01 मार्च 2009

श्री काली देवी क़ी आरती

आरती

आरती श्री काली देवी जी क़ी
मंगल क़ी सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े ।
पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले ज्याला तेरी भेंट धरे ।
सुन जगदम्बे न कर विलम्बे, जय काली कल्याण करे। सन्तन प्रतिपाली ॥
बुद्धि विधाता तू जगमाता, मेरा कारज सिद्ध करे ।
चारण कमल का लिया आसरा, शरण तुम्हारी आन परे ।
जब जब भीर पड़े भक्तन पर, तब तब आय सही करे। सन्तन प्रतिपाली ॥
गुरु के बार सफल जब मोह्यो, तरुणी रूप अनूप धरे ।
माता होकर पुत्र खिलावैकहा भार्या भोग करे ।
सब सुखदायी सदा सहाई, संत खड़े जयकार करे। सन्तन प्रतिपाली ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश फल लिये, भेंट देन तेरे द्वार खड़े ।
अटल सिंहासन बैठी माता, सर सोने का छात्र फिरे ।
बार शनिश्चर कुमकुम वरणी, जब लुंकड पर हुकम करे । सन्तन प्रतिपाली ॥
खंग खप्पर त्रिशूल हाथ लिये, रक्त बीज कूं भस्म करे ।
शुम्भ निशुम्भ क्षणहि में मारे, महिषासुर को पकड दले ।
आदित बारी आदि भवानी, जन अपने का कष्ट हरे । सन्तन प्रतिपाली ॥
कुपित होय कर दानव मारे, चण्ड मुण्ड सब चूर करे ।
जब तुम देखो दयररूप हो, पर में संकट दूर टरे ।
सौम्य स्वभाव धरयो मेरीमात, जन की अर्ज कबूल करे । सन्तन प्रतिपाली ॥
सात बार की महिमा बर्नी, सब गुण कौन बखान करे ।
सिंह पीठ पर चढी भवानी, अतल भवन में राज्य करे ।
दर्शन पावें मंगल गावें, सिध साधक तेरी भेंट धरे । सन्तन प्रतिपाली ॥

ब्रह्मा वेद पढे तेरे द्वारे, शिवशंकर हरि ध्यान करे ।
इन्द्र कृष्ण तेरी करें आरती, चंवर कुबेर डुलाये करे ।
जय जननी जय मातु भवानी, अचल भवन में राज्य करे ।
संतान प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे । सन्तन प्रतिपाली ॥

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