15 जुलाई 2010

स्वार्थ पर न टिके प्यार की नींव ( Love is not dependent on interest )


आज के इस भौतिकवादी युग में प्यार ढूँढने जाएँ तो कोसों दूर नहीं मिलता, क्योंकि प्यार का स्थान स्वार्थ ने ले लिये है। आज प्रेम भी वहीं दिल लगाना चाहते हैं जहान पर उन्हें फायदा दिखाई देता है। जिस तरह कई शादियों की नीवं दहेज़ पर टिकी होती है, ठीक उसी तरह आज के जमाने में प्यार की नींव स्वार्थ पर टिकी है। आज के युग में 1-2 वर्ष पुराना प्रेम ओल्ड फैशन हो गया है। यो लोग भूले-भटके किसी के प्यार में अपनी जिन्दगी दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हैं वे बेवक़ूफ़ वे पागलों में गिने जाते हैं।

यह सत्य है की आज प्रेम के बारे में उनका ज्ञान कच्चा है। इस जीवन के बारे में लोगों का ज्ञान केवल पारिवारिक अनुभवों या हिंदी फिल्मों में दिखाए गए दृश्यों तक ही सीमित रहता है।

प्रारंभ का प्रेम
प्यार के शुरूआती महीने में हर मौसम सुहान और जीवन का हर रंग खूबसूरत लगता है। इस दौरान गर्लफ्रेंड और ब्वायफ्रेंड एक-दूसरे के प्रति अत्यंत आकर्षित रहते हैं। वे एक- दूसरे के प्रति उदार, सहयोगी और हाथों-हाथ लेने का भाव प्रदर्शित करते हैं, ताकि जीवनसाथी को लगे की वह दुनिया का सर्वाधिक भाग्यशाली व्यक्ति है। इस दौरान कटु अनुभव होने की गुंजाइश बहुत कम होती है। यह सुहाना सफ़र कितना लंबा होगा यह तो अलग जोड़ों की अवस्था पर निर्भर करता है। कपल्स जो एक दूसरे से कम उमीदें रखते हैं उनका प्रेम अधिक समय तक टिकता है। लेकिन वे लोग जो यह सोचते हैं की प्यार में समझौता की कोई आवश्यकता नहीं है और सेक्स का मतलब सिर्फ प्यार है वे जल्द ही प्रेम से वंचित हो जाते हैं।

प्यार से पहले समझौता या अलगाव
प्यार अगर ताकत है तो प्यार कमजोरी भी है। अगर प्यार में इंसान अपनी भावनाओं के तहत कमजोर होता जाता है तो रिश्ता चाहे कोई भी हो सामने वाला इंसान उसका फायदा जरूर उठता है। फिर चाहे वह प्रेम माँ-बाप का बच्चों के प्रति हो या पति या पत्नी का अपने पार्टनर के प्रति हो।

प्रेमा बताती है, 'मेरा प्रेमी विवेक निहायत ही शरीफ और समझदार इंसान है। लड़कियों के साथ खासतौर से उसका व्यवहार शालीन भरा है। उसके किसी गुण के कारण ही उसकी तरफ आकर्षित हो गई। चूंकि में उसे मन ही मन चाहती थी। इसलिए विवेक की हर बात मानती थी। उसे भी इस बात की जानकारी थी की मैं उससे प्यार करती हूँ। इसलिए वह मुझे ऐसे रोब मारता था की मैं उसकी पत्नी हूँ। 'मेरे प्यार का फायदा उठाते हुए वह हमेशा मनमानी करता था। जब उसका दिल चाहता मुजस से मिलने आ जाता था लेकिन मेरे मिलने के लिये बुलाने पर वह कभी नहीं आता था। इस व्यवहार ने मुझे झकझोर कर रख दिया, फिर भी मैं चुप थी। लेकिन काफी वर्षों तक भी जब उसने मुझे शादी के लिये प्रपोज नहीं किया तो मैं भी उसे छोड़ने का फैसला कर लिया। दो महीने तक मैंने उससे बात तक नहीं की। मेरे इस व्यवहार ने उसका दिमाग खोल दिया। अब वह खुद मुझसे मिलने के लिये बेताब रहने लगा। एक दिन शाम को उसने मुझसे शादी के लिये प्रपोज कर दिया। इस समय हम दोनों पति-पत्नी के रूप में खुशी से जीवन का मजा ले रहें हैं।'

इस प्रकार हम देखते हैं की यह चारण जीवन के दोराहे पर लाकर खडा कर देता है, जहाँ से दो रास्ते दिखाई पड़ते हैं 'समझौता' या 'अलगाव'। जीवन की इस अवस्था में सभी जोड़ों को अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि एक भी गलत फैसला उन्हें हमेशा के लिये अलग कर सकता है। यहाँ दूसरे की गलतियों पर चीखने-चिल्लाने की जगह जीवनसाथी को उसकी कमियों के साथ स्वीकार करने की भावना जीवन को स्थायी बनाने का काम करती हैं, जबकि इसके विपरीत प्रतिक्रया सम्बन्ध विच्छेद या अलगाव की राह पर ले जाती है। जो कपल्स जीवन का आनंद उठाना चाहते हैं वे समझदारी से काम लेते हुए टकराव की परिस्थितियों को ढालने में रुचि दिखाते हैं। वे जीवन की इस वास्तविकता को समझ लेते हैं की परिवर्तन प्रकृति का नियम है और नई जिम्मेदारियां, नए अनुभवों को सहर्ष स्वीकार करते हैं। वे जीवनसाथी पर फैसलों को थोपने की जगह उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उससे कुछ सार्थक सीखने का प्रयास करते हैं।

संबंधों में दरार तर्क से पड़ती है
हर सम्बन्ध में मतभेद होते हैं और इन पर बहस होती है। इश्क होने का मतलब यह नहीं होता की कपल्स के दिमाग भी एक हो गए हैं। हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है और कोई भी कपल्स हर समय हर बात पर सहमत नहीं हो सकते हैं।
तर्क से बचने के लिये चुप्पी साधना कोई हल नहीं हैं, लेकिन बहस को कटु होने से जरूर बचना चाहिए। देखा जाए तो स्वस्थ बहस की तुलना में चुप रहकर मन में घुटते रहना दाम्पत्य जीवन को अधिक नुक्सान पहुंचाता है।
आप जितनी अधिक गलतियाँ निकालेंगे जीवनसाथी खुद को न बदलने के लिये उतना ही दृढ प्रतिज्ञ होता जायेगा।
अगर आप अपने जीवनसाथी को वाकई बदलना चाहते हैं तो उसके सकारात्मक पहलुओं की इमादारी से प्रशंसा कीजिये। आप पायेंगे की कुछ समय बाद नकारात्मक पहलुओं में स्वतः कमी आनी शुरू हो गई है।
जीवन में जीवनसाथी से कोई भी बात न छिपाना निःसंदेह एक आदर्श विचार है, लेकिन सच यह है की हर बात बता देना आप दोनों को करीब लाने की गारंटी नहीं है।

सही जानकारी का पता न चलना
अब तो अधिकतर प्यार इन्टरनेट के जरिये हो रहा है। अब पहले जमाने की तरह खानदान का विस्तार तो रहा नहीं, परिवार सिमटकर पति-पत्नी और दो बच्चों तक रह गया है। ऐसे में प्यार के लिये जांच-पडतान करवा पाना भी मुश्किल होता जा रहा है। इन्टरनेट में बहुत बातें छिपा दी जाती हैं, इसलिए शादी के लिये जल्दबाजी न करें जब तक सामनेवाले पक्ष के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त न कर लें, तब तक रिश्ता तय न करें।

उमा बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी। उसने जल्दबाजी में रेलवे में नौकरी करते लड़के से शादी कर ली। लड़का तुषार देखने में काफी स्मार्ट था। उमा भी सुंदर जीवनसाथी पाकर खुश थी। जब तीन साल गुजर गए और संतान पैदा नहीं हुआ तो सास ने ताना मारना शुरू कर दिया। उमा ने डाँक्टर को दिखाया लेकिन डाँक्टर डीपी राय ने उमा में कोई कमी नहीं पायी। यह सुनकर उमा की चिंता तो दूर हो गई, लेकिन उसने रात को एक दिन तुषार को भी चेकअप  कराने को कहा। इस पर तुषार तुनक गया. उल्टी-सीधी बातें करने लगा। वह तो उलटे उमा को ही खरी-खोटी सुनाने लगा।

समय बीतता गया। उमा कुंठित सी हो गई। आखिरकार एक दिन सच सामने आ ही गया। तुषार के एक पुराने फ़ाइल में उमा को उसका मेडिकल चेकअप मिल गया। उसकी रिपोर्ट के अनुसार तुषार नपुंसक था। उमा के तो होश ही उड़ गए। अब उसको पिछले दिनों की सारी बातें याद आने लगी। उसका पति एक-एक बहाना बना कर उससे दूर क्यों रहता था, तब बात उसको समझ में आ गई।

ऐसा नहीं है की किसी में कमी नहीं होती, लेकिन यदि इन कमियों को सही रूप में पहले ही सामने रख दिया जाए तो शायद बाद में सब ठीक हो जाएगा। आजकर थोड़ा बहुत झूठ बोलना तो आम बात हो गई है, लेकिन झूठ ऐसा न हो की वह रिश्तों को बिगाड़ दे, या मन में हमेशा के लिये गाँठ पड़ जाए। झूठ और अविश्वास की नींव पर रचे गए संबंधों में न तो स्थिरता होती है और न ही मधुरता।

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