09 दिसंबर 2009

कर्म और भाग्य


एक बार गुरु नानक किसी गांव में अपने एक भक्त के यहां प्रवचन करने जा रहे थे। रास्ते में एक किसान धान के अपने खेत के पास प्रसन्नचित्त बैठा था। गुरु नानक ने उससे कहा, 'भगवान की कृपा से इस बार बहुत अच्छी फसल हुई है।' किसान बोला, 'इसमें भगवान की कृपा कहां से आ गई। यह तो मेरी मेहनत और सूझबूझ का फल है। मैंने कड़ी मेहनत करके बारिश में भीग कर खेतों की जुताई की, कुदाल से खोद-खोद कर खर पतवार निकाले। समय पर खाद और पानी दिया, तब जाकर अच्छी पैदावार हुई है। यदि मैं मेहनत नहीं करता तो फसल अच्छी कैसे होती।' गुरु नानक ने कुछ नहीं कहा और चुपचाप आगे बढ़ गए। कई साल बाद फिर वह उसी गांव में प्रवचन करने आए। इस बार भी वही किसान अपने खेत के पास मुंह लटकाए बैठा था। किसान को उदास देख कर गुरु नानक ने पूछा, 'भइया, इतना उदास क्यों हो?'
किसान ने कहा, 'क्या बताऊं। सूखे ने सारी मेहनत, सारा खर्च बर्बाद कर दिया। भगवान ने मुझे तबाह कर दिया।' गुरु नानक ने कहा, 'भइया, यह सब भगवान की माया है। वह कभी देता है तो कभी ले लेता है।' इस पर किसान बोला, 'आप जख्म पर नमक क्यों छिड़क रहे हैं।' गुरु नानक ने जवाब दिया, 'आपको याद होगा कि जब मैं पिछली बार आया था तो आपकी अच्छी फसल देख कर मैंने कहा था कि यह भगवान की कृपा है। उस समय आपने कहा था कि इसमें भगवान की कृपा कहां से आ गई। यह तो मेरी मेहनत का फल है। अब आप कह रहे हो कि भगवान ने तबाह कर दिया। अच्छे कार्य का श्रेय आप स्वयं लो और बुरे कामों का दोष भगवान पर डाल दो, यह उचित नहीं है। सफलता के लिए भगवान की कृपा और परिश्रम दोनों चाहिए।'
किसान को गुरु नानक की बात समझ में आ गया। उसकी उदासी दूर हो गई।

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