनिया...

श्रीविद्या उपासना

अखिल चराचर जगत की अघिष्ठात्री शक्ति की महत्ता मातृ सत्ता के रूप में भारतीय वनाद्गमय में वर्णित है। वही शक्ति विश्व का सृजन, पालन, संहार, निग्रह एवं अनुग्रह इन पंच कर्मो की नियामिका है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड की केंद्रभूता यही शक्ति शरीर में अंतर्निहित प्राण शक्ति है। इसे ही योगियों की भाषा में चेतना शक्ति अथवा कुंडलिनी शक्ति कहा गया है। अखिल ब्रह्माण्ड की प्रतीकात्मक आकृति है श्री-यंत्र।

श्रीयंत्र के मध्य बिंदु में विराजमान भगवती महात्रिपुरसुन्दरी श्री श्रीविद्या के नाम से जानी जाती हैं। इन्हें मणिपुर-द्वीप वासिनी भी कहा जाता है। श्रीविद्या धाम,इंदौर में मां की इसी इसी विश्वमोहनी स्वरूप की प्रतिष्ठा की गई है।

स्वामी गिरिजानंदजी सरस्वती का इसकी स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान है।महात्रिपुरसुंदरी का यह मंदिर श्री यंत्र की रचना के आधार पर अष्टकोणीय है, जिसके मध्य में पंच प्रेतासन पर राजराजेश्वरी जगज्जननी मां पराम्बा ललिता महात्रिपुर संुदरी श्री विद्या विराजमान हैं। सिंहासन के चार आधार-स्तम्भ के रूप में चार देव ब्रह्मा, विष्णु,रूद्र एवं इर्शान हैं। पर्यड्क पर योगिराज शिव लेटे हैं, जिनकी नाभि से निकले सहस्रदल कमल पर मातेश्वरी आसीन हैं। श्रीश्रीविद्या का स्वरूप षोडश वर्षीया बालिका का है,जिनके चार हाथ एवं तीन नेत्र हैं। भगवती ने चारों हाथों में क्रमश: इक्षु-धनुष, पंच पुष्पबाण, पाश एवं अंकुश धारण किए हैं। मुख मण्डल प्रसन्न है तथा वाम नेत्र से भगवान सदाशिव को देख रही हैं। सदगुरू के श्रीमुख से प्राप्त की जाने वाली श्रीविद्या की दीक्षा ही साधना में सफलता दिलाती है। गुरू कृपा से फलीभूत होती है। श्री विद्या उपासना करने से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

ऎसे करें पूजन
माघ पूर्णिमा को भगवती राजराजेश्वरी महात्रिपुर सुंदरी मां श्री विद्या की पूजा मां के स्वरूप श्री यंत्र में करें। पूर्वाभिमुख होकर बैठें। लाल आसन का प्रयोग करें। शुद्ध और स्वच्छ वस्त्रों को स्त्रान करके धारण करें। शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। स्वर्ण,रजत,कांस्य अथवा पीतल के स्वच्छ पात्र में श्रीयंत्र की स्थापना करनी चाहिए। पुष्पों,अक्षत,गुलाब जल की बूंदों से माता को आसन देकर श्रीयंत्र स्थापित करना चाहिए।भगवती के नाम से श्री यंत्र के ऊपर श्रीविद्या का आह्वान करें। तीन बार पृथक पृथक जल चढ़ाएं। पंचामृत स्त्रान करवाएं। इसके बाद तीर्थ जल से मां को स्त्रान करवाना चाहिए। चंदन-केसर से भी श्री यंत्र को स्त्रान करवाना चाहिए। इत्र, गुलाब जल से भी स्त्रान कर मां को प्रसन्न करना चाहिए। श्री सूक्त से मां का अभिषेक दूध या गुलाब जल, गंगा जलादि अथवा गन्ने के रस से करना चाहिए। नए और शुद्ध वस्त्र से श्री यंत्र का प्रोक्षण कर स्थापित करें। पंच रंग का धागा यानी कलावा मां को अर्पित करें। इसके पश्वात श्रद्धापूर्वक मां को चंदन, केसर,अक्षत, बिल्व पत्र,कुंद,जूही, गुलाब, हार श्रृंगार ,चंपा (मां को विशेष प्रिय),कमल के फूल अथवा माला चढ़ाएं। कुंकुम-चावल, हलदी,अबीर,गुलाल, मेंहदी आदि सौभाग्य वस्तुएं जगत जननी को अर्पित करें।

मंत्र जप
अति गोपनीय और गुरू मुख से ग्राह्य श्रीविद्या की दीक्षा के अभाव में जन सामान्य इन मंत्रों से मां का जप करना चाहिए-
या देवी सर्वभूतेषु श्रीविद्यारूपेण संश्रिता।
नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमस्त्स्यै नमो नम:।।
श्री ललिता अम्ब्कायै नम:।

श्रीविद्यायै नम:।
श्रीमत्त्रिपुर सुन्दरायै नम:।
श्री चक्रराज निलयायै नम:।

श्रीविद्या पूजन के तीन भेद हैं। यथा परापूजा,परापरा पूजा और अपरापूजा। परापूजा यह ज्ञान है। परापरा पूजा यह भक्ति है। अपरापूजा यह कर्म है। इस विद्या के फल की ओर दृष्टि रखकर उपासना करने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती है। फल की अपेक्षा रखे बिना उपासना करने से जल्दी सिद्धि प्राप्त होती है। ऎसा सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद में कहा गया है।

आरती
जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे
मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे।। हरि ऊं जय देवि...
प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाद्ये
पारावारविहारिणि नारायणि ह्वद्ये।
प्रपंचसारे जगदाधारे श्रीविद्ये
प्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये ।। 1 ।। हरि ऊं जय देवि॥
दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदने
पदनखनिर्जितमदने मधुकैटभकदने।
विकसित पंकजनयने पन्नगपतिशयने
खगपतिवहने गहने संकटवन दहने ।। 2।। हरि ऊं जय देवि॥
मंजीरांकित चरणे मणिमुक्ताभरणे
कंचुकिवस्त्रावरणे वक्त्राम्ब्ाुजधरणे।
शक्रामयभय हरणे भूसुर सुखकरणे
करूणां कुरू मे शरणे गजनक्रोद्धरणे ।। 3।। हरि ऊं जय देवि॥
छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान्
ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूषं विबुधान।
विहरसि दानव ऋद्धान् समरे संसिद्धान्
मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान् ।। 4।। हरि ऊं जय देवि॥

07 जुलाई 2010

तुलसी से महकाएं बगिया

तुलसी के महत्व से लोग अनजान नहीं हैं। तुलसी के पत्ते से बने काढ़े का प्रयोग सर्दीजुकाम व सामान्य बुखार में सदियों से किया जा रहा है, इसीलिय हर घर में तुलसी का पौधा लगाना भारतीय परम्परा रही है।

आसीमम केनाम : इसे वन तुलसी भी कहा जाता है। वनस्पतिक विज्ञान में यह आसीमम केनाम के नाम से जानी जाती है। इस का पादप एकवर्षीय रोमयुक्त होता है। तथा छोटा होता है। पत्तियाँ हलके हरे रंग की होती हैं।

आसीमम ग्रेतीसीनाम : तुलसी पादप की सभी जातियों में यह सब से बड़ी होती है। इस के पुष्प सफ़ेद रंग के होते हैं। इसे अर्जक नाम से भी जाना जाता है।

आसीमम सेंतम : इसे तुलसी गौरी या वृंदा के नाम से भी जाना जाता है। आसीमम सेंतम इस का वनस्पतिक नाम है। इस की शाखाएं सीधी एवं फ़ैली हुई होती हैं।

आसीमम बेसीलिकम : तुलसी की सभी जातियों में यह सब से अधिक तीक्ष्ण खुशबु वाली है। इसे आम बोलचाल की भाषा में ’मरूहा’ के नाम से जाना जाता है। ’अजगंधिका’ या ’मरूबक’ नाम भी इस जाति के लिए प्रचलित हैं। इस के फ़ूल बैंगनी रंग के होते हैं। इस की शाखाएं हरी या फ़ीके पीले रंग की होती हैं।

आमतौर पर तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल कफ़, कृमि या वमन के नष्ट करने में किया जाता है। श्याम तुलसी का उपयोग रक्तदोष, ज्वर, वमन, कृमि आदि को समाप्त करने में करते है। ’मरूहा’ की तेज गंध घरों में मच्छरों को भगाती है।

घर में या बगिया में तुलसी का पौधा आसानी से लगाया जा सकता है। इसलिए तुलसी के पौधे को गमले में भी लगाया जा सकता है। एक बार तुलसी के पौधे को लगा देने के बाद पौधे से परिपक्व बीज गिर कर अंकुरित हो नए पौधे का निर्माण कर लेते हैं। तुलसी के पौधों का निर्माण कर लेते हैं। तुलसी के पौधों का निर्माण कर लेते हैं। तुलसी के पौधों को बढवार के लिए किसी विशेष खाद की जरूरत भी नहीं है। सिर्फ़ आप की थोडी सी देखभाल से तुलसी आप की बगिया को महका सकती है।

06 जुलाई 2010

महाभारत - पाण्डवों तथा कौरवों का जन्म

एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों - कुन्ती तथा माद्री - के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये मृग ने पाण्डु को शाप दिया, "राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।"

इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले, "हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहूँगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़" उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, "नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।" पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।

इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा, "राजन्! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता अतः हम आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।"

ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले, "हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?" कुन्ती बोली, "हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ। आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ।" इस पर पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।

एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।

इधर युधिष्ठिर के जन्म होने पर धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी के हृदय में भी पुत्रवती होने की लालसा जागी। गान्धारी ने वेदव्यास जी से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर लिया। गर्भ धारण के पश्चात् दो वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी जब पुत्र का जन्म नही हुआ तो क्षोभवश गान्धारी ने अपने पेट में मुक्का मार कर अपना गर्भ गिरा दिया। योगबल से वेदव्यास को इस घटना को तत्काल जान लिया। वे गान्धारी के पास आकर बोले, "गान्धारी तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र सौ कुण्ड तैयार कर के उनमें घृत भरवा दो।" गान्धारी ने उनकी आज्ञानुसार सौ कुण्ड बनवा दिये। वेदव्यास ने गान्धारी के गर्भ से निकले मांसपिण्ड पर अभिमन्त्रित जल छिड़का जिसे उस पिण्ड के अँगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गये। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गान्धारी के बनवाये सौ कुण्डों में रखवा दिया और उन कुण्डों को दो वर्ष पश्चात् खोलने का आदेश दे अपने आश्रम चले गये। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुण्ड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। दुर्योधन के जन्म के दिन ही कुन्ती का पुत्र भीम का भी जन्म हुआ। दुर्योधन जन्म लेते ही गधे की तरह रेंकने लगा। ज्योतिषियों से इसका लक्षण पूछे जाने पर उन लोगों ने धृतराष्ट्र को बताया, "राजन्! आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा। इसे त्याग देना ही उचित है। किन्तु पुत्रमोह के कारण धृतराष्ट्र उसका त्याग नहीं कर सके। फिर उन कुण्डों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दुश्शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ। गान्धारी गर्भ के समय धृतराष्ट्र की सेवा में असमर्थ हो गयी थी अतएव उनकी सेवा के लिये एक दासी रखी गई। धृतराष्ट्र के सहवास से उस दासी का भी युयुत्स नामक एक पुत्र हुआ। युवा होने पर सभी राजकुमारों का विवाह यथायोग्य कन्याओं से कर दिया गया। दुश्शला का विवाह जयद्रथ के साथ हुआ।