21 जुलाई 2010

रामायण - वाल्मीकि का संक्षिप्त परिचय ( Ramayana - Valmiki A Brief Introduction )

महाकाव्य वाल्मीकि रामायण
हिंदुओं के प्रसिद्ध ,महाकाव्य वाल्मीकि रामायण जिसे कि आदि रामायण भी कहा जाता है और जिसमें भगवान श्रीरामचन्द्र के निर्मल एवं कल्याणकारी चरित्र का वर्णन है, के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के विषय में अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ प्रचलित है जिसके अनुसार उन्हें निम्नवर्ग का बताया जाता है जबकि वास्तविकता इसके विरुद्ध है| ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदुओं के द्वारा हिंदू संस्कृति को भुला दिये जाने के कारण ही इस प्रकार की भ्रांतियाँ फैली हैं| वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि ने श्लोक संख्या 7/93/16, 7/96/18, और 7/111/11 में लिखा है कि व प्रचेता के पुत्र हैं| मनुस्मृति में प्रचेता को वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि का भाई बताया गया है| बताया जाता है कि प्रचेता का एक नाम वरुण भी है और वरुण ब्रह्माजी के पुत्र थे| यह भी माना जाता है कि वाल्मीकि वरुण अर्थात् प्रचेता के 10वें पुत्र थे और उन दिनों के प्रचलन के अनुसार उनके भी दो नाम 'अग्निशर्मा' एवं 'रत्नाकर' थे|

किंवदन्ती है कि बाल्यावस्था में ही रत्नाकर को एक निःसंतान भीलनी ने चुरा लिया और प्रेमपूर्वक उनका पालन-पोषण किया| जिस वन प्रदेश में उस भीलनी का निवास था वहाँ का भील समुदाय असभ्य था और वन्य प्राणियों का आखेट एवं दस्युकर्म ही उनके लिये जीवन यापन का मुख्य साधन था| हत्या जैसा जघन्य अपराध उनके लिये सामान्य बात थी| उन्हीं क्रूर भीलों की संगति में रत्नाकर पले, बढ़े, और दस्युकर्म में लिप्त हो गये|

युवा हो जाने पर रत्नाकर का विवाह उसी समुदाय की एक भीलनी से कर दिया गया और ग्राहस्थ जीवन में प्रवेश के बाद वे अनेकों संतानों के पिता बन गये| परिवार में वृद्धि के कारण अधिक धनोपार्जन करने के लिये वे और भी अधिक पापकर्म करने लगे|

एक दिन साधुओं की एक मंडली उस वन प्रदेश से गुजर रही थी| रत्नाकर ने उनसे धन की मांग की और धन न देने की स्थिति में हत्या कर देने की धमकी भी दी| साधुओं के यह पूछने पर कि वह ये पापकर्म किसलिये करता है रत्नाकर ने बताया कि परिवार के लिये| इस पर साधुओं के गुरु ने पूछा कि जिस तरह तुम्हारे पापकर्म से प्राप्त धन का उपभोग तुम्हारे समस्त परिजन करते हैं क्या उसी तरह तुम्हारे पापकर्मों के दण्ड में भी वे भागीदार होंगे? रत्नाकर ने कहा कि न तो मुझे पता है और न ही कभी मैने इस विषय में सोचा है|

साधुओं के गुरु ने कहा कि जाकर अपने परिवार के लोगों से पूछ कर आवो और यदि वे तुम्हारे पापकर्म के दण्ड के भागीदार होने के लिये तैयार हैं तो अवश्य लूटमार करते रहना वरना इस कार्य को छोड़ देना, यदि तुम्हें संदेह है कि हम लोग भाग जायेंगे तो हमें वृक्षों से बांधकर चले जाओ|

साधुओं को पेड़ों से बांधकर रत्नाकर अपने परिजनों के पास पहुँचे| पत्नी, संतान, माता-पिता आदि में से कोई भी उनके पापकर्म में के फल में भागीदार होने के लिये तैयार न था, सभी का कहना था कि भला किसी एक के कर्म का फल कोई दूसरा कैसे भोग सकता है!

रत्नाकर को अपने परिजनों की बातें सुनकर बहुत दुख हुआ और उन साधुओं से क्षमा मांग कर उन्हें छोड़ दिया| साधुओं से रत्नाकर ने अपने पापों से उद्धार का उपाय भी पूछा| साधुओं ने उन्हें तमसा नदी के तट पर जाकर 'राम-राम' का जाप करने का परामर्श दिया| रत्नाकर ने वैसा ही किया परंतु वे राम शब्द को भूल जाने के कारण 'मरा-मरा' का जाप करते हुये अखंड तपस्या में लीन हो गये| तपस्या के फलस्वरूप उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुये|

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रामायण - वाल्मीकि रामायण भूमिका
रामायण - राम जन्म

रामायण - बालकान्ड - महर्षि विश्वामित्र का आगमन ( Ramayana - Balkaned - Arrival of Maharishi Vishwamitra )

महाराज दशरथ का दरबार लगा हुआ था। यथोचित आसन पर गुरु वशिष्ठ, मन्त्रीगण और दरबारीगण बैठे थे। महाराज ने गुरु वशिष्ठ से कहा, "हे गुरुदेव! जीवन क्षणभंगुर है और मेरी वृद्धावस्था बढ़ती जा रही है। राम, भरत, लक्षम्ण और शत्रुघ्न चारों ही राजकुमार अब वयस्क भी हो चुके हैं। मेरी इच्छा है कि जीवन त्यागने के पहले राजकुमारों का विवाह देख लूँ। अतः आपसे विनय है कि इन राजकुमारों के लिये योग्य कन्याओं की खोज करवायें।" महाराज दशरथ की बात पूरी होते ही द्वारपाल ने ऋषि विश्वामित्र के पधारने की सूचना दी। राजा दशरथ ने स्वयं द्वार तक जाकर विश्वामित्र की अभ्यर्थना की और आदरपूर्वक उन्हें दरबार के अन्दर ले आये तथा गुरु वशिष्ठ के पास ही आसन देकर उनका समुचित सत्कार किया। .

कुशलक्षेम पूछने के पश्चात् राजा दशरथ ने सनम्र वाणी में ऋषि विश्वामित्र से कहा, "हे मुनिश्रेष्ठ! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हुआ तथा आपके चरणों की पवित्र धूलि से यह राजदरबार और सम्पूर्ण अयोध्यापुरी धन्य हो गई। अब कृपा करके आप अपने पधारने का प्रयोजन कहिये। आपकी किसी भी प्रकार की सेवा करके मैं स्वयं को अत्यंत भाग्यशाली समझूँगा।"

राजा के विनयपूर्ण वचनों को सुनकर मुनि विश्वामित्र बोले, "हे राजन्! आपने अपने कुल की मर्यादा के अनुरूप ही वचन कहे हैं। इक्ष्वाकु वंश के राजाओं की श्रद्धा भक्ति गौ, ब्राह्मण और ऋषि-मुनियों के प्रति सदा से ही रही है। मैं आपके पास एक विशेष प्रयोजन से आया हूँ या फिर समझिये कुछ माँगने के लिये आया हूँ। यदि आप मेरी इच्छित वस्तु मुझे देने का वचन दें तो मैं अपनी माँग आपके सामने प्रस्तुत करू। आप के वचन न देने की दशा में मैं बिना कुछ माँगे ही वापस चला जाऊँगा।"

महाराज दशरथ ने कहा, "हे ब्रह्मर्षि! आप अपनी माँग निःसंकोच रखें। समस्त संसार जानता है कि रघुकुल के राजाओं का वचन ही उनकी प्रतिज्ञा होती है। आपके माँगने पर मैं अपना शीश काट कर भी आपके चरणों में रख सकता हूँ।" उनके इन वचनों से आश्वस्त होकर ऋषि विश्वामित्र बोले, "राजन्! मैं अपने आश्रम में एक यज्ञ कर रहा हूँ। इस यज्ञ के पूर्णाहुति के समय मारीच और सुबाहु नाम के दो राक्षस आकर रक्त, माँस आदि अपवित्र वस्तुएँ यज्ञ वेदी में फेंक देते हैं। इस प्रकार यज्ञ पूर्ण नहीं हो पाता। ऐसा वे अनेक बार कर चुके हैं। मैं उन्हें अपने तेज से श्राप देकर नष्ट भी नहीं कर सकता क्योंकि यज्ञ करते समय क्रोध करना वर्जित है। मैं जानता हूँ कि आप मर्यादा का पालन करने वाले, ऋषि मुनियों के हितैषी एवं प्रजावत्सल राजा हैं। मैं आपसे आपके ज्येष्ठ पुत्र राम को माँगने के लिये आया हूँ ताकि वह मेरे साथ जाकर राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा कर सके और मेरा यज्ञानुष्ठान निर्विघ्न पूरा हो सके। मुझे पता है कि राम आसानी के साथ उन दोनों का संहार कर सकते हैं। अतः केवल दस दिनों के लिये राम को मुझे दे दीजिये। कार्य पूर्ण होते ही मैं उन्हें सकुशल आप के पास वापस पहुँचा दूँगा।"

विश्वामित्र की बात सुनकर राजा दशरथ विषाद में डूब गये। उन्हें ऐसा लगा कि अभी वे मूर्छित हो जायेंगे। फिर अपने आप को संभाल कर उन्होंने कहा, "मुनिवर! राम अभी बालक है। राक्षसों का सामना करना उसके लिये सम्भव नहीं होगा। आपके यज्ञ की रक्षा करने के लिये मैं स्वयं चलने को तैयार हूँ।" विश्वामित्र बोले, "राजन्! आप तनिक भी संशय न करें कि राम उनका सामना नहीं कर सकते। मैंने अपने योगबल से उनकी शक्तियों का अनुमान लगा लिया है। आप निःशंक होकर राम को मुझे दे दीजिये।"

इस पर राजा दशरथ ने उत्तर दिया, "हे मुनिश्रेष्ठ! राम ने अभी तक किसी राक्षस के माया प्रपंचों को नहीं देखा है और उसे इस प्रकार के युद्ध का अनुभव भी नहीं है। जब से उसने जन्म लिया है, मैंने उसे अपनी आँखों के सामने से कभी ओझल भी नहीं किया है। उसके वियोग से मेरे प्राण निकल जावेंगे। आपसे अनुरोध है कि कृपा करके मुझे ससैन्य चलने की आज्ञा दें।"

विश्वामित्र ने पुत्रमोह से ग्रसित होकर राजा दशरथ को अपनी प्रतिज्ञा से विचलित होते देखा तो वे आवेश में आ गये। उन्होंने कहा, "राजन्! मुझे नहीं पता था कि रघुकुल में अब प्रतिज्ञा पालन करने की परम्परा समाप्त हो गई है। यदि पता होता तो मैं कदापि नहीं आता। लो मैं अब चला जाता हूँ।" अपनी बात समाप्त करते करते उनका मुख क्रोध से लाल हो गया।

विश्वामित्र को इस प्रकार क्रुद्ध होते देख कर दरबारी एवं मन्त्रीगण भयभीत हो गये और किसी प्रकार के अनिष्ट की कल्पना से वे काँप उठे। गुरु वशिष्ठ ने राजा को समझाया, "हे राजन्! पुत्र के मोह में ग्रसित होकर रघुकुल की मर्यादा, प्रतिज्ञा पालन और सत्यनिष्ठा को कलंकित मत कीजिये। मैं आपको परामर्श देता हूँ कि आप राम के बालक होने की बात को भूल कर एवं निःशंक होकर राम को मुनिराज के साथ भेज दीजिये। महामुनि अत्यन्त विद्वान, नीतिनिपुण और अस्त्र-शस्त्र के ज्ञाता हैं। मुनिवर के साथ जाने से राम का किसी प्रकार से भी अहित नहीं हो सकता उल्टे वे इनके साथ रह कर शस्त्र और शास्त्र विद्याओं में और भी निपुण हो जायेंगे तथा उनका कल्याण ही होगा।"

गुरु वशिष्ठ के वचनों से आश्वस्त होकर राजा दशरथ ने राम को बुला भेजा। राम के साथ साथ लक्ष्मण भी वहाँ चले आये। राजा दशरथ ने राम को ऋषि विश्वामित्र के साथ जाने की आज्ञा दी। पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके राम के मुनिवर के साथ जाने के लिये तैयार हो जाने पर लक्ष्मण ने भी ऋषि विश्वामित्र से साथ चलने के लिये प्रार्थना की और अपने पिता से भी राम के साथ जाने के लिये अनुमति माँगी। अनुमति मिल जाने पर राम और लक्ष्मण सभी गुरुजनों से आशीर्वाद ले कर ऋषि विश्वामित्र के साथ चल पड़े।

समस्त अयोध्यावासियों ने देख कि मन्द धीर गति से जाते हुये मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र के पीछे पीछे कंधों पर धनुष और तरकस में बाण रखे दोनों भाई राम और लक्ष्मण ऐसे लग रहे थे मानों ब्रह्मा जी के पीछे दोनों अश्विनी कुमार चले जा रहें हों। अद्भुत् कांति से युक्त दोनों भाइयों के, गोह की त्वचा से बने दस्ताने पहने हुये, हाथों में धनुष और कटि में तीक्ष्ण धार वाली कृपाणें शोभायमान हो रहीं थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं शौर्य ही शरीर धारण करके चले जा रहे हों।

लता विटपों के मध्य से होते हुये छः कोस लम्बा मार्ग पार करके वे पवित्र सरयू नदी के तट पर पहुँचे। मुनि विश्वामित्र ने स्नेहयुक्त मधुर वाणी में कहा, "हे वत्स! अब तुम लोग सरयू के पवित्र जल से आचमन स्नानादि करके अपनी थकान दूर कर लो, फिर मैं तुम्हें प्रशिक्षण दूँगा। सर्वप्रथम मैं तुम्हें बला और अतिबला नामक विद्याएँ सिखाऊँगा।" इन विद्याओं के विषय में राम के द्वारा जिज्ञासा प्रकट करने पर ऋषि विश्वामित्र ने बताया, "ये दोनों ही विद्याएँ असाधारण हैं। इन विद्याओं में पारंगत व्यक्तियों की गिनती संसार के श्रेष्ठ पुरुषों में होती है। विद्वानों ने इन्हें समस्त विद्याओं की जननी बताया है। इन विद्याओं को प्राप्त करके तुम भूख और प्यास पर विजय पा जाओगे। इन तेजोमय विद्याओं की सृष्टि स्वयं ब्रह्मा जी ने की है। इन विद्याओं को पाने का अधिकारी समझ कर मैं तुम्हें इन्हें प्रदान कर रहा हूँ।"

राम और लक्ष्मण के स्नानादि से निवृत होने के पश्चात् विश्वामित्र जी ने उन्हें इन विद्याओं की दीक्षा दी। इन विद्याओं के प्राप्त हो जाने पर उनके मुख मण्डल पर अद्भुत् कान्ति आ गई। तीनों ने सरयू तट पर ही विश्राम किया। गुरु की सेवा करने के पश्चात् दोनों भाई तृण शैयाओं पर सो गये।

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कामदेव का आश्रम
ताड़का वध
अलभ्य अस्त्रों का दान
विश्वामित्र का आश्रम
मारीच और सुबाहु का वध
धनुष यज्ञ के लिये प्रस्थान
गंगा जन्म की कथा -1
गंगा जन्म की कथा -2
जनकपुरी में आगमन
अहिल्या की कथा
ऋषि विश्वामित्र का पूर्व चरित्र (1)
ऋषि विश्वामित्र का पूर्व चरित्र (2)
त्रिशंकु की स्वर्गयात्रा
विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति
पिनाक की कथा
धनुष यज्ञ
राम द्वारा धनुष भंग
अयोध्या में तैयारियाँ
विवाहपूर्व की औपचारिकताएँ
विवाह
परशुराम जी का आगमन
अयोध्या में आगमन

रामायण - अयोध्याकाण्ड - अयोध्याकाण्ड आरम्भ ( Ramayana - Ayodhyakand - Ayodhyakand Start )

भरत अपने भाई शत्रुघ्न के साथ कैकेय पहुँच कर आनन्दपूर्वक अपने दिन बिताने लगे। उनके मामा अश्वपति उनसे उतना ही प्रेम करते थे जितना कि उनके पिता राजा दशरथ। इस स्नेह के कारण उन्हें ऐसा प्रतीत होता था मानो वे ननिहाल में न होकर अपने ही घर अयोध्या में हों। इतना होने पर भी उन्हें समय-समय अपने पिता का स्मरण हो आता था और वे उनके दर्शनों के लिये व्याकुल हो उठते थे। यही दशा राजा दशरथ की भी थी। यद्यपि राम और लक्ष्मण उनके पास रहते हुये सदैव उनकी सेवा में संलग्न रहते थे, फिर भी वे भरत और शत्रुघ्न से मिलने के लिये अनेक बार आतुर हो उठते थे। परन्तु राम और लक्ष्मण को देखकर वे अपने मन को सन्तोष कर लेते थे।

राम भी अपने सद्बुणों का निरन्तर विस्तार कर रहे थे। अबवे पहले की अपेक्षा अधिक निरभिमान पराक्रम का परिचय दे रहे थे। राजकाज से समय निकाल कर आध्यात्मिक स्वाध्याय करते थे। वेदों का सांगोपांग अध्ययन करना और सूत्रों के रहस्यों का उद्घाटन करके उन पर मनन करना उनका स्वभाव बन गया था। दीनों पर दया और दुष्टों का दमन करने के लिये सदैव तत्पर रहते थे। जितने वे दयालु थे, उससे भी कई गुना कठोर वे आततायी को दण्ड देने में थे। मन्त्रियों की नीतियुक्त बातें ही नहीं सुनते थे बल्कि अपनी ओर से भी उन्हें तर्क सम्मत अकाट्य युक्तियाँ प्रस्तुत करके परामर्श दिया करते थे। युद्धों में अनेक बार उन्होंने सेनापति का दायित्व संभालकर दुर्द्धुर्ष शत्रुओं को अपने पराक्रम से पराजित किया था। जहाँ-जहाँ भी वे भ्रमण और देशाटन के लिये गये वहाँ के प्रचलित रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक धारणाओं का अध्ययन किया, उन्हें समझा और उनको यथोचित सम्मान दिया। उनके क्रिया कलापों को देख कर लोगों को विश्वास हो गया कि रामचन्द्र क्षमा नें पृथ्वी के समान, बुद्धि-विवेक में वृह्पति के समान और शक्ति में साक्षत् देवताओं के अधिपति महाराज इन्द्र के समान हैं। जब भी राम अयोध्या के सिंहासन को सुशोभित करेंगे, उनका राज्य अपूर्व सुखदायक होगा और वे अपने समय के सर्वाधिक योग्य एवं आदर्श नरेश सिद्ध होंगे। यह बात प्रजा के मस्तिष्क में ही नहीं स्वयं राजा दशरथ के मस्तिष्क में भी थी।

राजा दशरथ अब शीघ्रातिशीघ्र राम का राज्याभिषेक कर देना चाहते थे। उन्होंने मन्त्रियों को बुला कर कहा, "हे मन्त्रिगण! अब मैं वृद्ध हो चला हूँ और रामचन्द्र राजसिंहासन पर बैठने के योग्य हो गये हैं। मेरी प्रबल इच्छा है कि शीघ्रातिशीघ्र राम का राज्याभिषक कर दूँ। मेरे इस विचार पर आप लोगों की सम्मति लेने के लिये ही मैंने आप लोगों को यहाँ पर बुलाया है, कृपया आप सभी अपनी सम्मति दीजिये।" राजा दशरथ के इस प्रस्ताव को सभी मन्त्रियों ने प्रसन्नता पूर्वक मान लिया। शीघ्र ही राज्य भर में राजतिलक की तिथि की घोषणा कर दी गई और देश-देशान्तर के राजाओं को इस शुभ उत्सव में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रण पत्र भेज दिये गये। थोड़े ही दिनों में देश-देश के राजा महाराजा, वनवासी ऋषि-मुनि तथा स्थान-स्थान के विद्वान तथा दर्शगण इस अनुपम उत्सव में भाग लेने के लिये अयोध्या में आकर एकत्रित हो गये। आये हुये सभी अतिथियों का यथोचित स्वागत सत्कार हुआ तथा समस्त सुविधाओं के साथ उनके ठहरने की व्यस्था कर दी गई। निमन्त्रण भेजने का कार्य इतनी उतावली में हुआ कि मन्त्रीगण मिथिला पुरी और महाराज कैकेय के पास निमन्त्रण भेजना ही भूल गये। जब राजतिलक के केवल दो दिन ही रह गये तो मन्त्रियों को इसका ध्यान आया। वे अत्यन्त चिन्तित हो गये और डरते-डरते अपनी भूल के विषय में महाराज दशरथ को बताया। यह सुनकर महाराज को बहुत दुःख हुआ किन्तु अब कर ही क्या सकते थे? सब अतिथि आ गये थे इसलिये राजतिलक की तिथि को टाला भी नहीं जा सकता था। अतएव वे बोले, "अब जो हुआ सो हुआ, परन्तु बात बड़ी अनुचित हुई है। अस्तु वे लोग घर के ही आदमी हैं, उन्हें बाद में सारी स्थिति समझाकर मना लेंगे।"

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राजतिलक की तैयारी
कैकेयी कोपभवन में
कैकेयी द्वारा वरों की प्राप्ति
राम का वनवास
माता कौशल्या से विदा
सीता और लक्ष्मण का अनुग्रह
पिता के अन्तिम दर्शन
राम के द्वारा दान
वन के लिये प्रस्थान
तमसा के तट पर
भीलराज गुह
गंगा पार करना
ऋषि भारद्वाज के आश्रम में
चित्रकूट की यात्रा
चित्रकूट में
सुमन्त का अयोध्या लौटना
श्रवण कुमार की कथा
राजा दशरथ की मृत्यु
भरत और शत्रुध्न की वापसी
दशरथ की अन्त्येष्टि और भरत का वनगमन
राम और भरत का मिलाप
महर्षि अत्रि का आश्रम

मनुष्य मानव और दिव्य प्राणी दोनों है ( Man is both human and divine beings )

अक्सर जब हम धर्म शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, तो यह देखने की कोशिश करते हैं कि उनमें ईश्वर, आत्मा, जीवन, मृत्यु और लोक-परलोक के बारे में क्या लिखा है। उनमें हम यह भी देखते हैं कि हमारे लिए धर्म सम्मत आचरण क्या है। पिछले दिनों ओ. पी. घई की एक पुरानी किताब हमारे हाथ लगी, जिसका शीर्षक है 'अनेकता में एकता।' इस किताब के एक अध्याय में यह दिया गया है कि अलग-अलग धर्मों में मनुष्य के बारे में क्या लिखा गया है। यह पाठ दिलचस्प है।

हिंदू धर्म में अनेक तरह की व्याख्याएँ हैं, लेकिन उपनिषदों के अनुसार मनुष्य पशुओं में सबसे बड़ा है। वह एक ऐसा पशु है जिसमें अनश्वर आत्मा का वास है, जिसे संसार द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता। इसलिए मानवता से महान कुछ भी नहीं है। सिख धर्म में तो मनुष्य के शरीर को ईश्वर का निवास स्थान कहा गया है।

बौद्ध और जैन धर्म भी भारत भूमि से विकसित दर्शन की ही शाखाएँ हैं। जैन धर्म कहता है कि मनुष्य को ईश्वर ने बनाया है, वह जिस रूप में भी है, उसकी इच्छा के अनुसार ही बना है। वह देवत्व से थोड़ा ही कम है। ध्यान दीजिए कि जैन दर्शन में भी हिंदू उपनिषदों की तरह मनुष्य योनि को देवत्व के काफी निकट माना गया है।

लेकिन किताब के मुताबिक बौद्ध दर्शन कर्मवादी है। वह ईश्वर की तुलना में मनुष्यता को ज्यादा महत्व देता है। बौद्ध धर्म कहता है कि मनुष्य अपने ही विचारों के अनुरूप बनता है। जो कुछ भी वह है, उसके सभी आदर्श, पसंद और नापसंद, उसका अपना अहम उसके अपने विचारों का ही परिणाम हैं। इसलिए यदि हम अपने जीवन और अपनी परिस्थितियों में बदलाव चाहते हैं तो हमें पहले अपने आप को ही बदलना होगा।

किताब में इस्लाम और सिख मान्यताएँ भी संकलित हैं। इस्लाम कहता है कि ईश्वर ने पृथ्वी पर अपने सिंहासन पर बैठने के लिए मनुष्य का निर्माण किया। मनुष्य पृथ्वी पर भगवान का वायसराय है। ईश्वर ने हमारे ही लिए यह जमीन, पेड़-पौधे और ये दिन-रात बनाए हैं। हमारे ही लिए मीठे फल और ठंडे चश्मे पैदा किए हैं।

ईसाई धर्म मानता है कि मनुष्य फरिश्तों से थोड़ा ही कम है। वह सभी मूल्यों का माप है। ध्यान दें कि इस्लाम की तरह ईसाई धर्म भी यही कहता है कि मनुष्य के लिए ही इस संसार की उत्पत्ति हुई है। वे भी कहते हैं कि उसी के लिए ईसा मसीह पृथ्वी पर आए और सूली पर चढ़े। मनुष्य पृथ्वी पर ईश्वर का कारिन्दा है। यदि मनुष्य असफल होता है तो सब कुछ असफल हो जाता है।

भारत में पारसी धर्म का पदार्पण बहुत पहले हो चुका था। संभवत: इस वजह से भी उसके दर्शन का हिंदू धर्म से एक साम्य नजर आता है। पारसी धर्म मानता है कि ज्ञानी पुरुष (ईश्वर) ने मनुष्य को अपने जैसा ही बनाया। शरीर में बंद मनुष्य का मस्तिष्क दिव्यता से मिला है। इसलिए मनुष्य को केवल अच्छाई पर चलना चाहिए और जो कुछ भी बुरा है उससे दूर रहना चाहिए।

कन्फ्युशियस का कोई धर्म नहीं था, वे एक दार्शनिक विचारक थे। लेकिन वे कहते थे कि ईश्वर ने मनुष्य को अच्छा बनाया। उसकी मूल प्रकृति अच्छी है, परन्तु बहुत से लोग इस अच्छाई से दूर हट जाते हैं। मनुष्य की सांसारिकता उसे नीचे की ओर खींच कर ले जाती है और भगवान से दूर कर देती है। इसलिए जो अपने अंदर विद्यमान ईश्वरीय तत्व का अनुसरण करते हैं, वे महान हैं, और जो सांसारिक तत्व का अनुसरण करते हैं, वे निकृष्ट हैं।

कन्फ्युशियस की तरह यहूदी धर्माचार्य भी यही मानते हैं कि अधिकांश व्यक्ति सांसारिक सुखों में लिप्त रहते हैं, इसलिए वे मनुष्य के लिए संभव नैतिक ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाते। अहंकार महानता का बड़ा शत्रु है और वह क्रोध तथा लालच की ही तरह खतरनाक है।

इस दिव्यता की बात ताओ ने भी की है। ताओ धर्म कहता है कि मनुष्य मानव और दिव्य प्राणी दोनों है। उसके अंदर की दिव्यता अनन्त और अनमोल है। मनुष्य की मृत्यु हो जाती है, परंतु दिव्यता सदैव रहती है। उसमें अच्छाई ईश्वर से आती है।

शिव कौन हैं और उनसे सम्बन्धित चिन्हों का क्या अर्थ है? ( Who is Shiva and their associated markings mean? )

जगत पिता के नाम से हम भगवान शिव को पुकारते हैं। भगवान शिव को सर्वव्यापी व लोग कल्याण का प्रतीक माना जाता है जो पूर्ण ब्रह्म है। धर्मशास्त्रों के ज्ञाता ऐसा मानते हैं कि शिव शब्द की उत्पत्ति वंश कांतौ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- सबको चाहने वाला और जिसे सभी चाहते है। शिव शब्द का ध्यान मात्र ही सबको अखंड, आनंद, परम मंगल, परम कल्याण देता है।.

शिव भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शन ज्ञान को संजीवनी प्रदान करने वाले हैं। इसी कारण अनादि काल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में शिवलिंग की व साकार रूप में शिवमूर्ति की पूजा होती है। शिवलिंग को सृष्टि की सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है। भारत में भगवान शिव के अनेक ज्योतिलिंग सोमनाथ, विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, वैधनाथस नागेश्वर, रामेश्वर हैं। ये देश के विभिन्न हिस्सों उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में स्थित हैं, जो महादेव की व्यापकता को प्रकट करते हैं शिव को उदार ह्रदय अर्थात् भोले भंडारी कहा जाता है। कहते हैं ये थोङी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः इनके भक्तों की संख्या भारत ही नहीं विदेशों तक फैली है। यूनानी, रोमन, चीनी, जापानी संस्कृतियों में भी शिव की पूजा व शिवलिंगों के प्रमाण मिले हैं। भगवान शिव का महामृत्जुंजय मंत्र पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी को दीर्घायु, समृद्धि, शांति, सुख प्रदान करता रहा है और चिरकाल तक करता रहेगा। भगवान शिव की महिमा प्रत्येक भारतीय से जूङा है। मानव जाति की उत्पत्ति भी भगवान शिव से मानी जाती है। अतः भगवान शिव के स्वरूप को जानना प्रत्येक मानव के लिए जरूरी है।

जटाएं -  शिव को अंतरिक्ष का देवता कहते हैं, अतः आकाश उनकी जटा का स्वरूप है, जटाएं वायुमंडल का प्रतीक हैं।

चंद्र - चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है, उनका विवेक सदा जाग्रत रहता है। शिव का चंद्रमा उज्जवल है।

त्रिनेत्र - शिव को त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव के ये तीन नेत्र सत्व, रज, तम तीन गुणों, भूत, वर्तमान, भविष्य, तीन कालों स्वर्ग, मृत्यु पाताल तीन लोकों का प्रतीक है।

सर्पों का हार - सर्प जैसा क्रूर व हिसंक जीव महाकाल के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक वृत्ति का जीव है, जिसे शिव ने अपने अधीन किया है।

त्रिशूल - शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशुल सृष्टि में मानव भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।

डमरू - शिव के एक हाथ में डमरू है जिसे वे तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्म रुप है।

मुंडमाला - शिव के गले में मुंडमाला है जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है।

छाल - शिव के शरीर पर व्याघ्र चर्म है, व्याघ्र हिंसा व अंहकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।

भस्म - शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से करते हैं। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है शरीर नश्वरता का प्रतीक है।

वृषभ - शिव का वाहन वृषभ है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ का अर्थ है, धर्म महादेव इस चार पैर वाले बैल की सवारी करते है अर्थात् धर्म, अर्थ, काम मोक्ष उनके अधीन है। सार रूप में शिव का रूप विराट और अनंत है, शिव की महिमा अपरम्पार है। ओंकार में ही सारी सृष्टि समायी हुई है।

20 जुलाई 2010

क्या सही क्या गलत ( What right wrong )

व्यक्ति, जितना बुद्धिमान होगा, उतना स्वयं के ढंग से जीना चाहेगा। सिर्फ बुद्धिहीन व्यक्ति पर ऊपर से थोपे गए नियम प्रतिक्रिया, रिएक्शन पैदा नहीं करेंगे। तो, दुनिया जितनी बुद्धिहीन थी, उतनी ऊपर से थोपे गए नियमों के खिलाफ बगावत न थी। जब दुनिया बुद्धिमान होती चली जा रही है, बगावत शुरू हो गई है। सब तरफ नियम तोड़े जा रहे हैं। मनुष्य का बढ़ता हुआ विवेक स्वतंत्रता चाहता है।

स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्‍छंदता नहीं है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि मैं अपने व्यक्तित्व की स्वतंत्रता पूर्ण निर्णय करने की स्वयं व्यवस्था चाहता हूँ, अपनी व्यवस्था चाहता हूँ। तो अनुशासन की पुरानी सारी परंपरा एकदम आकर गड्‍ढे में खड़ी हो गई है। वह टूटेगी नहीं। उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता, उसे चलाने की कोशिश नहीं ही करें, क्योंकि जितना हम उसे चलाना चाहेंगे, उतनी ही तीव्रता से मनोप्रेरणा उसे तोड़ने को आतुर हो जाएगी। और उसे तोड़ने की आतुरता बिल्कुल स्वाभाविक, उचित है।

गलत भी नहीं है। तो अब एक नये अनुशासन के विषय में सोचना जरूरी हो गया है, जो व्यक्ति के विवेक के विकास से सहज फलित होता है। एक तो यह नियम है कि दरवाजे से निकलना चाहिए, दीवार से नहीं निकलना चाहिए। यह नियम है। जिस व्यक्ति को यह नियम दिया गया है, उसके विवेक में कहीं भी यह समझ में नहीं आया है कि दीवार से निकलना, सिर तोड़ लेना है। और दरवाजे से निकलने के अतिरिकत कोई मार्ग नहीं है। उसकी समझ में यह बात नहीं आई है। उसके विवेक में यह बात आ जाए तो हमें कहना पड़ेगा कि दरवाजे से निकलो।

वह दरवाजे से निकलेगा। निकलने की यह जो व्यवस्था है उसके भीतर से आएगी, बाहर से नहीं। अब तक शुभ क्या है, अशुभ क्या है, अच्छा क्या है, बुरा क्या है, यह हमने तय कर लिया था, वह हमने सुनिश्चित कर लिया था। उसे मानकर चलना ही सज्जन व्यक्ति का कर्तव्य था। अब यह नहीं हो सकेगा, नहीं हो रहा है, नहीं होना चाहिए।

मैं जो कह रहा हूँ, वह यह है कि एक-एक व्यक्ति के भीतर उतना सोचना, उतना विचार, उतना विवेक जगा सकते हैं। उसे यह दिखाई पड़ सके कि क्या करना ठीक है, और क्या करना गलत है। निश्चित ही अगर विवेक जगेगा, तो करीब-करीब हमारा विवेक एक से उत्तर देगा, लेकिन उन उत्तरों का एक सा होना बाहर से निर्धारित नहीं होगा, भीतर से निर्धारित होगा। प्रत्येक व्यक्ति के विवेक को जगाने की कोशिश की जानी चाहिए और विवेक से जो अनुशासन आएगा, वह शुभ है। फिर सबसे बड़ा फायदा यह है कि विवेक से आए हुए, अनुशासन में व्यक्ति को कभी परतंत्रता नहीं मालूम पड़ती है।

दूसरे के द्वारा लादा गया सिद्धांत परतंत्रता लाता है। और यह भी ध्यान रहे, परतंत्रता के खिलाफ हमारे मन में विद्रोह पैदा होता है। विद्रोह से नियम तोड़े जाते हैं, और अगर व्यक्ति स्वतंत्र हो, अपने ढंग से जीने की कोशिश से अनुशासन आ जाए, तो कभी विद्रोह पैदा नहीं होगा। इस सारी दुनिया में नए बच्चे जो विद्रोह कर रहे हैं, वह उनकी परतंत्रता के खिलाफ है। उन्हें सब ओर से परतंत्रता मालूम पड़ रही है।

मेरी दृष्टि यह है कि अच्छी चीज के साथ परतंत्रता जोड़ना बहुत महँगा काम है। अच्छी चीज के साथ परतंत्रता जोड़ना बहुत खतरनाक बात है। क्योंकि परतंत्रता तोड़ने की आतुरता बढ़ेगी, साथ में अच्‍छी चीज भी टूटेगी। क्योंकि आपने अच्छी चीज के साथ स्वतंत्रता जोड़ी है। अच्छी चीज के साथ स्वतंत्रता हो ही सकती है क्योंकि अच्छी चीज होने के भीतर स्वतंत्रता का स्वप्न ही अनिवार्य है; अन्यथा हम उसके विवेक को जगा सकते हैं। शिक्षा बढ़ी है, संस्कृति बढ़ी है, सभ्यता बढ़ी है, ज्ञान बढ़ा है। आदमी के विवेक को अब जगाया जा सकता है। अब उसका ऊपर से थोपना ‍अनिवार्य नहीं रह गया है।

मेरा कहना यह है कि विवेक विकसित करने की बात है एक-एक चीज के संबंध में। लंबी ‍प्रक्रिया है। किसी को बँधे-बँधाए नियम देना बहुत सरल है कि झूठ मत बोलो, सत्य बोलना धर्म है। पर नियम देने से कुछ होता है? नियम देने से कुछ भी नहीं होता। पुराना अनुशासन गया, आखिरी साँसें गिन रहा है। और पुराने मस्तिष्क उस अनुशासन को जबरदस्ती रोकने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि अगर अनुशासन चला गया, तो क्या होगा? क्योंकि उनका अनुभव यह है कि अनुशासन के रहते भी आदमी अच्छा नहीं था, और अगर अनुशासन चला जाए तो मुश्किल हो जाएगी।

उनका अनुभव यह है कि अनुशासन था, तो भी आदमी अच्छा नहीं था तो अनुशासन नहीं रहेगा, तो आदमी का क्या होगा? उन्हें पता नहीं है कि आदमी के बुरे होने में उनके अनुशासन का नब्बे प्रतिशत हाथ था। गलत अनुशासन था- अज्ञानपूर्ण था, थोपा हुआ था, जबरदस्ती का था।

एक नया अनुशासन पैदा करना पड़ेगा। और वह अनुशासन ऐसा नहीं होगा कि बँधे हुए नियम दे दें। ऐसा होगा‍ कि उसके विवेक को बढ़ाने के मौके दें, और उसके विवेक को बढ़ने दें, और अपने अनुभव बता दें जीवन के, और हट जाएँ रास्ते से बच्चों के। एकदम रास्ते पर खड़े न रहें उनके। सब चीजों में उनके बाँधने की, जंजीरों में कसने की कोशिश न करें। वे जंजीरें तोड़ने को उत्सुक हो गए हैं।

अब जंजीरें बर्दाश्त न करेंगे। अगर भगवान भी जंजीर मालूम पड़ेगा तो टूटेगा, बच नहीं सकता। अब तोड़ने की भी जंजीर बचेगी नहीं, क्योंकि जंजीर के खिलाफ मामला खड़ा हो गया है। अब पूरा जाना होगा, जंजीर बचनी नहीं चाहिए।

लेकिन मनुष्य चेतना के विकास का क्रम है। एक क्रम था जब चेतना इतनी विकसित नहीं थी, नियम थोपे गए थे, सिवाय इसके कोई उपाय नहीं था। अब नियम थोपने की जरूरत नहीं रह गई है। अब नियम बाधा बन गए हैं। अब हमें समझ, अंडरस्टैंडिंग ही बढ़ाने की दिशा में श्रम करना पड़ेगा। तो मैं कहना चाहता हूँ कि समझ, विवेक, एकमात्र अनुशासन है। पूरी प्रक्रिया बिल्कुल अलग होगी। नियम थोपने की प्रक्रिया बिल्कुल अलग थी।, बायोलॉजिकल अपोजिट है, दोनों बिल्कुल विरोधी हैं। खतरे इसमें उठाने पड़ेंगे। खतरे पुरानी प्रक्रिया में भी बहुत उठाए।

सबसे बड़ा खतरा यह उठाया कि आदमी जड़ हो गया। जिसने नियम माना, वह जड़ हो गया, जिसने नियम नहीं माना, वह बर्बाद हो गया। वे दोनों विकल्प बुरे थे। अगर किसी ने पुराना अनुशासन मान लिया तो वह बिल्कुल ईडियाटिक हो गया, जड़ हो गया। उसकी बुद्धि खो गई। और‍ जिसने बुद्धि को बचाने की कोशिश की, उसे नियम तोड़ने पड़े। वह बर्बाद हो गया, वह अपराधी हो गया, वह प्रॉब्लम बन गया, वह समस्या बन गया। दोनों विकास बुरे सिद्ध हुए। जिसने नियम माना वह खराब हुआ; क्योंकि नियम ने उसको जड़ बना दिया। गुलाम बना दिया। और जिसने नियम तोड़ा, वह स्वच्छंद हो गया। नियम से अच्छापन नहीं आया।

जैसा खाए अन्न वैसा बने मन ( As the mind became like eating food )

तपस्या का मूल आधार है मित आहार। मित आहार का मतलब है अत्यंत सीमित मात्रा में जितना आवश्यक हो उतना ही भोजन ग्रहण करना। भोजन में स्वाद की बजाए सात्विकता, शुचिता और पवित्रता का होना साधक की सफलता का अनिवार्य तत्व है। भारतीय शास्त्रों में आहार शुद्धि पर अत्यधिक बल दिया गया है। शास्त्र कहते हैं- 'जैसा खाए अन्ना वैसा बने मन।' अर्थात मनुष्य का मन और आचरण उसके आहार के अनुसार ही चलता है। जीवन में सफलता, यश, कीर्ति, वैभव, महानता, उच्चता और भगवत्प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति का आहार शुद्ध, सात्विक, संतुलितऔर चित्त पर अनुकूल प्रभाव डालने वाला हो।

भोजन केवल जिह्वा की स्वाद संतुष्टि का साधन मात्र नहीं है। यह महज उदरपूर्ति का उपक्रम भी नहीं है। यह साधक की साधना का एक अभिन्ना अंग है। सच कहा जाए तो साधक की साधना का प्रथम सोपान ही आहार शुद्धि है। शास्त्रों में जिसे मित आहार कहा गया है, उसका मतलब केवलआहार की अल्पता ही नहीं वरन उसकी पवित्रता और शुचिता है। साधक का मन साधना में तभी लग सकता है, जबकि उसका आहार सात्विक एवं चित्त को एकाग्रता प्रदान करने वाला हो। घंटों एकांत में बैठकर तप करने वाले या ईश्वरोपासना में दीर्घकाल तक रत रहने वाला व्यक्तिअगर यह सोचे कि इतनी लंबी पूजा-तपस्या करने के बाद अब मैं कुछ भी भोजन करूँ और कितनी भी मात्रा में ग्रहण करूँ इससे तपस्या या पूजा पर क्या असर पड़ने वाला है, लेकिन साधक का ऐसा सोचना गलत है। आहार की शुद्धि के बिना साधक की साधना की पूर्णता संभव नहीं है।

मनुष्य का कर्म, आचरण और जीवन उसके द्वारा ग्रहण किए जाने वाले आहार पर निर्भर करता है। न केवल आहार शुद्ध हो अपितु उसे बनाने वाले हाथ, परोसने वाले और उसमें उपयोग लाए जाने वाले पदार्थ तथा आहार जहाँ तैयार किया जा रहा है वहाँ का वातावरण भी शुद्ध होना चाहिए। शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि आहार ग्रहण करने के पूर्व उसे ईश्वर को समर्पित किया जाना चाहिए। सच्चे अर्थों में जिसे आप भोजन मानकर ग्रहण करते हैं, वह प्रभु प्रसाद है। उसे उसी रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। हमारे यहाँ अन्ना को देवता माना गया है। अतः उसे जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करना और झूठा छोड़ना दोनों ही गलत है। मनुष्य को मित आहारी बनकर भोजन को प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए तभी उसमें मनसा, वाचा, कर्मणा, एकरूपता और आचरण में पवित्रता, और उच्चता का गुण विकसित हो सकता है।

"हिम्मत मत हारो" ( "Do not lose courage" )

एक दिन एक किसान का गधा कुएँ में गिर गया ।वह गधा घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं। अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि गधा काफी बूढा हो चूका था,अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था;और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही गधे कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है ,वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा । और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।

सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे। तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह गधा एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था। वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एस सीढी ऊपर चढ़ आता । जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह गधा कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया।

ध्यान रखो ,तुम्हारे जीवन में भी तुम पर बहुत तरह कि मिट्टी फेंकी जायेगी ,बहुत तरह कि गंदगी तुम पर गिरेगी। जैसे कि ,तुम्हे आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही तुम्हारी आलोचना करेगा ,कोई तुम्हारी सफलता से ईर्ष्या के कारण तुम्हे बेकार में ही भला बुरा कहेगा । कोई तुमसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो तुम्हारे आदर्शों के विरुद्ध होंगे। ऐसे में तुम्हे हतोत्साहित होकर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हिल-हिल कर हर तरह कि गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख लेकर,उसे सीढ़ी बनाकर,बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

अतः याद रखो !जीवन में सदा आगे बढ़ने के लिए
1)    नकारात्मक विचारों को उनके विपरीत सकारात्मक विचारों से विस्थापित करते रहो।
2)   आलोचनाओं से विचलित न हो बल्कि उन्हें उपयोग में लाकर अपनी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करो।

महाभारत - कर्ण का जन्म ( Mahabharata - Karna's birth )

धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के लालन पालन का भार भीष्म के ऊपर था। तीनों पुत्र बड़े होने पर विद्या पढ़ने भेजे गये। धृतराष्ट्र बल विद्या में, पाण्डु धनुर्विद्या में तथा विदुर धर्म और नीति में निपुण हुये। युवा होने पर धृतराष्ट्र अन्धे होने के कारण राज्य के उत्तराधिकारी न बन सके। विदुर दासीपुत्र थे इसलिये पाण्डु को ही हस्तिनापुर का राजा घोषित किया गया। भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से कर दिया। गांधारी को जब ज्ञात हुआ कि उसका पति अन्धा है तो उसने स्वयं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली।

उन्हीं दिनों यदुवंशी राजा शूरसेन की पोषित कन्या कुन्ती जब सयानी हुई तो पिता ने उसे घर आये हुये महात्माओं के सेवा में लगा दिया। पिता के अतिथिगृह में जितने भी साधु-महात्मा, ऋषि-मुनि आदि आते, कुन्ती उनकी सेवा मन लगा कर किया करती थी। एक बार वहाँ दुर्वासा ऋषि आ पहुँचे। कुन्ती ने उनकी भी मन लगा कर सेवा की। कुन्ती की सेवा से प्रसन्न हो कर दुर्वासा ऋषि ने कहा, "पुत्री! मैं तुम्हारी सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ अतः तुझे एक ऐसा मन्त्र देता हूँ जिसके प्रयोग से तू जिस देवता का स्मरण करेगी वह तत्काल तेरे समक्ष प्रकट हो कर तेरी मनोकामना पूर्ण करेगा।" इस प्रकार दुर्वासा ऋषि कुन्ती को मन्त्र प्रदान कर के चले गये।

एक दिन कुन्ती ने उस मन्त्र की सत्यता की जाँच करने के लिये एकान्त स्थान पर बैठ कर उस मन्त्र का जाप करते हुये सूर्यदेव का स्मरण किया। उसी क्षण सूर्यदेव वहा प्रकट हो कर बोले, "देवि! मुझे बताओ कि तुम मुझ से किस वस्तु की अभिलाषा करती हो। मैं तुम्हारी अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा।" इस पर कुन्ती ने कहा, "हे देव! मुझे आपसे किसी भी प्रकार की अभिलाषा नहीं है। मैंने तो केवल मन्त्र की सत्यता परखने के लिये ही उसका जाप किया है।" कुन्ती के इन वचनों को सुन कर सूर्यदेव बोले, "हे कुन्ती! मेरा आना व्यर्थ नहीं जा सकता। मैं तुम्हें एक अत्यन्त पराक्रमी तथा दानशील पुत्र प्रदान करता हूँ।" इतना कह कर सूर्यदेव अन्तर्ध्यान हो गये।

कुन्ती ने लज्जावश यह बात किसी से नहीं कह सकी। समय आने पर उसके गर्भ से कवच-कुण्डल धारण किये हुये एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कुन्ती ने उसे एक मंजूषा में रख कर रात्रि बेला में गंगा में बहा दिया। वह बालक बहता हुआ उस स्थान पर पहुँचा जहाँ पर धृतराष्ट्र का सारथी अधिरथ अपने अश्व को गंगा नदी में जल पिला रहा था। उसकी दृष्टि कवच-कुण्डल धारी शिशु पर पड़ी। अधिरथ निःसन्तान था इसलिये उसने बालक को अपने छाती से लगा लिया और घर ले जाकर उसे अपने पुत्र के जैसा पालने लगा। उस बालक के कान अति सुन्दर थे इसलिये उसका नाम कर्ण रखा गया।

कालान्तर में कुन्ती का विवाह पाण्डु के साथ हो गया। मद्र देश के राजा ने भी पाण्डु के पराक्रम से प्रभावित होकर अपनी कन्या माद्री का विवाह पाण्डु के साथ कर दिया।

19 जुलाई 2010

सूरज के साथ होड़ ( Competing with the sun )

प्राचीन काल में एक समय ब्रह्मदत्त काशी पर राज्य करते थे। उस समय चित्रकूट पर्वत पर नब्बे हज़ार हंस निवास करते थे। उसी समय बोधिसत्व ने एक हंस के रूप में जन्म लिया। उसके अन्दर अनेक उत्तम गुण थे। वह अत्यधिक सुन्दर था। साथ ही वह अत्यंत तेज गति से उड़ सकता था। इसी कारण वह नब्बे हज़ार हंसों का प्रधान बन गया।

ऐसे असंख्य उत्तम गुणों व शक्तियों के कारण हंसों के प्रधान को लोग राजहंस कहने लगे।

एक दिन राजहंस अपने दल के साथ सरोवर में विहार करके अपने निवास को लौट रहा था। मार्ग में वह काशी राज्य के ऊपर से होकर निकला। पक्षियों के उस विशाल दल को देखने पर ऐसा लगता था, मानो सारे काशी राज्य पर सोने का वितान बिछा दिया गया हो।

काशी के राजा ने बड़े आश्चर्य से उस दल की ओर देखा। उन सभी पक्षियों में तारों के बीच चन्द्रमा के समान शोभायमान राजहंस को देखकर राजा जैसे उस पर मुग्ध हो गये।

काशी नरेश उस राजहंस के राजसी ठाट, तेज आदि राजोचित लक्षणों को देख बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने सुन्दर फूल मालाएँ और पुजापा मँगवा कर राजहंस का अभिनन्दन किया।

राजहंस ने राजा का यह अपूर्व आतिथ्य बड़े ही स्नेहपूर्वक स्वीकार किया और सपरिवार कुछ दिन वहीं बिताकर अपने निवास को लौट गया।

उस दिन से राजहंस के प्रति काशी नरेश के मन में स्नेह बढ़ता गया। दिन रात वे उसी के बारे में सोचने लगे। वे पलक पांवड़े बिछाये राजहंस की प्रतीक्षा करते रहते कि न मालूम वह कब किस दिशा से उधर आ जाए।

एक दिन चित्रकूट पर्वत प्रदेश के हंसों में से दो बाल हंस राजहंस के पास आए और बोले, ‘‘राजन! हम दोनों कई दिनों से सूर्य के साथ होड़ लगाने की इच्छा कर रहे हैं।''

इस पर राजहंस ने समझाया- ‘‘अरे बच्चो! सूरज के साथ तुम्हारी दौड़ कैसी! कहाँ सूरज और कहाँ नन्हीं जान तुम! शायद तुम लोग नहीं जानते कि सूर्य की गति क्या है? तुम उन के साथ दौड़ नहीं सकते, इस दौड़ में प्राणों का खतरा भी हो सकता है! अज्ञानता वश तुम लोगों ने यह निर्णय कर लिया होगा। इसलिए तुम दोनों अपना यह कुविचार छोड़ दो।''

पर उन बालहंसों को हित की ये बातें अच्छी न लगीं। कुछ दिनों के बाद फिर उन बालहंसों ने राजहंस के पास आकर सूर्य के साथ उड़ने की अनुमति माँगी। इस बार भी राजहंस ने उन्हें मना कर दिया। फिर भी छोटे हंसों ने अपने विचार को नहीं त्यागा। कुछ दिनों के बाद तीसरी बार अनुमति माँगी। इस बार भी राजहंस ने स्वीकृति नहीं दी।

आखिर अपनी असमर्थता से अनजान हंस के वे दोनों बच्चे अपने नेता की स्वीकृति के बिना ही सूरज के साथ दौड़ लगाने के लिए युगन्धर पर्वत की चोटी पर पहुँचे। यह चोटी इतनी ऊँची थी, मानो आसमान से बातें कर रही हो।

इधर राजहंस ने अपने परिवार के सदस्यों की गिनती की तो पाया कि उन में दो हंसों की कमी है।

असली बात भॉंपने में राजहंस को देर न लगी। वह उनके लिए चिन्तित हो उठा। फिर सोचा, अब चिन्ता करने से क्या लाभ? किसी तरह से उन दो हंसों को पता लगाना है और उनकी रक्षा करनी ही होगी।

राजहंस शीघ्र ही युगन्धर पर्वत की चोटी पर पहुँचा और बालहंसों से आँख बचा कर एक जगह बैठ गया।

दूसरे दिन सूर्योदय होते ही बालहंस सूर्य के साथ उड़ने लगे।

राजहंस ने भी उन का अनुसरण किया।

उन बालहंसों में से छोटा हंस दोपहर तक उड़्रता रहा, फिर पंखों में जलन के कारण बेहोश हो गया। गिरते समय उसे राजहंस दिखाई पड़ा। वह निराश हो बोला, ‘‘राजन, मैं हार गया।''

इस पर राजहंस ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, मैं तुम्हारी सहायता के लिए हूँ।'' इस प्रकार प्यार भरे शब्दों में समझाकर उसे अपने पंखों पर चढ़ा लिया और अपने निवास में अन्य सदस्यों के बीच छोड़ दिया।

इस के थोड़ी देर बात दूसरे बालहंस के पंखों में भी पीड़ा होने लगी, मानों उसे सुइयों से चुभोया जा रहा हो।

आ़खिर थककर वह भी बेहोश होने लगा।

उसने भी राजहंस को देख दीनतापूर्वक बचाने की प्रार्थना की। उसे भी राजहंस ने अपने पंखों पर बिठा कर चित्रकूट पर पहुँचा दिया।

अपने परिवार के दो पक्षियों को सूर्य से परास्त होते देख राजहंस को बहुत दुख हुआ। वह यह अपमान सहन नहीं कर पाया। इसलिए वह स्वयं सूरज के साथ होड़ लगाने चल पड़ा।

अपूर्व क्षिप्र गति रखने वाला राजहंस अपनी उड़ान प्रारंभ करने के कुछ ही देर बाद सूर्य बिम्ब से जा मिला और पलक मारते उसे भी पार करके और ऊपर उड़ता चला गया। उसने केवल सूर्य की शक्ति का अनुमान लगाना चाहा था अन्यथा उसे सूर्य से होड़ लगाने की आवश्यकता ही क्या थी।

राजहंस इसलिए थोड़ी देर तक अपनी इच्छानुसार चक्कर काट कर भूलोक पर उतर आया और काशीराज्य में पहुँचा।

राजहंस की प्रतीक्षा में व्याकुल काशी नरेश उसे देखते ही आनन्द विभोर हो उठे।

राजहंस को राजा ने अपने स्वर्ण-सिंहासन पर बिठाया तथा स्वर्ण थाल में खीर और स्वर्ण कलश में शीतल शरबत से उसका आतिथ्य किया। राजहंस ने राजा का आतिथ्य स्वीकार कर सूर्य के साथ उड़ने का सारा वृत्तांत विस्तार के साथ राजा को सुनाया।

सारा वृत्तांत सुनकर राजा राजहंस की अलौकिक शक्ति पर बहुत प्रस हुए। फिर उन्होंने राजहंस से अनुरोध किया, ‘‘हे पक्षी राज, सूर्य के साथ होड़्र लगाने से भी कहीं अधिक अपनी महान शक्ति और प्रज्ञा दिखाइए। उस दृश्य को देखने की कई दिनों से मेरी प्रबल इच्छा है।''

राजहंस ने राजा को अपनी शक्ति का परिचय देने की स्वीकृति देते हुए कहा, ‘‘राजन, आप के राज्य में बिद्युत से भी अधिक द्रुतगति के साथ बाण चलानेवाले धनुर्धारी हों तो ऐसे चार व्यक्तियों को यहाँ बुलवाइए।'' राजा ने ऐसे चार धनुर्धारियों को बुलवाया।

राजा के उद्यान में एक चौकोर स्तम्भ था। राजहंस ने उस के चतुर्दिक चारों धनुर्धारियों को खड़ा कर दिया। इसके बाद वह अपने गले में एक घंटी बाँध कर स्तम्भ पर बैठ गया।

‘‘मेरा संकेत पाते ही तुम चारों अपने बाण छोड़ दो। क्षण भर में मैं तुम चारों के बाण लाकर तुम्हारे सामने रख दूँगा। पर तुम लोग मेरे कंठ में बंधी घण्टी की ध्वनि से ही मेरी गति का परिचय पा सकते हो। तुम लोग मुझ को उड़ते हुए देख न सकोगे।'' राजहंस ने उन धनुर्धारियों से कहा।

अपने वचन के अनुसार विद्युत की कौंध की अवधि के अन्दर राजहंस ने धनुर्धारियों के द्वारा छोड़े गये बाण लाकर उन के सामने रख दिये।

राजा तथा उनका परिवार विस्मय में आकर दातों तले अंगुली दबाने लगे।

इस पर राजहंस बोला, ‘‘राजन, आपने जो मेरी गति देखी है, यह मेरी निम्नतम गति है। इसके आधार पर आप अनुमान लगा सकते हैं कि मेरी वास्तविक गति क्या होगी?'' राजा बड़्रे ही आतुर होकर बोले- ‘‘हे पक्षीराज, तुम्हारे वेग का नमूना तो मैंने देख लिया लेकिन क्या इससे भी अधिक वेग रखनेवाला कोई है?'' इस पर राजहंस ने कहा, ‘‘क्यों नहीं? मुझ से भी अनन्त गुना अधिक वेग रखने वाली एक महाशक्ति है। वही काल नामक सर्प है। वह काल सर्प प्रति क्षण विश्र्व के जीवों को अवर्णनीय वेग के साथ नष्ट कर रहा है।''

ये बातें सुन कर राजा भय से कांप उठे।

तब राजहंस के रूप में बोधिसत्व ने काशी राजा को इस प्रकार तत्वोपदेश दिया, ‘‘राजन, जो लोग इस बात का स्मरण रखते हैं कि काल सर्प नामक कोई चीज़ है, उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। आप जब तक नीति व धर्म के साथ शासन करते रहेंगे, तब तक आप को किसी का कोई भय न होगा। इसलिए आप विधिपूर्वक अपने कर्तव्य करते जाइए।''

बोधिसत्व के उपदेशानुसार काशी राजा ने धर्म मार्ग पर शासन करके अपार यश प्राप्त किया।

विल्हण-रतिलेखा ( Willhon - Arathilekha )

चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य के राजकवि विल्हण का उस समय के कवियों, विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ स्थान था। उनका कहना था कि इस संसार में केवल एक ही ऐसा रस है, जो लोहे के आदमी को भी मोम बना देता है और वह हैं 'प्रेम रस'।

राजकवि विल्हण राजा के विश्वासपात्र थे। इसलिए राजा ने राजकुमारी रतिलेखा की शिक्षा-दीक्षा की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी। किंतु विल्हण अति सुंदरी रतिलेखा को काव्य पढ़ाते-पढ़ाते प्रेम शास्त्र पढ़ाने लगे और एक दिन जब रतिलेखा और विल्हण गंधर्व विवाह करके गंधर्व क्रीड़ा के लिए तैयार थे, तभी राजा ने उन्हें देख लिया और राजा ने तुरंत विल्हण को फाँसी की सज़ा दे दी।

फाँसी का तख्त नर-मुण्डों की भूमि पर ख़ड़ा प्रतीत हो रहा था। एक तरफ राजा ऊँचे सिंहासन पर विराजमान थे। बधिकों ने विल्हण से कहा, 'अंतिम बेला आ पहुँची है, अपने इष्ट का स्मरण करो।' राजकवि ने उस समय एक श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ था- ''जिसने जीवन के सुखों का संपूर्ण मर्म समझने में बराबर का योग दिया, जिसने वाणी को कोमल शब्द उच्चारण करने की सामर्थ्य दी, जिसने मृत्युलोक में ही स्वर्ग की कल्पना को साकार दिया, उसी तरह रतिलेखा का स्मरण विल्हण करता है- विल्हण के लिए वही चरम आनंद की जननी है।''

फिर वही श्लोक सहस्त्रों मुखों से बार-बार मुखरित होने लगा। रतिलेखा राजा के चरणों पर गिरकर विलाप करने लगी, 'हे राजन, विल्हण के साथ ही राज्य की श्री, मुषमा, सुशीलता सबका अंत हो जाएगा। जीवन दासता से कलंकित होगा, रसराज का आदर खत्म हो जाएगा, जन-जन कुमार्गगामी हो जाएँगे। विल्हण को क्षमा करो, नहीं तो उनकी चिता पर गंधर्व विवाह से उनकी पत्नी बन चुकी रतिलेखा भी जीवित ही भस्म हो जाएगी।

फिर तो राजा को जनता और रतिलेखा के सामने झुकना पड़ा और उन्होंने विल्हण को अभयदान देकर दोनों के प्रेम व वैवाहिक संबंधों को स्वीकार किया। यहीं नहीं, इसके बाद राजा ने विल्हण को 'महाकवि' की उपाधि से भी सम्मानित किया।

पट्ट हाथी ( Elephant Board )

सैकड़ों साल पहले की बात है। काशी राज्य पर ब्रह्मदत्त शासन करते थे। उन दिनों काशी नगर से थोड़ी दूर बढ़इयों का एक गाँव था। उसमें पाँच सौ बढ़ई थे। वे लोग नावों में नदी पार कर जंगलों में चले जाते, पेड़ काट कर नावों में लाद कर लकड़ी ले आते थे।

जंगल में एक हथिनी रहा करती थी। एक दिन उसके पैर में एक चैला फंस गया जिस से उसका पैर सूझकर दर्द करने लगा। बड़ी कोशिश करके भी वह उस चैले को पैर से निकाल न पाई। इस बीच उसे पेड़ काटने की आवाज़ सुनाई दी। हथिनी लंगड़ाते उनके नज़दीक़ पहुँची।

हथिनी को देखते ही बढ़इयों ने भांप लिया कि वह किसी पीड़ा से परेशान है। इस बीच हथिनी आकर बढ़इयों के सामने लेट गई। बढ़इयों ने छेनी से हथिनी के पैर का चैला निकाला और उसके घाव पर मरहम पट्टी की।

थोड़े ही दिनों में हथिनी चलने-फिरने लायक़ हो गई। इस उपकार के बदले में हथिनी बढ़इयों की मदद करने लगी। वह गिरे हुए पेड़ों को उठाकर ला देती। काटी गई तख़्तियों और पाटियों को नदी के पास नावों तक पहुँचा देती। इस वजह से बढ़इयों और हथिनी के बीच दोस्ती बढ़ती गई। पाँच सौ बढ़ई अपने खाने का थोड़ा हिस्सा हथिनी को खिलाने लगे।

कई दिन बीत गये। हथिनी का एक बच्चा हुआ। वह ऐरावत जाति का था और उसका रंग सफ़ेद था। हथिनी जब बूढ़ी हो गई और उसमें चलने-फिरने की ताक़त न रही, तब वह अपने बच्चे को बढ़इयों के हाथ सौंपकर जंगल में चली गई। इसके बाद सफ़ेद हाथी बढ़इयों की मदद करने लगा। उनके हाथ का खाना खा लेता और उनके बच्चों को अपनी पीठ पर बिठाकर जंगल में घुमा देता। नदी में उन्हें नहलाता और ख़ुशी के साथ अपने दिन गुजार देता था। बढ़ई लोग हाथी को अपने बच्चे के बराबर प्यार करते थे। हाथी उनके परिवार के सदस्य की तरह उनके लिए उपयोगी बनने की कोशिश करता था।

राजा ब्रह्मदत्त को जब यह ख़बर मिली कि जंगल में एक उत्तम नस्ल का सफ़ेद हाथी है, तब वे उसे पकड़ ले जाने के लिए सदल-बल जंगल में चले आये।

बढ़इयों ने सोचा कि राजा मकान बनाने की लकड़ी के वास्ते जंगल में आये हुए हैं। उन लोगों ने राजा को समझाया, ‘‘महाराजा, आप मेहनत उठाकर इस जंगल में क्यों आये? हमें ख़बर कर देते तो ख़ुद हम लकड़ी आपके महल में पहुँचा देते?''

‘‘मैं लकड़ी ले जाने के वास्ते नहीं आया हूँ; सफ़ेद हाथी को पकड़ ले जाने के वास्ते आया हूँ।'' राजा ने अपने दिल की बात बताई।

बढ़इयों को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। लेकिन वे कर भी क्या सकते थे। आखिर यह राजा की इच्छा थी और राजा अपने राज्य में कुछ भी करने के लिए स्वतन्त्र था। उन्होंने यह भी सोचा कि राजा के पास हाथी अधिक सुख और शान के साथ रह सकेगा। इसीलिए हाथी के जाने का दुख होते हुए भी वे राजी हो गये।

‘‘तब तो आप हाथी को अपने साथ ले जाइये।'' बढ़इयों ने उत्तर दिया।

मगर बड़ी कोशिश के बावजूद हाथी टस से मस न हुआ। इस पर राजा का एक कर्मचारी असली बात ताड़ गया और बोला, ‘‘महाराज, यह एक विवेकशील जानवर है। आप अगर इस हाथी को अपने साथ ले जायेंगे तो इन बढ़इयों का भारी नुक़सान होगा। इसका मुआवजा देने पर ही हाथी यहाँ से निकल सकता है।''

राजा ने हाथी के चारों पैर और सूंड के पास एक एक लाख सोने के सिक्के रखकर बढ़इयों को बॉंटने का आदेश दिया। तिस पर भी हाथी वहाँ से नहीं हिला।

इसके बाद राजा ने बढ़इयों की औरतों और बच्चों को कपड़े दिये, तब जाकर हाथी राजा के पीछे चल पड़ा। इसके बाद राजा गाजे-बाजे के साथ हाथी को काशी नगर में ले गये। उसे राजसी अलंकारों से सजाया संवारा गया। फिर सारी गलियों में उसका जुलूस निकाला गया।

अंत में उसके वास्ते एक बढ़िया गज शाला बनाकर उसमें रखा गया। उसकी सेवा के लिए सैकड़ों नौकर-चाकर रखे गये। उसके भोजन का विशेष प्रबन्ध किया गया। वह हाथी राजा का पट्ट हाथी बना। उस पर सिवाय राजा के कोई सवार नहीं हो सकता था।

नगर में उस हाथी के आने के बाद काशी राज्य की सीमा और यश चारों तरफ़ फैलने लगा। उसके प्रभाव से बड़े-बड़े राजा भी काशी राजा से बुरी तरह हार जाते थे। राज्य में सुख-शान्ति और खुशहाली बढ़ने लगी। प्रजा में एक दूसरे के लिए प्रेम और सौहार्द बढ़ने लगा।

कुछ दिन बाद काशी की रानी गर्भवती हुई। उसके गर्भ में बोधिसत्व ने प्रवेश किया। रानी के प्रसव में एक हफ़्ता ही रह गया था; इस बीच काशी राजा का स्वर्गवास हो गया । यह मौक़ा देख कोसल देश के राजा ने काशी राज्य पर अचानक एक दिन हमला कर दिया । मंत्रियों ने आपस में सलाह-मशविरा किया और आख़िर कोसल राजा के पास यह संदेश भेजा, ‘‘आपने कायर की तरह धोखे से हमारे राज्य पर आक्रमण कर दिया है, जब कि सारा राज्य अपने राजा की मृत्यु पर शोक में डूबा हुआ है। यह नीचता है। एक अच्छे पड़ोसी राजा होने के नाते आप को हमारे साथ सम्वेदना और सहायता का हाथ बढ़ाना चाहिये था। खैर, जो भी हो, हमारी रानी का एक हफ़्ते के अन्दर प्रसव होनेवाला है, अगर महारानी ने एक बच्ची को जन्म दिया तो आप काशी राज्य पर बिना युद्ध और रक्तपात के कब्जा कर लीजिये । यदि रानी ने एक लड़के को जन्म दिया तो हम लोग आप के साथ युद्ध करेंगेऔर देश के लिए मर मिटेंगे और जीते जी शत्रुओं को सीमा के अन्दर आने नहीं देंगे।''

कोसल राजा ने उन्हें एक हफ़्ते की मोहलत दी। एक हफ़्ते के पूरा होते ही महारानी ने बोधिसत्व को जन्म दिया। काशी राजा की सेनाएँ कोसल सेना के साथ जूझ गईं। मगर उस युद्ध में कोसल का हाथ ऊँचा मालूम होने लगा। उस हालत में मंत्रियों ने महारानी के पास जाकर निवेदन किया, ‘‘महारानी जी, हमारे पट्ट हाथी का ल़ड़ाई के मैदान में प्रवेश करने पर ही हमारी विजय हो सकती है, लेकिन महाराजा के स्वर्गवास के दिन से लेकर पट्ट हाथी खाना-पीना व नींद को भी तज कर दुख में डूबा हुआ है। हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसी हालत में क्या किया जाये।''

मंत्रियों के मुँह से ये बातें सुनते ही महारानी प्रसूती के कमरे में उठ बैठी, अपने शिशु को राजोचित पोशाक पहनाकर पट्ट हाथी के पास ले गई।

शिशु को उसके पैरों के सामने रखकर प्रणाम करके बोली, ‘‘गजराज, आप अपने मालिक के स्वर्गवास पर चिंता न कीजिए। देखिये, अब यही राजकुमार आपका मालिक है। लड़ाई के मैदान में इसके दुश्मनों का हाथ ऊँचा है। आप जाकर उन्हें हरा दीजिए। वरना इस राजकुमार को अपने पैरों के नीचे कुचलकर मार डालिये।'' रानी के मुँह से ये बातें निकलने की देर थी कि हाथी का दुख जाता रहा। उसने प्यार से राजकुमार को अपनी सूंड से ऊपर उठाया और अपने मस्तक पर बिठा लिया। फिर राजकुमार को रानी के हाथ में सौंप कर लड़ाई के मैदान की ओर चल पड़ा।

हाथी का रौद्र रूप और भयंकर गर्जन करते और अपनी ओर बढ़ते देख कोसल राज्य के सैनिकों का कलेजा कांप उठा। वे तितर-बितर होकर भागने लगे। किसी सैनिक को उसके सामने आने का साहस नहीं हुआ। जो भी उसके सामने आ जाता, उसे कुचलता-रौंदता, उछालता हुआ हाथी तूफान की तरह आगे बढ़ता गया और सीधे कोसल राजा के पास पहुँचा। उनको अपनी सूंड में लपेट कर ले आया और काशी के राजकुमार के पैरों के पास डाल दिया। कोसल राजा ने राजकुमार के चरण छूकर माफ़ी माँग ली। काशी राज्य के मंत्रियों ने उनको क्षमा कर वापस भेज दिया।

बोधिसत्व के सात साल की उम्र होने तक हाथी ने काशी राज्य की रक्षा की। इसके बाद बोधिसत्व गद्दी पर बैठे और उस हाथी को अपना पट्ट हाथी बनाकर बड़ी दक्षता के साथ शासन करने लगे।

रूहानी प्यार कभी खत्म नहीं होता ( Spiritual love would never end )

वो नजरें झुकाकर क्लासरूम की तरफ बढ़ रही है, उसने किताबें अपने सीने के साथ लगाई हुई हैं। जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सीने से लगाकर चलती है। इतने में वो एक नौजवान लड़के के साथ टकरा जाती है और किताबें नीचे गिरती हैं, दोनों के मुँह में से एक ही अल्फाज सुनाई देता है सॉरी। बस इस दौरान दोनों की निगाहें एक दूसरे से टकराती हैं, और पहली ही नजर में प्यार हो जाता है। कुछ ऐसा ही दृश्य होता है हिन्दी फिल्मों में, बस जगह और हालात बदल दिए जाते हैं, किताबों की जगह कुछ और आ जाता है। मगर लड़का लड़की आपस में अचानक टकराते हैं और वहाँ से ही प्यार की ज्वाला भड़क उठती है। क्या इसे ही प्यार कहते हैं? मेरा जवाब तो नहीं है, औरों का क्या होगा पता नहीं।

पहली नजर में प्यार कभी हो ही नहीं सकता, वह तो एक आकर्षण है एक दूसरे के प्रति, जो प्यार की पहली सीढ़ी से भी कोसों दूर है। जैसे दोस्ती अचानक नहीं हो सकती, वैसे ही प्यार भी अचानक नहीं हो सकता। प्यार भी दोस्ती की भाँति होता है, पहले पहले अनजानी सी पहचान, फिर बातें और मुलाकातें। सिर्फ एक नए दोस्त के नाते, इस दौरान जो तुम दोनों को नजदीक लेकर आता है वह प्यार है। कुछ लोग सोचते हैं कि अगर मेरी शादी मेरे प्यार से हो जाए तो मेरा प्यार सफल, नहीं तो असफल। ये धारणा मेरी नजर से तो बिल्कुल गलत है, क्योंकि प्यार तो नि:स्वार्थ है, जबकि शरीर को पाना तो एक स्वार्थ है। इसका मतलब तो ये हुआ कि आज तक जो किया एक दूसरे के लिए वो सिर्फ उस शरीर तक पहुँचने की चाह थी, जो प्यार का ढोंग रचाए बिन पाया नहीं जा सकता था।

" प्यार तो वो जादू है, जो मिट्टी को भी सोना बना देता है। प्यार वो रिश्ता है, जो हमको हर पल चैन देता है, कभी बेचैन नहीं करता, अगर कुछ बेचैन करता है तो वो हमारा शरीर को पाने का स्वभाव।"
मेरी नजर में तो प्यार वही है, जो एक माँ और बेटे की बीच में होता है, जो एक बहन और भाई के बीच में या फिर कहूँ बुल्ले शाह और उसके मुर्शद के बीच था। ज्यादातर लड़के और लड़कियाँ तो प्यार को हथियार बना एक दूसरे के जिस्म तक पहुँचना चाहते हैं, अगर ऐसा न हो तो दिल का टूटना किसे कहते हैं, उसने कह दिया मैं किसी और से शादी करने जा रही हूँ या जा रहा हूँ, तो इतने में दिल टूट गया। सारा प्यार एक की झटके में खत्म हो गया, क्योंकि प्यार तो किया था, लेकिन वो रूहानी नहीं था, वो तो जिस्म तक पहुँचने का एक रास्ता था, एक हथियार था। अगर वो जिस्म ही किसी और के हाथों में जाने वाला है तो प्यार किस काम का।

सच तो यह है कि प्यार तो रूहों का रिश्ता है, उसका जिस्म से कोई लेना देना ही नहीं, मजनूँ को किसी ने कहा था कि तेरी लैला तो रंग की काली है, तो मजनूँ का जवाब था कि तुम्हारी आँखें देखने वाली नहीं हैं। उसका कहना सही था, प्यार कभी सुंदरता देखकर हो ही नहीं सकता, अगर होता है तो वह केवल आकर्षण है, प्यार नहीं। माँ हमेशा अपने बच्चे से प्यार करती है, वो कितना भी बदसूरत क्यों न हो, क्योंकि माँ की आँखों में वह हमेशा ही दुनिया का सबसे खूबसूरत बच्चा होता है।

एक वो जिन्होंने प्यार को हमेशा रूह का रिश्ता बनाकर रखा, और जिस्मानी रिश्तों में उसको ढलने नहीं दिया, उनको आज भी वो प्यार याद आता है, उसकी जिन्दगी में आ रहे बदलाव उनको आज भी निहारते हैं। उसको कई सालों बाद फिर निहारना आज भी उनको अच्छा लगता है। रूहानी प्यार कभी खत्म नहीं होता। वो हमेशा हमारे साथ कदम दर कदम चलता है। वो दूर रहकर भी हमको ऊर्जावान बनाता है।

कुबेर का सरोवर ( Kubera's lake )

ब्रह्मदत्त जब काशी राज्य पर शासन करते थे, उन दिनों बोधिसत्व उनके पुत्र के रूप में पैदा हुए। राजा ने उनका नामकरण महाशासन किया। थोड़े महीने बाद रानी ने एक और पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम सोमदत्त रखा गया।

दोनों पुत्रों की पैदाइश के दो साल बाद रानी का देहांत हो गया। इस पर राजा ने दूसरा विवाह किया। कुछ समय बाद नई रानी ने भी एक पुत्र को जन्म दिया। यह ख़बर सुनते ही राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने रानी से कहा, ‘‘रानी, इस शुभ अवसर पर तुम कोई वर मांग लो।''

‘‘यह वर मैं अपनी ज़रूरत के व़क्त मांग लूँगी।'' रानी ने जवाब दिया।

छोटी रानी के पुत्र का नाम आदित्य था। उसने राजोचित सारी विद्याएँ सीख लीं। जब आदित्य जवान हो गया, तब एक दिन रानी ने राजा से कहा, ‘‘महाराज, आपने आदित्य के जन्म के समय वर मांगने को कहा था, उसे अब मैं मांगती हूँ। आप आदित्य को युवराजा के रूप में अभिषेक कीजिए।''

यह सुनकर राजा निश्चेष्ट हो गये और थोड़ी देर सोचकर बोले, ‘‘मेरी पहली पत्नी के दो पुत्रों के होते हुए आदित्य को मैं युवराजा कैसे बना सकता हूँ? यह न्याय संगत नहीं है।''

मगर रानी को जब भी मौक़ा मिलता वह अपने पुत्र को युवराजा बनाने की इच्छा प्रकट कर राजा को सताने लगी। राजा ने भांप लिया कि रानी अपना हठ नहीं छोड़ेगी। उनके मन में यह संदेह भी पैदा हुआ कि रानी के द्वारा बड़े राजकुमारों की कोई हानि भी हो सकती है। इसलिए वे उन्हें बचाने का उपाय दिन-रात सोचने लगे।

राजा ने एक दिन अपने दोनों बड़े पुत्रों को बुलवाकर सारी बातें समझाईं और बोले, ‘‘तुम दोनों थोड़े समय के लिए नगर को छोड़कर कहीं और रह जाओ। मेरे बाद तुम्ही लोगों को यह राज्य प्राप्त होगा, इसलिए उस व़क्त लौटकर राज्य का भार संभाल सकते हो। तब तक तुम दोनों भूल से भी इस राज्य के अन्दर प्रवेश न करना।''

अपने पिता की इच्छा के अनुसार महाशासन और सोमदत्त नगर को छोड़कर जब राज्य की सीमा पर पहुँचे, तब उन लोगों ने देखा कि छोटा राजकुमार आदित्य भी उनके पीछे चला आ रहा है। तीनों मिलकर कुछ दिनों के बाद हिमालय के जंगलों में पहुँचे।

एक दिन वे तीनों अपनी यात्रा की थकान मिटाने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गये। उस व़क्त महाशासन ने आदित्य से कहा, ‘‘मेरे छोटे भैया! उधर देखो, एक सरोवर दिखाई दे रहा है! तुम वहाँ जाकर अपनी प्यास बुझा लो और हमारे लिए कमल पत्रों वाले दोने में पानी ले आओ।''

आदित्य जाकर ज्यों ही सरोवर में उतरा, त्यों ही जल पिशाच उसे पकड़ कर जल के नीचे वाले अपने घर में ले गया। बड़ी देर तक आदित्य को न लौटते देख महाशासन चिंतित हुआ और इस बार महाशासन ने सोमदत्त को भेजा। उसको भी जल पिशाच ने पकड़ लिया।

थोड़ी देर तक इंतजार करने के बाद महाशासन अपने भाइयों को लौटते न देख खतरे की आशंका करके तलवार लेकर ख़ुद चल पड़ा। वह सरोवर में उतरे बिना किनारे पर खड़े हो पानी की ओर परख कर देख रहा था । इसे भांपकर जल पिशाच ने अंदाजा लगाया कि ये अपने भाइयों के जैसे जल्दबाजी में आकर जल में न उतरेंगे।

इसके बाद जल पिशाच एक बहेलिये का वेष धरकर महाशासन के पास आया और बोला, ‘‘खड़े खड़े देखते क्या हो? प्यास लगी है तो सरोवर में उतर कर प्यास क्यों नहीं बुझाते?''

यह सलाह पाकर महाशासन ने सोचा कि दाल में कुछ काला है, तब बोला, ‘‘तुम्हारा व्यवहार देखने पर मुझे शक होता है कि तुमने ही मेरे दोनों भाइयों को गायब कर डाला है।''

‘‘तुम तो विवेकशील मालूम होते हो। मैं सच्ची बात बता देता हूँ, ज्ञानी लोगों को छोड़ बाक़ी सभी लोगों को, जो इस सरोवर के पास आते हैं, पकड़ कर मैं बन्दी बनाता हूँ। यह तो कुबेर का आदेश है!'' जल पिशाच ने कहा।

‘‘इसका मतलब है कि तुम ज्ञानियों से उपदेश पाना चाहते हो! मैं तुम्हें ज्ञानोपदेश कर सकता हूँ! लेकिन थका हुआ हूँ।'' महाशासन ने कहा। झट जल पिशाच उसे पानी के तल में स्थित अपने निवास में ले गया। अतिथि सत्कार करने के बाद उसे उचित आसन पर बिठाया। वह ख़ुद उसके चरणों के पास बैठ गया।

महाशासन ने जो कुछ अपने गुरुओं से सीखा था, वह सारा परम ज्ञान जलपिशाच को सुनाया। दूसरे ही क्षण जलपिशाच बहेलिये का रूप त्यागकर अपने निज रूप में आकर बोला, ‘‘महात्मा, आप महान ज्ञानी हैं ! मैं आपके भाइयों में से एक को देना चाहता हूँ। दोनों में से आप किसको चाहते हैं?''

‘‘मैं आदित्य को चाहता हूँ।'' महाशासन ने कहा।

‘‘बड़े को छोड़ छोटे की मांग करना क्या धर्म संगत होगा।'' जलपिशाच ने पूछा।

‘‘इसमें अधर्म की बात क्या है? अपनी माँ की संतान में से मैं बचा हुआ हूँ, ऐसी हालत में मेरी सौतेली माँ के भी एक पुत्र तो होना चाहिए न? अपने भ्रातृ-प्रेम से प्रेरित होकर यह भोला आदित्य हमारे पास चला आया है। अगर हम दोनों बड़े भाई नगर को लौट जायें, तब लोग हमसे पूछें कि आदित्य कहाँ है? तब हमारा यह कहना कहाँ तक न्याय संगत होगा कि जलपिशाच ने उसे निगल डाला है?'' यों महाशासन ने जलपिशाच से उल्टा सवाल पूछा।

इस पर जलपिशाच ने महाशासन के चरणों में प्रणाम करके कहा, ‘‘आप ज़ैसे महान ज्ञानी को मैंने आज तक नहीं देखा है, मैं आपके दोनों छोटे भाइयों को मुक्त कर देता हूँ। आप लोग इस जंगल में मेरे अतिथि बनकर रहिए!''

इस पर महाशासन और उसके छोटे भाई जलपिशाच के अतिथि बनकर रह गये। थोड़े समय बाद उन्हें ख़बर मिली कि उनके पिता ब्रह्मदत्त का स्वर्गवास हो गया है। इस पर महाशासन अपने दोनों छोटे भाइयों तथा जलपिशाच को साथ ले काशी चले गये।

महाशासन का राज्याभिषेक हुआ। तब उसने सोमदत्त को अपने प्रतिनिधि के रूप में तथा आदित्य को सेनापति के पद पर नियुक्त किया। अपना उपकार करने वाले जलपिशाच के वास्ते एक सुंदर निवास का प्रबंध किया और उसकी सेवा के लिए नौकर नियुक्त किया।

रामायण - बालकाण्ड 1 ( Ramayana - Balkand 1 )

महामुनि वाल्मीकि का आश्रम तमसा नदी के तट पर था। एक दिन नारद मुनि वहाँ पधारे। वाल्मीकि ने शास्त्रोक्त विधि से उनकी पूजा की और कहा, "महात्मा, इस युग में क्या कोई ऐसा पुरुष है, जो सकल सद्‌गुण संप और महा पराक्रमी हो?''

तब नारद ने, वाल्मीकि को श्रीराम की कथा सविस्तार सुनायी। नारद महामुनि के वहाँ से निकलते-निकलते स्नान का समय हो गया। उनके चले जाने के बाद वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज को लेकर तमसा नदी के तट पर गये।

वहॉं उन्होंने क्रौंच पक्षियों की एक जोडी देखी। वल्कल वस्त्र पहनकर पानी में उतरते हुए वे क्रौंच पक्षियों का आनंद व उत्साह देखते रह गये। इतने में एक भील ने पुरुष पक्षी पर अपना बाण चलाया। वह नीचे गिरकर छटपटाने लगा। मादा पक्षी आर्तनाद करने लगी। यह दृश्य देखकर वाल्मीकि के हृदय में उस पक्षी पर दया उमड़ आयी। उस किरात पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। उनके मुँह से अनायास ही एक श्लोक निकल पड़ा, जिसमें उन्होंने कहा, "अरे ओ कठोर मानव, तुमने प्रेम में मग्न दो पक्षियों में से एक को मार डाला। जीवन भर तुम सुखी और शांत नहीं रहोगे।''

अपने मुँह से निकले श्र्लोक पर वाल्मीकि स्वयं विस्मित हुए। आश्रम लौटने के बाद भी उसी श्र्लोक के बारे में सोचते रहे।

इतने में ब्रह्मा उन्हें देखने आये। उन्हें देखते ही वाल्मीकि तुरंत उठ खडे हो गये और साष्टांग प्रणाम किया। फिर वे मौन खड़े रहे। तब ब्रह्मा ने कहा, "वाल्मीकि, मेरे अनुग्रह के कारण तुम कविता करने लगे हो। तुमने तो इसके पूर्व राम की कथा सुन ली है। उस कथा को महाकाव्य के रूप में रचो। जब तक यह पृथ्वी है, तब तक वह भी शाश्वत रहेगा। जब तक वह होगा, तुम्हारा संचार उत्तम लोकों में होता रहेगा।'' यों कहकर ब्रह्मा अदृश्य हो गये।

यों ब्रह्मा के प्रोत्साहन से प्रेरित होकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की, जिसे पढ़कर किसने आनंद नहीं लिया होगा।

वैवस्वत सूर्य का पुत्र था। इक्ष्वाकु वैवस्वत का पुत्र था। वैवस्वत ने सातवॉं मनु होकर शाश्वत कीर्ति कमायी। उनके तदुपरांत इक्ष्वाकु के संतान सूर्यवंशज कहलाये जाने लगे। इनमें से सगर भी एक था। वह छे चक्रवर्तियों में से एक था। स्वर्ग से गंगा को ले आनेवाले भगीरथ इसी सगर का पोता था। सूर्यवंश के राजाओं ने अयोध्या नगर को अपनी राजधानी बनाकर कोसल देश पर शासन किया। वैवस्वत मनु ने स्वयं अयोध्या का निर्माण किया।

शत्रुओं के लिए दुर्भेद्य अयोध्या पर सूर्यवंशी राजा दशरथ शासन करते थे । वे ऐश्वर्य में कुबेर से कम नहीं थे । वे महा पराक्रमी थे।

दृष्टि, जयंत, जिय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मंत्रपाल, सुमंत ये आठों दशरथ के मंत्री थे। वसिष्ठ महामुनि इनके कुलगुरु थे। वसिष्ठ व वामदेव उनके पुरोहित थे। गुप्तचरों के द्वारा उन्हें जानकारी मिलती रहती थी कि देश के किस कोने में क्या हो रहा है। अपने मंत्रियों की सहायता से दशरथ न्यायपूर्वक शासन चलाते थे। उनकी प्रजा हर तरह से सुखी थी। किसी पर कोई अन्याय नहीं करता था। सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते थे। इनके राज्य में कोई दीन-दुखी नहीं था।

दशरथ को किसी बात की कमी नहीं थी, किन्तु वे संतानहीन थे । इसी को लेकर वे बहुत चिंतित रहते थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि अश्र्वमेध याग करके देवताओं को संतुष्ट करूँ और संतान पाऊँ। अपने मंत्रियों में से अग्रगण्य सुमंत के द्वारा उन्होंने वसिष्ठ, वासुदेव, सुयज्ञ, बाबालि आदि गुरुओं को तथा अन्य ब्राह्मण श्रेष्ठों को बुलवाया और उनकी सलाह माँगी। उन्हें अश्वमेध यज्ञ का विचार अच्छा लगा।

उन सबके चले जाने के बाद मंत्री सुमंत ने दशरथ से कहा, "महाराज, आपने जिस अश्वमेध यज्ञ की बात सोची है, वह नितांत उचित है। परंतु इस याग को संपादित करने की शक्ति व महिमा केवल ऋश्यशृंग में ही है। उनसे बढ़कर कोई और नहीं है। उनका वृत्तांत मुझसे सुनिये,'' फिर सुमंत ने यों उनकी कथा सुनायीः

अंगदेश का शासक रोमपाद दशरथ के मित्रों में से एक था। एक बार अंगदेश में भयंकर अकाल पड़ा। रोमपाद इस अकाल को लेकर चिंताग्रस्त हो गया। ब्राह्मणों को बुलवाकर अकाल के अंत का उपाय पूछा।

ब्राह्मणों ने कहा, "महाराज, ऋश्यशृंग, विभंडक मुनि का पुत्र है। जहाँ वह रहता है, वहाँ अकाल नहीं पड़ता। उसे अंगदेश बुलवाइये, अपनी पुत्री शांता से उसका विवाह रचाइये, उसे अंगदेश में ही स्थायी रूप से रहने का प्रबंध कीजिये तो अकाल मिट जायेगा और देश सुभिक्ष होगा।''

तब रोमपाद ने अपने पुरोहित और मंत्रियों को बुलवाया और उनसे कहा, "आप लोग जाइये और ऋश्यशृंग को यहाँ ले आइये।''

यह सुनते ही पुरोहित व मंत्री डर गये, क्योंकि ऋश्यशृंग अरण्य व तपस्या को छोड़कर कहीं निकलता नहीं था। किसी के बुलाने से जानेवालों में से नहीं था। क्रोधित होकर शाप देने की संभावना भी थी। उसे ले आना हो तो कोई मायामय उपाय ढूँढ़ना होगा। पुरोहित ने वह उपाय रोमपाद को यों सुनायाः

"महाराज, ऋश्यशृंग बचपन से ही लेकर अरण्य में ही रहा और वेदों का अध्ययन किया। तपस्या में ही अधिकतर मग्न रहता है। लेकिन उसे प्राकृतिक सौन्दर्य देखते हुए वन में घूमना अच्छा लगता है। वैसे वह बाहर कभी नहीं जाता लेकिन वन के फूलों, पशु-पक्षियों को देखते हुए वह कोसों दूर निकल जाता है। उसमें सांसारिक ज्ञान लेश मात्र भी नहीं है। उसे यह भी नहीं मालूम कि स्त्रियाँ कैसी होती हैं। हम चंद नर्तकियों को उसके पास भेजें तो शायद वह उनके प्रति आकर्षित होकर उनके साथ यहाँ चला आये।

रोमपाद ने इसके लिए अपनी सहमति दे दी। कुछ नर्तकियों को अच्छी तरह से अलंकृत करके उन्हें ऋश्यशृंग के आश्रम में भेजा। ऋश्यशृंग सदा पिता की सेवा सुश्रूषा में लगा रहता था और आश्रम को छोड़कर कहीं जाता नहीं था। परंतु एक दिन किसी कारणवश वह आश्रम के बाहर आया। नर्तकियाँ गीत गाती हुई, नृत्य करती हुई उसके पास पहुँचीं। उनके नयनाभिराम स्वरूपों, अलंकारों, मधुर कंठों को सुनकर ऋश्यशृंग आश्र्चर्य में डूब गया और उनके प्रति आकर्षित हो गया।

नर्तकियों ने उससे पूछा, "आप कौन हैं? इस अरण्य में क्यों अकेले घूम रहे हैं?'' "मैं विभंडक महामुनि का पुत्र हूँ। आप आश्रम आयेंगी तो मैं आपकी उचित रूप से पूजा करूँगा,'' ऋश्यशृंग ने कहा। वे उसके साथ-आश्रम गयीं और उसके दिये कंद, फल खाये। उन नर्तकियों ने भी अपनी तरफ से कुछ पकवान उसे दिये और कहा, "ये भी फल हैं, इन्हें चखकर देखिये। हमें तपस्या करने के लिए अभी लौटना है,'' यह कहती हुई वे वहाँ से चली गयीं।

ऋश्यशृंग ने उनके दिये पकवान खाये और समझा कि वे भी फल ही हैं। परंतु वे पकवान फलों से अधिक स्वादिष्ट थे। दूसरे दिन, उन्हें देखने और मिलने की आशा लेकर वह उसी स्थल पर गया, जहाँ वे कल उससे मिली थीं।

उसे देखते ही उन नर्तकियों ने कहा, "महाशय, आप भी हमारे आश्रम में पधारियेगा। वहाँ आपकी अच्छी आवभगत होगी।''

ऋश्यशृंग ने सानंद अपनी स्वीकृति दे दी और उनके साथ चल पड़ा। ऋश्यशृंग ने अंगदेश में जैसे ही पदार्पण किया, वर्षा होने लगी। रोमपाद ने ऋश्यशृंग का स्वागत किया, साष्टांग नमस्कार किया और उसे इस प्रकार से अपने देश में ले आने के लिए क्षमा माँगी। फिर अपनी पुत्री शांता से उसका विवाह करवाया। ऋश्यशृंग, शांता के साथ अंगदेश में ही बस गया।

सुमंत की बतायी इस कथा को सुनकर दशरथ बहुत ही आनंदित हुए। वसिष्ठ महामुनि की अनुमति पाकर, अपनी पत्त्नियों व मंत्रियों को लेकर दशरथ अंगदेश गये। रोमपाद ने दशरथ का भव्य स्वागत किया। फिर सहर्ष अपने दामाद ऋश्यशृंग व पुत्री शांता को दशरथ के साथ अयोध्या भेजा।

ऋश्यशृंग के अयोध्या आये कुछ दिन बीत गये। वसंत ऋतु ने प्रवेश किया। दशरथ न ऋश्यशृंग से कहा, "कृपया आप यज्ञ का प्रारंभ कीजिये और स्वयं उसे चलाइये।'' अश्वमेध यज्ञ के लिए बहुत बड़े पैमाने पर तैयारियाँ शुरू हो गयीं। यज्ञ करनेवाले, वेदों का पठन करनेवाले सुयज्ञ, वामदेव, बाबालि, काश्यप आदि ब्राह्मण श्रेष्ठ निमंत्रित किये गये। सरयू नदी के उत्तरी तट पर यज्ञशाला का निर्माण हुआ।

शुभ मुहूर्त के दिन दशरथ यज्ञशाला पहुँचे। यज्ञ शुरू हो गया। प्रथम हविर्भाग इंद्र को अर्पित करने के बाद होम चलने लगा।

अश्वमेध यज्ञ तीन दिवसों का यज्ञ है। शास्त्रोक्त विधि से समाप्ति के बाद दशरथ ने यज्ञ करानेवाले ऋत्विजों को सारी भूमि दान में दे दी। उन्होंने दशरथ से कहा, "महाराज, भूमि लेकर हम क्या करेंगे? इस भूमि के बदले हमें मणियाँ, सोना, गायें या कुछ और जो भी है, दान में दीजिये।'' दशरथ ने उन्हें दस लाख गायें, सौ करोड़ का सोना, चार सौ करोड़ की चांदी दान में दिये।

ब्राह्मणों को जो भी दान में मिला, उसे उन्होंने ऋश्यशृंग व वसिष्ठ को समर्पित कर दिया। इतने में एक दरिद्र ब्राह्मण वहाँ आया और दशरथ के सामने हाथ फैलाये। दशरथ ने तुरंत अपने हाथ का कंकण उतारा और उस ब्राह्मण को दे दिया। सब ब्राह्मणों ने दशरथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

अश्वमेध यज्ञ जैसे ही पूरा हुआ, ऋश्यशृंग ने दशरथ से पुत्र कामेष्टि विधि पूरी करवायी। समस्त देवी-देवता आकर अपने-अपने उचित स्थानों पर आसीन हो गये। उस अवसर पर देवताओं ने ब्रह्मा से सविस्तार बताया कि वे रावणासुर के हाथों कितना सताये जा रहे हैं।

ब्रह्मा ने उनसे कहा, "दुष्ट रावण ने वरदान माँगा था कि उसकी मृत्यु देव, दानव, गंधर्व, यक्ष के हाथों न हो। उसकी दृष्टि में मानवों की कोई हस्ती ही नहीं थी। वह उन्हें अशक्त, निस्सहाय व भीरु मानता था। उसका विश्वास था कि मनुष्य जैसा प्राणी भला उसका क्या बिगाड़ सकता है! इसी कारण उसने मनुष्यों से रक्षा नहीं माँगी। सुनो, महाविष्णु दशरथ की पत्त्नियों में से किसी का एक पुत्र होकर जन्म लेंगे और नर रूप में रावण का संहार करेंगे।'' यह घोषणा सुनकर देवता बहुत प्रसन्न हुए।

इतने में होम कुंड से जगमगाता हुआ एक दिव्य स्वरूपी प्रकट हुआ। वह दिव्य स्वरूपी अपने हाथों में एक कलश लिये हुए था। वह कलश सोने का था और उसका ढक्कन चांदी का। उस दिव्य स्वरूपी ने दशरथ से कहा, "राजन्‌, देवताओं ने इस कलश में अपनी पकाई खीर भर कर दी है । प्रजापति की आज्ञा के अनुसार मैं इसे लेकर आया हूँ। यह खीर तुम अपनी पत्त्नियों को खिलाओगे तो वे गर्भवती होंगी और पराक्रमी पुत्रों को जन्म देंगी।''

दशरथ ने बड़े ही आनंद से उस कलश को अपने हाथों में लिया और उस दिव्य स्वरूपी की प्रदक्षिणा की।

दशरथ ने उस कलश में भरी खीर का आधा भाग कौसल्या को दिया। शेष खीर में आधा भाग सुमित्रा को और शेष आधा भाग कैकेयी को। तीनों को देने के बाद जो बचा, उसे पुनः सुमित्रा को दिया। शीघ्र ही तीनों गर्भवती हुईं।

एक ओर महाविष्णु मानव रूप में प्रकट होने की तैयारियाँ कर रहे थे तो दूसरी ओर ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार देवताओं ने काम रूपी बानरों की सृष्टि की। देवेंद्र से बाली, सूर्य से सुग्रीव, कुबेर से गंधमादन, अश्र्विनी देवताओं से मैंदद्विविद, विश्वकर्मा से नल, अग्नि से नील, वरुण से सुषेण, पर्जन्य से शरथ, वायुदेव से हनुमान जन्मे। ये सबके सब महाबली वानर श्रेष्ठ थे। शेष देवताओं से हज़ारों वानर जन्मे। ये वानर ऋष्यमूक नामक पर्वत के निकट बस गये और वाली, सुग्रीव को अपना राजा बनाकर तथा नल, नील, हनुमान आदि को अपना मंत्री बनाकर जीवन यापन करने लगे।

पुत्र कामेष्टि की पूर्ति के बारहवें महीने में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में कौसल्या ने राम को जन्म दिया। पुष्यमी नक्षत्र में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया। अश्लेषा नक्षत्र में मध्याह्न समय पर सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। अयोध्या नगर के नागरिकों ने आनन्दोत्सव मनाया। गलियाँ नाचने-गानेवालों से खचाखच भर गयीं। पूरे राज्य में खुशी की लहर फैल गई। गरीबों में भोजन और वस्त्र बाँटे गये। महीनों तक वातावरण में शीत-संगीत का स्वर गूंजता रहा। राजा के महल में ही नहीं, बल्कि हर प्रजा के घर में राजकुमारों के जन्म का उत्सव मनाया जा रहा था। दशरथ ने विपुल मात्रा में ब्राह्मणों को गोदान व अन्नदान किया।

चारों बालक क्रमशः बडे होने लगे। यद्यपि राम, लक्ष्मण एक ही मॉं के पुत्र नहीं थे, परंतु सदा मिल जुलकर रहते थे। उसी प्रकार भरत, शत्रुघ्न दोनों एक साथ घूमते-फिरते, खेलते-कूदते थे। चारों ने वेद शास्त्रों का अध्ययन किया, धनुर्विद्या में निष्णात बने और पिता की सेवा-सुश्रूषा करते हुए युवक हुए। दशरथ उनके विवाह को लेकर मंत्रियों और पुरोहितों से सलाह-मशविरा करने लगे।

राजा और मंत्री जब इसी चर्चा में तल्लीन थे, तब द्वारपालक ने आकर कहा, "महाराज, कुशिक वंश के, गाधि राजकुमार विश्वामित्र महामुनि आपके दर्शनार्थ आये हैं और द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।''

दशरथ तुरंत पुरोहित को लेकर विश्वामित्र से मिलने गये और उनकी पूजा की, उनका सादर स्वागत किया।

विश्वामित्र ने कहा, "राजन्‌, तुम और तुम्हारी प्रजा सकुशल है न? शत्रु का कोई भय तो नहीं है न?'' कुशल-मंगल जानने के बाद उन्होंने वसिष्ठ से बातें कीं और राजभवन में प्रवेश करके उचित आसन पर आसीन हो गये।

"महामुनि, आपके आगमन से हम धन्य हुए। कहिये, मुझसे आपको क्या चाहिये।'' दशरथ ने पूछा।

विश्वामित्र प्रसन्न होते हुए बोले, "राजन्‌, जिस काम पर मैं आया हूँ उसे पूरा करके प्रमाणित करो कि तुम सत्यनिष्ठ हो। मैंने एक यज्ञ प्रारंभ किया, किन्तु दो पराक्रमी राक्षसों ने मेरी यज्ञ वेदिका पर रक्त मांस बिखेर दिया और मेरे व्रत संकल्प को बिगाड़ डाला। तुम मेरे साथ अपने बड़े बेटे राम को भेज दो। मारीच, सुबाहु नामक उन दोनों राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा करेगा।''

यह सुनते ही दशरथ को लगा कि उसका हृदय मानों फट गया हो। भय-दुख उमड़-उमड़कर आने लगे। सिंहासन से उतरकर कांपते हुए स्वर में दशरथ ने कहा,"महामुनि, राम अभी बालक है। उसके सोलह साल भी पूरे नहीं हुए। वह धनुर्विद्या भी भली-भांति नहीं जानता। भला, वह राक्षसों से क्या लड़ेगा? मेरे पास एक अक्षौहिणी सेना है। मैं स्वयं आकर उनसे युद्ध करूँगा और उन्हें मार डालूँगा। बताइये तो सही, आख़िर वे राक्षस हैं कौन?''

विश्वामित्र ने कहा, "तुम तो रावण नामक राक्षस राजा को जानते हो। ब्रह्मा को प्रस करके उसने कितनी ही अमोघ शक्तियाँ प्राप्त कीं। रावण विश्रवस का पुत्र है, कुबेर का साक्षात्‌ छोटा भाई है। जब वह स्वयं यज्ञ को भंग नहीं कर सकता, तब इन बलशाली मारीच, सुबाहु को भेजता रहता है।''

"बाप रे! रावण? उसका सामना भला मैं क्या करूँगा? जब यह काम मुझसे ही नहीं हो सकता तो बालक राम क्या करेगा?'' दशरथ ने अपनी असहायता जतायी। क्रोध से विश्वामित्र की आँखें लाल हो गयीं। यह कहते हुए वे अचानक उठ गये, "महाराज, वचन से मुकर गये न? क्या यही तुम्हारी सत्यनिष्ठा है? अपकीर्ति ढोते हुए सुखी रहो।''

तब कुलगुरु वसिष्ठ ने दशरथ को डॉंटते हुए कहा,"राजन्‌, जो करना नहीं चाहिये, वह तुम कर रहे हो। वचन से मुकरकर इक्ष्वाकु वंश को कलंकित कर रहे हो। तुमने विश्वामित्र को क्या समझ रखा है? कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं, जिसे वे न जानते हों। नये अस्त्रों की सृष्टि भी वे कर सकते हैं। क्या तुमने यह समझ रखा है कि वे उन राक्षसों को मार नहीं सकते, इसीलिए तुम्हारे पास आये हैं? तुम्हारे पुत्रों का भला करने के लिए ही वे आये हैं। तुम्हारे पुत्रों के विश्वामित्र के साथ रहने से न केवल उनकी विद्या और ज्ञान में पूर्णता आयेगी, बल्कि तुम्हारे पुत्रों को यश मिलेगा। सर्वत्र उनकी कीर्ति फैलेगी। तुम्हारे पुत्र साधारण मानव नहीं हैं। वे दिव्य पुरुष हैं। भविष्य में जो कार्य उनके द्वारा सम्पन्न होनेवाला है, उसकी आधारशिला तैयार करने के लिए विश्वामित्र तुम्हारे बालकों को लेने आये हैं। इसीलिए निश्श्चिन्त होकर राम को उनके साथ भेजो। जब तक वे उनके साथ हैं, उनका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।''

वसिष्ठ के हितबोध से दशरथ में धैर्य आ गया। उन्होंने राम, लक्ष्मण को विश्वामित्र के सुपुर्द किया। राम, लक्ष्मण विश्वामित्र के पीछे-पीछे जाने लगे। दोनों के पास धनुष बाण थे। उनके हाथों में खड्‌ग भी थे।


बालकाण्ड 2
बालकाण्ड 3
बालकाण्ड 4
बालकाण्ड 5
अयोध्या काण्ड - 1
अयोध्या काण्ड - 2
अयोध्या काण्ड - 3
अयोध्या काण्ड - 4
अयोध्या काण्ड - 5
अयोध्या काण्ड - 6
अयोध्या काण्ड - 7
अयोध्या काण्ड - 8
अयोध्या काण्ड - 9
अयोध्या काण्ड - 10
अरण्य काण्ड - 1
अरण्य काण्ड - 2
अरण्य काण्ड - 3
अरण्य काण्ड - 4
अरण्य काण्ड - 5
अरण्य काण्ड - 6
अरण्य काण्ड - 7
किष्किन्धा काण्ड - 1
किष्किन्धा काण्ड - 2
किष्किन्धा काण्ड - 3
किष्किन्धा काण्ड - 4
किष्किन्धा काण्ड - 5
किष्किन्धा काण्ड - 6
किष्किन्धा काण्ड - 7
सुन्दर काण्ड - 1
सुन्दर काण्ड - 2
सुन्दर काण्ड - 3
सुन्दर काण्ड - 4
सुन्दर काण्ड - 5
सुन्दर काण्ड - 6
सुन्दर काण्ड - 7
युद्ध काण्ड - 1
युद्ध काण्ड - 2
युद्ध काण्ड - 3
युद्ध काण्ड - 4
युद्ध काण्ड - 5
युद्ध काण्ड - 6
युद्ध काण्ड - 7

बूढ़े पिता और पत्नी ( Old father and wife )

बहुत पुराने समय की बात है। एक बार बोधिसत्व ने काशी राज्य में एक किसान के घर जन्म लिया। उनके माता-पिता ने नाम रखा-कमल। कमल बड़े लाड़-प्यार में पलने लगा।

बचपन से ही उसकी बुद्धि तीक्ष्ण थी। अपनी अवस्था के बालकों से वह अधिक ज्ञानी और विचारवान था। माता-पिता का दुलारा था, लेकिन दादा का तो वह मानों प्राण था।

दादा बहुत ही बूढ़े थे। वे घर का कोई काम नहीं कर सकते थे। उलटे घर के लोगों को उनकी सेवा में रहना पड़ता। यह बात कमल की माँ को बहुत अखरती थी।

एक दिन कमल की माँ ने अपने पति से कहा, ‘‘मैं तो तुम्हारे पिता की सेवा करते-करते खुद ही स्वर्ग सिधार जाऊँगी। सारा दिन उसी की टहल करते रहो। लगता है घर में और काम ही नहीं हैं। आखिर यह कब तक चलता रहेगा!''

‘‘जब तक उनकी आयु है, तब तक उनकी सेवा करना हमारा धर्म बनता है। आखिर मौत के पहले किसी का गला घोंट कर तो नहीं मार सकते।'' किसान ने थोड़ी तेज आवाज़ में कहा।

‘‘मार डालने में भी क्या बुराई है? ज़िन्दा रहने में न उसे सुख है न हमें। तिल-तिल कर मरने से तो अच्छा है एक बार मौत आ जाये।''

किसान से अधिक पत्नी की आवाज़ तेज़ थी। किसान को पहले पत्नी की बात बहुत बुरी लगती थी। लेकिन धीरे-धीरे पत्नी के दबाव में आकर उसकी बातों से वह भी सहमत हो गया। वह भी सोचने लगा कि पिता को मार देने में कोई पाप नहीं है, बल्कि वे बुढ़ापे की पीड़ा से मुक्त हो जायेंग़े। उसने एक योजना भी बना ली।

एक दिन किसान ने अपने पिता से कहा, ‘‘बाबूजी! खेत में एक कुआँ खोदवाने के लिए पड़ोसी गाँव के महाजन से कर्ज़ ले रहा हूँ। महाजन कहता है कि दस्तावेज़ पर आप के हस्ताक्षर भी आवश्यक हैं। इसलिए मेरे साथ गाड़ी पर कृपा करके चलिये।''

उसका पिता बेटे की बात सच मान कर उसके साथ चल पड़ा। कमल भी ज़िद करके अपने दादा के पास बैठ गया।

रास्ते में एक छोटा-सा जंगल था। किसान ने जंगल के बीच गाड़ी रोक दी। वह एक फावड़ा लेकर उतर पड़ा और बोला, ‘‘तुम दोनों गाड़ी में ठहरो। मैं अभी आता हूँ।''

पिता के जाने के बाद कमल भी एक फावड़ा लेकर उसी ओर चल पड़ा। थोड़ी दूर पर कमल का पिता एक झाड़ी के पास गड्ढा खोद रहा था। उसी झाड़ी के दूसरी ओर कमल भी एक गड्ढा खोदने लग गया।

थोड़ी देर में कुछ आहट पाकर किसान रुक गया। जिधर से आहट आ रही थी, उधर जाकर उसने देखा। ‘‘अरे कमल, तुम यहाँ गड्ढा क्यों खोद रहे हो?''

‘‘जिस काम के लिए आप खोद रहे हैं, मैं भी उसी काम के लिए खोद रहा हूँ।'' कमल के उत्तर ने पिता को झकझोर दिया।

पिता ने साहस करके पूछा, ‘‘क्या तुम्हें मालूम है कि मैं क्यों यह गड्ढा खोद रहा हूँ?''

‘‘मुझे मालूम तो नहीं है लेकिन किसी कार्य के लिए ही ऐसा कर रहे होंगे। आप का अनुसरण करने में क्या कोई दोष है?'' कमल के भोलेपन ने उसके हृदय को छू दिया।

वह अपने बेटे से कुछ छिपा न सका। उसने कहा, ‘‘मैं अपने पिता को दफ़नाने के लिए यह गड्ढा खोद रहा हूँ। उनके मरने पर उनके अन्तिम संस्कार की जिम्मेदारी मुझ पर है, क्योंकि मैं उनका पुत्र हूँ।''
‘‘लेकिन दादा तो अभी जीवित हैं।'' कमल ने जैसे पिता का षड्यंत्र ताड़ लिया हो।

‘‘क्षणभंगुर जीवन का क्या भरोसा! वे किसी समय दम तोड़ सकते हैं। वे बहुत वृद्ध हो चुके हैं।'' पिता ने पुत्र को समझाने की कोशिश की।

‘‘जीवन तो किसी का शाश्र्वत नहीं है। इसलिए मैं भी अपने पिता के लिए क़ब्र खोद रहा हूँ। पुत्र होने के नाते उन्हें दफ़नाने की जिम्मेदारी मेरी है।'' कमल उसी भोलेपन में कह गया।

उसके पिता को लगा जैसे वह आसमान से नीचे गिर गया हो। बेटे ने उसकी आँख की पट्टी खोल दी। उसे अब समझ में आया कि वह नीच कर्म करने जा रहा था। लज्जा से वह गड़ गया।

किसान अपने पिता और पुत्र के साथ घर लौट आया। किसान की पत्नी उस दिन बहुत प्रस थी और विशेष भोजन तथा मिष्टा बना कर अपने पति की प्रतीक्षा कर रही थी। लेकिन गाड़ी में ससुर को देख कर उसकी सारी प्रसता निराशा में बदल गई।

किसान ने, अपनी पत्नी को कमल के गाड़ी में साथ जाने तथा अपने पिता के लिए गड्ढा खोदने का सारा समाचार सुना दिया।

उसकी पत्नी को काटो तो खून नहीं। वह सिर पीटती हुई बोली, ‘‘हाय भगवान? कैसा युग आ गया! हम बेटे को कितना लाड़-प्यार से पालते हैं, लेकिन वह अपने जीवित पिता के लिए ही क़ब्र खोदता है !''

‘‘लेकिन मैं भी तो वही काम करने जा रहा था। क्या उन्होंने मुझे बचपन में लाड़-प्यार से नहीं पाला?'' किसान ने पत्नी की ओर एक विशेष प्रयोजन से देखा।

उसके बाद पत्नी ने अपने बूढ़े ससुर के प्रति कोई शिकायत नहीं की।

17 जुलाई 2010

क्या है बजट ( What is the budget )

सरकार के आर्थिक नीतियों और एक वित्तीय वर्ष का लेखा-जोखा ही बजट कहलाता है। संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत वित्त मंत्री संसद में बजट पेश करते हैं। बजट का सीधा सरोकार आम जनता से होता है, जिस कारण इसे लेकर काफी उत्सुकता रहती है।

देश के वित्तमंत्री बजट के जरिये आगामी वर्ष के लिये सरकार की आमदनी और खर्च का पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करते हैं। साथ ही भविष्य की आर्थिक योजनाओं की भी घोषणा करते हैं। कुल मिलाकर बजट देश की आर्थिक गतिविधि का सूचक होता है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति का भी पता चलता है।

कौन तैयार करता है बजट
बजट को वित्त मंत्री की अगुवाई में सरकार का एक कोर ग्रुप बहुत सावधानी से तैयार करता है। इसमें वित्त मंत्रालय के अधिकारी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष शामिल होते हैं। वित्त मंत्रालय की तरफ से वित्त सचिव, राजस्व और व्यय सचिव बजट तैयार करने में अहम् भूमिका निभाते हैं। इसमें वित्त सचिव पूरी बजट प्रक्रिया को संचालित करता है। बजट तैयार करने से पूर्व विभिन्न मंत्रालयों, हित समूहों, राज्य सरकारों व विशेषज्ञों के साथ लंबा विचार-विमर्श किया जाता है।

ऐसे तैयार होता है बजट
रेवेन्यू यानी आमदनी एवं एक्सपेंडिचर यानी खर्च, आम बजट के दो प्रमुख हिस्से हैं। इसके लिये राजस्व और व्यय विभाग होते हैं। राजस्व विभाग विभिन्न करों एवं अन्य स्त्रोतों से होने वाली आय की गणना करता है जबकि व्यय विभाग संभावित खर्च का ब्योरा सरकार को देता है। एफबीआरएम   एक्ट के निर्देशों के तहत वित्त मंत्रालय पर वित्तीय घाटा कम करने का भी दबाव होता है। इसलिए वह कमाई के लिये नए कर लगाने या कर का दायरा बढाने पर विचार करता है। इसके लिये प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर सरकार के दो महत्वपूर्ण स्त्रोत है।

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यूं बनता है देश का बजट

16 जुलाई 2010

नरकवासी ( Hell resident )

काशी राज्य पर राजा ब्रह्मदत्त शासन कर रहे थे। उसी समय वहाँ एक धनी व्यापारी रहता था। उसके मित्रविंद नामक एक पुत्र था। मित्रविंद बड़ा पापी था। धनी व्यापारी का अल्प आयु में ही देहांत हो गया। इस पर उसकी पत्नी ने अपने पुत्र मित्रविंद को बुलाकर समझाया, ‘‘बेटा, तुम दान-धर्म किया करो। नियमों का पालन करो। धर्म मार्ग का अनुसरण करो! अपने माँ-बाप का नाम रोशन करो ।''

पर मित्रविंद ने अपनी माता की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस बीच कार्तिक पूर्णिमा का पर्व आ पड़ा । मित्रविंद को उसकी माँ ने समझाया, ‘‘बेटा । आज पुण्य पर्व का दिन है। रात भर विहारों में धर्म का उपदेश करते हैं। तुम वहॉं पर जाओ। सबके साथ मिलकर पूजा करो।

उपदेश सुनकर लौट आओ। तुम्हें मैं एक हज़ार मुद्राएँ दूँगी।'' धन के लोभ में आकर मित्रविंद ने माता की बात मान ली। उपदेश सुनने के लिए वह विहार में तो पहुँचा, पर एक कोने में लेट कर सो गया। सवेरा होते ही हाथ-मुँह धोकर सीधे घर चला आया।

माता ने सोचा कि उसका पुत्र धर्म प्रचारक को साथ लेकर घर लौटेगा। इस विचार से उसने दोनों के लिए रसोई बनाई। लेकिन अपने पुत्र को अकेले घर लौटे देख माता ने पूछा, ‘‘बेटा, तुम धर्म-प्रचारक को अपने साथ क्यों नहीं ले आये?'' ‘‘माँ, उनको यहाँ पर लाने की क्या आवश्यकता है? उनके साथ मेरा क्या काम है?''

मित्रविंद ने उत्तर दिया। इसके बाद मित्रविंद खाना खाकर माता से एक हज़ार मुद्राएँ लेकर घर से निकल गया। उस धन को अपनी पूँजी बनाकर मित्रविंद ने कोई व्यापार प्रारंभ किया और कुछ ही दिनों में उसने बीस लाख मुद्राएँ कमा लीं।

उस धन से मित्रविंद संतुष्ट नहीं हुआ। तब उस ने अपने मन में सोचा, ‘मैं इस धन को पूँजी बनाकर समुद्री व्यापार करूँगा। इससे कई गुना अधिक धन कमाऊँगा!' इस विचार से उसने एक नाव खरीद ली। माल खरीदकर नाव पर लदवा दिया, तब समुद्री व्यापार का समाचार सुनाकर अपनी माता से अनुमति लेने के लिए घर पहुँचा।

अपने पुत्र के मुँह से सारा वृत्तांत सुनकर माता की आँखों में आँसू भर आये। वह बोली, ‘‘बेटा, तुम मेरे इकलौते पुत्र हो। तुम्हारे पास आवश्यकता से अधिक धन है। और ज्यादा धन कमाकर तुम क्या करोगे? समुद्री यात्रा खतरों से खाली नहीं है। मेरी बात मानकर अपनी यात्रा बंद करो। घर पर ही रह जाओ! मैं तुमसे यही चाहती हूँ।'' पर मित्रविंद ने अपनी माँ की बात नहीं मानी।

उसने समुद्री यात्रा पर जाने का हठ किया। इस पर माता ने उसका हाथ पकड़कर गिड़गिड़ाते हुए उसे यात्रा पर जाने से रोकना चाहा, लेकिन उस दुष्ट ने अपनी माता को पीटा और जबर्दस्ती हाथ छुड़ाकर घर से निकल गया। उसी दिन मित्रविंद की नाव यात्रा पर चल पड़ी।

सात दिनों तक समुद्री यात्रा बिना विघ्न के आराम से चली, पर आठवें दिन समुद्र के बीच नाव आगे बढ़ने से रुक गई। नाव के नाविकों ने सोचा कि इस दुर्घटना का कारण नाव के यात्रियों में से कोई ज़रूर होगा। इस ख्याल से उन लोगों ने उसका पता लगाने के लिए चिट बाँटा। उस चिट पर मित्रविंद का नाम निकला।

इसपर तीन बार चिट बाँटे गये, तीनों बार चिट पर मित्रविंद का नाम निकला। इसपर नाविकों ने नाव से एक छोटी सी डोंगी निकाली, उसपर मित्रविंद को छोड़कर बाकी सब अपने रास्ते नाव पर आगे बढ़ गये। कई दिन यातनाएँ झेल कर आखिर मित्रविंद एक टापू पर पहुँचा। उस टापू में मित्रविंद को संगमरमर का एक महल दिखाई दिया। उस में चार पिशाचिनियाँ निवास करती थीं।

वे पिशाचिनियाँ सात दिनों तक विलासमय जीवन बिताती थीं और फिर एक सप्ताह तक अपने पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए कठोर नियमों का पालन करती थीं। यह उनका नियम था।

मित्रविंद ने उन पिशाचिनियों के साथ सात दिन विलासपूर्ण जीवन बिताया, पर जब पिशाचिनियों ने सात दिनों के लिए कठोर व्रत का पालन करना प्रारंभ किया तब उसका मन उस व्रत का आचरण करने को तैयार न हुआ। इस पर वह अपनी डोंगी पर वहाँ से चल पड़ा।

कुछ दिन समुद्री यात्रा के बाद मित्रविंद दूसरे टापू पर पहुँचा। उस टापू में आठ पिशाचिनियाँ निवास करती थीं। मित्रविंद ने उन पिशाचिनियों के साथ एक हफ़्ता बिताया, इसके बाद उन पिशाचिनियों ने ज्यों ही कठोर व्रत शुरू किया, त्यों ही वह अपनी डोंगी पर वहाँ से निकल पड़ा।

इस प्रकार उसने एक अन्य टापू में सोलह पिशाचिनियों के साथ और दूसरे टापू में बत्तीस पिशाचिनियों के साथ एक सप्ताह विलासपूर्ण जीवन बिताया। आखिर अपनी डोंगी पर वह एक और टापू में पहुँचा। उस टापू में एक विशाल नगर था। उसके चारों तरफ़ ऊँची दीवार बनी थी।

उसके चार द्वार थे। वह उस्सद नरक था, लेकिन मित्रविंद को वह नरक जैसा प्रतीत न हुआ। बल्कि वह एक सुंदर नगर जैसा लगा। उसने अपने मन में सोचा, ‘मैं इस नगर में प्रवेश करके इसका राजा बन जाऊँगा।' नगर के अन्दर एक स्थान पर मित्रविंद को एक व्यक्ति दिखाई दिया। वह अपने सर पर असिधारा चक्र ढो रहा था।

उसकी धार पैनी थी । साथ ही वह चक्र बोझीला था। इस कारण वह चक्र उस आदमी के सर में धँस गया था। सर से रक्त की धाराएँ बह रही थीं। उसका शरीर पाँच लड़ियोंवाली जंजीर से बंधा हुआ था। वह पीड़ा के मारे कराह रहा था।

उस दृश्य को देखने के बाद भी मित्रविंद इस भ्रम में आ गया कि वह व्यक्ति उस नगर का राजा है। असिधारा चक्र मित्रविंद की आँखों को पद्म जैसा दिखाई दिया। उसकी देह पर बंधी जंजीर उसे एक अलंकृत आभूषण जैसी प्रतीत हुई।

उसकी कराहट गंधर्वगान जैसा सुनाई दिया। मित्रविंद उस नरकवासी के समीप जाकर बोला, ‘‘महाशय, आप बहुत समय से इस पद्म को अपने सर पर धारण किये हुए हैं। मुझे भी थोड़े समय के लिए धारण करने दीजिए!'' ‘‘महाशय, यह तो पद्म नहीं, बल्कि असिधारा चक्र है।'' नरकवासी ने उत्तर दिया। ‘‘ओह, आप तो यह मुझे देना नहीं चाहते, इसीलिए आप यह बात कह रहे हैं।'' मित्रविंद ने कहा।

‘आज से मेरे पापों का परिहार हो गया है। यह भी मेरे जैसे अपनी माँ को पीट कर आया होगा! उस पाप का फल भोगने के लिए ही यहाँ पहुँच गया है।' यों अपने मन में विचार करके नरकवासी ने अपने सर पर के असिधारा चक्र को उतारकर मित्रविंद के सर पर रख दिया और खुशी के साथ अपने रास्ते चला गया। स्वर्ग में इन्द्र के पद पर रहने वाले बोधिसत्व देवगणों को साथ लेकर समस्त नरकों का निरीक्षण करते हुए मित्रविंद के पास पहुँचे।

बोधिसत्व को देखते ही मित्रविंद रोते हुए बोला, ‘‘स्वामी, मुझ पर कृपा कीजिए! कृपया यह बताइये कि इस चक्र से मेरा पिंड कब छूटेगा?'' इस पर इन्द्र ने मित्रविंद को यों समझाया, ‘‘तुमने अपार संपत्ति के होते हुए भी धन की कामना की। पिशाचिनियों के साथ सुख भोगा, मानव द्वारा अनुसरण योग्य उत्तम धर्म-मार्ग तुम्हें अच्छे नहीं लगे। दूसरों ने तुम्हारे हित के लिए जो सलाह दी, उसका तुमने तिरस्कार किया और तुमने अपनी इच्छा से इस चक्र की माँग की। इसलिए तुम्हारे जीवन पर्यंत यह असिधारा चक्र तुमको नहीं छोड़ेगा!'' मित्रविंद अपनी इस दुर्दशा का कारण समझ कर दुख में डूब गया।