29 दिसंबर 2009

जनमानस के हृदय में बसते हैं राम


भारत के ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में हजारों वर्षो से जिन महापुरुषों के चरित्र ने जनमानस को हृदय की गहराइयों तक प्रभावित किया है, उनमें भगवान राम का नाम सर्वप्रमुख है। उनका युग चक्रवर्ती सम्राटों व साम्राज्यों का था। यह वह जमाना था जिसके बारे में बाइबल में लिखा है कि सारे संसार में एक ही भाषा व वाणी थी। उस समय हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी आदि धर्म/मत/ संप्रदाय नहीं थे और न ही आज के समान जाति-आधारित सामाजिक दीवारें। तब मनुष्य समाज के दो ही भाग थे आर्य व अनार्य। जो चरित्रवान व विद्वान न था वही अनार्य (राक्षस) था। तब सारी मानव जाति की एक ही संस्कृति थी।
साहित्य शोध भगवान राम के बारे में अधिकारिक रूप से जानने का मूल स्त्रोत महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण है। इस गौरव ग्रंथ के कारण वाल्मीकि दुनिया के आदि कवि माने जाते हैं। श्रीराम कथा केवल वाल्मीकि रामायण तक सीमित न रही बल्कि मुनि व्यास रचित महाभारत में भी चार स्थलों- रामोपाख्यान,आरण्यकपर्व,द्रोण पर्व तथा शांतिपर्व-पर वर्णित है। बौद्ध परंपरा में श्रीराम संबंधित दशरथ जातक, अनामक जातक तथा दशरथ कथानक नामक तीन जातक कथाएं उपलब्ध हैं। रामायण से थोडा भिन्न होते हुए भी वे इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं। जैन साहित्य में राम कथा संबंधी कई ग्रंथ लिखे गए, जिनमें मुख्य हैं-विमलसूरिकृत पदमचरित्र (प्राकृत), रविषेणाचार्यकृतपद्म पुराण (संस्कृत), स्वयंभू कृत पदमचरित्र (अपभ्रंश), रामचंद्र चरित्र पुराण तथा गुणभद्रकृतउत्तर पुराण (संस्कृत)। जैन परंपरा के अनुसार राम का मूल नाम पदम था।
दूसरे, अनेक भारतीय भाषाओं में भी राम कथा लिखी गई। हिंदी में कम से कम 11,मराठी में 8,बंगला में 25,तमिल में 12,तेलुगु में 5तथा उडिया में 6रामायणेंमिलती हैं। हिंदी में लिखित गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस ने उत्तर भारत में विशेष स्थान पाया। इसके अतिरिक्त भी संस्कृत, गुजराती, मलयालम, कन्नड, असमिया, उर्दू, अरबी, फारसी आदि भाषाओं में राम कथा लिखी गई। महाकवि कालिदास,भास,भट्ट, प्रवरसेन,क्षेमेन्द्र,भवभूति,राजशेखर,कुमारदास,विश्वनाथ, सोमदेव, गुणादत्त,नारद, लोमेश,मैथिलीशरण गुप्त, केशवदास,गुरु गोविंद सिंह, समर्थ गुरु रामदास, संत तुकडोजी महाराज आदि चार सौ से अधिक कवियों ने, संतों ने अलग-अलग भाषाओं में राम तथा रामायण के दूसरे पात्रों के बारे में काव्यों/कविताओंकी रचना की है।
विदेशों में भी तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तानकी खोतानीरामायण, इंडोनेशिया की ककबिनरामायण, जावाका सेरतराम,सैरीराम,रामकेलिंग,पातानीरामकथा, इण्डोचायनाकी रामकेर्ति(रामकीर्ति), खमैररामायण, बर्मा (म्यांम्मार) की यूतोकी रामयागन,थाईलैंड की रामकियेनआदि रामचरित्र का बखूबी बखान करती है। इसके अलावा विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमरका प्राचीन काव्य इलियड रोम के कवि नोनसकी कृति डायोनीशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता है।
विश्व साहित्य में इतने विशाल एवं विस्तृत रूप से विभिन्न देशों में विभिन्न कवियों/लेखकों द्वारा राम के अलावा किसी और चरित्र का इतनी श्रद्धा से वर्णन न किया गया।
मंदिर व मृण्मूर्तियां-देश-विदेशोंमें भगवान राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान आदि के सैकडों नहीं, हजारों मंदिरों का निर्माण किया गया। कंबोडिया के विश्व प्रसिद्ध 11वींशताब्दी में निर्मित अंकोरवाटमंदिर की दीवारों पर रामायण व महाभारत के दृश्य अंकित हैं। इसी तरह 9वींसदी में निर्मित जावाके परमबनन(परमब्रह्म)नामक विशाल शिवमंदिर की भित्तिकाओंपर रामायण की चित्रावली अंकित है। रामायण से संबंधित सैकडों मृण्मूर्तियां(टैराकोटा) हरियाणा प्रदेश के सिरसा, हाठ,नचारखेडा (हिसार), जींद,संथाय(यमुनानगर), उत्तर प्रदेश के कौशांबी (इलाहाबाद), अहिच्छत्र(बरेली), कटिंघर(एटा) तथा राजस्थान के भादरा(श्रीगंगानगर) आदि जगहों से प्राप्त हुई है। इन मृण्मूर्तियोंपर वनवास काल की प्रमुख घटनाओं को बहुत सुंदर रूप से दिखाया गया है। इनमें मुख्य है राम, सीता, लक्ष्मण का पंचवटी गमन, मारीचमृग, त्रिशिराराक्षस द्वारा खर-दूषण से विचार-विमर्श और राम द्वारा 14राक्षसों के वध का वर्णन, रावण द्वारा सीताहरण, सुग्रीव-बाली युद्ध, श्रीराम द्वारा बाली वध, हनुमान द्वारा अशोक वाटिका को नष्ट किया जाना, त्रिशिराराक्षस का वध, रावण पुत्र इंद्रजीत का युद्ध में जाना आदि-आदि दृश्य विद्यमान है। इन मृण्मूर्तियोंपर गुप्तकालपूर्व की लिपि में वाल्मीकीय रामायण के श्लोक भी लिखे गए हैं। ये मृण्मूर्तियांझज्जर(हरियाणा)केपुरातत्व संग्रहालय में देखी जा सकती है। इसके अलावा सैकडों मृण्मूर्तियांभारत के विभिन्न संग्रहालयों तथा लंदन म्यूजियम में संग्रहितहैं।
श्रीराम का काल-प्राचीन भारतीय कालगणनातथा पुराणीयपरंपरा के अनुसार श्रीराम 24वेंत्रेतायुग में पैदा हुए। वाल्मीकि रामायण तथा अन्य रामायणों/रामचरित्रों के अतिरिक्त अन्य प्राचीन ग्रंथों में राम, रावण आदि के विषय में चार मुख्य संदर्भ मिलते हैं।
त्रेतायुगेचतुर्विंशेरावण: तपस: क्षयात।राम दशरथिंप्राप्य सगण:क्षयमीयीवान्।।
(वायु पुराण)
संद्यौतुसमनुप्राप्तेत्रैतायांद्वापरस्यच।रामौदाशरथिर्भूत्वाभविष्यामिजगत्पति॥
(महाभारत )
चतुर्विशेयुगेचापिविश्वामित्र पुर: सर:। लोकेराम इति ख्यात: तेजसाभास्करोपम्॥
(हरिवंश)
चतुर्विशेयुगेवत्स! त्रेतायांरघुवंशज:।
रामोनाम भविष्यामिचतुव्र्यूह:सनातन:॥ (ब्रह्माण्ड पुराण)
उपरोक्त संदर्भो व प्रमाणों के आधार पर यही सत्य प्रतीत होता है कि श्रीराम, विश्वामित्र आदि युग पुरुष 24वेंत्रेतायुग में थे। महाभारत के अनुसार श्रीराम त्रेताएवं द्वापर युगों के संधिकाल में हुए थे।
ऊपर लिखे प्रमाणों के आधार पर हम अगर 24वेंत्रेताकी समाप्ति पर राम का काल माने तो युगों की वर्ष-गणना के हिसाब से श्रीराम का समय आज से 8,69,108वर्ष पूर्व का ठहरता है।
इतने लम्बे काल के बाद किसी भी भवन, मूर्ति, मुद्रा, हथियार आदि का अस्तित्व रह ही नहीं सकता। प्रत्येक मनुष्य के अस्तित्व के लिए प्रमाण दिए भी नहीं जा सकते। 4-5पीढियों पूर्व अगर कोई व्यक्ति बिना संतान के मर गया तो उसको सिद्ध करने के लिए हमारे पास शायद काई प्राकृतिक वस्तु न मिले। अगर कोई घर है भी तो उसीनेबनाया था जब तक इसका दस्तावेज नहीं मिलता अथवा उसके बारे में कोई जनश्रुतिनहीं मिलती तो कैसे सिद्ध किया जा सकता है? आज के समय में देश में अथवा विदेशों में राज्य करने वाले प्रधानमंत्रियों तथा राष्ट्रपतियों के बारे में 1000वर्षो के बाद में कोई प्रमाण मांगे तो उस समय उनके पास सिर्फ पुस्तकीय विवरण तथा जनश्रुतिही उनके इतिहास को बता सकती है। पिछले कुछ वर्षो में कम्प्यूटर का ज्ञान रखने वाले कुछ अति उत्साही लोगों ने वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड) में वर्णित श्री राम के जन्म समय (चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, नवमी तिथि, पुनर्वसुनक्षत्र, कर्क लग्न आदि) की प्लेनेटेरियम गोल्ड साफ्टवेयर के माध्यम से आधुनिक गणना की है। इन लोगों ने ग्रहों, नक्षत्रों आदि की स्थिति का अध्ययन करते हुए यह परिणाम निकाला कि श्रीराम का जन्म 10जनवरी, 5114ई. पूर्व (अर्थात आज से 7121वर्ष पूर्व) हुआ था। ये लोग जहां साधुवाद के पात्र हैं, वहां हमें यह भी याद रखना चाहिए कि गणित ज्योतिष की अनभिज्ञता व साहित्यिक प्रमाण के अभाव के कारण उनका यह परिणाम ठीक नहीं। गणित ज्योतिष के हिसाब से लगभग 26000वर्षाें में राशियां अपना एक चक्र पूरा कर लेती हैं। अर्थात एक राशि चक्र का अपने पूर्ववत स्थान पर आने के लिए लगभग 26000वर्ष लगते हैं।
इसीलिए राम सिर्फ 7121वर्ष पूर्व ही जन्मे, यह किस आधार पर कहा जा सकता है? पहले दिए गए वायुपुराणव महाभारत के प्रमाणों के आधार पर यदि हम श्रीराम का जन्म 28वेंत्रेता(वर्तमान चतुर्युगी) में मानें तो तब से राशि चक्र आकाश में 33चक्कर लगा चुका है व 34वांचालू है और यदि हम 24वेंत्रेताका आधार लेते हैं तो तब से लेकर आज तक 698राशि चक्र पूरे हो चुके हैं और 699वांचक्र अभी चल रहा है।
नासा अमेरिका एजेंसी के जैमिनि-11आकाश यान (स्पेश क्राफ्ट) द्वारा वर्ष 2002में एडम ब्रिज (रामसेतु) के लिए गए चित्रों के वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर कहा गया था कि भारत तथा श्रीलंका को जोडने वाले पुल के ये अवशेष मनुष्यकृत हैं तथा लगभग 17.5लाख वर्ष पुराने हैं।

1 टिप्पणी:

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