28 दिसंबर 2009

काम के प्रति रहे फोकस्ड


जीवन के किसी भी स्तर पर अपनी राह से भटक जाना आजकल आम होता जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकी छोटी सी समयावधि बहुत कुछ प्रदशित या जाहिर करने के चक्कर मे हम अपने कार्य की मुख्य धुरी से भटक जाते हैं।
इसका एक ताजा उदाहरण मुझे हाल ही में समपन्न फ़िल्म समारोह मे नजर आया। यहाँ प्रदशित होने वाली हर फ़िल्म से पहले एक अजीब सी रस्मअदायगी की गयी। कोई युवा श्ख्स मच पर आता, अपने काल सेंटर वाले बेह्तरीन लह्जे मे लोगो में वहा प्रदशित होने वाली फ़िल्म का कथासार प्रस्तुत करता। यह वक्ता वही पढ़कर सुनाता जो वहा मौजूद लोगो के बीच बाट दिए गए ब्रोशर मे लिखा होता। इस समारोह के मुख्य आयोजन स्थल ( मुबई के अँधेरी इलाके मे स्थित फ़न रिपब्लिक मल्टीप्लेक्स ) के स्टाफकर्मी अलग-अलग फॉर्मेट में बनी फिल्मों को सही तरीके से हैंडल और प्रदशित करने के लिहाज से अप्रशिक्षित नज़र आये। उनमें से एक ने तो आंगंतुकों को प्रोजेक्ट कबिन में न घुसने के लिए कड़े शब्दों में चेतावनी तक दे डाली। फिल्म समारोह में आने वाले शिष्टमंडल की गंभीरता को देखते हुए इस तरह की उदघोषणा और ब्रोशर को पढ़कर सुनाता कतई जरुरी नहीं था। फिल्म समारोह का मुख्य फोकस दस दिन की समयावधि में चुनिंदा २०० फिल्मों का प्रदशन करना था। इसके बजाय इससे जुड़े ज्यादा से ज्यादा अनुषंगी आयोजनों से दर्शक उबने लगे, जो वहां कुछ गंभीर योजनाओं के साथ आये थे। फिल्म समारोह में ज्यादातर वही लोग आते हैं और इसे समर्थन देते हैं जो फिल्म मेंकिंग व मनोरंजन के कारोबार में हैं। वे वहां अपना मनोरंजन करने नहीं आते। उन्हें मनोरंजन से परेशानी नहीं है, लेकिन उनका फोकस अपने यहाँ प्रदशित होने वाली दुनियाभर की फिल्मों से कुछ सीखना होता है।


 
फंडा यह है कि.......

किसी भी इवेंट में मिशन स्टेटमेंट को तय कर उसी पर फोकस करना चाहिय।

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