09 दिसंबर 2009

दया हिरण और भरत


महाराज भरत भगवान के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है, उनके समय से ही भारतवर्ष नाम प्रसिद्ध हुआ। एक बार वह नदी में स्नान करने के बाद तट पर पूजा-आराधना कर रहे थे। उसी समय एक प्यासी हिरणी वहां आई। उसके पेट में गर्भ था। वह नदी में पानी पी ही रही थी कि अकस्मात एक शेर की दहाड़ सुनाई दी।उसे अपने प्राण संकट में दिखाई दिए। शेर से बचने के लिए उसने नदी में छलांग लगा दी। डर के कारण Êयादा उछलने से उसका गर्भ नदी के प्रवाह में गिर गया। भरत ने जब नदी में उसके बच्चे को बहकर जाते देखा, तो उन्हें बड़ी दया आई। उन्होंने उसे नदी में से निकाला और अपने आश्रम ले आए। वह प्रतिदिन उसके लिए खाने-पीने का प्रबंध करते। उनका मन उस हिरणी के बच्चे में रमने लगा। धीरे-धीरे उनको उससे मोह हो गया। वह हमेशा उसे अपने साथ रखते। उनका मन उसमें इतना अधिक लग गया कि वह अपने आत्मस्वरूप को भुला बैठे। आख़िरकार उनका अंत समय आ गया। उस समय भी उनका मन हिरण में ही था। वह उसके बारे में ही सोच रहे थे। इसी कारण उनका अगला जन्म एक हिरण के रूप में हुआ। कहते हैं साधना के प्रभाव से उनको पूर्वजन्म की सभी बातें याद रहीं। हिरण के रूप में उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। श्रीमद्भागवत में इस कथा का उल्लेख है। शिक्षा-यह कथा हमें बोध कराती है कि मन बड़ा ही चंचल है। अगर उस पर क़ाबू न रहे, तो वह हमें पतन के मार्ग पर भी ले जा सकता है। एक हिरण में मन लगने के कारण भरत की तपस्या भंग हो गई। इसलिए साधक को हमेशा सजग रहना चाहिए।

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