01 फ़रवरी 2011

विज्ञापनों में उलझ न जाएं बच्चे

युवराज की उम्र महज दस साल है, लेकिन जब पिज्जा या बर्गर की बात आती है, तो उसके माता-पिता के लिये उसे मनाना काफी मुश्किल होता है. इस दस वर्षीय बालक के पिता सुब्रमण्यम को काफी मान-मनुहार के बाद आखिरकार बेमन से ही सही, लेकिन उसे हफ्ते में एक दिन पिज्जा या बर्गर खिलाने की मंजूरी देनी ही पडी, इस वादे के साथ कि बाकी छः दिन वह अपनी माँ के द्वारा पकाया हुआ खाना खाएगा. हमारे ज्यादातर घरों में कुछ ऐसे ही हालात हो सकते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो डायबिटीज फाउंडेशन आँफ इंडिया जैसे संस्थानों को आँन रिकाँर्ड यह कहना नहीं पड़ता कि 'जंक फ़ूड के विज्ञापनों का बच्चों की आदतों पर गहरा प्रभाव पड़ता है.' विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O) के मुताबिक़ दुनिया में कम से कम 4 करोड़ 30 लाख प्री-स्कूली बच्चे ( जिनकी उम्र पांच साल से कम है ) मोटापे का शिकार हैं और इनमें से 3 करोड़ 50 लाख बच्चे भारत जैसे विकासशील देशों में रहते हैं. एक सर्वे के अंतर्गत कम से कम 54 फीसदी बच्चों का कहना था कि वे घर में पकाए गए खाने के बजाय विज्ञापनों में दिखाए गए खाघ उत्पादों को लेना ज्यादा पसंद करेंगे.

W.H.O ने दुनिया के तमाम देशों से अपील की है कि वे अपने बच्चों को इस तरह के विज्ञापनों से दूर रखें. इस सन्दर्भ में उसने कुछ अंतरराष्टीय अनुशंसाओं को लागू करने का सुझाव भी दिया है. गौरतलब है कि पिछले साल मई में W.H.O ने बच्चों के लिये खाघ पर्दार्थों की मार्केटिंग के सन्दर्भ में अंतरराष्टीय अनुशंसाओं का एक सेट तैयार किया था, लेकिन हमारे जैसे देश में इनका क्रियान्वयन नहीं के बराबर देखने में आता है. जहाँ कई देशों ने अपने यहाँ अस्वास्थ्यकर उत्पादों की मार्केटिन को नियंत्रित करते हुए इनके विज्ञापनों को टेलीविजन या रेडियो पर प्रसारित करना बंद कर दिया है, वहीं भारत समेत ऐसे कई देश हैं, जिन्हों अब इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है. इस तरह का नियंत्रण भारत के लिये बहुत अहम है, क्योंकि हम एक ऐसे देश हैं, जहाँ युवाओं की काफी तादाद है और यदि आज इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो आज से छह या सात साल बाद हमार्रे यहाँ मोटे लोगों की विशाल आबादी होगी.

फंडा यह है कि...
बच्चे विज्ञापनों का सबसे आसान लक्ष्य हैं. अभिभावकों को देखना होगा कि कोई भी उनके बच्चों का इस्तेमाल (वह भी उनकी सेहत की कीमत पर) न कर सके.

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