02 फ़रवरी 2009

सिख धर्म



सिख शब्द का शाब्दिक अर्थ शिष्य है। श्री गुरु नानक देव जी से लेकर श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज तक १० गुरु हुये। उनके बाद गुरुगद्दी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सौंप दी गई थी। दस गुरुओं तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हुक्म के अनुसार जीवन यापन करने वाला व्यक्ति सिख कहलाता है। इस समय सिख धर्म दुनियां का पांचवा सबसे बड़ा धर्म है। सिख धर्म के संस्थापक जगत गुरु श्री नानक देव जी हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने खालसा पंथ में उसे परिवर्तित किया। खालसा का अर्थ खालिस अर्थात शुद्ध होता है। इस प्रकार दस गुरुओं ने २४० वर्षों तक मेहनत कर मनुष्य को जिस सांचे मे ढाला, वह खालसा कहलाया। सिख धर्म पंद्रहवीं शताब्दी में उपजा और सत्रहवीं शताब्दी में धर्म रूप में परिवर्तित हुआ था। उत्तर भारत में पंजाब राज्य में जन्मा था। इसके प्रथम गुरु थे गुरु नानक देव जी, और फ़िर बाद में नौ और गुरु हुए सिख धर्म: सिख एक ही ईश्वर को मानते हैं, पर उसके पास जाने के लिये दस गुरुओं की सहायता को महत्त्वपूर्ण समझते हैं । इनका धर्मग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब है । अधिकांश सिख पंजाब (भारत) में रहते हैं । सिख एक ही ईश्वर को मानते हैं, जिसे वे एक-ओंकार कहते हैं । उनका मानना है कि ईश्वर अकाल और निरंकार है । सिख शब्द संस्कृत शब्द शिष्य से निकला है, जिसका अर्थ है शिष्य या अनुयायी। सिख धर्म विश्व का नौवां बड्क्षा धर्म है। इसे पाँचवां संगठित धर्म भी माना जाता है।

श्री गुरु नानक देव जी ने मनुष्य को ८४ लाख कष्टदायक योनियों से छुटकारा प्राप्त करने के लिये एक ईश्वर के नाम का हर वक्त सुमिरन करते रहने का उपदेश दिया है। साथ ही आपने संयम का जीवन व्यतीत करने के लिये भी कहा है। सिख गुरु दर्शन के अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिये जंगल या पहाड़ों में जाकर शरीर को गैर जरुरी कष्ट देकर साधना करनी आवश्यक नही है। अपितु गृहस्थ आश्रम में ही रहते हुये जीवन को एक खास सांचे में ढालकर हंसते-खेलते, पहनते तथा खाते हुये मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि खालसा मात्र किसी खास पहरावे या वेश भुषा का नाम नही है। यों एक दीक्षित सिख को पांच तरह के चिन्ह शरीर पर धारण करने अनिवार्य हैं। ये हैं – केश, कंघा, कड़ा, कृपाण तथा कच्छ।

गुरु ग्रंथ साहिब सिख धर्म का प्रमुख धर्मग्रन्थ है। इसका संपादन सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 16 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इसमे कुल 1430 पृष्ठ है।


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