15 मई 2011

आदर्श ब्रहमचारी, अतुल पराक्रमी थे श्री परशुराम

श्री परशुराम भगवान् विष्णु के अंशावतार थे। धर्मग्रंथों में लिखा है श्री परशुराम का आर्विभाव वेंशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि के प्रदोषकाल में जिला इंदौर की तहसील महू के गाँव जम्दाग्नेश्वर में हुआ था। इनके प्राकव्य के समय छः ग्रह अपनी राशी अथवा उच्चा स्थिति में थे। दार्शनिक दृष्टि से ये तेज (अग्नि) तत्व के घनीभूत स्वरुप हैं।

इनके क्रोध से बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी कांपते थे। इन्होने कठोर तपस्य से भगवान् शंकर को प्रसन्न करके उनके अमोघ परशु को प्राप्त किया और इसे धारण करने के कारण ही राम से परशुराम कहलाए।

श्री परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि तथा माता रेणुका थीं। जमदग्नि पुत्र होने से उन्होंने 'जामदग्न' भी कहा गया। कहते हैं कि पुत्रोत्पत्ति के लिये रेणुका तथा विश्वामित्र की माता को प्रसाद मिला था, किन्तु देववश प्रसाद दोनों माताओं के बीच बदल गया। इसके फलस्वरूप रेणुका के पुत्र परशुराम जी ब्रह्मण होते हुए भी क्षत्रीय गुण सम्पन्न हो गए। इससे वे स्वभाव से उग्र तथा महान योद्धा बन गए, जबकि विश्वामित्र क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी ब्रह्मर्षि हो गए। परशुराम में ब्राह्मण और क्षत्रिय तेज का अपूर्व समन्वय मिलता है।

परशुराम जी अपने पिता के बड़े आज्ञाकारी थे। एक बार इनके पिता ने अपनी पत्नी से रूष्ट होकर अपने पुत्र को रेणुका का वध करने का आदेश दिया। पिता की आज्ञा को मानकर परशुराम ने अपनी पत्नी का सिर काट लिया। पिता ने प्रसन्न होकर जब इनसे वर माँगने को कहा, तो परशुराम ने अपनी माता को पुनः जीवित करने का वरदान माँगा। महर्षि के प्रताप से रेणुका जीवित हो गई।

परशुराम आदर्श ब्रह्मचारी होने से अतुल पराक्रम और उत्साह के मूर्तिमान स्वरुप हैं। भीष्म पितामह एवं कर्ण को धनुर्विद्या इन्होने ही सिखाई थी। सीता स्वयंवर में अपने गुरू शिव के धनुष को भगवान् श्री रामचंद्र द्वारा तोड़े जने पर ये महाराजा जनक के दरबार में पहुंचे। पहले तो श्री राम पर क्रोधित हुए, लेकिन बाद में इनका क्रोध शांत हो गया। भगवान् परशुराम के प्रति लोगों की अनन्य आस्था है। उनका तेज अतुलित था। उन्होंने यज्ञ और आदर्श आचार परम्परा के निर्वाह का नया सिद्धांत दिया।

श्री परशुराम से सम्बंधित तीर्थ
परशुराम कुंड यह अरूणाचल प्रदेश में है। कहते हैं कि यहाँ पर जिस जगह भगवान् परशुराम ने परशु मारा था, वहां से जल निकल आया। यहाँ स्नान करने से व्यक्ति ब्रह्म ह्त्या से छूट जाता है।
परशुराम आश्रम बलिया में भृगुक्षेत्र के पंचकोशी मार्ग में परसिया ग्राम हैं, वहां सरयू नदी के किनारे मनियार ग्राम में भगवान् परशुराम का आश्रम हैं। यहाँ के एक वृक्ष के नीचे उन्होंने तपस्या की थी।
परशुराम मन्दिर रुनकता मथुरा से 10 किमी पर रुनकता है। यहाँ महर्षि जमदग्नि का आश्रम था। ऊंचे पहाड़ पर माता रेणुका तथा जमदग्नि का मन्दिर है। नीचे परशुराम जी का मन्दिर है, जहाँ परशुराम जयन्ती पर मेला लगता है।
खाटी कपूरथला के फगवाड़ा से पांच किमी दूर भगवान् परशुराम मन्दिर है। इसे जमदग्नि का तापोस्थान कहा जाता है। गाँव में ब्राह्मणों का एक भी घर नहीं होने से मन्दिर की सेवा सिख समुदाय के लोग करते हैं। उन्होंने ही सड़क पर परशुराम गेटका भी बनवाया है।
रकासन राहों से 10 किमी दूर रेनुका का मन्दिर है। इसके साथ भगवान् परशुराम का टोबा भी है।

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