19 अगस्त 2010

रामायण - अयोध्याकाण्ड - राम का वनवास ( Ramayan - Ayodhyakand - Ram's exile )

रामचन्द्र ने पिता दशरथ और माता कैकेयी के चरणों को स्पर्श करके उनका अभिवादन किया। राम की ओर देखकर महाराज ने एक ठंडी साँस छोड़ते हुये कहा, "हे राम! ......" और इसके आगे कुछ न कह सके। फिर गहरी और लम्बी साँसें छोड़ने लगे। उनके नेत्रों से अश्रु की धारा बहने लगी। राम ने कैकेयी से बड़े विनीत स्वर में पूछा, "हे माता! पिताजी की ऐसी दशा क्यों हो रही है? उनकी इस दशा का कारण यदि आपको ज्ञात है तो मुझे बताइये। यदि वे मुझसे अप्रसन्न हैं तो मैं उन्हें अप्रसन्न करके एक क्षण भी नहीं जीना चाहता।"

कैकेयी ने कहा, "वत्स! महाराज तुमसे तनिक भी अप्रसन्न नहीं हैं। इनके हृदय में एक विचार उठा है जो तुम्हारे विरुद्ध है। इसलिये ये उसे तुमसे भय एवं संकोच के कारण कह नहीं पा रहे हैं। अतः यह बात मैं ही तुम्हें बताती हूँ। देवासुर संग्राम के समय इन्होंने मुझे दो वर देने का वचन दिया था। आज मैंने इनसे वे दोनों वर माँग लिये। अब तुम अपने पिता की सहायता करो ताकि वे अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह कर सकें। प्रतिज्ञा करो कि जो कुछ मैं कहूँगी, उसका तुम अवश्य पालन करोगे तो मैं तुमसे उन वरदानों के विषय में बता सकती हूँ।" राम बोले, "माता! पिता की आज्ञा से मैं अपने प्राण भी त्याग सकता हूँ। इसलिये मैं आपके चरणों की सौगन्ध खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपके वचनों का अवश्य पालन करूँगा।"

राम की प्रतिज्ञा से सन्तुष्ट होकर कैकेयी ने कहा, "राम! मैंने एक वर से भरत के लिये अयोध्या का राज्य और दूसरे से तुम्हारे लिये चौदह वर्ष का वनवास माँगा है। अब यदि तुम अपने आपको और अपने पिता को प्रतिज्ञा पालक के रूप में सिद्ध करना चाहते हो तो इसी समय वक्कल धारण करके वन के लिये प्रस्थान करो। तुम्हारे जाने के पश्चात् भरत का राज्याभिषेक होगा। तुम्हारे मोह के कारण महाराज दुःखी हो रहे हैं। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञा का पालन करके राजा को पापरूपी सागर से मुक्ति दिलाओ।"

राम ने कैकेयी के वचनों को दुःख और शोक से रहित होकर सुना और मुस्कुराते हुये बोले, "माता! क्या इस छोटी सी बात के लिये ही आप और पिताजी इतने परेशान हो रहे हैं। मैं आज और अभी ही वन को चला जाता हूँ। इसे आप मेरी सत्य प्रतिज्ञा समझें।" राम और कैकेयी के इस संवाद को सुन कर महाराज दशरथ एक बार फिर मूर्छित हो गये। राम मूर्छित पिता और कैकेयी के चरणों में मस्तक नवाकर चुपचाप उस प्रकोष्ठ से बाहर चले गये।

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