12 मार्च 2010

घर को दें पारंपरिक लुक

हर तरफ फैशन के बड़ते दौर ने जहाँ सभी चीजों को बड़ावा दिया है। वहीं घरों की सजावट का प्रचलन अच्छा खासा बड़ गया है। केवल ‍रंग-बिरंगी दीवारों से ही घर खूबसूरत नहीं बनता बल्कि घर में रखे साजो-सामान से भी घर की खूबसूरती निखरती है। यदि आप घर को नया रूप देना चाहते हैं तो एक बार पारंपरिक वस्तुओं से घर की सजावट करने के बारे में जरूर सोचिएगा।
.
.
.

लगभग हर छोटे-बड़े शहर में लगने वाली हस्तकला प्रदर्शनी या हाट-बाजार में आपको बहुत सारी ऐसी चीजें मिल जाएँगी जिन्हें आप अपने घर की सजावट में उपयोग कर सकते हैं।
कच्छी-कसीदे का सामान हो या राजस्थानी लाख का सामान, केरल का सीप का सामान आदि सभी कुछ हमें इन बाजारों में आसानी से मिल जाता है। लकड़ी के खिलौने, फोटो फ्रेम, पारंपरिक चित्र आदि आपके घर को सुंदर बनाने के साथ-साथ आपके दिल को सुकून भी देते हैं।
.
.
.
शहरों में जगह की कमी हम सभी की एक प्रमुख समस्या है। ऐसे में कम जगह में घर को अपनी पसंद में ढालना बहुत मुश्किल होता है। इसके बावजूद कुछ लोग इतने शौकीन होते हैं कि वे छोटी सी जगह को भी अपनी पसंद के अनुसार सुंदर बना लेते हैं।
भारत संस्कृति व परंपराओं का देश है। यहाँ हर प्रदेश की अपनी एक अलग पहचान व कला है।यदि हम इस कला को अपने घर की सजावट में उपयोग करें तो वह हमें शांति व सुकून देने के साथ-साथ हमारे घर की खूबसूरती में चार चाँद भी लगाएगा।
..
।.
.
हर तरफ फैशन के बड़ते दौर ने जहाँ सभी चीजों को बड़ावा दिया है। वहीं घरों की सजावट का प्रचलन अच्छा खासा बड़ गया है। आजकल जहाँ देखो लोगों को थोड़ी सी भी खाली स्पेस मिली नहीं कि वे हरियाली बिखेरने लगते हैं। और इसी दौर में मकान और बंगले के कमरों के अनुरूप फूलों की साज।सज्जा का भी काफी प्रचलन बड़ गया है। जहाँ एक ओर फूलों का चलन बड़ा है। वहीं बाजार में रोजाना नित नए प्रकार के बुके और तरह.तरह के फूल हमें सजे हुए दिखाई देते हैं। घर की सजावट में फूलों का अपना भी विशष महत्व है जो आपके घर को चार.चाँद लगा देते हैं।
.
.
.
आइए हम आपको कुछ ऐसे टिप्स:
1. अपने घर में फूलों की सजावट करते समय हमेशा कमरे के रंग और कमरे के परदों के अनुसार ही फूलों एवं फूलदान का चयन करें। आजकल बाजार में अनेक प्रकार से डेकोरेट किए हुए फूलदान उपलबध हैं, जिन्हें आप आसानी से खरीदसकती हैं। इससे आपके घर की शानो.शौकत और ज्यादा बड़ जाएगी। और घर पर आने वाले मेहमान आपके द्वारा सजाए गए कमरे की तारीफ किए बिना नहीं रह पाएँग।

2. फूलदान में फूलों की सजावट करते समय पानी डालने में कंजूसी ना करें। इस बात को हमेशा ध्यान में रखें कि फूलदान में पानी जितना ज्यादा होगा उतने ही फूल खिले.खिले दिखेंग। साथ ही अगर आपका फूलों को एकाध हफ्ते तक फरेश बनाए रखने का विचार हो तो पानी में एकाध छोटी चम्मच शक्कर मिला दें या एकाध एसि्प्रन की गोली डाल दें।

.
3।ज्यादा फूलों को एक.साथ जोडे रखने के लिए ओएसिस बिर्क का प्रयोग करें। फूलों की सजावट की बड़ती माँग के अनुसार आजकल यह बिर्क बाजार में आसानी से उपलबध होती है।
4. फूलदान के पानी को एक दिन छोडकर बदला जा सकता है। रोज पानी बदलेंगी तो फूल और पत्तियों को क्षति पहुँचने का डर रहेगा।
.
.
.
5। फूलदान सजाते समय सबसे बीच वाले भाग में लंबे डंडी वाले फूल और बाद में छोटे फूल और पत्तियों को इकट्ठा कर बिर्क से जोड दें।




.
.
.
6. बुके सजाते समय डार्क कलर या डार्क शड वाले फूलों को मध्य में रखें और हलके रंग वाले फूलों को आस.पास सजाएँ। इससे आपके गुलदस्ते में खूबसूरती आ जाएगी।


.
.
.
7. बाजार में फूलों को खरीदते समय अधखिले फूलों का ही चयन करें। इससे आपके फूलदान के फूल ज्यादा दिनों तक ताजा दिखाई देंग। अगर गुलदस्ता सजाने में देर हो तो ऐसे फूलों को घर लाने के पश्चात उनकी टहनियों को एकाध घंटा पानी के मर्तबान में रख दें।
.
.
.
8. आपके द्वारा बनाए गए बुके या गुलदस्ते को ज्यादा गरम कमरे में या धूप वाले स्थान पर ना रखें। इससे आपके गुलदस्ते के जल्दी मुरझने का डर रहेगा।

.
.
.
9. फूलों की सजावट के समय पत्तियों का महत्व भी समझें और उन्हें फूलों के साथ जोडे। इससे आपका फूलदान हराभरा दिखाई देगा। साथ ही वह आपके कमरे की रोशनी भीबड़ाएगा।


.
.
.
10। अगर आपके घर में बगीचा है या फूलों को आप अपने ही घर में उगाती हैं तो फूलों को हमेशा अलसुबह तोडें इससे फूलोंमें नमी ज्यादा समय तक बनी रहेगी। इससे फूल जल्दी नहीं मुरझएँग। इस तरह आप फूलों की सजावट से अपने कमरे को महका सकती हैं। जो आपके परिवार वालों के साथ.साथ आपके पति भी उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाएँग और इस तरह आप बनेंगी उनकी और प्रिय।

कैसा हो आपका पूजा घर

पूजा घर, घर का वो कक्ष होता है जहाँ हम ईश्वर का ध्यान करते हैं तथा दुनियादारी से दूर कुछ देर के लिए ईश्वर की आराधना में खो जाते हैं। आजकल स्थान की कमी के कारण कई बार हम रसोईघर या शयनकछ में ही भगवान के कुछ चित्र लगाकर वहीं पूजाघर बना लेते हैं, जो कि बहुत गलत है।

वास्तु में पूजाघर एक निर्धारित दिशा में होना चाहिए, जिससे कि आपको आपके द्वारा की गई ईश्वर की आराधना का श्रेष्ठ फल मिल सके।

वास्तु की छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर आप अपने घर में सुख-शांति व खुशियाँ ला सकते हैं। जब भी आप अपने घर में पूजाघर बनाएँ तो वास्तु के निम्न निर्देशों का विशेष ख्याल रखें -

* आपका पूजाघर शौचालय के ठीक ऊपर या नीचे नहीं होना चाहिए।
* शयन कक्ष के भीतर बनाया गया पूजाघर को वास्तु में श्रेष्ठ नहीं माना गया है।
* भगवान को मूर्ति को भूल से भी कभी दक्षिण-पश्चिम दिशा में नहीं रखना इससे आपके कार्यों में रुकावट आती है।
* एक ही भगवान की कई सारी मूर्तियाँ एकसाथ पूजाघर में नहीं रखना चाहिए।
* घर की पूर्व या उत्तरी दीवार पर कुलदेवता का चित्र लगाना शुभ होता है।
* पूजाघर का रंग सफेद या हल्का क्रीम होना चाहिए।
* पूजाघर का दरवाजा टिन या लोहे की ग्रिल का नहीं होना चाहिए।
* पूजाघर और शौचालय का दरवाजा आसपास या आमने-सामने नहीं होना चाहिए।

आयुर्वेद

आयुर्वेद के प्रणेता ब्रह्मा जिन्होंने
ब्रह्मसंहिता की रचना की

आयुर्वेद आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पद्धति है। यह आयु का वेद अर्थात आयु का ज्ञान है। जिस शास्त्र के द्वारा आयु का ज्ञान कराया जाय उसका नाम आयुर्वेद है। शरीर, इन्द्रिय सत्व, और आत्मा के संयोग का नाम आयु है। आधुनिक शब्दों में यही जीवन है। प्राण से युक्त शरीर को जीवित कहते है। आयु और शरीर का संबंध शाश्वत है। आयुर्वेद में इस सम्बन्ध में विचार किया जाता है। फलस्वरुप वह भी शाश्वत है। जिस विद्या के द्वारा आयु के सम्बन्ध में सर्वप्रकार के ज्ञातव्य तथ्यों का ज्ञान हो सके या जिस का अनुसरण करते हुए दीर्घ आशुष्य की प्राप्ति हो सके उस तंत्र को आयुर्वेद कहते हैं, आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है।
यह मनुष्य के जीवित रहने की विधि तथा उसके पूर्ण विकास के उपाय बतलाता है, इसलिए आयुर्वेद अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह एक चिकित्सा पद्धति मात्र नही है, अपितु सम्पूर्ण आयु का ज्ञान है। आयुर्वेद में आयु के हित (पथ्य, आहार, विहार), अहित (हानिकर, आहार, विहार), रोग का निदान और व्याधियों की चिकित्सा कही गई है। हित आहार, सेवन एवं अहित आहार त्याग करने से मनुष्य पूर्ण रुप से स्वस्थ रह सकता है। आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के चरम लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। पुरुषार्थ चतुष्टयं की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है अतः उसकी सुरक्षा पर विशेष बल देते हुए आयुर्वेद कहता है कि धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है। सम्पूर्ण कार्यों विशेष रुप से शरीर की रक्षा करना चाहिए। भाव प्रकाश, आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ, मे कहा गया है कि जिस शास्‍त्र के द्वारा आयु का ज्ञान, हित और अहित आहार विहार का ज्ञान, व्‍याधि निदान तथा शमन का ज्ञान प्राप्ति किया जाता है, उस शास्‍त्र का नाम आयुर्वेद है।
.
आयुर्वेद का प्रारम्भ और विकास
आयुर्वेद के इतिहास पर यदि अवलोकन किया जाय तो इसकी उत्‍पत्ति महर्षि देवता ब्रह्मा जी द्वारा माना गया है, जिन्होंने ब्रह्मसंहिता की रचना की थी। कहा जाता है कि ब्रह्मसंहिता में दस लाख श्‍लोक तथा एक हजार अघ्‍याय थे, लेकिन आधुनिक काल में यह ग्रंथ उपलब्‍ध नहीं है।
आयुर्वेद के ज्ञान के आदि श्रोत वेद मानें जाते हैं। यद्यपि आयुर्वेद का वर्णन सभी चारों वेदों में किया गया है, लेकिन अथर्ववेद से अधिक साम्‍यता होंनें के कारण महर्षि सुश्रुत नें उपांग और महर्षि वाग्‍भट्ट नें उपवेद बताया है। महर्षि चरक नें भी अथर्ववेद से सबसे अधिक नजदीकी विवरण मिलनें के कारण आयुर्वेद को इसी वेद से जोडा है।
इसी कडी में, ऋग्वेद में आयुर्वेद को उपवेद की संज्ञा दी गयी है। महाभारत में भी आयुर्वेद को उपवेद कहा गया है। पुराणों में भी वर्णन प्राप्‍त है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा गया है। वास्‍तव में किसी भी वैदिक साहित्‍य में आयुर्वेद शब्‍द का वर्णन नहीं मिलता, फिर भी महर्षि पाणिनि द्वारा रचित ग्रंथ अष्‍टाध्‍यायी में आयुर्वेद शब्‍द प्राप्‍त होता है।
आयुर्वेद का सम्‍पूर्ण वर्णन प्रमुख रूप से चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में किया गया है। अन्‍य संहिताओं यथा काश्‍यप संहिता, हरीत संहिता, में इसका वर्णन किया गया है, लेकिन ये सम्‍पूर्ण नहीं हैं। अष्टाङ्ग संग्रह, अष्टाङ्ग हृदय, भाव प्रकाश, माधव निदान इत्‍यादि ग्रंथों का सृजन चरक और सुश्रुत को आधार बनाकर रचित की गयीं हैं। समय के परिवर्तन के साथ साथ निदानात्‍मक और चिकित्‍सकीय अनुभवों को लेखकों नें अपने अपने दृष्टिकोणों और विचारों को अनुकूल समझ कर संस्‍कृत भाषा में लिपिबद्ध किया।
शिरोधार
आयुर्वेद का उद्देश्य
संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो दुःखी होना चाहता हो। सुख की चाह प्रत्येक व्यक्ति की होती है, परन्तु सुखी जीवन उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। स्वस्थ और सुखी रहने के लिए यह आवश्यक है कि शरीर में कोई विकार न हो और यदि विकार हो जाए तो उसे शीघ्र दूर कर दिया जाये। आयुर्वेद का मुख्य लक्ष्य व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना एवं रोगी हो जाने पर उसके विकार का प्रशमन करना है। ऋषि जानते थे कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ जीवन से ही है इसीलिए उन्होंने आत्मा के शुद्धिकरण के साथ शरीर की शुद्धि व स्वास्थ्य पर भी विशेष बल दिया है।
आयुर्वेद के विकास क्रम और विकास के इतिहास पर दृष्टिपात करनें से ऐसा समझा जाता है कि आदिम काल के पूर्वजों नें रोंगों से मुक्ति पानें के लिये जिन जंगली जड़ी-बूटियों, रहन-सहन और अन्‍य पदार्थों को रोगानुसार आरोग्‍यार्थ स्‍वरूप में स्‍वीकार किया, वे यह सारा ज्ञान अपनें बाद की पीढियों को देते चले गये। यह सारा ज्ञान श्रुति और स्‍मृति पर आधारित रहा। कालान्‍तर में यह ज्ञान एक स्‍थान पर एकत्र होता गया। जब गुरूकुलों की स्‍थापना हुयी तो धर्म, कर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इत्‍यादि की प्राप्ति के लिये यह कहा गया कि जब तक तन और मन स्‍वस्‍थ्य नहीं होंगे, ऐसा उद्देश्‍य प्राप्‍त करना कठिन है, इसलिये पहली आवश्‍यकता शरीर को स्‍वस्‍थ्‍य बनाये रखना है।
जब तक लिपि का आविष्‍कार नहीं हुआ था तब तक यह ज्ञान स्‍मृति और श्रुति के सहारे जीवित रहा। जब लिपियों का आविष्‍कार हुआ तब यह ज्ञान पत्‍थरों से लेकर भोजपत्र में संचित करके रखा गया।
नागार्जुन, आयुर्वेद के भिषज्
आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थ
ग्रन्थ -- रचनाकार
चरक संहिता -- चरक
सुश्रुत संहिता -- सुश्रुत
अष्टांग हृदय -- वाग्भट्ट
वंगसेन -- वंगसेन
माधव निदान -- मधवाचार्य
भाव प्रकाश -- भाव मिश्र
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त वैद्य विनोद, वैद्य मनोत्सव, भैषज्य रत्नावली, वैद्य जीवन आदि अन्य वैद्यकीय ग्रन्थ हैं। वैद्य जीवन के रचयिता पंडितवर लोलिम्बराज हैं; इस ग्रन्थ को अतीत में एवं आधुनिक काल में अधिक श्रद्धा के साथ वैद्यों ने अपनाया है।
.
आयुर्वेद अवतरण
आयुर्वेद के अवतरण की कई गाथायें हैं :
चरक संहिता के अनुसार ब्रह्मा जी नें आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया, दक्ष प्रजापति नें यह ज्ञान दोनों अश्विनी कुमार को दिया, अश्‍वनी कुमारों नें यह ज्ञान इन्‍द्र को दिया, इन्‍द्र नें यह ज्ञान भारद्वाज को दिया, भारद्वाज नें यह ज्ञान आत्रेय पुनर्वसु को दिया, आत्रेय पुनर्वसु नें यह ज्ञान अग्निवेश, जतूकर्ण, भेल, पराशर, हरीत, क्षारपाणि को दिया ।
सुश्रुत संहिता के अनुसार ब्रम्‍हा जी नें आयुर्वेद का ज्ञान दक्षप्रजापति को दिया, दक्ष प्रजापति नें यह ज्ञान अश्‍वनीं कुमार को दिया, अश्‍वनी कुमार से यह ज्ञान धन्‍वन्‍तरि को दिया, धन्‍वन्‍तरि नें यह ज्ञान औपधेनव और वैतरण और औरभ और पौष्‍कलावत और करवीर्य और गोपुर रक्षित और सुश्रुत को दिया।
काश्‍यप संहिता के अनुसार ब्रम्‍हा जी नें आयुर्वेद का ज्ञान अश्‍वनी कुमार को दिया और अश्‍वनीं कुमार नें यह ज्ञान इन्‍द्र को दिया और इन्‍द्र ने यह ज्ञान कश्‍यप और वशिष्‍ठ और अत्रि और भृगु आदि को दिया। इनमें से एक शिष्‍य अत्रि नें यह ज्ञान अपनें पुत्र और अन्‍य शिष्‍यों को दिया।
सृष्टि के प्रणेता ब्रह्मा द्वारा एक लाख सूत्रों में आयुर्वेद का वर्णन किया गया और इस ज्ञान को दक्ष प्रजापति द्वारा ग्रहण किया गया तत्पश्चात् दक्ष प्रजापति से यह ज्ञान सूर्यपुत्र अश्विन कुमारों को और अश्विन कुमारों से स्वर्गाधिपति इन्द्र को प्राप्त हुआ। आयुर्वेद के इतिहास से यह ज्ञात होता है कि इन्द्र के द्वारा यह ज्ञान पुनर्वसु आत्रेय को यह प्राप्त हुआ। शल्य शास्त्र के रुप में यह ज्ञान आदि धन्वन्तरि को प्राप्त हुआ। और स्त्री एवं बाल चिकित्सा के रुप में यह ज्ञान इन्द्र से महर्षि कश्यप को दिया गया। उपरोक्त वर्णन से यह ज्ञात होता है कि भारत में प्रारंभ से ही चिकित्सा ज्ञान, काय चिकित्सा, शल्यचिकित्सा, स्त्री एवं बालरोग चिकित्सा रुप में विख्यात हुआ था। उपरोक्त इस विशेष कथन से यह बात भी प्रमाणित होती है कि चिकित्सा कार्य को करने के लिए आज की राज आज्ञा के अनुरुप चिकित्सा कार्य करने के लिए स्वर्गाधिपति इन्द्र से अनुमति प्राप्त करनी आवश्यक होती थी।
चरक संहिता को काश्‍मीर राज्‍य के आयुर्वेदज्ञ दृढ़बल नें पुर्नसंगृहित किया। इस समय के प्रसिद्ध आयुर्वेदज्ञों में मत्‍त, मान्‍डव्‍य, भास्‍कर, सुरसेन, रत्‍नकोष, शम्‍भू, सात्विक, गोमुख, नरवाहन, इन्‍द्रद, काम्‍बली, व्‍याडि आदि रहे हैं।
महात्‍मा बुद्ध के समय में आयुर्वेद विज्ञान नें सबसे अधिक प्रगति रस चिकित्‍सा विज्ञान और रस विद्या में किया है। इसी कारण बौद्ध युग को रस शास्‍त्र का स्‍वर्ण युग कहा जाता है।
रस विद्या तीन भागों 1- धातु विद्या 2- रस चिकित्‍सा 3- क्षेम विद्या, में विभाजित हुयी ।
.
शल्‍य चिकित्‍सा पर प्रतिबन्‍ध
कलिंग विजय के पश्‍चात सम्राट अशोक नें भगवान बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनें राज्‍य में रक्‍तपात और रक्‍तपात से संबंधित समस्‍त कार्यकलापों पर पूर्णत: प्रतिबन्‍ध लागू कर दिया। इससें कालान्‍तर में शनै: शनै: आयुर्वेद में प्रचिलित शल्‍य-चिकित्‍सा का अभ्‍यास प्रभावित हुआ और अन्‍तत: एक प्रकार से शल्‍यचिकित्‍सा का लोप होता चला गया। लेकिन दूसरी तरफ रस चिकित्‍सा में अदभुत रूप से प्रगति हुयी। केवल रसौषधियों के बल पर साध्‍य, कष्‍ट साध्‍य और असाध्‍य रोंगों की चिकित्‍सा विधियों की खोज की गयी।
बौद्ध युग के सिद्ध आयुर्वेदज्ञों में भगवान बुद्ध के शिष्‍य नागार्जुन तृतीय ने रस विद्या के उत्‍थान के लिये बहुत योगदान दिया। भगवान बुद्ध के शिष्‍यों में लगभग आठ नागार्जुन हुये हैं। ऐसा समझा जाता है कि आयुर्वेद रस-चिकित्‍सा विज्ञान के उत्‍थान और शोध में सभी नागार्जुनों का अमूल्‍य योगदान रहा है।
.
आयुर्वेद के मूल सिद्धान्त
आयुर्वेद, के विद्वान मनीषियों नें चिकित्‍सा-विधि को ज्ञान एवं तर्क युक्‍त बनानें के लिये बहुत से मूल सिद्धान्तों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हुये संरचनायें की हैं. ये इस प्रकार रचित की गयीं हैं -
त्रिदोष
मुख्य लेख : त्रिदोष
मुख्यतः यह तीन होते हैं जिन्‍हें वात, पित्‍त और कफ कहते हैं (ये एकल दोष कहे जाते हैं)।
जब वात और पित्‍त अथवा पित्‍त और कफ अथवा वात और कफ ये दो दोष मिल जाते हैं , तब इस मिश्रण को द्विदोषज कहते हैं।
जब वात, पित्‍त और कफ ये तीनों दोष एक साथ मिल जाते हैं , तब इस मिश्रण को त्रिदोषज या सन्निपातज कहते हैं।
त्रिदोष के पांच भेद
मुख्य लेख : त्रिदोष के प्रत्‍येक के पांच भेद
हरेक दोष के पांच भेद आयुर्वेद के मनीषियों नें निर्धारित किये हैं -
वात दोष के पांच भेद (1) समान वात (2) व्‍यान वात (3) उदान वात (4) प्राण वात (5) अपान वात हैं। वात दोष को ‘’ वायु दोष ‘’ भी कहते हैं।
पित्‍त दोष के पांच भेद होते हैं: 1- पाचक पित्‍त 2- रंजक पित्‍त 3- भ्राजक पित्‍त 4- लोचक पित्‍त 5- साधक पित्‍त
इसी प्रकार कफ दोष के पांच भेद होते हैं: 1- श्‍लेष्‍मन कफ 2- स्‍नेहन कफ 3- रसन कफ 4- अवलम्‍बन कफ 5- क्‍लेदन कफ
आधुनिक आयुर्वेदज्ञ वातादि दोषों के भेदों को फिजियोलांजिकल बेसिस आंफ डिसीजेज के समकक्ष मानते हें। कुछ अन्‍य विदृवान इसे असामान्‍य एनाबालिजम की तरह से समझते हैं।व्च्व्ह्ज अ
सप्‍त धातु
मुख्य लेख : सप्‍त धातु
आयुर्वेद के मौलिक सिदधान्‍तों में सप्‍त धातुओं का बहुत महत्‍व है इनसे शरीर का धारण होता है, इसी कारण से धातु कहा जाता है। ये संख्‍या में सात होती है -
रस धातु
रक्‍त धातु
मांस धातु
मेद धातु
अस्थि धातु
मज्‍जा धातु
शुक्र धातु
सप्‍त धातुयें वातादि दोषों से कुपित होंतीं हैं जिस दोष की कमी या अधिकता होती है, सप्‍त धातुयें तदनुसार रोग अथवा शारीरिक विकृति उत्‍पन्‍न करती हैं
आधुनिक आयुर्वेदज्ञ सप्‍त धातुओं को पैथोलांजिकल बेसिस‍ आंफ डिसीजेज के समतुल्‍य मानते हैं
मल-आयुर्वेद
मुख्य लेख : मल-आयुर्वेद
मल तीन प्रकार के होतें हैं
पुरीष
मूत्र
स्‍वेद
.
आयुर्वेद के आठ अङ्ग : अष्टाङ्ग आयुर्वेद
चिकित्‍सा के दृष्टिकोण से आयुर्वेद को आठ अंगों में वर्गीकृत किया गया है । इसे अष्टाङ्ग आयुर्वेद कहते हैं ।
1- शल्‍य
2- शालाक्‍य
3- काय चिकित्‍सा
4- भूत विद्या
5- कौमार भृत्‍य
6- अगद तन्‍त्र
7- रसायन
8- बाजीकरण
.
आयुर्वेद में नयी खोजें
आयुर्वेद लगभग, 5000 वर्ष पुराना चिकित्‍सा विज्ञान है. इसे भारतवर्ष के विद्वानों नें भारत की जलवायु, भौगालिक परिस्थितियों,भारतीय दर्शन, भारतीय ज्ञान-विज्ञान के द्ष्टकोण को घ्‍यान में रखते हुये विकसित किया है। वतर्मान में स्‍वतंत्रता के पश्‍चात आयुर्वेद चिकित्‍सा विज्ञान नें बहुत प्रगति की है. भारत सरकार द्वारा स्‍थापित संस्‍था ‘’केन्द्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसं‍धान परिषद’’,[Central council for research in Ayurveda and Siddha, CCRAS] नई दिल्‍ली, भारत, आयुर्वेद में किये जा रहे अनुसन्‍धान कार्यों को समस्‍त देश में फैले हुये शोध सन्‍स्‍थानों में सम्‍पन्‍न कराता है। बहुत से एन0जी0ओ0 और प्राइवेट सन्‍स्‍‍थान तथा अस्‍पताल और व्‍यतिगत आयुर्वेदिक चिकित्‍सक शोध कार्यों में लगे हुये है। इनमें से प्रमुख शोध त्रिफला, अश्वगंधा आदि औषधियों, इलेक्ट्रानिक उपकरणों यथा इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफी ई०टी०जी० और नाडी तरन्गिणी यत्रों द्वारा आयुर्वेदिक तौर तरीकों से आयुर्वेद के मौलिक सिद्धन्तों की पहचान, रोगों के निदान में सहायता और सटीक साक्ष्य आधारित चिकित्सा व्यवस्था से संबंधित हैं।
.
आलोचना
आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान एलोपैथी के समर्थन करनें वाले चिकित्‍सा विज्ञानियों का मानना है कि आयुर्वेद एक अवैज्ञानिक चिकित्‍सा पद्धति है और इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। जिस प्रकार एलोपैथी में रोगों के कारण बैक्‍टीरिया, इन्‍फेक्‍सन, जेनेटिक आदि होते हैं और औषधियों के परीक्षण जानवरों पर होते हैं और परिणाम प्राप्‍त करनें तक की सारी प्रक्रिया साक्ष्‍य आधारित [Evidence Based] होती है वैसा आयुर्वेद में कुछ भी नहीं है और सब कुछ कपोल कल्‍पना पर आधारित है।
जनरल आंफ पोस्‍ट ग्रेजुएट मेडिसिन में चिकित्‍सा विज्ञानियों नें दावा किया है कि ऐसी तमाम आयुर्वेदिक औषधियां हैं जिनमें एलापैथिक स्‍टेरायड मिले हुये होते हैं।
जनरल आंफ अमेरिकन मेडिकल एसोसियेशन नें एक अध्‍ययन के पश्‍चात यह निष्‍कर्ष निकाला है कि एशिया के बाजारों से प्राप्‍त आयुर्वेदिक दवाओं के सैंपिल जांचनें में हेवी मेटल [Heavy metals] यानी भारी धातुयें जैसे पारा, शीशा और संखिया जैसे जहरीले पदार्थ 20 प्रतिशत नमूनों में मात्रा से अधिक प्राप्‍त हुआ है।
.
आयुर्वेद द्वारा रोगों का इलाज
.
कड़ी संख्या - 2
कड़ी संख्या - 3
कड़ी संख्या - 4
कड़ी संख्या - 5

वो मुँह से निकाल देती है पथरी!

रलायता गाँव की एक वृद्ध महिला का दावा

आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हमारी मंजिल थी उज्जैन के पास का रलायता गाँव। हमने सुना था इस गाँव में रहने वाली एक बुढ़िया कैसी भी पथरी हो, मुँह से निकाल देती है। इस बात को खँगालने के लिए हमने अपना सफर शुरू किया। जैसे ही हमने उज्जैन के बाहर बने कालियादेह पैलेस को पार किया, सोचा किसी से रलायता गाँव का रास्ता पूछ लिया जाए।
जल्द ही हमें एक गड़रिया दिखा। जैसे ही हमने गडरिए से रलायता गाँव का पता पूछा। गड़रिए ने हमसे ही उल्टा सवाल किया- क्या आपको पथरी निकलवानी है। हमने कहा हाँ, कुछ ऐसा ही समझें। उसने कहा- फिर भटकते क्यों हैं, सामने की सड़क पकड़ लें। रास्ते में जो भी मिले, उससे आगे का रास्ता पूछ लेना। ठीक जगह पहुँच जाएँगे।
हमने उसकी सलाह पर अमल किया और कुछ देर में ही हम सीताबाई की ड्योढ़ी पर थे। यहाँ पहुँचने से पहले हमने अपने ड्राइवर को समझा दिया था कि उसे भी मरीज बनकर सीताबई से मिलना होगा। यहाँ पहुँचते ही हमने देखा दुर्गा मंदिर के अहाते पर एक वृद्ध स्त्री को भीड़ ने घेर रखा था। पास जाने पर पता चला, यही सीताबाई हैं, जो मुँह से पथरी निकाल लेती हैं।
और यह भीड़ उनसे इलाज करवाने वालों की थी। सीताबाई तल्लीनता से अपने काम में लगी थीं। वे एक व्यक्ति को नीचे लेटातीं। पूछतीं कहाँ दर्द हो रहा है। फिर दर्द वाले स्थान को चूसने लगतीं। कुछ पल बाद ही वे सामने बैठे लड़के को अपने मुँह से पथरी निकालकर दे देतीं।
यह सिलसिला लगातार काफी देर तक चलता रहा। जैसे ही उन्हें कुछ फुरसत मिली, हमने सवालों की झड़ी शुरू कर दी। सीताबाई ने बताया मैं पिछले 18 सालों से पथरी निकालने का काम कर रही हूँ। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहने लगीं मैं हवा हूँ, मेरे 52 स्थान हैं। हर जगह मैं अलग-अलग काम करती हूँ। इलाज का मूलमंत्र माँ पर विश्वास है। यदि विश्वास पक्का हो तो इलाज शर्तिया है, वरना कुछ नहीं हो सकता।यह कहते ही वे वापस अपने मरीजों के इलाज में लग गईं।
एक तरफ सीताबाई तेजी से पथरी निकालने का काम कर रही थीं। वहीं दूसरी तरफ बैठा पंडा पीड़ित लोगों को पालक, टमाटर, बैंगन न खाने की हिदायत दे रहा था। वहीं दवाई के रूप में तुलसी के पत्ते, बिल्वपत्र का चूर्ण दिया जा रहा था, जिसे तीन दिन तक शाम को खाने की सलाह दी जा रही थी। सीताबाई से इलाज कराने के लिए राजस्थान, कानपुर, ग्वालियर आदि अलग-अलग जगह से लोग आए थे।

जयपुर से आए एके मौरे के साथ 75 वर्षीय श्रीमती भगवानदेवी किडनी की पथरी का इलाज करवाने आई थीं। उन्होंने जयपुर में सीताबाई के बारे में सुना था। वे कहती हैं अब इस उमर में ऑपरेशन तो करा नहीं सकती हूँ, इसलिए यहाँ आई हूँ । क्या महसूस हुआ, पूछने पर वे कहती हैं अजीब-सा खिंचाव लग रहा था। दर्द नहीं हुआ। महीनेभर के अंदर यहाँ वापस आने के लिए कहा है। उसके बाद सोनोग्राफी करवाने के लिए कहा गया है। देखते हैं क्या होता है।
भगवानदेवी की तरह काफी लोग थे, जो पहली बार यहाँ आए थे। तो कुछ का दूसरा दौरा था। दूसरी बार आने वाले लोगों का कहना था, पथरी के दर्द में काफी कमी आई है। ऐसे ही एक व्यक्ति मनोज का कहना था कि वे ग्वालियर जाने के बाद अल्ट्रासाउंड कराकर देखेंगे कि पथरी खत्म हुई या नहीं।

यहाँ हम लोगों से बातचीत कर रहे थे। वहाँ सीताबाई लगातार पथरी निकालने का काम जारी रखे हुई थीं। इस बीच हमारे ड्राइवर का नंबर आ गया। उसने सीताबाई को बताया कि उसे पेट में दर्द होता है शायद पथरी है। सीता बाई ने उसका पेट अपने अंदाज में चूसा और एकदम बोल दिया कि तुम्हें पथरी नहीं है। शायद गैस की समस्या होगी खाना समय पर खाया करों। हमारे ड्राइवर को पथरी नहीं है यह उन्होंने कैसे बताया, हमें नहीं पता।
अब हम सीताबाई से बातचीत होने का इंतजार करने लगे, लेकिन ये क्या जैसे ही आखिरी मरीज का इलाज किया, सीताबाई की शख्सियत ही बदल गई। कुछ देर पहले जो महिला हमसे गुस्से में बात कर रही थी, वह गाँव की आम दादी-नानी की तरह बातें करने लगी। हमने उनसे पूछा वे यह सब कब से कर रही हैं, तो उन्होंने अजीब-सा जवाब दिया मैं क्या कर रही हूँ, करती तो देवी माँ हैं। मैं कैसे इलाज करती हूँ, इसके बारे में तो मैं भी नहीं जानती। बस एक शक्ति है, जो हमसे ये सब काम करवा रही है। यह कहकर वे अनाज साफ करने बैठ गईं।

यहाँ इलाज करा चुके कई लोगों का दावा है कि उनकी पथरी खत्म हो चुकी है, लेकिन डॉक्टरों को इस बारे में भरोसा नहीं है। जब हमने इस संबंध में जनरल सर्जन डॉ. अपूर्व चौधरी से बात की तो उन्होंने बताया पथरी यदि बारीक हुई तो वह पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाएगी, अन्यथा पूरा इलाज ही उसे दूर कर सकता है। मुँह से पथरी निकालना! ऐसा हो ही नहीं सकता। हो सकता है, कोई पहले से ही पत्थर मुँह में रखे और पथरी निकालने का दावा करे।

रामायण – लंकाकाण्ड – मेघनाद वध

उधर विभीषण ने क्रोध करके अग्नि के समान जाज्वल्यमान बाणों की बौछार करके राक्षस सेना का विनाश करना आरम्भ कर दिया। विभीषण की बाणवर्षा से प्रोत्साहित होकर वानर सेना पूरे बल से हनुमान के नेतृत्व में पत्थर और वृक्ष मारकर राक्षसों को यमलोक भेजने लगी। इस महायुद्ध को देखकर देवता-दानव सबके हृदय दहल गये। पृथ्वी पर शवों के अतिरिक्त वृक्षों एवं पत्थरों के समूह से गगनचुम्बी पर्वत बन गये। वहाँ लक्ष्मण और मेघनाद के बाणों से दसों दिशाएँ आच्छादित हो गईं, सूर्य छिप गया और चारों ओर अन्धकार छा गया। तभी सुमित्रानन्दन ने मेघनाद के रथ के चारों घोड़ों को मारकर सारथि का सिर काट डाला। यह देखकर राक्षसों के उत्साह पर पाला गिर गया और वानर सेना में फिर से नवजीवन का संचार हो गया। तभी मेघनाद लपक कर दूसरे रथ पर चढ़ गया और उस पर से बाणों वर्षा करने लगा।

मेघनाद ने जब दूसरे रथ पर चढ़कर युद्ध करना आरम्भ किया तो विभीषण को बहुत क्रोध आया। उसने पूरे वेग से गदा का वार करके उसके रथ को चूर-चूर कर दिया और सारथि को मार डाला। अपने चाचा द्वारा किये गये इस विनाशकारी आक्रमण से मेघनाद जलभुन गया और उसने एक साथ दस बाण विभीषण को मारने के लिये छोड़े। मेघनाद के लक्ष्य को द‍ृष्टि में रखकर लक्ष्मण ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उन बाणों को मार्ग में ही नष्‍ट कर दिया। अपना वार इस प्रकार खाली जाते देख मेघनाद क्रोध से पागल हो गया और उसने विभीषण को मारने के लिये वह शक्‍तिशाली बाण छोड़ा जो उसे यमराज से प्राप्त हुआ था। वह एक अद्‍भुत बाण था जिसे इन्द्र आदि देवता भी नहीं काट सकते थे और जिसके वार को तीनों लोकों में भी कोई सहन नहीं कर सकता था। इस यम बाण को अपनी ओर आता देख लक्ष्मण ने भी वह अप्रमेय शक्‍ति वाला बाण निकाला जो उन्हें कुबेर ने दिया था। उन बाणों के छूटने से सम्पूर्ण आकाश प्रकाश से जगमगा उठा। वे दोनों एक दूसरे से टकराये जिससे भयानक अग्नि उत्पन्न हुई और दोनों बाण जलकर भस्म हो गये। अपने बाण को व्यर्थ जाता देख लक्ष्मण ने मेघनाद पर वरुणास्त्र छोड़ा। उस प्रलयंकारी अस्त्र का निवारण करने के लिये इन्द्रजित ने आग्नेय बाण छोड़ा। इसके परिणामस्वरूप लक्ष्मण का वरुणास्त्र निरस्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। लगभग उसी समय मेघनाद ने लक्ष्मण के प्राण लेने के लिये आसुरास्त्र नामक बाण छोड़ा। उसके छूटते ही सम्पूर्ण वातावरण में अन्धकार छा गया और कुछ भी देखना सम्भव नहीं रह गया। अपने इस सफलता पर मेघनाद ने बड़े जोर की गर्जना की, किन्तु दूसरे ही क्षण लक्ष्मण ने सूर्यास्त्र छोड़कर उस अन्धकार को दूर कर दिया जिससे पृथ्वी, आकाश एव सभी दिशाएँ पूर्ववत् चमकने लगीं।

उसी के साथ उन्होंने एक अद्वितीय बाण प्रत्यंचा पर चढ़ाते हुये यह कहकर कि 'यदि रघुवंशमणि महात्मा राम परम सत्यवादी, धर्मपरायण तथा द‍ृढ़व्रती हैं तो हे बाण! तू शीघ्र जाकर दुष्ट मेघनाद को यमलोक पहुँचा' वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हुये उन्होंने वह बाण छोड़ दिया। तीनों लोकों का क्षय करने की सामर्थ्य वाला वह अजेय बाण सम्पूर्ण वातावरण को प्रकाशित करता हुआ मेघनाद को लगा और उसका मस्तक उड़ाकर आकाश में बहुत दूर तक ले गया। मेघनाद का मस्तकविहीन धड़ बड़े जोर का धमाका करता हुआ पृथ्वी पर गिरा। इन्द्र को भी समरभूमि में पराजित करने वाले, सम्पूर्ण देवताओं एवं दानवों को अपने नाम से ही भयभीत करने वाले इस परम पराक्रमी मेघनाद का सुमित्रानन्दन के हाथों वध होता देख वानर सेना के आनन्द की सीमा न रही। वे बड़े जोर से हर्षध्वनि और सिंह गर्जना करते हुये राक्षसों को चुन-चुन कर मारने लगे। लंका के महत्वपूर्ण स्तम्भ तथा राक्षसकुल के परम तेजस्वी युवराज को इस प्रकार मरते देख राक्षस सेना का मनोबल टूट गया। उनके पैर उखड़ गये। कुछ साहसी राक्षस आधे मन से लड़ते रहे और शेष प्राण बचाकर लंका की ओर दौड़े। वानर सेना उस समय विजयोन्माद से ग्रस्त हो रही थी। उसने भागते हुये राक्षसों को भी न छोड़ा और उन पर निरन्तर पत्थरों से आक्रमण करते रहे। जो उनकी पकड़ में आ गये, उन्हें नाखूनों और दाँतों से चीर डाला। एक ओर राक्षस हाहाकार करते हुये भागे जा रहे थे तो दूसरी ओर ऋक्ष एवं वानर राम-लक्ष्मण की जयजयकार करते हुये उन्हें खदेड़ रहे थे। देवताओं एवं ऋषि-मुनियों के भयंकर शत्रु के मर जाने पर सब लोग प्रसन्‍न हो हर्षनाद कर रहे थे।

11 मार्च 2010

एक संत क़ी अमूल्य शिक्षा


1. एक ही सिद्धांत, एक ही इष्ट एक ही मंत्र, एक ही माला, एक ही समय, एक ही आसन, एक ही स्थान हो तो जल्दी सीधी होती है।
2. विष्णु, शंकर, गणेश, सूर्य और देवी - ये पाँचों एक ही हैं। विष्णु क़ी बुद्धि 'गणेश' है, अहम् 'शंकर', नेत्र 'सूर्य' है और शक्ति 'देवी' है। राम और कृष्ण विष्णु के अंतर्गत ही हैं।
3. कलियुग में कोई अपना उद्दार करना चाहे तो राम तथा कृष्ण क़ी प्रधानता है, और सिद्दियाँ प्राप्त करना चाहे तो शक्ति तथा गणेश क़ी प्रधानता है- 'कलौ चणडीविनायकौ'।
4. औषध से लाभ न तो हो भगवान् को पुकारना चाहिए। एकांत में बैठकर कातर भाव से, रोकर भगवान् से प्रार्थना करें जो काम औषध से नहीं होता, वह प्रार्थना से हो जाता है। मन्त्रों में अनुष्ठान में उतनी शक्ति नहीं है, जितनी शक्ति प्रार्थना में है। प्रार्थना जपसे भी तेज है।
5. भक्तों के नाम से भगवान् राजी होते हैं। शंकर के मन्दिर में घंटाकर्ण आदि का, राम के मन्दिर में हनुमान, शबरी आदि का नाम लो। शंकर के मन्दिर में रामायण का पाठ करो। राम के मन्दिर में शिव्तान्दाव, शिवमहिम्न: आदि का पाठ करो। वे राजी हो जायेंगे। हनुमानजी को प्रसन्न करना हो उन्हें रामायण सुनाओ। रामायण सुनने से वे बड़े राजी होते हैं।
6. अपने कल्याण क़ी इच्छा हो तो 'पंचमुखी या वीर हनुमान' क़ी उपासना न करके 'दास हनुमान' क़ी उपासना करनी चाहिए।
7. शिवजी का मंत्र रुद्राक्ष क़ी माला से जपना चाहिए, तुलसी क़ी माला से नहीं।
8. हनुमानजी और गणेशजी को तुलसी नहीं चढानी चाहिए।
9. गणेशजी बालाक्स्वरूप में हैं। उन्हें लड्डू और लाल वस्त्र अच्छे लगते हैं।
10. दशमी- विद्ध एकादशी त्याज्य होती है, पर गणेशचतुर्थी त्रित्या- विद्धा श्रेष्ठ होती है।
11. किसी कार्यको करें या न करें - इस विषय में निर्णय करना हो तो एक दिन अपने इस्ट का खूब भजन-ध्यान, नामजप, कीर्तन करें। फिर कागज़ क़ी दो पुडिया बनाएं, एक में लिखें 'काम करें' और दूसरी में लिखें 'काम न करें'। फिर किसी बच्चे से कोई एक पुडिया उठ्वायें और उसे खोलकर पढ़ लें।
12. किंकर्तव्यविमूढ होने क़ी दशा में चुप, शांत हो जाएँ और भगवान् को याद करें तो समाधान मिल जाएगा।
13. कोई काम करना हो तो मन से भगवान् को देखो। भगवान् प्रसन्न देखें तो वह काम करो और प्रसन्न न देखें तो वह काम मत करो क़ी भगवान् क़ी आगया नहीं है। एक- दो दिन करोगे तो भान होने लगेगा।
14. विदेशी लोग दवापर जोर देते हैं, पर हम पथ्यपर जोर देते हैं -
पथ्ये सटी गदार्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
पथ्येSसति गदर्त्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
'पथ्य से रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध-सेवन से क्या प्रायोजन ? और पथ्य से न रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध - सेवन से क्या प्रायोजन ?'
15. जहाँ तक हो सके, किसी भी रोग में आपरेशन नहीं करना चाहिए। दवाओं से चिकित्सा करनी चाहिए। आपरेशन द्वारा कभी न करायें। जो स्त्री चक्की चलाती है, उसे प्रसव के स्ममय पीड़ा नहीं होती और स्वास्थ भी सदा ठीक रहता है।
16. इक ही दावा लम्बे समय तक नहीं लेनी चाहिए। बीच में कुछ दिन उसे छोड़ देना चाहिए। निरंतर लेने से वह दावा आहार (भोजन) क़ी तरह जो जाता है।
17. वास्तव में प्रारब्ध से रोग बहुत कम होते हैं, ज्यादा रोग कुपथ्य से अथवा असंयम से होते हैं, कुपथ्य छोड़ दें तो रोग बहुत कम हो जायेंगे। ऐसे ही प्रारभ दुःख बहुत कम होता है, ज्यादा दुःख मूर्खता से, राग-द्वेष से, खाब स्वभाव से होता है।
18. चिंता से कई रोग होते हैं। कोई रोग हो तो वह चिंता से बढ़ता है। चिंता न करने से रोग जल्दी ठीक होता है। हर दम प्रसन्न रहने से प्राय: रोग नहीं होता, यदी होता भी है तो उसका असर कम पड़ता है।
19. मन्दिर के भीतर स्थित प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ती के दर्शन का जो महात्मय है, वाही महात्मय मन्दिर के शिखर के दर्शन का है।
20. शिवलिंग पर चढ़ा पदार्थ ही मिर्माल्या अर्थात त्याज्य है। जो पदार्थ शिवलिंग पर नहीं चढ़ा वह निर्माल्य नहीं है। द्वादश ज्योतिलिंगों में शिवलिंग पर चढ़ा पदार्थ भी निर्माल्य नहीं है।
21. जिस मूर्ती क़ी प्राणप्रतिष्ठा हुई हो, उसी में सूतक लगता है। अतः उसकी पूजा ब्रह्मण अथवा बहन- बेटी से करानी चाहिए। परन्तु जिस मूर्ती क़ी प्राणप्रतिष्ठा नहीं क़ी गयी हो, उसमें सूतक नहीं लगता। कारण क़ी प्राणप्रतिष्ठा बिना ठाकुरजी गहर के सदस्य क़ी तरह ही है; अतः उनका पूजन सूतक में भी किया जा सकता है।
22. घर में जो मूर्ती हो, उसका चित्र लेकर अपने पास रखें। कभी बहार जाना पड़े तो उस चित्र क़ी पूजा करें। किसी कारणवश मूर्ती खण्डित हो जाए तो उस अवस्था में भी उस चित्र क़ी ही पूजा करें।
23. घर में राखी ठाकुर जी क़ी मूर्ती में प्राणप्रतिष्ठा नहीं करानी चाहिए।
24. किसी स्त्रोत का महात्मय प्रत्येक बार पढने क़ी जरुरत नहीं। आरम्भ और अंत में एक बार पढ़ लेना चाहिए।
25. जहाँ तक शंख और घंटे क़ी आवाज क़ी आवाज जाती है, वहां तक पीरोगता, शांति, धार्मिक भाव फैलते है।
26. कभी मन में अशांति, हलचल हो तो 15-20 मिनट बैठकर राम-नाम का जप करो अथवा 'आगमापायिनोSनित्या:' (गीता 1/14) - इसका जप करो, हलचल मिट जायेगी।
27. कोई आफत आ जाए तो 10-15 मिनट बैठकर नामजप करो और प्रार्थना करो तो रक्षा हो जायेगी। सच्चे हृदय से क़ी गयी प्रार्थना से तत्काल लाभ होता है।
28. घर में बच्चो से प्रतिदिन घंटा-डेढ घण्टा भगवानाम का कीर्तन करवाओ तो उनकी जरूर सदबुद्धि होगी और दुर्बद्धि दूर होगी।
29. 'गोविन्द गोपाल की जय' - इस मंत्र का उच्चारण करने से संकल्प- विकल्प मिट जाते हैं।, आफत मिट जाती है।
30. नाम जप से बहुत रक्षा होती है। गोरखपुर में प्रति बारह वर्ष प्लेग आया करता था। भाई जी श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार ने एक वर्ष तक नामजप कराया तो फिर प्लेग नहीं आया।
31. कोई रात-दिन राम-राम कर्ना शुरु कर दे तो उस्के पास अन्न, जल, वस्त्र आदि की कमी नहीं रहेगी।
32. प्रहलाद की तरह एक नामजप में लग जाय तो कोई जादू-टोना, व्यभिचार, मूठ आदि काम नहीं करता।
33. वास्तव में वशीकरण मन्त्र उसी पर चलता है, जिसके भीतर कामना है। जितनी कामना होगी, उतना असर होगा। अगर कोई कामना न हो तो मन्त्र नहीं चल सकता; जैसे पत्थर पर जोंक नहीं लग सकती।
34. राम्राक्षस्त्रोत, हनुमानचालीसा, सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से अनिष्ट मन्त्रों का (मारण-मोहन आदि तांत्रिक प्रयोगों) असर नहीं होता। परन्तु इसमें बलाबल काम करेगा।
35. भगवान् का जप-कीर्तन करेने से अथवा कर्कोटक, दमयंती, नल और ऋतुपणर्का नाम लेने से कलियुग असर नहीं करता।
36. कलियुग से बचने के लिये हरेक भाई-बहिन को नल-दमयंती क़ी कथा पढनी चाहिए। नल-दमयंती क़ी कथा पढने से कलियुग का असर नहीं होगा, बुद्द्नी शुद्ध होगी।
37. छोटे गरीब बच्चों को मिठाई, खिलौना आदि देकर राजी करने से बहुत लाभ होता है और शोक-चिंता मिटते हैं, दुःख दूर होता है। इसमें इतनी शक्ति है क़ी आपका भाग्य बदल सकता है। जिनका ह्रदय कठोर हो, वे यदी छोटे-छोटे गरीब बच्चों को मिठाई खिलायें और उन्हें खाते हुए देखें तो उनका ह्रदय इतना नरम हो जाएगा क़ी एक दिन वे रो पड़ेंगे!
38. छोटे ब्रह्मण-बालकों को मिठाई, खिलौना आदि मनपसंद वस्तुएं देने से पितर्रदोष मिट जाता है।
39. कन्याओं को भोजन कराने से शक्ति बहुत प्रसन्न होती है।
40. रात्री सोने से पहले अपनी छाया को तीन बार कह दे कि मुझे प्रात: इतने बजे उठा देना तो ठीक उतने बजे नींद खुल जायेगी। उस समय जरुर उठ जाना चाहिए।
41. जो साधक रात्री साढे ग्यारह से साढे बारह बजे तक अथवा ग्यारह से एक बजे तक जागकर भजन-स्मरण, नाम-जप करता है, उसको अंत समय में मूरचा नहीं आती और भगवान् क़ी स्मृति बनी रहती है।
42. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोना नहीं चाहिए। सूर्योदय के बाद उठने से बुद्धि कमजोर होती है, और सूर्योदय से पहले उठने से बुद्धि का विकास होता है। अतः सूर्योदय होने से पहले ही उठ जाओ और सूर्य को नमस्कार करो। फिर पीछे भले ही सो जाओ।
43. प्रतिदिन स्नान करते समय 'गंगे-गंगे' उच्चारण करने क़ी आदत बना लेनी चाहिए। गंगा के इन नामों का भी स्नान करते समय उच्चारण करना चाहिए - 'ब्रह्मकमण्डुली, विष्णुपादोदकी, जटाशंकरी, भागीरथी,जाहन्वी' । इससे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश- तीनों का स्मरण हो जाता है।
44. प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद गंगाजल का आचमन लेना चाहिए। गंगाजल लेने वाला नरकों में नहीं जा सकता। गंगाजल को आग्पर गरम नहीं करना चाहिए। यदि गरम करना ही हो तो धुप में रखकर गरम कर सकतें है। सूतक में भी गंगा-स्नान कर सकते हैं।
45. सूर्य को जल देने से त्रिलोकी को जल देने का महात्मय होता है। प्रातः स्नान के बाद एक ताम्बे के लोटे में जल लेकर उसमें लाल पुष्प या कुमकुम दाल दे और 'श्रीसूर्याय नम:' अथवा 'एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाध्य दिवाकर॥' कहते हुए तीन बार सूर्यको जल दे।
46. प्रत्येक कार्य में यह सावधानी रखनी चाहिए क़ी समय और वास्तु कम-से-कम खर्च हों।
47. रोज़ प्रातः बड़ों को नमस्कार करना चाहिए। जो प्रातः बड़ों को नमस्कार करते हैं, वे नमस्कार करने योग्य हैं।
48. प्रत्येक बार लघुशंका करने के बाद इन्द्रिय और मुख को ठण्डे जल से तथा पैरों को गरम जल से धोना चाहिए। इससे आयु बढती है।
49. कोई हमारा चरण - स्पर्श करे तो आशीर्वाद न देकर भगवान् का उच्चारण करना चाहिए।
50. किसी से विरोध हो तो मन से उसकी परिक्रमा करके प्रणाम करो तो उसका विरोध मिटता है, द्वेष-वृत्ति मिटती है। इससे हमारा वैर भी मिटेगा। हमारा वैर मिटने से उसका भी वैर मिटेगा।
51. कोई व्यक्ति हमसे नाराज हो, हमारे प्रति अच्छा भाव न रखता हो तो प्रतिदिन दुबह-शाम मन इ उसकी परिक्रम करके दंडवत प्रणाम करें। ऐसा करने से कुछ ही दिनों में उसका भाव बदल जाएगा। फिर वह व्यक्ति कभी मिलेगा तो उसके भावों में अंतर दीखेगा। भजन-ध्यान करने वाले साधक के मानसिक प्रणाम का दुसरे पर ज्यादा असर पड़ता है।
52. किसी व्यक्ति का स्वभाव खराब हो तो जब वह गहरी नींद में सोया हो, तब उसके श्वासों के सामने अपने मुख करके धीरे से कहिएं क़ी तुम्हारा स्वभाव बड़ा अच्छा है, तुम्हारे में क्रोध नहीं है, आदि। कुछ दिन ऐसा करने से उसका स्वभाव सुधरने लगेगा।
53. अगर बेटे का स्वभाव ठीक नहीं हो तो उसे अपना बेटा न मानकर, उसमें सर्वदा अपनी ममता छोड़कर उसे सच्चे ह्रदय से भगवान् के अर्पण कर दे, उसे भगवान् का ही मान ले तो उसका स्वभाव सुधर जाएगा।
54. गाय की सेवा करने से सब कामनाएं सिद्ध होती है। गाय को सहलाने से, उसकी पीठ आदि पर हाथ फेरने से गाय प्रसन्न होती है। गाय के प्रसन्न होने पर साधारण रोगों क़ी तो बात ही क्या है, बड़े-बड़े असाध्य रोग भी मिट जाते हैं। लगभग बारह महीने तक करके देखना चाहिए।
55. गाय के दूध, घी, गोबर-गोमूत्र आदि में जीवनी-शक्ति रहती है। गाय के घी के दीपक से शांति मिलती है। गाय का घी लेने से विषैले तथा नशीली बस्तु का असर नस्त हो जाता है। परन्तु बूढी अशुद्ध होने से अच्छी चीज भे बुरी लगती है, गाय के घी से भी दुर्गन्ध आती है।
56. बूढी गाय का मूत्र तेज होता है और आँतों में घाव कर देता है। परन्तु दूध पीने वाली बछडी का मूत्र सौम्य होता है; अतः वाही लेना चाहिए।
57. गायों का संकरीकरण नहीं करना चाहिए। यह सिद्धांत है क़ी शुद्ध चीज में अशुद्ध चीज मिलें से अशुद्ध क़ी ही प्रधानता हो जायेगी; जैसे-छाने हुए जल में अन्चाने जल क़ी कुछ बूंदे डालने से सब जल अन्चाना हो जाएगा।
58. कहीं जाते समय रास्ते में गाय आ जाए तो उसे अपनी दाहिनी तरफ करके निकलना चाहिए। दाहिनी तरफ करे से उसकी परिक्रमा हो जाती है।
59. रोगी व्यक्ति को भगवान् का स्मरण कराना सबसे बड़ी और सच्ची सेवा है। अचिक बीमार व्यक्ति को सांसारिक लाभ-हानि क़ी बातें नहीं सुनानी चाहिए। छोटे बच्चों को उसके पासा नहीं ले जाना चाहिए; क्योकि बच्चों में स्नेह अधिक होने से उसकी वृत्ति उनमें चली जायेगे।
60. रोगी व्यक्ति कुछ भी खा- पी लेना सके तो गेहूं आदि को अग्नि में डालर उसका धुंआ देना चाहिए। उस धुंए से रोगी को पुष्टि मिलती है।
61. भगवनाम अशुद्ध अवस्था में भी लेना चाहिए। कारण क़ी बिमारी में प्राय: अशुधि रहती है। यदि नामे लिये बिना मर गए तो क्या दशा होगी? क्या अशुद्ध अवस्था में श्वास नहीं लेते? नामजप तो श्वास से भी अधिक मूल्यवान है।
62. मरणासन्न व्यक्ति के सिरहाने गीताजी रखें। डाह-संस्कार के समय उस गीताजी को गंगाजी में बहा दे, जलायें नहीं।
63. यदि रोगी के मस्तक पर लगाया चन्दन जल्दी सूख जाय तो समझें क़ी ये जल्दी मरने वाला नहीं है। मृत्यु के समीप पहुंचे व्यक्ति उसके मस्तक क़ी गर्मी चली जाती है, मस्तक ठंडा हो जाता है।
64. शव के दाह-संस्कार के समय मृतक के गले में पड़ी तुलसी क़ी माला न निकालें, पर गीताजी हो तो निकाल देनी चाहिए।
65. अस्पताल में मरने वाले क़ी प्राय: सदगति नहीं होती। अतः मरनासन व्यक्ति यदी अस्पताल में हो तो उसे घर ले आना चाहिए।
66. श्राद्ध आदि कर्म भारतीय तिथि के अनुसार करने चाहिए, अंग्रेजी तारीख के अनुसार नहीं। (भारत आजाद हो गया, अपर भीतर से गुलामी नहीं गयी। लोग अंग्रेजी दिनाक तो जानते हैं, पर तिथि जानते ही अन्हीं!)
67. किसी व्यक्ति क़ी विदेश में मृत्यु हो जाय तो उसके श्राद्ध में वहां क़ी तिथि न लेकर भारत क़ी तिथि ही लेनी चाहिए अर्थात उसकी मृत्यु के समय भारत में जो तिथि हो, उसी तिथि में श्राद्धादि करना चाहिए।
68. श्राद्धका अन्न साधुको नहीं देना चाहिए, केवल ब्राहम्ण को ही देना चाहिए।
69. घर में किसी क़ी मृत्यु होने पर सत्संग, मन्दिर और तीर्थ- इन तीनों में शोक नहीं रखना चाहिए अर्थात इन तीनों जगह जरुर जाना चाहिए। इनमें भी सत्संग विशेष है। सत्संग से शोक्का नाश होता है।
70. किसी क़ी मृत्यु से दुःख होता है तो इसके दो कारन हैं- उससे सुख लिया है, और उससे आशा रखी है। मृतात्मा क़ी शांति और अपना शोक दूर करने के लिये तीन उपाय करने चाहिए - 1) मृतात्मा को भगवान् के चरणों में बैठा देखें 2) उसके निमित्त गीता, रामायण, भगवत, विष्णुसहस्त्रनाम आदि का पाठ करवाएं 3) गरीब बालकों को मिठाई बांटें।
71. घर का कोई मृत व्यक्ति बार-बार स्वप्न में आये तो उसके निमित्त गीता-रामायण का पाठ करें, गरीब बालकों को मिठाई खिलायें। किसी अच्छे ब्रह्मण से गया-श्राद्ध करवाएं। उसी मृतात्मा अधिक याद आती है, जिसका हम पर ऋण है। उससे जितना सुख-आराम लिया है, उससे अधिक सुख-आराम उसे न दिया जाय, तब तक उसका ऋण रहता है। जब तक ऋण रहेगा, तब तक उसकी याद आती रहेगी।
72. यह नियम है कि दुखी व्यक्ति ही दुसरे को दुःख देता है। यदी कोई प्रेतात्मा दुःख दे रही है तो समझना चाहिए क़ी वह बहुत दुखी है। अतः उसके हित के लिये गया-श्राद्ध करा देना चाहिए।
73. कन्याएं प्रतिदिन सुबह-शाम सात-सात बार 'सीता माता' और 'कुंती माता' नामों का उच्चारण करें तो वे पतिव्रता होती हैं।
74. विवाह से पहले लड़के-लड़की का मिलना व्यभिचार है। इसे मैं बड़ा पाप मानता हूँ।
75. माताएं-बहनें अशुद्ध अवस्था में भी रामनाम लिख सकती हैं, पर पाठ बिना पुस्तक के करना चाहिए। यदी आवश्यक हो तो उन दिनों के लिये अलग पुस्तक रखनी चाहिए। अशुद्ध अवस्था में हनुमान चालीसा स्वयं पाठ न करके पति से पाता कराना चाहिए।
76. अशुद्ध अवस्था में माताएं तुलसी क़ी माला से जप न करके काठ क़ी माला से जप करें, और गंगाजी में स्नान न करके गंगाजल मंगाकर स्नानघर में स्नान करें। तुलसी क़ी कण्ठीतो हर समय गले में रखनी चाहिए।
77. गर्भपात महापाप है। इससे बढ़कर कोई पाप नहीं है। गर्भ्पाप करनेवाले क़ी अगले जन्म में कोई संतान नहीं होती।
78. स्त्रियों को शिवलिंग, शालग्राम और हनुमानजी का स्पर्श कदापि नहीं करना चाहिए। उनकी पूजा भी नहीं करनी चाहिए। वे शिवलिंग क़ी पूजा न करके शिवमूर्ति क़ी पूजा कर सकती हैं। हाँ, जहाँ प्रेमभाव मुख्य होता है, वहां विधि-निषेध गौण हो जाता है।
79. स्त्रियों को रूद्राक्ष क़ी माला धारण नहीं करनी चाहिए। वे तुलसी क़ी माला धारण करें।
80. भगवान् क़ी जय बोलने अथवा किसी बात का समर्थन करने के समय केवल प्रुर्शों को ही अपने हाथ ऊँचें करने चाहिए, स्त्रियों को नहीं।
81. स्त्री को गायत्री-जप और जनेऊ-धारण करने का अधिकार नहीं है। जनेऊ के बिना ब्रह्मण भी गायत्री-जप नहीं कर सकता है। शरीर मल- मूत्र पैदा करने क़ी मशीन है। उसकी महत्ता को लेकर स्त्रियों को गायत्री-जप का अधिकार देते हैं तो यह अधिकार नहीं, प्रत्युत धिक्कार है। यह कल्याण का रास्ता नहीं है, प्यात्युत केवल अभिमान बढाने के लिये है। कल्याण चाहने वाली स्त्री गायत्री-जप नहीं करेगी। स्त्री के लिये गायत्री-मंत्र का निषेध करके उसका तिरस्कार नहीं किया है, प्रत्युत उसको आफत से चुदाय है। गायत्री-जप से ही कल्याण होता हो- यह बात नहीं है। राम-नाम का जप गायत्री से कम नहीं है। (सबको सामान अधिकार प्राप्त हो जय, सब बराबर हो जाएँ - ऐसी बातें कहने-सुनने में तो बड़ी अच्छी दीखती हैं, पर आचरण में लाकर देखो तो पता लगे! सब गड़बड़ हो जाएगा! मेरी बातें आचरण में ठीक होती है।)
82. पति के साधु होने पर पत्नी विधवा नहीं होती। अतः उसे सुहाग के चिन्ह नहीं छोड़ने चाहिए।
83. stri परपुरुष का और पुरुष परस्त्री का स्पर्श न करे तो उनका तेज बढेगा। पुरुष मान के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम करे, पर अन्य सब स्त्रियों को दूर से प्रणाम करे। स्त्री पति के चरण-स्पर्श करे, पर ससुर आदि अन्य पुरुषों को दूर से प्रणाम करे। तात्पर्य है क़ी स्त्री को पति के सिवाय किसी के भी चारण नहीं चूने चाहिए। साधू-संतों को भी दूर से पृथ्वी पर सर टेककर प्रणाम करना चाहिए।
84. दूध पिलाने वाली स्त्री को पति का संग नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से दूध दूषित हो जाता है, जिसे पीने से बच्चा बीमार हो जाता है।
85. कुत्ता अपनी तरफ भौंकता हो तो दोनों हाटों क़ी मुठ्ठी बंद कर लें। कुछ देर में वह चुप हो जाएगा।
86. मुसलमान लोग पेशाब को बहुत ज्यादा अशुद्ध मानते हैं। अतः गोमूत्र पीने अथवा छिड़कने से मुस्लिम तंत्र का प्रभाव कट जाता है।
87. कहीं स्वर्ण पडा हुआ मिल जाय तो उसे कभी उठाना नहीं चाहिए।
88. पान भी एक श्रृंगार है। यह निषिद्ध वास्तु नहीं है, पर ब्रह्मचारी, विधवा और सन्यासी के लिये इसका निषेध है।
89. पुरुष की बायीं आँख ऊपर से फडके तो शुभ होती है, नीचे से फडके तो अशुभ होती है। कान क़ी तरफ वाला आँख का कोना फडके तो अशुभ होता है और नाक क़ी तरफ्वाला आँख का कोना फडके तो शुभ होता है।
90. यदि ज्वर हो तो छींक नहीं आती। छींक आ जाय तो समझो ज्वर गया! छींक आना बीमारी के जाने का शुभ शकुन है।
91. शकुन मंगल अथवा अमंगल - 'कारक' नहीं होते, प्रत्युत मंगल अथवा अमंगल - 'सूचक होते हैं।
92. 'पूर्व' क़ी वायु से रोग बढ़ता है। सर्प आदि का विष भी पूर्व क़ी वायु से बढ़ता है। 'पश्चिम' क़ी वायु नीरोग करने वाली होती है। 'पश्चिम' वरुण का स्थान होने से वारूणी का स्थान भी है। विघुत तरंगे, ज्ञान का प्रवाह 'उत्तर' से आता है। 'दक्षिण' में नरकों का स्थान है। 'आग्नेय' क़ी वायु से गीली जमीन जल्दी सूख जाती है; क्योंकि आगनेय क़ी वायु शुष्क होती है। शुष्क वायु नीरोगता लाती है। 'नैऋत्य' राक्षसों का स्थान है। 'ईशान' कालरहित एवं शंकर का स्थान है। शंकर का अर्थ है - कल्याण करने वाला।
93. बच्चों को तथा बड़ों को भी नजर लग जाती है. नजर किसी-किसी की ही लगती है, सबकी नहीं. कईयों की दृष्टि में जन्मजात दोष होता है और कई जान-बूझकर भी नजर लगा देते हैं. नजर उतरने के लिये ये उपाय हिं- पहला, साबत लालमिर्च और नमक व्यक्ति के सिर पर घुमाकर अग्नि में जला दें. नजर लगी होगी तो गंध नहीं आयेगी. दूसरा, दाहिने हाथ की मध्यमा-अनामिका अँगुलियों की हथेली की तरफ मोड़कर तर्जनी व कनिष्ठा अँगुलियों को परस्पर मिला लें और बालक के सिर से पैर तक झाड दें. ये दो अंगुलियाँ सबकी नहीं मिलती. तीसरा, जिसकी नजर लगी हो, वह उस बालक को थू-थू-थू कर दे, तो भी नजर उतर जाती है.
94. नया मकान बनाते समय जीवहिंसा होती है; विभिन्न जीव-जंतुओं की स्वतन्त्रता में, उनके आवागमन में तथा रहने में बाधा लगती है, जो बड़ा पाप है. अतः नए मकान की प्रतिष्ठा का भोजन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है.
95. जहाँ तक हो सके, अपना पहना हुआ वस्त्र दूसरे को नहीं देना चाहिए.
96.  देवी की उपासना करने वाले पुरूष को कभी स्त्री पर क्रोध नहीं करना चाहिए.
97.  एक-दूसरे की विपरीत दिशा में लिखे गए वाकया अशुभ होते हैं. इन्हें 'जुंझारू वाक्य' कहते हैं.
98.  कमीज, कुरते आदि में बायाँ भाग (बटन लगाने का फीता आदि) ऊपर नहीं आना चाहिए. हिन्दू-संस्कृति के अनुसार वस्त्र का दायाँ भाग ऊपर आना चाहिए.
99.  मंगल भूमिका पुत्र है; अतः मंगलवार को भूमि नहीं खोदनी चाहिए, अन्यथा अनिष्ट होता है. मंगलवार को वस्त्र नापना, सिलना तथा पहनना भी नहीं चाहिए.
100.  नीयत में गड़बड़ी होने से, कामना होने से और विधि में त्रुटी होने से मंत्रोपासक को हानि भी हो सकती है. निष्काम भाव रखने वाले को कभी कोई हानि नहीं हो सकती.
101.  हनुमानचालीसा का पाठ करने से प्रेतात्मा पर हनुमान जी की मार पड़ती है.
102.  कार्यसिद्धि के लिये अपने उपास्यदेव से प्रार्थना करना तो ठीक है, पर उन पर दबाव डालना, उन्हने शपथ या दोहाई देकर कार्य करने के लिये विवश करना, उनसे हाथ करना सर्वथा अनुचित है. उदाहरणार्थ, 'बजरंगबाण' में हनुमानजी पर ऐसा ही अनुचित दबाव डाला गया है; जैसे- 'इन्हें मारू, तोही सपथ राम की.', 'सत्य होहु हरि सपथ पाई कई.', 'जनकसुता-हरि-दास कहावै. ता की सपथ, विलम्ब न लावे..', 'उठ, उठ, चालू, तोही राम दोहाई'. इस तरह दबाव डालने से उपास्य देव प्रसन्न नहीं होते, उलटे नाराज होते हैं, जिसका पता बाद में लगता है. इसलिए मैं 'बजरंगबाण' के पाठ के लिये मना किया करता हूँ. 'बज्रंग्बान' गोस्वामी तुलसीदासजी की रचना नहीं है. वे ऐसी रचना कर ही नहीं सकते.
103.  रामचरितमानस एक प्रासादिक ग्रन्थ है. जिसको केवल वर्णमाला का गया है, वह भी यदि अंगुली रखकर रामायण के एक-दो पाठ कर ले तो उसको पढना आ जायेगा. वह अन्य पुस्तकें भी पढ़ना शुरू कर देगा.
104.  रामायण के एक सौ आठ पाठ करने से भगवान के साथ विशेष संबंध जुड़ता है.
105.  रामायण का नवाह्न-पारायण आरम्भ होने पर सूआ-सूतक हो जाय तो कोई दोष नहीं लगता.
106.  रामायण का पाठ करने से बुद्धि विक्सित होती है. रामायण का नावाह्न पाठ करने वाला विद्यार्थी कभी फेल नहीं होता.
107.  कमरदर्द आदि के कारण कोई लेटकर रामायण का पाठ चाहे तो कर सकता है. भाव का मूल्य है. भाव पाठ में रहना चाहिए, शरीर चाहे जैसे रहे.
108.  पुस्तक उल्टी नहीं रखनी चाहिए. इससे उसका निरादर होता है. सभी वस्तुएँ भगवत्स्वरूप होने से चिन्मय है. अतः किसी की वास्तु का निरादर नहीं करना चाहिए. किसी आदरणीय वास्तु का निरादर करने से वह वास्तु नष्ट हो जाती है. अथवा उसमें विकृति आ जाती है, यह मेरा अनुभव है.

                                                                                                                                      - ब्रह्मलीन परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी  

शिवलिंग का रंग बदला

क्या राम सेतु पर संकट से बदला शिवलिंग का रंग?

इसे आस्था कहें या अंधविश्वास? काशी विश्वनाथ की नगरी वाराणसी के मंदिरों में ही नहीं, वरन उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के कई शिव मंदिरों के शिवलिंगों का रंग एकाएक बदल गया है। एक ही दिन कई शिव मंदिरों में शिवलिंग का रंग बदलने की घटना ठीक उसी प्रकार प्रतीत हो रही है, जिस प्रकार पूर्व में एक बार देशभर में गणेश भगवान की मूर्तियों ने दूध पिया था।
.
लखनऊ के चारों धाम मंदिर स्थित शिवलिंग के रंग बदलने की सूचना पाकर भक्तजन भक्तिरस में डूब गए और भजन-पूजन करने लगे। यह घटना रविवार दोपहर 12 बजे के आसपास की है जब मंदिर में भक्तों ने देखा कि काले पत्थर के भगवान शिव के लिंग का रंग कुछ हिस्सों में सफेद होने लगा। दर्शनार्थी अचम्भित हो उठे। इसके बाद चर्चा ने जोर पकड़ा। रानीकटरा स्थित चारों धाम मंदिर में मंदिर से जुड़े हुए परिवार और अन्य लोगों का ताँता लग गया।

"भक्तजन एवं मन्दिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी इस घटना को रामसेतु पर आए संकट से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के राम विरोधी बयान और सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा गलत हलफनामा देने से ही यह चमत्कार मालूम पड़ता है।"
चौपटिया स्थित चारों धाम सिद्धपीठ मंदिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी इस घटना को ईश्वर की अद्‍भुत घटना मान रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पुराने लखनऊ का यह इलाका छोटी काशी के नाम से विख्यात है। यहाँ चारों धाम मन्दिर एवं बड़ी कालीजी की बड़ी महिमा है। पुराने लखनऊ की सँकरी गलियों में स्थित चारों धाम मन्दिर में रामेश्वरम्‌, बद्रीनाथ, केदारनाथ, द्वारिकाधीश और जगन्नाथपुरी के साक्षात दर्शन संभव हैं। यहाँ स्वर्ग और नरक के भी साक्षात दर्शन होते हैं। मन्दिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी का कहना है कि द्वारिकाधीश मन्दिर की प्रतिमा तो बाकायदा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से पंजीकृत है।

चारों धाम मन्दिर में स्थित रामेश्वरम्‌ मन्दिर बिलकुल रामेश्वर स्थित मन्दिर की तर्ज पर बना हुआ है। शिवलिंग के करीब से ही लंका जाने के लिए रामसेतु तथा उसके बाद रावण दरबार बना हुआ है, जहाँ आजकल रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। संभवतः रावण दरबार अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। आश्चर्य है कि रामेश्वरम्‌ के नाम से बने इस मन्दिर के शिवलिंग ने अपना रंग बदला। भक्तजन एवं मन्दिर के पुजारी पंडित सियाराम अवस्थी इस घटना को रामसेतु पर आए संकट से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के राम विरोधी बयान एवं भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा गलत हलफनामा देने से ही यह चमत्कार मालूम पड़ता है।

रविवार को राजधानी लखनऊ के रानीकटरा मोहल्ला में संतोषी माता मंदिर स्थित शिवलिंग के कुछ हिस्से के रंग बदलने से भक्तजन अवाक रह गए। पुराने मंदिर में स्थित सफेद शिवलिंग के बीच में लाल धारियाँ पड़ने से भी शिवभक्तों को आश्चर्य हुआ। यही नहीं नन्दी का भी रंग बदला। इसी मंदिर में शिवलिंग में शिव के नेत्र भी उभरकर सामने दिखाई देने लगे।

संतोषी माता मंदिर के पुजारी चन्द्रशेखर तिवारी का कहना है कि वे पिछले 20 वर्षों से इस मंदिर के पुजारी हैं, किन्तु ऐसा चमत्कार उन्होंने पहली बार देखा है। उन्होंने कहा कि भगवान ही चमत्कार दिखाते हैं, ताकि भक्तजन ईश्वर अंश को समझें। जो भगवान राम एवं शिव को नहीं मानता उसे ईश्वर ऐसे कारनामे दिखाता है जिससे वे अदृश्य शक्ति मानने को मजबूर हो जाते हैं। उनका कहना है कि कहीं शिव मंदिर में नाग निकलते हैं तो कहीं कन्या। यह सब भावना का खेल है। जैसी भावना वैसा ही प्रभु का स्वरूप दिखाई पड़ता है।

"शिवलिंग के रंग बदलने की घटना को वैज्ञानिक अन्वेषण का विषय बताया। उनका कहना था कि इस प्रकार की घटना उनके विभाग द्वारा संरक्षित मूर्तियों जिनकी आयु हजारों वर्ष है, के बारे में अभी तक प्राप्त नहीं हुई है।"
अब समय के साथ मंदिर स्थित शिवलिंग अपने पुराने स्वरूप में वापस लौट रहा है। भक्तजन बताते हैं कि रविवार को शिवलिंग में जितनी लालिमा थी, वह अब धीरे-धीरे काले छल्ले में बदल रही है। रानीकटरा चौपटिया निवासी मधुबाला, योगिता सिंह, वन्दना पाण्डेय, बृजेश पाण्डेय, अजीत कुमार शर्मा, मनोज मिश्रा आदि शिवलिंग के रंग बदलने की घटना को अद्‍भुत संयोग मान रहे हैं। शिवलिंग के रंग बदलने की घटना के बाद मंदिर में भक्तजनों का ताँता लग गया। सूचना है कि इसी प्रकार की घटना चारबाग, सरोजनीनगर के गौरी गाँव आदि कई जगहों पर घटित हुई है। अधिकतर लोग इस घटना को आस्था एवं विश्वास की नजर से देख रहे हैं।

पुरातत्व निदेशालय के उपनिदेशक पी.के. सिंह ने शिवलिंग के रंग बदलने की घटना को वैज्ञानिक अन्वेषण का विषय बताया। उनका कहना था कि इस प्रकार की घटना उनके विभाग द्वारा संरक्षित मूर्तियों, जिनकी आयु हजारों वर्ष है, के बारे में अभी तक नहीं प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि शिवलिंग का रंग बदलने की घटना का संबंध पुरातत्व अन्वेषण से नहीं है। इस संबंध में आईटीआरसी के पूर्व निदेशक एवं बायोटेक पार्क के मुख्य अधिशासी अधिकारी डॉ. पी.के. सेठ से जानकारी चाही किन्तु वे कोई भी बयान देने से बचे और उन्होंने आईटीआरसी में ही किसी वैज्ञानिक से संबंध स्थापित करने को अपने निजी सचिव के माध्यम से कहा। इस तरह शिवलिंग रंग क्यों बदल रहे हैं? इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है, वहीं शिवभक्तों का कहना है जहाँ आस्था की बात आती है, वहाँ शक की गुंजाइश ही नहीं होती।

रामायण – लंकाकाण्ड – युद्ध के लिये रावण का प्रस्थान

अपने पुत्र इन्द्रजित की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण व्याकुल हो दीनतापूर्वक विलाप करने लगा। फिर वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर राक्षसों को एकत्रित कर बोला, "हे निशाचरों! मैंने घोर तपस्या करके ब्रह्माजी से अद्‍भुत कवच प्राप्त किया है। उसके कारण मुझे कभी कोई देवता या राक्षस नहीं हरा सकता। देवासुर संग्राम में प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने मुझे बाण सहित विशाल धनुष भी दिया है। आज मैं उसी धनुष से राम-लक्ष्मण का वध करूँगा। मेरे पुत्र मेघनाद ने वानरों को भ्रम में डालने के लिये माया की सीता बनाकर उसका वध किया था, परन्तु मैं आज वास्तव में सीता का वध करके उस झूठ को सत्य कर दिखाउँगा।" यह कहकर वह चमचमाती हुई तलवार लेकर सीता को मारने के लिये अशोकवाटिका में जा पहुँचा।

रावण को यह नीच कर्म करने के लिये तैयार देखकर रावण के एक विद्वान और सुशील मन्त्री सुपार्श्‍व ने उसे रोकते हुये कहा, "महाराज दशग्रीव! आप साक्षात् कुबेर के भाई और वेद शास्त्रों के ज्ञाता हैं। फिर क्रोध के कारण धर्म को भूलकर सीता की हत्या क्यों करना चाहते हैं? आप सदा से धैर्यपूर्वक कर्तव्य का पालन करते आये हैं। इसलिये यह अनुचित कार्य न करें और हमारे साथ चलकर रणभूमि में राम पर अपना क्रोध उतारें।"

मन्त्री के वचन सुनकर रावण अपने महल को लौट गया। वहाँ मन्त्रियों के साथ आगे की योजना पर विचार करने लगा। फिर बोला, "कल हमको पूरी शक्‍ति से राम पर आक्रमण कर देना चाहिये।" रावण की आज्ञा पाकर दूसरे दिन प्रातःकाल लंका के वीर राक्षस नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर वानर सेनाओं से जा भिड़े। परिणाम यह हुआ कि दोनों ओर के वीरों द्वारा की गई मारधाड़ से समरभूमि में रक्‍त की धारा बह चली जो मृत शरीरों को लकड़ी की तरह बहा रही थी। जब राक्षसों ने वानर सेना की मार-मार कर दुर्गति कर दी तो स्वयं श्री राम ने वानरों पर आक्रमण करती हुई राक्षस सेना का देखते-देखते इस प्रकार सफाया कर दिया जिस प्रकार तेजस्वी सूर्य की किरणें आकाश से बादलों का सफाया कर देती हैं। उन्होंने केवल आधे पहर में दस हजार रथों, अठारह हाथियों, चौदह हजार अश्‍वारोही वीरों और दो लाख पैदल सैनिकों को मार गिराया।

जब लंका में इस भयानक संहार की सूचना पहुँची तो सारे नगर में हाहाकार मच गया। राक्षस नारियाँ अपने पिता, पति, पुत्र, भाई आदि का स्मरण कर करके भयानक क्रन्दन करने लगीं। रावण ने क्रुद्ध, दुःखी और शोकाकुल होकर महोदर, महापार्श्‍व और विरूपाक्ष को युद्ध करने के लिये बुला भेजा। उनके आने पर वह स्वयं भी करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान तथा आठ घोड़ों से सुसज्जित रथ पर बैठकर उन्हें साथ ले युद्ध करने को चला। उसके चलते ही मृदंग, पाह, शंख आदि नाना प्रकार के बाजे बजने लगे। महापार्श्‍व, महोदर और महावीर विरूपाक्ष भी अपने-अपने रथों पर सवार होकर उसके साथ चले। उस समय सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गई। सब दिशाओं में अन्धेरा छा गया। भयंकर पक्षी अशुभ बोली बोलने लगे। धरती काँपती सी प्रतीत होने लगी, ध्वज के अग्रभाग पर गृद्ध आकर बैठ गया। बायीं आँख फड़कने लगी। इन भयंकर उत्पातों की ओर ध्यान न देकर रावण अपनी सेना सहित युद्धभूमि में जा पहुँचा।

पब्‍लि‍क रि‍लेशंस में संभावनाएँ

पब्लिक रिलेशन अधिकारी के लिए कॉरपोरेट जगत में बहुत सी संभावनाएँ मौजूद हैं। चूँकि आज हर छोटी बड़ी कंपनी अपनी इमेज को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित रहती है। मार्केट में कंपनी की इमेज और विश्वसनीयता ही उसके बिजनेस का मूल आधार है।


पीआरओ के लिए व्यावसायिक जगत, सरकारी व प्राइवेट कंपनियों, विज्ञापन कंपनियों, टूरिस्ट रिजॉर्ट, होटल, बैंक व वित्तीय संस्थान, गैर सरकारी संस्थाओं, प्राइवेट कंसलटेंसी फर्म, मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्रीज में भी रोजगार के ढेरों अवसर मौजूद हैं। इनकी माँग केवल भारतीय कंपनियों में ही दिखाई नहीं देती है बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी पब्लिक रिलेशन अधिकारी की सेवाएँ भी खूब ले रही हैं। वैश्विकरण और बढ़ते उद्योगीकरण के कारण आने वाले समय में भी पीआरओ की माँग बनी रहेगी।
क्या कहती है रिपोर्ट:
ब्यूरो ऑफ लेबर स्टेटिक्स की रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में करियर बहुत उज्ज्वल है। 2016 तक इस क्षेत्र में 16।7 प्रतिशत नौकरियों की संभावनाएँ बढ़ने के आसार हैं। मतलब 2016 तक तकरीबन 50 लाख लोगों की माँग बढ़ेगी। वहीं ओ-नेट ऑनलाइन की रिपोर्ट कहती है कि पीआर के क्षेत्र में 2016 तक देश में तकरीबन 20 प्रतिशत माँग बढ़ेगी तथा 2,43000 नौकरीपेशा लोगों के अतिरिक्त 61000 लोगों की आवश्यकता पड़ेगी।
वेतन:
शुरुआती दौर में आपको पाँच से सात हजार रुपए प्रतिमाह आसानी से मिल जाते हैं। बाद में से 40000 रुपए प्रतिमाह आसानी से कमाए जा सकते हैं। इस क्षेत्र में वेतन काफी हद तक आपके काम पर भी निर्भर करता है।
प्रमुख संस्थान:
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन, नई दिल्ली
साउथ दिल्ली पॉलीटेक्निक फॉर वुमेन नई दिल्ली
नलंदा ओपन यूनिवर्सिटी, पटना
भारती विद्या भवन, नई दिल्ली
मुंबई यूनिवर्सिटी, मुंबई
अमेटी यूनिवर्सिटी, नोएडा
पंजाब यूनिवर्सिटी, पटियाला
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़
बीआर अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जर्नलिज्म, भोपाल

10 मार्च 2010

क्यों अपनी गलती स्वीकार नहीं करते?

बहुत ही सामान्य बात है। गलतियाँ हर इंसान करता है। सभी से होती हैं। लेकिन इसे स्वीकार हर कोई नहीं कर पाता। आखिर क्यों? कोई न कोई चीज इसके आड़े जरूर आती है। अंतरआत्मा उसकी कहेगी हाँ गलती हुई तो है मुझसे लेकिन वह बात मुँह से नहीं बोल सकता। लाखों तर्क दे देगा अपने पक्ष में। स्वीकार करेगा तो भी ऊपर से केवल फिर अंतरआत्मा और जुबाँ के बीच एक जगह आ जाती है। जहाँ पर बोलेगा बिना गलती के ही स्वीकार करना पड़ रहा है। पर क्या करो मजबूरी है। अंतरआत्मा कहेगी तुम्हारा दंभ है, झूठा दंभ जिसके चलते तुम जुबान से स्वीकार नहीं कर रहे। फिर ऊपर से बोलेगा नहीं, दंभ नाम की चीज तो मेरे अंदर है ही नहीं। कभी करता ही नहीं। मुझे काहे का दंभ।

शायद ही कभी आपने इस बात को गंभीरता से लिया हो कि गलती हुई इसे स्वीकार कर लेने से क्या हो जाएगा या नहीं करते हैं तो उससे क्या फर्क पड़ेगा। याद रखिए मित्रों गलती होने पर उसे स्वीकार कर लेना आपको आगे ले जाने वाले गुणों में से एक है।

मानव स्वभाव है गलतियाँ करने का। गलतियाँ सभी से होती हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी भी कहते थे भले ही 100 गलतियाँ करो लेकिन उन्हें दोहराओ मत। क्योंकि गलतियों को दोहराना मूर्खता है।

गलती हो उसे पूरी शिद्‍दत के साथ स्वीकार करो। कुछ गलतियाँ होती हैं जो अनजाने में हो जाती हैं और कुछ होती हैं जो आपसे जानबूझकर होती हैं। अनजाने में होने वाली गलतियों पर आपका बस नहीं चलता। उसके लिए तो सिवाय माफी माँगने के कोई चारा नहीं रह जाता। लेकिन जानबूझकर होने वाली गलतियों में आप कमी कर सकते हैं। इसके लिए क्या करें।

सहज बनें : अपने स्वभाव को सहज बनाए रखें। जिससे आपको कई प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने में मदद मिलेगी। बात-बात में बिगड़ने की आदत छोड़ें।

सकारात्मक सोच रखें : अपनी सोच सकारात्मक रखें। नकारात्मक चीजों से ज्यादा वास्ता न रखें। पढ़ने और देखने में भी नकारात्मकता सामने आए तो उसे केवल इसी रूप में ध्यान रखें कि कहीं यह आदतें मुझमें तो नहीं।

अहंकार से बचें : अहंकार व्यक्ति को देता कुछ नहीं बल्कि उसे तोड़कर रख देता है। अहंकार जिसके जीवन में आया समझो उसकी अव‍नति शुरू हो जाती है।

समस्याओं से लड़ें : प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कई तरह की समस्याएँ होती हैं। नौकरी पेशे संबंधी भी और पारिवारिक भी। घर-परिवार में सामंजस्य बैठाना। नौकरी-पेशे में लोगों से संबंध बनाना आदि अनेक समस्याओं से आदमी को रोज 2-4 होना पड़ता है। इनसे पूरी तरह से जुझारू होकर लड़ें।

साहित्य और संगीत से नाता जोड़ें : अच्छा और सकारात्मक साहित्य पढ़ें। संगीत से संबंध बढ़ाएँ। रेडियो आदि पर गाने सुन सकते हैं। संगीत तनाव को मिटाता है और आपको तरोताजा रखता है।

जो हुआ उसे भूल जाएँ : कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें उसी समय भूल जाना ज्यादा बेहतर होता है बजाय उसे गाँठ बाँधकर रखने के। मानो घर में चार बर्तन होते हैं तो ठनकेंगे तो सही। तो ऐसी छोटी-मोटी बातें सभी दूर चलती रहती हैं। इसलिए ऐसा क्या हुआ जिससे कि यह स्थिति निर्मित हुई। उससे अगली बार बचा जाए। फिर देखिए दुनिया की कोई ताकत आपको दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने से नहीं रोक सकती।

गलती को स्वीकार कर देखिए आपको तरक्की के अवसर तो प्राप्त होंगे ही साथ ही आत्मिक शांति भी मिलेगी और यदि नहीं करते हैं तो कभी ध्यान से सोचिए वह दिन आपका कैसा गुजरा होगा। हर मिनट आप अंतर्द्वंद्व की स्थिति से गुजर रहे होंगे। तो जो चीज आपके लिए लाभदायक है। उसे अपनाने में देर कैसी।

सफलता जीवन की सार्थकता

संकल्प, संस्कार, सुविचार, समर्पण व सिद्धता इस पंचामृत के ‍सम्मिलित स्वरूप का नाम है सफलता - जीवन के प्रत्येक क्षेत्र व कार्य में सफलता प्राप्ति को प्रमुख ध्येय के रूप में निर्धारण करना आवश्यक है। सफलता प्राप्ति के लिए कार्य व कार्यक्रमों का युक्तियुक्त व व्यवस्थित नियोजन व निर्धारित करना जरूरी है। यदि व्यक्ति अपनी संपूर्ण क्षमताओं का सदुपयोग संस्कार, नैतिकता व अनुशासन रूपी त्रिवेणी के संयोजन के साथ करता है तो सफलता निश्चित रूप से उसी के साथ होती है।

आइए, सफलता प्राप्ति के 11 अमृत बिंदुओं पर दृष्टिपात करें।

1। हमारा जीवन ईश्वर की व्यवस्था के अनुरूप है।
2। मनुष्य पद सर्वश्रेष्ठ है।
3। स्वयं के साथ ही समाज के लिए जिएँ।
4। सबके सुख-दुख में हमारी सहभागिता हो।
5। सद्‍गुण, सद्‍व्यवहार, सदाचार, सद्‍ संकल्प व सहृदयता अपनाएँ।
6। राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर कार्य करें।
7। शांत, प्रसन्न चित्त, सकारात्मक, ध्येय निष्ठ व आस्थावान रहें।
8। व्यवस्था-प्रियता व न्याय-प्रियता को सर्वोच्च स्थान दें।
9। सभ्यता, शालीनता, विनम्रता, चरित्र व आचरण की महत्ता को समझें।
10। समय का कुशलतापूर्वक नियोजन करें।
11। ईमानदारी, समझदारी व जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्व व कार्यों का निर्वहन करें।

हम सब आगे बढ़ते रहें, सफलता पल, प्रतिपल, अहर्निश हमारे साथ होगी।

सुतून ऐ दार

सुतून ऐ दार की उँचाई से न डर बाबा
जो हौसला है तो इस राह से गुज़र बाबा

ये देख जु़लमत ए शब का पहाड़ काट के हम
हथेलियों पे सजा लाए हैं सहर बाबा

मिली है तब कहीं इरफ़ान ए ज़ात की मंजिल
खुद अपने आपमें सदियों किया सफ़र बाबा

बुलंदियाँ भी उसे ‍सर उठा के देखती हैं
सुतून ए दार की ज़ीनत बने जो सर बाबा

रामायण – लंकाकाण्ड - भयानक युद्ध

रावण सहित राक्षस सेना को आया देखकर ललकारती हुई वानर सेना भी सामने आ पहुँची। उसे देखकर रावण का क्रोध और भड़क गया। उसने रोषपूर्वक भारी मारकाट मचा दी। कितने ही वानरों के सिर काट डाले, कितनों के मस्तक कुचल डाले, कितनों ही की छातियाँ फाड़ डालीं। जिधर भी उसकी द‍ृष्टि घूम जाती, वहीं उसके बाण वीर यूथपतियों को अपनी मार से व्याकुल कर देते। अन्त में बचे घायल वानरों ने दौड़कर श्री रामचन्द्र जी के पास गुहार लगाई। उनके पीछे-पीछे रावण भी श्री राम के सामने जा पहुँचा।

उधर सुग्रीव ने वानर सेना की दुर्दशा देखकर सेना को स्थिर रखने का भार वीर सुषेण पर सौंपा और स्वयं एक विशाल वृक्ष उखाड़कर शत्रु पर आक्रमण करने के लिये दौड़ा। अनेक यूथपति भी बड़े-बड़े वृक्ष और पत्थर लेकर उसके पीछे दौड़ चले। उनकी मार से राक्षस सेना धराशायी होने लगी। राक्षस सेना को नष्ट होते देख विरूपाक्ष गर्जना करते हुये सुग्रीव पर आक्रमण करने के लिये दौड़ा। सुग्रीव ने एक बड़ा वृक्ष उस पर दे मारा जिससे विरूपाक्ष का हाथी वहीं मरकर ढेर हो गया। हाथी की पीठ से कूदकर हाथ में तलवार ले विरूपाक्ष सुग्रीव पर झपटा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। जब सुग्रीव उसकी तलवार से घायल हो गया तो उन्होंने क्रोध से दाँत किटकिटाकर उसकी छाती में मुक्का मारा। इससे वह और क्रुद्ध हो गया। उसने तलवार के एक ही वार से सुग्रीव का कवच काट डाला। तब अत्यन्त कुपित हो सुग्रीव ने उस पर लगातार अनेक प्रहार किये। उसके शरीर से रक्‍त बहने लगा, एक आँख फूट गई। अन्त में उसने वहीं दम तोड़ दिया।

विरूपाक्ष को मरते देखकर महोदर ने अत्यन्त कुपित हो वानर सेना में भयंकर संहार आरम्भ कर दिया। जब घायल होकर वानर इधर-उधर भागने लगे तो सुग्रीव ने एक बड़ी शिला उस पर दे मारी जिसे महोदर ने अपने बाणों से बीच में ही काट डाला। फिर सुग्रीव ने एक साल वृक्ष से उस पर आक्रमण किया, किन्तु उसने उसे भी काट डाला। जब सुग्रीव ने मारने के लिये परिध उठाया तो महोदर ने गदा से आक्रमण करना आरम्भ कर दिया। युद्ध में जब परिध और गदा दोनों टूट गये तो वेर दोनों एक दूसरे पर मुक्कों से वार करने लगे। दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। तभी सुग्रीव और महोदर ने वहाँ पड़ी तलवारों को उठा लिया। महोदर ने तलवार से सुग्रीव का कवच काटने के लिये आक्रमण किया तो तलवार कवच में अटक गई। जब वह तलवार को खींच रहा था तभी सुग्रीव ने उसका सिर काटकर उसे यमलोक पहुँचा दिया।

महोदर को मरते देख महाबली महापार्श्‍व सुग्रीव पर तीक्ष्ण हथियारों की मार करता हुआ टूट पड़ा। सामने जाम्बवन्त और अंगद को देखकर उसने अपने बाणों से दोनों को घायल कर दिया। इससे अंगद के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उसने एक लौहमय परिध को उसकी ओर इतने वेग से फेंका कि उसके हाथ से धनुष और सिरस्त्राण छूटकर दूर जा गिरे। इससे क्रोधित होकर महापार्श्‍व ने एक तीक्ष्ण परशु अंगद पर फेंका जिसे बचाकर अंगद ने पूरी शक्‍ति से राक्षस के सीने पर घूँसा मारा। वज्र सद‍ृश घूँसा पड़ते ही उसका हृदय फट गया और वह वहीं मरकर धराशायी हो गया।
इधर जब रावण ने अपने तीनों पराक्रमी वीरों की मृत्यु का समाचार सुना तो उसने अपने तामस नामक अस्त्र से वानरों को भस्म करना आरम्भ कर दिया। रावण को विशाल वानर सेना का संहार करते देख राम और लक्ष्मण अपने-अपने धनुष बाणों को लेकर युद्ध करने के लिये तैयार हुये। सबसे पहले लक्ष्मण ने अपने बाणों से रावण पर आक्रमण किया। रावण लक्ष्मण के बाणों को काटते हुये श्री राम के सामने जा पहुँचा और उन पर बाणों की वर्षा करने लगा। राम ने भी इसका उचित उत्तर दिया और दोनों ओर से भयंकर युद्ध होने लगा। दोनों ही दो भयानक यमराजों की भाँति एक दूसरे से भिड़ रहे थे और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण कर रहे थे। रावण ने सिंह, बाघ, कंक, चक्रवाक, गीध, बाज, मगर, विषधर जैसे मुख वाले बाणों की वर्षा की तो श्रीराम ने अग्नि, सूर्य, चन्द्र, धूमकेतु, उल्का तथा विद्युत प्रभा के समान बाणों से आक्रमण किया। दोनों ही वीर उन अस्त्रों का निवारण कर नया आक्रमण कर देते थे। कुपित रावण ने दस बाण एक साथ छोड़कर रघुनाथ जी को घायल कर दिया। उसकी चिन्ता न करते हये उन्होंने भी रावण को बुरी तरह से घायल कर दिया।

09 मार्च 2010

जैन धर्म दर्शन - एकीभावस्तोत्रम्

एकीभावस्तोत्रम् [श्रीवादिराज]

एकीभाव संस्कृत स्तोत्र के रचियता आचार्य श्री वादिराज हैं आपकी गणना महान् आचार्यों में की जाती है आप महान वाद-विजेता और कवि थे आपकी पा‌र्श्वनाथ चरित्र, यशोधर चरित्र, एकीभाव स्तोत्र, न्याय-विनिश्यिय विवरण, प्रमाण निर्णय ये पांच कृतियाँ प्रसिद्ध हैं आपका समय विक्रम की 11 वीं शताब्दी माना जाता है आपका चौलुक्य नरेश जयसिंह (प्रथम) की सभा में बडा़ सम्मान था 'वादिराज' यह नाम नही वरन् पदवी है प्रख्यात वादियों में आपकी गणना होने से आप वादिराज के नाम से प्रसिद्ध हुए
निस्पृही आचार्य श्री वादिराज ध्यान में लीन थे कुछ द्वेषी व्यक्तियों ने उन्हें कुष्ट-ग्रस्त देखकर राजसभा में जैन मुनियों का उपहास किया जिसे जैनधर्म प्रेमी राजश्रेष्ठी सहन न कर सके और भावावेश में कह उठे कि हमारे मुनिराज की काया तो स्वर्ण जैसी सुन्दर होती है राजा ने अगले दिन मुनिराज के दर्शन करने का विचार रखा सेठ ने मुनिराज से सारा विवरण स्पष्ट कह कर धर्मरक्षा की प्रार्थना की मुनिराज ने धर्मरक्षा और प्रभावना हेतु एकीभाव स्तोत्र की रचना की जिससे उनका शरीर वास्तव में स्वर्ण सदृश हो गया राजा ने मुनिराज के दर्शन करके और उनके रुप को देखकर चुगल-खोरों को दण्ड दिया परन्तु उत्तम क्षमाधारक मुनिराज ने राजा को सब बात समझा कर तथा सबका भ्रम दूर कर सबको क्षमा करा दिया इस स्तोत्र का श्रद्धा एवं पूर्ण मनोयोग पूर्वक पाठ करने से समस्त व्याधियां दूर होती हैं तथा सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं

कविवर भूधरदास जी कृत भाषानुवाद
दोहा :- वादिराज मुनिराज के, चरणकमल चित्त लाय
भाषा एकीभाव की, करुँ स्वपर सुखदाय
(रोला छन्दः "अहो जगत गुरुदेव" विनती की चाल में)

यो अति एकीभाव भयो मानो अनिवारी
जो मुझ-कर्म प्रबंध करत भव भव दुःख भारी
ताहि तिहांरी भक्ति जगतरवि जो निरवारै
तो अब और कलेश कौन सो नाहिं विदारै1

तुम जिन जोतिस्वरुप दुरित अँधियारि निवारी
सो गणेश गुरु कहें तत्त्व-विद्याधन-धारी
मेरे चित्त घर माहिं बसौ तेजोमय यावत
पाप तिमिर अवकाश तहां सो क्यों करि पावत2

आनँद-आँसू वदन धोयं तुम जो चित्त आने
गदगद सरसौं सुयश मन्त्र पढ़ि पूजा ठानें
ताके बहुविधि व्याधि व्याल चिरकाल निवासी
भाजें थानक छोड़ देह बांबइ के वासी3

दिवि तें आवन-हार भये भवि भाग-उदय बल
पहले ही सुर आय कनकमय कीन महीतल
मन-गृह ध्यान-दुवार आय निवसो जगनामी
जो सुरवन तन करो कौन यह अचरज स्वामी4

प्रभु सब जग के बिना-हेतु बांधव उपकारी
निरावरन सर्वज्ञ शक्ति जिनराज तिहांरी
भक्ति रचित मम चित्त सेज नित वास करोगे
मेरे दुःख-संताप देख किम धीर धरोगे5

भव वन में चिरकाल भ्रम्यों कछु कहिय न जाई
तुम थुति-कथा-पियूष-वापिका भाग से पाई
शशि तुषार घनसार हार शीतल नहिं जा सम
करत न्हौन ता माहिं क्यों न भवताप बझै मम6

श्रीविहार परिवाह होत शुचिरुप सकल जग
कमल कनक आभाव सुरभि श्रीवास धरत पग
मेरो मन सर्वंग परस प्रभु को सुख पावे
अब सो कौन कल्यान जो न दिन-दिन ढिग आवे7

भव तज सुख पद बसे काम मद सुभट संहारे
जो तुमको निरखंत सदा प्रिय दास तिहांरे
तुम-वचनामृत-पान भक्ति अंजुलि सों पीवै
तिन्हैं भयानक क्रूर रोगरिपु कैसे छीवै8

मानथंभ पाषान आन पाषान पटंतर
ऐसे और अनेक रतन दीखें जग अंतर
देखत दृष्टि प्रमान मानमद तुरत मिटावे
जो तुम निकट न होय शक्ति यह क्योंकर पावे9

प्रभुतन पर्वत परस पवन उर में निबहे है
ता सों तत छिन सकल रोग रज बाहिर ह्रै है
जा के ध्यानाहूत बसो उर अंबुज माहीं
कौन जगत उपकार-करन समरथ सो नाहीं10

जनम जनम के दुःख सहे सब ते तुम जानो
याद किये मुझ हिये लगें आयुध से मानों
तुम दयाल जगपाल स्वामि मैं शरन गही है
जो कुछ करनो होय करो परमान वही है11

मरन-समय तुम नाम मंत्र जीवक तें पायो
पापाचारी श्वान प्रान तज अमर कहायो
जो मणिमाला लेय जपे तुम नाम निरंतर
इन्द्र-सम्पदा लहे कौन संशय इस अंतर12

जो नर निर्मल ज्ञान मान शुचि चारित साधै
अनवधि सुख की सार भक्ति कूंची नहिं लांघे
सो शिव वांछक पुरुष मोक्ष पट केम उघारे
मोह मुहर दिढ़ करी मोक्ष मंदिर के द्वारै13

शिवपुर केरो पंथ पाप-तम सों अतिछायो
दुःख सरुप बहु कूप-खाई सों विकट बतायो
स्वामी सुख सों तहां कौन जन मारग लागें!
प्रभु-प्रवचन मणि दीप जोन के आगे आगे14

कर्म पटल भू माहिं दबी आतम निधि भारी
देखत अतिसुख होय विमुख जन नाहिं उघारी
तुम सेवक ततकाल ताहि निहचै कर धारै
थुति कुदाल सों खोद बंद भू कठिन विदारै15

स्याद् वाद-गिरि उपज मोक्ष सागर लों धाई
तुम चरणांबुज परस भक्ति गंगा सुखदाई
मो चित निर्मल थयो न्होन रुचि पूरव तामें
अब वह हो न मलीन कौन जिन संशय या में16

तुम शिव सुखमय प्रगट करत प्रभु चिंतन तेरो
मैं भगवान समान भाव यों वरतै मेरो
यदपि झूठ है तदपि त्रप्ति निश्चल उपजावे
तुव प्रसाद सकलंक जीव वांछित फल पावे17

वचन जलधि तुम देव सकल त्रिभुवन में व्यापे
भंग-तरंगिनि विकथ-वाद-मल मलिन उथापे
मन सुमेरु सों मथे ताहि जे सम्यज्ञानी
परमामृत सों तृप्त होहिं ते चिरलों प्रानी18

जो कुदेव छविहीन वसन भूषन अभिलाखे
वैरी सों भयभीत होय सो आयुध राखे
तुम सुंदर सर्वांग शत्रु समरथ नहिं कोई
भूषन वसन गदादि ग्रहन काहे को होई19

सुरपति सेवा करे कहा प्रभु प्रभुता तेरी
सो सलाघना लहै मिटे जग सों जग फेरी
तुम भव जलधि जिहाज तोहि शिव कंत उचरिये
तुही जगत-जनपाल नाथ थुति की थुति करिये20

वचन जाल जड़ रुप आप चिन्मूरति झांई
तातैं थुति आलाप नाहिं पहुंचे तुम तांई
तो भी निर्फल नाहिं भक्ति रस भीने वायक
संतन को सुर तरु समान वांछित वरदायक21

कोप कभी नहिं करो प्रीति कबहूं नहिं धारो
अति उदास बेचाह चित्त जिनराज तिहांरो
तदपि आन जग बहै बैर तुम निकट न लहिये
यह प्रभुता जगतिलका कहां तुम बिन सरदहिये22

सुरतिय गावें सुजश सर्व गति ज्ञान स्वरुपी
जो तुमको थिर होहिं नमैं भवि आनंद रुपी
ताहि छेमपुर चलन वाट बाकी नहिं हो हैं
श्रुत के सुमरन माहिं सो न कबहूं नर मोहै23

अतुल चतुष्टय रूप तुम्हें जो चित में धारे
आदर सों तिहुं काल माहिं जग थुति विस्तारे
सो सुकृत शिव पंथ भक्ति रचना कर पूरे
पंच कल्यानक ऋद्धि पाय निहचै दुःख चूरे24

अहो जगत पति पूज्य अवधि ज्ञानी मुनि हारे
तुम गुन कीर्तन माहिं कौन हम मंद विचारे
थुति छल सों तुम विषै देव आदर विस्तारे
शिव सुख-पूरनहार कलपतरु यही हमारे25

वादिराज मुनि तें अनु, वैयाकरणी सारे
वादिराज मुनि तें अनु, तार्किक विद्यावारे
वादिराज मुनि तें अनु, हैं काव्यन के ज्ञाता
वादिराज मुनि तें अनु, हैं भविजन के त्राता26

दोहा - मूल अर्थ बहु विधि कुसुम, भाषा सूत्र मँझार
भक्ति माल 'भूधर' करी, करो कंठ सुखकार

जैन धर्म दर्शन - ॐ श्री मंगलाष्टक स्त्रोत

श्री मंगलाष्टक स्तोत्र

अर्हन्तो भगवत इन्द्रमहिताः, सिद्धाश्च सिद्धीश्वरा,
आचार्याः जिनशासनोन्नतिकराः, पूज्या उपाध्यायकाः
श्रीसिद्धान्तसुपाठकाः, मुनिवरा रत्नत्रयाराधकाः,
पञ्चैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं, कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - इन्द्रों द्वारा जिनकी पूजा की गई, ऐसे अरिहन्त भगवान, सिद्ध पद के स्वामी ऐसे सिद्ध भगवान, जिन शासन को प्रकाशित करने वाले ऐसे आचार्य, जैन सिद्धांत को सुव्यवस्थित पढ़ाने वाले ऐसे उपाध्याय, रत्नत्रय के आराधक ऐसे साधु, ये पाँचों मरमेष्ठी प्रतिदिन हमारे पापों को नष्ट करें और हमें सुखी करे1

श्रीमन्नम्र - सुरासुरेन्द्र - मुकुट - प्रद्योत - रत्नप्रभा-
भास्वत्पादनखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः
ये सर्वे जिन-सिद्ध-सूर्यनुगतास्ते पाठकाः साधवः
स्तुत्या योगीजनैश्च पञ्चगुरवः कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - शोभायुक्त और नमस्कार करते हुए देवेन्द्रों और असुरेन्द्रो के मुकुटों के चमकदार रत्नों की कान्ति से जिनके श्री चरणों के नखरुपी चन्द्रमा की ज्योति स्फुरायमान हो रही है, और जो प्रवचन रुप सागर की वृद्धि करने के लिए स्थायी चन्द्रमा हैं एवं योगीजन जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये पांचों परमेष्ठी हमारे पापों को क्षय करें और हमें सुखी करें2

सम्यग्दर्शन-बोध-व्रत्तममलं, रत्नत्रयं पावनं,
मुक्ति श्रीनगराधिनाथ - जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः
धर्म सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं, चैत्यालयं श्रयालयं,
प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी, कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये पवित्र रत्नत्रय हैं श्रीसम्पन्न मुक्तिनगर के स्वामी भगवान् जिनदेव ने इसे अपवर्ग (मोक्ष) को देने वाला कहा है इस त्रयी के साथ धर्म सूक्तिसुधा (जिनागम), समस्त जिन-प्रतिमा और लक्ष्मी का आकारभूत जिनालय मिलकर चार प्रकार का धर्म कहा गया है वह हमारे पापों का क्षय करें और हमें सुखी करे3

नाभेयादिजिनाः प्रशस्त-वदनाः ख्याताश्चतुर्विंशतिः,
श्रीमन्तो भरतेश्वर-प्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश
ये विष्णु-प्रतिविष्णु-लांगलधराः सप्तोत्तराविंशतिः,
त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्टि-पुरुषाः कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - तीनों लोकों में विख्यात और बाह्य तथा अभ्यन्तर लक्ष्मी सम्पन्न ऋषभनाथ भगवान आदि 24 तीर्थंकर, श्रीमान् भरतेश्वर आदि 12 चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण और 9 बलभद्र, ये 63 शलाका महापुरुष हमारे पापों का क्षय करें और हमें सुखी करे4

ये सर्वौषध-ऋद्धयः सुतपसो वृद्धिंगताः पञ्च ये,
ये चाष्टाँग-महानिमित्तकुशलाः येऽष्टाविधाश्चारणाः
पञ्चज्ञानधरास्त्रयोऽपि बलिनो ये बुद्धिऋद्धिश्वराः,
सप्तैते सकलार्चिता मुनिवराः कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - सभी औषधि ऋद्धिधारी, उत्तम तप से वृद्धिगत पांच, अष्टांग महानिमित्तज्ञानी, आठ प्रकार की चारण ऋद्धि के धारी, पांच प्रकार की ज्ञान ऋद्धियों के धारी, तीन प्रकार की बल ऋद्धियों के धारी, बुद्धि ऋद्धिधारी ऐसे सातों प्रकारों के जगत पूज्य गणनायक मुनिवर हमारा मंगल करे5

ज्योतिर्व्यन्तर-भावनामरग्रहे मेरौ कुलाद्रौ स्थिताः,
जम्बूशाल्मलि-चैत्य-शखिषु तथा वक्षार-रुप्याद्रिषु
इक्ष्वाकार-गिरौ च कुण्डलादि द्वीपे च नन्दीश्वरे,
शैले ये मनुजोत्तरे जिन-ग्रहाः कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - ज्योतिषी, व्यंतर, भवनवासी और वैमानिकों केआवासों के, मेरुओं, कुलाचकों, जम्बू वृक्षों औरशाल्मलि वृक्षों, वक्षारों विजयार्धपर्वतों,इक्ष्वाकार पर्वतों, कुण्डलवर (तथा रुचिक वर), नन्दीश्वर द्वीप, और मानुषोत्तर पर्वत के सभी अकृत्रिम जिन चैत्यालय हमारे पापों काक्षयकरेंऔरहमें सुखी बनावें6

कैलाशे वृषभस्य निर्व्रतिमही वीरस्य पावापुरे
चम्पायां वसुपूज्यसुज्जिनपतेः सम्मेदशैलेऽर्हताम्
शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्यार्हतः,
निर्वाणावनयः प्रसिद्धविभवाः कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - भगवान ऋषभदेव की निर्वाणभूमि - कैलाश पर्वत, महावीर स्वामी कीपावापुर, वासुपूज्य स्वामी (राजा वसुपूज्य के पुत्र) की चम्पापुरी, नेमिनाथ स्वामी की ऊर्जयन्त पर्वत शिखर, और शेष बीस तीर्थंकरों की श्री सम्मेदशिखर पर्वत, जिनका अतिशय और वैभव विख्यात है ऐसी ये सभी निर्वाण भूमियाँ हमें निष्पाप बनावें और हमें सुखी करें7

यो गर्भावतरोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो,
यो जातः परिनिष्क्रमेण विभवो यः केवलज्ञानभाक्
यः कैवल्यपुर-प्रवेश-महिमा सम्पदितः स्वर्गिभिः
कल्याणानि च तानि पंच सततं कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - तीर्थंकरों के गर्भकल्याणक, जन्माभिषेक कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और कैवल्यपुर प्रवेश (निर्वाण) कल्याणक के देवों द्वारा सम्पादित महोत्सव हमें सर्वदा मांगलिक रहें 8

सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्पदामायते,
सम्पद्येत रसायनं विषमपि प्रीतिं विधत्ते रिपुः
देवाः यान्ति वशं प्रसन्नमनसः किं वा बहु ब्रूमहे,
धर्मादेव नभोऽपि वर्षति नगैः कुर्वन्तु नः मंगलम्
अर्थ - धर्म के प्रभाव से सर्प माला बन जाता है, तलवार फूलों के समान कोमल बन जाती है, विष अमृत बन जाता है, शत्रु प्रेम करने वाला मित्र बन जाता है और देवता प्रसन्न मन से धर्मात्मा के वश में हो जाते हैं अधिक क्या कहें, धर्म से ही आकाश से रत्नों की वर्षा होने लगती है वही धर्म हम सबका कल्याणकरे9

इत्थं श्रीजिन-मंगलाष्टकमिदं सौभाग्य-सम्पत्करम्,
कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थंकराणामुषः
ये श्र्रण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैः धर्मार्थ-कामाविन्ताः,
लक्ष्मीराश्रयते व्यपाय-रहिता निर्वाण-लक्ष्मीरपि
अर्थ - सोभाग्यसम्पत्ति को प्रदान करने वाले इस श्री जिनेन्द्र मंगलाष्टक को जो सुधी तीर्थंकरों के पंच कल्याणक के महोत्सवों के अवसर पर तथा प्रभातकाल में भावपूर्वक सुनते और पढ़ते हैं, वे सज्जन धर्म, अर्थ और काम से समन्वित लक्ष्मी के आश्रय बनते हैं और पश्चात् अविनश्वर मुक्तिलक्ष्मी को भी प्राप्त करते हैं10