12 अप्रैल 2010
पुरातात्विक उत्खनन, बेसनगर ( विदिशा)
प्राचीन समय में साँची भी बेसनगर का महत्वपूर्ण अंग था। प्राचीन समय में साँची भी बेसनगर का महत्वपूर्ण अंग था। बेसनगर स्थित हिलियोडोरस स्तम्भ (खाम्बबा) से वैष्णव धर्म के विषय में जानकारी प्राप्त होती है तथा ऐसा भी ज्ञात होता है क़ी विदिशा में भागभद्र के दरबार में तक्षिला से यावंदूत हिलियोडोरस और उसने वैष्णव धर्म की अच्छाइयों को देखकर भागवत धर्म स्वीकार कर विष्णु मन्दिर का निर्माण करवाया तथा गरुड़ स्तम्भ की स्थापना की थी। मगध के शासक पुष्यमित्र शंगु के समय विदिशा पश्चिम क्षेत्र की राजधानी मानी जाती थी। शंगुकाल में साँची के स्तूप का विकास हुआ था। विदिशा (बेसनगर) में हाती दांत का कार्य अधिक होता था। साँची स्तूप की चारों दिशाओं में तोरण द्वार निर्मित किये गए जो हीनयान कला के महत्वपूर्ण उदहारण मानेज जाते हैं। कालिदास रचित मेघदूत तथा मालविकाग्निमित्रम में इस क्षेत्र की भौगोलिक तथा तत्कालीन घटनाओं का वर्णन किया गया है। उन्होंने वेत्रवती (बेतवा) का बहुत सुंदर वर्णन किया है।
बेसनगर का क्षेत्र सातवाहन, कुषाण, पद्मावती (पवाया) के भारशिव नागवंशी शाशकों के अंतर्गत रहकर बहुत ही विकसित हुआ। गुप्तकाल में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वित्य की मालवा विजय के उपलक्ष्य में विदिशा के निकट उदयगिरी में गुफाओं का निर्माण हुआ जिनके अभिलेख गुफाओं में देखने को मिलते हैं। बेसनगर के दुर्जनपुर से प्राप्त रामगुप्त के समय की तीन जैन प्रतिमाओं की पादपीठ पर उत्कीर्ण लेख से गुप्त सम्राट रामगुप्त के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। विदिशा के भैसला नाम से यह निष्कर्ष निकाला गया क़ी बेतवा के तट पर भिल्ल्स्वामी (सूर्य) का विशाल मन्दिर था, परन्तु यह मन्दिर कहाँ था, ज्ञात नहीं हो सका है।
दसवीं-ग्यारवीं शताब्दी के पश्चात विदिशा बेसनगर से हटकर वर्तमान विदिशा क्षेत्र में बस गया, जिसका विकसित स्वरुप आज विधमान है। प्रतिहार, परमार तथा मालवा के सुल्तानों के पश्चात विदिशा का यह क्षेत्र ग्वालियर के मराठा शासकों (सिंधिया) के अंतर्गत आकर बहुत विकसित हुआ। नया विदिशा बसने का एक प्रमुख कारण यह भी माना जाता है कि बेस तथा में निरंतर बाढ़ आती रही। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस क्षेत्र में कई स्थानों पर किये गए पुरातात्विक उत्खनन से ये तथ्य उजागर हुए हैं। साथ ही मिटटी की विभिन्न परतों में जले हुए अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। इन उत्खननों से प्राचीन इतिहास के विषय में ठोस प्रमाण मिले, जिनसे विभिन्न युगों क़ी सभ्यताएं प्रकाश में आई हैं।
आजादी से पूर्व ग्वालियर राज्य के पुरातत्व विभाग द्वार किया गए उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष ग्वालियर, विदिशा तथा अन्य संग्राहलयों में देखे जा सकते हैं। इस क्षेत्र की विश्व प्रसिद्ध प्रतिमाएं भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में भी देखी जा सकती हैं। इनमें प्रमुख शंगुकल कल्पवृक्ष तथा यक्षी प्रतिमा है। शैली के आधार पर ये प्रतिमाएं लगभग बाईस सौ बर्ष प्राचीन मानी जाती हैं।
बेसनगर क्षेत्र में समय-समय पर किये गए पुरातात्विक सर्वेक्षण के आधार पर यह तो निश्चित हो गया है क़ी पाषाणकालीन संस्कृति के अवशेषों से लेकर मध्यकालीन संस्कृति तक के अवशेष लगातार क्रमबद्ध प्रकाश में आये। शिलाश्रयों तथा उनके आसपास पूर्व, मध्य तथा उत्तर पुरापाषाण्कालीन उपकरण प्रचुर मात्रा में पाए गए हैं।
मध्यप्रदेश में विशेष रूप से बेसनगर क्षेत्र के अंतर्गत ताम्राश्मकालीन अवशेषों में आहाड सभ्यता के अवशेषों एवं उस समय के मृदभाण्डों का मिलना महत्वपूर्ण माना गया है, परन्तु बेसनगर से महाभारतकालीन चित्रित धूसर मृदभाण्डों का मिलना भी महत्वपूर्ण है। पलवल, दिल्ली, मथुरा, कुरुक्षेत्र, अहिछ्त्र, हस्तिनापुर, रुपड, कोटला निहंग, मुरैना जिले में कोटवार, गिलुलीखेडा इत्यादि स्थलों पर चित्रित धूसर मृदभाण्ड उत्खनन से एवं ऊपरी सतह पर पर्याप्त मात्र में मिलते हैं। उज्जैन के आस-पास वैश्य टेकरी क्षेत्र में तथा संदीपनी आश्रम के आसपास भी ऊपरी सतह पर इस प्रकार के मृदभाण्ड सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त हुए हैं। ये मृदभाण्ड लौह युग अथवा महाभारतकालीन संस्कृति के विकास के सूचक हैं। परन्तु बेसनगर में चित्रित धूसर मृदभाण्डों उत्खनन में मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हरियाण, पंजाब में हडप्पाकालीन मृदभाण्डों के साथ चित्रित धूसर मृदभाण्ड मिलना आश्चर्यजनक होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण भी हैं। बेसनगर में तम्राश्मयुगीन संस्कृति के मृदभाण्डों के साथ चित्रित धूसर मृदभाण्डों का मिलना भी उतना ही आश्चर्यजनक है, जो ताम्राश्मयुग की समाप्ति के साथ साथ लौह युग अथवा महाभारतकालीन संस्कृति का प्रारंभ दर्शाता है।
इसके साथ ही पुरातात्विक सर्वेक्षण के अंतर्गत मुरैना जिले में एक ओर कायथा मृदभाण्ड मिले हैं वहीँ दूसरी ओर इस मुरैना जिले में चित्रित धूसर मृदभाण्ड भी प्राप्त हुए हैं। वाकणकर कायथ को हड़प्पा से पहले हा मानते थी। यदि हम विचार करें तो बेसनगर उत्खनन से स्पष्ट हो गया है कि यहां ताम्राश्मयुगीन मृदभाण्डों के साथ चित्रित धूसर मृदभाण्ड भी प्रप्त होते हैं। एक ओर बेतवा तट पर स्थित रंगई स्थल से आहाड, मालवा, नवाश्मयुगीन "सेल्ट" मिला है, वहीँ दूसरी ओर बेतवा तट पर ताम्राश्मयुगीन संस्कृति के मृदभाण्ड, नवाश्मयुगीन "सेल्ट" तथा चित्रित धूसर मृदभाण्ड मिले हैं। यह हो सकता है क़ी ताम्राश्मयुगीन संस्कृति के अंतिम चारण के साथ ही चित्रित धूसर मृदभाण्डों का प्रयोग प्रारम्भ हो गया हो। बेसनगर के पश्चिम में शुंगकालीन सुरक्षा दीवार के नीचे स्तर पर जो मौर्यकाल तथा उसके पहले का स्तर है, उसके भी नीचे केवल चित्रित धूसर मृदभाण्डों के तुकडे, जो उत्तम श्रेणी के थे, प्राप्त हुए। रंगी उत्खनन में वाकणकर बेसनगर आये थे। उनका कहना था क़ी यहाँ कायथा मृदभाण्ड मिलना चाहिए, परन्तु न मिलने पर उन्होंने बताया क़ी भविष्य में उत्खनन किया जाए तो कायथा मृदभाण्ड अवश्य मिल सकते हैं।
बेसनगर से एक महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है, क़ी उत्तरी काले ओपदार मृदभाण्ड मौर्यकाल तथा कुछ बाद तक इनका निर्माण होना बंद हो गया था। इनके टूट जाने पर इन्हें ताम्बे क़ी रिबित तथा पत्ती से जोड़ा जाता था। उत्खनन में इन मृदभाण्डों की भग्न पत्ती भी प्राप्त हुई, जिससे बह जोड़े गए थे। बेसनगर कई बार बाढ़ तथा अग्निकां से उजड़ा तथा पुनः बसा, जिसका प्रमाण यहाँ युगयुगीन टीले हैं। यहाँ के निवासी बहादुर थे, फिर भी बाढ़, अग्निकां तथा युद्ध की बार-बार परेशानी के पश्चात वर्तमान विदिशा में विशाल दुर्ग का परकोटा निर्मित पर बस गए थे, जिसके प्रमाण प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। इसके बावजूद भी खाम्बाबा क्षेत्र में बसावट निरंतर वर्तमान युग तक चलती रही।
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Posted by Udit bhargava at 4/12/2010 08:59:00 pm 0 comments
11 अप्रैल 2010
तू कौन?- मैं शेखचिल्ली
अनेक कपोल- कल्पित हास्य-कथाओं के नायक शेखचिल्ली वस्तुतः जाति से शेख मुसलमान थे। इनका जन्म बलूचिस्तान के एक खानाबदोश कबीले में हुआ था।
निरंतर घुमक्कड़ी का जीवन जीने के कारण शेखचिल्ली पढ़ न सके। हाँ, आये दिन की परेशानियों और अभावों ने इनको आवश्यकता से अधिक हवाई किलेबाजी अता फरमा दी।
बचपन ही से शेखचिल्ली चमत्कारों की तलाश में पीर-फकीरों के दीवाने रहे। घुमक्कड़ी का जीवन इन्हें रास नहीं आया। रात-दिन ऐशो-आराम के साधन पा लेने के सपने और तुनकमिजाज अधिकारियों और सामंतों की तरह अपने को पेश करने के हवाई पुल बांधना इनकी नियति बनती गई।
वह जमाना ही अंधविश्वासों, झाड-फूंक और गंडे-तावीजों का था। फिर जिस कबीलियाई परिवेश में शेखचिल्ली गोदी से उतर धरती पर चलने लायक बने, उसमें तो अंधविश्वासों की जडें दिमाग के हर कोने में जमी थीं। अभावों में पलता भावुक बाल शेखचिल्ली इन्हीं अंधविश्वासों की परिणति में काल्पनिक चमत्कारों के रंग भरना सीख गया।
एक किवदंती के अनुसार शेखचिल्ली क़ी इन बे-सिर-पैर की हरकतों से तंग आकर एक रात उसके कबीले वाले किसी 'सूखे करेजे' (सूखी झाड़ियों का झुण्ड) के पास इन्हें सोता छोड़कर आगे निकल गए। शेखचिल्ली के जीवन का यह एक नया मोड़ था। अब वह नितांत अकेला रह गया था।
अकेलेपन की इस भावना ने उसकी कल्पना में पंख लगा दिए। जो उससे दूर था, अप्राप्य था, उसके पास होने के सुखद सपने और भटकना ही उसका जीवन बन गया। मनचाहा पा लेने की इच्छा से उसने फकीरों, ओझाओं और टोने-टोटके करने वाले नाजूमियों के दामन पकड़ने चाहे। न जाने क्यों, जैसकि ऐसी सूरतों में अक्सर होता है, उसमें कुंठा के या कमतरी के भाव नहीं हुए। हो जाते तो आज न शेखचिल्ली होता, न उसकी कहानियां।
शेखचिल्ली क्वेटा की बंजर धरती से कुरुक्षेत्र के हरियल इलाके में कैसे और कब आये, कोई नहीं जानता। केवल यह सोचा ही जा सकता है क़ी वह उन दिनों सीमा पार से आने वाले किसी जन-प्रवाह में बहकर कुरुक्षेत्र आ पहुंचे।
कुरुक्षेत्र उन दिनों हिन्दू साधू-संतों के साथ-साथ मुस्लिम फकीरों और पीरों की शरण-स्थली बन चूका था। शेखचिल्ली भी चमत्कारों की चाह में वहां के किसी पीर के मुरीद बन गए।
उन दिनों झज्जर एक छोटी-सी रियासत थी। पंजाब के अधिकाँश भाग से मराठों का शासन समाप्त हो चुका था और मुस्लिम शासकों की हर जगह तूती बोलनी शुरू हो गयी थी। शेखचिल्ली को कुरुक्षेत्र में नयी जिंदगी तो मिल गयी, मगर उसकी कल्पनाशीलता कम होने की उपेक्षा और अधिक निखरती गयी।
उन्हीं दिनों नारनौल के रईस हाफिज नूरानी से उनकी मुलाक़ात हुई। हाफिज नूरानी शेखचिल्ली क़ी न जाने किस अदा पर फ़िदा हुए क़ी उन्हें साथ इ आये। झज्जर के नवाबी घराने से हाफिज नूरानी क़ी खाई जान-पहचान थी। उन्होंने शेखचिल्ली को नवाब के दरबार में नौकरी दिलवा दी। शादी भी करा दी क़ी शेखचिल्ली के भटकावों में थोडा ठहराव आ जाए।
झज्जर एक छोटी-सी रियासत थी। जितनी आमदनी थी, लगभग उतने ही खर्चे थे। इसलिये शेखचिल्ली को उस नौकरी से इतना तो कभी नहीं मिल सका क़ी नवाब के दुसरे मुलाजिमों के तरह मजे से खा-पी सकें। हाँ, नवाब का मुलाजिम होने के कारण लाख खामियां होने के बावजूद भी, रियासत में उनकी इज्जत थी।
कहा जाता है क़ी सन 1800 के आसपास शेखचिल्ली झज्जर रियासत छोड़कर फिर कुरुक्षेत्र वापस चले गए। फ़कीर बन गए। उस समय तक उनकी आयु अस्सी के आस पास हो चली थी। उनके दोष हाफिज नूरानी भी अल्लाह को प्यारे हो गए थे और शेखचिल्ली की बेगम भी चल बसी थीं। रियासत पर भी दुर्भाग्य के बादल उड़ने शुरू हो गए थे और अंग्रेजों ने अवध को हड़पने की तैयारियों के साथ-साथ पंजाब की और हाथ बढाने शुरू कर दिए थे।
आजादी की पहली लड़ाई से लगभग पचास वर्ष पूर्व ही कुरुक्षेत्र में शेखचिल्ली की मृत्यु हो गयी। उस समय तक उनको मानने वालों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी थी। कुरुक्षेत्र में स्थित शेखचिल्ली का मकबरा आज भी इस बात के गवाही देता है क़ी शेखचिल्ली अपने समय की उन शक्सियतों में से थे, जिनकी मौत पर गम मनाने वालून के कमी नहीं होती और जिन्हें इतिहास के पन्नों में ज़िंदा रखने की जरूरत महसूस की जाती है।
शेखचिल्ली को अक्सर हवाई किलेवाजी में दक्ष एक कामचोर मूर्ख की तरह चित्रित किया जाता है। हवाई किलेबाजी वह बेशक थे, किन्तु यदी गंभीरता से मनन किया जाए, तो शेखचिल्ली की हवाई किलेबाजी में अनेक सामाजिक असमानताओं और अहं के बंधनों को तोड़ डालने की चत्पताहत सहज ही महसूस की जा सकती है। शेखचिल्ली का व्यक्तित्व समाज के शोषण और तिरस्कार का प्रतिबिम्ब है। वह सबकुछ पा लेने की अदम्य इच्छा है, जिसमें सचमुच पा लेने की क्षमता को समाज ने पंगु बना डाला हो। फिर भी उनके किरदार में दया, परोपकार, और संतोष के झलक पूरी परिलक्षित होती है।
आगे पढ़ें :-
बेगम के पैर
तेंदुए का शिकार
सिर पर टोकरा
आसमानी चूहा
नीम पर गायब
घोड़े क़ी छलांग
Posted by Udit bhargava at 4/11/2010 11:39:00 am 1 comments
शेखचिल्ली की चल गई
शेखचिल्ली बाजार में यह कहता हुआ भागने लगा, “चल गई, चल गई!” बात क्या थी?
एक दिन शेखचिल्ली बाजार में यह कहता हुआ भागने लगा, “चल गई, चल गई!” उन दिनों शहर में शिया-सुन्नियों में तनाव था और झगड़े की आशंका थी।
उसे ‘चल गई, चल गई’ चिल्लाते हुए भागते देखकर लोगों ने समझा कि लड़ाई हो गई है। लोग अपनी-अपनी दूकानें बंद कर भागने लगे। थोड़ी ही देर में बाजार बंद हो गया।
कुछ समझदार लोगों ने शेखचिल्ली के साथ भागते हुए पूछा, “अरे यह तो बताओ, कहां पर चली है? कुछ जानें भी गई हैं क्या?”
शेखचिल्ली थोड़ा ठहरा और हैरान होकर पूछा, “क्या मतलब?”
“भाई, तुम्हीं सबसे पहले इस खबर को लेकर आए हो। यह बताओ लड़ाई किस मुहल्ले में चल रही है।”
“कैसी लड़ाई?” शेखचिल्ली ने पूछा।
“अरे तुम्हीं तो चिल्ला रहे थे कि चल गई चल गई।”
“हां-हां”, शेखचिल्ली ने कहा “वो तो मैं इसलिए चिल्ला रहा था कि बहुत समय से जेब में पड़ी एक खोटी दुअन्नी, आज एक लाला की दुकान पर चल गई है।”
Posted by Udit bhargava at 4/11/2010 11:23:00 am 0 comments
शेखचिल्ली का कफन
एक जगह कुछ लोग इकट्ठे बैठे थे। शेखचिल्ली भी वहीं बैठा था। कस्बे के कुछ समझदार लोग और हकीम जी दुर्घटनाओं से बचने के उपाय पर विचार-विमर्श कर रहे थे। किस दुर्घटना पर कौन-सी प्राथमिक चिकित्सा होनी चाहिए, इस पर भी विचार किया जा रहा था।
थोड़ी देर में हकीम जी ने वहां बैठे सभी लोगों से पूछा, “किसी के डूब जाने पर पेट में पानी भर जाए और सांस रुक जाए तो तुम क्या करोगे?” सब चुप थे।
हकीम जी के अन्य साथी बोले, “तुम बोलो शेखचिल्ली, किसी के डूबने पर उसकी सांस रुक जाए तो सबसे पहले तुम क्या करोगे?”
“उसके लिए सबसे पहले कफन लाऊंगा। फिर कब्र खोदने वाले को बुलाऊंगा”, शेखचिल्ली ने जवाब दिया।
Posted by Udit bhargava at 4/11/2010 11:21:00 am 0 comments
सड़क यहीं रहती है
एक दिन शेखचिल्ली कुछ लड़कों के साथ, अपने कस्बे के बाहर एक पुलिया पर बैठा था। तभी एक सज्जन शहर से आए और लड़कों से पूछने लगे, ‘क्यों भाई, शेख साहब के घर को कौन-सी सड़क गई है?’ शेखचिल्ली के पिता को सब ‘शेख साहब’ कहते थे। उस गाँव में वैसे तो बहुत से शेख थे, परंतु ‘शेख साहब’ चिल्ली के अब्बाजान ही कहलाते थे। वह व्यक्ति उन्हीं के बारे में पूछ रहा था। वह शेख साहब के घर जाना चाहता था।
परन्तु उसने पूछा था कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है। शेखचिल्ली को मजाक सूझा। उसने कहा, ‘क्या आप यह पूछ रहे हैं कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘हाँ-हाँ, बिल्कुल!’ उस व्यक्ति ने जवाब दिया।
इससे पहले कि कोई लड़का बोले, शेखचिल्ली बोल पड़ा, ‘इन तीनों में से कोई भी रास्ता नहीं जाता।’ ‘तो कौन-सा रास्ता जाता है?’ ‘कोई नहीं।’‘क्या कहते हो बेटे?’ शेख साहब का यही गाँव है न? वह इसी गाँव में रहते हैं न?’ ‘हाँ, रहते तो इसी गाँव में हैं।’ ‘मैं यही तो पूछ रहा हूँ कि कौन-सा रास्ता उनके घर तक जाएगा।’
‘साहब, घर तक तो आप जाएँगे।’ शेखचिल्ली ने उत्तर दिया, ‘यह सड़क और रास्ते यहीं रहते हैं और यहीं पड़े रहेंगे। ये कहीं नहीं जाते। ये बेचारे तो चल ही नहीं सकते। इसीलिए मैंने कहा था कि ये रास्ते, ये सड़कें कहीं नहीं जाती। यहीं पर रहती हैं। मैं शेख साहब का बेटा चिल्ली हूँ। मैं वह रास्ता बताता हूँ, जिस पर चलकर आप घर तक पहुँच जाएँगे।’
‘अरे बेटा चिल्ली!’, वह आदमी प्रसन्न होकर बोला, ‘तू तो वाकई बड़ा समझदार और बुद्धिमान हो गया है। तू छोटा-सा था जब मैं गाँव आया था। मैंने गोद में खिलाया है तुझे। चल बेटा, घर चल मेरे साथ। तेरे अब्बा शेख साहब मेरे लंगोटिया यार हैं। और मैं तेरे रिश्ते की बात करने आया हूँ। मेरी बेटी तेरे लायक़ है। तुम दोनों की जोड़ी अच्छी रहेगी। अब तो मैं तुम दोनों की सगाई करके ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली उस सज्जन के साथ हो लिया और अपने घर ले गया। आगे चलकर वह सज्जन शेखचिल्ली के ससुर बन गए।
Posted by Udit bhargava at 4/11/2010 11:17:00 am 0 comments
शेखचिल्ली का नुकसान
एक दिन शेखचिल्ली की अम्मी ने उससे कहा, ‘बेटे, अब तुम जवान हो गए हो। अब तुम्हें कुछ काम-काज करना चाहिए।’ ‘क्या काम करूँ?’ शेखचिल्ली ने पूछा। ‘कोई भी काम करो।’
‘मेरी तो समझ में नहीं आता, अम्मी कि मैं क्या काम करूँ? मैं तो किसी तरह की दस्तकारी भी नहीं जानता।’ ‘बेटे, तुम्हारे अब्बाजान अब बूढ़े हो गए हैं। तुम्हें कोई-न-कोई काम-धंधा जरूर करना चाहिए।’ ‘तुम ऐसा कहती हो तो ठीक है। मैं काम की तलाश में जाता हूँ।’ ‘जाओ।’ अम्मी ने कहा।
‘जा रहा हूँ। पर मुझे बढ़िया- सा खाना खिलाओ। मैं खा-पीकर ही जाऊँगा।’ शेखचिल्ली बोला।
‘अभी बनाए देती हूँ।’ अम्मी ने उत्तर दिया। शेखचिल्ली की माँ ने उसके लिए बढ़िया-बढ़िया पकवान बनाए और उन्हें खिला-पिलाकर उसे नौकरी की तलाश में भेज दिया। शेखचिल्ली मस्ती में झूमता हुआ घर से निकल पड़ा। उसके दिमाग में नौकरी या मजदूरी के सिवा कोई बात नहीं थी।
वह घर से बहुत दूर निकल गया। एक जगह रास्ते में उसे एक सेठ मिला। वह घी का हंडा सिर पर लिए जा रहा था। बोझ के कारण सेठ के कदम लड़खड़ा रहे थे। सेठ ने उसे देखते ही कहा, ‘ए भाई! मजदूरी करोगे?’ ‘बिलकुल करूँगा। बंदा तो मजदूरी की तलाश में है ही।’ ‘तो मेरा यह हंडा ले चलो। इसमें घी है। घी बिखर न जाए! तुम इसे मेरे घर तक पहुँचा दोगे तो मैं तुम्हें एक अधन्ना दूँगा।’
‘सिर्फ एक अधन्ना!’ चिल्ली ने पूछा। ‘हाँ,’ सेठ ने उत्तर दिया। ‘लाओ सेठजी, मैं ही लिए चलता हूँ। पहली बार मजदूरी कर रहा हूँ, दो पैसे कम ही सही।’ शेखचिल्ली ने कहा। और उसने सेठ का घी से भरा हुआ वह बड़ा बर्तन अपने सिर पर रख लिया। सिर पर घी का बर्तन रखकर शेखचिल्ली उस सेठ के साथ चल दिया।
चलते-चलते शेखचिल्ली सोचने लगा, यह सेठ मुझे दो पैसे देगा। दो पैसे यानी आधा आना। आधा आना यानी कि दो पैसे।
उनमें एक मुर्गी और एक मुर्गे का चूज़ा खरीदा जा सकता है। वे चूज़े बड़े होंगे। एक बड़ी मुर्गी और मुर्गा। मुर्गी अंडे देगी। वह रोज अंडे देगी। खूब चूज़े बनेंगे। कुछ दिनों में बहुत-सी मुर्गियाँ हो जाएँगी। ढेरों मुर्गियाँ हो जाएँगी तो वे और अंडे दिया करेंगी। अंडे बेचने से मुझे बहुत आमदनी होगी।
फिर तो पैसों की कमी ही नहीं रहेगी। अपने लिए एक शानदार घर बनाऊँगा। बहुत-सी जमीन खरीदूँगा। भैंसे खरीदकर डेरी बनाऊँगा। दूध बेचूँगा। दूध और अंडों का थोक व्यापारी बन जाऊँगा तो पूरे इलाके में मेरी धाक जम जाएगी। सब लोग मेरा माल पसंद करेंगे और खरीदेंगे। व्यापार चल निकलेगा।
Posted by Udit bhargava at 4/11/2010 11:12:00 am 0 comments
शेखचिल्ली के कारनामे
शेखचिल्ली स्वभाव से नटखट तो था ही, साथ ही वह बेवक़ूफ़ भी था। उसकी बेवकूफी के कारण उसकी माँ को बहुत से उलाहने सुनने पड़ते थे।
अंत में एक दिन ऊबकर उसने शेखचिल्ली को घर से निकाल दिया। शेखचिल्ली घर से निकल कर पड़ोस के एक दूसरे गाँव में चला गया। वहां उसने एक झोंपड़ी बनायी और रहने लगा। उसका स्वभाव बहुत ही खुशदिल था इसलिये गाँव के लोग उसके मित्र हो गए। उन्होंने उसकी बड़ी मदद दी और उसका रोटी-पानी का खर्च चलने लगा।
उसकी जिन्दादिली गाँव के मुखिया की लड़की रजिया उस पर आशिक हो गई। गाँव के कुछ नौजवान भी शेखचिल्ली के हिमायती थे। उन्होंने एक दिन दवाव डालकर मुखिया क़ी लड़की रजिया से उसकी शादी करा दी। शेखचिल्ली को शादी में दान-दहेज़ में बहुत कुछ रूपये तथा जेवरात भी मिले। शेखचिल्ली अपनी औरत तथा शादी में मिले हुए रूपये और जेवरात लेकर अपने गाँव वापिस लौट आया।
गाँव में लौटकर शेखचिल्ली अपनी माँ से मिला तथा बोला-माँ देख। मैंने मुखिया की लड़की से शादी कर ली है।
शेखचिल्ली की माँ ने देखा क़ी बेटा बगल के गाँव बाले मुखिया की लड़की से शादी कर लाया है। उसकी माँ ने यः भी देखा क़ी शेखचिल्ली दहेज़ में बहुत-सी दौलत तथा समान इत्यादि ले आया है, तो वह मन ही मन बहुत खुश हो गई।
परन्तु वह जानती थी कि शेखचिल्ली एक बिलकुल बेकार लड़का है। इस्कू पैसा कमाने का कोई भी हुनर मालुम नहीं। इसलिये वह कहने लगी-बेटा तू महालानतो आदमी है। तेरे किये कुछ भी होने का नहीं।
यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा-"माँ! मैंने इतना बड़ा काम किया है। क्या यह कम है?"
उसकी माँ ने कहा-बेटा ! यह बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया है। तू अगर अपने मन से जान-बूझकर कोई काम करे और उसमें कोई तरक्की करके चार पैसे कमाकर ला सके तो मैं जानू। तू मुझे बुढापे में सुख नहीं दे सकता।
यह सुनकर शेखचिल्ली ने कहा-माँ तू ऐसा मत बोल मैं वक़्त आने पर तेरे लिये कुछ कर सकता हूं।
इसी तरह कुछ और वक़्त बीत गया। उसकी औरत नैहर चली गयी और एक साल बीत गया। एक दिन उसने ससुराल जाने की ठान ली। मान से पुचा-अम्मीजान मेरी ससुराल कहाँ है? मुझे उसका पता बताओ, ताकि मैं वहां एक बार हो आऊं मैं भूल गया हूँ।
इस पर उसकी माँ ने कहा-बेटा तुझमे अक्ल तो है ही नहीं। इसलिये अगर मैंने पता बताया तो तू भूल जाएगा। इसलिये मेरी बात का ख़याल रखे तो सीता अपने ससुराल पहुँच जाएगा। यह कहकर उसने कहा-बेटा तू सीधा अपनी नाक की सीध में चले जाना, कहीं से इधर-उधर मुड़ना नहीं, बस सीधे अपनी ससुराल पहुँच जाएगा।
यह सुनकर शेखचिल्ली सीधन ससुराल को चल दिया। चलते चलते उसकी माँ ने कहा बेटा! जो साग सत्तू घर में था मैंने बाँध दिया है। यह पोटली लेता जा और बूख लगने पर यही साग-सत्तू खा लेना।
शेखचिल्ली अपने घर से चलकर सीधा अपने नाक की सीध में रवाना हुआ। वह जब अपने घर से सीधा मैदान में दो तीन कोस निकल आया, तो सामने एक दरख्त पडा। उसने सोचा-माँ ने नाक की सीध में चलने को कहा था। यह सोचकर वह पेड़ पर चढ़ गया और फिर दूसरी तरफ से उतर फिर नाक की सीच में रवाना हुआ।
आगे चलने पर उसे एक नदी मिली। उसने उस नदी को बड़ी मुश्किल से पार किया और आगे चल पड़ा। इसी प्रकार चलता हुआ वह आखिरकार अपनी ससुराल आ पहुंचा।
ससुराल पहुँचने पर उसकी भली-भाँती खातिरदारी की जाने लगी। परन्तु उसने साग-सत्तू छोड़कर कुछ भी खाना स्वीकार न किया, क्योंकि उसकी माँ ने ऐसा ही कहा था।
रात को बचा-खुचा साग-सत्तू खाकर सो रहा। रात्रि को उसे भूक सताने लगी। अब वह क्या करे? आखिर भूक से ऊबकर वह बहार निकल आया और मैदान में एक दरख्त के नीचे लेट गया।
उस पेड़ पर मधुमखियों का एक बहुत बड़ा छत्ता था। छत्ता मधु से इतना ज्यादा भरा हुआ था क़ी उसमें से रात को मधु टपकता था। शेखचिल्ली जब उस वृक्ष के नीचे लेटा। तो ऊपर से उसके बदन पर मधु टपकने लगा। मधु की कुछ बूंदे उसके मूंह में टपकीं तो बह उसे चाटने लगा और बड़ा खुश हुआ। कुछ बूंदे उसके बदन पर भी टपकती रहीं और वह परेशान होकर इधर-उधर करवटें बदलता रहा।
शेखचिल्ली बेवक़ूफ़ तो था ही। उसे इस बात का पता नहीं लग सका क़ी आधिर पेड़ पर से क्या चीज उसके बदन पर टपकती है। निदान लाचार होकर वह वहां से उठा और घर के भीतर घुसकर एक कोठरी में जाकर सो रहा। उस कोठरी के अंदर घुनी हुई रूई राखी हुई थी। शेखचिल्ली को नर्म-नर्म रूई मिली तो उसी में आराम के साथ जाकर सो रहा। उसके बदन के चारों और शहद तो लिप्त हुआ था ही, अब धुनी हुए रुई उसी के साथ बदन भर में चारों और चिपक गयी और उसका बदन और उसकी शक्ल अजीब किस्म की हो गयी।
सुबह हुई तो शेखचिल्ली की औरत कुछ रुई निकालने उस कोठरी में घुशी। तब तक शेखचिल्ली जाग उठा था। उसको ऐसे रूप में देखकर उसकी औरत चीख उठी उसने हिम्मत बांधकर पुछा तुम कौन हो? शेखचिल्ली ने जोर से डांट कर कहा-'चुप'
वह बहार भागी और अपनी माँ से जाकर कहा-अम्मा! उस रूई वाली कोठरी में 'चुप' घुस आया है। उसकी शक्ल बहुत भयानक है।
यह सुनकर उसकी माँ ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया। कई लोग उस कोठरी में घुसे। शेखचिल्ली को देखकर सबने पुछा- तुम कौन हो?
'शेखचिल्ली ने फिर चिल्लाकर कहा-चुप'
अब तो उसका ऐसा रूप देखकर सबकी सिट्टी-पिट्टी गम हो गयी। सब समझे चुप नाम क़ी कोई भयानक बला घर में घुस आई है। उसे निकालने के लिये किसी सयाने को बुलाना चाहिए।
कई एक ओझा मौलवी बुलाए गए। सबने कितने ही मंत्र-जंत्र किए मगर वह चुप नाम की बला नहीं मिकली। आखिर हार कर मौलवियों ने सलाह दी कि आप लोग यह मकान खाली करके किसी दूसरे में चले जाइए, वरना वह बला आप लोगों का सत्यानाश कर देगी।
शेखचिल्ली के ससुराल वालों ने यह मकान खाली कर दिया और दूसरे मकान में चले गए। शेखचिल्ली को अवसर मिल गया और वह रात्री के समय उस कोठरी से निकल कर बाहर की ओर भागा।
रास्ते में कुछ चोर दिखाई पड़े। आगे एक किसान के बहुत से भेड़ वगैरह बंधे थे। शेखचिल्ली चोरों के दर के मरे उन्हीं भेड़ बकरियों के बीच जा घुसकर बैठ गया। उधर वे चोर भी उसी तरफ आ पहुंचे।
चोरों ने केई एक भेड़ों को चुरा लिया। उन्हीं में शेखचिल्ली ने को भी रूई से लिपटा हुआ देख कोई दुम्बा भेड़ समझकर साथ लेकर भाग चले। भागते-भागते वे नदी के किनारे आ पहुंचे। इतने में सुबह होने लगी। उन्होंने सब भेड़ों को जमीन पर पटक दिया। यह देखकर शेखचिल्ली ने कहा- मुझे थोड़ा धीरे से पटकना।
उसकी आवाज सुनकर चोरों की नानी मर गई। उन्होंने समझा कि यह कोई भेड़ के रूप में भयानक बला है जो कि इस तरह बोलती है। उन्होंने शेखचिल्ली को पानी में फ़ेंक दिया और भाग चले।
उधर पानी में शहद घुल जाने के कारण शेखचिल्ली के बदन पर चिपकी हुई रूई साफ़ हो गई उसने बदन मल मल कर स्नान किया और सुबह होते ही ससुराल आया। दूसरे मकान में जाकर अपने ससुर को मिला और पूछा- आपने मकान क्यों छोड़ दिया।
ससुर ने कहा- मेरे मकान में कोई 'चुप' नाम की बला घुस गई है।
शेखचिल्ली ने झूठ-मूठ जाकर कोई मंत्र पढ़ दिया और फिर कहा-वह बाला चली गई।
आखिर सब लोग उसी मकान में चले आए।
शेखचिल्ली की बड़ी खातिरदारी हुई। वह सस्रुआल में ही रहने लगा।
एक दिन उसने ससुर से कहा- मैं कोई कारोबार करना चाहता हूँ। मुझे एक गाडी बनवा दीजिये। दिन में लकडियाँ काटूंगा और गाडी में लाद कर बाजार में बेचूंगा। ससुर ने एक बैलगाड़ी बनवा दी। शेक्चिल्ली ने जंगल से लकडियाँ लाने के लिये बैलगाड़ी जोती, बैलगाड़ी लेकर वह चला तो कुछ आगे जाकर गाडी जंगल में चर्र चूं चर्र चूं की आवाज करने लगी। शेख्चिली ने सोचा-यह मेरे कारोबार का पहला दिन है और यह गाडी साली अपशकुन कर रही है। आरे की मदद से गाडी को काटकर टुकडे-टुकडे कर दिया तथा उसे वहीं फैंक-फांक कर आगे लकड़ी काटने चल दिया।
शेखचिल्ली एक मोटा पेड़ देखकर उसी पर चढ़ गया। एक बहुए ही मोती डाल पर जा बैठा और कुल्हाड़ी से काटकर जब थक गया तो आरा हाथ में उठाकर उसी से उसने उस डाल को काटना शुरू किया।
इतने में एक आदमी नीचे गुजरा। उसने जब शेखचिल्ली को डाल काटते देखा तो ठहर गया। गौर से देखने पर उसको मालूम हुआ कि शेख्चिल्ले उसी डाल को डाट रहा था जिस पर कि वह बैठा हुआ है।
उसने कहा-अरे मूर्ख! तू जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है। इस तरह तू डाल के साथ-साथ खुद भी नीचे गिर जाएगा।
शेखचिल्ली ने कहा-अरे जा जा! मैं भला जमीन पर कैसे गिर सकता हूँ।
वह आदमी वहीं तहर गया। थोड़ी देर में डाल कट गई और डाल के साथ-साथ शेखचिल्ली भी नीचे आ गिरा।
तब शेखचिल्ली उसको कहने लगा-आप तो बहुत बड़े आदमी मालूम होते हैं। मुझे यह तो बताइये कि मैं कब मरूँगा?
इस पर उस आदमी ने कहा-मैं यह सब नहीं जानता मगर शेखचिल्ली कहाँ छोड़ने वाला था। उसने उसका पीछा पकड़ लिया तो उसने छुड़ाने के लिये कहा-तू आज शाम को मर जाएगा।
यह कहकर वह आदमी तो चला गया। अब शेखचिल्ली ने सोचा कि मुझे आज शाम को मर ही जाना है तो अच्छा है कि पहले से ही कब्र के अंदर लेट जाऊं ताकि मेरे मरने के बाद मेरे रिश्तेदारों को कब्र खोदनी न पड़े।
ऐसा सोचकर वह उसी जंगल में एक गड्ढा खोदकर उसमें लेट रहा।
उसी तरफ से एक आदमी जा रहा था। उसके पास एक मटका था। वह आवाज लगाता जा रहा था कि अगर कोई इस मटके को मेरे घर तक पहुंचा दे तो मैं उसे दो पैसे दूंगा।
यह सुनकर शेखचिल्ली झटपट कब्र के अंदर से उठकर खडा हुआ और कहने लगा-लाओ! मैं तुम्हारा मटका ले चलता हूँ।
यह सुनकर उस आदमी ने वह मटका शेखचिल्ली के हवाले किया। शेखचिल्ली उसे लेकर चल पडा। रास्ते में यह सोचता जा रहा था कि मुझे उसकी मजदूरी के दो पैसे मिलेंगे। दो पैसे का एक अंडा खरीदूंगा उसे अंडे से मुर्गी पैदा होगी। उस एक मुर्गी से बहुत सी मुर्गियां पैदा होंगी। उन मुर्गियों को बेचकर एक बकरी खरीद लूंगा। बकरी से बहुत सी बकरियां होंगी उन बकरियों को बेचकर एक गाय खरीदूंगा। उस गाय से बहुत सी गायें पैदा होंगी। उन्हें बेचकर घोडी से बहुत सी घोड़ियाँ पैदा होंगी। उन सबको बेचकर बहुत से रूपये मिलेंगे। तब मैं अपना मकान बनाऊंगा। फिर एक घोड़े पर बैठकर बाजार में सैर करने निकालूँगा। फिर कारोबार करके बहुत सी दौलत पैदा करूंगा। फिर घर में ठाठ से शाम को बैठक में हुक्का गुद्गुदौंगा, औरत बच्चों को मेरे पास खाना खाने के लिये भेजेगी।
उस वक्त मैं हुक्का गुडगुडाते हुए जोरों से सिर हिलाकर कहूंगा-अभी खाना नहीं खाउंगा।
शेखचिल्ली ने ज्योंही अपने ख्यालों में जोरों से सिर हिलाया कि वह मटका सिर पर से गिरकर फूट गया और अंदर का सारा सामान मिट्टी में गिरकर खराब हो गया।
इस अपर उस आदमी ने शेखचिल्ली की अच्छी खासी मरम्मत की। शेखचिल्ली का सपना टूट गया।
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Posted by Udit bhargava at 4/11/2010 10:31:00 am 1 comments
10 अप्रैल 2010
रामायण – अरण्यकाण्ड - अकम्पन रावण के पास
खर के एक सैनिक अकम्पन ने रावण के दरबार में जाकर खर की सेना के नष्ट हो जाने की सूचना दी। वह हाथ जोड़ कर बोला, "हे लंकापति! दण्डकारण्य में रहने वाले आपके भाई खर और दूषण अपने चौदह सहस्त्र सैनिकों सहित युद्ध में मारे गये। मैं बड़ी कठिनता से बच कर आपको सूचना देने के लिये आया हूँ।" यह सुन कर रावण को बड़ा दुःख हुआ साथ ही भारी क्रोध भी आया। उन्होंने कहा, "मेरे भाइयों को सेना सहित मार डालने वाला कौन है? मैं अभी उसे नष्ट कर दूँगा। तुम मुझे पूरा वतान्त सुनाओ।"
रावण की आज्ञा पाकर अकम्पन ने कहा, "प्रभो! यह सब अयोध्या के राजकुमार राम ने किया है। उसने अकेले ही सब राक्षस वीरों को मृत्यु के घाट उतार दिया।" रावण ने आश्चर्य से पूछा, " क्या राम ने देवताओं से सहायता प्राप्त कर के खर को मारा है?" अकम्पन ने उत्तर दिया, "नहीं प्रभो! ऐसा उसने अकेले ही किया है। वास्तव में राम तेजस्वी, बलवान और युद्ध विशारद योद्धा है। मैंने राम को अपनी आँखों से राक्षस सेना का विनाश करते देखा है। जिस खर की एक गर्जना से सारे देवता काँप जाते थे, उस रणबाँकुरे को उनकी शक्तिशाली सेना सहित उसने आनन-फानन में समाप्त कर दिया। उसका रणकौशल देख कर मुझे ऐसा आभास होता है कि आप अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ युद्ध करके भी उसे परास्त नहीं कर सकेंगे। उस पर विजय पाने का मेरी दृष्टि में एक ही उपाय है। उसके साथ उसकी पत्नी है जो अत्यन्त रूपवती, लावण्यमयी और सुकुमारी है। राम उससे बहुत प्रेम करता है। इसलिये वह उसे अपने साथ वन में लिये फिरता है। तात्पर्य यह है कि वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। मेरा विश्वास है, यदि आप किसी प्रकार उसका अपहरण कर के ले आयें तो राम उसके वियोग में घुल-घुल कर मर जायेगा। और यह समस्या अपने आप ही सुलझ जायेगी। आपको समरभूमि में व्यर्थ का रक्तपात भी नहीं करना पड़ेगा।"
लंकापति रावण को अकम्पन का यह प्रस्ताव सर्वथा उचित प्रतीत हुआ। उसने इस विषय में अधिक सोच विचार करना या अपने मन्त्रियों से परामर्श करना भी उचित नहीं समझा। वह तत्काल अपने दिव्य रथ पर सवार हो आकाश मार्ग से उड़ता हुआ सागर पार कर के मारीच के पास पहुँचा। मारीच रावण का परम मित्र था। सहसा अपने घनिष्ठ मित्र को अपने सम्मुख पाकर मारीच बोले, "हे लंकेश! आज अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के आपके यहाँ आने का क्या कारण है? आप जो इतनी हड़बड़ी में आये हैं, उससे मेरे मन में नाना प्रकार की शंकाएँ उठ रही हैं। लंका में सब कुशल तो है? परिवार के सब सदस्य आनन्द से तो हैं? अपने आने का कारण शीघ्र बता कर मेरी शंका को दूर कीजिये। मेरे मन में अनेक अशुभ आशंकाएँ उठ रही हैं।"
मारीच के वचनों को सुन कर रावण ने कहा, "यहाँ आने का कारण तो विशेष ही है। अयोध्या के राजकुमार राम ने मेरे भाई खर और दूषण को उनकी सेना सहित मार कर अरण्य वन के मेरे जनस्थान को उजाड़ दिया है। इसी से दुःखी हो कर मैं तुम्हारी सहायता लेने के लिये आया हूँ। मैं चाहता हूँ कि राम की पत्नी का अपहरण कर के मैं लंका ले जाऊँ। इसमें मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। सीता के वियोग में राम बिना युद्ध किये ही तड़प-तड़प कर मर जायेगा और इस प्रकार मेरा प्रतिशोध पूरा हो जायेगा।"
रावण के वचन सुन कर मारीच बोला, "हे रावण! तुम्हारा यह विचार सर्वथा अनुचित है। जिसने तुम्हें सीताहरण का सुझाव दिया है वह वास्तव में तुम्हारा मित्र नहीं शत्रु है। तुम राम से किसी प्रकार भी जीत नहीं सकोगे। राम के होते हुये तुम उससे सीता को नहीं छीन सकोगे। उसके अदभुत पराक्रम के सम्मुख तुम एक क्षण भी नहीं ठहर सकोगे। तुम्हारा हित इसी में है कि तुम इस विचार का परित्याग कर चुपचाप लंका में जा कर बैठ जाओ।" मारीच के उत्तर से निराश हो रावण लंका लौट आया।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 06:05:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - रावण को शूर्पणखा का धिक्कार
रावण के मारीच के पास से लंका लौटने के कुछ काल पश्चात् शूर्पणखा वहाँ आ पहिँची। उसने देखा, रावण चारों ओर से मन्त्रियों से घिरा हुआ स्वर्ण के सिंहासन पर बैठा ऐसी शोभा पार रहा था जैसे स्वर्ण की वेदी में घी प्रज्वलित अग्नि। जिसने समुद्रों तथा पर्वतों पर विजय प्राप्त की है, नागराज वासुकि को परास्त कर तक्षक की प्रिय पत्नी का हरण किया है, कुबेर को जीत कर उससे पुष्पक विमान छीना है, इन्द्रादि देवता जिससे भयभीत रहते हैं, वायु देवता जिस पर पंखा डुलाते हैं, वरुण जिसके यहाँ पानी भरता है और जो मृत्यु को भी परास्त करने की सामर्थ्य रखता है, ऐसे परमप्रतापी भाई की बहन होकर मैं नाक-कान कटवा कर अपमान का विष पियूँ, धिक्कार है ऐसी वीरता और पराक्रम पर। यह सोचते हुये उसका सम्पूर्ण शरीर क्रोध और अपमान की ज्वाला ले जलने लगा। वह रावण के पास आ कर क्रोध से फुँफकारती हुई बोली, "धिक्कार है तुम पर, तुम्हारे शौर्य पर और तुम्हारे इन मन्त्रियों पर। तुम संसार से इतने अनजान होकर अपनी विलासिता में डूबे हुये हो कि तुम्हें यह भी पता नहीं कि तुम्हारी ओर तुम्हारा काल बढ़ा चला आ रहा है। हे नीतिवान रावण! क्या मुझे तुमको यह बताने की आवश्यकता है कि समय पर उचित कार्य न करने वाले और अपने देश की रक्षा के प्रति असावधा रहने वाले राजा का राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जिस राजा के गुप्तचर सक्रिय और सतर्क नहीं होते, वह वास्तव में राज्य करने योग्य नहीं होता। क्योंकि गुप्तचर ही उसके नेत्र होते हैं। उनके बिना वह अंधा होता हे। मैं देख रही हूँ कि तुम्हारे गुप्तचर मूर्ख, अयोग्य और आलसी हैं। मन्त्री भी सर्वथा अयोग्य हैं जो उन्हें अभी तक यह पता नहीं कि उनके राज्य दण्डकारण्य में कितनी भयंकर घटना घट चुकी है। चौदह सहस्त्र राक्षसों का मेरे वीर भ्राताओं खर-दूषण सहित संहार हो चुका है। तुम्हारी बहन के नाक-कान एक विदेशी ने काट लिये हैं। परन्तु सुरा और सुन्दरियों में व्यस्त रहने वाले तुम्हें और तुम्हारे मन्त्रियों को इस सबकी क्या चिन्ता है? जो ऋषि-मुनि कल तुम्हारे नाम से थर-थर काँपते थे वे आज सिर उठा कर निर्भय हो घूम रहे हैं। तुम्हें अब भी सोचना चाहिये कि वृक्ष से गिरे हुये पत्ते और राज्य से च्युत राजा का कोई मूल्य नहीं होता। जो राजा आँखों से सोता और नीति से जागता है, जिसका क्रोध प्रलयंकर और प्रसन्नता सुखदायिनी है, प्रजा उसी की पूजा करती है। किन्तु तुम में तो एक भी गुण नहीं है जो तुम राम द्वारा किये गये भीषण हत्याकाण्ड से अभी तक अपरिचित हो।"
शूर्पणखा के कटु वाक्य सुन कर रावण लज्जित होते हुये बोला, "मैं सब जानता हूँ शूर्पणखे! केवल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम राम और लक्ष्मण को मरा हुआ ही समझो। तेरे नाक-कान काटने वाले को अब कोई बचा नहीं सकता। मैंने भली-भाँति विचार कर लिया है कि मुझे क्या करना है। राम मेरे हाथों मारा जायेगा। सीता मेरे महलों की शोभा बढ़ायेगी और तेरी दासी बन कर रहेगी।"
इतना कह कर रावण ने मन्त्रियों को विदा किया और फिर आकाश मार्ग से मारीच के पास पहुँचा। उससे स्नेह दिखाता हुआ बोला, "मित्र मारीच! मित्र ही संकट के समय मित्र की सहायता करता है। मैं जानता हूँ कि मेरे मित्रों और शुभचिन्तकों में तुमसे बढ़ कर बलवान, नीतिवान और मुझसे सच्चा स्नेह करने वाला और कोई नहीं है। मुझे बहन शूर्पणखा की दशा देख कर बहुत दुःख हुआ है। उन दुष्टों ने यह भी नहीं सोचा कि एक स्त्री पर हाथ नहीं उठाना चाहिये। उन कायरों को अवश्य दण्ड देना होगा। यह नाक शूर्पणखा की नहीं, सम्पूर्ण राक्षस जाति की कटी। हमारे नामे से काँपने वाले ऋषि-मुनि आज हमारी कायरता पर हँसते हैं। इस अपमान से तो मर जाना ही अच्छा है। भाई मारीच! उठो और सम्पूर्ण राक्षस जाति की इस अपमान से रक्षा करो। मैं सीता का हरण अवश्य करूँगा। तुम नाना प्रकार के वेश धारण करने में अद्वितीय हो। मैं चाहता हूँ कि तुम चाँदी के बिन्दुओं वाला स्वर्णमृग बन कर राम के आश्रम के सानमे जाओ। तुम्हें देख कर सीता अवश्य राम-लक्ष्मण को तुम्हें पकड़ने के लिये भेजेगी। उन दोनों के चले जाने पर मैं अकेली सीता का अपहरण कर के ले जाउँगा। राम को सीता का वियोग असह्य होगा और विरही राम को मार डालना मेरे लिये कठिन नहीं होगा।"
रावण के प्रस्ताव से अपनी असहमति प्रकट करते हुये मारीच बोला, "हे लंकापति! मैं पहले भी तुमसे कह चुका हूँ कि ऐसा करना तुम्हारे लिये उचित नहीं होगा। यह कार्य तुम्हारे जीवन के लिये काल बन जायेगा। सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि वेद-शास्त्रों के ज्ञाता होते हुये भी तुम परस्त्री हरण जैसा भयंकर पाप करने जा रहे हो। स्मरण रखो, राम के क्रोध से तुम बच नहीं सकोगे।"
मारीच के उत्तर से कुपित हो हाथ में खड्ग ले कर रावण बोला, "मारीच! मैं तुझे अपना मित्र समझ कर तेरे पास आया था। तेरा अनर्गल प्रलाप सुनने के लिये नहीं। तेरी कायरतापूर्ण युक्तियों को सुन कर मैं अपना विचार नहीं बदल सकता। सीता का हरण मुझे अवश्य करना है और तुझे मेरे आज्ञा का पालन करना है। यदि तू मेरी आज्ञा मान कर मेरे इस कार्य में सहायता नहीं करेगा तो राम-लक्ष्मण से पहले मैं तेरा वध करूँगा।"
रावण के इन क्रुद्ध शब्दों से भयभीत हो मारीच ने अपनी सहमति दे दी। इससे प्रसन्न हो कर रावण बोला, "अब तू सच्चा राक्षस है और मेरे परम मित्र है।" इसके पश्चात् रावण उसे ले कर दण्डक वन में पहुँच राम के आश्रम की खोज करने लगा। जब आश्रम मिल गया तो मारीच ने रावण के निर्देशानुसा मृग का रूप धारण किया और आश्रम के निकट विचरण करने लगा। इस अद्भुत स्वर्णिम मृग की शोभा देख कर सीता आश्चर्यचकित रह गई और विस्मित हो कर उसके पास पहुँची। मायावी मारीच ने अपनी मृग-सुलभ क्रीड़ाओं से सीता का मन मुग्ध कर लिया।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 06:04:00 pm 0 comments
रामायण - अरण्यकाण्ड - महर्षि शरभंग का आश्रम
विराध राक्षस को मारकर सीता और लक्ष्मण के साथ राम महामुनि शरभंग के आश्रम में पहुँचे। उन्होंने देखा महर्षि शरभंग अत्यन्त वृद्ध और शरीर से जर्जर हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि उनका जीवन-दीप शीघ्र ही बुझने वाला है। उन्होंने महर्षि के चरणस्पर्श करके उन्हें अपना परिचय दिया। महर्षि शरभंग ने आगतों का सत्कार करते हुये कहा, "हे राम! इस वन-प्रान्त में तुम्हारे जैसे अतिथियों के दर्शन कभी-कभी ही होते हैं। मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था। अब तुम आ गये हो, इसलिये मैं इस नश्वर जर्जर शरीर का परित्याग कर ब्रह्मलोक में जाउँगा। मैं चाहता हूँ कि मेरी और्ध्व दैहिक क्रिया तुम्हारे ही हाथों से हो।" इतना कहकर महर्षि ने स्वयं अपने शरीर को प्रज्जवलित अग्नि को समर्पित कर दिया।
शरभंग के देहान्त के पश्चात् आश्रम की निकटवर्ती कुटियाओं में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों ने रामचन्द्र के पास आकर प्रार्थना की, "हे राघव! आप क्षत्रिय नरेश हैं। हम लोगों की रक्षा करना आपका कर्तव्य है। हम यहाँ तपस्या करते हैं और हमारी तपस्या के चौथाई भाग का फल राजा को प्राप्त होता है। परन्तु शोक की बात यह है कि आप जैसे धर्मात्मा राजाओं के होते हुये भी राक्षस लोग अनाथों की तरह हमें सताते हैं और हमारी हत्या करते हैं। इन राक्षसों ने पम्पा नदी, मन्दाकिनी और चित्रकूट में तो इतना उपद्रव मचा रखा है कि यहाँ तपस्वियों के लिये तपस्या करना ही नहीं जीना भी दूभर हो गया है। ये समाधिस्थ तपस्वियों को असावधान पाकर मृत्यु के घाट उतार देते हैं। इसलिये हम आपकी शरण आये हैं। इस असह्य कष्ट और अपमान से हमारी रक्षा करके आप हमें निर्भय होकर तप करने का अवसर दें।
तपस्वयों की कष्टगाथा सुनकर राम बोले, "हे मुनियों! मुझे आपके कष्टों की कहानी सुनकर बहुत दुःख हुआ है। आप मुझे बताइये, मुझे क्या करना चाहिये। पिता की आज्ञा से मैं चौदह वर्ष तक इन वनों में निवास करूँगा। इस अवधि में राक्षसों को चुन-चुन कर मैं उनका नाश करना चाहता हूँ। मैं आप सबके सम्मुख प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अपने भुजबल से पृथ्वी के समस्त मुनि-द्रोही राक्षसों को समाप्त कर दूँगा। मैं चाहता हूँ कि आप लोग मुझे आशीर्वाद दें जिससे मैं इस उद्देश्य में सफल हो सकूँ।
इस प्रकार उन्हें धैर्य बँधाकर और राक्षसों के विनाश की प्रतिज्ञाकर रामचन्द्र ने सीता और लक्ष्मण के साथ मुनि सुतीक्ष्ण के आश्रम में आये। वहाँ अतिवृद्ध महात्मा सुतीक्ष्ण के दर्शनकर उन्होंने उनके चरण स्पर्श किये और उन्हें अपना परिचय दिया। राम का परिचय पाकर महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुये और तीनों को समुचित आसन दे कुशलक्षेम पूछने लगे तथा फल आदि से उनका सत्कार किया। वार्तालाप करते करते जब सूर्यास्त की बेला आ पहुँची तो उन सबने एक साथ बैठकर सन्ध्या उपासना की। तीनों ने रात्रि विश्राम भी उनके आश्रम में ही किया। प्रातःकाल ऋषि की परिक्रमा करके राम बोले, "हे महर्षि! हमारा विचार दण्डक वन में निवास करने वाले ऋषि-मुनियों के दर्शन करने का है। हमने सुना है कि यहाँ ऐसे अनेक ऋषि-मुनि हैं जो सहस्त्रों वर्षों से केवल फलाहार करके दीर्घकालीन तपस्या करते हुये सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं। ऐसे महात्माओं के दर्शनों से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये आप हमें वहाँ जाने की आज्ञा दीजिये।"
राम की विनीत वाणी सुनकर महात्मा ने आशीर्वाद देकर प्रेमपूर्वक उन्हें विदा किया और कहा, "हे राम! तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो। वास्तव में यहाँ के तपस्वी अथाह ज्ञान और भक्ति के भण्डार हैं। उनके अवश्य दर्शन करो। इस वन का वातावरण भी तुम्हारे सर्वथा अनुकूल है। इसमें तुम लोग भ्रमण करके अपने वनवास के समय को सार्थक करो। इससे सीता और लक्ष्मण का भी मनोरंजन होगा।"
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 06:02:00 pm 0 comments
रामायण - अरण्यकाण्ड - सीता की शंका
मार्ग में सीता रामचन्द्र से बोलीं, "नाथ! मेरे मन में एक शंका उठ रही है। आप शास्त्रों के ज्ञाता तथा धर्म पर सुदृढ़ रहने वाले होते हुये भी ऐसे कार्य में प्रवृत होने जा रहे हैं जो आपके करने योग्य नहीं है। हे स्वामी! मनुष्य के तीन दोष ऐसे हैं जिनका उन्हें परित्याग करना चाहिये। क्योंकि ये इच्छा से उत्पन्न होते हैं। वे दोष हैं मिथ्या भाषण जो आपने न कभी किया है और न करेंगे। दूसरा दोष हौ पर-स्त्रीगमन जो धर्म का नाश करके लोक परलोक दोनों को ही बिगाड़ता है। यह कार्य भी आपके लिये असम्भव है क्योंकि आप एकपत्नीव्रतधारी और महान सदाचारी हैं। तीसरा दोष है रौद्रता। यह दोष आपको लगता प्रतीत होता है क्योंकि आपने इन तपस्वियों के सामने राक्षसों को समूल नष्ट कर डालने की जो प्रतिज्ञा की है, उसी में मुझे दोष दिखाई दे रहा है। इस तपोभूमि में आपने लक्ष्मण के साथ जो धनुष चढ़ाकर प्रवेश किया है, उसे मैं कल्याणकारी नहीं समझती। जिन राक्षसों ने आपको कोई क्षति नहीं पहुँचाई है, उनकी हत्या करके आप व्यर्थ ही अपने हाथों को रक्त-रंजित करें, यह मुझे अच्छा नहीं लगता। इसे मैं अनुचित और दोषपूर्ण कृत्य समझती हूँ।
मैंने बचपन में एक वृतान्त सुना था, वह मुझे स्मरण आ रहा है। किसी वन में एक ऋषि तपस्या करते थे। वे केवल फलाहार करके ईश्वर की आराधना में तल्लीन रहते थे। उनकी इस कठिन तपस्या से भयभीत होकर इन्द्र ने उनकी तपस्या को भंग करना चाहा। वे एक दिन उनकी तपस्या भंग करने के लिये ऋषि के आश्रम में पहुँचे और विनीत स्वर में बोले, "हे मुनिराज! मेरा यह खड्ग आप अपने पास धरोहर के रूप में रख लीजिये, आवश्यकता पड़ने पर मैं इसे आपके पास से वापस ले जाउँगा। ऋषि ने वह खड्ग लेकर अपनी कमर में बाँध लिया जिससे वह खो न जाय। खड्ग कमर में बाँधने के प्रभाव से उनमें तामस भाव उत्पन्न हुआ और प्रवृति में रौद्रता आने लगी। परिणाम यह हुआ कि अब वे तपस्या तो कम करते किन्तु निरीह पशुओं का शिकार अधिक करते। इस पापकर्म के फलस्वरूप अन्त में उन्हें नर्क की यातना सहनी पड़ी। इसीलिये हे नाथ। इस प्राचीन कथा को ध्यान में रखते हुये मैं आपसे कहना चाहती हूँ कि शस्त्र और अग्नि की संगति एक सा प्रभाव दिखाने वाली होती है। आपने जो यह भीषण प्रतिज्ञा की है और आप जो दोनों भाई निरन्तर धनुष उठाये फिरते हैं, आप लोगों के लिये कल्याणकारी नहीं है। आपको निर्दोष राक्षसों की हत्या नहीं करनी चाहिये। आपके प्रति उनका कोई बैर-भाव नहीं है। फिर बिना शत्रुता के किसी की हत्या करना लोक में निन्दा का कारण बनती है। हे नाथ! आप ही सोचिये, कहाँ वन का शान्त तपस्वी अहिंसामय जीवन और कहाँ शस्त्र-संचालन। कहाँ तपस्या और कहाँ निरीह प्राणियों की हत्या। ये परस्पर विरोधी बातें हैं। जब आपने वन में आकर तपस्वी का जीवन अपनाया है तो उसी का पालन कीजिये। वैसे भी सनातन नियम यह है कि बुद्धमान लोग कष्ट सहकर भी अपने धर्म की साधना करते हैं। यह तो आप जानते हैं कि संसार में कभी सुख से सुख नहीं मिलता, दुःख उठाने पर ही सुख की प्राप्ति होती है।"
सीता के वचन सुनकर राम बोले, "प्रिये! जो कुछ तुमने कहा, उसमें कोई अनुचित बात नहीं है। फिर तुमने यह बात मेरे कल्याण की दृष्टि से कही है। तुम्हारा यह कथन भी सर्वथा उचित है कि धनुष बाण धारण करने का एकमात्र प्रयोजन आर्यों की रक्षा करना है। तुम यह देख चुकी हो कि यहाँ निवास करने वाले ऋषि-मुनि और तपस्वी राक्षसों के हाथों अत्यन्त दुःखी हैं और वे उनसे अपनी रक्षा चाहते हैं तथा इसके लिये उन्होंने मुझसे प्रार्थना भी की है। उनकी रक्षा के लिये ही मैंने प्रतिज्ञा भी की है। असहाय और दुखियों की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म है। क्या तुम यह उचित समझती हो कि मैं उस प्रतिज्ञा को भंग कर दूँ? यह तो तुम नहीं चाहोगी कि मैं प्रतिज्ञा भंग करके झूठा कहलाऊँ जबकि सत्य मुझे प्राणों से भी प्रिय है। ऋषि-मुनि और ब्राह्मणों की सेवा तो मुझे बिना कहे ही करनी चाहिये। फिर मैं तो उन्हें वचन भी दे चुका हूँ। फिर भी जो कुछ तुमने कहा उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।"
इसके पश्चात् राम ने सीता और लक्ष्मण को साथ लेकर अगस्त्य मुनि के दर्शन के लिये प्रस्थान किया। इस प्रकार अनेक ऋषि-मुनियों के दर्शन करते और वनों में भ्रमण करते हुये उन्हें दस वर्ष बीत गये। इस अवधि में उन्होंने अनेक स्थानों पर एक-एक दो-दो वर्ष तक कुटिया बनाकर निवास किया। बीच बीच में अगस्त्य मुनि का आश्रम भी खोजते रहे परन्तु अनेक प्रयत्न करने पर भी उनका आश्रम न पा सके। अन्त में वे लौटकर फिर सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में आये और बोले, "मुनिराज! मैं पिछले दस वर्ष से वन में भटककर महर्षि अगस्त्य के आश्रम की खोज कर रहा हूँ किन्तु अभी तक उनके दर्शन का लाभ प्राप्त नहीं कर सका हूँ। उनके दर्शनों की मुझे तीव्र लालसा है। इसलिये कृपा करके आप उनका ऐसा पता बताइये जिससे मैं सरलता से उनके आश्रम में पहुँच सकूँ।
राम के वचन सुनकर महर्षि सुतीक्ष्ण ने कहा, "हे राम! तुम मेरे आश्रम से दक्षिण दिशा की ओर सोलह कोस जाओ। वहाँ तुम्हें एक विशाल पिप्पली वन दिखाई देगा। उस वन में प्रत्येक ऋतु में खिलने वाले सुगन्धियुक्त रंग-बिरंगे फूलों से लदे वृक्ष मिलेंगे। उन पर नाना प्रकार की बोलियों में कलरव करते हुये असंख्य पक्षी होंगे। अनेक प्रकार के हंसों, बकों, कारण्डवों आदि से युक्त सरोवर भी दिखाई देंगे। इसी वातावरण में महात्मा अगस्त्य के भाई का आश्रम है जो वहाँ ईश्वर साधना में निमग्न रहते हैं। कुछ दिन उनके आश्रम में रहकर विश्राम करें। जब तुम्हारी मार्ग की क्लान्ति मिट जाय तो वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर वन के किनारे चलना। वहाँ से चार कोस की दूरी पर महर्षि अगस्तय का शान्त मनोरम आश्रम है जिसके दर्शन मात्र से अद्वितीय शान्ति मिलती है।
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रामायण – अरण्यकाण्ड - अगस्त्य मुनि के आश्रम में
सुतीक्ष्ण मुनि से विदा ले कर राम, सीता और लक्ष्मण ने वहाँ से प्रस्थान किया। मार्ग के नदी, पर्वतों एवं उपत्यकाओं की शोभा को निरखते हुये, दो दिन महर्षि अगस्त्य के भाई के आश्रम में विश्राम करने के पश्चात् अन्त में वे अगस्त्य मुनि के आश्रम के निकट जा पहुँचे। आश्रम के निकट का वातावरण बड़ा हृदयहारी था। सुन्दर विशाल वृक्ष पुष्पवती लताओं से सजे हुये थे। अनेक वृक्ष हाथियों द्वारा तोड़े जाकर पृथ्वी पर पड़े थे। वृक्षों की ऊँची-ऊँची शाखाओं पर वानरवृन्द अठखेलियाँ कर रहे थे। पक्षियों का कलरव उनकी क्रीड़ाओं को तालबद्ध कर रहा था। हिंसक पशु भी हिरण आदि के साथ कल्लोल कर रहे थे। यह देखकर राम लक्ष्मण से बोले, "देखो सौमित्र! इस आश्रम का प्रभाव कितना अद्भुत और स्नेहपूर्ण है कि जन्मजात शत्रु भी परस्पर स्नेह का बर्ताव करते हैं और एक दूसरे की हत्या नहीं करते। यह महर्षि के तपोबल का ही प्रभाव है। राक्षस भी यहाँ किसी प्रकार का उपद्रव नहीं करते। मैंने तो यह भी सुना है कि उनके प्रभाव से अनेक राक्षस अपनी तामसी वृति का त्याग करके उनके अनन्य भक्त बन गये हैं। यही कारण है कि इस युग के ऋषि-मुनियों में महामुनि अगस्त्य का स्थान सर्वोपरि है। उनकी कृपा से इस वन में निवास करने वाले देवता, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर सब मानवीय धर्मों का पालन करते हुये बड़े प्रेम से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इस परम शान्तिप्रद वन में चोर, डाकू, लम्पट, दुराचारी व्यक्ति दिखाई भी नहीं देते। ऐसे महात्मा महर्षि के आज हम दर्शन करेंगे। तुम आगे जाकर मेरे आने की सूचना दो।"
राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने आश्रम में प्रवेश किया और अपने सम्मुख महर्षि के शिष्य को पाकर उससे बोले, "हे सौम्य! तुम महर्षि अगस्त्य को सादर सूचित करो कि अयोध्या के परम तेजस्वी सूर्यवंशी सम्राट दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र जी अपनी पत्नी जनकनन्दिनी सीता के साथ उनके दर्शन के लिये पधारे हैं। वे बाहर अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।" शिष्य से लक्ष्मण का संदेश सुनकर अगस्त्य मुनि बोले, "यह तो बड़ा आनन्ददायक समाचार तू ने सुनाया है। राम की प्रतीक्षा करते हुये मेरे नेत्र थक गये थे। तू जल्दी से जाकर राम को जानकी और लक्ष्मण के साथ मेरे पास ले आ।" मुनि का आदेश पाते ही शिष्य राम, सीता और लक्ष्मण को लेकर मुनि के पास पहुँचा जो पहले से ही उनके स्वागत के लिये कुटिया के बाहर आ चुके थे। तेजस्वी मुनि को स्वयं स्वागत के लिये बाहर आया देख राम ने श्रद्धा से सिर नवा कर उन्हें प्रणाम किया। सीता और लक्ष्मण ने भी उनका अनुसरण किया। अगस्त्य मुनि ने बड़े प्रेम से उन सबको बैठने के लिये आसन दिये। कुशलक्षेम पूछ कर तथा फल-फूलों से उनका सत्कार कर वे बोले, "हे राम! मैंने दस वर्ष पूर्व तुम्हारे दण्डक वन में आने का समाचार सुना था। तभी से मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। आज मेरे सौभाग्य है कि मेरी इस कुटिया में तुम्हारे जैसा धर्मात्मा, सत्यपरायण, प्रतिज्ञापालक, पितृभक्त अतिथि आया है। वास्तव में मेरी कुटिया तुम्हारे आगमन से धन्य हो गई है।" इसके पश्चात् महर्षि ने राम को कुछ दैवी अस्त्र-शस्त्र देते हुये कहा, "हे राघव! जब देवासुर संग्राम हुआ था, उस समय से ये कुछ दिव्य अस्त्र मेरे पास रखे थे। आज इन्हें मैं तुम्हें देता हूँ। इनका उपयोग जितना उचित तुम कर सकते हो अन्य कोई धर्मपरायण योद्धा नहीं कर सकता। इस धनुष का निर्माण विश्वकर्मा ने स्वर्ण और वज्र के सम्मिश्रण से किया है। ये बाण स्वयं ब्रह्मा जी ने दिये थे। स्वर्ण किरणों की भाँति चमकने वाले ये बाण कभी व्यर्थ नहीं जाते। यह तरकस जो मैं तुम्हें दे रहा हूँ, मुझे देवाधिपति इन्द्र ने दिये थे। इनमें अग्नि की भाँति दाहक बाण भरे हुये हैं। यह खड्ग कभी न टूटने वाला है चाहे इस पर कैसा ही वार किया जाय। मुझे विश्वास है कि इन अस्त्र-शस्त्रों को धारण कर के तुम इन्द्र की भाँति अजेय हो जाओगे। इनकी सहायता से इस दण्डक वन में जो देव-तपस्वी द्रोही राक्षस हैं, उनका नाश करो।"
राम ने महर्षि के इस कृपापूर्ण उपहार के लिये उन्हें अनेक धन्यवाद दिये और बोले, "मुनिराज! यह आपकी अत्यन्त अनुकम्पा है जो आपने मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों के योग्य समझा। मैं यथाशक्ति इनका उचित उपयोग करने का प्रयास करूँगा।" राम के विनीत शब्द सुन कर मुनि ने कहा, "नहीं राम! इसमें अनुकम्पा की कोई बात नहीं है। तुम वास्तव में मेरे आश्रम में आने वाले असाधारण अतिथि हो। तुम्हें देख कर मैं कृत-कृत्य हो गया हूँ। लक्ष्मण भी कम महत्वपूर्ण अतिथि नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी विशाल बलिष्ठ भुजाएँ विश्व पर विजय पताका फहराने के लिये ही बनाई गई है। और जानकी का तो पति-प्रेम तथा पति-निष्ठा संसार की स्त्रियों के लिये अनुकरणीय आदर्श बन गये हैं। इन्होंने कभी कष्टों की छाया भी नहीं देखी, तो भी केवल पति भक्ति के कारण तुम्हारे साथ इस कठोर वन में चली आई हैं। वास्तव में इनका अनुकरण करके सन्नारियाँ स्वर्ग की अधिकारिणी हो जायेंगीं। तुम तीनों को अपने बीच में पाकर मेरा हृदय फूला नहीं समा रहा है। तुम लोग इतनी लम्बी यात्रा करके आये हो, थक गये होगे। अतएव अब विश्राम करो। मेरी तो इच्छा यह है कि तुम लोग वनवास की शेष अवधि यहीं व्यतीत करो। यहाँ तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न होगा।"
ऋषि के स्नेह भरे वचन सुन कर राम ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया, "हे मुनिराज! जिनके दर्शन बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं तथा दीर्घकाल तक तपस्या करने वाले ऋषि मुनियों को भी दुर्लभ हैं, उनके दर्शन मैं आज इन नेत्रों से कर रहा हूँ। भला इस संसार में मुझसे बढ़ कर भाग्यशाली कौन होगा? आपकी इस महान कृपा और अतिथि सत्कार के लिये मैं सीता और लक्ष्मण सहित आपका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करते हुये हम लोग आज की रात्रि अवश्य यहीं विश्राम करेंगे किन्तु वनवास की शेष अवधि आपके मनोरम आश्रम में हृदय से चाहते हुये भी बिताना सम्भव नहीं होगा। मैं आपकी तपस्या में किसी भी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं करना चाहता, परन्तु आपकी सत्संगति के लाभ से भी वंचित नहीं होना चाहता। इसलिये कृपा करके कोई ऐसा स्थान बताइये जो फलयुक्त वृक्षों, निर्मल जल तथा शान्त वातावरण से युक्त सघन वन हो। वहाँ मैं आश्रम बना कर निवास करूँगा। यहाँ से अधिक दूर भी न हो।"
राम की बात सुनकर अगस्त्य मुनि ने कुछ क्षण विचार करके उत्तर दिया, "हे राम! तुम्हारे यहाँ रहने से मुझे कोई असुविधा नहीं होगी। यदि फिर भी तुम किसी एकान्त स्थान में अपना आश्रम बनाना चाहते हो तो यहाँ से आठ कोस दूर पंचवटी नामक महावन है। वह स्थान वैसा ही है जैसा तुम चाहते हो। वहाँ पर गोदावरी नदी बहती है। वह स्थान अत्यन्त रमणीक, शान्त, स्वच्छ एवं पवित्र है। सामने जो मधुक वन दिखाई देता है, उत्तर दिशा से पार करने के पश्चात् तुम्हें एक पर्वत दृष्टिगोचर होगा। उसके निकट ही पंचवटी है। वह स्थान इतना आकर्षक है कि उसे खोजने में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी।"
मुनि का आदेश पाकर सन्ध्यावन्दन आदि करके राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ रात्रि अगस्त्य मुनि के आश्रम में ही विश्राम किया। प्रातःकालीन कृत्यों से निबटकर महामुनि से विदा हो राम ने अपनी पत्नी तथा अनुज के साथ पंचवटी की ओर प्रस्थान किया।
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रामायण – अरण्यकाण्ड - पंचवटी में आश्रम
पंचवटी की ओर जाते हुये राम, सीता और लक्ष्मण की दृष्टि एक पर्वताकार बलिष्ठ व्यक्ति पर पड़ी। लक्ष्मण ने इस असाधारण आकार वाले मनुष्य को देखकर समझ लिया कि यह कोई राक्षस है। इसलिये धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते हुये उससे बोले, "तुम कौन हो?" लक्ष्मण के इस प्रश्न का उसने कोई उत्तर नहीं दिया, किन्तु राम की ओर दोनों हाथ जोड़ कर बोला, "हे रघुकुलतिलक! जब से मुझे ज्ञात हुआ कि आप दण्डकारण्य में पधारे हुये हैं, तभी से आपकी प्रतीक्षा में मैं यहाँ पड़ा हुआ हूँ। आपकी प्रतीक्षा करते हुये मुझे अनेक वर्ष व्यतीत हो गये हैं। मेरा नाम जटायु है और मैं गृद्ध जाति के यशस्वी व्यक्ति अरुण का पुत्र हूँ। मेरा निवेदन है कि आप मुझे अपने साथ रहने की अनुमति दें ताकि मैं सेवक की भाँति आपके साथ रहकर आपकी सेवा कर सकूँ।" यह कह कर वह राम और लक्ष्मण के साथ चलने लगा।
पंचवटी में पहुँच कर राम ने लक्ष्मण से कहा, "भैया लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि अगस्त्य ने जिस पंचवटी का वर्णन किया था, वह यही है और हम सही स्थान पर आ पहुँचे हैं। सामने गोदावरी नदी भी कल-कल करती हुई बह रही है। इसलिये कोई अच्छा सा स्थान खोज कर उस पर आश्रम बनाने की तैयारी करो।" राम के प्रस्ताव का समर्थन करते हुये सीता ने भी कहा, "हाँ नाथ! यह स्थान वास्तव में उपयुक्त है। गोदावरी के तट पर पुष्पों से लदे वृक्ष कितने अच्छे लग रहे हैं। वृक्षों पर लगे अनेक प्रकार के फल-फूल स्वर्ण, रजत एवं ताम्र के सदृश चमक रहे हैं। इन रंग-बिरंगे पुष्पों वाले वृक्षों से युक्त पर्वत ऐसे प्रतीत होते हैं, मानों गजों के समूह ने ऋंगार किया हो। मुझे तो ताल, तमाल, नागकेशर, कटहल, आम, अशोक, देवदारु, चन्दन, कदम्ब आदि के वृक्षों से तथा केवड़ा, मोतिया, चम्पक, गेंदा, मौलसिरी आदि रंग-बिरंगे पुष्पों से सुसज्जित वन अत्यन्त मनोरम प्रतीत होता है। आप अपना आश्रम यहीं बनाइये। मेरा मन भी यहाँ भली भाँति रम जायेगा।"
राम का प्रस्ताव और सीता का अनुमोदन पाकर लक्ष्मण ने लकड़ियों तथा घास-फूसों की सहायता से एक कुटिया का निर्माण कर लिया। जब यह कुटिया बनकर पूरी हो गई तो उसी के निकट उन्होंने एक और कुटिया का निर्माण सुन्दर लता-पल्लवों से किया और उस में सुन्दर स्म्भों से युक्त यज्ञ वेदी बनाई। तत्पश्चात् उन्होंने पूरे आश्रम के चारों ओर काँटों की बाड़ लगा दी। फिर राम और सीता को बुला कर आश्रम का निरीक्षण कराया। वे इस सुन्दर आश्रम को देख कर बहुत प्रसन्न हुये और लक्ष्मण की सराहना करते हुये बोले, "लक्ष्मण! तुमने तो इस बीहड़ वन में भी राजप्रासाद जैसा सुविधाजनक निवास स्थान बना दिया। तुम्हारे कारण तो मुझे वन घर से भी अधिक सुखदायक हो गया है।" इसके पश्चात् उन दोनों के साथ बैठ कर राम ने यज्ञ-कुटीर में हवन किया। वे वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे और लक्ष्मण दत्तचित्त होकर उन दोनों की सेवा करने लगे। इस प्रकार उन्होंने शरद ऋतु के दो मास सुख से बिता दिये।
एक दिन हेमन्त ऋतु की प्रातः बेला में राम सीता के साथ गोदावरी में स्नान करने के लिये जा रहे थे। लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे घड़ा उठाये चल रहे थे। शीतल वायु बह रही थी जिससे शरीर सुन्न हुआ जा रहा था। सरिता के तट पर पहुँच कर लक्ष्मण को ध्यान आया कि हेमन्त ऋतु रामचन्द्र जी की कितनी प्रिय ऋतु रही है इसलिये वे तट पर घड़े को रख कर बोले, "भैया! यही वह हेमन्त ऋतु है जो आपको सदा सर्वाधिक प्रिय रही है। इस ऋतु को आप वर्ष का आभूषण कहा करते थे। अब कठोर शीत पड़ने लगी है। पृथ्वी अन्नपूर्णा बन गई है। ग्रीष्म ऋतु में जितना जल सुहावना लगता था, आज उतनी ही अग्नि सुहावनी लगती है। नागरिक लोग धूमधाम से यज्ञों में अन्न की हवि देकर उसका पूजन करने लगे हैं। सम्पूर्ण भारत भूमि में दूध-दही की नदियाँ बहने लगी हैं। राजा-महाराजा अपनी-अपनी चतुरंगिणी सेनाएँ लेकर शत्रुओं को पराजित करने के लिये निकल पड़े हैं। सूर्य के दक्षिणायन होने से उत्तर दिशा की शोभा समाप्त हो गई है। आजकल सूर्य का ताप और अग्नि की उष्मा दोनों ही प्रिय लगते हैं। रात्रियाँ हिम जैसी ठण्डी हो गई हैं। उधर देखिये प्रभो! जौ और गेहूँ से भरे खेतों में ओस के बिन्दु मोतियों की भाँति झिलमिला रहे हैं। इधर ओस के जल से भीगी हई रेत पैरों को घायल कर रही है। उधर भैया भरत अयोध्या में रहते हुये भी वनवासी का जीवन व्यतीत करते हुये ठण्डी भूमि पर शयन करते होंगे। वे भी सब प्रकार के ऐश्वर्यों को लात मार कर आपकी भाँति त्याग एवं कष्ट का जीवन व्यतीत कर रहे होंगे। हे तात! विप्रजन कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव उसकी माता के अनुकूल होता है, पिता के नहीं, परन्तु भरत ने इस कहावत को मिथ्या सिद्ध कर दिया है। उनका स्वभाव अपनी माता के क्रूर स्वभाव से कदापि मेल नहीं खाता। उनकी माता का क्रूर स्वभाव वास्तव में हमारे और सम्पूर्ण देश के दुःख का कारण बन गया है।"
लक्ष्मण के मुख से कैकेयी के लिये निन्दा भरे वचन सुन कर राम बोले, "लक्ष्मण! इस प्रकार माता कैकेयी की निन्दा मत करो। वनवास में मैंने तापस धर्म ग्रहण किया है और तपस्वी के लिये किसी की निन्दा करना या सुनना दोनों ही पाप है। फिर कैकेयी जैसी भरत की माता हैं, वैसी ही मेरी भी माता हैं। हमें भरत के उन विनम्र, मधुर एवं स्नेहयुक्त वचनों को स्मरण रखना चाहिये जो उन्होंने चित्रकूट में आकर कहे थे। मैं तो व्यग्रता से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब हम चारों भाई फिर एकत्रित होकर एक दूसरे के गले मिलेंगे।" इस प्रकार भरत के वियोग में व्याकुल होते हुये राम सीता और लक्ष्मण के साथ गोदावरी के शीतल जल में स्नान कर के अपने आश्रम लौटे।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:59:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - शूर्पणखा के नाक-कान काटना
जब रामचन्द्र सीता और लक्ष्मण के साथ अपने आश्रम में पहुँचे तो उन्होंने आश्रम के निकट एक राक्षस कन्या को देखा जो राम के तेजस्वी मुखमण्डल, कमल-नयन तथा नीलम्बुज सदृश शरीर की कान्ति को देख कर ठगी सी खड़ी थी। अकस्मात् उसके भावों में परिवर्तन हुआ और वह राम को वासनापूर्ण दृष्टि से देखने लगी। वह उनके पास आकर बोली, "तुम कौन हो और इस वन में क्यों आये हो? यहाँ तो राक्षसों का राज्य है। वेश तो तुम्हारा तपस्वियों जैसा है, परन्तु हाथों में धनुष बाण लिये हो। साथ में स्त्री को लिये घूमते हो। ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। इसलिये तुम अपना परिचय देकर मेरे आश्चर्य का निवाराण करो और अपना पूरा वृतान्त सुनाओ।"
राम ने सरल भाव से उत्तर दिया, "हे राक्षसकन्ये! मैं अयोध्या के चक्रवर्ती नरेश महाराजा दशरथ का ज्येष्ठ पुत्र राम हूँ। यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है और यह जनकपुरी के महाराज जनक की राजकुमारी तथा मेरी पत्नी सीता है। पिताजी की आज्ञा से हम चौदह वर्ष के लिये वनों में निवास करने के लिये आये हैं। यही हमारा परिचय है। अब तुम जुझे अपना परिचय देकर मेरी इस जिज्ञासा को शान्त करो कि तुम इस भयंकर वन में अकेली इस प्रकार क्यों घूम रही हो?" राम का प्रश्न सुन कर राक्षसी बोली, "मेरा नाम शूर्पणखा है और मैं लंका के नरेश परम प्रतापी महाराज रावण की बहन हूँ। सारे संसार में विख्यात विशालकाय कुम्भकरण और परम नीतिवान विभीषण भी मेरे भाई हैं। वे सब लंका में निवास करते हैं। पंचवटी के स्वामी खर और दूषण भी मेरे भाई हैं। वे अत्यन्त पराक्रमी हैं। संसार में बिरला ही कोई वीर ऐसा होगा जो इन दोनों भाइयों के सामने समरभूमि में ठहर कर उनसे लोहा ले सके। यह तो हुआ मेरा परिचय, अब मैं तुम्हें कुछ अपने विषय में बताती हूँ। यह तो तुम देख ही रहे हो कि मैं रति से भी सुन्दर, पूर्ण यौवना और लावण्यमयी हूँ। तुम्हारे सुन्दर रूप और कान्तिमय बलिष्ठ युवा शरीर को देख कर मैं तुम्हें अपना हृदय अर्पित कर बैठी हूँ। मैं चाहती हूँ कि तुम पत्नी के रूप में मुझे स्वीकार कर के अपना शेष जीवन आनन्दपुर्वक बिताओ। यह तुम्हारे लिये अत्यन्त सौभाग्य की बात होगी कि मुझसे विवाह कर के तुम सहज ही त्रैलोक्य में विख्यात अद्भुत पराक्रमी लंकापति महाराज रावण के सम्बंधी बन जाओगे और फिर तुम्हारी ओर कोई आँख उठा कर भी नहीं देख सकेगा। मुझे पाने के लिये सैकड़ों राजकुमार अपने प्राण न्यौछावर करने को तैयार हैं, जबकि मैं स्वयं तुम्हारे सम्मुख अपना हाथ बढ़ा रही हूँ।"
शूर्पणखा के प्रस्ताव को सुन कर राम ने उत्तर दिया, "भद्रे! तुम देख रही हो कि मैं विवाहित हूँ और मेरी पत्नी मेरे साथ है। ऐसी दशा में मेरा तुसे विवाह करना कदापि उचित नहीं हो सकता। यह धर्मानुकूल भी नहीं है। हाँ मेरा भाई लक्ष्मण यहाँ अकेला है। यदि तुम चाहो और वह सहमत हो तो तुम उससे विवाह कर सकती हो। इस विषय में उससे बात कर के तुम देख लो।"
राम का उत्तर सुन कर शूर्पणखा ने लक्ष्मण को वासनामयी दृष्टि से देखा और फिर लक्ष्मण के पास जाकर बोली, "हे राजकुमार! तुम सुन्दर हो और मैं युवा हूँ। ऐसी दशा में तुम्हारी और मेरी जोड़ी खूब फबेगी। मुझसे विवाह कर के तुम्हारा रावण के साथ जो सम्बंध स्थापित होगा, उससे तुम्हारी स्थिति राम से भी श्रेष्ठ हो जायेगी। इसलिये तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लो। फिर तुम्हारा वनवास का कटु जीवन सुख और ऐश्वर्य में बदल जायेगा।" शूर्पणखा की कामातुर भंगिमा देख और विवाह का प्रस्ताव सुन कर वाक् चतुर लक्ष्मण ने कहा, "सुन्दरी! तुम राजकुमारी हो, मैं राम का एक साधारण सा दास हूँ। तुम मेरी पत्नी बन कर केवल दासी कहलाओगी। क्या किसी महान देश की राजकुमारी होकर दासी बनना तुम्हें शोभा देगा? इससे तो अच्छा है कि तुम राम से ही विवाह कर के उनकी छोटी भार्या बन जाओ। तुम जैसी रूपवती उन्हीं के योग्य है।" शूर्पणखा को लक्ष्मण के प्रशंसा भरे युक्तिपूर्ण वचन अच्छे लगे और वह पुनः राम के पास जा कर क्रोध से बोली, "हे राम! इस कुरूपा सीता के लिये तुम मेरा विवाह प्रस्ताव अस्वीकार कर के मेरा अपमान कर रहे हो। लो, पहले मैं इसे ही मार कर समाप्त किये देती हूँ। उसके पश्चात् तुम्हारे साथ विवाह कर के मैं अपना जीवन आनन्द से बिताउँगी।" इतना कह कर भयंकर क्रोध करती हुई शूर्पणखा बिजली जैसे वेग से सीता पर झपटी। इस आकस्मिक आक्रमण को राम ने बड़ी कठिनता किन्तु तत्परता से रोका। शूर्पणखा को सीता से अलग करते हुये वे लक्ष्मण से बोले, "हे वीर! इस दुष्टा राक्षसी से अधिक बात करना या इसके साथ हास्य विनोद करना उचित नहीं है। इसने तो जनकनन्दिनी की हत्या ही कर डाली होती। तुम इसके नाक कान काट कर इस दुश्चरित्र को ऐसी शिक्षा दो कि भविष्य में फिर कभी ऐसा आचरण न कर सके।"
राम की आज्ञा पाते ही लक्ष्मण ने तत्काल खड्ग निकाल कर दुष्टा शूर्पणखा के नाक-कान काट डाले। नाक-कान कटने की पीड़ा और घोर अपमान के कारण रोती हुई शूर्पणखा अपने भाइयों, खर-दूषण, के पास पहुँची और घोर चीत्कार कर के उनके सामने गिर पड़ी।
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रामायण – अरण्यकाण्ड - खर-दूषण से युद्ध
अपनी बहन शूर्णखा को उठा कर जब खर ने उसका रक्त-रंजित मुखमण्डल देखा तो वह क्रोध से काँपते हुये बोला, "बहन! यह क्या हुआ? किस दुष्ट ने तेरे नाक-कान काटने का दुःसाहस किया? किसने आज इस सोते हुये नागराज को छेड़ने की मूर्खता की है? किसके सिर पर काल नाच रहा है? तू शीघ्र उसका नाम बता और सारा वृतान्त विस्तारपूर्वक कह, मैं अभी उस दुष्ट को इस पृथ्वी से समाप्त कर दूँगा।"
खर के इन वचनों सुन कर शूर्पणखा का कुछ धैर्य बँधा और वह रोते-रोते खर को बताने लगी, "अयोध्या के राजा दशरथ के दो पुत्र राम और लक्ष्मण इस वन में आये हुये हैं। साथ में राम की भार्या सीता भी है। वे दोनों भाई बड़े सुन्दर, पराक्रमी और तपस्वी मालूम होते हैं। जब मैंने उनसे उस स्त्री के विषय में पूछा तो वे चिढ़ गये। उनमें से एक ने मेरे नाक-कान काट लिये। भैया! तुम शीघ्र उन्हें मार कर उनसे मेरे अपमान का बदला लो। जब तक मैं उन तीनों का गरम-गरम रुधिर न पी लूँगी, मुझे शान्ति नहीं मिल सकती। इतना सुनते ही खर ने अपनी सेना के चौदह सबसे भयंकर योद्धा एवं पराक्रमी राक्षसों को आदेश दिया कि शूर्पणखा के साथ जा कर उन तीनों का वध करो। मेरी बहन को वहीं उनके शरीर का गरम-गरम रक्त पिला कर इसके अपमान की ज्वाला को शान्त करो। खर की आज्ञा पाकर वे राक्षस भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर राम, लक्ष्मण तथा सीता को मारने के लिये शूर्पणखा के साथ चल पड़े।
जब राम ने शूर्पणखा को इस राक्षस दल के साथ आते देखा तो वे लक्ष्मण से बोले, "लक्ष्मण! ये राक्षस शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिये आ रहे हैं। तुम सीता की रक्षा करो। मैं अभी एक-एक को मार कर यमलोक भेजता हूँ।" इसके पश्चात् जब तक राक्षस उनके पास पहुँचें, राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर बाण सँभाले युद्ध के लिये तैयार हो चुके थे। फिर उनसे बोले, "दुष्टों! हम लोग इस वन में निवास करते हुये तपस्वी धर्म का पालन कर रहे हैं और किसी निर्दोष को कभी नहीं छेड़ते। इसलिये तुम भी यदि अपनी भलाई चाहते हो तो यहाँ से लौट जाओ।" राम के वचन सुन कर बिना कोई उत्तर दिये ही उन राक्षसों ने एक साथ राम पर अपने शस्त्रों से आक्रमण कर दिया। इस पर राम ने एक साथ चौदह बाण छोड़े जिन्होंने उनकी छातियों में घुस कर उनके प्राणों का हरण कर लिया। वे भूमि पर गिर कर तड़पने लगे। फिर वे सब मृत्यु को प्राप्त हुये। सब राक्षसों को इस प्रकार मरा देख शूर्पणखा रोती-बिलखती खर के पास जाकर बोली, "उन सब राक्षसों को अकेले राम ने ही मार डाला। वे सब मिल कर भी उसका कुछ न बिगाड़ सके। मुझे तो ऐसा लगता है कि वे तुम्हारे सब योद्धाओं को पल भर में समाप्त कर देंगे। तुम अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा कर उससे युद्ध करो। यदि तुमने मेरे अपमान का प्रतिशोध नहीं लिया तो मैं आत्महत्या करके अपने प्राण त्याग दूँगी।"
शूर्पणखा के इन वचनों को सुन कर खर ने क्रोधित होकर कहा, "शूर्पणखे! तू अकारण ही भयभीत हो कर आत्महत्या करने का प्रलाप कर रही है। मैं तत्काल जाकर उन दोनों भाइयों का वध कर डालूँगा। उनका तेज मेरे सामने वैसा ही है जैसे कि सूर्य के सामने जुगनू। तू व्यर्थ की चिंता त्याग दे।" इस भाँति शूर्पणखा को सान्त्वना देकर खर चौदह सहस्त्र विकट योद्धाओं वाली अपनी विशाल सेना को साथ लेकर राम से संग्राम करने के लिये तीव्रता पूर्वक चला। खर को अपनी विशाल सेना के साथ आते देख कर राम ने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि राक्षसराज अपने पूरे दल-बल के साथ चला आ रहा है। आज आर्य का अनार्य के साथ संघर्ष होगा और निःसन्देह आर्य की विजय होगी। तुम सीता की रक्षा के लिये उसे साथ ले कर शीघ्र ही किसी गुफा में चले जाओ ताकि मैं निश्चिंत होकर युद्ध कर सकूँ।"
लक्ष्मण ने तत्काल अपने अग्रज की आज्ञा पालन किया। वे सीता को ले कर पर्वत की एक अँधेरी कन्दरा में चले गये। अभेद्य कवच धारण कर के राम युद्ध के लिये तैयार हो गये। देवता, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व आदि सभी राम के विजय के लिये परमात्मा से इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, "हे त्रिलोकीनाथ! वीर पराक्रमी रामचन्द्र को इतनी शक्ति दे कि उनके हाथों गौ, ब्राह्मणों तथा ऋषि-मुनियों को अनेक प्रकार से कष्ट देने वाले राक्षसों का नाश हो सके।" राक्षसों की सेना ने राम को चारों ओर से घेर लिया तथा आक्रमण की तैयारी करने लगे। राम ने भीषण विनाश करने वाली अग्नि बाण छोड़ दिया जिससे राक्षस हाहाकार करने लगे। राक्षसों के द्वारा छोड़े गये बाणों को वे अपने बाणों से आकाश में ही काटने लगे। राक्षसों ने अत्यन्त क्रोधित होकर एक साथ बाणों की वर्षा करना आरम्भ कर दिया और राम चारों ओर से उनके बाणों से आच्छादित हो गये। राम ने अपने धनुष को मण्डलाकार करके अद्भुत हस्त-लाघव का प्रदर्शन करते हुये बाणों को छोड़ना आरम्भ कर दिया जिससे राक्षसों के बाण कट-कट कर भूमि पर गिरने लगे। यह ज्ञात ही नहीं हो पाता था कि कब उन्होंने तरकस से बाण निकाला, कब प्रत्यंचा चढ़ाई और कब बाण छूटा। राम के बाणों के लगने से राक्षसगण निष्प्राण होकर भूमि में लेटने लगे। अल्पकाल में ही राक्षसों की सेना उसी भाँति छिन्न-भिन्न हो गई जैसे आँधी आने पर बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। पूरा युद्धस्थल राक्षसों के कटे हुये अंगों से पट गया।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:57:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - खर-दूषण वध
खर की सेना की दुर्दशा के विषय में ज्ञात होने पर दूषण भी अपनी अपार सेना को साथ ले कर समर भूमि में कूद पड़ा किन्तु राम ने अपने बाणों से उसकी सेना की भी वैसी ही दशा कर दिया जैसा कि खर की सेना का किया था। क्रोधित होकर दूषण ने मेघ के समान घोर गर्जना कर के तीक्ष्ण बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। इस आक्रमण से कुपित हो कर राम ने चमकते खुर से दूषण के धनुष को काट डाला तथा चार बाण छोड़ कर उसके रथ के चारों घोड़ों को भूमि पर सुला दिया। फिर एक अर्द्ध चन्द्राकार बाण से दूषण के सारथी का सिर काट दिया। क्रुद्ध दूषण एक परिध उठा कर राम को मारने झपटा। उसे अपनी ओर आता देख राम ने पलक झपकते ही अपना खड्ग निकाल लिया और दूषण के दोनों हाथ काट डाले। पीड़ा से छटपटाता हुआ वह मूर्छित होकर धराशायी हो गया। दूषण की ऐसी दशा देख कर सैकड़ों राक्षसों ने एक साथ राम पर आक्रमण करना आरम्भ कर दिया। रामचन्द्र ने स्वर्ण तथा वज्र से निर्मित तीक्ष्ण बाणों को छोड़ कर उन सभी राक्षसों का नाश कर दिया। उनके पराक्रम से खर और दूषण की अपार सेना यमलोक पहुँच गई।
अब केवल खर और उसका सेनापति त्रिशिरा शेष बचे थे। खर अत्यन्त निराश हो चुका था। उसे धैर्य बँधाते हुये त्रिशिरा ने कहा, "हे राक्षसराज! आप निराश न हों। मैं अभी राम का वध करके अपने सैनिकों के मारे जाने का प्रतिशोध लेता हूँ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि यदि मैंने उस तपस्वी को न मारा तो मैं युद्धभूमि में अपने प्राण त्याग दूँगा।" इतना कह कर वह राम की ओर तीव्र गति से झपटा। उसे अपनी ओर आते देख राम ने फुर्ती के साथ बाण चलना आरम्भ कर दिया। राम के बाणों ने त्रिशिरा के सारथी, घोड़ों तथा ध्वजा को काट डाला। इस पर क्रुद्ध सेनापति हाथ में गदा ले कर राम की ओर दौड़ा, किन्तु वीर राम ने उसे अपने निकट पहुँचने के पहले ही एक ऐसा तीक्ष्ण बाण छोड़ा जो उसके कवच को चीर कर हृदय तक पहुँच गया। हृदय में बाण लगते ही त्रिशिरा धराशायी हो गया और तत्काल उसके प्रण पखेरू उड़ गये। जहाँ पर वह गिरा वहाँ की सारी भूमि रक्त-रंजित हो गई।
जब खर अकेला रह गया तो वह क्रोधित हो कर राम पर अंधाधुंध बाणों की वर्षा करने लगा। चहुँ ओर उसके बाण वायुमण्डल में फैलने लगे। बाणों की घटाओं से घिरने पर राम ने अग्निबाणों की बौछार करना आरम्भ कर दिया। इससे और भी क्रुद्ध होकर खर ने एक बाण से रामचन्द्र के धनुष को काट दिया। खर के इस अद्भुत पराक्रम को देख कर यक्ष, गन्धर्व आदि भी आश्चर्यचकित रह गये, किन्तु अदम्य साहसी राम तनिक भी विचलित नहीं हुये। उन्होंने अगस्त्य ऋषि के द्वारा दिया हुआ धनुष उठा कर क्षणमात्र में खर के घोड़ों को मार गिराया। रथहीन हो जाने पर अत्यन्त क्रुद्ध हो पराक्रमी खर हाथ में गदा ले राम को मारने के लिये दौड़ा। उसे अपनी ओर आता देख राघव बोले, "हे राक्षसराज! निर्दोषों तथा सज्जनों को दुःख देने वाला व्यक्ति चाहे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी ही क्यों न हो, उसे अन्त में अपने पापों का फल भोगना ही पड़ता है। तुझे भी निर्दोष ऋषि-मुनियों को भयंकर यातनाएँ देने का फल भुगतना पड़ेगा। आज तेरे पापों का घड़ा भर गया है। तुझ जैसे अधर्मी, दुष्ट दानवों का विनाश करने के लिये ही मैं वन में आया हूँ। अब तू समझ ले कि तेरा भी अन्तिम समय आ पहुँचा है। अब तुझे कोई नहीं बचा सकता।"
राम के वचनों को सुन कर खर ने कहा, "हे अयोध्या के राजकुमार! वीर पुरुष अपने ही मुख से अपनी प्रशंसा नहीं किया करते। अपने इन वचनों से तुमने अपनी तुच्छता का ही परिचय दिया है। तुममें इतनी शक्ति नहीं है कि तुम मेरा वध कर सको। मेरी इस गदा ने अब तक सहस्त्रों आर्यों को रणभूमि में धराशायी किया है। आज यह तुम्हें भी चिरनिद्रा में सुला कर मेरी बहन के अपमान का प्रतिशोध दिलायेगी।" यह कहते हुये खर ने अपनी शक्तिशाली गदा को राम की ओर उनके हृदय का लक्ष्य करके फेंका। राम ने एक ही बाण से उस गदा को काट दिया। फिर एक साथ अनेक बाण मार कर खर के शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया। क्षत-विक्षत होने परे भी खर क्रुद्ध सर्प की भाँति राम की ओर लपका। इस पर राम ने अगस्त्य मुनि द्वारा दिया गये एक ही बाण से खर का हृदय चीर डाला। खर भयंकर चीत्कार करता हुआ विशाल पर्वत की भाँति धराशायी हो गया और उसके प्राण पखेरू सदा के लिये उड़ गये।
खर के मरने पर ऋषि-मुनि, तपस्वी आदि राम की जय-जयकार करते हुये उन पर पुष्प वर्षा करने लगे। उन्होंने राम की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुये कहा, "हे राघव! आज आपने दण्डक वन के निवासी तपस्वियों पर महान उपकार किया है। इन राक्षसों ने अपने उपद्रवों से हमारा जीवन, हमारी तपस्या, हमारी शान्ति सब कुछ नष्टप्राय कर दिये थे। आज से हम लोग आपकी कृपा से निर्भय और निश्चिन्त होकर सोयेंगे। परमपिता परमात्मा आपका कल्याण करें। इस प्रकार उन्हें आशीर्वाद देते हुये वे अपने-अपने निवास स्थानों को लौट गये। इसी समय लक्ष्मण भी सीता को गिरिकन्दरा से ले कर लौट आये। अपने वीर पति की शौर्य गाथा सुन कर सीता का हृदय गद्-गद् हो गया।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:55:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - राम का स्वर्णमृग के पीछे जाना
इस सुन्दर हिरण को पकड़ कर आश्रम में रखने की दृष्टि से सीता ने राम को पुकार कर अपने पास बुलाया और बोली, "हे नाथ! आप लक्ष्मण के साथ यहाँ शीघ्र आइये। देखिये, यह स्वर्णमृग कितना सुन्दर और प्यारा है।" उस माया मृग को देख कर लक्ष्मण ने राम से कहा, "तात! स्वर्ण का मृग आज तक न तो कभी हमने देखा और न सुना। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हमें छलने के लिये किसी राक्षसी माया की रचना की गई है।" लक्ष्मण के कथन को अनसुना कर के सीता बोली, "हे प्रभो! यह मृग शावक विधाता की अद्भुत रचनाओं में से एक है। आप इसे पकड़ कर अवश्य लाइये। मैं इससे अपना मन बहलाया करूँगी। जब हम वनवास समाप्त कर के अयोध्या लौटेंगे तो यह हमारे प्रासाद की शोभा बढ़ायेगा। अवधवासी इसे देख कर कितने प्रसन्न होंगे। यदि यह जीवित न पकड़ा जा सके तो इसे मार कर मृगछाला ही ले आइये। मैं उस पर बैठ कर ईश्वर आराधना करूँगी। जाइये, शीघ्रता कीजिये न।"
सीता के आग्रह को देख कर राम लक्ष्मण से बोले, "हे लक्ष्मण! इसमें सन्देह नहीं कि इस मृग का रूप वास्तव में आकर्षक है। यदि यह पकड़ा भी नहीं गया तो मारा तो अवश्य ही जायेगा। इसकी मृगछाला निःसन्देह मनोमुग्धकारी होगी। इसलिये इस अवश्य पकड़ना चाहिये। और यदि यह राक्षसी माया है तो भी इस राक्षस को मारना उचित ही होगा क्योंकि मैं राक्षसों को मारने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। तुम सावधान हो कर सीता की रक्षा करो। मैं इसे जीवित पकड़ने या मारने के लिये जाता हूँ। इतना कह कर राम धनुष बाण और तीक्ष्ण कृपाण ले कर मायावी मृग के पीछे चल पड़े। राम को अपनी ओर आता देख मृग भी उछलता कूदता गहन वन में घुस गया। वह प्राणों के भय से विविध वृक्षों, झाड़ियों के बीच छिपता प्रकट होता द्रुत गति से भागने लगा। उसका पीछा करते-करते रामचन्द्र बहुत आगे निकल गये। तब क्रुद्ध हो कर मृग के दृष्टिगत होते ही राम ने एक तीक्ष्ण बाण छोड़ा जो उसके मायावी छद्म वेश को चीर कर मारीच के हृदय तक पहुँच गया। बाण के लगते ही मारीच उछल कर अपने असली वेश में धराशायी हो गया और उच्च स्वर में 'हा लक्ष्मण! हा जानकी!' कहता हुआ मर गया। उसका विशाल मृत शरीर पृथ्वी पर ताड़ के वृक्ष की भाँति निश्चल पड़ा था।
मारीच का मृत शरीर देख कर राम को लक्ष्मण का कथन स्मरण हो आया। वास्तव में यह राक्षसी माया निकली। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि इस राक्षसी माया के पीछे कोई षड़न्त्र है। अनिष्ट की आशंका से वे तीव्र गति से आश्रम की ओर लौट पड़े। उन्हें यह भी ध्यान आया कि यह दुष्ट उच्च स्वर में 'हा लक्ष्मण! हा जानकी!' कह कर मरा है। कहीं ऐसा न हो कि लक्ष्मण सीता को अकेला छोड़ कर मेरी सहायता के लिये चल पड़े और सीता का कोई हरण कर ले जाये।
राम की आशंका सही निकली। जब सीता ने अपने पति के स्वर में 'हा लक्ष्मण! हा जानकी!' सुना तो उन्होंने घबरा कर लक्ष्मण से कहा, "हे लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे भैया संकट में पड़ गये हैं। तुम शीघ्र जा कर उनकी सहायता करो। मेरा हृदय चिन्ता से व्याकुल हो रहा है। ये उन्हीं के दुःख भरे शब्द थे।" सीता के आतुर वचन सुन कर लक्ष्मण बोले, "हे आर्ये! मैं आप को अकेला छोड़ कर नहीं जा सकता। भैया की ऐसी ही आज्ञा है। आप धीरज रखें वे अभी आते ही होंगे।"
लक्ष्मण के उत्तर से दुःखी हो कर सीता बोलीं, "लक्ष्मण! मुझे लगता है, तुम भाई के रूप में उनके शत्रु हो। जो उनके ऐसे आर्त स्वर सुन कर भी उनकी सहायता के लिये नहीं जाना चाहते। जब उनको ही कुछ हो गया तो मेरी रक्षा से क्या लाभ?" इस प्रकार कहते हुये उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। सीता की यह दशा देख कर लक्ष्मण हाथ जोड़ कर बोले, "माता! आप व्यर्थ दुःखी हो रही हैं। संसार में ऐसा कौन सा देव, दानव है जो भैया को परास्त कर सके या उनका बाल भी बाँका कर सके। आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, वे आते ही होंगे। आप नहीं जानतीं कि मायावी राक्षस नाना प्रकार के रूप धारण करते हैं और नाना प्रकार की बोलियाँ बोलते हैं। मैं जाने को तैयार हूँ, परन्तु ऐसा न हो कि अकेली रह कर आप किसी विपत्ति में पड़ जायें। इसीलिये मैं आप को अकेली नहीं छोड़ना चाहता।"
लक्ष्मण के तर्क ने सीता के क्रोध को और बढ़ा दिया। वे बोलीं, "लक्ष्मण! मैं तुम्हारी मनोवृति को भली-भाँति समझ रही हूँ। तुम राम के मर जाने पर मुझ पर अपना अधिकार जमाने की बात सोच रहे हो तो मैं तुम्हारी दुष्ट इच्छा को कभी पूरा नहीं होने दूँगी। राम के बिना मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।" सीता के ये वचन सुन कर लक्ष्मण का हृदय पीड़ा से भर उठा। उन्हें मूर्छा सी आने लगी। बड़ी कठिनाई से स्वयं को सँभाल कर बोले, "जानकी! मैं आपकी बातों का कोई उत्तर नहीं दे सकता, क्योंकि आप मेरी माता के स्थान पर हैं। मैं केवल यही कह सकता हूँ कि आज आप की बुद्धि नष्ट हो गई है जो अपने अग्रज की आज्ञा पालन करने वाले अनुज पर ऐसा दुष्टतापूर्ण लांछन लगा रही हैं। आज आप पर अवश्य कोई संकट आने वाला है। यह सब उसी की भूमिका है। मैं आपके द्वारा बलात् भेजा जा रहा हूँ। वन के देवता इसके साक्षी हैं।" यह कह कर कन्धे पर धनुष रख लक्ष्मण उधर चल दिये जिधर राम मारीच के पीछे गये थे।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:50:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - सीता हरण
लक्ष्मण के जाने के पश्चात् सन्यासी का वेष धारण कर रावण सीता के पास आया और बोला, "हे रूपसी! तुम कोई वन देवी हो या लक्ष्मी अथवा कामदेव की प्रिया स्वयं रति हो? तुम्हारे जैसी रूपवती, लावण्यमयी युवती मैंने आज तक इस संसार में नहीं देखा है। मझे यह देख कर आश्चर्य हो रहा है कि जो सौन्दर्य महलों में होना चाहिये था आज इस वन में कैसे दिखाई दे रहा है। तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? और इस वन में किस लिये निवास कर रही हो?"
रावण के प्रश्न को सुन कर सीता ने कहा, "हे सन्यासी! मैं तुम्हें और तुम्हारे वेश को नमस्कार करती हूँ। आप इस आसन पर बैठ कर यह जल और फल ग्रहण कीजिये। मेरा नाम सीता है। मैं मिथिलानरेश जनक की पुत्री और अयोध्यापति दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री रामचन्द्र की पत्नी हूँ। पिता की आज्ञा से मेरे पति अपने भाई भरत को अयोध्या का राज्य दे कर चौदह वर्ष के लिये वनवास कर रहे हैं। उन पराक्रमी सत्यपरायण वीर के साथ मेरे तेजस्वी देवर लक्ष्मण भी हैं। आप थोड़ी देर बैठिये, वे अभी आते ही होंगे। अब आप बताइये महात्मन्! आप कौन हैं और इधर किस उद्देश्य से पधारे हैं?" सीता का प्रश्न सुन कर रावण गरज कर बोला, "हे सीते! मैं तीनों लोकों, चौदह भुवनों का विजेता महाप्रतापी लंकापति रावण हूँ जिसके नाम से देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, मुनि सब थर-थर काँपते हैं। इन्द्र, वरुण, कुबेर जैसे देवता जिसकी चाकरी कर के अपने आप को धन्य समझते हैं। मैं तुम्हारे लावण्यमय सौन्दर्य को देख कर अपनी सुन्दर रानियों को भी भूल गया हूँ और मैं तुम्हें ले जा कर अपने रनिवास की शोभा बढ़ाना चाहता हूँ। हे मृगलोचने! तुम मेरे साथ चल कर नाना देशों से आई हुई मेरी अतीव सुन्दर रानियों पर पटरानी बन कर शासन करो। मेरे देश लंका की सुन्दरता को देख कर तुम इस वन के कष्टों को भूल जाओगी। इसलिये मेरे साथ चलने को तैयार हो जाओ।"
रावण का नीचतापूर्ण प्रस्ताव सुन कर सीता क्रुद्ध स्वर में बोली, "हे अधम राक्षस! तुम परम तेजस्वी, अद्भुत पराक्रमी और महान योद्धा रामचन्द्र के प्रताप को नहीं जानते इसीलिये तुम मेरे सम्मुख यह कुत्सित प्रस्ताव रखने का दुःसाहस कर रहे हो। अरे मूर्ख! क्या तू वनराज सिंह के मुख में से उसके दाँत उखाड़ना चाहता है? क्या तेरे सिर पर काल नाच रहा है जो तू यह घृणित प्रस्ताव ले कर यहाँ आया है? इस विचार को ले कर यहाँ आने से पूर्व तूने यह भी नहीं सोचा कि तू अपने नन्हें से हाथों से सूर्य और चन्द्र को पकड़ कर अपनी मुट्ठी में बन्द करना चाहता है। वास्तव में तेरी मृत्यु तुझे यहाँ ले आई है।" सीता के ये अपमानजनक वाक्य सुन कर रावण के तन बदन में आग लग गई। वह आँखें लाल करते हुये बोला, "सीते! तू मेरे बल और प्रताप को नहीं जानती। मैं आकाश में खड़ा हो कर पृथ्वी को गेंद की भाँति उठा सकता हूँ। अथाह समुद्र को एक चुल्लू में भर कर पी सकता हूँ। मैं तुझे लेने के लिये आया हूँ और ले कर ही जाउँगा।" यह कह कर रावण ने गेरुये वस्त्र उतार कर फेंक दिया और दोनों हाथों से सीता को उठा कर अपने कंधे पर बिठा निकटवर्ती खड़े विमान पर जा सवार हुआ। इस प्रकार अप्रत्यशित रूप से पकड़े जाने पर सीता ने 'हा राम! हा राम!!' कहते हुये स्वयं को रावण के हाथों से छुड़ाने का प्रयास किया। परन्तु बलवान रावण के सामने उनकी एक न चली। उसने उन्हें बाँध कर विमान में एक ओर डाल दिया और तीव्र गति से लंका की ओर चल पड़ा। सीता निरन्तर विलाप किये जा रही थी, "हा राम! पापी रावण मुझे लिये जा रहा है। हे लक्ष्मण! तुम कहाँ हो? तुम्हारी बलवान भुजाएँ इस समय इस दुष्ट से मेरी रक्षा क्यों नहीं करतीं? हाय! आज कैकेयी की मनोकामना पूरी हुई।" इस प्रकार विलाप करती हुई सीता ने मार्ग में खड़े जटायु को देखा। जटायु को देखते ही सीता चिल्लाई, "हे आर्य जटायु! देखो, लंका का यह दुष्ट राजा रावण मेरा अपहरण कर के लिये जा रहा है। आप तो मेरे श्वसुर के मित्र हैं। इस नराधम से मेरी रक्षा करें। यदि आप मुझे इस नीच के फंदे से नहीं छुड़ा सकते तो यह वृतान्त मेरे पति से तो अवश्य ही कह देना।"
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:49:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - जटायु वध
सीता का आर्तनाद सुन कर जटायु ने उस ओर देखा तथा रावण को सीता सहित विमान में जाते देख बोले, "अरे ब्राह्मण! तू चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान होते हुये एक पर-स्त्री का अपहरण कर के ले जा रहा है। अरे लंकेश! महाप्रतापी श्री रामचन्द्र जी की यह भार्या है। तुम ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे कर रहे हो? राजा का धर्म तो पर-स्त्री की रक्षा करना है। तुम काम के वशीभूत हो कर अपना विवेक खो बैठे हो। छोड़ दो राम की पत्नी को। हे रावण! यह जानते हुये कि तुम बलवान, युवा तथा शस्त्रधारी हो और मैं दुर्बल, वृद्ध एवं शस्त्रहीन हूँ; फिर भी प्राण रहते मैं सीता की रक्षा करूँगा। तुमने जो यह भीषण अपराध किया है, उससे मैं तुम्हें रोकूँगा। यदि रोक न सका तो या तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा या स्वयं अपने प्राण दे दूँगा। मेरे जीवित रहते तुम सीता को नहीं ले जा सकोगे।"
जटायु के इन कठोर अपमानजनक शब्दों को सुन कर रावण उसकी ओर झपटा जो सीता को मुक्त कराने के लिये विमान की ओर तेजी से बढ़ रहा था। वायु से प्रवाहित दो मेघों की भाँति वे एक दूसरे से टकराये। क्रुद्ध जटायु ने मार-मार कर रावण को घायल कर दिया। घायल रावण भी वृद्ध दुर्बल जटायु से अधिक शक्तिशाली था। उसने अवसर पा कर जटायु की दोनों भुजायें काट दीं। पीड़ा से व्याकुल हो कर मूर्छित हो वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। जटायु को भूमि पर गिरते देख जानकी भी उसके पीछे भूमि पर गिरी, किन्तु रावण ने फुर्ती से केश पकड़ कर उन्हें भूमि पर गिरने से रोक लिया और "हा राम! हा लक्ष्मण!!" कह कर विलाप करती हुई सीता को विमान में एक ओर पटक दिया। फिर विमान को आकाश में ले जा कर तीव्र गति से लंका की ओर चल पड़ा।
जब उसने देखा कि सीता जोर-जोर से विलाप कर के वनवासियों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है तो उसने सीता को बलात् खींच कर अपनी गोद में डाल लिया और एक हाथ उनके मुख पर रख कर उनकी वाणी अवरुद्ध करने का प्रयास करने लगा। उस समय उन्नत भालयुक्त, सुन्दर कृष्ण केशों वाली, गौरवर्णा, मृगनयनी जानकी का सुन्दर मुख रावण की गोद में पड़ा ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा नीले बादलों को चीर कर चमक रहा हो। फिर भी सीता का क्रन्दन वन के प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। वन के सिंह, बाघ, मृग आदि रावण से कुपित हो कर उसके विमान के नीचे दौड़ने लगे। पर्वतों से गिरते हुये जल-प्रपात ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानों वे भी सीता के दुःख से दुःखी हो कर आर्तनाद करते हुये आँसू बहा रहे हों। श्वेत बादल से आच्छादित सूर्य भी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अपनी कुलवधू की दुर्दशा देख कर उसका मुख श्रीहीन हो गया हो। सब सीता के दुःख से दुःखी हो रहे थे।
जब सीता को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब दुष्ट रावण से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है तो वह बड़ी दीनता से परमात्मा से प्रार्थना करने लगी, "हे परमपिता परमात्मा! हे सर्वशक्तिमान! इस समय मेरी रक्षा करने वाला तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नहीं है। हे प्रभो! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो! हे दयामय! मेरे सतीत्व की रक्षा करने वाले केवल तुम ही हो।" जब सीता इस प्रकार भगवान से प्रार्थना कर रही थी तो उन्होंने नीचे एक पर्वत पर पाँच वानरों को बैठे देखा। उनको देख कर जानकी ने अनुसूया द्वारा दिये गये परिधान में उन्हीं के द्वारा दिये गये आभूषणों को बाँध कर ऊपर से गिरा दिया। अकस्मात् इस पोटली को गिरते देख वानरों ने ऊपर देखा कि एक विमान तेजी से उड़ता चला जा रहा है और उसमें बैठी कोई स्त्री विलाप कर रही है। वे इस विषय में कुछ और अधिक देख पाते उससे पूर्व विमान नेत्रों से ओझल हो गया। वनों, पर्वतों और सागर को पार करता हुआ रावण सीता सहित लंका में पहुँचा। उसने सीता को मय दानव द्वारा निर्मित सुन्दर महल में रखा। फिर क्रूर राक्षसनियों को बुला कर आज्ञा दी, "कोई भी मेरी आज्ञा के बिना इस स्त्री से मिलने न पावे। यह जो भी वस्त्र, आभूषण, खाद्यपदार्थ माँगे, वह तत्काल इसे दिया जाय। इसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये और न कोई इसका तिरस्कार करे। अवज्ञा करने वालों को दण्ड मिलेगा।"
इस प्रकार राक्षसनियों को आदेश दे कर अपने निजी महल में पहुँचा। वहाँ उसने अपने आठ शूरवीर सेनापतियों को बुला कर आज्ञा दी, "तुम लोग जा कर दण्डक वन में रहो। हमारे जनस्थान को राम लक्ष्मण नामक दो तपस्वियों ने उजाड़ दिया है। तुम वहाँ रह कर उनकी गतिविधियों पर दृष्टि रखो और उनकी सूचना मुझे यथाशीघ्र देते रहो। मैं तुम्हें यह अधिकार देता हूँ कि अवसर पा कर उन दोनों की हत्या कर डालो। मैं तुम्हारे पराक्रम से भली-भाँति परिचित हूँ। इसीलिये उन्हें मारने का दायित्व तुम्हें सौंप रहा हूँ।"
उन्हें इस प्रकार आदेश दे कर वह कामी राक्षस वासना से पीड़ित हो कर सीता से मिलने के लिये चल पड़ा।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:48:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - रावण-सीता संवाद
राम के वियोग में आँसू बहाती हुई जानकी के पास जा कर रावण बोला, "हे सुमुखी! अब उस तपस्वी के लिये आँसू बहाने से क्या लाभ? अब तू उसे भूल जा। तू प्रेम भरी दृष्टि से मेरी ओर देख। यह सम्पूर्ण राज्य मैं तुझे अर्पित कर दूँगा। यह राज्य ही नहीं, मैं भी, जो तीनों लोकों का स्वामी हूँ, तेरे चरणों का दास बन कर रहूँगा। मैं तुझे प्राणों से भी बढ़ कर चाहने लगा हूँ। मेरी समस्त सुन्दर रानियाँ तेरी दासी बन कर रहेंगीं। तू केवल मुझे पति रूप में स्वीकार कर ले। मैं आज ही देश भर में तेरे लंका की पटरानी होने की घोषणा करा दूँगा। सारे देव, दानव, नर, किन्नर जो मेरे दास हैं, वे सब तेरे संकेत पर अपने प्राण भी न्यौछावर करने को तैयार हो जायेंगे। तूने जो यह वनवास का कठोर जीवन व्यतीत किया है यह तेरे पूर्वजन्मों का फल था। अब उसकी अवधि समाप्त समझ। मुझसे विवाह करके तीनों लोकों की स्वामिनी बनने के तेरे दिन आ गये हैं। तेरे हाँ कहते ही संसार के सर्वोत्तम दिव्य वस्त्र, आभूषण, भोज्य पदार्थ तेरे सम्मुख उपस्थित कर दिये जायेंगे। तेरे जैसी अनुपम सुन्दरी रोने-बिलखने और कष्ट उठाने के लिये उत्पन्न नहीं हुई है, तू मेरी पटरानी बन कर मेरे साथ पुष्पक विमान में बैठ कर आकाश में विहार कर। यदि तू धर्म और लोकलाज से भयभीत होती है, तो यह तेरा विचार मिथ्या और निर्मूल है। किसी सुन्दरी का युद्ध में हरण कर के उसके साथ विवाह करना भी तो वैदिक रीति का ही एक अंग है। इसलिये तू निःशंक हो कर मेरी बन जा।"
रावण के इन वासनामय शब्दों को सुन कर उसके और अपने मध्य में तृण रख शोक संतप्त सीता बोली, "हे नराधम! परम पराक्रमी, धर्मपरायण एवं सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्री रामचन्द्र जी ही मेरे पति हैं। मैं उनके अतिरिक्त किसी अन्य की ओर दृष्टि तक भी नहीं कर सकती। तेरे अनर्गल प्रलाप से ऐसा प्रतीत होता है कि अब लंका सहित तेरे विनाश का समय आ गया है। तू कायरों की तरह मुझे चुरा कर अब डींगें हाँक रहा है। यदि उनके सम्मुख मेरा अपहरण करने का प्रयास करता तो तेरी भी वही दशा होती जो तेरे भाई खर और दूषण की हुई है। यदि तू उनके सामने पड़ जाता तो उनके बाण तेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देते। तू ऐसे भ्रम में मत रह कि जब देवता और राक्षस तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो राम भी तुझे नहीं मार सकेंगे। उनके हाथों से तेरी मृत्यु निश्चित है। अब तेरा जीवनदीप बुझने वाला है। तेरे तेज, बल और बुद्धि तो पहले ही नष्ट हो चुके हैं। और जिसकी बुद्धि नष्ट हो चुकी होती है, उसका विनाश-काल दूर नहीं होता। जो तू मुझसे बार-बार विवाह करने की बात कहता है, तूने एक बार भी सोचा है कि कमलों में विहार करने वाली हंसिनी क्या कभी कुक्कुट के साथ रह सकती है? मैं तुझे सावधान करती हूँ कि तू बार-बार मेरे पति की निन्दा न कर, चाहे मेरे इस क्षणभंगुर शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डाल। मैं तो तेरे जैसे नीच से वार्तालाप करना भी पाप समझती हूँ।"
सीता के कठोर एवं अपमानजनक वाक्य सुन कर रावण कुपित हो कर बोला, "हे सीते! यदि मैं चाहूँ तो अभी तेरा सिर काट कर तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँ। परन्तु मुझे तुझ पर दया आती है। यदि एक वर्ष के अन्दर तूने मुझे पति के रूप में स्वीकार न किया तो मैं तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।" फिर वह राक्षसनियों से बोला, "तुम इसे यहाँ से अशोक वाटिका में ले जा कर रखो और जितना कष्ट दे सकती हो, दो। तुम्हें इसकी पूरी स्वतन्त्रता है।"
लंकापति रावण की आज्ञा पाकर राक्षसनियाँ सीता को अशोक वाटिका में ले गईं। अशोक वाटिका एक रमणीय स्थल होते हुये भी सीता के लिये पति वियोग और निशाचरी दुर्व्यवहार के कारण दुःखदायी स्थान बन गया था।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:47:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - राम की वापसी और विलाप
जब राम मारीच का वध कर के आश्रम की ओर लौटे तो उन्होंने मार्ग में लक्ष्मण को आते देखा। जनकदुलारी सीता के बिना अकेले लक्ष्मण को देख आशंका से उनका माथा ठनका। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि किसी राक्षसी षड़यंत्र के फलस्वरूप सीता किसी कठिनाई में फँस गई है। उन्होंने चिन्तित हो कर पूछा, "लक्ष्मण! सीता कहाँ है? जब मैं तुम्हें यह आदेश दे आया था कि तुम सीता की रक्षा करना, फिर तुम उसे अकेली कैसे छोड़ आये? वह किसी विपत्ति में तो नहीं फँस गई? जीवित तो है? शीघ्र बताओ उसे क्या हुआ है? यदि वह जीवित नहीं होगी तो मैं आश्रम नहीं जाउँगा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उस मायावी राक्षस ने हा 'लक्ष्मण!' कह कर तुम्हें भी भ्रम में डाल दिया है और इस दुरभिसन्धि के फलस्वरूप तुम सीता को अकेली छोड़ कर यहा दौड़ आये हो? अथवा सीता ने ही भ्रमित हो कर तुम्हें यहाँ आने को विवश किया हो। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि राक्षसों ने अपने प्रतिशोध लेने के लिये यह चाल चली है और तुम इसमें फँस गये हो। खर और दूषण की मृत्यु का बदला लेने के लिये उन्होंने सीता को मार डाला होगा।"
इस प्रकार चिन्ता में डूबते उतराते हुये राम के साथ लक्ष्मण जब अपने आश्रम पहुँचे तो उनकी आशंका सही निकली। उन्हें सीता कहीं दिखाई नहीं दी। उन्होंने आश्रम का कोना-कोना छान मारा, परन्तु उस समय पर्णकुटी की दशा शीत से मारी हुई कमलिनी जैसी हो रही थी। आश्रम के वृक्ष और पत्ते भी वायु में सन-सना कर दुःख भरी ठण्डी आहें लेते प्रतीत होते थे। रामचन्द्र ने देखा, मृगछाला और कुश इधर-उधर बिखरे पड़े हैं, आसन औंधे पड़े हैं, वृक्षों के फूल-पत्ते तथा कहीं-कहीं टहनियाँ टूटी या अधटूटी पड़ी हैं। आश्रम का अस्त-व्यस्त दृष्य देख कर राम विचार करने लगे। सीता का किसी ने हरण कर लिया, अथवा किसी दुष्ट राक्षस ने उसे अपना आहार बना लिया। कहीं वह फूल चुनने या नदी पर जल भरने तो नहीं चली गई। जब सब ओर खोजने पर भी उन्हें सीता कहीं दिखाई न दी तो उनकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। मस्तिष्क घूमने लगा। वे इधर-उधर नदी-नालों पर्वत-कन्दराओं पर जा-जा कर उन्मत्त की भाँति आवाज दे-दे कर सीता की खोज करने लगे। अन्त में उनकी उन्मत्तता इतनी बढ़ गई कि वे कभी कदम्ब के वृक्ष के पास जाकर कहते, "हे कदम्ब! मेरी सीता को तेरे पुष्पों से बहुत स्नेह था। तू ही बता वह कहाँ है?" कभी विल्व के पास जा कर उससे पूछते, "हे विल्व विटप! क्या तुमने पीतवस्त्रधारिणी सीता को कहीं देखा है?" इस प्रकार वे कभी किसी वृक्ष से, कभी किसी लता से और कभी पुष्प समूहों से सीता का पता पूछते। कभी अशोक वृक्ष के पास जा कर कहते, "अरे अशोक विटप! तेरा तो नाम ही अशोक है, फिर तू सीता से मेरी भेंट करा कर मेरे शोक का हरण क्यों नहीं करता?" फिर ताड़ के वृक्ष से कहते, "तू तो सब वृक्षों से ऊँचा है। तू दूर-दूर की वस्तुएँ देख सकता है। देख कर बता क्या तुझे सीता कहीं दिखाई दे रही है। चुपचाप खड़ा न रह। यदि तू देखना चाहेगा तो तुझे वह अवश्य दिखाई देगी।"
इस प्रकार नाना प्रकार के वृक्षों से पूछ-पूछ कर रामचन्द्र विलाप करने लगे, "हे प्राणवल्लभे जानकी! तू कहाँ छिप गई? यदि तू वृक्षों की ओट में छिप कर हँसी कर रही है तो मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ, तू प्रकट हो जा। देख, मैं तेरे बिना कितना व्याकुल हो रहा हूँ। अब बहुत हँसी हो चुकी। मैं हार मानता हूँ। मैं तुझे नहीं ढूँढ पा रहा हूँ। या तू सचमुच मुझसे रूठ गई है। बोल प्यारी सीते, बोल, जल्दी बोल, तू कहाँ है? इधर देख, तेरे साथ खेलने वाले मृग शावक भी तेरे वियोग में अश्रु बहा रहे हैं। सीते! तेरे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। मैं चाहता हूँ, अभी तेरे वियोग में अपने प्राण त्याग दूँ किन्तु पिता की आज्ञा से विवश हूँ। मुझे स्वर्ग में पा कर वे धिक्करेंगे और कहेंगे 'तू मेरी आज्ञा की अवहेलना कर के - चौदह वर्ष की वनवास की अवधि पूरी किये बिना ही - स्वर्ग में कैसे चला आया।' हा! मैं कितना अभागा हूँ, जो तुम्हारे विरह में मर भी नहीं सकता। हाय जानकी! तुम ही बताओ, तुम्हारे बिना मैं क्या करू?"
बड़े भाई को इस प्रकार विलाप करते देख लक्ष्मण ने उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा, "हे नरोत्तम! रोने और धैर्य खोने से कोई लाभ नहीं होगा। आइये, आश्रम से बाहर चल कर वनों और गिरि-कन्दराओं में भाभी की खोज करें। उन्हें वनों तथा पर्वतों में भ्रमण करने का चाव था। सम्भव है, वहीं कहीं भ्रमण कर रही हों। यह भी सम्भव है कि गोदावरी के तट पर बैठी मछलियों की जलक्रीड़ा देख रहीं हों या किसी भय की आशंका से भयभीत हो कर किसी लता कुँज में बैठी हों। इसलिये हमारे लिये यही उचित है कि हम विषाद और चिन्ता को छोड़ कर उनकी खोज करें।"
लक्ष्मण के युक्तियुक्त वचन सुन कर राम उसके साथ वनों, लताओं, गिरि-कन्दराओं आदि में खोज करने के लिये चले। उन दोनों ने वन, पर्वत-कन्दरा आदि का एक-एक कोना खोज डाला, परन्तु उन्हें सीता कहीं नहीं मिली। अन्त में राम हताश हो कर बोले, "भैया सौमित्र! यहाँ तो कोई ऐसा स्थान शेष नहीं बचा जहाँ हमने जानकी की खोज न की हो, परन्तु हमें सर्वत्र निराशा ही हाथ लगी। अब ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी सीता मुझे कभी नहीं मिलेगी। मैं वनवास की अवधि बिता कर जब अयोध्या लौटूँगा और माता कौशल्या पूछेंगी कि सीता कहाँ है तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? मिथिलापति जनक को क्या मुँह दिखाउँगा।" यह कहते हुये वे जोर-जोर से विलाप करने लगे, "हे सीते! मैं तुम्हें कहाँ ढूँढू? हे वनों के मृगों! क्या तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है? हे वनों की कोकिलों! क्या तुमने कहीं कोकिलाकण्ठी जानकी को देखा है? कोई तो कुछ बताओ। क्या सभी मेरे लिये निर्मोही हो गये हो? कोई नहीं बोलता, कोई नहीं बताता। कोई भी मुझसे बात करना नहीं चाहता। मैं नपुंसक हूँ, कायर हूँ जो अपनी भार्या की रक्षा न कर सका।"
थोड़ी देर मौन रहने के पश्चात् वे फिर लक्ष्मण से बोले, "हे सौमित्र! अब सीता के बिना मैं किसी को मुख दिखाने के लायक नहीं रहा। मैं अवधि पूर्ण होने पर अयोध्या भी नहीं जाउँगा। तुम अब अयोध्या लौट जाओ। मेरी ओर से भरत से कह देना अब तुम ही अयोध्या का राज्य सँभालो। मैं कभी नहीं लौटूँगा। माता कौशल्या से कहना कि किस प्रकार सीता का अपहरण हो गया और उसकी विरह-व्यथा को न सह सकने के कारण राम ने आत्महत्या कर ली। अब तुम्हारे जाते ही मैं गोदावरी नदी में कूद कर अपने प्राण त्याग दूँगा। वास्तव में मैं इस संसार में सबसे बड़ा पापी हूँ। इसीलिये तो मुझे एक के पश्चात् एक अनेक दुःख मिलते चले जा रहे हैं। पहले पिताजी का स्वर्गवास हुआ और अब सीता भी मुझे छोड़ कर जाने कहाँ चली गई। घर बार और सम्बंधी तो पहले ही छूट गये थे। मुझे रह-रह कर यह ध्यान आता है कि सीता राक्षसों के चंगुल में फँस गई है। वह भी रो-रो कर अपने प्राण विसर्जित कर रही होगी। तुम कहते हो कि वन में या गोदावरी के तट पर गई होगी। ये सब मन बहलाने की बातें हैं। जो वनवास की इतनी लम्बी अवधि में एक बार भी आश्रम से अकेली बाहर नहीं निकली, वह आज ही कैसे जा सकती है? अवश्य ही राक्षसों ने उसका अपहरण कर लिया है अथवा उसे अपना आहार बना लिया है। इन वृक्षों, पशुओं आदि से इतना सामीप्य होते हुये भी कोई मुझे सीता का पता नहीं बताता। हा सीते। हा प्राणवल्लभे! तू ही बता मैं तुझे कहाँ ढूँढू? कहाँ जा कर खोजूँ?"
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:46:00 pm 0 comments
रामायण – अरण्यकाण्ड - जटायु से भेंट
राम को इस प्रकार असहाय अनाथ की भाँति रुदन करते देख लक्ष्मण ने उन्हें धैर्य बँधाते हुये कहा, "भैया! तनिक सोचो, कितनी तपस्या से माता कौशल्या और पिताजी ने आपको प्राप्त किया है। आपके वियोग में ही पिताजी ने बिलखते हये अपने प्राण त्याग दिये। यदि इसी प्रकार रुदन करते हुये आप अपने प्राण त्याग देंगे तो सोचिये, तीनों माताओं, भरत और मेरी क्या दशा होगी? आपके वियोग में हम कितने दिन जीवित रह सकेंगे? फिर आपके प्यारे अयोध्यावासियों का क्या होगा? आपने ऋषि-मुनियों को साक्षी देकर राक्षसों के विनाश की जो प्रतिज्ञा की है, उसका क्या होगा? क्या लोग यह कह कर निन्दा न करेंगे कि सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलसूर्य राघव अपने निजी दुःखों को वरीयता दे कर अपनी प्रतिज्ञा से विचलित हो गये? हे पुरुषोत्तम! सुख-दुःख का तो नित्य घूमने वाला चक्र है। ऐसा कौन है जिस पर विपत्तियाँ नहीं आतीं और ऐसी कौन सी विपत्ति है जिसका अन्त नहीं होता? किसी के सदैव एक से दिन नहीं रहते। आप तो स्वयं महान विद्वान हैं। क्या आपको शिक्षा देता मैं अच्छा लगता हूँ? आप परिस्थितियों पर विचार कर के धैर्य धारण करें। कहीं न कहीं हमें जानकी जी की खोज अवश्य मिलेगी।"
लक्ष्मण के मर्म भरे वचनों को सुन कर राम ने अपने आप को सँभाला और लक्ष्मण के साथ सीता की खोज करने के लिये खर-दूषण के जनस्थान की ओर चले। मार्ग में उन्होंने अपने पिता के सखा जटायु को देखा। उसे देख कर उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "भैया! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इसी जटायु ने सीता को खा डाला है। मैं अभी इसे यमलोक भेजता हूँ।" ऐसा कह कर क्रोध से तिलमिलाते हुये उन्होंने अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और जटायु को मारने के लिये आगे बढ़े। राम को अपनी ओर आते देख जटायु बोला, "राम! तुम आ गये। अच्छा हुआ। तुम्हारी ही प्रतीक्षा में मेरे प्राण अटके हुये थे। लंका का राजा सीता का हरण कर के ले गया है और उसी ने मेरी भुजाएँ काट कर मुझे बुरी तरह से घायल कर दिया है। हे वीर! जिस जनकनन्दिनी को तुम यहाँ वन पर्वत में ढूँढ रहे हो, उसे रावण अपने विमान में बिठा कर लंका ले गया है। सीता की पुकार सुन कर मैं उसकी सहायता के लिये गया भी था, परन्तु उस महाबली राक्षस ने मुझे मार-मार कर मेरी यह दशा कर दी। वृद्धावस्था के कारण मैं उस पर पार नहीं पा सका। यह उसका धनुष और उसके बाण हैं। इधर कुछ उसके विमान का टूटा हुआ भाग पड़ा है। अब मेरा अन्तिम समय आ गया है। इसलिये मैं अधिक नहीं बोल पा रहा हूँ। मैं तुम्हारे पिता का मित्र हूँ, अतएव मेरे मरने पर तुम मेरा अन्तिम संस्कार कर देना।" इतना कह कर जटायु का गला रुँध गया, आँखें पथरा गईं और उसके प्राण पखेरू उड़ गये।
जटायु के प्राणहीन रक्तरंजित शरीर को देख कर राम दुःखी होकर लक्ष्मण से बोले, "भैया! सचमुच मैं कितना अभागा हूँ। राज्य छिन गया, घर से निर्वासित हुआ, पिता का देहान्त हो गया, सीता का अपहरण हुआ और आज पिता के मित्र जटायु का भी मेरे कारण निधन हुआ। मेरे ही कारण इन्होंने अपने शरीर की बलि चढ़ा दी। इनके इस बलिदान से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। इनके मरने का मुझे बड़ा दुःख है। तुम जा कर लकड़ियाँ एकत्रित करो। मैं अपने हाथों से इनका दाह-संस्कार करूँगा। ये मेरे पिता के समान थे।"
राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने लकड़ियाँ एकत्रित कीं। दोनों ने मिल कर चिता का निर्माण किया। राम ने पत्थरों को रगड़ कर अग्नि निकाली। फिर द्विज जटायु के शरीर को चिता पर रख कर बोले, "हे पूज्य गृद्धराज! जिस लोक को यज्ञ एवं अग्निहोत्र करने वाले, समरांगण में लड़ कर प्राण देने वाले और धर्मात्मा व्यक्ति जाते हैं, उसी लोक को आप प्रस्थान करें। आपकी कीर्ति इस संसार में सदैव अटल रहेगी।" यह कह कर उन्होंने चिता में अग्नि प्रज्वलित कर दी। थोड़ी ही देर में जटायु का नश्वर शरीर पंचभूतों में मिल गया। इसके पश्चात् दोनों भाइयों ने गोदावरी के तट पर जा कर दिवंगत जटायु को जलांजलि दी।
Posted by Udit bhargava at 4/10/2010 05:45:00 pm 0 comments







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