18 जनवरी 2010

आरती क्यों और कैसे?

पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। किसी भी देवता की आरती करते समय उन्हें 3बार पुष्प अर्पित करें। इस दरम्यान ढोल, नगाडे, घडियाल आदि भी बजाना चाहिए।
एक शुभ पात्र में शुद्ध घी लें और उसमें विषम संख्या [जैसे 3,5या 7]में बत्तियां जलाकर आरती करें। आप चाहें, तो कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि हम अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारतीकहलाती है। सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं।
कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं।
यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।
जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।
नारियल- आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।
सोना- ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। सोने को शुद्ध कहा जाता है।
यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोडने का माध्यम भी माना जाता है।
तांबे का पैसा- तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।
सप्तनदियोंका जल-गंगा, गोदावरी,यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरीऔर नर्मदा नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि ज्यादातर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी। सुपारी और पान- यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देते हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है। पान की बेल को नागबेलभी कहते हैं।
नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडने वाली कडी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।
तुलसी-आयुर्र्वेद में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।
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आरती संग्रह :-
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श्री हनुमानजी की आरती
श्री साई बाबा की आरती
श्री श्यामबाबा की आरती
श्री कुंज बिहारी की आरती
श्री सत्यनारायणजी की आरती
श्री वृहस्पति देव की आरती
श्री रामचन्द्रजी की आरती
श्री गणेशजी की आरती
श्री राणी सतीजी की आरती
श्री अम्बें जी की आरती
श्री शिवजी की आरती
श्री सरस्वती प्रार्थना
श्री कालीमाता की आरती
श्री लक्ष्मीजी की आरती
श्री संतोषी माता आरती
श्री सरस्वतीमाता की आरती
श्री शनि देवजी की आरती
माता वैष्णो देवी की आरती
श्री विष्णु भगवान की आरती
श्री खाटू श्याम जी क़ी आरती
श्री गुरु श्री चन्द्र जी क़ी आरती
संत महिमा क़ी आरती
श्री काली देवी जी क़ी आरती
श्री त्रिवेणी जी क़ी आरती
श्री नर्मदा जी क़ी आरती
श्री यमुना जी क़ी आरती
श्री चिंतपूर्णी देवी जी क़ी आरती
श्री राधाजी क़ी आरती
शाकुम्भरी देवी जी क़ी आरती
नव दुर्गाजी क़ी आरती
श्री गोवर्धन महाराज जी क़ी आरती
श्री गोपाल जी क़ी आरती
श्री ब्रिज्नंदन जी क़ी आरती
गोमाता जी क़ी आरती
श्री केदारनाथ जी क़ी आरती
सरस्वती जी क़ी आरती
श्री भगवान् श्यामसुंदर जी क़ी आरती
श्री मद्भागवत पुरांजी क़ी आरती
श्री कृष्ण जी क़ी आरती
श्री प्रेतराज सर्कार जी क़ी आरती
श्री बद्रीनारायण जी क़ी आरती
बटुक भैरव जी क़ी आरती
कैलाशपति शिव जी क़ी आरती
मनसा देवी जी क़ी आरती
नैना देवी जी क़ी आरती
श्री सूर्यनारायण जी क़ी आरती
श्री रविदास जी क़ी आरती
कबीर जी क़ी आरती
जाहर वीरजी क़ी आरती
श्री पार्वती जी क़ी आरती
श्री सीताजी क़ी आरती
श्री तुलसी जी क़ी आरती
श्री गंगाजी क़ी आरती
श्री भगवन्नाम आरती
श्री विन्ध्येश्वरी आरती

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