19 जुलाई 2010

रामायण - बालकाण्ड 1 ( Ramayana - Balkand 1 )

महामुनि वाल्मीकि का आश्रम तमसा नदी के तट पर था। एक दिन नारद मुनि वहाँ पधारे। वाल्मीकि ने शास्त्रोक्त विधि से उनकी पूजा की और कहा, "महात्मा, इस युग में क्या कोई ऐसा पुरुष है, जो सकल सद्‌गुण संप और महा पराक्रमी हो?''

तब नारद ने, वाल्मीकि को श्रीराम की कथा सविस्तार सुनायी। नारद महामुनि के वहाँ से निकलते-निकलते स्नान का समय हो गया। उनके चले जाने के बाद वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज को लेकर तमसा नदी के तट पर गये।

वहॉं उन्होंने क्रौंच पक्षियों की एक जोडी देखी। वल्कल वस्त्र पहनकर पानी में उतरते हुए वे क्रौंच पक्षियों का आनंद व उत्साह देखते रह गये। इतने में एक भील ने पुरुष पक्षी पर अपना बाण चलाया। वह नीचे गिरकर छटपटाने लगा। मादा पक्षी आर्तनाद करने लगी। यह दृश्य देखकर वाल्मीकि के हृदय में उस पक्षी पर दया उमड़ आयी। उस किरात पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। उनके मुँह से अनायास ही एक श्लोक निकल पड़ा, जिसमें उन्होंने कहा, "अरे ओ कठोर मानव, तुमने प्रेम में मग्न दो पक्षियों में से एक को मार डाला। जीवन भर तुम सुखी और शांत नहीं रहोगे।''

अपने मुँह से निकले श्र्लोक पर वाल्मीकि स्वयं विस्मित हुए। आश्रम लौटने के बाद भी उसी श्र्लोक के बारे में सोचते रहे।

इतने में ब्रह्मा उन्हें देखने आये। उन्हें देखते ही वाल्मीकि तुरंत उठ खडे हो गये और साष्टांग प्रणाम किया। फिर वे मौन खड़े रहे। तब ब्रह्मा ने कहा, "वाल्मीकि, मेरे अनुग्रह के कारण तुम कविता करने लगे हो। तुमने तो इसके पूर्व राम की कथा सुन ली है। उस कथा को महाकाव्य के रूप में रचो। जब तक यह पृथ्वी है, तब तक वह भी शाश्वत रहेगा। जब तक वह होगा, तुम्हारा संचार उत्तम लोकों में होता रहेगा।'' यों कहकर ब्रह्मा अदृश्य हो गये।

यों ब्रह्मा के प्रोत्साहन से प्रेरित होकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की, जिसे पढ़कर किसने आनंद नहीं लिया होगा।

वैवस्वत सूर्य का पुत्र था। इक्ष्वाकु वैवस्वत का पुत्र था। वैवस्वत ने सातवॉं मनु होकर शाश्वत कीर्ति कमायी। उनके तदुपरांत इक्ष्वाकु के संतान सूर्यवंशज कहलाये जाने लगे। इनमें से सगर भी एक था। वह छे चक्रवर्तियों में से एक था। स्वर्ग से गंगा को ले आनेवाले भगीरथ इसी सगर का पोता था। सूर्यवंश के राजाओं ने अयोध्या नगर को अपनी राजधानी बनाकर कोसल देश पर शासन किया। वैवस्वत मनु ने स्वयं अयोध्या का निर्माण किया।

शत्रुओं के लिए दुर्भेद्य अयोध्या पर सूर्यवंशी राजा दशरथ शासन करते थे । वे ऐश्वर्य में कुबेर से कम नहीं थे । वे महा पराक्रमी थे।

दृष्टि, जयंत, जिय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मंत्रपाल, सुमंत ये आठों दशरथ के मंत्री थे। वसिष्ठ महामुनि इनके कुलगुरु थे। वसिष्ठ व वामदेव उनके पुरोहित थे। गुप्तचरों के द्वारा उन्हें जानकारी मिलती रहती थी कि देश के किस कोने में क्या हो रहा है। अपने मंत्रियों की सहायता से दशरथ न्यायपूर्वक शासन चलाते थे। उनकी प्रजा हर तरह से सुखी थी। किसी पर कोई अन्याय नहीं करता था। सभी वर्णों के लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते थे। इनके राज्य में कोई दीन-दुखी नहीं था।

दशरथ को किसी बात की कमी नहीं थी, किन्तु वे संतानहीन थे । इसी को लेकर वे बहुत चिंतित रहते थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि अश्र्वमेध याग करके देवताओं को संतुष्ट करूँ और संतान पाऊँ। अपने मंत्रियों में से अग्रगण्य सुमंत के द्वारा उन्होंने वसिष्ठ, वासुदेव, सुयज्ञ, बाबालि आदि गुरुओं को तथा अन्य ब्राह्मण श्रेष्ठों को बुलवाया और उनकी सलाह माँगी। उन्हें अश्वमेध यज्ञ का विचार अच्छा लगा।

उन सबके चले जाने के बाद मंत्री सुमंत ने दशरथ से कहा, "महाराज, आपने जिस अश्वमेध यज्ञ की बात सोची है, वह नितांत उचित है। परंतु इस याग को संपादित करने की शक्ति व महिमा केवल ऋश्यशृंग में ही है। उनसे बढ़कर कोई और नहीं है। उनका वृत्तांत मुझसे सुनिये,'' फिर सुमंत ने यों उनकी कथा सुनायीः

अंगदेश का शासक रोमपाद दशरथ के मित्रों में से एक था। एक बार अंगदेश में भयंकर अकाल पड़ा। रोमपाद इस अकाल को लेकर चिंताग्रस्त हो गया। ब्राह्मणों को बुलवाकर अकाल के अंत का उपाय पूछा।

ब्राह्मणों ने कहा, "महाराज, ऋश्यशृंग, विभंडक मुनि का पुत्र है। जहाँ वह रहता है, वहाँ अकाल नहीं पड़ता। उसे अंगदेश बुलवाइये, अपनी पुत्री शांता से उसका विवाह रचाइये, उसे अंगदेश में ही स्थायी रूप से रहने का प्रबंध कीजिये तो अकाल मिट जायेगा और देश सुभिक्ष होगा।''

तब रोमपाद ने अपने पुरोहित और मंत्रियों को बुलवाया और उनसे कहा, "आप लोग जाइये और ऋश्यशृंग को यहाँ ले आइये।''

यह सुनते ही पुरोहित व मंत्री डर गये, क्योंकि ऋश्यशृंग अरण्य व तपस्या को छोड़कर कहीं निकलता नहीं था। किसी के बुलाने से जानेवालों में से नहीं था। क्रोधित होकर शाप देने की संभावना भी थी। उसे ले आना हो तो कोई मायामय उपाय ढूँढ़ना होगा। पुरोहित ने वह उपाय रोमपाद को यों सुनायाः

"महाराज, ऋश्यशृंग बचपन से ही लेकर अरण्य में ही रहा और वेदों का अध्ययन किया। तपस्या में ही अधिकतर मग्न रहता है। लेकिन उसे प्राकृतिक सौन्दर्य देखते हुए वन में घूमना अच्छा लगता है। वैसे वह बाहर कभी नहीं जाता लेकिन वन के फूलों, पशु-पक्षियों को देखते हुए वह कोसों दूर निकल जाता है। उसमें सांसारिक ज्ञान लेश मात्र भी नहीं है। उसे यह भी नहीं मालूम कि स्त्रियाँ कैसी होती हैं। हम चंद नर्तकियों को उसके पास भेजें तो शायद वह उनके प्रति आकर्षित होकर उनके साथ यहाँ चला आये।

रोमपाद ने इसके लिए अपनी सहमति दे दी। कुछ नर्तकियों को अच्छी तरह से अलंकृत करके उन्हें ऋश्यशृंग के आश्रम में भेजा। ऋश्यशृंग सदा पिता की सेवा सुश्रूषा में लगा रहता था और आश्रम को छोड़कर कहीं जाता नहीं था। परंतु एक दिन किसी कारणवश वह आश्रम के बाहर आया। नर्तकियाँ गीत गाती हुई, नृत्य करती हुई उसके पास पहुँचीं। उनके नयनाभिराम स्वरूपों, अलंकारों, मधुर कंठों को सुनकर ऋश्यशृंग आश्र्चर्य में डूब गया और उनके प्रति आकर्षित हो गया।

नर्तकियों ने उससे पूछा, "आप कौन हैं? इस अरण्य में क्यों अकेले घूम रहे हैं?'' "मैं विभंडक महामुनि का पुत्र हूँ। आप आश्रम आयेंगी तो मैं आपकी उचित रूप से पूजा करूँगा,'' ऋश्यशृंग ने कहा। वे उसके साथ-आश्रम गयीं और उसके दिये कंद, फल खाये। उन नर्तकियों ने भी अपनी तरफ से कुछ पकवान उसे दिये और कहा, "ये भी फल हैं, इन्हें चखकर देखिये। हमें तपस्या करने के लिए अभी लौटना है,'' यह कहती हुई वे वहाँ से चली गयीं।

ऋश्यशृंग ने उनके दिये पकवान खाये और समझा कि वे भी फल ही हैं। परंतु वे पकवान फलों से अधिक स्वादिष्ट थे। दूसरे दिन, उन्हें देखने और मिलने की आशा लेकर वह उसी स्थल पर गया, जहाँ वे कल उससे मिली थीं।

उसे देखते ही उन नर्तकियों ने कहा, "महाशय, आप भी हमारे आश्रम में पधारियेगा। वहाँ आपकी अच्छी आवभगत होगी।''

ऋश्यशृंग ने सानंद अपनी स्वीकृति दे दी और उनके साथ चल पड़ा। ऋश्यशृंग ने अंगदेश में जैसे ही पदार्पण किया, वर्षा होने लगी। रोमपाद ने ऋश्यशृंग का स्वागत किया, साष्टांग नमस्कार किया और उसे इस प्रकार से अपने देश में ले आने के लिए क्षमा माँगी। फिर अपनी पुत्री शांता से उसका विवाह करवाया। ऋश्यशृंग, शांता के साथ अंगदेश में ही बस गया।

सुमंत की बतायी इस कथा को सुनकर दशरथ बहुत ही आनंदित हुए। वसिष्ठ महामुनि की अनुमति पाकर, अपनी पत्त्नियों व मंत्रियों को लेकर दशरथ अंगदेश गये। रोमपाद ने दशरथ का भव्य स्वागत किया। फिर सहर्ष अपने दामाद ऋश्यशृंग व पुत्री शांता को दशरथ के साथ अयोध्या भेजा।

ऋश्यशृंग के अयोध्या आये कुछ दिन बीत गये। वसंत ऋतु ने प्रवेश किया। दशरथ न ऋश्यशृंग से कहा, "कृपया आप यज्ञ का प्रारंभ कीजिये और स्वयं उसे चलाइये।'' अश्वमेध यज्ञ के लिए बहुत बड़े पैमाने पर तैयारियाँ शुरू हो गयीं। यज्ञ करनेवाले, वेदों का पठन करनेवाले सुयज्ञ, वामदेव, बाबालि, काश्यप आदि ब्राह्मण श्रेष्ठ निमंत्रित किये गये। सरयू नदी के उत्तरी तट पर यज्ञशाला का निर्माण हुआ।

शुभ मुहूर्त के दिन दशरथ यज्ञशाला पहुँचे। यज्ञ शुरू हो गया। प्रथम हविर्भाग इंद्र को अर्पित करने के बाद होम चलने लगा।

अश्वमेध यज्ञ तीन दिवसों का यज्ञ है। शास्त्रोक्त विधि से समाप्ति के बाद दशरथ ने यज्ञ करानेवाले ऋत्विजों को सारी भूमि दान में दे दी। उन्होंने दशरथ से कहा, "महाराज, भूमि लेकर हम क्या करेंगे? इस भूमि के बदले हमें मणियाँ, सोना, गायें या कुछ और जो भी है, दान में दीजिये।'' दशरथ ने उन्हें दस लाख गायें, सौ करोड़ का सोना, चार सौ करोड़ की चांदी दान में दिये।

ब्राह्मणों को जो भी दान में मिला, उसे उन्होंने ऋश्यशृंग व वसिष्ठ को समर्पित कर दिया। इतने में एक दरिद्र ब्राह्मण वहाँ आया और दशरथ के सामने हाथ फैलाये। दशरथ ने तुरंत अपने हाथ का कंकण उतारा और उस ब्राह्मण को दे दिया। सब ब्राह्मणों ने दशरथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

अश्वमेध यज्ञ जैसे ही पूरा हुआ, ऋश्यशृंग ने दशरथ से पुत्र कामेष्टि विधि पूरी करवायी। समस्त देवी-देवता आकर अपने-अपने उचित स्थानों पर आसीन हो गये। उस अवसर पर देवताओं ने ब्रह्मा से सविस्तार बताया कि वे रावणासुर के हाथों कितना सताये जा रहे हैं।

ब्रह्मा ने उनसे कहा, "दुष्ट रावण ने वरदान माँगा था कि उसकी मृत्यु देव, दानव, गंधर्व, यक्ष के हाथों न हो। उसकी दृष्टि में मानवों की कोई हस्ती ही नहीं थी। वह उन्हें अशक्त, निस्सहाय व भीरु मानता था। उसका विश्वास था कि मनुष्य जैसा प्राणी भला उसका क्या बिगाड़ सकता है! इसी कारण उसने मनुष्यों से रक्षा नहीं माँगी। सुनो, महाविष्णु दशरथ की पत्त्नियों में से किसी का एक पुत्र होकर जन्म लेंगे और नर रूप में रावण का संहार करेंगे।'' यह घोषणा सुनकर देवता बहुत प्रसन्न हुए।

इतने में होम कुंड से जगमगाता हुआ एक दिव्य स्वरूपी प्रकट हुआ। वह दिव्य स्वरूपी अपने हाथों में एक कलश लिये हुए था। वह कलश सोने का था और उसका ढक्कन चांदी का। उस दिव्य स्वरूपी ने दशरथ से कहा, "राजन्‌, देवताओं ने इस कलश में अपनी पकाई खीर भर कर दी है । प्रजापति की आज्ञा के अनुसार मैं इसे लेकर आया हूँ। यह खीर तुम अपनी पत्त्नियों को खिलाओगे तो वे गर्भवती होंगी और पराक्रमी पुत्रों को जन्म देंगी।''

दशरथ ने बड़े ही आनंद से उस कलश को अपने हाथों में लिया और उस दिव्य स्वरूपी की प्रदक्षिणा की।

दशरथ ने उस कलश में भरी खीर का आधा भाग कौसल्या को दिया। शेष खीर में आधा भाग सुमित्रा को और शेष आधा भाग कैकेयी को। तीनों को देने के बाद जो बचा, उसे पुनः सुमित्रा को दिया। शीघ्र ही तीनों गर्भवती हुईं।

एक ओर महाविष्णु मानव रूप में प्रकट होने की तैयारियाँ कर रहे थे तो दूसरी ओर ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार देवताओं ने काम रूपी बानरों की सृष्टि की। देवेंद्र से बाली, सूर्य से सुग्रीव, कुबेर से गंधमादन, अश्र्विनी देवताओं से मैंदद्विविद, विश्वकर्मा से नल, अग्नि से नील, वरुण से सुषेण, पर्जन्य से शरथ, वायुदेव से हनुमान जन्मे। ये सबके सब महाबली वानर श्रेष्ठ थे। शेष देवताओं से हज़ारों वानर जन्मे। ये वानर ऋष्यमूक नामक पर्वत के निकट बस गये और वाली, सुग्रीव को अपना राजा बनाकर तथा नल, नील, हनुमान आदि को अपना मंत्री बनाकर जीवन यापन करने लगे।

पुत्र कामेष्टि की पूर्ति के बारहवें महीने में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में कौसल्या ने राम को जन्म दिया। पुष्यमी नक्षत्र में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया। अश्लेषा नक्षत्र में मध्याह्न समय पर सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। अयोध्या नगर के नागरिकों ने आनन्दोत्सव मनाया। गलियाँ नाचने-गानेवालों से खचाखच भर गयीं। पूरे राज्य में खुशी की लहर फैल गई। गरीबों में भोजन और वस्त्र बाँटे गये। महीनों तक वातावरण में शीत-संगीत का स्वर गूंजता रहा। राजा के महल में ही नहीं, बल्कि हर प्रजा के घर में राजकुमारों के जन्म का उत्सव मनाया जा रहा था। दशरथ ने विपुल मात्रा में ब्राह्मणों को गोदान व अन्नदान किया।

चारों बालक क्रमशः बडे होने लगे। यद्यपि राम, लक्ष्मण एक ही मॉं के पुत्र नहीं थे, परंतु सदा मिल जुलकर रहते थे। उसी प्रकार भरत, शत्रुघ्न दोनों एक साथ घूमते-फिरते, खेलते-कूदते थे। चारों ने वेद शास्त्रों का अध्ययन किया, धनुर्विद्या में निष्णात बने और पिता की सेवा-सुश्रूषा करते हुए युवक हुए। दशरथ उनके विवाह को लेकर मंत्रियों और पुरोहितों से सलाह-मशविरा करने लगे।

राजा और मंत्री जब इसी चर्चा में तल्लीन थे, तब द्वारपालक ने आकर कहा, "महाराज, कुशिक वंश के, गाधि राजकुमार विश्वामित्र महामुनि आपके दर्शनार्थ आये हैं और द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।''

दशरथ तुरंत पुरोहित को लेकर विश्वामित्र से मिलने गये और उनकी पूजा की, उनका सादर स्वागत किया।

विश्वामित्र ने कहा, "राजन्‌, तुम और तुम्हारी प्रजा सकुशल है न? शत्रु का कोई भय तो नहीं है न?'' कुशल-मंगल जानने के बाद उन्होंने वसिष्ठ से बातें कीं और राजभवन में प्रवेश करके उचित आसन पर आसीन हो गये।

"महामुनि, आपके आगमन से हम धन्य हुए। कहिये, मुझसे आपको क्या चाहिये।'' दशरथ ने पूछा।

विश्वामित्र प्रसन्न होते हुए बोले, "राजन्‌, जिस काम पर मैं आया हूँ उसे पूरा करके प्रमाणित करो कि तुम सत्यनिष्ठ हो। मैंने एक यज्ञ प्रारंभ किया, किन्तु दो पराक्रमी राक्षसों ने मेरी यज्ञ वेदिका पर रक्त मांस बिखेर दिया और मेरे व्रत संकल्प को बिगाड़ डाला। तुम मेरे साथ अपने बड़े बेटे राम को भेज दो। मारीच, सुबाहु नामक उन दोनों राक्षसों से मेरे यज्ञ की रक्षा करेगा।''

यह सुनते ही दशरथ को लगा कि उसका हृदय मानों फट गया हो। भय-दुख उमड़-उमड़कर आने लगे। सिंहासन से उतरकर कांपते हुए स्वर में दशरथ ने कहा,"महामुनि, राम अभी बालक है। उसके सोलह साल भी पूरे नहीं हुए। वह धनुर्विद्या भी भली-भांति नहीं जानता। भला, वह राक्षसों से क्या लड़ेगा? मेरे पास एक अक्षौहिणी सेना है। मैं स्वयं आकर उनसे युद्ध करूँगा और उन्हें मार डालूँगा। बताइये तो सही, आख़िर वे राक्षस हैं कौन?''

विश्वामित्र ने कहा, "तुम तो रावण नामक राक्षस राजा को जानते हो। ब्रह्मा को प्रस करके उसने कितनी ही अमोघ शक्तियाँ प्राप्त कीं। रावण विश्रवस का पुत्र है, कुबेर का साक्षात्‌ छोटा भाई है। जब वह स्वयं यज्ञ को भंग नहीं कर सकता, तब इन बलशाली मारीच, सुबाहु को भेजता रहता है।''

"बाप रे! रावण? उसका सामना भला मैं क्या करूँगा? जब यह काम मुझसे ही नहीं हो सकता तो बालक राम क्या करेगा?'' दशरथ ने अपनी असहायता जतायी। क्रोध से विश्वामित्र की आँखें लाल हो गयीं। यह कहते हुए वे अचानक उठ गये, "महाराज, वचन से मुकर गये न? क्या यही तुम्हारी सत्यनिष्ठा है? अपकीर्ति ढोते हुए सुखी रहो।''

तब कुलगुरु वसिष्ठ ने दशरथ को डॉंटते हुए कहा,"राजन्‌, जो करना नहीं चाहिये, वह तुम कर रहे हो। वचन से मुकरकर इक्ष्वाकु वंश को कलंकित कर रहे हो। तुमने विश्वामित्र को क्या समझ रखा है? कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं, जिसे वे न जानते हों। नये अस्त्रों की सृष्टि भी वे कर सकते हैं। क्या तुमने यह समझ रखा है कि वे उन राक्षसों को मार नहीं सकते, इसीलिए तुम्हारे पास आये हैं? तुम्हारे पुत्रों का भला करने के लिए ही वे आये हैं। तुम्हारे पुत्रों के विश्वामित्र के साथ रहने से न केवल उनकी विद्या और ज्ञान में पूर्णता आयेगी, बल्कि तुम्हारे पुत्रों को यश मिलेगा। सर्वत्र उनकी कीर्ति फैलेगी। तुम्हारे पुत्र साधारण मानव नहीं हैं। वे दिव्य पुरुष हैं। भविष्य में जो कार्य उनके द्वारा सम्पन्न होनेवाला है, उसकी आधारशिला तैयार करने के लिए विश्वामित्र तुम्हारे बालकों को लेने आये हैं। इसीलिए निश्श्चिन्त होकर राम को उनके साथ भेजो। जब तक वे उनके साथ हैं, उनका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।''

वसिष्ठ के हितबोध से दशरथ में धैर्य आ गया। उन्होंने राम, लक्ष्मण को विश्वामित्र के सुपुर्द किया। राम, लक्ष्मण विश्वामित्र के पीछे-पीछे जाने लगे। दोनों के पास धनुष बाण थे। उनके हाथों में खड्‌ग भी थे।


बालकाण्ड 2
बालकाण्ड 3
बालकाण्ड 4
बालकाण्ड 5
अयोध्या काण्ड - 1
अयोध्या काण्ड - 2
अयोध्या काण्ड - 3
अयोध्या काण्ड - 4
अयोध्या काण्ड - 5
अयोध्या काण्ड - 6
अयोध्या काण्ड - 7
अयोध्या काण्ड - 8
अयोध्या काण्ड - 9
अयोध्या काण्ड - 10
अरण्य काण्ड - 1
अरण्य काण्ड - 2
अरण्य काण्ड - 3
अरण्य काण्ड - 4
अरण्य काण्ड - 5
अरण्य काण्ड - 6
अरण्य काण्ड - 7
किष्किन्धा काण्ड - 1
किष्किन्धा काण्ड - 2
किष्किन्धा काण्ड - 3
किष्किन्धा काण्ड - 4
किष्किन्धा काण्ड - 5
किष्किन्धा काण्ड - 6
किष्किन्धा काण्ड - 7
सुन्दर काण्ड - 1
सुन्दर काण्ड - 2
सुन्दर काण्ड - 3
सुन्दर काण्ड - 4
सुन्दर काण्ड - 5
सुन्दर काण्ड - 6
सुन्दर काण्ड - 7
युद्ध काण्ड - 1
युद्ध काण्ड - 2
युद्ध काण्ड - 3
युद्ध काण्ड - 4
युद्ध काण्ड - 5
युद्ध काण्ड - 6
युद्ध काण्ड - 7

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